Sunday 8 November 2009

प्रयोगधर्मिता से निकली राह : सुनीत घिल्डियाल का कला संसार



सुनीत घिल्डियाल राजस्‍थान के बेहद प्रशंसित और प्रतिष्ठित चित्रकार हैं। राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उनके काम को एक दर्जन से अधिक बार सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। देश-विदेश तक उनकी कलाकृतियां पहुंची हैं और सराही गई हैं। राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न कला शिविरों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। उनके चित्र चालीस से अधिक एकल व समूह प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किये गए हैं। हेमवतीनंदन बहुगुणा विश्‍वविद्यालय, गढ़वाल से कला में स्नातकोत्तर सुनीत वर्तमान में जयपुर में राजस्थान स्कूल आफ आर्ट में पढ़ा रहे हैं।
स्वभाव से बेहद हंसमुख, मिलनसार और निरंतर कला की धुन में मगन रहने वाले सुनीत घिल्डियाल का काम मुझे व्यक्तिगत रूप से उस वक्त से पसंद रहा है, जब वे पेंसिल ड्राइंग से अत्यंत अर्थवान चित्रों की रचना किया करते थे। यह बात करीब दो दशक पुरानी है। इस बीच सुनीत ने एक लंबी कला यात्रा की है, जिसमें वृहदाकार कैनवस से लेकर ताजा काष्ठ कलाकृतियों का अभिनव कला संसार समाहित है। मुझे इस पूरी कला यात्रा को देखकर महसूस होता है कि अब शायद सुनीत को अपना मनचाहा कला रूप या कहें कि माध्यम मिल गया है। पता नहीं क्यों ये पंक्तियां लिखते वक्त मुझे सुनीत की वो ड्राइंग बुक्स याद आ रही हैं, जिन्हें दिखाते हुए सुनीत एक-एक चित्र की गहन व्याख्या कर मुझे अपनी सृजनशीलता की गहराई से ही नहीं बल्कि अपनी विचार प्रक्रिया और उससे संबद्ध सृजन प्रक्रिया से प्रभावित किया करते थे। उस दौर में वे एक युवा कलाकार के तौर पर जिस आत्म संघर्ष की प्रक्रिया से गुजर रहे थे, वह आज जिस मुकाम पर आई है, उसमें सुनीत की बरसों की कलात्मक अंतर्यात्रा बहुत गहराई से रची-बसी है और मुझे गहरी आश्‍वस्ति देती है। उनके कला संसार की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे मूर्त और अमूर्त दोनों तरह के चित्र बनाते हैं और बहुधा उनके यहां दोनों का अत्यंत सुंदर समावेश देखने को मिलता है।



इन बरसों में सुनीत ने रंग और रेखाओं के साथ जो रिश्‍ता बनाया वह कागज, कैनवस से आगे चलकर काष्ठ कला के नए आयामों वाली कला में विकसित हुआ है। कला के सुधी प्रेक्षकों को याद होगा कि सुनीत अपनी ‘फेसेज’ चित्र श्रृंखला से बेहद चर्चित हुए थे, जिसमें उन्हें कई सम्मान-पुरस्कार हासिल हुए थे। पिछले एक दशक से सुनीत ने इस नई कला प्रविधि में देवदार की लकड़ी के पटरे पर कुरेद कर आकृतियां बनाई हैं और इनमें रंग भर कर बेहद खूबसूरत कलाकृतियों का सृजन किया है। लकड़ी पर सुनीत रंगों को कुछ इस प्रकार भरते हैं कि लकड़ी का अपना सौंदर्य भी बना रहे और रंगों की पारदर्षिता प्रेक्षक को नया कलात्मक आस्वाद प्रदान करे। कागज से काष्ठ तक की इस यात्रा को मैं सुनीत की चित्रकला में एक माध्यम भर की खोज हीं नहीं मानता, बल्कि मेरे लिए यह यात्रा सुनीत के चित्रों की अंतर्वस्तु की यात्रा भी है। क्योंकि मेरे लिए कला में माध्यम की खोज अंततः अंतर्वस्तु के बिना नहीं हो सकती। इसलिए मुझे सुनीत की इस नई कला प्रविधि में उनकी वर्षों की सतत कला साधना और गहरी विचार प्रक्रिया दृष्टिगत होती है।



सुनीत ने इस नई कला यात्रा को ‘टाइम एण्ड लाइफ-ए कण्टीन्युअस जर्नी’ शीर्षक दिया है। एक सृजनशील कलाकार के लिए यह शीर्षक उचित भी है, क्योंकि वह इस तरह अपनी पूरी सृजन यात्रा को बयां कर रहा होता है। इस यात्रा पथ में जितने उतार-चढाव हो सकते हैं, वे सब आपको उनकी कला में दिखाई देंगे। हंसी-खुशी के पल हों या किंचित अवसाद के, जीवन के चमकीले प्रकाशमान अवसर हों या गहरी स्मृतियां, सुनीत की कला में वो सब अपनी सदेह उपस्थिति दर्ज कराते हैं। दरअसल सुनीत के काम में आपको एक अजीब किस्म की गहरी संलग्नता दिखाई देती है, जो आपको पहली नजर में ठिठका देती है और जब आप एकबारगी ठहर कर उनके काम को देखने लगते हैं तो रंग और आकृतियों के व्यामोह में आप पूरी तरह खो जाते हैं। फिर आप अपनी स्मृतियों पर जोर डालने लगते हैं और आपके सामने आपका अपना स्मृतिलोक एक नए कलात्मक रूप में सामने दिखने लगता है। इस तरह सुनीत अपने प्रेक्षक को कई स्तरों पर देखने सोचने के लिए विवश करते हुए आधुनिक कला की अद्भुत कल्पनाशील सर्जनात्मक दुनिया से साक्षात कराते हैं। आधुनिक कला को अर्थहीन कहने वाले बहुतेरे लोग मिल जाएंगे, लेकिन ऐसे लोगों को भी सुनीत की कला, मेरा दावा है, एकबारगी तो गहराई से देखने और सोचने के लिए विवश करेगी ही।



सुनीत गढ़वाल, उत्तराखंड में जन्मे हैं और उनके कला संसार में वहां की खूबसूरत वादियों के साथ, सर्पिल राहें, पगडंडियां, फूलों से महकता परिवेश, जाड़ों में कांपता-सा सूरज, ग्रामीण जनजीवन में व्याप्त लोक रूपाकार, कठोर पहाड़ी जीवन का संघर्ष और इस सबके साथ राजस्थान के रेतीले धोरों की पीली उजास भरी दुनिया इस तरह एकाकार हो गई है कि दो विपरीत छोरों के अंचलों के तमाम रंग उनके काम में सहज दृष्टिगोचर होते हैं। सुनीत प्रारंभ से ही प्रयोगधर्मी रहे हैं और इस माध्यम में उनकी प्रयोगशीलता बहुत आगे निकल आई है, जहां वे काष्ठ पटरे को कैनवस की तरह इस्तेमाल करते हुए उसे कैनवस से अलग भी आकार देते हैं, यानी तयशुदा ज्यामितीय आकार से अलग एक किस्म का ‘लोक रूप’, जिसमें आपको कांकड़ पर विराजमान लोकदेवता के थान की याद आ जाए या फिर गांव-देहात में बिखरे लोक कलारूपों की।



सुनीत के काम की खूबी यही है कि इसमें हमारी जानी पहचानी दुनिया नए रूपाकारों में दिखाई देती है। इस बात को मैं विशेष रूप से कहना चाहता हूं कि आज के आधुनिक कला जगत में जब बहुतेरे कलाकारों की कला प्रेक्षक को एक अजीब किस्म से भयभीत करती है या सजावटी सामान की तरह दिखाई देती है, सुनीत की कला एक विचार प्रक्रिया से गुजरने और सहज ढंग से आधुनिक कला का आस्वाद लेने के लिए आमंत्रित करती है। सुनीत ने वर्षों की प्रयोगधर्मिता के बाद नए माध्यम की खोज करते हुए जो अंतर्यात्रा की है, वह एक और नए सुनीत की संभावना जगाती है, जो अगली बार कुछ और अर्थवान रचता हुआ, हमारे लिए नई कलात्मक दुनिया लेकर आएगा। इस अंतर्यात्रा का हासिल यह है तो इसका आगामी पड़ाव और बेहतर होगा, यही उम्मीद करनी चाहिए।


(सुनीत घिल्डियाल से ए-60, गोल मार्केट, जवाहर नगर, जयपुर, मोबाइल नंबर 09413622979 पर संपर्क किया जा सकता है। यह आलेख जयपुर से समांतर संस्‍थान द्वारा प्रकाशित की जाने वाली द्विमासिक पत्रिका 'संस्‍कृति मीमांसा' के जुलाई-अगस्‍त अंक में शाया हुआ।)





Monday 2 November 2009

आलोचना की उपेक्षा परंपरा के शिकार जनकवि


हिंदी आलोचना की परंपराओं में उपेक्षा भी एक परंपरा ही है, जिसमें अनेक महत्वपूर्ण कवियों को बिल्कुल भुला दिया जाता है और कम महत्वपूर्ण कवियों को खासी तवज्जोह देकर महान सिद्ध कर दिया जाता है। ऐसी उपेक्षा के शिकार कवियों में हिंदी और राजस्थानी के सुप्रसिद्ध जनकवि हरीश भादाणी भी हैं। साहित्य की तथाकथित मुख्यधारा ने भले ही हरीश भादाणी को ज्यादा महत्व ना दिया हो, लेकिन वे एक ऐसे कवि थे, जिनकी कविता हजारों लाखों कण्ठों से एक साथ फूटती हुई इंकलाब का परचम बन जाती है। गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर, 2009 को ऋषि परंपरा के इस महान कवि ने कैंसर से लड़ते हुए अंतिम सांस ली। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उनकी महायात्रा में बीकानेर और प्रदेश भर से आए हजारों लोगों ने उनके गीत गाते हुए उन्हें अंतिम विदाई दी।



11 जून, 1933 को बीकानेर के एक समृद्ध सामंती परिवार में उनका जन्म हुआ। जन्म के तुरंत बाद ही पिता संन्यासी हो गए और इस शोक को सह नहीं पाने के कारण जल्द ही माता का भी देहावसान हो गया। जब तक पिता रहे, उनके घर में भक्ति संगीत की महफिलें जमती थीं। इसलिए कदाचित उन्हें विरासत में संन्यासी पिता बेवा जी महाराज जैसा सुरीला कण्ठ मिला, जिससे गीत सुनकर लोग उन्मत्त हो जाते थे। संन्यासी पिता की बड़ी प्रतिष्ठा थी। जयपुर में एक घर में उनकी विशाल तस्वीर लगी हुई कुछ लोगों ने देखी है। बहरहाल, बचपन में भादाणी जी की घर में ही हिंदी, महाजनी और संस्कृत की प्रारंभिक शिक्षा हुई। जन्म के साथ ही पिता के संन्यासी बनने और मां की असमय मृत्यु के कारण परिवार द्वारा उन्हें अपशगुनी बालक करार दिया गया, दूसरी तरफ घर का सामंती माहौल। इसलिए उन्हें संभवतः बचपन से ही उस घर से वितृष्णा हो गई थी, ऐसे में उनका प्रतिरोध कविता के सिवा और कहां स्वर पाता? और जब समाजवादियों के गढ़ बीकानेर में रायवादियों और समाजवादियों के संपर्क में आए तो फिर पूरी दुनिया उनका घर हो गई। किसी को तंगहाल देखते तो अपनी चिंता छोड़कर उसकी मदद करने में लग जाते। जो कुछ संपति विरासत में मिली था, उसे परमार्थ में लगाने लगे। सामाजिक आंदोलनों में सक्रियता ऐसी बढ़ी कि एम.ए. अधूरा रह गया और मजदूर-किसानों के साथ संघर्ष करते हुए जेल जाना भी सामान्य बात हो गई। आंदोलनों में सिर्फ भाषणों से काम नहीं चलता इसलिए संघर्ष के जुझारू गीत लिखने लगे। लोकप्रिय रूमानी गीतों का गायक, मंचों पर वाहवाही लूटने वाला गीतकार, जनता का, जनता के संघर्षों का कवि बन गया।

उनका घर जरूरतमंदों का आश्रयस्थल बन गया। दूर-दूर से साहित्यकार, परिचित, सामाजिक कार्यकर्ता और बहुत से लोग आकर उनके विशाल हवेलीनुमा घर में डेरा जमा लेते और फिर आवश्यककता के अनुकूल समय तक, जो कई बार दो साल भी होता, वहीं रहते। 1960 में उन्होंने राजस्थान में अपने ढंग की नई साहित्यिक पत्रिका ‘वातायन’ का प्रकाशन शुरु किया। (हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि राजेश जोशी की पहली कविता इसी ‘वातायन’ में प्रकाशित हुई थी।) अब भादाणी जी को लोगों के साथ पत्रिका प्रकाशन के लिए भी आर्थिक व्यवस्था करनी थी। एक-एक कर उनकी सारी विरासत परमार्थ और ‘वातायन’ के लिए बिकती चली गई और इस व्यवस्था को कायम रखने के लिए बंबई और कलकत्ता में कई किस्म की कलमी मजूरी करनी पड़ी। चौदह वर्षों तक उन्होंने ‘वातायन’ को नियमित चलाया। लेकिन अनवरत संघर्ष करने की प्रक्रिया में उनकी आखिरी हवेली भी बिक गई और उसी हवेली के सामने एक छोटा-सा वातायनी घर बनाकर रहने लगे। उनकी दरियादिली में इस सबके बावजूद कोई कमी नहीं आई।



सिर्फ कविता के बल पर जीने वाला कवि आपको हरीश भादाणी जैसा दूसरा शायद ही मिले। मंच के कवि सम्मेलनों से कविता की यात्रा आरंभ करने वाले हरीश जी जनता के संघर्ष की कविता से होकर ऋग्वेद और उपनिषदों की रहस्यमय कविताओं तक गए। ‘सयुजा सखाया’ संग्रह में उनके वो गीत हैं, जिनके बारे में प्रख्यात आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय ने लिखा है कि इन कविताओं में ‘भारत के आध्यात्मिक, दार्शनिक चिंतन को यथार्थ जीवन, कर्म और लौकिक संबंधों से पृथक न कर उनसे गूंथा गया है, कबीर की चदरिया की तरह। इससे जीवन-जगत की सही मानवीय समझ पैदा होती है। यद्यपि चिंतन भीतर से शुरु होता है लेकिन वह सारे सृष्टि-अर्थ खोल देता है ताकि मनुष्य, चराचर की समानता और सह अस्तित्वमय जीवन जीने की ओर बढ़ सके।... कवि ने द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दृष्टि का समायोजन, पारंपरिक भाव, चेतना और अभिव्यक्ति का सही मान रखते हुए किया है, ताकि अलौकिक अर्थ का महत्व भी कम ना हो और वह लौकिक अर्थ में भी ढल सके। यह शैली संतों जैसी है।’  हरीश जी ने अपने निजी जीवनानुभवों से काव्ययात्रा में यह रास्ता चुना था, भारतीय मनीषा का एक प्रगतिशील जनवादी प्रत्याख्यान करने का, जिसे पढ़-सुन कर नए अर्थ ध्वनित होते हैं। बाबा नागार्जुन को भी उनकी ऐसी कविताएं बहुत पसंद थीं।


हरीश जी की कविताओं के हिंदी और राजस्थानी में बीस से अधिक संकलन हैं, इसके अलावा जनगीतों और साक्षरता के लिए लिखी दो दर्जन से अधिक पुस्तिकाएं प्रकाशित हुईं। कविता के लिए उन्हें मीरा प्रियदर्शिनी सम्मान, राहुल सम्मान और बिहारी सम्मान सहित अनेक सम्मान-पुरस्कारों से नवाजा गया। बंबई में कलम मजूरी करते हुए उन्होंने फिल्मी दुनिया के लिए भी काम किया। इनमें से बहुत-सी चीजें दूसरों के नाम चली गईं, उनके नाम बचा सिर्फ ‘आरंभ’ फिल्म का गीत, ‘सभी सुख दूर से गजरें, गुजरते ही चले जाएं’। मुकेश के गाए इस गीत को सुनकर अंदाज होता है कि सिनेमा के लिए ऐसी कविता भी लिखी जा सकती है।

वे कई मायनों में सामाजिक क्रांति के अग्रदूत थे। अपनी बेटियों को उन्होंने खुद आगे बढ़कर सामाजिक आंदोलनों में अग्रणी बनाया। उनकी सबसे बड़ी बेटी सरला माहेश्वरी पं. बंगाल से दो बार सांसद रह चुकी हैं। बीकानेर में पुष्पा और कविता निरंतर आंदोलनों में सक्रिय रहती है। उन्होंने बीकानेर की प्रसिद्ध होली को अश्लीलता से मुक्त कर उसमें जनजागरण के गीतों की शुरुआत की। सोरठा छंद में उन्होंने जो ‘हूणिए’ लिखे, वो जनसंघर्षों के दौरान क्रांति का उद्घोष गीत बन गए। उनके जनगीतों में ‘रोटी नाम सत है और ‘बोल मजूरा हल्ला बोल’ वो गीत हैं, जिन्हें हजारों लोगों द्वारा दिल्ली के इंडिया गेट से लेकर गांव-कस्बों के जनांदलनों में गाया जाता है। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि बीकानेर में उनका पता किसी से पूछने की जरूरत नहीं थी, कोई तांगे वाला आपको बिना पैसे लिए उनके घर छोड़ देता था। हर गांव, कस्बे और शहर में उनके अपने जैसे कई घर थे, जहां वे अपनी सुविधा से रहते थे। जीवन भर लोगों के काम आने वाले इस महान जनकवि ने मृत्यु के बाद अपनी देह बीकानेर मेडिकल कालेज को दान कर अपनी अंतिम इच्छा पूरी की। शत शत नमन।

पार्टी झण्‍डे में लिपटी जनकवि की देह

(बीकानेर मेडिकल कॉलेज को देहदान करते मित्र, परिजन और प्रशंसक, 'हरीश भादानी अमर रहे' का नारा लगाती श्रीमती जमुना भादानी, हरीश जी की जीवनसंगिनी)

हरीश भादानी जी को पुष्‍पांजलि अर्पित करते मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत
( यह आलेख हिंदी मासिक 'आउटलुक' के नवंबर, 2009 अंक में प्रकाशित)

Sunday 1 November 2009

विडम्बनाओं के भंवर में फंसा रचनाकार - सेमुएल योसफ एग्नान



एफ्रो एशियाई भाषा परिवार की हिब्रू भाषा को बाइबिल की पुरानी भाषा होने के कारण हमारी संस्कृत की तरह पवित्र भाषा के रूप में जाना जाता है। प्राचीनता के कारण इस दुर्लभ, दुर्भेद्य और इतनी पुरानी भाषा के आधुनिक साहित्य को अब तक सिर्फ एक बार नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। यह सौभाग्य मिला 1966 में इजराइल के सेमुएल योसफ एग्नान को। 17 जुलाई, 1888 को यूक्रेन के गैलीशिया नगर में जन्मे एग्नान उन चुनिंदा यहूदियों में हैं, जिन्हें विश्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह भी संयोग ही है कि 1966 में उनके साथ एक और यहूदी लेखिका नेली शेक्स को भी संयुक्त रूप से साहित्य का नोबल प्रदान किया गया। यहूदी समुदाय के विस्थापन के त्रासद इतिहास को इस प्रकार वैश्विक संवेदना का स्पर्श मिला। एग्नान का जबर्दस्त गद्य हमें यहूदियों के ऐतिहासिक संघर्ष और आधुनिक विश्व के साथ उसके त्रासद यथार्थ के चित्र दिखाता हुआ एक ऐसी दुनिया प्रस्तु‍त करता है, जिसमें मजहब, जाति, और नस्ल के आधार पर किसी का दमन नहीं होना चाहिए। लेकिन पूंजी के क्रूर खेल ने सदियों से मानवता का इसी प्रकार अहित किया है, जिसे हिब्रू में एग्नान की तरह लिखने वाले रचनाकार तमाम भाषाओं में मिल जाएंगे।


एग्नान ने पांच साल की उम्र से लिखना शुरु किया और जल्द ही उनकी प्रसिद्धि इस कदर फैल गई कि गायक उनके गीत गाने लगे। बीस बरस की उम्र में कविताएं और कहानियां प्रकाशित होने लगीं। खुद जीवन की राह बनाने के लिए एग्नान घर छोड़कर पहले फिलीस्तीन गए, फिर एक प्रकाशक के कहने पर जर्मनी में रहने लगे। लेकिन भाग्य की विडम्बना देखिए कि प्रथम विश्वयुद्ध ने एग्नान का सब कुछ समाप्त कर दिया। उनका घर आग की भेंट चढ़ गया और सब कुछ स्वाहा हो गया। पांच साल बाद फिर यहूदी विरोधी नाजी माहौल में उनका घर जला दिया गया। दो बार की आगजनी में उनकी पांच हजार किताबें और दो अधूरे उपन्यास, जिनमें एक के सात सौ पेज वे लिख चुके थे, और बहुत सी महत्वपूर्ण सामग्री खाक हो गई।

इतने झंझावातों के बीच 1931 में जब उनका उपन्यास ‘द ब्राइडल कैनोपी’ प्रकाशित हुआ तो हर तरफ से उनकी सराहना की गई। कहा गया कि आधुनिक हिब्रू को एक नया विश्वस्तरीय रचनाकार मिल गया है। इस उपन्यास में एग्नान ने एक ऐसे सरल, भोले और वृद्ध आस्थावान व्यक्ति का चरित्र लिखा जो उन्नीनवीं सदी के प्रारंभ में एक उजाड़ नगर में अपनी बेटी के लिए दूल्हा खोजने के लिए निकला। यह वही उजाड़ नगर था जिसमें एग्नान ने बचपन और किशोरावस्था के दिन बिताए थे। इस उपन्यास की सरवांतीस के महान उपन्यास ‘डॉन क्विक्‍जोट’ से तुलना की गई। अपनी स्मृतियों के शहर गैलीशिया और यरूशलम को एग्नान यहूदी मिथकों और इतिहास के माध्यम से अपनी तमाम रचनाओं में विविध प्रकार से खोजते रहे। ‘ए गेस्ट फॉर द नाइट’ में एग्नान ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद नष्ट हुए अपने शहर का मार्मिक चित्रण किया और इस उपन्यास के माध्यम से यूरोप में यहूदी समुदाय का भविष्य देखने का प्रयत्न किया। लेकिन उनका सबसे महत्वहपूर्ण उपन्यायस ‘द डे बिफोर यस्टरडे’ है, जिसमें बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में यहूदियों के सर्वनाश के बाद वैश्विक शरणार्थी बन जाने की महागाथा है। इस उपन्यास में एग्नान ने प्राचीन और तत्कालीन यहूदी जीवन को इस खूबसूरती के साथ पिरोया कि एक महानायक और एक कुत्ते की कथा ने समूचे यहूदी समुदाय की विडंबनाओं को पूरी शिद्दत से उजागर कर दिया।

17 फरवरी, 1970 को एग्नान का निधन हुआ। इस अवधि में उनकी दर्जनों किताबें प्रकाशित हुईं, जिनमें से कई का अंगेजी और जर्मन में अनुवाद हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी ने उनके अप्रकाशित साहित्य के सुव्युवस्थित प्रकाशन का काम किया। आज इजराइली साहित्य के युवा अध्येता निरंतर एग्नान के साहित्य पर शोध कर रहे हैं। मृत्यु से पूर्व उनकी प्रतिष्ठा का आलम यह था कि स्थानीय प्रशासन ने लेखक की शांति में खलल ना पड़े, यह ध्यान में रखते हुए उनके घर के पास से गुजरने वाली सड़क पर वाहनों का आवागमन बंद कर दिया गया और बाकायदा बोर्ड लगा दिया, ‘वाहनों का प्रवेश निषेध, लेखक काम पर है’।

एग्नान की रचनाएं यहूदियों के लिहाज से बेहद आधुनिक हैं, क्योंकि वे यहूदी समुदाय की बहुत सी धारणाओं को तोड़ते हुए इतिहास से निकलकर वर्तमान में जीने की बात करते हैं। लेकिन यहूदी धर्म के इतिहास और बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य में उनकी रचनाएं एक भिन्न किस्म का यहूदी पाठ प्रस्तुत करती हैं, जिसमें यहूदी समुदाय की वैयक्तिक और सामुदायिक पहचान का प्रश्न इतिहास और वर्तमान के बीच एक विडंबना की तरह अनुत्तरित रह जाता है। बदलते समय के बीच संस्कृतियों को बचाने का जो संकट पैदा होता है, उसे एग्नान ने खूबसूरती से बयान किया है, लेकिन यहूदी धर्म का आधुनिक जगत से मिलान करते हुए उसकी प्रासंगिकता की तलाश में उन्हें कुछ मूल्यवान नहीं मिलता और यही उनके लेखन और विषयवस्तु की सबसे बड़ी सीमा है। आलोचक लिपमैन बोडोफ के अनुसार एग्नान अतीत और भविष्य, धर्म और प्रकृति, अध्यात्म और विज्ञान, एकेश्वरवाद और बहुदेववाद, यहूदी परंपरा और यूनानी व रोमन संस्कृति, ईश्वर और प्रकृति... इन सबके बीच घूमते हुए बहुत सूक्ष्म विश्लेषण तो करते हैं लेकिन शायद नहीं जानते कि ऐसी रस्साकशी में विजेता साफ तौर पर किसी एक को नहीं कहा जा सकता। इसके साथ-साथ एग्नान की भाषा और कथावस्तु इतनी गंभीर और इस कदर संश्लिष्ट है कि मूल हिब्रू से उनका अनुवाद भी अत्यंत कठिन है। वजह यह भी है कि एग्नान ने अपनी रचनाओं में धर्मग्रंथों के विशद उद्धरण दिए हैं, जिन्हें सामान्य हिब्रू का ज्ञान रखने वाला भी नहीं समझ सकता। इसीलिए आलोचक उन्हें बहुत दुर्भेद्य और अनुवाद के लिहाज से अनुपयुक्त लेखक मानते हैं।

एग्नान ने अपने नोबल भाषण में जो महत्ववपूर्ण बातें कहीं उनमें दो का जिक्र बहुत जरूरी लगता है, क्योंकि वह भारतीय परंपरा से मिलता है। एग्नान ने अपने लेखन पर विभिन्न लेखकों और पुस्तकों से पड़े प्रभावों का जिक्र करते हुए कहा कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि कौनसी गाय के किस दूध से मेरा शरीर बना है, वैसे ही मेरे लिए लेखकों-प्रेरकों का जिक्र करना भी मुश्किल है। इसी प्रकार उन्होंने कहा था कि हमारी महान परंपरा के अनुसार किसी भी खुशी के अवसर को बिना ईश्वरीय आशीर्वाद या अनुकंपा के ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए, वो ईश्वर हमें आशीष दे जिसने इस रक्त–मांस-मज्जायुक्त देह में चेतना दी है। भारतीय काव्य परंपरा जैसा यह अद्भुत  आह्वान हमें विश्व्साहित्य में सेमुअल योसफ एग्नान की रचनाओं में मिलता है।
( यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय में 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में 25 अक्‍टूबर, 2009 को प्रकाशित हुआ।)


Saturday 17 October 2009

रोशनी के रंग हजार





रोशनी और अंधकार के बिना इस सृष्टि में कुछ भी संभव नहीं होता। अंधेरा था इसलिए रोशनी का जन्म हुआ। कह सकते हैं कि रोशनी अंधकार की बेटी है यानी उजाला तम का पुत्र है। चित्रकला में कहा जाता है कि सफेद कोई रंग नहीं है, वह रंगों की अनुपस्थिति से उपजी रिक्तता है। इस प्रकार रोशनी अंधकार की अनुपस्थिति है लेकिन रिक्तता नहीं, मानव समाज के लिए वह अंधकार से पैदा होने वाली रिक्तता की पूरक है। विज्ञान कहता है कि रोशनी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन यानी विद्युतचुंबकीय विकिरण है। लेकिन भारतीय मनीषा ने ईसा से छह सौ बरस पहले कह दिया था कि यह सृष्टि जिन पंचतत्वों से बनी है उसमें अग्नि बहुत महत्वपूर्ण है। अग्निरूपी इस रोशनी की मनुष्य सभ्यता में लाखों बरसों से प्रतिष्ठा रही है, देश-धर्म के बंधनों से बहुत ऊंचा स्थान रहा है रोशनी का। हर जाति, मजहब, देश, काल में रोशनी को पवित्र माना गया है तो इसीलिए कि रोशनी से मनुष्य का रिश्ता जन्‍म से शुरू होता है और गर्भावस्था के तम से मुक्त होने और रोशन दुनिया में आने की कामना उसे रोशनी के हजार रंगों की ओर लिए चलती है। कहने को रोशनी के सिर्फ सात रंग होते हैं, लेकिन यह मनुष्य ही है जिसने उसे हजारों आयाम दे दिए हैं। इंसान के लिए रोशनी अब सिर्फ दिन के उजाले और रात में काम आने वाली रोशनी भर नहीं, बल्कि जिंदगी के हर हिस्से में रोशनी फैला देने से है।

रोशनी का इतिहास
विज्ञान में रोशनी को पहले यह माना जाता था कि प्रकाश की संरचना पदार्थ जैसी है, जिसे आगे चलकर आइंस्टीन तक आते आते पूरी तरह नकार दिया गया। इस परंपरा में आदि मुस्लिम वैज्ञानिक इब्न अल हसैन के अलावा देकार्त, न्यूटन, रॉबर्ट हुक और थॉमस यंग की खोजों को नहीं भूला जा सकता। अब विज्ञान कहता है कि रोशनी एक प्रवाहमान चीज है। लेकिन सांस्कृतिक दृष्टिकोण से देखें तो भारत में दीपावली का त्यौहार जिस तरह भगवान राम के अयोध्या आगमन को लेकर मनाया जाता है, उसी तरह दुनिया भर में दीपोत्सव को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं, और लगभग सभी धर्मों और संस्कृतियों में रोशनी का उत्सव साल में एक बार जरूर मनाया जाता है। मसलन ईसाई समुदाय क्रिसमस को दीपावली की तरह मनाता है, इस्लाम में पैगंबर मोहम्मद साहब के जन्मदिन यानी बारावफात को चराग रोशन किये जाते हैं, सिक्ख समुदाय में गुरूनानक जन्मदिवस पर रोशनी सजाई जाती है, महावीर स्वामी की जयंती पर जैन और महात्मा बुद्ध की जयंती पर बौद्ध धर्मावलंबी अपने घर और पूजास्थलों को रोशन करते हैं। पारसी तो हैं ही अग्निपूजक। वैसे लगभग सभी धर्मों में पूजाघरों में दीपक जलाना या शमा रोशन करना प्रतिदिन का रिवाज है। मंदिर, मस्जिद, जिनालय, चैत्यालय में दीया और गिरजाघर में शमा रोशन करना वस्तुत: रोशनी की आराधना ही है। और इसके पीछे है मनुष्य की वह आदिम समझ जिसके चलते उसने प्रकृति की सबसे ताकतवर चीजों में अग्नि को सबसे उच्च स्थान दिया। जब पहली बार मनुष्य ने अग्नि का रौद्र रूप देखा होगा, फिर वो चाहे ज्वालामुखी से निकली हो, आकाश से बरसी हो या पेड़-पत्थररों के टकराने से पैदा हुई हो, तभी उसके प्रति भय मिश्रित श्रद्धा का भाव पैदा हुआ होगा। यही आगे चलकर दीपक या शमा जलाने में बदल गया। मानव सभ्य्ता का इतिहास रोशनी का इतिहास है, जिसमें येन केन प्रकारेण अंधकार से मुक्त होने और रोशन दुनिया बसाने की चाहत छुपी हुई है, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’।

रोशनी का दर्शन
सभ्यता के प्रारंभ से ही रोशनी मनुष्य के चिंतन का केंद्र रही है, इसीलिए रोशनी अपने भौतिक अर्थ और अभिप्राय: से आगे चलकर मनुष्य जीवन को सांगोपांग रूप से प्रकाशमान करने के व्यापक और विस्तृत अर्थ में तब्दील हो गई है। मानव समाज को कैसे एक ऐसी रोशन दुनिया बनाया जाए जिसमें किसी भी प्रकार का अंधकार ना हो, यह चिंतन सदियों से चला आ रहा है। भारतीय दर्शन परंपरा ने पहली बार रोशनी को इतने व्यापक और बहुलतावादी दृष्टिकोण से देखा और संपूर्ण सृष्टि को प्रकाशमान करने की परिकल्पना की। सबसे पहले सांख्य और वैशेषिक परंपरा के दार्शनिकों ने प्रकृति के मूल तत्वों पर चिंतन करते हुए प्रकाश को जीवन का महत्वपूर्ण कारक माना। महात्मा बुद्ध के अनुयायियों और जैन मुनियों ने इस परंपरा को समृद्ध करते हुए मनुष्य समाज को संपूर्णता में प्रकाशमान बनाने को लेकर मौलिक चिंतन किया, जिससे बहुत से नैतिक और सहज मानवीय मूल्यों की व्यापक परिकल्पना संभव हुई। इस प्रकार का प्रकाशमान चिंतन लगभग सभी धर्मों में हुआ और एक किस्म की वैश्विक सभ्य मानव समाज की सृष्टि के लिए रोशन खयालों की दुनिया का विस्तार हुआ।

हर तरफ रोशन हो दुनिया
आज के मानव समाज को हर तरफ रोशनी चाहिए, सिर्फ घरों की बिजली नहीं, लोगों के दिमाग भी रोशन होने चाहिए। शिक्षा की रोशनी हर ओर फैले, धार्मिक, राष्ट्रवादी और जातिवादी कट्टरता का अंधकार हटे, अंधविश्वास का तमस छंटे, समानता का प्रकाश फैले, मनुष्य जीवन के तमाम अंधकार दूर हों। दुनिया के सारे दीपोत्सव यही कामना करते हैं।
यूं दुनिया के विभिन्नि हिस्सों में मनाए जाने वाले लगभग सभी दीपोत्सव कृषक परंपरा से जुड़े हैं यानी फसल पकने के बाद के उत्सव हैं जिसमें नवान्न के साथ व्यक्ति और समुदाय की प्रगति की कामना जुड़ी हुई है। इस प्रकार देखा जाए तो यह दुनिया में किसी भी मनुष्य के भूखा ना रहने की कामना और स्वस्‍थ मानव समाज की परिकल्‍पना से जुड़ा दीपकामना का उत्सव है। आज के किसानों के हालात देखकर क्या हम एक बार फिर उस किसान के बारे में सोच सकते हैं जो बहुत बुरी हालत में है, आत्महत्या करने को मजबूर है। क्यों किसान के बेटे बंदूक उठा रहे हैं और क्यों खुशियों के पटाखों की जगह आतंक के खौफनाक धमाके हर ओर सुनाई दे रहे हैं। इन हालात में एक दीपक उनके नाम भी रोशन किया जाए, जो हमसे बिछुड़े और उनके नाम भी जो राह भटक कर अंधकार की राह जा रहे हैं। हर मजहब में जलने वाला दीपक मनुष्य के दिल और दिमागों को रोशन करे, इसी सोच के साथ सही मायनों में शुभ होगा दीपोत्सव।

सांध्य रवि ने कहा
मेरा साथ देगा कौन
सुनकर जगत सारा
रह गया निरूत्तर मौन
एक माटी के दीये ने कहा
नम्रता के साथ
जितना हो सकेगा
मैं करूंगा नाथ
रवींद नाथ टैगौर



यह आलेख जयपुर से प्रकाशित डेली न्‍यूज़ के रविवारीय 'हम लोग' की टॉप स्‍टोरी के रूप में 11 अक्‍टूबर, 2009 को प्रकाशित हुआ। चित्र गूगल से साभार।

Monday 5 October 2009

मैं महज एक काला हब्‍शी हूं



नोबल पुरस्कार के इतिहास में अब तक सिर्फ तीन अश्वेत साहित्यकारों को पुरस्कृत किया गया है, जिनमें वोले शोयिंका और टोनी मॉरिसन के साथ डेरेक वालकोट का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। वेस्टन इण्डीज के छोटे-से देश सेंट लूसिया के बेहद प्रतिष्ठित कवि डेरेक वालकोट को जब 1992 में नोबल पुरस्कार दिया गया, तब इस कैरेबियन द्वीप समूह के साहित्य की ओर विश्व समुदाय का ध्यान गया। यूरोप और वेस्ट इण्डीज की संस्कृति के बीच बंजारों की तरह घूमने वाले वालकोट के सृजन संसार में कविता बहुत गहराई के साथ रची बसी है। गुलामों जैसी विरासत से चलकर नोबल पुरस्कार तक की सृजनयात्रा बेहद रोचक और दिल दहला देने वाली भी है, लेकिन वालकोट की मस्तमौला फकीरी जैसी काव्यात्मक जिंदगी एक आदर्श भी है और मानक भी। यह जानकर बेहद आश्चर्य होता है कि नोबल पुरस्कार लेते वक्त वालकोट ने भारतीय रामलीला का विशद वर्णन किया था। दरअसल वे ट्रिनीडाड के एक गांव में भारतीय मूल के लोगों द्वारा खेले जाने वाली रामलीला की बात कर रहे थे और उनके नोबल भाषण का एक लंबा हिस्सा उस रामलीला के बहाने जड़ों से उखड़े, गुलामी से निकलकर आए, उपनिवेशवाद के सताए लोगों के दर्द को बयान कर रहा था, जिसे पहली बार विश्वमंच पर इतना बड़ा सम्मान दिया जा रहा था।


चित्रकार पिता और टीचर मां के यहां वालकोट एक जुड़वां भाई रोड्रिक के साथ 23 जनवरी, 1930 को वालकोट का जन्म एक सुदूर द्वीप के एक गांव में हुआ। 18 बरस की उम्र में पहला कविता संग्रह आया और ‘इन ए ग्रीन नाइट’ संग्रह से वे चर्चा में आए। पत्रकारिता और देश-विदेश में अध्यापन करते हुए जीवनयापन किया और इन दिनों वे ट्रिनीडाड में रह रहे हैं। वालकोट के लेखन में उनके जीवन के आत्मसंघर्ष और कैरेबियन द्वीप समूह में रहने वाले लोगों की जिंदगी का सच्चा लेखा-जोखा देखने को मिलता है।

‘द फॉरच्यून ट्रेवलर’ और ‘मिडसमर’ में वालकोट ने अमेरिका में खुद को एक अश्वेत कवि के रूप में गहराई से देखने की कोशिश की। क्योंकि अमेरिका प्रवास के दौरान उन्हें रह-रह कर अपना कैरेबियाई परिवेश याद आता था। एक कवि ह्रदय व्यक्तित्व अपनी जड़ों उखड़कर कैसे अपने आपको तनहा महसूस करता है, इसे बहुत शिद्दत से वालकोट ने अपने इन संग्रहों में रेखांकित किया है। उनकी किताबों के ‘कास्टअवे’ और ‘द गल्‍फ' जैसे शीर्षक भी उनकी इसी मानसिक उधेड़बुन को व्यक्त करते हैं। उन्होंने अपने एक साक्षात्का्र में कहा था कि हम चाहे कहीं भी रहें, अमेरिका में या लंदन में, हमें महसूस होता है कि जैसे हमें अलग रखा जाता है, यह एक किस्म का अलगाववाद है।

वालकोट की सबसे मशहूर कविता है ‘ओमेरोस’, जो होमर से प्रेरित है। इस काव्यकृति में वालकोट ने होमर के प्रसिद्ध नाटक ‘इलियड’ और ‘ऑडिसी’ को कैरेबिया पृष्ठभूमि में पुनर्सृजित किया। चौंसठ अध्यायों वाली इस लंबी कविता में वालकोट ने निर्वासन, बिछुड़े हुए लोगों और कैरेबियाई जनजीवन का चित्रण करते हुए नस्लवाद के प्रति अपना गुस्सा और उपनिवेशवादी प्रवृत्तियों खासकर औपनिवेशिक संस्कृति का समूल नकार प्रस्तुत किया है। इस किताब में वे एक जगह लिखते हैं, ‘मैं महज एक काला हब्शी हूं / जिसे समुद्र से प्रेम है / मेरे पास गहरी औपनिवेशिक शिक्षा है / मेरे भीतर डच, नीग्रो और अंग्रेजी भाषाएं मौजूद हैं / या तो मैं कुछ नहीं हूं या फिर एक पूरा राष्ट्र हूं।‘

वालकोट कवि के साथ बहुत बड़े नाटककार भी हैं। उनके लिखे नाटकों में भी कविताओं की ही अभिव्यक्ति हुई है अर्थात् जो बात कविता में कही, उसे नाटक में पूरी कहानी के साथ कुछ और नाटकीय वैविध्य के साथ प्रस्तुत किया। दो दर्जन से अधिक नाटकों में उन्होंने पूरे कैरेबियाई द्वीप समूह की अंतसचेतना को बहुत गहराई से देखा-परखा है। चार सौ साल के गुलामी और औपनिवेशिक दासता वाले इतिहास की परत दर परत खोज करते हुए वे उस विराट जनसमुदाय की आवाज बन जाते हैं जो सदियों से अपमानित और प्रताडि़त होता आया है। यह वह जनसमुदाय है जिसे दक्षिण अफ्रीका और भारत से जहाजों में भरकर अंग्रेज वहां ले गए थे, जिनकी अपनी जुबान और संस्कृति उपनिवेशवाद के चलते गुम हो गई और वो एक अजीब सी मिली-जुली खिचड़ी किस्‍म की संस्कृति में रहने के लिए अभिशप्त हैं। इस जनता में वो भारतीय भी हैं जिनका वहां के सांस्कृतिक और सामाजिक ही नहीं आर्थिक और राजनैतिक रूप से भी महत्व है। भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक और नोबल पुरस्कार से सम्मानित सर वी.एस. नायपाल भी यहीं से गए थे और पॉप गायिका पार्वती खान भी यहीं की हैं।

वालकोट का सबसे प्रसिद्ध नाटक है ‘ड्रीम आन मंकी माउण्टेन’। इस नाटक में वालकोट ने कैरेबियाई संस्कृति का विहंगम परिदृश्य रचते हुए एक स्वनप्निल संसार की रचना की है जिसमें दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाता है। इस विविधतापूर्ण्‍ सांस्कृतिक परिदृश्य के बारे में और उसकी अपनी पीड़ा को लेकर वालकोट ने एक जगह लिखा है, ‘यहां हम सब अजनबी हैं...हमारे शरीर एक भाषा में विचार करते हैं और दूसरी भाषा में विचरते हैं।‘
वालकोट मानक अंग्रेजी और कैरेबियाई भाषा में समान रूप से लिखते हैं। उनकी मातृभाषा क्रेयोल है जो एक छोटे से समुदाय की भाषा है। उन्होंने अपने जुड़वां भाई की मृत्यु के बाद 2004 में अपनी आखिरी पुस्‍तक लिखी ‘द प्रोडिगाल’।

वालकोट का कहना है कि वे अपनी क्षमता का आठवां हिस्सा ही लिख सके हैं, और कैरेबिया द्वीप समूह में बोली जाने वाली तमाम टूटी-फूटी खिचड़ी भाषाओं से वे पूर्णत: परिचित हैं। डेरेक वालकोट ने विश्वसाहित्य का गहन अध्ययन किया, जिसके कारण उन्होंने अपनी रचनात्‍मकता में एक तरफ जहां यूरोपियन सर्जनात्मक मानदण्डों के अनुकूल प्रतिमानों का प्रयोग किया वहीं अपने कैरेबियाई द्वीप समूह की गहरी संवेदनशील और आत्मीयता भरी संस्कृति को जुबान दी। कलात्मकता के साथ रचनाओं में आई इस संवेदनशीलता ने वालकोट की काव्य और नाट्य कला को नया उत्कर्ष दिया, जिसे खारिज करना असंभव था। ऊपर से उनके काम की मात्रा इतनी विपुल और समृद्ध कि नोबल पुरस्कार देते वक्त उनके सृजन को ‘महासागरीय कृतित्व्’ कहा गया। इस महासागर से प्रस्तुत है एक कविता-

प्रेम के बाद प्रेम

वक्त आएगा


जब तुम प्रफुल्लता के साथ


अपने ही दरवाजे पर, अपने ही आईने में


खुद का आते हुए स्वागत करोगे


और दोनों एक दूसरे की ओर मुस्कुराते हुए मिलोगे






फिर कहोगे, बैठो, कुछ खा लो


तुम उस अज्ञात व्यक्ति से प्रेम करोगे


जो तुम खुद ही थे


शराब परोसो, रोटी परोसो


उस अजनबी को वापस अपना दिल दे दो


जिसने तुम्हें प्रेम किया है






तमाम जिंदगी जिसे तुमने


किसी और के लिए उपेक्षित रखा


जिसे तुम दिल से जानते हो


किताबों की अलमारी से प्रेमपत्र बाहर निकाल लो






वो तस्वीरें, वो निराशा भरे नोट्स


आईने से अपनी ही छवि खुरच लो


बैठो, अपनी जिंदगी की दावत उड़ाओ।






Sunday 4 October 2009

हरीश भादाणी – एक फकीरी जीवन



वो मेरे दादाजी की उम्र के थे, लेकिन मैं उन्हें बाकी दोस्तों की तरह हमेशा भाई साहब ही कहता था। वो भी भाई ही मानते थे, बात-बात में कुछ याद आने पर कहते थे, ‘प्रेमचंद तुम्हारी भाभी कहती है..’ और वे इस तरह पीढियों का अंतराल सिरे से खत्म कर देते थे। मैंने जीवन में ऐसा एक भी वरिष्ठ साहित्यकार नहीं देखा, जो इस कदर अपने से कमउम्र लोगों के बीच सहजता से घुलमिल जाता हो। हम श्रद्धा से पांव छूते तो मना कर देते, किताब भेंट करते तो हमेशा ‘सहधर्मी शब्दकर्मी समानधर्मा मित्र’ संबोधन ही लिखते, और भावुक होने पर बच्चों की तरह रो देते। वो सदा खिलखिलाता मुस्कुराते रहने वाला शख्स पहाड़ सी जिंदगी के कितने भयानक दौरों से गुजरकर आया था, यह जानकर मन श्रद्धा से भर जाता था और एकदम आत्मीयता का कभी ना थमने वाला दौर शुरू हो जाता था।

उनके साथ बिताए ना जाने कितने यादगार पल हैं जिनकी स्मृतियां भाव विह्वल कर देती हैं। लेकिन उनके विराट व्यक्तित्व के पीछे छिपी उनकी अनथक साहित्य् साधना को याद करता हूं तो लगता है ऐसा जीवन जीने के लिए एक जीवन कम पड़ जाए। कभी उनके जीवन के उतार चढाव भरे कंटकाकीर्ण पथ को याद करता हूं तो लगता है जैसे किसी विश्वस्तरीय लेखक की जीवन कथा पढ़ रहा हूं। बचपन में पिता संन्यासी होकर इकलौते पुत्र को अकेले छोड़कर चले गए। और एक सामंती किस्म के परिवार में कई हवेलियों के बीच हरीश भादाणी जी ने अपना बचपन गुजारा। ना जाने कितनी पीड़ाएं झेली होंगी इस बालक ने जो सामंती शोषण और अत्याचार बचपन में अपनी आंखों से देखा होगा। तभी तो वो ‘रोटी नाम सत है’ जैसा शाश्वत गीत लिख सके। हिंदी में क्या आपको विश्वसाहित्य में ऐसी कविता नहीं मिलेगी, जो एक शोकसंतप्तत स्‍वर को इस प्रकार एक आंदोलनकारी जनगीत में बदल दे। ‘राम नाम सत है’ की जगह 'रोटी नाम सत है कहना', कितने बड़े कवि के कण्ठ से निकला है, इसे इस गीत को पढने, गाने और सुनने से अहसास होता है। यहां वे अपनी संपूर्ण चेतना के साथ उपस्थित हैं, जिसमें वंचितों का क्रोध, अधिकारों के लिए संघर्ष और व्यवस्था के प्रति आमजन का गहरा आक्रोश एक साथ देखा जा सकता है। इस गीत की कुछ पंक्तियां हैं, "रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है, ऐरावत पर इंदर बैठे बांट रहे टोपियां, झोलियां फैलाए लोग, भूल रहे सोटियां, वायदों की चूसनी से छाले पड़ जीभ पर, रसोई में लाव लाव भैरवी बजत है, बोले खाली पेट की करोड़ों करोड़ कूंडियां, तिरछी टोपी वाले भोपे भरे हैं बंदूकियां, भूख के धरमराज यही तेरा व्रत है, रोटी नाम सत है कि खाए से मुगत है।" मुक्ति राम के जाप से नहीं रोटी से मिलेगी। ऐसा स्वर आपको विश्वसाहित्य में इस चेतना के साथ आपको शायद ही कहीं मिलेगा।

हरीश जी एम.एन. राय और समाजवादी विचारों से चलकर मार्क्सवाद तक आए थे। लेकिन उनके भीतर की भारतीय मनीषा उन्हें बारंबार ऋग्वेद और उपनिषदों की ओर ले जाती थी, जिससे वे मार्क्सवाद और भारतीय मनीषा का प्रत्याख्यान करते थे। ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं और उपनिषदों के अनेक सूक्तों की उन्होंने एक समाजशास्त्रीय ढंग से पुनर्रचना की है। और ऐसी रचनाओं का जब वे सस्वर पाठ करते थे तो जनमानस में ऐसा समां बंधता था कि पूछिए मत। उनके गाए गीतों पर हजारों लोग झूमते थे और उनकी अनुपस्थिति में भी हर जनांदोलन में उनके गीत गूंजते रहते हैं। उनके गीतों और कविताओं की पंक्तियां संघर्ष का नारा गईं। ‘बोल मजूरा हल्ला बोल’ जैसी पंक्ति हरीश भादाणी ही लिख सकते थे।

क्योंकि उन्होंने अपनी आंखों से जो शोषण और अत्याचार देखा था, उसके प्रति उनकी घृणा इतनी जबर्दस्त थी कि जिस सामंती परिवार में पैदा हुए, उसकी एक एक ईंट तक उन्होंने आम आदमी की भूख मिटाने और साहित्यिक पत्रकारिता के लिए ‘वातायन’ को चलाने में बेच डाली। ऐसा जीवट वाला साहित्यकार आपको किसी भी भाषा में शायद ही मिलेगा, जिसने एक नहीं तेरह हवेलियां बेचने के बाद एक छोटे से घर में रहना मंजूर किया हो। और इसके बाद खुद जनपथ पर आ गए और ‘सड़कवासी राम’ लिखने लग गए। इस नई राह पर हरीश जी ने पता नहीं कितने पापड़ बेले। बंबई और कलकत्ता के ना जाने कितने सेठों के नाम से किताबें लिखीं, बड़े बड़े फिल्मी गीतकारों के नाम से गीत लिखे। सिनेजगत में उनके नाम से बस ‘आरंभ’ फिल्म का गीत ही बचा है, ‘सभी सुख दूर से गुजरें, गुजरते ही चले जाएं’। लगता है उनका जीवन भी ऐसा ही रहा, जिसमें सारे सुख दूर से गुजरे और उनके हिस्से आई सिर्फ रचनात्मकता, जिसके माध्यम से वो जनता की आवाज यानी जनकवि बन गए।
(नई दुनिया के राजस्‍थान संस्‍करण में 4 अक्‍टूबर, 2009 को प्रकाशित)



Friday 2 October 2009

जनकवि हरीश भादाणी नहीं रहे



हिंदी और राजस्‍थानी के सुप्रसिद्ध जनकवि हरीश भादाणी जी का आज तड़के बीकानेर में निधन हो गया। 11 जून, 1933 को जन्‍मे हरीश भादाणी जी की लोकप्रियता इतनी जबर्दस्‍त थी कि हजारों लोगों को उनके गीत कंठस्‍थ हैं और विभिन्‍न जनांदलनों में बरसों से गाये जा रहे हैं। 'बोल मजूरा हल्‍ला बोल' और 'रोटी नाम सत है' जैसे कई गीत जगप्रसिद्ध हैं। उनकी कविता की बीस से अधिक पुस्‍तकें हिंदी और राजस्‍थानी में प्रकाशित हुईं। उनके परिवार में एक पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। उनकी बड़ी बेटी सरला माहेश्‍वरी दो बार पश्चिम बंगाल से राज्‍यसभा की सांसद रह चुकी हैं।
भादाणी जी पिछले कई महीनों से अस्‍वस्‍थ चल रहे थे। वे कैंसर से पीडि़त थे। दो दिन पूर्व ही वे कोलकाता में अपनी दोहित्री के विवाह समारोह से लौटे थे। उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि बीकानेर शहर में आप किसी रिक्‍शा या तांगे वाले से उनका पता पूछकर उनके घर जा सकते हैं।

इनके पिता संन्‍यासी हो गए थे। उस वक्‍त हरीश जी बहुत छोटे थे। सामंती परिवार में जन्‍मे हरीश जी ने जनता के दुख दर्द को गले लगाया और एक-एक कर सात पुश्‍तैनी हवेलियों को बेचने के बाद एक छोटे से घर में रहने लगे। साहित्‍य और समाज को पूरी तरह समर्पित इस महान कवि के गीत सदियों तक अवाम के दिलोदिमाग में गूंजते रहेंगे। हरीश जी खुद बहुत अच्‍छा गाते थे। उनके गीतों की कई कैसेट और सीडी निकली हैं। उन्‍होंने कुछ वक्‍त मुंबइया फिल्‍मी दुनिया में भी गुजारा। कई मशहूर गीतकारों ने उन्‍हें आशीर्वाद दिया और उनके लिखे गीत अपने नाम से फिल्‍मों में चला दिये। 1976 में आनंद शंकर के संगीत निर्देशन में उनका लिखा और मुकेश की आवाज में गाया गया फिल्‍म 'आरंभ' का गीत 'सभी सुख दूर से गुजरें गुजरते ही चले जाएं' लोकप्रिय हुआ। फिल्‍मी दुनिया में उनके नाम से बस यही गीत बचा है, बाकी गीत बड़े गीतकारों के नाम चले गए। यह गीत मेरे विशेष आग्रह पर भाई युनूस खान ने रेडियोवाणी पर लगाया है। आप इस गीत को यहां सुन सकते हैं। हरीश जी ने कभी उन गीतकारों के नाम नहीं बताए, बस हंसकर टाल जाते थे।
मुझे व्‍यक्तिगत रूप से उनका 'रेत है रेत' बहुत पसंद है।

इसे मत छेड़ पसर जाएगी
रेत है रेत बिफर जाएगी
कुछ नहीं प्यास का समंदर है
ज़िन्दगी पांव-पांव जाएगी
धूप उफने है इस कलेजे पर
हाथ मत डाल ये जलाएगी
इसने निगले हैं कई लस्कर
ये कई और निगल जाएगी
न छलावे दिखा तू पानी के
जमीं आकाश तोड़ लाएगी
उठी गांवों से ये ख़म खाकर
एक आंधी सी शहर जाएगी
आंख की किरकिरी नहीं है ये
झांक लो झील नज़र आएगी
सुबह भीजी है लड़के मौसम से
सींच कर सांस दिन उगाएगी
कांच अब क्या हरीश मांजे है
रोशनी रेत में नहाएगी
इसे मत छेड़ पसर जाएगी
रेत है रेत बिफर जाएगी

इसके अलावा मुझे उनका 'रेत में नहाया है मन' भी बहुत भाता है।

रेत में नहाया है मन !



आग ऊपर से, आँच नीचे से


वो धुँआए कभी, झलमलाती जगे


वो पिघलती रहे, बुदबुदाती बहे


इन तटों पर कभी धार के बीच में


डूब-डूब तिर आया है मन


रेत में नहाया है मन !


घास सपनों सी, बेल अपनों सी


साँस के सूत में सात सुर गूँथ कर


भैरवी में कभी, साध केदारा


गूंगी घाटी में, सूने धारों पर


एक आसन बिछाया है मन


रेत में नहाया है मन !




आँधियाँ काँख में, आसमाँ आँख में


धूप की पगरखी, ताँबई, अंगरखी


होठ आखर रचे, शोर जैसे मचे


देख हिरनी लजी साथ चलने सजी


इस दूर तक निभाया है मन


रेत में नहाया है मन !




Indic Transliteration