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Monday, 28 December 2009

2009 के नौ नौजवान


गुजश्‍ता साल में राजस्थान के नौजवानों ने साहित्य, कला और संस्कृति की दुनिया में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस कदर नाम कमाया है कि आज की युवा पीढ़ी की प्रतिभा और कर्मशीलता देखकर हर किसी को नाज होता है। हमने राजस्थान के समूचे सांस्कृतिक परिदृश्‍य पर एक विहंगम दृष्टि डाली तो सुखद आश्‍चर्य हुआ कि साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में निरंतर नए लोग आ रहे हैं और पिछले कुछ सालों से सक्रिय संस्कृतिकर्मियों ने निरंतर उपस्थिति से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। गुजरते हुए 2009 के नौ युवा लेखक-कलाकारों का चयन करना खासा मुश्किल काम है। फिर भी हमने विभिन्न क्षेत्रों के वरिष्ठ संस्कृतिकर्मियों से बातचीत के आधार पर साल के नौ प्रतिबद्ध, समर्पित, सक्रिय और प्रतिभावान युवाओं का चयन किया है। 35 वर्ष से कम आयु के ऐसे नौजवान जिन्होंने इस वर्ष खास उपलब्धि हासिल की और अपनी प्रतिभा के दम पर सुनहरे भविष्य के संकेत दिए। इनके अतिरिक्त ऐसे युवा भी हैं, जिन्होंने अपनी सक्रियता से उम्मीदें जगाई हैं। इन सभी नौजवानों को सौ-सौ सलाम।

ग़ज़ल की दुनिया का नया सितारा: मोहम्मद वकील


टेलीविजन से सिनेमा तक की दुनिया में नाम कमा चुके युवा ग़ज़ल गायक मोहम्मद वकील इस बरस अपने नए एलबम ‘गुजारिश’ की वजह से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहे गए। इस एलबम की ‘स्क्रीन’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका ने प्रशंसा की। इस एलबम में मो. वकील ने संगीत के महान दिग्गज कलाकारों मसलन बेगम अख्तर, बड़े गुलाम अली खां, मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और जगजीत सिंह को आदरांजलि दी है। ग़ज़ल सम्राट उस्ताद अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन के इस प्रतिभावान शिष्य से संगीत की दुनिया को बहुत उम्मीदें हैं।

सितार का नया जादूगर: अंकित भट्ट


मशहूर सितारवादक पं. शशिमोहन भट्ट के पोते युवा सितारवादक अंकित भट्ट ने इस साल की शुरुआत ही अहमदाबाद के प्रसिद्ध सप्तक समारोह में सितारवादन से की। संगीत में सर्वोच्च अंकों के साथ एम.ए. करने पर अंकित को राज्यपाल ने सम्मानित किया। गोवा, मुंबई, दिल्ली, जयपुर और देश के विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगीत सम्मेलनों और जुगलबंदी कार्यक्रमों में शिरकत कर यह सिद्ध किया कि वह सितार का नया जादूगर है। इसी बरस अंकित को मुंबई का प्रसिद्ध सुरमणि सम्मान प्रदान किया गया।

साहित्य का उभरता नक्षत्र: राहुल सोनी


लेखक, अनुवादक और संपादक राहुल सोनी भारत की पहली पांडुलिपि संपादन सेवा ‘राइटर्स साइड’ के संपादक हैं। इस साल उनके द्वारा संपादित पुस्तक  मैन एशियन लिटरेरी अवार्ड के लिए नामांकित हुई। राहुल ने केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, उदय प्रकाश, उदयन वाजपेयी, गगन गिल आदि बहुत से हिंदी साहित्यकारों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। इन दिनों वे धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’, गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘तिरोहित’ और श्रीकांत वर्मा के काव्य संग्रह ‘मगध’ का अंग्रेजी में अनुवाद कर रहे हैं।  राहुल द्वारा संपादित पुस्तकें पेंगुइन, हे हाउस, सेडार, हार्पर कोलिंस, यात्रा बुक्स आदि प्रतिष्ठित प्रकाशनों से प्रकाशित हुई हैं। इसी बरस राहुल को प्रतिष्ठित ईस्‍ट एंग्लिया विश्‍वविद्यालय, ब्रिटेन ने वर्ष 2010 के लिए चार्ल्‍स वालेस फेलोशिप प्रदान करने की घोषणा की है। राहुल हिंदी की पहली द्विभाषी वेब पत्रिका 'प्रतिलिपि' के, गिरिराज किराडू के साथ संस्‍थापक-संपादक हैं।

रंगमंच की नई प्रतिभा: दिनकर शर्मा


साबिर खान जैसे समर्पित वरिष्ठ रंगकर्मी के हाथों ढलकर जयपुर के जिन युवा कलाकारों ने इस वर्ष अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया उनमें दिनकर शर्मा बेहद प्रतिभाशाली हैं। दर्जनों नाटकों में अभिनय कर चुके दिनकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दौलत वैद के साथ ‘बेहद नफरत के दिनों में’ नाटक में निर्देशन आदि में सहयोग किया। इसके अतिरिक्त दो नाट्य कार्यशालाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस वर्ष भारत सरकार के कला व संस्कृति मंत्रालय की प्रतिष्ठित जूनियर छात्रवृत्ति के लिए दिनकर शर्मा का चयन किया गया। इस छात्रवृत्ति के तहत दिनकर स्तानिस्लाव्स्की और बर्तोल्त ब्रेख्त की अभिनय दृष्टि का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे। राजस्थान के रंगमंच को इस युवा कलाकार से बहुत आशाएं हैं।

फिल्म, कला और साहित्य की त्रिवेणी: निधि सक्सेना


कविता से शुरुआत कर चित्रकला और मूर्तिकला से होते हुए निधि सक्सेना ने डाक्यूमेंट्री और धारावाहिकों की दुनिया में इस साल पदार्पण किया है। कोई एक दर्जन से अधिक डाक्यूमेंट्री फिल्में एक साल में बनाने वाली निधि ने इन फिल्मों में लेखन और निर्देशन भी स्वयं किया है। इस बरस के आखिर में निधि ने राजस्थान के शास्त्रीय संगीत को लेकर जयपुर दूरदर्शन पर अपना पहला स्वतंत्र धारावाहिक ‘राग रेगिस्तानी’ शुरु किया है, जिसमें दिग्गज संगीतकारों के साथ निधि ने उनकी कला को अंतरंगता से पहचानने और सामने लाने की कोशिश की है। इसके अलावा विभिन्न कला प्रदर्शनियों में निधि के चित्र और मूर्तिशिल्प भी इस वर्ष प्रदर्षित हुए और पर्याप्त सराहे गए।

राजस्थानी का कल्पनाशील कवि: मदन गोपाल लढ़ा


राजस्थानी भाषा में ‘म्हारी पांती री चिंतावां’ कविता संग्रह से चर्चा में आए युवा कवि और कथाकार मदन गोपाल लढ़ा लगातार सक्रिय हैं। हिंदी और गुजराती में उन्होंने काफी अनुवाद किए हैं। पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होकर पाठकों और आलोचकों का ध्यान खींचती रही हैं। मनुज देपावत, भत्तमाल जोशी और चंद्रसिंह बिरकाळी सम्मान से सम्मानित इस प्रतिभावान युवा राजस्थानी लेखक को इस साल कमला गोईन्का फाउण्डेशन, मुंबई की ओर से प्रतिष्ठित किशोर कल्पनाकांत सम्मान से नवाजा गया।

भवाई में समाई निष्ठा


राजस्थानी लोक नृत्यों की प्रवीण युवा नृत्यांगना निष्ठा अग्रवाल ने भवाई जैसे मुश्किल नृत्य को इस कदर साध लिया है कि भारत सरकार के कला व संस्कृति मंत्रालय की ओर से इस वर्ष निष्ठा को राष्ट्रीय युवा छात्रवृत्ति के लिए चुना गया। देश भर में निष्ठा ने भवाई के सैंकडों कार्यक्रम प्रस्तुत कर राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की है। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, पंजाब और राजस्थान सरकार द्वारा सम्मानित इस युवा नृत्यांगना ने राजस्थानी लोक नृत्य को नए आयाम दिए हैं और उम्मीद जगाई है कि उनके रहते राजस्थानी लोक नृत्यों का भविष्य बहुत उज्ज्वल है।

आम आदमी का चितेरा: सोहन जाखड़


चित्रकला में राजस्थान के जिन युवा चित्रकारों ने इस साल सबसे ज्यादा सक्रिय रहकर अपनी प्रतिभा और लगन से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई उनमें सोहन जाखड़ का नाम इसलिए भी लिया जाना चाहिए कि इस युवा कलाकार के चित्र राष्ट्रीय ही नहीं अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित हुए। एक बरस में छह प्रदर्शनियां और विभिन्न कला शिविरों में शिरकत करने वाले सोहन की चित्रकृति को सूदबी जैसी प्रतिष्ठित संस्था ने न्यूयार्क में नीलामी के लिए चुना। इसी साल उनके चित्रों की दिल्ली, मुंबई और सिंगापुर में प्रदर्शनियां हुईं। सोहन के चित्रों में आम भारतीय आदमी के संघर्षपूर्ण जीवन को गहरी संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया गया है, इसीलिए समकालीन कला में उनकी अलग पहचान बनी है।

गहरे बिंबों का सर्जक: राजेन्‍द्र प्रसाद


बहुत से युवा चित्रकार प्रारंभ से ही अपनी अलग सोच और कल्पनाशीलता से एक खास पहचान बना लेते हैं। ऐसे कलाकारों में राजेन्‍द्र प्रसाद भी हैं, जिनके चित्र उनसे बेहद उम्मीदें जगाते हैं। राजेन्‍द्र का काम राजस्थान में उस परंपरा का काम है, जिसे पी.एन. चोयल जैसे महान चित्रकारों ने विकसित किया। लोक में बिखरे चित्राम और बिंबों को राजेन्‍द्र ने बहुत खूबसूरती के साथ पकड़ा है। इस साल राजेन्‍द्र ने जे.आर.एफ. में सफलता हासिल की और अनेक कला प्रदर्शनियों व शिविरों में भाग लेकर अपनी कला के प्रति बेहद आश्‍वस्त किया है। इस वर्ष राजेन्‍द्र को कला मेले में और एक पोस्टर प्रतियोगिता में भी पुरस्कृत किया गया।

इन कलाकारों और रचनाकारों के अलावा भी अनेक युवाओं ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई और अपनी सर्जनात्मकता से सबका ध्यान आकर्षित किया। संगीत की दुनिया में सलिल भट्ट को प्री ग्रैमी नोमिनेशन मिला, गायन में जयपुर के अल्लाह रक्खा, दिव्या शर्मा जांगिड़ व बीकानेर के समर्थ जाह्नवे, जोधपुर के दीपक क्षीरसागर गिटार वादन में, जयपुर के विनायक सेठ वायलिन में और विनायक शर्मा सितार में अपनी प्रतिभा से वर्षपर्यंत चर्चित रहे। चित्रकला में अमित शर्मा हारित, गौरी शंकर सोनी, हरि कुमावत, राम खिलाड़ी सैनी, आकाश चोयल, पवन शर्मा, अजय मिश्रा और बहुत से कलाकार हैं। साहित्य में गौरव सोलंकी,  पल्लव, मिहिर पण्ड्या और गिरिराज किराडू सरीखे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त लेखक हैं, जो निरंतर सक्रिय हैं। युवा कथाकार रामकुमार सिंह की दूसरी कहानी 'तुझे हम वली समझते, जो न बादाख्‍वार होता' संगमन-2009 में चर्चा के केंद्र में रही। साहित्‍य अकादमी से अब तक रिकॉर्ड सबसे कम उम्र में सम्‍मानित राजस्‍थानी कवयित्री संतोष मायामोहन का दूसरा काव्‍य संग्रह 'जळविरह' आया। रंगमंच के क्षेत्र में जयपुर की सारिका पारीक और धौलपुर के नरेश पाल सिंह चौहान ने दूसरे प्रयास में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिला पाया। वहीं अभिषेक गोस्‍वामी और गगन मिश्रा ने थिएटर इन एजूकेशन के माध्यम से नई पीढ़ी में रंगमंच को लोकप्रिय बनाने में खासे सक्रिय रहे। उर्दू साहित्य के लिहाज से ‘आबशार’ की गुलजार के साथ युवा शायरों के साथ वर्कशॉप से साल का आगाज हुआ, लेकिन नए शायरों में आदिल रज़ा मंसूरी और ब्रजेश अंबर के अलावा किसी ने प्रभावित नहीं किया।

Sunday, 8 November 2009

प्रयोगधर्मिता से निकली राह : सुनीत घिल्डियाल का कला संसार



सुनीत घिल्डियाल राजस्‍थान के बेहद प्रशंसित और प्रतिष्ठित चित्रकार हैं। राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उनके काम को एक दर्जन से अधिक बार सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। देश-विदेश तक उनकी कलाकृतियां पहुंची हैं और सराही गई हैं। राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न कला शिविरों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। उनके चित्र चालीस से अधिक एकल व समूह प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किये गए हैं। हेमवतीनंदन बहुगुणा विश्‍वविद्यालय, गढ़वाल से कला में स्नातकोत्तर सुनीत वर्तमान में जयपुर में राजस्थान स्कूल आफ आर्ट में पढ़ा रहे हैं।
स्वभाव से बेहद हंसमुख, मिलनसार और निरंतर कला की धुन में मगन रहने वाले सुनीत घिल्डियाल का काम मुझे व्यक्तिगत रूप से उस वक्त से पसंद रहा है, जब वे पेंसिल ड्राइंग से अत्यंत अर्थवान चित्रों की रचना किया करते थे। यह बात करीब दो दशक पुरानी है। इस बीच सुनीत ने एक लंबी कला यात्रा की है, जिसमें वृहदाकार कैनवस से लेकर ताजा काष्ठ कलाकृतियों का अभिनव कला संसार समाहित है। मुझे इस पूरी कला यात्रा को देखकर महसूस होता है कि अब शायद सुनीत को अपना मनचाहा कला रूप या कहें कि माध्यम मिल गया है। पता नहीं क्यों ये पंक्तियां लिखते वक्त मुझे सुनीत की वो ड्राइंग बुक्स याद आ रही हैं, जिन्हें दिखाते हुए सुनीत एक-एक चित्र की गहन व्याख्या कर मुझे अपनी सृजनशीलता की गहराई से ही नहीं बल्कि अपनी विचार प्रक्रिया और उससे संबद्ध सृजन प्रक्रिया से प्रभावित किया करते थे। उस दौर में वे एक युवा कलाकार के तौर पर जिस आत्म संघर्ष की प्रक्रिया से गुजर रहे थे, वह आज जिस मुकाम पर आई है, उसमें सुनीत की बरसों की कलात्मक अंतर्यात्रा बहुत गहराई से रची-बसी है और मुझे गहरी आश्‍वस्ति देती है। उनके कला संसार की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे मूर्त और अमूर्त दोनों तरह के चित्र बनाते हैं और बहुधा उनके यहां दोनों का अत्यंत सुंदर समावेश देखने को मिलता है।



इन बरसों में सुनीत ने रंग और रेखाओं के साथ जो रिश्‍ता बनाया वह कागज, कैनवस से आगे चलकर काष्ठ कला के नए आयामों वाली कला में विकसित हुआ है। कला के सुधी प्रेक्षकों को याद होगा कि सुनीत अपनी ‘फेसेज’ चित्र श्रृंखला से बेहद चर्चित हुए थे, जिसमें उन्हें कई सम्मान-पुरस्कार हासिल हुए थे। पिछले एक दशक से सुनीत ने इस नई कला प्रविधि में देवदार की लकड़ी के पटरे पर कुरेद कर आकृतियां बनाई हैं और इनमें रंग भर कर बेहद खूबसूरत कलाकृतियों का सृजन किया है। लकड़ी पर सुनीत रंगों को कुछ इस प्रकार भरते हैं कि लकड़ी का अपना सौंदर्य भी बना रहे और रंगों की पारदर्षिता प्रेक्षक को नया कलात्मक आस्वाद प्रदान करे। कागज से काष्ठ तक की इस यात्रा को मैं सुनीत की चित्रकला में एक माध्यम भर की खोज हीं नहीं मानता, बल्कि मेरे लिए यह यात्रा सुनीत के चित्रों की अंतर्वस्तु की यात्रा भी है। क्योंकि मेरे लिए कला में माध्यम की खोज अंततः अंतर्वस्तु के बिना नहीं हो सकती। इसलिए मुझे सुनीत की इस नई कला प्रविधि में उनकी वर्षों की सतत कला साधना और गहरी विचार प्रक्रिया दृष्टिगत होती है।



सुनीत ने इस नई कला यात्रा को ‘टाइम एण्ड लाइफ-ए कण्टीन्युअस जर्नी’ शीर्षक दिया है। एक सृजनशील कलाकार के लिए यह शीर्षक उचित भी है, क्योंकि वह इस तरह अपनी पूरी सृजन यात्रा को बयां कर रहा होता है। इस यात्रा पथ में जितने उतार-चढाव हो सकते हैं, वे सब आपको उनकी कला में दिखाई देंगे। हंसी-खुशी के पल हों या किंचित अवसाद के, जीवन के चमकीले प्रकाशमान अवसर हों या गहरी स्मृतियां, सुनीत की कला में वो सब अपनी सदेह उपस्थिति दर्ज कराते हैं। दरअसल सुनीत के काम में आपको एक अजीब किस्म की गहरी संलग्नता दिखाई देती है, जो आपको पहली नजर में ठिठका देती है और जब आप एकबारगी ठहर कर उनके काम को देखने लगते हैं तो रंग और आकृतियों के व्यामोह में आप पूरी तरह खो जाते हैं। फिर आप अपनी स्मृतियों पर जोर डालने लगते हैं और आपके सामने आपका अपना स्मृतिलोक एक नए कलात्मक रूप में सामने दिखने लगता है। इस तरह सुनीत अपने प्रेक्षक को कई स्तरों पर देखने सोचने के लिए विवश करते हुए आधुनिक कला की अद्भुत कल्पनाशील सर्जनात्मक दुनिया से साक्षात कराते हैं। आधुनिक कला को अर्थहीन कहने वाले बहुतेरे लोग मिल जाएंगे, लेकिन ऐसे लोगों को भी सुनीत की कला, मेरा दावा है, एकबारगी तो गहराई से देखने और सोचने के लिए विवश करेगी ही।



सुनीत गढ़वाल, उत्तराखंड में जन्मे हैं और उनके कला संसार में वहां की खूबसूरत वादियों के साथ, सर्पिल राहें, पगडंडियां, फूलों से महकता परिवेश, जाड़ों में कांपता-सा सूरज, ग्रामीण जनजीवन में व्याप्त लोक रूपाकार, कठोर पहाड़ी जीवन का संघर्ष और इस सबके साथ राजस्थान के रेतीले धोरों की पीली उजास भरी दुनिया इस तरह एकाकार हो गई है कि दो विपरीत छोरों के अंचलों के तमाम रंग उनके काम में सहज दृष्टिगोचर होते हैं। सुनीत प्रारंभ से ही प्रयोगधर्मी रहे हैं और इस माध्यम में उनकी प्रयोगशीलता बहुत आगे निकल आई है, जहां वे काष्ठ पटरे को कैनवस की तरह इस्तेमाल करते हुए उसे कैनवस से अलग भी आकार देते हैं, यानी तयशुदा ज्यामितीय आकार से अलग एक किस्म का ‘लोक रूप’, जिसमें आपको कांकड़ पर विराजमान लोकदेवता के थान की याद आ जाए या फिर गांव-देहात में बिखरे लोक कलारूपों की।



सुनीत के काम की खूबी यही है कि इसमें हमारी जानी पहचानी दुनिया नए रूपाकारों में दिखाई देती है। इस बात को मैं विशेष रूप से कहना चाहता हूं कि आज के आधुनिक कला जगत में जब बहुतेरे कलाकारों की कला प्रेक्षक को एक अजीब किस्म से भयभीत करती है या सजावटी सामान की तरह दिखाई देती है, सुनीत की कला एक विचार प्रक्रिया से गुजरने और सहज ढंग से आधुनिक कला का आस्वाद लेने के लिए आमंत्रित करती है। सुनीत ने वर्षों की प्रयोगधर्मिता के बाद नए माध्यम की खोज करते हुए जो अंतर्यात्रा की है, वह एक और नए सुनीत की संभावना जगाती है, जो अगली बार कुछ और अर्थवान रचता हुआ, हमारे लिए नई कलात्मक दुनिया लेकर आएगा। इस अंतर्यात्रा का हासिल यह है तो इसका आगामी पड़ाव और बेहतर होगा, यही उम्मीद करनी चाहिए।


(सुनीत घिल्डियाल से ए-60, गोल मार्केट, जवाहर नगर, जयपुर, मोबाइल नंबर 09413622979 पर संपर्क किया जा सकता है। यह आलेख जयपुर से समांतर संस्‍थान द्वारा प्रकाशित की जाने वाली द्विमासिक पत्रिका 'संस्‍कृति मीमांसा' के जुलाई-अगस्‍त अंक में शाया हुआ।)





Sunday, 19 April 2009

दो परदेसी दोस्त और उनके साथ बिताये पल


कुछ दोस्‍त जिंदगी में कभी कभी मिलते हैं और जिंदगी का हिस्‍सा हो जाते हैं। कहते तो ये हैं कि ‘परदेसियों से ना अंखियां मिलाना’, लेकिन कभी मिल जाए तो बहुत सुकून होता है। कुछ दिन पहले दो परदेसी दोस्‍तों से एकाध मुलाकात हुई और बातों का सिलसिला ऐसा चला कि एक गहरी दोस्‍ती ने जन्‍म लिया। एक आस्‍ट्रेलिया से है और एक अमेरिका से। पहले ये दोनों आपस में दोस्‍त बने और फिर हमारी मण्‍डली में दाखिल हुए। मैं बात कर रहा हूं आस्‍ट्रेलिया के डेनियल और अमेरिका की एलन की। डैनी चित्रकार है और एलन हिंदी की छात्रा के रूप में आयरिश और भारतीय सिनेमा का अध्‍ययन कर रही है। डैनी एक बार पर्यटक के रूप में जयपुर आए तो यहीं के होकर रह गये। पिछले तीन सालों से उनका और जयपुर का रिश्‍ता लगातार गहरा होता जा रहा है। उनकी मित्र मण्डली में सबसे पहले चित्रकार एकेश्‍वर जुडे और फिर यह सिलसिला चल निकला। आज जयपुर में डैनी के दोस्‍तों की तादाद सैंकडों में हैं और इनमें सिर्फ चित्रकार और बुद्धिजीवी ही नहीं, शहर के आटो चालक, रिक्‍शा चालक, फल बेचने वाले और अडोस पडोस के बहुत से लोग शामिल हैं, जिनसे डैनी का रोज वास्‍ता पडता है।
डैनी आस्‍ट्रलिया में स्‍पेनिश पढाते थे। यूं वे कला के विद्यार्थी रहे हैं और जयपुर में कलाकर्म ही कर रहे हैं। पोर्टेट बनाने में उनका कोई सानी नहीं। छोटे से लेकर पूरी दीवार के आकार के पोर्टट वे सहजता से बना लेते हैं और उनमें कला की तमाम खूबियों से लेकर उनके हाथ की कुशलता को सहज ही देखा जा सकता है। प्रयोग में भी वे पीछे नहीं रहते और विभिन्‍न तरह के प्रयोग करते रहते हैं। वे कई कला प्रदर्शनियों में भाग लेते रहे हैं और कई कलाशिविरों में भी अपना कौशल दिखा चुके हैं।


डैनी से एक दिन अचानक भाई रामकुमार सिंह के साथ मुलाकात हुई। उस वक्‍त डैनी की बहन आई हुई थी, वो हमें बहन से मिलाने ले गये। बातों का सिलसिला ऐसा चला कि हमें यही नहीं पता चला कि कब हम बेतकल्‍लुफ हो गए और नाचने गाने लगे, जिसे डैनी की बहन मैगी ने अपने कैमरे में कैद कर लिया। इस तरह मुलाकातों का एक सिलसिला गति पकडता रहा। अभी 14 अप्रेल को डैनी और उसके पांच मित्रों की एक सामूहिक कला प्रदर्शनी थी। उस दिन एलन से दूसरी मुलाकात हुई। पहले अमित कल्‍ला और हिमांशु व्‍यास की प्रदर्शनी में एलन से मुख्‍तसर सी मुलाकात हो चुकी थी। इस बार थोडी खुलकर बातें हुईं।
एलन आयरिश मूल की अमेरिकी युवती है। उसे भारत और भारतीय सिनेमा से गहरा लगाव है। हिंदी फिल्‍मों की वह जबर्दस्‍त प्रशंसक है। इसी लगाव के चलते उसने पी.एच.डी. के लिए विषय चुना-‘बंटवारे पर बनी आयरिश और भारतीय फिल्‍मों का तुलनात्‍मक अध्‍ययन’। उसके अध्‍ययन में नवें दशक के बाद का सिनेमा ही शामिल है, लेकिन उसने तमाम पुरानी फिल्‍में भी देख रखी हैं। यहां तक कि पाकिस्‍तान में बंटवारे पर बनी फिल्‍में भी उसने देखी हैं। एक दिन डैनी ने कहा कि वह 22 अप्रेल को छह महीने के लिए आस्‍ट्रेलिया जा रहा है, क्‍योंकि वीजा नियमों के कारण वह और नहीं रूक सकता। उधर एलन का भी कोर्स पूरा हो गया है औ उसे भी दो सप्‍ताह बाद जाना है। डैनी ने कहा कि वह हम तीन दोस्‍तों के साथ एक शाम गुजारना चाहता है। यानी मैं, एलन और रामकुमार के साथ।
पहले यह बता दूं कि एलन और डैनी की मुलाकात कैसे हुई। ये दोनों सलमान खान की निर्माणाधीन फिल्‍म ‘वीर’ के सैट पर मिले थे। दोनों को विदेशी होने कारण छोटे से रोल मिले थे। वहां हुई इनकी मुलाकात गहरी दोस्‍ती में बदल गई और दोस्‍ती का एक विशाल दायरा बनता गया। इसमें हम भी शामिल हो गए। अभी जोधपुर में एक कला शिविर में भाग लेकर डैनी लौटा तो उसके सीने पर स्‍वामी विवेकानंद का एक बैज था। मैंने उससे विवेकानंद के बारे में बात की, वह ज्‍यादा कुछ नहीं जानता था। इस बार की मुलाकात में मैंने डैनी को रोम्‍यां रौलां की लिखी विवेकानंद की जीवनी और स्‍वामी जी के चुनिंदा भाषणों की किताबें भेंट कीं। उसकी खुशी देखने लायक थी।



तो हम चार दोस्‍त एक शाम मिले। करीब तीन घण्‍टे तक खाने-पीने का दौर चला, जिसमें खुलकर ठहाके लगे, एक दूसरे की पसंद नापसंद वाली फिल्‍मों से लेकर विश्‍व सिनेमा तक की बातें हुई। एक मस्‍त और मजेदार शाम गुजरी। उस शाम बहुत सी बातें हुईं, जिन्‍हें मैं लिखना चाहता हूं, लेकिन फिलहाल इसे एक परिचयात्‍मक विवरण ही समझें, बाकी बातें विस्‍तार से कभी लिखूंगा। अभी तो यही चिंता खाए जा रही है कि इन दो अच्‍छे दोस्‍तों के बिना रहने की आदत डालनी पडेगी।