Thursday, 30 April, 2009

प्रसिद्ध उर्दू लेखक कमर रईस नहीं रहे



उर्दू के जाने माने साहित्‍यकार और विद्वान डा. कमर रईस का कल रात दिल्‍ली के बत्रा हास्पिटल में निधन हो गया। 77 वर्षीय रईस पिछले कई दिनों से पीलिया का इलाज करा रहे थे। उनके परिवार में पत्‍नी और एक पुत्री है। कमर रईस भारत सरकार के संस्‍कृति विभाग में काम करते हुए कई वर्षों तक ताशकंद में रहे। वहीं उन्‍होंने मुगल बादशाह जहीरूदीन बाबर के जीवन पर अपनी मशहूर किताब लिखी जिसमें बाबर के जीवन के अछूते पक्षों पर खोजपरक दृष्टि से अनेक महत्‍वपूर्ण जानकारियां दी गई हैं। कमर रईस ने अपने ताशकंद प्रवास के दौर में ही एक और अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण किताब का संपादन किया ‘अक्‍टूबर रिवोल्‍यूशन – इंपेक्‍ट आन इंडियन लिटरेचर’। इस किताब की भूमिका पूर्व प्रधानमंतगी इाई.के. गुजराल ने लिखी थी। कमर रईस ने सज्‍जाद जहीर और रतननाथ सरशार की जीवनियां लिखीं। उर्दू साहित्‍य में मुंशी प्रेमचंद का महत्‍व स्‍थापित करने में उनकी बडी भूमिका रही। प्रेमचंद पर उर्दू में उनकी प्रसिद्ध किताब है ‘प्रेमचंद का फन’। वे करीब पच्‍चीस बरस तक प्रगतिशील लेखक संघ के उर्दू संगठन अंजुमन तरक्‍कीपसंद मुसन्‍नफीन के सेक्रेट्री रहे। फिलवक्‍त वे दिल्‍ली उर्दू एकेडमी के वाइस चेयरमैन थे।
मेरी उनसे एक ही मुख्‍तसर सी मुलाकात रही, जब उन्‍होंने अंजुमन तरक्‍कीपसंद मुसन्‍नफीन की जानिब से इलाहाबाद में सज्‍जाद जहीर की जन्‍मशती का भव्‍य समारोह करवाया था। उस समारोह में पाकिस्‍तान से जाहिदा हिना सहित करीब पच्‍चीस लेखक आए थे।
प्रस्‍तुत तस्‍वीर में बाईं तरफ कमर रईस हैं अपने एक दोस्‍त के साथ।


Saturday, 25 April, 2009

हमेशा रहेगी किताबों की जरूरत


उस दुनिया की कल्‍पना करना कितना भयावह है, जिसे किताबों के बिना जीना पडता है। लेकिन सच्‍चाई यही है, आज भी विश्‍व की करीब पचास फीसद जनता पुस्‍तकविहीन अंधकारमय जीवन जीने के लिए विवश है। लेकिन यह भी इतना ही बडा सच है कि ऐसे अज्ञान और अंधकार भरे समाज के लिए किताब पहुंचाने की कोशिशें भी वैश्विक स्‍तर पर जारी हैं। देश में चल रहे ‘सर्वशिक्षा अभियान’ जैसे प्रयास दुनिया के तमाम निर्धन देशों में चल रहे हैं। हालांकि ऐसा मानने वाले लोगों की भी कमी नहीं है कि बिना किताबों के भी ज्ञान प्राप्‍त किया जा सकता है और यह एक हद तक सच भी है। हमारे पुरखों ने ज्ञान के नाम पर अपने समय में जो कुछ प्राप्‍त किया वह जीवनानुभवों का ही सार है, जिसके बिना किताब भी संभव नहीं होती, क्‍योंकि किताब भी आखिरकार एक व्‍यक्ति के अनुभूत ज्ञान और संचित जीवनानुभवों का ही तो समुच्‍चय है।
इस दुनिया को आज हम जिस रूप में देख रहे हैं, उसके पीछे किताबों की बहुत बडी भूमिका है। दुनिया के तमाम धर्मों में एक या अधिक किताबों की जरूरत हमेशा से रही है, जिनसे उनके अनुयायियों को धर्म की राह पर चलने के लिए एक रास्‍ता मिलता है। आज भी लोगों के लिए किताब अगर एक पवित्र किस्‍म की चीज है तो वह इसीलिए कि प्रारंभ में किताब का अर्थ धार्मिक किताब ही होता था, जिसके पैर से छू जाने या गिर जाने से अनर्थ की आशंका होती थी और धर्म का अपमान लगता था। मजहबी किताबें दुनिया में सबसे ज्‍यादा बिकने वाली किताबें हैं और शायद हमेशा रहेंगी। वजह यह कि पढना आये या ना आये अपने धर्म की किताब हर व्‍यक्ति घर में जरूर रखना चाहता है। सुख-दुख के अवसरों पर इनकी महत्‍ता रहती है, घर को ये एक किस्‍म की पवित्रता प्रदान करती हैं। व्‍यक्ति को ऐसी किताबों के अध्‍ययन और श्रवण से आत्मिक संतोष मिलता है। इसीलिए सभी धर्मों में आप देखेंगे कि धार्मिक किताबों के समय-समय पर पाठ आयोजित करने की परंपरा है, फिर वह चाहे गुरूग्रंथ साहिब का पाठ हो या रामायण का, कुरानख्‍वानी हो या बाइबिल का पाठ।
धार्मिक किताबों का महत्‍व इस मायने में स्‍वीकार किया जाना चाहिए कि इन्‍हीं की वजह से शिक्षा का प्रसार भी हुआ। आज भी बहुत से लोग अगर लडकियों को पढने स्‍कूल भेजते हैं तो यही समझकर कि चलो कम से कम वह कुरान, रामायण या गुरूग्रंथ साहिब का पाठ तो कर लेगी और अपने बच्‍चों को ठीक-ठाक संस्‍कार दे सकेगी। लेकिन किताबों की दुनिया का यह एक बहुत बडा सच है कि यह एक प्रकार से मनुष्‍य में संक्रामक रोग भी पैदा करती है, अर्थात जिसे पढना आ गया वह एक के बाद दूसरी किताब पढने की ओर आगे बढता है। और पढने की इस चाहत ने ही किताबों की दुनिया को परवान चढाया है। जिन लडकियों को धार्मिक किताबें पढने के लिए पाठशाला भेजा गया, वे आगे चलकर दूसरी किताबें पढकर खुद लेखिकाएं बन गईं, ऐसे हमारे समाज में सैंकडों उदाहरण हैं।
आज के तेजी से बदलते संचार क्रांति के युग में बहुत से लोग कहते हैं कि अब किताबें अप्रासंगिक हो जाएंगी, वजह यह कि किताबों की जगह लेने के लिए बाजार में बहुत सी चीजें आ गई हैं और किताबों का स्‍वरूप भी बदल गया है। सीडी, डीवीडी, ई-बुक, और इसी किस्‍म की बहुत सी ईजादों ने किताब का स्‍थान लेने की कोशि की है, लेकिन पश्चिम के अघाये हुए समाज की मानें तो आज भी पन्‍ने पलटकर, कहीं भी बैठकर, लेटकर, यात्रा करते हुए यानी किसी भी तरह किताब पढने से बेहतर कुछ नहीं है। आधुनिक संसाधनों ने जो सबसे बडा काम किया वो यह कि किताबों की उम्र और पढने का दायरा बढा दिया। आज दुनिया के लाखों पुस्‍तकालय डिजिटलाइज्‍ड हो रहे हैं, आनलाइन हो रहे हैं, हजारों की तादाद में ऐसी वेबसाइटें मौजूद हैं जिन पर दुनिया भर की असंख्‍य किताबों के बारे में जानकारी ही हासिल नहीं की जा सकती, बल्कि डाउनलोड कर किताबें पढी भी जा सकती हैं। अभी तक अप्राप्‍य और दुर्लभ समझी जाने वाली असंख्‍य किताबें आज इंटरनेट की दुनिया में या तो उपलब्‍ध हैं या ऐसा करने के प्रयास वैश्विक स्‍तर पर चल रहे हैं। इस तरह संचार क्रांति किताबों की दुनिया के लिए वरदान सिद्ध हो रही है।
दुनिया बदल रही है और इस बदलती हुई दुनिया की यह एक बहुत बडी सच्‍चाई है कि दुनिया में आज मौजूद अनेक समस्‍याएं अज्ञान और अशिक्षा के कारण हैं। फिर वो चाहे आतंकवाद हो या मजहबी कटटरता के कारण पनपने वाला सांप्रदायिक विद्वेष, इन सबकी जड में अशिक्षा और अज्ञान ही है। किताबों की दुनिया ही हमारे समाज को बताती है कि सब धर्म एक परमात्‍मा तक पहुंचने के अलग-अलग रास्‍तों के सिवा कुछ नहीं हैं, मनुष्‍य का एकमात्र धर्म है मानवता की सेवा और सब धर्मों का मूल मकसद है इस धरती को सुंदर बनाना, मानव मात्र को सुखी बनाना। प्रत्‍येक धर्म की किताब यही सिखाती है, लेकिन कुछ लोग हैं जो उनका अलग अर्थ निकालकर लोगों को एक दूसरे खिलाफ भडकाते हैं और व्‍यर्थ में खून बहाते हैं। इस प्रक्रिया में ना जाने कितनी सभ्‍यताएं नष्‍ट हो चुकी हैं और नष्‍ट होंगी, फिर किताबें ही बताएंगी कि क्‍यों वे सभ्‍यताएं नष्‍ट हुईं।


एक फ्रांसिसी दार्शनिक ने म्रत्‍यु शैया पर कहा था, ‘जो कुछ हम जानते हैं वह बहुत थोडा है, जो नहीं जानते वह बहुत अधिक है।‘ किताबों की दुनिया हमारे लिए उस अजाने संसार के दरवाजे खोलती है, जिसे हम एक जीवन में प्राप्‍त नहीं कर सकते। प्रत्‍येक विद्धान, मनीषी यही कहता है कि मैं तो एक विद्यार्थी मात्र हूं। किताबें ही यह विनम्रता का बोध पैदा करती हैं और मनुष्‍य को महामानव बनाती हैं। मनुष्‍य जीवन में किताबों का महत्‍व सदा से किसी ना किसी रूप में मौजूद रहा है और धरती के नष्‍ट होने तक रहेगा। इस दुनिया में किताब की ताकत का अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि बहुत से आततायी और हिंसक लोगों ने सिर्फ डर की वजह से न केवल किताबें, बल्कि पूरी की पूरी लाइब्रेरियां जला डालीं।
(विश्व पुस्तक दिवस २१ अप्रेलको जयपुर 'डेली न्यूज़' में आलेख.)

Sunday, 19 April, 2009

दो परदेसी दोस्त और उनके साथ बिताये पल


कुछ दोस्‍त जिंदगी में कभी कभी मिलते हैं और जिंदगी का हिस्‍सा हो जाते हैं। कहते तो ये हैं कि ‘परदेसियों से ना अंखियां मिलाना’, लेकिन कभी मिल जाए तो बहुत सुकून होता है। कुछ दिन पहले दो परदेसी दोस्‍तों से एकाध मुलाकात हुई और बातों का सिलसिला ऐसा चला कि एक गहरी दोस्‍ती ने जन्‍म लिया। एक आस्‍ट्रेलिया से है और एक अमेरिका से। पहले ये दोनों आपस में दोस्‍त बने और फिर हमारी मण्‍डली में दाखिल हुए। मैं बात कर रहा हूं आस्‍ट्रेलिया के डेनियल और अमेरिका की एलन की। डैनी चित्रकार है और एलन हिंदी की छात्रा के रूप में आयरिश और भारतीय सिनेमा का अध्‍ययन कर रही है। डैनी एक बार पर्यटक के रूप में जयपुर आए तो यहीं के होकर रह गये। पिछले तीन सालों से उनका और जयपुर का रिश्‍ता लगातार गहरा होता जा रहा है। उनकी मित्र मण्डली में सबसे पहले चित्रकार एकेश्‍वर जुडे और फिर यह सिलसिला चल निकला। आज जयपुर में डैनी के दोस्‍तों की तादाद सैंकडों में हैं और इनमें सिर्फ चित्रकार और बुद्धिजीवी ही नहीं, शहर के आटो चालक, रिक्‍शा चालक, फल बेचने वाले और अडोस पडोस के बहुत से लोग शामिल हैं, जिनसे डैनी का रोज वास्‍ता पडता है।
डैनी आस्‍ट्रलिया में स्‍पेनिश पढाते थे। यूं वे कला के विद्यार्थी रहे हैं और जयपुर में कलाकर्म ही कर रहे हैं। पोर्टेट बनाने में उनका कोई सानी नहीं। छोटे से लेकर पूरी दीवार के आकार के पोर्टट वे सहजता से बना लेते हैं और उनमें कला की तमाम खूबियों से लेकर उनके हाथ की कुशलता को सहज ही देखा जा सकता है। प्रयोग में भी वे पीछे नहीं रहते और विभिन्‍न तरह के प्रयोग करते रहते हैं। वे कई कला प्रदर्शनियों में भाग लेते रहे हैं और कई कलाशिविरों में भी अपना कौशल दिखा चुके हैं।


डैनी से एक दिन अचानक भाई रामकुमार सिंह के साथ मुलाकात हुई। उस वक्‍त डैनी की बहन आई हुई थी, वो हमें बहन से मिलाने ले गये। बातों का सिलसिला ऐसा चला कि हमें यही नहीं पता चला कि कब हम बेतकल्‍लुफ हो गए और नाचने गाने लगे, जिसे डैनी की बहन मैगी ने अपने कैमरे में कैद कर लिया। इस तरह मुलाकातों का एक सिलसिला गति पकडता रहा। अभी 14 अप्रेल को डैनी और उसके पांच मित्रों की एक सामूहिक कला प्रदर्शनी थी। उस दिन एलन से दूसरी मुलाकात हुई। पहले अमित कल्‍ला और हिमांशु व्‍यास की प्रदर्शनी में एलन से मुख्‍तसर सी मुलाकात हो चुकी थी। इस बार थोडी खुलकर बातें हुईं।
एलन आयरिश मूल की अमेरिकी युवती है। उसे भारत और भारतीय सिनेमा से गहरा लगाव है। हिंदी फिल्‍मों की वह जबर्दस्‍त प्रशंसक है। इसी लगाव के चलते उसने पी.एच.डी. के लिए विषय चुना-‘बंटवारे पर बनी आयरिश और भारतीय फिल्‍मों का तुलनात्‍मक अध्‍ययन’। उसके अध्‍ययन में नवें दशक के बाद का सिनेमा ही शामिल है, लेकिन उसने तमाम पुरानी फिल्‍में भी देख रखी हैं। यहां तक कि पाकिस्‍तान में बंटवारे पर बनी फिल्‍में भी उसने देखी हैं। एक दिन डैनी ने कहा कि वह 22 अप्रेल को छह महीने के लिए आस्‍ट्रेलिया जा रहा है, क्‍योंकि वीजा नियमों के कारण वह और नहीं रूक सकता। उधर एलन का भी कोर्स पूरा हो गया है औ उसे भी दो सप्‍ताह बाद जाना है। डैनी ने कहा कि वह हम तीन दोस्‍तों के साथ एक शाम गुजारना चाहता है। यानी मैं, एलन और रामकुमार के साथ।
पहले यह बता दूं कि एलन और डैनी की मुलाकात कैसे हुई। ये दोनों सलमान खान की निर्माणाधीन फिल्‍म ‘वीर’ के सैट पर मिले थे। दोनों को विदेशी होने कारण छोटे से रोल मिले थे। वहां हुई इनकी मुलाकात गहरी दोस्‍ती में बदल गई और दोस्‍ती का एक विशाल दायरा बनता गया। इसमें हम भी शामिल हो गए। अभी जोधपुर में एक कला शिविर में भाग लेकर डैनी लौटा तो उसके सीने पर स्‍वामी विवेकानंद का एक बैज था। मैंने उससे विवेकानंद के बारे में बात की, वह ज्‍यादा कुछ नहीं जानता था। इस बार की मुलाकात में मैंने डैनी को रोम्‍यां रौलां की लिखी विवेकानंद की जीवनी और स्‍वामी जी के चुनिंदा भाषणों की किताबें भेंट कीं। उसकी खुशी देखने लायक थी।



तो हम चार दोस्‍त एक शाम मिले। करीब तीन घण्‍टे तक खाने-पीने का दौर चला, जिसमें खुलकर ठहाके लगे, एक दूसरे की पसंद नापसंद वाली फिल्‍मों से लेकर विश्‍व सिनेमा तक की बातें हुई। एक मस्‍त और मजेदार शाम गुजरी। उस शाम बहुत सी बातें हुईं, जिन्‍हें मैं लिखना चाहता हूं, लेकिन फिलहाल इसे एक परिचयात्‍मक विवरण ही समझें, बाकी बातें विस्‍तार से कभी लिखूंगा। अभी तो यही चिंता खाए जा रही है कि इन दो अच्‍छे दोस्‍तों के बिना रहने की आदत डालनी पडेगी।

गरीबों का प्रतिनिधि:प्रतिरोध का कवि



मेरे कार्टूनिस्ट दोस्त अभिषेक तिवारी ने आज ऑरकुट पर मुझे कन्नड़ कवि सिद्धालिंगैया की एक शानदार कविता भेजी तो बहुत अच्छा लगा। मुझे महसूस हुआ कि इस कविता को अपने मित्रों और पाठकों के साथ बाँटना चाहिए, इसलिए यह कविता अब आप सब के लिए प्रस्तुत है, सौजन्य से अभिषेक तिवारी, राजस्थान पत्रिका, जयपुर।



भूख से मरने वाले
पत्थर ढोने वाले
पिटने वाले, पिटते- पिटते गिर पड़ने वाले
हाथ पैर छूने वाले

खेत जोतने वाले
बोने वाले
फसल काटने वाले
पसीना बहाने वाले
घाम में उबलने वाले मेरे लोग
खाली हाथ घर आने वाले उसांस लेकर बैठ जाने वाले
पेट काट कर जीने वाले मेरे लोग

मंजिलों पर मंजिलें खडी करने वाले
बंगले बनाने वाले
नींव के पत्थरों में फंस जाने वाले मेरे लोग
गलियों गलियों फिरने वाले
बिना आवाज वाले
अन्दर ही अन्दर रोने वाले मेरे लोग

हमेशा ब्याज देते रहने वाले
भाषणों की आग में जल कर भस्म हो जाने वाले मेरे लोग
परमात्मा का नाम लेकर पकवान खाने वालों के
जूते-चप्पल सिलने वाले मेरे लोग

सोना निकलने वाले
अनाज देखने को भी नसीब न होने वाले
कपडे बुनने वाले नंगे शरीर घूमने वाले
जैस कहा जाये वैसा ही करने वाले मेरे लोग

हवा पर जीते हैं मेरे लोग

Tuesday, 14 April, 2009

दया पवार के 'अछूत' की याद


कुछ लेखक ऐसे होते हैं, जो अपने लेखन से साहित्य की पूरी परंपरा ही बदल डालते हैं। मराठी के महान रचनाकार दगडू मारुति पवार उर्फ दया पवार ऐसे ही लेखक थे। दया पवार की जिंदगी का संघर्ष विश्वसाहित्य के उन महान लेखकों की याद दिलाता है, जिन्होंने विपरीत हालात में भी विचलित हुए बिना ही लेखन और जीवन दोनों स्तर पर निरंतर संघर्ष करते हुए अपना मुकाम बनाया। उनका विश्वप्रसिद्ध उपन्यास ‘अछूत’ उनके जीवन और संघर्ष का अनूठा दस्तावेज है, जिसे पढ़ते हुए आपके रोंगटे खड़े हो जायें, क्योंकि एक दलित होने की यातना और उस यातना से गुजरते हुए कदम-कदम पर अदम्य जिजीविषा के साथ आगे बढ़ते जाने की ललक आपको भारतीय क्या विश्वसाहित्य में भी इस रूप में बहुत कम पढ़ने-देखने को मिलेगी। वजह यह भी कि भारतीय जाति व्यवस्था जैसी अमानवीय व्यवस्था, जिसमें मनुष्य को सिर्फ एक जाति में जन्म लेने के कारण अपमान और यंत्रणा जिंदगी भर भोगनी पड़ती है।

‘अछूत’ एक ऐसा आत्मकथात्मक उपन्यास है, जिसमें दया पवार और दगडू मारुति पवार का आपसी संवाद है और इस संवाद में चालीस बरस का लेखा-जोखा है। इन चालीस बरसों के विवरण में आपको महाराष्ट्र के एक गांव से लेकर ठेठ मुंबई तक यानी दया पवार के बचपन से लेकर प्रौढावस्था तक जिये गए त्रासद जीवन की दिल दहला देने वाली कथा पढ़ने को मिलती है। मां और नानी के साथ गांव में बिताए दिनों में सवर्णों की जूठन खाने से लेकर पग-पग पर अपमानित होने की अनंत यातना से गुजरना और आजादी के उस संघर्षषील दौर में डा. अंबेडकर के नेतृत्व में दलितों का संगठित होना, अत्याचार के विरूद्ध संघर्ष करना और पढ़-लिख कर आगे बढना, अर्थात कुल जमा हर मुष्किल में सामाजिक बदलाव को जारी रखना। एक यंत्रणापूर्ण जीवन में डा. अंबेडकर के विचार और उनका प्रेरक व्यक्तित्व कैसे एक सामान्य लड़के को, जो पढ़ाई में बेहद कमजोर है, बमुष्किल पास हो पाता है, पहले एक सरकारी अधिकारी की नौकरी दिलाते हैं और फिर एक क्रांतिकारी लेखक बनाते हैं। जब बाबासाहेब जिन्हें लेखक ने दादासहेब कहा है, निधन होता है तो उनकी शवयात्रा में शामिल होने के लिए दया पवार छुट्टी के लिए आवेदन करते हैं। अर्जी में कारण लिखते हैं, डा. अंबेडकर का निधन। अफसर कहता है कोई निजी कारण लिख दो। दया पवार कहते हैं, ‘साहब, वे हमारे घर के एक सदस्य ही थे। कितनी अंधेरी गुफाओं से उन्होंने हमें बाहर निकाला, यह आपको क्यों मालूम होने लगा?’ इस जगह आकर किसी भी पाठक की आंखों से आंसू आए बिना नहीं रह सकते, क्योंकि दया पवार की जिस जिंदगी को इससे पहले के पृष्ठों में जिसने पढ़ लिया, वो इसी बिंदु पर आकर दर्द और संवेदना से परिपूरित होता है।

यह उपन्यास पहले मराठी में ‘बलूत’ नाम से छपा, फिर हिंदी में और इसके बाद विष्व की कई भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ। मराठी में भास्कर चंदावरकर ने इस उपन्यास पर ‘अत्याचार’ नाम से फिल्म बनाई, जिसे कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराहा गया। 1978 में इस उपन्यास के प्रकाषन के बाद सवर्णों की ओर से इसकी खूब आलोचना भी की गई, लेकिन इतिहास ने सिद्ध कर दिया कि एक किताब कैसे पूरी परंपरा को बदल डालती है। इस उपन्यास के बाद ही मराठी में आत्मकथात्मक लेखन की शुरूआत हुई और हिंदी साहित्य में कमलेष्वर ने ‘सारिका’ का मराठी दलित लेखन विषेषांक निकालकर हिंदी क्षेत्र में दलित साहित्य का रास्ता खोला। आज के समूचे दलित लेखन की नींव कमोबेष दया पवार के इस उपन्यास पर ही टिकी है। भाषा के स्तर पर देखें तो यह उपन्यास ही आज के समकालीन दलित लेखन की भाषा, भंगिमा और सौंदर्यषास्त्र का मार्गदर्षक रहा है। अमानवीय परिस्थितियों में रहने वालों की भाषा-बानी पहली बार भारतीय साहित्य में दया पवार ही सामने लेकर आए। इस बाबत दया पवार इस साफगोई का श्रेय अपनी मां को देते हैं, जिसने उन्हें यह सीख दी कि अपने जीवन की हर सही गलत बात किसी एक व्यक्ति को जरूर बताकर रखो। दया पवार ने इस उपन्यास को इसी रूप में लिखा है यानी दगडू मारुति को अपनी जीवन कथा बताते हुए। उपन्यास के अंत में दया पवार एक कविता के रूप में अपने जीवन को बयान करते हैं। ‘नस-नस से फूटना चाहती है यातना, ज्यों कोढ़ी की अंगुलयों से पत्ते झरते हों’।

पद्मश्री से सम्मानित दया पवार का जन्म 15 सितंबर, 1935 को हुआ और 20 दिसंबर, 1996 को निधन हुआ। वे एक समर्थ कवि भी थे और उनकी पहली काव्यकृति ‘कोंडवाडा’ खासी चर्चित रही। उन्होंने आलोचनात्मक लेखन भी किया और फिल्में भी लिखीं। जब्बार पटेल निर्देषित फिल्म ‘बाबासाहेब’ उनकी महत्वपूर्ण फिल्म है, जिसमें मराठी के एक और महत्वपूर्ण उपन्यासकार अरुण साधु उनके सहयोगी लेखक थे।

Monday, 13 April, 2009

जापान के हिन्दी विद्यार्थियों का वीडियो

पिछली पोस्ट में मेरे ऑरकुट प्रोफाइल से मित्रों को जापानी हिन्दी विद्यार्थियों का वीडियो देखने में थोडी दिक्कत हो रही थी। वह वीडियो http://youtube.com par hai आप भी इसे देखें और विद्यार्थियों के हिन्दी प्रेम की सराहना करें। अगर आप सुरेश ऋतुपर्ण को इसके लिए शुक्रिया कहें तो क्या कहने। वीडियो देखें और अपनी टिप्पणी जरूर पोस्ट करें। आप यूं ट्यूब पर जाकर 'जापानीज़ इन इंडिया' फाइल खोज कर भी इसे देख सकते हैं। लिंक इस प्रकार है http://www.youtube.com/watch?v=AOrRMqyjR78

Sunday, 12 April, 2009

जापान से आए हिन्दी विद्यार्थी


कोई एक महीने भर पहले दिल्ली के वासी सुरेश ऋतुपर्ण अपने साथ जापानी हिन्दी विद्यार्थियों का एक दल लेकर आए थे। ऋतुपर्ण आजकल जापान की टोकियो यूनवर्सिटी ऑफ़ फोरेन स्टडीज़ में हिन्दी पढ़ा रहे हैं। कुछ वक्त इन विद्यार्थियों के साथ बिताने का मौका मिला। यह सब अभी हिन्दी की पहली कक्षा में ही हैं लेकिन हिन्दी बोलने में इनका उत्साह गज़ब का था। मैंने जयपुर में मीडिया के कुछ मित्रों को बुलाकर कवरेज़ करवाया। मैंने अपने मोबाइल कैमरे से इनका एक वीडियो और कुछ फोटो शूट किए थे। ब्लॉग पर आप उनकी तस्वीर कई दिन से देख रहे हैं, आज मैंने अपने ऑरकुट प्रोफाइल पर वो वीडियो भी डाल दिया है। मित्र लोग जाकर उस वीडियो को देखें कि कैसे जापानी गुडियाएँ हिन्दी में 'हम होंगे कामयाब' गीत गुनगुना रही हैं। मेरे ऑरकुट प्रोफाइल का पता वही है जो ब्लॉग का है। एक बार जाकर देखें तो सही।

Sunday, 5 April, 2009

चार्ल्स डार्विन: प्राणी जगत की अद्भुत कथा


बेचारे चार्ल्स डार्विन को आज तक गालियाँ पड़ रही हैं की उसने इंसान को बंदरों की औलाद कहा था। आज न्यूयॉर्क या मुंबई, लाहौर में जो कुछ हो रहा है, वो काम कम से कम बन्दर तो नहीं कर सकते, लेकिन इंसानी दुनिया को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बदलने का जो काम डार्विन ने डेढ़ सौ सालों पहले किया उसे याद करने की आज भी ज़रूरत है। मैंने 'डेली न्यूज़' के अपने साप्ताहिक स्तम्भ 'पोथीखाना' में इस बार डार्विन की किताब का ज़िक्र किया है। पाठक मित्रों के लिया हाज़िर है वही आलेख।

उन्नीसवीं शताब्दी में जिन किताबों ने दुनिया को देखने का नजरिया हमेशा के लिए बदल डाला उनमें चार्ल्स डार्विन की ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ़ स्पीसीज बाइ मीन्स ऑफ़ नेचुरल सलेक्षन, ऑर द प्रिज़र्वेशन ऑफ़ द फेवर्ड रेसेज इन द स्ट्रगल फॉर लाइफ’ के प्रकाशन के डेढ़ सौ वर्ष इसी साल पूरे हो रहे हैं। आज के दिन यानी 5 अप्रेल, 1859 को डार्विन ने इस क्रांतिकारी किताब के पहले तीन अध्याय प्रकाषक को सौंपे थे। इस वर्ष डार्विन के जन्म के भी दो सौ साल पूरे हो रहे हैं। डार्विन की इस पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि विज्ञान की किताब होते हुए भी यह आम आदमी के लिए आसानी से समझ में आ जाने वाली किताब है। संभवतः यह दुनिया में इस किस्म की एकमात्र किताब है, जिसका विश्व की लगभग समस्त भाषाओं में अनुवाद हुआ और अरबों पाठकों ने पढ़ा। अपने डॉक्टर पिता की छह में से पांचवीं संतान डार्विन को बचपन से ही वनस्पति शास्त्र और जीव विज्ञान में गहरी रूचि थी। डार्विन के आरम्भिक अध्यापकों ने उसकी कोई मदद नहीं कि उल्टे उसे हतोत्साहित ही किया। केंब्रिज विश्वविद्यालय पहुंचने पर ही डार्विन को अच्छे गुरु और सहयोगी मिले। अपनी धुन के पक्के डार्विन ने जब पेले की किताब ‘नेचुरल थियोलोजी’ पढी, तो उसे संदेह हुआ, क्योंकि उस किताब में यह बताया गया था कि जीवों में परिवर्तन ईश्वरीय इच्छा के कारण प्राकृतिक रूप से होता है। इसके बाद डार्विन ने जॉन हर्षेल और अलेक्जेंडर वोन हंबोल्ट को पढ़ा तो उन्हें लगा कि प्रकृति में कुछ रहस्य ऐसे हैं, जिन पर शोध करने से इस बात पर से पर्दा उठ सकता है कि कैसे एक ही प्रकार के प्राणी अलग अलग जगहों पर एक दूसरे से भिन्न दिखाई देते हैं। डार्विन ने इस बाबत स्थानीय और व्यक्तिगत स्तर पर कुछ शोध किये और लेख लिखे। इन लेखों से डार्विन की ख्याति एक युवा शोधकर्ता के रूप में फैलने लगी।

इसके फलस्वरूप एचएमएस बीगल जहाज की दूसरी यात्रा के लिए डार्विन को एक युवा सहयोगी और शोधकर्ता के रूप में भाग लेने के लिए निमंत्रण मिला। पिता इस बात के लिए राजी नहीं थे कि डार्विन इस कठिन समुद्री यात्रा पर वक्त बर्बाद करने के लिए जाए। एक रिश्तेदार ने पिता को मनाया और डार्विन एक ऐतिहासिक यात्रा पर निकल पड़े। इस यात्रा में डार्विन ने मुख्य रूप से समुद्री जंतुओं का अध्ययन किया। जब जहाज रुक जाता तो डार्विन उस इलाके के जीव-जंतुओं को अध्ययन करते, उन्हें पकड़ते और अपने साथ जहाज पर ले लेते। किसी स्थान से वे किसी माध्यम से अपने नोट्स और जीव-जंतुओं को केंब्रिज भेज देते। जहाज की यात्रा लगभग पांच साल की थी। इन पांच वर्षों के अध्ययन को डार्विन ने वापस लौटकर लिपिबद्ध किया। 2 अक्टूबर, 1836 को बीगल से लौटने पर डार्विन की शोहरत एक जीवविज्ञानी के रूप में हर तरफ फैल चुकी थी। डार्विन ने अपनी यात्रा को लिपिबद्ध करने का जो क्रम शुरु किया तो हजारों लेख लिख डाले। इन लेखों के कारण विज्ञान और समाज में निरंतर विवाद खड़े होने लगे। चर्च को डार्विन की खोजों के कारण आपत्ति होने लगी। अखबारों में डार्विन को गलत सिद्ध करने के लिए लगातार हमले होने लगे। क्योंकि डार्विन उस बनी बनाई धार्मिक अवधारणा को चुनौती दे रहे थे, जो यह मानकर चलती है कि संसार में परिवर्तन सिर्फ ईश्वरीय इच्छा के कारण होते हैं।लगभग पच्चीस सालों के निरंतर अनुसंधान और लेखन के बाद 1859 में ‘द ओरिजिन ऑफ़ स्पीसीज’ पूर्ण हुई। छपते ही किताब तुरंत बिक गई और हंगामा मच गया। इस किताब का पहले खासा लंबा नाम था, जो 1872 के सातवें संस्करण में संक्षिप्त किया गया। प्रकाशन के तुरंत बाद केंब्रिज विश्वविद्यालय में कुछ धर्मगुरुओं, वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों और विद्यार्थियों की एक सभा हुई, जिसमें डार्विन पर खूब हमले किये गये और सवालों की बौछार की गई। डार्विन ने अविचलित रहते हुए सबको गौर से सुना और अंत में संक्षिप्त में अपनी बात रखी। डार्विन ने कहा कि कुदरती तौर पर प्रत्येक जीव स्वयं को बचाने और अपना वंश बढ़ाने के प्रयास करता है। काल और परिस्थिति के मुताबिक वह स्वयं को बदलता है, यह बदलाव ही प्राकृतिक चयन का सिद्धांत है, जिससे नए प्राणियों की उत्पत्ति होती है और प्राणिजगत का विकास होता है। डार्विन ने कहा कि आज आप भले ही मेरी बात से सहमत न हों, इसमें मैं कुछ नहीं कर सकता, लेकिन जो सच है मैं उससे इन्कार नहीं कर सकता, समय के साथ आपको ही नहीं दुनिया को मानना पड़ेगा, क्योंकि इस दुनिया को इसी सिद्धांत के चलते अपना अस्तित्व बनाए रखना होगा। डार्विन की इस किताब ने ही आगे चलकर विज्ञान में कई नई शाखाओं की शुरुआत की। आधुनिक वनस्पतिशास्त्र, कोशिकीय जीवविज्ञान और जीन विज्ञान जैसे विषय डार्विन की पुस्तक के कारण ही जनमे और आधुनिक विज्ञान का नया स्वरूप विकसित हुआ।

Wednesday, 1 April, 2009

पिता के बहाने एक खोजयात्रा

हर बार की तरह मैंने बीते हफ्ते 'डेली न्यूज़' के अपने 'पोथीखाना स्तम्भ में एक नई और शानदार किताब की चर्चा की है। यहाँ पेश है वही स्तम्भ, अपने दोस्तों और प्रिय पाठकों के लिए।
आतिश तासीर सिर्फ जन्म से मुसलमान हैं, वजह यह कि उनकी मां सिख हैं और एक पत्रकार होने के नाते उनकी मुलाकात एक संयोग से एक दिन पाकिस्तान के एक नेता से दिल्ली में होती है। कुछ दिनों की नजदीकियों से आतिश का जन्म होता है और पिता कभी पलटकर मां-बेटे की खैर-खबर नहीं लेते। मां ने बेटे को न केवल मुस्लिम नाम दिया, बल्कि परवरिश भी उसी रूप में करने की कोशिश की। अपने सिख भाई-बहनों के बीच पले-बढ़े आतिश उच्च शिक्षा प्राप्त कर पत्रकार बने और ‘टाइम’ जैसी पत्रिका से जुड़े। आतिश ने अपने पिता को सिर्फ एक तस्वीर में ही देखा था, लेकिन एक मुस्लिम होने के अहसास और उसकी वजह से उठने वाले कई सवाल उन्हें परेशान करने लगे तो उन्होंने इन सवालों के जवाब ढूंढने के लिए एक लंबी यात्रा शुरू की, जो अब एक किताब की शक्ल में सामने है, ‘स्ट्रेंजर टू हिस्ट्री-ए संस जर्नी थ्रू इस्लामिक लैंड्स।’

आतिश की पहली विडम्बना थी कि एक हिंदू भारतीय मां और पाकिस्तानी मुस्लिम पिता की संतान होने से एक बच्चे के मन में कितने किस्म के सवाल पैदा होते हैं। इन सवालों से जूझते हुए आतिश अपने मुस्लिम पाकिस्तानी पिता और उनके देश को जानने के लिए निकल पड़ते हैं। पिता आधुनिक हैं, शराब के शौकीन भी, लेकिन अपने आपको एक ‘सांस्कृतिक मुसलमान’ मानते हैं। आखिर यह सांस्कृतिक मुसलमान क्या है? अगर पूरी दुनिया की मुसलमान कौम एक है तो फिर इतने मुस्लिम देश क्यों हैं और क्यों आपस में लड़ते रहते हैं, क्यों पाकिस्तान से बांग्लादेश का जन्म होता है? ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने के लिए आतिश तासीर ने अपनी यात्रा शुरू की, इस्लाम के लिहाज से ऐतिहासिक और समृद्ध सांस्कृतिक नगर इस्ताम्बूल से। वहां से चलकर मक्का और ईरान होते हुए वे पाकिस्तान पहुंचते हैं, जहां अपने पिता से मिलते हैं। जिस दिन आतिश की पिता से मुलाकात होती है, उसी दिन पेशावर में बेनजीर भुट्टो की हत्या हो जाती है। आतिश के पिता सलमान तासीर हैं, जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेता हैं और पंजाब के गवर्नर हैं। आतिश की साहसी माँ हैं भारत की कद्दावर पत्रकार तवलीन सिंह।
आतिश अपनी किताब में लिखते हैं, ‘मैंने अपने पिता को आखिर खोज ही लिया, क्योंकि मैं उस अंधेरे मैं नहीं जीना चाहता था, जिसमें पिता के प्रति एक अजनबीपन जिंदगी भर बना रहे। अगर मैं अपने पिता से नहीं मिलता तो मैं जिंदगी भर उनके बारे में उन बातों से ही अंदाजा लगाता रहता, जो मेरी मां आस्थापूर्वक उनके बारे में मुझे बताती रही हैं। मुझे महसूस हुआ कि इस सब से तो मैं अपरिचय और अज्ञान के दायरे में बंधा रह जाउंगा। इतिहास को कभी भी आस्था और विशवास के सहारे स्वीकार नहीं किया जा सकता है।’ अपनी यात्रा में आतिश ने न केवल अपने पिता को खोजा, बल्कि उन सवालों से भी दो-चार हुए, जिनको लेकर भारत, पाक और बांग्लादेश के मुसलमान दुनिया के दूसरे मुल्कों के मुसलमानों से अलग सोच रखते हैं और अधिकाँश मुसलमान आधुनिकता को लेकर क्यों डर पाले रहते हैं। इन सवालों के जवाबों के लिए वे मुल्ला, मौलवी से लेकर आम लोगों तक से मिले। जो जवाब मिले वे परस्पर विरोधी और चौंकाने वाले थे।
तुर्की में आतिश की मुलाकात एक ऐसे चित्रकार से होती है, जो पक्का मजहबी मुसलमान है। एक दिन उसका दोस्त कार में रखी कुरान शरीफ उठाकर बाहर फेंक देता है और कहता है कि इसमें कुछ नहीं रखा। दरअसल तुर्की में सरकार पुलिस के बल पर इस्लामी कानून लागू करने के प्रयास करती है और इसीलिए चित्रकार का मित्र कुरान फेंक कर सरकार के प्रति अपनी नफरत जाहिर करता है। आप किसी भी व्यक्ति को जबर्दस्ती मजहबी नहीं बना सकते। इसी तरह तेहरान में आतिश की मुलाकात ऐसे मुसलमानों से होती है, जो गुपचुप तरीके से हरे रामा हरे कृष्णा संप्रदाय से जुड़े हुए हैं। तुर्की के मुसलमान जिस इस्लामी व्यवस्था का ख्वाब देखते हैं, वही ईरान में लागू होती है तो जनता परेशान होती है? इस्लाम और मुसलमानों के इन अंतर्विरोधों को आतिश तासीर ने बहुत खूबसूरती से और दिलचस्प अंदाज में उठाया है।
इस किताब को पढ़ते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आतिश की परवरिश एक सिख परिवार में हुई और आतिश के पिता को लेकर परिवार में जो नाराजगी और नफरत थी, वह बचपन से ही आतिश को घर में होते हुए भी घर से अलग होने के अहसास तले दबाये हुए थी। इसलिए आतिश की बहुत सी संकल्पनाओं से असहमत हुआ जा सकता है। लेकिन दिलचस्प अंतर्विरोधों को जानने, समझने और कुछ इस्लामी देशों की यात्रा करने के लिहाज से किताब जरूर पढ़ी जा सकती है।