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Sunday, 5 September 2010

कोंकणी को गरिमा देने वाले केलकर

किसी भाषा में शायद ही रवींद्रबाब जैसे रचनाकार मिलते हैं, जो जिंदगी भर अपनी माटी की, अपनी जनता की और अपनी भाषा की सेवा करते रहें और उन्हें जनता का उतना ही प्यार और सम्मान मिले। आज यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि एक अकेला रचनाकार विशुद्ध गांधीवादी औजारों से एक तरफ तो उपनिवेशवादी सरकार से लोहा ले और दूसरी तरफ अपने ही देश में अपनी भाषा और प्रांतीय अस्मिता के लिए जीवन भर संघर्ष करता हुआ अपने जीवनकाल में विजय भी प्राप्त करे। लेकिन रवींद्रबाब ऐसे ही संघर्षशील और जुझारू कलम के योद्धा थे। गोवा और कोंकणी के इस महान सपूत ने अभी हाल ही में 85 वर्ष की आयु में 27 अगस्त, 2010 को अंतिम सांस ली। 25 मार्च, 1925 को दक्षिणी गोवा में प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. राजाराम केलकर के यहां उनका जन्म हुआ। राजाराम केलकर ने 'भगवद्गीता' का पुर्तगाली भाषा में पहला अनुवाद किया था। नाना लिंगुबाब दलवी ने कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर नाम रखा रवींद्र। उन दिनों गोवा पर पुर्तगाल का शासन था और पूरा गोवा मुक्ति के लिए छटपटा रहा था। पणजी में आरंभिक शिक्षा के दौरान ही 21 बरस की उम्र में रवींद्र केलकर गोवा मुक्ति संग्राम से जुड़ गए थे। कॉलेज में शिक्षाविद, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी लक्ष्मण राव सरदेसाई ने उनके भीतर देशभक्ति और जनसेवा के पौधे को पल्लवित किया। उन्हीं दिनों स्वाधीनता सेनानी दोस्तों ने एक सरकारी स्कूल को जला डाला था और इसमें रवींद्र के पकड़े जाने की पूरी उम्मीद थी, इसलिए वो पुर्तगाली सरकार की निगाह से बचने के लिए भागकर मुंबई आ गए। यहां वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं और गांधीजी के संपर्क में आए। राम मनोहर लोहिया से उनकी पहली मुलाकात यहीं हुई और लोहिया से रवींद्र ने सीखा कि जनता को जगाने के लिए अपनी मातृभाषा को माध्यम बनाकर कैसे लड़ा जा सकता है। गांधीजी के दर्शन से प्रभावित होकर वे मुंबई से काका साहेब कालेलकर के साथ वर्धा चल दिए। यहां सेवाग्राम में रहते हुए युवा रवींद्र ने काका साहेब से बहुत कुछ सीखा। काका साहेब को वे मोबाइल यूनिवर्सिटी कहते थे, जाहिर है ऐसे महान व्यक्तित्व के सान्निध्य में रवींद्र के व्यक्तित्व में बहुत कुछ जुड़ना था। अध्ययन, मनन और जनसेवा के साथ एक पत्रिका का संपादन करते हुए रवींद्र केलकर ने छह साल वर्धा में गुजारे और 1949 में गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्‍ली में लाइब्रेरियन के रूप में काम करने लगे। देश आजाद हो चुका था, लेकिन गोवा पर अभी भी पुर्तगाली आधिपत्य था। रवींद्र केलकर ने एक साल में ही दिल्ली की नौकरी छोड़ दी, उन्हें गोवा का मुक्ति संग्राम पुकार रहा था।

गोवा पहुंचकर उन्होंने गांधीवादी अहिंसक रास्ते से गोवा की मुक्ति के लिए संघर्ष आरंभ किया। उन्होंने जन जागरण के लिए कलम को हथियार बना लिया और हिंदी, मराठी और कोंकणी में लेख लिखकर लोगों को गोवा की आजादी के लिए जगाने लगे। मुंबई से उन्होंने ‘गोमांतभारती’ साप्ताहिक पत्रिका निकाली, जो रोमन लिपि में कोंकणी में प्रकाशित होती थी। 1961 में जब भारतीय सेना ने गोवा को आजाद करा लिया तो रवींद्र केलकर का संघर्ष दूसरे रूप में आरंभ हुआ। कोंकणी भाषा और सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने के लिए गोवा को महाराष्ट्र से अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए। कोंकणी को मराठी की आंचलिक भाषा या बोली मानने का तर्क उन्हें स्वीकार नहीं था और इसी आधार पर वे गोवा को अलग राज्य का दर्जा दिलाना चाहते थे। उनके आंदोलन का ही परिणाम था कि भारत सरकार ने गोवा को महाराष्ट्र में शामिल करने के बजाय केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया। अब रवींद्र केलकर के लिए एक नया आंदोलन तैयार खड़ा था, कोंकणी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का और गोवा को पूर्ण राज्य बनाने का। कोंकणी भाषा के लिए उनका संघर्ष और योगदान अप्रतिम है। 1962 में प्रकाशित उनकी ‘आमची भास कोंकणिच’ अद्भुत पुस्तक है, जिसमें राह चलते लोगों से संवाद के माध्यम से वे कोंकणी भाषा की अस्मिता के लिए आह्वान करते हैं। ‘शालेंत कोंकणी कित्याक’ में उन्होंने कोंकणी का पूरा स्कूली पाठ्यक्रम बना दिया। ‘कोंकणी साहित्य की ग्रंथसूची’ को कोंकणी, हिंदी और कन्नड़ में प्रस्‍तुत कर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि कोंकणी का महत्व अब हर हाल में स्वीकारा जाना चाहिए। उनकी संघर्षशीलता को गोवा के लोगों ने अपूर्व सम्मान दिया और स्नेह से उन्हें सब रवींद्रबाब पुकारने लगे। 1975 में साहित्य अकादमी ने कोंकणी को स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दी तो कोंकणी के आत्मसम्मान को राष्ट्रीय तौर पर स्वीकारा गया। दो साल बाद उनके यात्रा संस्मरणों की पुस्तक ‘हिमालयांत’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। 1987 में जब गोवा को पृथक राज्य घोषित किया गया तो राज्य विधानसभा ने कोंकणी को राज्य की अधिकारिक भाषा स्वीकार किया। 1990 में रवींद्रबाब को दूसरी बार साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, इस बार गुजराती निबंधकार झवेरचंद मेघानी की पुस्तक का कोंकणी में अनुवाद करने के लिए। केलकर का संघर्ष 1992 में फलीभूत हुआ जब कोंकणी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।

कोंकणी, हिंदी, अंग्रेजी और मराठी में रवींद्र केलकर की तीन दर्जन से अधिक पुस्‍तकें प्रकाशित हुई हैं। महात्मा बुद्ध, काका साहेब कालेलकर और महात्मा गांधी की जीवनियां तो बहुत ही दिलचस्प और पठनीय हैं। लेकिन कोंकणी में उन्होंने दो खण्डों में ‘महाभारत’ का जो अनुवाद किया है वो अद्भुत है। एक तटस्थ वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने महाभारत के चमत्कारिक प्रसंगों से इतर महाभारत की जो ‘अनुरचना’ की है, उसके सामने शायद नरेंद्र कोहली की ‘महासमर’ कुछ भी नहीं है। 2007 में उन्हें जीवनपर्यंत साहित्य सेवा के लिए साहित्य अकादमी फेलोशिप प्रदान की गई। 2006 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार घोषित किया गया, जो उनकी अस्वस्थता के कारण उन्हें 2010 में दिया जा सका। इस अवसर पर उन्होंने अपने भाषण में बहुत सी महत्वपूर्ण बातें कही थीं, जिनमें से एक बात बहुत ध्यान देने की है। उन्होंने कहा था, ‘लोगों ने आजकल क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य पढ़ना बंद कर दिया है। और दूसरी तरफ अंग्रेजी के माध्यम से हमने बोन्साई बुद्धिजीवी पैदा कर दिए हैं। बोन्साई लेखक और बोन्साई पाठक।‘ शोभा डे और चेतन भगत जैसे अंग्रेजीदां बोन्साई लेखक और बुद्धिजीवियों के लिए यह बात रवींद्र केलकर जैसा गांधीवादी, प्रखर योद्धा रचनाकार ही कह सकता था। ऐसे महान रचनाकार को शत शत नमन, जिसने एक प्रांत और एक भाषा को महान गरिमा और आत्मसम्मान दिया।

यह आलेख डेली न्‍यूज़ के रविवारीय परिशिष्‍ट 'हम लोग' में 05 सितंबर, 2010 को प्रकाशित हुआ।

Sunday, 29 August 2010

अपनी ही धुन का कवि पाब्लो नेरूदा

भारतीय कविता पर जिन विदेशी साहित्यकारों का सबसे ज्यादा असर रहा है उनमें पाब्लो नेरूदा का नाम सबसे उपर है। नेरूदा उन गिने-चुने विदेशी लेखकों में हैं जिनकी जन्म शताब्दी भारत में व्यापक पैमाने पर मनाई गई और इस अवसर पर उन पर कई भाषाओं में केंद्रित पत्रिकाओं के विशेषांक और कई पुस्तकाकार प्रकाशन हुए। 12 जुलाई, 1904 को रेल्वे कर्मचारी पिता और अध्यापिका माता के यहां चिली में जन्मे पाब्लो नेरूदा की मां का जन्म के दो महीने बाद ही निमोनिया से निधन हो गया। पिता ने दूसरी शादी की और दो सौतेले भाई-बहनों के साथ नेरूदा का लालन-पालन हुआ। पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा लेखक-कवि बने, इसलिए उन्होंने प्रारंभ में नेरूदा के इस रुझान का विरोध भी किया, क्योंकि वे चाहते थे कि बेटा दुनियादार आदमी बने और लेखक-कवि बनने का ख्वाब छोड़ दे। लेकिन चिली के जंगलों में बालसुलभ कौतूहल में घंटों घूमने वाले और कई किस्म के कीट-पतंगों और फूल-पत्तियों का संग्रह करने वाले नेरूदा अपनी धुन के पक्के थे। फिर आरंभिक शिक्षा के दौरान नेरूदा को गेब्रिएला मिस्त्राल जैसी कवयित्री शिक्षिका का सान्निध्य मिला, जिन्हें आगे चल कर नोबल पुरस्कार मिला। नेरूदा की पहली कविता अपनी दिवंगत मां की स्मृति में थी, जो कहीं विस्मृत हो गई। पहली रचना तेरह बरस की उम्र में ही एक स्थानीय अखबार में एक निबंध ‘उत्साह और उद्यमशीलता’ के रूप में प्रकाशित हुई। पाब्लो नेरूदा का मूल नाम रिकार्डो एलीज़र नेफ्टाली रीस वाय बेसाआल्टो था। लेकिन पिता के डर से उन्होंने अपना नाम पाब्लो नेरूदा रख लिया जो दो महान लेखकों जेन नेरूदा और पॉल वरलाइन के मिश्रण से बना था। सोलह साल की उम्र तक आते-आते उनके बदले हुए नाम से रचनाएं प्रचुर मात्रा में पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। पढ़ने की नेरूदा को इतनी जबर्दस्त धुन थी कि कम उम्र में ही उन्होंने कस्बे की लाइब्रेरी की तमाम किताबें पढ़ डालीं।

सत्रह साल की आयु में वे चिली विश्‍वविद्यालय में फ्रेंच भाषा पढ़कर अध्यापक बनने का सपना लेकर गए। लेकिन जल्द ही यह सपना त्याग कर वे पूर्णकालिक कवि हो गए। उन्नीस की उम्र में पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ ‘बुक ऑफ ट्वाइलाइट्स’। अगले साल ‘ट्वेंटी लव पोएम्स एण्ड ए सोंग ऑफ डिस्पेयर’ ने पाब्लो की ख्याति रातों-रात बढ़ा दी। इतनी कम उम्र में ऐसी खूबसूरत प्रेम कविताओं की वजह से पाब्लो को जबर्दस्त आलोचना और प्रशंसा समान रूप से मिली। उन्‍मुक्‍त प्रेम की उद्दाम भावनाओं की कविताओं के इस संग्रह का कालांतर में विश्‍व की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और आज भी ये उनकी सर्वाधिक बिक्री वाला संग्रह है। इस संग्रह में एक कविता में उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर की ‘गीतांजलि’ से उद्धृत करते हुए कविगुरू को सम्मान दिया था। भारत के साथ नेरूदा का रिश्‍ता कालांतर में और मजबूत होता गया। पाब्लों की प्रसिद्धि तो फैल रही थी, लेकिन गरीबी पिंड नहीं छोड़ रही थी। पैसा कमाने की कई योजनाएं बनाते और हर बार असफल हो जाते। इसलिए वे राजनयिक सेवा में एक नौकरी के लिए 1927 में नितांत अनजान जगह रंगून जा पहुंचे। इसके बाद वो कोलंबो, बटाविया और सिंगापुर भी रहे। बटाविया, जावा में पाब्लो की मुलाकात डच बैंककर्मी मैरिका से हुई, जिसके साथ उन्होंने पहला विवाह किया। राजनयिक सेवा के दौरान पाब्लो जहां भी रहे, वहां के साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं का अध्ययन कर अपनी कविताओं में निरंतर प्रयोग करते रहे और विभिन्न संस्कृतियों को अपने काव्य में रचते रहे।

चिली वापस लौटने के बाद उनकी नियुक्ति अर्जेंटीना और स्पेन में की गई। यहां उन्हें लोर्का और राफाएल जैसे कवि-साहित्यकारों से हुई। 1934 में पहली बेटी का जन्म हुआ, जो लगातार बीमारी के कारण जल्द ही चल बसी। इस बीच उनका पत्नी की तरफ से रुझान घटता गया और 1936 में तलाक हो गया। इसके बाद पाब्लो ने अर्जेंटाइन डेलिया से विवाह किया जो उनसे बीस साल छोटी थी। स्पेन में जब गृहयुद्ध छिड़ गया तो पाब्लो नेरूदा राजनैतिक तौर पर बेहद गंभीर हो गए और वामपंथी विचारों से प्रभावित हुए। स्पेन में जब लोर्का की हत्या की गई तो वे उग्र वामपंथी हो गए और परिणाम स्वरूप ‘स्पेन इन द हार्ट’ कविता संग्रह प्रकाश में आया। 1937 में स्वदेश वापसी के बाद पाब्लो नेरूदा की कविताएं पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंग गईं, जिनमें आतताइयों का प्रखर विरोध और जनता का प्रबल समर्थन मुखरित हुआ।

राजनयिक सेवा के दौरान उनकी नियुक्ति मेक्सिको में हुई जहां वे ऑक्टोविया पाज जैसे महान कवि से मिले। अपने राजनैतिक विचारों के कारण नेरूदा को देश और नौकरी दोनों को छोड़ना पड़ा। लेकिन वे कभी भी अपने राजनैतिक विचारों से विमुख नहीं हुए और इसका आगे चलकर उन्हें फायदा भी मिला। उनके लिए कविता हमेशा मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज रही। 1950 में उनका विराट कविता संग्रह ‘केंटो जनरल’ प्रकाशित हुआ, जिसमें उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कविता ‘माचू पिच्चू के शिखर’ भी शामिल थी। इस कविता का हिंदी में कई कवियों ने अनुवाद किया है और भारतीय साहित्य में नेरूदा की यह सबसे लोकप्रिय कविताओं में से है। इंका सभ्यता के एक उजड़े हुए नगर के बहाने यह कविता सभ्यता और संस्कृति का विहंगम विमर्श प्रस्तुत करती है, जिसमें मनुष्य के प्रयत्नों की गंध और उसके स्वप्नों की बहुत सुंदर छवियां देखने को मिलती हैं। जब चिली में उनके विचारों की सरकार की स्थापना हुई तो वे स्वदेश लौट आए और 1958 में ‘एक्सट्रावैगारियो’ काव्य संग्रह प्रकाश में आया। उनकी ख्याति बतौर कवि और राजनेता चिली में चरम पर थी और उनके अनुवाद निरंतर प्रकाशित होते जा रहे थे। बतौर राजनेता वे सीनेटर चुने गए।

1971 में जब उन्हें नोबल पुरस्कार दिया गया तो वे स्वाभाविक तौर पर इसके हकदार माने गए। क्‍योंकि करीब दस साल से हर बार उनका नाम संभावितों की सूची में होता था और अंत में किसी अन्‍य लेखक को नोबल घोषित हो जाता था। बहरहाल, उन्होंने आपने नोबल भाषण में नोबल पुरस्कार उन तमाम लोगों को समर्पित किया जो उनकी कविता में किसी भी रूप में आए। पाब्लो नेरूदा के लिए कहा जाता है कि दुनिया की तमाम भाषाओं में वे बीसवीं सदी के महानतम कवि हैं। नेरूदा ने चार बार भारत की यात्रा की। पहली बार नवंबर, 1927 में वे मद्रास आए, जहां उन्होंने भारतीय महिलाओं पर बेहतरीन कविताएं लिखीं। इसके बाद दिसंबर, 1928 में वे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में शामिल हुए, जहां मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी आदि राष्ट्रीय नेताओं से मिले। भारतीय स्वाधीनता संग्राम से नेरूदा ने प्रभावित होकर लिखा कि यह पूरे एशिया का जागरण था। 1951 में वे विश्‍व शांति परिषद के प्रतिनिधि के तौर पर प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से मिलने आए। यहीं उन्होंने ‘इंडिया 1951’ कविता लिखी, ‘धरती का गर्भ/एक बंद गलियारा जहां इतिहास के अंगूर पकते हैं/पुराने ग्रह-नक्षत्रों की प्राचीन बहन है भारत की धरती।’ अंतिम बार नेरूदा 1957 में बांग्ला कवि विष्णु डे के निमंत्रण पर भारत आए। 23 सितंबर 1973 को उनका निधन हुआ।
यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 29 अगस्‍त, 2010 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।









Sunday, 18 July 2010

सत्‍ता के मानवीयकरण की हिमायत

नोबल पुरस्कार के इतिहास में साहित्य में सर्वाधिक पुरस्कार जर्मन भाषा के हिस्से में हैं, लेकिन बहुत-से ऐसे जर्मनभाषी लेखकों को भी मिले, जो जर्मनी मूल के नहीं थे या अपने मूल वतन से विस्थापित होकर किसी अन्य देश में रहे। दक्षिण-पूर्वी यूरोप के छोटे-से देश बल्गारिया को साहित्य में एक मात्र नोबल पुरस्कार 1981 में एलियास कैनेटी को 1981 में मिला। 25 जुलाई, 1905 को बल्गारिया के डेन्यूब नदी किनारे एक छोटे से नगर में कैनेटी का जन्म हुआ। सफल यहूदी व्यापारी माता-पिता के सबसे बड़े बेटे कैनेटी के बचपन के मात्र छह साल बल्गारिया में गुजरे और फिर परिवार इंग्लैंड चला गया। लेकिन यहां आते ही कैनेटी के पिता का अचानक निधन हो गया और मां परिवार को लेकर विएना चली आईं। यहीं से कैनेटी की आरंभिक शिक्षा प्रारंभ हुई। मां ने जर्मन भाषा पर जोर दिया, जो उस माहौल में अनिवार्य था। कुछ साल विएना में रहने के बाद परिवार ज्यूरिख चला गया और वहां से अंततः फ्रेंकफर्ट, जहां कैनेटी ने हाई स्कूल पास की। कैनेटी ने ग्यारह बरस की उम्र में लिखना आरंभ कर दिया था और 16 साल की उम्र में तो पहला काव्यनाटक ‘जूनियस ब्रूटस’ प्रकाशित भी हो गया था। उच्च अध्ययन के लिए कैनेटी एक बार फिर विएना गए, जहां उनके लेखन की नई शुरुआत हुई। हालांकि कैनेटी दर्शनशास्त्र और साहित्य पढना चाहते थे, किंतु दाखिला लिया रसायन विज्ञान में। विएना के साहित्यिक हलकों में उनका परिचय का सिलसिला आगे बढ़ता गया और वे लिखने लगे। राजनैतिक रूप से उनका झुकाव वामपंथ की तरफ था, इसीलिए 1927 के मशहूर जुलाई विद्रोह में भी कैनेटी ने सक्रिय भाग लिया और गिरफ्तार हुए। ब्लैक फ्राइडे के नाम से मशहूर इस विद्रोह का कैनेटी की मानसिकता पर गहरा प्रभाव पड़ा, इसी को आधार बनाकर कालांतर में जब कैनेटी ने अपने लेखन में मुख्य स्थान दिया तो उनकी ख्याति अंतर्राष्ट्रीय हो गई। राजनीति और लेखन के साथ पढ़ाई चलती रही और 1929 में उन्होंने रसायनशास्त्र में पी.एच.डी. की डिग्री लेकर विज्ञान को अलविदा कह दिया। इसके बाद अमेरिकी लेखक अप्टॉन सिंक्लेयर के उपन्यासों का अनुवाद करते हुए और रंगमंच के लिए हास्य और प्रयोगधर्मी एब्सर्ड नाटक लिखते हुए कैनेटी ने अपनी विराट रचनात्मकता को बरकरार रखा।

अपने विद्यार्थी जीवन में कैनेटी एक बार बर्लिन गए, जहां बर्तोल्त ब्रेख्त और आइजैक बाबेल जैसे कई मशहूर नाटककारों से मुलाकात हुई। तभी कैनेटी ने तय कर लिया था कि वे मनुष्य के हास्यास्पद पागलपन को केंद्र में रखकर उपन्यासों की शृंखला लिखेंगे। करीब सात साल बाद इस विचार को ‘डाई ब्लैंगडंग’ उपन्यास में कैनेटी ने मूर्त रूप दिया। किस तरह राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों को बरगला कर बेवकूफ बनाया जाता है और जनता भी धर्म और सत्ता की चकाचौंध में पगला जाती है, इसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों और काल्पनिक कथा के माध्यम से कैनेटी ने विलक्षण ढंग से दर्शाया। यह उपन्यास अपने समय से पहले प्रकाशित हुआ, इसलिए तत्काल इस पर ध्यान नहीं गया, लेकिन दूसरे विश्‍वयुद्ध की समाप्ति के बाद और खास तौर पर अंग्रेजी में अनुवाद के बाद इसकी ख्याति विश्‍वव्यापी हुई। नाजी सरकार ने उपन्यास को प्रतिबंधित कर दिया था। बाद में अनुवाद होने पर टॉमस मान और आइरिश मर्डोक जैसे आलोचक साहित्यकारों ने इस उपन्यास को ‘क्राउड सायक्लोजी’ का विश्‍वसाहित्य का बेहतरीन उपन्यास बताया था।

जब नाजी जर्मनी ने ऑस्ट्रिया को अपने कब्जे में ले लिया तो कैनेटी देश छोड़कर पहले पेरिस और फिर इंग्लैंड चले गए और वहीं रहने लगे। नाटक, डायरी, यात्रा विवरण और निबंध लिखते हुए कैनेटी ने 1960 में अपनी एक और अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक पूरी की, ‘क्राउड्स एण्ड पावर।’ इस पुस्तक के आरंभ में वे यहां से अपना विश्‍लेषण शुरु करते हैं कि भीड़ की मानसिकता आदिकाल से ही बचे रहने के लिए संघर्ष की होती है और किसी के भी बचने का सबसे आसान उपाय है दूसरे की हत्या कर देना। कैनेटी विस्तार से बताते हैं कि भीड़ क्यों और कैसे हिटलर जैसे नेतृत्व के आदेशों की पालना करती है। उनकी मान्यता है कि अगर नेतृत्व को मानवीय बनाया जाए तो भीड़ द्वारा होने वाले नरसंहारों से बचा जा सकता है। लेकिन कैनेटी यह नहीं बता पाते कि नेतृत्व को कैसे मानवीय बनाया जाए।

दरअसल कैनेटी के लेखन की केंद्रीय चिंता यही है कि सत्ता को कैसे अत्यधिक मानवीय बनाया जाए, ताकि अवाम के बीच भेदभाव ना पनप सकें और लोग सामूहिक रूप से एक दूसरे को मारने पर उतारू ना हो जाएं। और अपनी इस चिंता को वे जिस कलात्मक सौंदर्य के साथ व्यक्त करते हैं, वह विश्‍वसाहित्य में दुर्लभ है। मृत्यु और मानवीय संवेदना से ओतप्रोत समाज की कल्पना करते हुए कैनेटी काफ्का के साहित्य का अनूठा विश्‍लेषण करते हैं, जो ‘काफ्का’ज अदर ट्रायल: द लैटर्स टू फेलिस’ में सामने आता है। पत्र शैली में लिखी इस किताब में कैनेटी काफ्का के दुतरफा संघर्ष को बताते हैं, जिसमें सिर्फ दो विकल्प हैं, या तो मध्यवर्गीय आरामतलब जिंदगी के मजे लो अन्यथा वैयक्तिक निर्वासन भोगो। काफ्का जीवन और रचना दोनों में कैसे यह संघर्ष कर रहे थे, इसे कैनेटी ने काफ्का की प्रेमिका फेलिस के नाम काल्पनिक पत्रों के माध्यम से बताने का सराहनीय काम किया। ‘द कंसाइंस ऑफ द वर्ड’ में कैनेटी कहते हैं कि इस दुनिया को बचाने, नया अर्थ देने और अधिक मानवीय बनाने में लेखक की बहुत बड़ी भूमिका होती है। कैनेटी को नोबल पुरस्कार के अलावा विश्‍व साहित्य में करीब दर्जन भर प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से समादृत किया गया। 13 अगस्त, 1994 को ज्यूरिख में मृत्यु से पूर्व एलियास कैनेटी ने तीन खण्डों में अपनी वृहद् आत्मकथा और यात्रा संस्मरणों की एक पुस्तक भी लिखी।

Sunday, 27 June 2010

गल्प का विराट शिल्पी : सॉल बैलो

‘लोग अपनी जिंदगी पुस्तकालयों में खत्म कर सकते हैं। उन्हें सावधान करने की जरूरत है।’ ऐसी रोचक टिप्पणी विश्‍वसाहित्य में सॉल बैलो के सिवा और कौन कर सकता है। बेहद मामूली और सामान्य से दिखने वाले इंसानों के भीतर कितनी किस्मों के चरित्र हो सकते हैं, यह जानना हो तो सॉल बैलो को पढ़िये, जहां हंसते, खिलखिलाते, धीर-गंभीर, आवारा, हताश, उन्मुक्त, मस्त, पस्त और ना जाने कितने चरित्र अपने पूरे वजूद के साथ सिनेमा की तरह चलते-फिरते नजर आते हैं। इन चरित्रों के सर्जक सॉल बैलो के यहूदी माता-पिता 1913 में रूस से कनाडा पहुंचे। यहीं 10 जून, 1915 को सॉल बैलो का जन्म हुआ। एक पराए देश में संघर्षपूर्ण तरीके से जीवनयापन करते माता-पिता के साथ सॉल बैलो का बचपन गुजरा, जिसमें मां के वो पुराने किस्से शामिल थे, जब मां सुनाया करती थी कि रूस में वो कैसे नौकर-चाकरों से भरे घर में रहती थी। अलग-अलग राष्ट्रीयताओं वाले अपने हमशहरी लोगों के बीच नौ बरस की उम्र तक सॉल बैलो कनाडा के मांट्रियल शहर में रहे। यहां पिता अब्राहम शराब का गैरकानूनी कारोबार करते थे। एक बार पिता को पीटा गया। इसके बाद परिवार अमेरिका के शिकागो शहर चला आया। यहां पिता ने नया आयात व्यापार शुरु किया। यहीं सॉल बैलो की शिक्षा हुई। धार्मिक विचारों वाली मां चाहती थी कि सॉल बैलो संगीत के क्षेत्र में जाए, लेकिन सॉल बैलो को यह पसंद नहीं था। किशोरावस्था में एच. बी. स्टो का विश्‍वप्रसिद्ध उपन्यास ‘अंकल टॉम’स कैबिन’ पढ़कर सॉल बैलो ने तय कर लिया कि लेखक बनना है।
सत्रह साल की उम्र में मां की मृत्यु से सॉल बैलो बेहद विचलित हो गए। स्कूली शिक्षा के बाद सॉल बैलो साहित्य में ही उच्च शिक्षा लेना चाहते थे, लेकिन उन दिनों यहूदियों के खिलाफ हर तरफ बेहद नफरत का माहौल था और विश्‍वविद्यालयों के मानविकी विभागों में तो बहुत ही खराब वातावरण था। लिहाजा सॉल बैलो ने साहित्य के बजाय नृतत्वशास्त्र और समाजविज्ञान में पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान साहित्य के एक प्रोफेसर ने उनसे कह दिया कि कोई यहूदी ऐसी अंग्रेजी नहीं सीख सकता, जिससे लेखक बना जाए। बात चुभने वाली थी, लेकिन सॉल बैलो ने तो बचपन में ही लेखक बनने की ठान ली थी। वे लिखते रहे, लेकिन प्रकाशन नहीं हुआ। उन्होंने अध्यापक की नौकरी की और एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के संपादन विभाग में भी कुछ समय काम किया। दो साल वे अमेरिकन मर्चेंट मैरीन में रहे। इस बीच उन्होंने अपना पहला उपन्यास लिखा, ‘डैंजलिंग मैन’। 1944 में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ, जिसमें एक निराश बेरोजगार युवक की संघर्षगाथा, डायरी शैली में कही गई है। तीन साल बाद दूसरा उपन्यास आया ‘द विक्टिम’, जो एक अधेड़ यहूदी व्यक्ति की कथा है, जिसे भय है कि किसी बदकिस्मती के चलते उसके साथ सब कुछ बुरा हो रहा है। ये दोनों उपन्यास साहित्य की दुनिया में सॉल बैलो के सामान्य उपन्यास माने जाते हैं, खुद सॉल बैलो पहले उपन्यास को ‘एम.ए.’ और दूसरे को ‘पी.एच.डी.’ मानते थे।
1953 में जब उनका तीसरा उपन्यास ‘द एडवेंचर्स ऑफ ऑगी मार्च’ आया तो सॉल बैलो की धूम मच गई। आधुनिक आम अमेरिकी व्यक्ति के बचपन से लेकर बड़े होने तक की रोमांचक, हास्य और व्यंग्य से भरपूर गाथा सॉल बैलो ने ऐसी खूबसूरत किस्सागो शैली में प्रस्तुत की कि आलोचकों ने कहा कि अमेरिकी साहित्य का डॉन क्विक्जोट अब पैदा हुआ है। बेहद गरीबी का मारा ऑगी शहरी जीवन की विद्रूपताओं, झूठ, छल, प्रपंच और अजीब मानसिकताओं से भरे चरित्रों के बीच आम अमेरिकी की उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें जनता किसी भी तरह जल्दी अमीर बनने और आरामतलब जिंदगी जीने का स्वप्न देख कर जीती है। इस उपन्यास में सॉल बैलो भावातिरेक से बचते हुए विशुद्ध यथार्थ के साथ एक ऐसी कथा रचते हैं, जिसमें आगे आने वाली घटनाओं का कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। बेचारा नायक अचानक धनवान बनने के बाद तुरंत ही कंगाल हो जाता है और हर हाल में मस्त रहता है। इस उपन्यास की लोकप्रियता से विचलित हुए बिना सॉल बैलो ने अपने अगले उपन्यास में पूरी शैली बदल डाली और ‘सीज द डे’ में एक असफल अभिनेता की मार्मिक कथा लिखी, जो अपनी विफलता के चलते पत्नी, बच्चे और पिता सबसे अलग-थलग पड़ जाता है। द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद अमेरिकी समाज में उपजे हालात और पारस्परिक संबंधों में आए व्यापक बदलाव को इस उपन्यास ने जितना बेहतरीन ढंग से रूपायित किया उतना किसी ने नहीं। इसीलिए इसे बीसवीं सदी का श्रेष्ठतम अमेरिकी उपन्यास कहा जाता है। अपने पांचवें उपन्यास ‘हैंडरसन द रेन किंग’ में सॉल बैलो एक ऐसे धनी अधेड़ व्यक्ति की कथा कहते हैं जो कोई अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति और ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। इस अतृप्त प्यास को लेकर वह अफ्रीका के गांवों में पहुंच जाता है और कई रोमांचक घटनाओं के बीच नए अनुभव हासिल करता है। उसे महसूस होता है कि आत्मा, शरीर और बाहरी दुनिया के बीच कोई शत्रुता नहीं है और सौहार्द्रपूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
सॉल बैलो की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे पुराकथाओं जैसा गल्प रचते हुए अपने समय और समाज को अनेक आयामों में देखते हैं, जहां तमाम भागमभाग और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मनुष्य को एक सहज, संतोषी और सौहार्द्रपूर्ण जीवन की ओर ले जाने का मार्ग दिखाई देता है। सॉल बैलो का अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यास ‘हरजोग’ एक ऐसे अधेड़ यहूदी की कथा है जो पत्नी द्वरा त्याग दिया गया है और जिस स्त्री के साथ रहता है, वह उससे विवाह नहीं करना चाहती। गहरी अनास्था और हताशा के बीच वह अपने दोस्तों, परिजनों, महान विद्वानों, दार्शनिकों और भगवान के नाम पत्र लिखता रहता है, लेकिन इन पत्रों को किसी को नहीं भेजता। इन पत्रों के माध्यम से ही उसकी मानसिकता और उलझन भरी कहानी पता चलती है। इसी तरह मि. सैमलर’स प्लेनेट में एक ऐसे विद्वान प्रोफेसर की कहानी है जो खुद एक प्रलय से बच कर आया है, लेकिन अजीब पागलपन का शिकार होने की वजह से लोगों को भविष्य के विचित्र वायदे करता रहता है। उसका मानना है कि अधिकाधिक सुविधाभोगी जीवन से ही मनुष्य की तकलीफें बढ़ रही हैं।
अमेरिका के नेशनल बुक अवार्ड के लिए छह बार नामांकित होने और तीन बार पुरस्कृत होने वाले सॉल बैलो एकमात्र रचनाकार हैं। लेखन के लिए उन्हें पुलित्जर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। जब 1976 में उन्हें नोबल पुरस्कार दिया गया तो उन्हें इसका वाजिब हकदार माना गया। जन्म से कनाडाई होने के कारण, कनाडा के इतिहास में सिर्फ उन्हीं को साहित्य के लिए यह सम्मान मिला। सॉल बैलो के लेखन को लेकर बहुत से लोगों का मानना है कि उनके अधिकांश उपन्यासों में उनकी अपनी निजी जिंदगी से जुड़ी हुई चीजें हैं, जैसे उनका यहूदी होना, साहित्य के साथ समाजशास्त्र और नृतत्वशास्त्र पढ़ाना, एक के बाद एक पांच-पांच शादियां करना और घूम-घूम कर नई जगहें देखना। खुद सॉल बैलो भी मानते थे कि एक लेखक की रचनाओं में ऐसा होना सहज है। साहित्य की दुनिया में कहा जाता है कि सॉल बैलो बीसवीं शताब्दी के ऐसे महान रचनाकार थे, जिन्होंने रूसी, यूरोपीय, अंग्रेजी और अमेरिकी क्लासिक उपन्यास परंपरा को नया जीवन दिया और सरवांतीस, दोस्तोयेव्स्की, डिकेंस और टॉलस्टोय जैसे सर्वकालिक महान रचनाकारों की शैली को आत्मसात करते हुए आधुनिक उपन्यास को नई बुलंदियों पर पहुंचाया। 5 अप्रेल, 2005 को 90 वर्ष की उम्र में सॉल बैलो का ब्रुकलिन में निधन हुआ।

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्‍ट में 'विश्‍व के साहित्‍यकार' स्‍तंभ में 27 जून, 2010 को प्रकाशित हुआ।

Sunday, 13 June 2010

विष्‍णु नागर होने का मतलब

नागर जी से मेरा पहला परिचय उनके असंख्य पाठकों की तरह नवभारत टाइम्स के जरिए ही हुआ। ये मेरे लेखकीय शैशवकाल के दिन थे, जब पढ़ने की भूख कुछ भी पढ़वा लेती थी और जिन लेखकों को पत्र-पत्रिकाओं में किसी ना किसी रूप में पढ़ता रहा, उनमें नागर जी अहम थे। उन दिनों मुझे लगता था कि विष्णु नागर नाम के तीन लोग हैं, जिनमें से एक कविताएं लिखता है, दूसरा व्यंग्य और तीसरा पत्रकारिता करता है। कई साल बाद जब असलियत मालूम हुई तो आश्‍चर्य हुआ कि एक व्यक्ति कैसे इन तीन विधाओं को साध सकता है। आश्‍चर्य इस बात का भी था कि एक पत्रकार इस कदर रचनात्मक हो सकता है कि वह कविता को व्यंग्य जैसी विधा के साथ साध लेता है। आज भी मुझे लगता है कि विष्णु नागर जैसी रचनात्मकता के लिए बहुत गहरे आंतरिक रचनात्मक अनुशासन और संवेदनशीलता की जरूरत है, जो हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं है और पत्रकारिता में रहते हुए तो यह लगभग असंभव ही है। और यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हिंदी दैनिक पत्रकारिता में विष्णु नागर जैसा दूसरा कोई पत्रकार नहीं दिखाई देता, जो कविता, कहानी, व्यंग्य और समसामयिक विषयों पर एक साथ कलम चला सकता हो।

मुझे यह याद नहीं आ रहा कि पहली बार मेरा उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलना कब हुआ। लेकिन स्मृति पर जोर डालता हूं तो लगता है जैसे हम सदियों से एक-दूसरे को जानते हों। कुछ व्यक्ति ऐसे ही होते हैं, जिनसे आप कितनी ही बार मिले हों, लगता है, जैसे उनसे आपका बहुत पुराना रिश्‍ता है। विष्णु जी की सहज, सरल मृदुल मुस्कान आपको पहली नजर में अपनत्व से भर देती है और उनकी मिलनसारिता अपने मोहपाश में इस कदर जकड़ लेती है कि आप बरसों बाद मिलेंगे तो भी आपको वे कुछ नहीं कहेंगे और अपनी निर्मल मुस्कान से फिर अपना बना लेंगे। मेरे जैसे बेहद आलसी व्यक्ति से भी वे कभी निराश नहीं होते और कभी उलाहना भी नहीं देते। अगर प्रभाष जोशी होते तो इसे मालवा की मिट्टी की खासियत के तौर पर रेखांकित करते। लेकिन उसी मालवा की धरती से निकले कई रचनाकार मिल जाएंगे जिनके व्यक्तित्व में नागर जी जैसी सहजता नहीं है।

पिछले करीब बीस वर्षों में नागर जी से बीसियों मुलाकातें और गप्प गोष्ठियां हुई हैं, और मैंने कभी भी किसी मसले पर उत्तेजित होते नहीं देखा, एक सहज सौम्य मृदुल उपस्थिति से वे पूरे माहौल को गरिमामय बनाए रखते हैं। सायंकालीन रसरंजन गोष्ठियों में जब भाई लोग किसी विषय पर विचारोत्तेजक होते हुए वीरोचित मुद्रा अख्तियार कर लेते हैं, नागर जी शांत और सौम्य बने रहते हैं और अक्सर वातावरण को सामान्य बनाने में उन्हीं की मुख्य भूमिका होती है। नागर जी स्वाद के बहुत शौकीन हैं और उत्तेजनापूर्ण माहौल को सहज करने में उनकी यह रूचि प्रायः काम कर जाती है, जब वे बहस में संलग्न मित्रों से कहते हैं, छोड़िए इन बातों को, ये जो नमकीन है वो लाजवाब है, आपके यहां के नमकीन व्यंजनों की तो बात ही निराली है। और फिर बहस व्यंजनों की ओर मुड़ जाती है, जिसमें हर भोजनभट्ट अपनी तरफ से नई जानकारियां जोड़ते हुए नागर जी की जीभ का जायका बढ़ाने लगता है और उन्हें दावत देने लगता है। एक बार बातचीत में नागर जी ने बताया था कि उनकी मां बहुत अच्छा खाना बनाती थीं, जहां से उन्हें अच्छे खाने का चस्का लगा। और प्रमिला भाभी भी बहुत स्वादिष्ट भोजन बनाती हैं और इसमें भी कमाल की बात यह कि दोनों पति-पत्नी ही जायकेदार भोजन के गुणग्राहक हैं। लेकिन बहुत से लोग शायद यह नहीं जानते कि प्रमिला भाभी का कण्ठ बहुत सुरीला है। उनके स्वर में कबीर को सुनना एक अद्भुत अनुभव होता है। उन्हें सुनते हुए आपको कुमार गंधर्व और प्रहलाद टिपनिया का कबीर गायन याद आता है। मालवी लोकगीत भी प्रमिला भाभी को खूब याद हैं और मन करता है तो खुलकर गाती हैं। मुझे नहीं मालूम कितने सौभाग्यशाली मित्रों को प्रमिला भाभी को सुनने का अवसर मिला है, लेकिन मैं उन खुशकिस्मत लोगों में हूं।

नागर जी कविता में जितने सहज हैं, व्यंग्य में उतने ही तीखे और पत्रकारिता में वैसे ही प्रखर और गंभीर। मेरे खयाल से पत्रकारिता जो सबसे बड़ी चीज सिखाती है, वो है पठनीयता। और नागर जी ने इसे इस कदर साध लिया है कि वे सामान्य पाठक के दिल में सीधे उतर जाते हैं, फिर वो रचना किसी भी विधा की हो। इसीलिए हिंदी आउटलुक ने एक बार जब हिंदी के दस लोकप्रिय लेखकों का सर्वेक्षण किया तो उसमें विष्णु नागर भी एक रहे। ऐसी लोकप्रियता सहज बोधगम्य लेखन से ही हासिल होती है। उनकी कविताओं में मुझे लगता है कई बार उनका व्यंग्यकार बहुत सहजता से दाखिल होकर कविता को बहुआयामी और बेहद तीक्ष्ण बना देता है। ‘हंसने की तरह रोना’ संग्रह में ऐसी ही एक अद्भुत कविता है, जिसमें नरेंद्र मोदी और जॉर्ज बुश एकमेक होकर नई अर्थछवियां रचते हैं।
 
ग्‍लोबलाइजेशन के इस जमाने में
हत्‍यारे का नाम कुछ भी हो सकता है
जॉर्ज मोदी भी और नरेंद्र बुश भी

नागर जी अपनी कविता में कहीं भी, एक क्षण के लिए भी वैयक्तिक नहीं होते। आत्म से अगर उनकी कविता शुरु भी होती है तो एकाध पंक्ति के बाद ही उसमें पूरा मानव समाज किसी ना किसी रूप में आ जाता है और वैयक्तिक को निर्वैयक्तिक में बदलते हुए समूची मानवता को अपने संवेदना संसार में शामिल कर लेती है। उनका आधुनिकता बोध इतना गहरा है कि वे अत्यंत साधारण विषय को भी रोचकता के साथ बहुआयामी अर्थ दे देते हैं। ‘घर के बाहर घर’ संग्रह में एक कविता है ‘स्वर्ग में कुछ भी नहीं है’। इस कविता में नागर जी स्वर्ग में आधुनिक सुख सुविधाओं के अभाव की बात करते हुए कहते हैं,

स्वर्ग में बाज़ार नहीं है, भूमण्डलीकरण नहीं है
नहीं है, नहीं है, मैंने कहा न स्वर्ग में कुछ भी नहीं है

इसलिए मैं नरक तो फिर भी जा सकता हूं
लेकिन स्वर्ग-बिल्कुल नहीं!

विष्णु नागर का गद्य बहुआयामी है। वे इतिहास में जाकर पुराण कथाओं का ग़जब पुनराविष्कार करते हैं। कछुए और खरगोश की कहानी का जो नवीनीकरण नागर जी ने किया है, वह हमारे समय में पुराने आख्यानों को देखने की एक नई दृष्टि देता है। नागर जी ने इस क्रम में बहुत सारी पुराकथाओं का नवीकरण किया है। लेकिन मेरे विचार से उनका सबसे महत्वपूर्ण काम है, ‘ईश्‍वर की कहानियां’। ईश्‍वर का ऐसा दयनीय और मार्मिक रूप नागर जी ने रचा है कि आज के घोर आस्थावान और अंधभक्ति के माहौल में इन कथाओं को पढ़कर किसी भी पाठक को ईश्‍वर पर दया आ सकती है। नागर जी के लेखन की एक और जो बड़ी विशेषता है वो यह है कि वे हमारे समय में घट रहे यथार्थ को अतीत के आख्यानों से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भों में व्याख्यायित करते हुए पाठक को एक नये किस्म का आस्वाद देते हैं और अपने समय व समाज के प्रति और अधिक संवेदनशील बनाते हैं। उनकी एक कविता है ‘लगते तो नहीं’:

कई बार लोग मुझी से पूछते हैं
कि क्या आप
विष्णु नागर हो

जब मैं कहता हूं कि हां हूं
तो वे कहते हैं कि लेकिन लगते तो नहीं

और वे भीड़ में
विष्णु नागर को ढूंढने आगे बढ़ जाते हैं।

यह जो नहीं लगना है वह बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि विष्णु नागर को देखकर सचमुच आपको नहीं लगता कि यह शाश्‍वत मुस्कुराने वाला मृदुलता से ओतप्रोत व्यक्तित्व इतना बहुआयामी लेखक-रचनाकार हो सकता है। और लोग अगर भीड़ में विष्णु नागर को ढूंढने निकल पड़ते हैं तो इसका यही अर्थ है कि विष्णु नागर जनता का रचनाकार है, वह व्यक्ति में नहीं समष्टि में मिलेगा। जहां भी जनता के सवाल होंगे, जनता होगी, आप विष्णु नागर को वहीं पाएंगे। हम खुशकिस्मत लोग हैं कि हमारे समय में एक ऐसा लेखक-रचनाकार मौजूद है, जो हमारे समय और समाज को विविध रूपों में रचते हुए न केवल साहित्य को समृद्ध कर रहा है, बल्कि अपनी जनता को, उसकी संवेदना को, उसकी सोच-समझ और संस्कारों को भी नए आयाम दे रहा है। विष्णु नागर शतायु हों, सहस्रायु हों, और निरंतर हमें अपनी रचनाशीलता से लाभान्वित करते रहें, यही कामना है।

यह आलेख 'संबोधन' पत्रिका के 'विष्‍णु नागर' पर केंद्रित अंक, अप्रेल-जून 2010 में प्रकाशित हुआ।

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Monday, 7 June 2010

विवादास्पद और वर्जित विषयों की रचनाकार : एलफ्रीडे जेलीनेक

यूरोप के छोटे-से देश ऑस्ट्रिया के साहित्य की तरफ दुनिया का ध्यान पहली बार तब आकर्षित हुआ जब नोबल पुरस्कार के 110 साल के इतिहास में पहली बार 2004 में, यहां की चर्चित नाटककार और उपन्यासकार ऐलफ्रीडे जेलेनीक को दुनिया के सबसे बड़े साहित्य सम्मान से नवाजा गया। इस पर खासा विवाद भी हुआ, क्योंकि यूरोप के स्वतंत्र समाज में भी जेलीनेक के लेखन को कई लोग अश्‍लीलता की श्रेणी में मानते हैं, लेकिन ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि जेलीनेक अपनी विवादास्पद लेखन शैली में कितनी चिंता और गहराई के साथ सामाजिक विद्रूपताओं को बेनकाब कर रही हैं। उनकी लेखनशैली और विवादित विषयों पर लिखने के मूल में जाएं तो कारण आसानी से समझ में आता है।

जेलीनेक का जन्म 20 अक्टूबर, 1946 को स्तीरिया प्रांत में हुआ। पिता चेक-यहूदी मूल के थे और मां विएना के प्रतिष्ठित परिवार से थीं। दूसरे विश्‍वयुद्ध के दौरान पैतृक परिवार के बहुत से लोग नाजियों की बर्बरता के चलते मारे गए और जेलीनेक के पिता जिंदा बचने वालों में से एक थे। जेलीनेक की मां की इच्छा थी कि जेलीनेक कम उम्र में ही संगीत की दुनिया में नाम कमाए और यही सोचकर वे बेटी को लेकर विएना चली आईं जहां एक छोटे-से घर में मां-बेटी रहने लगे। मां के कठोर अनुशासन और जिद के आगे चार साल की उम्र में ही जेलीनेक को संगीत का कड़ा अभ्यास शुरु करना पड़ा। सामान्य शिक्षा के साथ संगीत का गहन अभ्यास करते हुए जेलीनेक ने 14 साल की उम्र में पियानो के लिए विशेष शिक्षा के लिए एक मशहूर संस्था में प्रवेश लिया। 4 साल बाद हाई स्कूल पास कर उन्होंने विएना विश्‍वविद्यालय में रंगमंच, कला और इतिहास विषयों के अध्ययन के लिए दाखिला लिया। इस बीच जेलीनेक कविताएं लिखने लगीं थीं और सत्रह साल की उम्र में पहली कविता प्रकाशित हुई। विश्‍वविद्यालय की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वो साहित्य की दुनिया में आ गई। पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और गद्य रचनाओं का नियमित प्रकाशन होने लगा और 1967 में पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ। कविता के साथ जेलीनेक ने महिलाओं की समस्याओं को लेकर नाटक लिखना शुरु किया तो खासी शोहरत मिलने लगी। नारी की यौन प्रश्‍नाकुलता को जेलीनेक ने बड़ी शिद्दत से उठाया और पुरुष वर्चस्व को चुनौती दी। इस बीच छात्र संगठनों से जुड़ाव के कारण उनके लेखन में नारी समस्याओं के साथ दूसरी सामाजिक समस्याएं भी समाहित होने लगीं। 1970 में उनका एक उपन्यास बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसे हिंदी में ‘हम बच्चे नहीं चारा हैं’ कहा जा सकता है। इस उपन्यास में एक तरफ तो खुद जेलेनीक के बचपन का प्रभाव है और दूसरी तरफ छात्रों के साथ रहने के अनुभवों से उपजी संवेदनशीलता। किस प्रकार मां-बाप बच्चों पर अपने सपने लाद देते हैं और उनके स्वप्न छीन लेते हैं, इसे व्यंग्यात्मक शैली में जेलीनेक ने बहुत खूबसूरती से दर्शाया है। जेलीनेक की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें 1973 में ऑस्ट्रिया की राष्ट्रीय छात्रवृति प्रदान की गई।

1972 में दूसरा उपन्यास आया, जिसमें जेलीनेक ने ऑस्ट्रियाई समाज की आमबोलचाल की भाषा और संस्कृति को लेकर विद्रोही तेवर में कड़ी आलोचना करते हुए बताया कि बेहतर जीवन का दावा बिल्कुल झूठा है और वो समाज में कहीं दिखाई नहीं देता। महिलाओं के लिए वर्जित विषयों पर लिखते हुए जेलीनेक ने सारी परंपराएं तोड़ दीं और देश की चर्चित महिलाओं में शुमार हो गईं। 1974 में वे कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बन गईं और लेखन के साथ राजनीति में भी सक्रिय हो गईं। अगले ही साल उनका उपन्यास ‘वूमन एज लवर्स’ बहुत लोकप्रिय हुआ, इसे जर्मन भाषा पढ़ने वाले तमाम देश में प्रशंसा मिली। जेलीनेक के लेखन की खासियत यह है कि वो जो कथानक बुनती हैं, उसमें परिस्थितियां बहुत उलझी हुईं और जटिल होती हैं। पाठक हतप्रभ रह जाता है कि इस समाज में हिंसा और दमन इतने रूपों में व्याप्त है कि सहसा हमारा ध्यान ही नहीं जाता। दमन के शिकार लोगों को किस प्रकार बेबसी के साथ घुटने टेकने पड़ते हैं? मनोरंजन उद्योग किस तरह लोगों की चेतना को कुंद कर देता है और लोग वर्ग एवं लिंग के आधार पर होने वाले अन्याय के किसी भी प्रकार के प्रतिरोध के काबिल नहीं रह जाते? ऑस्ट्रियाई साहित्य में जेलीनेक जैसा स्वर पहली बार देखा गया है, इससे पहले के साहित्य में समाज की आलोचना तो होती थी, लेकिन बहुत संभ्रांत ढंग से।

जेलीनेक का उपन्यास ‘लस्ट’ दुनिया की कई कई भाषाओं में अनूदित होने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। इस उपन्यास में उन्होंने बुनियादी तौर पर सभ्यता और संस्कृति को लेकर ही कई सवाल उठाए हैं। जेलीनेक का मानना है कि जब तक समाज में महिलाओं पर होने वाली हर स्तर की हिंसा खत्म नहीं होगी, इस कथित सभ्यता पर सवाल उठते रहेंगे। उनकी लेखनी को किसी खास तरह से व्याख्यायित करना संभव नहीं है, क्योंकि उनके लेखन का दायरा बहुत विस्तृत है। गहरी काव्यात्मकता और व्यंग्य के साथ जेलीनेक अपने कथानक के साथ चलने वाली आवाजों को भी पूरा महत्व देते हुए एक अजीब किस्म का रसायन बनाती हैं कि पहले पाठ में सामान्य पाठक के पल्ले कुछ नहीं पड़ता, लेकिन धीरे-धीरे रहस्य खुलने लगते हैं, साथ होने वाली घटनाएं आवाजों के माध्यम से एक पूरे संसार की रचना करती हैं, जिसमें लेखिका का दर्द पूरी संवेदनशीलता के साथ प्रकट होता है। हिंदी में एक प्रकाशक ने ‘लस्ट’ को मूल जर्मन से अनुवाद करवा कर छापा तो है, लेकिन अनुवादक ने देशज अनुवाद करने के प्रयास में जो कुछ किया वह भारतीय माहौल में अश्‍लीलता ही माना जाएगा। इसलिए प्रकाशक ने इसे जारी नहीं किया है।

एलफ्रीडे जेलीनेक बहुत मुखर लेखिका हैं। उन्होंने अपने देश की दक्षिणपंथी पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का खुलकर विरोध किया तो सरकार ने उन पर देशद्रोही होने का आरोप लगा दिया। लेकिन जेलीनेक की मुखरता का कोई अंत नहीं है। उन्हें लेखन के लिए उपन्यास और नाटकों पर कई पुरस्कार और सम्मान मिले। 2004 में जब नोबल पुरस्कार की घोषणा हुई तो वे लेने नहीं गई। उन्होंने कहा कि इतना बड़ा सम्मान मिलना प्रसन्नता की बात है, लेकिन मुझसे कई बड़े रचनाकार हैं, जो इसके हकदार हैं। करीब दो दशकों से वे अपने घर में ही रहती हैं और कहीं आती जाती नहीं। उन्हें सामाजिक जीवन से और प्रशंसकों की भीड़ से बड़ा डर लगता है। कठोर अनुशासन में बीते बचपन का असर ही है यह शायद कि जेलीनेक हवाई जहाज में बैठने से और बाजार जाकर खरीदारी करने से भी डरती हैं। उनके लेखन में व्याप्त भय और हिंसा का वातावरण वैश्विक है, लेकिन कितनी बड़ी विडंबना है कि दुनिया को भय से मुक्ति का मार्ग दिखाने वाली कलमकार अपने ही डर की वजह से विएना के अपने ही घर में खुद कैद होकर बैठी है।

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 6 जून, 2010 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।













Sunday, 30 May 2010

सर्बिया का चमकीला नक्षत्र - ईवो आंद्रिक

दो साल की उम्र में जिस बालक को पिता अनाथ छोड़ जाएं, उस के भविष्य की कल्पना ही भयावह होती है। लेकिन जीवट हो तो इंसान क्या नहीं कर सकता? ऐसा ही हुआ, 1961 के नोबल पुरस्कार विजेता कथाकार-उपन्यासकार ईवो आंद्रिक के साथ। 9 अक्टूबर, 1892 को जन्मे ईवो को पिता की मृत्यु के बाद मां के साथ ननिहाल आना पड़ा और आरंभिक वर्ष वहीं गुजारने पड़े। ईवो का जन्म आस्ट्रिया-हंगरी के अधीन प्राचीन ऑटोमान साम्राज्य में हुआ, जो पहले यूगोस्लाविया का भाग था और आज बोस्निया और हर्जेगोविना देश का हिस्सा है। शुरुआत में ईवो ने जिम्नास्टिक की शिक्षा ली और कालांतर में उच्च अध्ययन के लिए कई विश्‍वविद्यालयों में पढ़ाई की। 19 साल की उम्र में ईवो की पहली कविता एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुई। युवावस्था में ही आंद्रिक क्रांतिकारी छात्र संगठनों से जुड़ गए थे, इसलिए उनके लेखन और व्यवहार में भी क्रांति के स्वर उभरने लगे थे। ईवो वैचारिक रूप से साम्राज्यवाद के खिलाफ थे और यूगोस्लाविया के समर्थक थे, इसलिए उपनिवेशवादी सरकार ने प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान ईवो आंद्रिक को जेल में डाल दिया। जेल में रहने के दौरान आंद्रिक ने क्रांतिकारी साहित्य का भरपूर अध्ययन किया। लेकिन रूस की सफल क्रांति के बाद बने यूगोस्लाविया गणराज्य में ईवो आंद्रिक को जेल से रिहाई मिली।

प्रथम विश्‍वयुद्ध की समाप्ति के बाद ईवो आंद्रिक ने चार विश्‍वविद्यालयों में स्लाविक भाषा और साहित्य का अध्ययन किया और ‘तुर्की शासनकाल में बोस्नियाई संस्कृति का इतिहास’ विषय पर शोध किया। 1920 में उन्हें यूगोस्लावियाई प्रशासनिक सेवा में ले लिया गया, जहां बीस वर्ष तक उन्होंने कई महत्वपूर्ण राजनयिक पदों पर काम करते हुए अपनी लेखन यात्रा जारी रखी। ईवो की कविताएं अब तमाम महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं और उन्होंने लेखन के साथ विश्‍व साहित्य से अनुवाद का काम भी शुरु कर दिया था। 1920 में पहली कहानी के प्रकाशन के साथ ही ईवो आंद्रिक ने कविता से किनारा कर लिया और पूरी तरह गद्य के लिए समर्पित हो गए। कहानी लेखन में ईवो ने सदियों पुरानी यूगोस्लावियाई लोक संस्कृति को रूपायित करते हुए वहां की कैथोलिक, यहूदी और मुस्लिम समुदाय की समृद्ध विरासत और संघर्षशील जनता के दुख दर्द को शानदार अभिव्यक्ति दी।

दस साल में उनकी कहानियों के कई संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें सबका शीर्षक ‘कहानियां’ था। द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान यूगोस्लाविया पर नाजी आक्रमण के बाद ईवो अपनी राजनयिक सेवा छोड़कर स्वदेश वापस लौट आए। लौटते ही नाजियों ने ईवो को उनके घर में ही नजरबंद कर दिया। इस अवधि में ईवो ने अपना सर्वश्रेष्ठ लेखन किया जो 1945 में उपन्यास त्रयी के रूप में प्रकाशित हुआ। इस त्रयी में ‘द ब्रिज ऑन द्रीना’, ‘बोस्नियन क्रॉनिकल’ और ‘द वूमन फ्राम सरायेवो’ को जबर्दस्त लोकप्रियता हासिल हुई। पूर्वी बोस्निया में द्रीना नदी पर एक प्राचीन पुल के माध्यम से ईवो ने बोस्नियाई ग्रामीण समुदाय के चार सदियों के संघर्षमय जीवन को पहली बार विश्‍व के समक्ष रखा। यहां पुल और नदी जीवंत चरित्र के रूप में सामने आते हैं। यह पुल पूरब और पश्चिम को जोड़ने वाले घटक के तौर पर उभरता है, जिसे प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया जाता है। ‘बोस्नियन क्रॉनिकल’ में संस्कृतियों के संघर्ष को ईवो ने अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। नेपोलियन के विश्‍वविजयी अभियान के बाद फ्रांसिसी शासन के दौरान किस तरह तुर्की और यूरोपीय संस्कृतियों में जबरदस्त टकराव होता है, इसे महज सात साल के दौरान एक कथासूत्र में पिरोकर ईवो आंद्रिक ने दर्शाया। ‘द वूमन फ्राम सरायेवो’ में एक नौकरानी की धनलोलुपता को ईवो ने एक नीतिकथा की शैली में औपन्यासिकता प्रदान की। यह नौकरानी अच्छी खासी खाती पीती महिला है, लेकिन पैसों को लेकर उसके लालच का कोई अंत नहीं है।

दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद ईवो आंद्रिक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए और कई वर्षों तक वे यूगोस्लावियाई लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। इस अवधि में ईवो ने सैंकडों कहानियां, यात्रा संस्मरण, सामयिक विषयों पर लेख और कुछ लघु उपन्यास लिखे। पांचवे दशक में यूगोस्लाविया में सामाजिक यथार्थवाद और आधुनिकता को लेकर लंबी बहस चली, जिसमें ईवो आधुनिकता के पक्ष में खड़े थे और अंततः उनके पक्ष की ही जीत हुई। 1960 तक आते-आते ईवो आंद्रिक की रचनाओं का दुनिया की अनेक भाषाओं में अनुवाद होने लगा था और वे सर्वाधिक अनूदित सर्बियाई लेखक हो चुके थे। यूगोस्लाविया के वे सबसे सम्मानित, चर्चित और महत्वपूर्ण व्यक्तियों में थे। 1959 में जाकर ईवो ने चित्रकार मिलिका बेबिक से विवाह किया। 1961 में उन्हें नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। सर्बियाई भाषा के वे पहले साहित्यकार थे, जिन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित होने का गौरव मिला। उनकी नोबल प्रशस्ति में कहा गया कि ईवो आंद्रिक के लेखन में आधुनिक मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि के साथ पुराकथाओं जैसी मानव नियति के दर्शन होते हैं। मानवता के प्रति ईवो गहरा अनुराग और प्रेम महसूस करते हैं लेकिन सबसे बड़ी बुराई के तौर पर दुनिया में मौजूद भय और हिंसा से मुंह नहीं मोड़ते। ईवो आंद्रिक ने अपने देश के इतिहास से मानव की नियति कथाओं को लेकर महाकाव्यात्मक शक्ति से अभिव्यक्त किया है। हिंदी में उनकी कुछ कहानियों का अनुवाद हुआ है। करीब तीन दशक पहले ईवो की उपन्यास त्रयी के पहले उपन्यास को साहित्य अकादमी ने ‘द्रीना नदी का पुल’ शीर्षक से प्रकाशित किया था, जो अब अनुपलब्ध है। ईवो आंद्रिक के लेखन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक निजी और देशज कथा को वैश्विक आयाम देते हैं और इसीलिए सुदूर बोस्निया के बाशिंदों की कहानी भी अपनी-सी लगने लगती है। 13 मार्च, 1975 को 83 बरस की उम्र में ईवो आंद्रिक का निधन हुआ। उनकी मृत्यु के बाद बोस्निया में उनका स्मारक और संग्रहालय बनाया गया। ईवो आंद्रिक आज भी दुनिया में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले सर्बियाई लेखक हैं।

Sunday, 16 May 2010

बेचैन आत्‍मा का कवि : इयुजीनियो मोन्‍ताले

समकालीन भारतीय कविता, विशेष रूप से हिंदी कविता को विश्‍व के जिन कवियों ने बेहद प्रभावित किया है, उनमें इतालवी कवि इयुजीनियो मोंताले का नाम प्रमुख है। आधुनिक इतिहास, दर्शन, प्रेम और मानवीय अस्तित्व की विविध दुविधाओं और बेचैनियों को गीतात्मक सौंदर्य और अबूझ रहस्यों के साथ प्रस्तुत करने वाले मोंताले को 1975 में नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया था। 12 अक्टूबर, 1896 को व्यापारी परिवार में जन्मे मोंताले छह भाई-बहिनों में सबसे छोटे थे। खराब सेहत के चलते बचपन में पढ़ाई आधी-अधूरी रही। संगीत का शौक था और गायक बनने का सपना लिए मोंताले संगीत सीखने लगे। लेकिन अपने गुरु की असामयिक मृत्यु से विचलित हो मोंताले ने संगीत शिक्षा छोड दी और साहित्य की तरफ चले आए। उनकी रूचि इतालवी और यूरोपीय साहित्य के साथ दर्शनशास्त्र में थी। परिवार में सबसे छोटे होने के कारण उन्हें अपने मन से कुछ भी करने की स्वतंत्रता थी। इसलिए कुछ दिन उन्होंने एकाउंटेंट की नौकरी भी की और प्रथम विश्‍वयुद्ध में सैन्य अधिकारी के रूप में देश की सेवा भी की। लेकिन किताबों के प्रति अपने अगाध प्रेम की वजह से वे पूरी तरह साहित्य की दुनिया में लौट आए। पुस्तकालयों में घंटों बैठकर पढते और लिखते। कई पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हुए उन्होंने कुछ समय एक प्रकाशन संस्थान में भी काम किया। 1928 में वे एक अनुसंधान पुस्तकालय के निदेशक नियुक्त किए गए, जहां से उनकी आलोचना यात्रा आरंभ होकर नए आयामों तक पहुंची।

मोंताले राजनैतिक तौर पर फासीवाद के विरोधियों के साथ थे, इसलिए उनका पहला कविता संग्रह 'बोन्स ऑफ द कटलफिश' 1925 में फासीवाद विरोधी प्रकाशक पिएरो गोबेती ने प्रकाशित किया। मोंताले परिवार गर्मियों के दिन  एक छोटे से गांव लिगूरिया में बिताया करता था। मोंताले ने अपने पहले संग्रह की कविताओं में उसी गांव के श्रमशील लोगों की जिंदगी, उस वातावरण में अपने एकांतिक अस्तित्व और उसमें छाई हुई हताशा और नैराश्‍य के बीच वहां के प्राकृतिक सौंदर्य को अपनी विशिष्ट शैली में प्रस्तुत किया। प्रथम विश्‍वयुद्ध की निरर्थकता ने समूचे यूरोपीय साहित्य को प्रभावित किया और मोंताले भी इससे अछूते नहीं रहे। मोंताले के पहले संग्रह में एक प्रसिद्ध कविता की अंतिम पंक्तियां हैं-

आज हमारे पास आपसे कहने के लिए इतना भर है कि
हम वो नहीं हैं कि जो हम होना नहीं चाहते

1933 में मोंताले की मुलाकात यहूदी-अमेरिकी शोधकर्ता इरमा ब्रेंडिस से हुई और जल्द ही उनकी मित्रता मशहूर हो गई। दांते पर शोधरत इरमा को लोग दांते की प्रेमिका बिएत्रिस की तरह मोंताले की बिएत्रिस कहने लगे। 1938 में फासीवादी सरकार ने आते ही मोंताले को निदेशक के पद से हटा दिया। अगले साल उनका सबसे महत्वपूर्ण संग्रह 'द ऑकेजंस' प्रकाशित हुआ। इसे इतालवी साहित्य में प्रथम विश्‍वयुद्ध के बाद की सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक माना जाता है। इस संग्रह में एक तरफ तो फासीवाद के विरोध में स्वर उठाती कविताएं हैं तो दूसरी तरफ इरमा को क्लीजिया के रूप में संबोधित कर लिखी गई प्रेम कविताएं हैं। मानव मन की अनंत गहराइयों का उत्खनन करते हुए मोंताले अपने निजी संसार को भी कविता में अपनी दुरूह शैली में सार्वजनिक बना देते हैं। बेहद निजी और अबूझ संसार को अपनी कविता में रचते हुए मोंताले व्यक्तिगत रूप से भी गैर सांसारिक हो जाते हैं। संगीत की दुनिया में उन्हें सुकून मिलता है और वे इटली के सबसे बड़े अखबार कूरियर डेला सेरा के लिए अपने नियमित स्तंभ में संगीत की चर्चा करते रहते हैं। अपनी कविता की एकांतिक दुनिया और दुरुहता के बारे एक बार उन्होंने कहा था, 'एक कवि कभी नहीं जानता और अक्सर जान ही नहीं पाता कि वह किस पाठक को संबोधित कर लिख रहा है।'
 
लंबे समय तक मोंताले कविता की दुनिया से दूर रहे और विश्‍व के महान साहित्यकारों की रचनाओं का इतालवी में अनुवाद करते रहे। दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद वे मिलान चले गए। यहां वे अपनी आत्मकथा लिखने लगे जो कई सालों में कई बार प्रकाशित होते अंततः दो खण्डों में पूरी हुई। 1956 में उनका महत्वपूर्ण संग्रह 'द स्टोर्म एण्ड अदर पोएम्स' प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद उपजी स्थितियों का काव्यात्मक और आलोचनात्मक आख्‍यान है। इसमें हिटलर, मुसोलिनी और क्लीजिया के साथ स्वयं कवि अपने समय की निर्मम आलोचना करता हुआ जंग की खिलाफत करता है और मानवता की बात करता है। चौथा संग्रह 'सेतूरा' 1962 में प्रकाशित हुआ। इसमें मोंताले बेहद व्यंग्यात्मक लहजे में दुनिया की विद्रूपताओं का वर्णन करते हैं। 'धुंधली-सी रोशनी हुई/जब इंसान ने सोचा/कि वह छछूंदरों और झींगुरों से बहुत बड़ा है।'

1967 में उन्हें इटली की सीनेट का आजीवन सदस्य बनाया गया। उन्हें मिलान, केंब्रिज और रोम विद्गवविद्यालयों ने मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की। 1975 में उन्हें नोबल पुरस्कार मिला। 12 सितंबर 1981 को उनका निधन हुआ। मोंताले की मृत्यु के बाद 1996 में प्रकाशित उनकी डायरी कवियों, काव्यप्रेमियों और आलोचकों के बीच बहुत लोकप्रिय है।

Sunday, 25 April 2010

कलम से खुदाई करने वाले शेमस हीनी

आयरलैंड के कवियों में शेमस हीनी ऐसे कवि हैं, जिनकी कविताओं ने देश-काल की सीमाओं को लांघते हुए हर काव्यप्रेमी का दिल जीता है। १३ अप्रेल, १९३९ को एक किसान परिवार में जन्मे शेमस हीनी ने अपने ग्रामीण परिवेश में जो कुछ बचपन से देखा-भोगा, उसे अपनी कवितओं में इस खूबसूरती के साथ रूपांतरित किया कि पर्यटन के नक्‍शों में दिखाए जाने वाले आयरलैंड के सुहावने दृश्‍यों से अलग वहां की धरती के नैसर्गिक सौंदर्य के दर्शन होते हैं। और इस सौंदर्य में आयरलैंड की खूबसूरत वादियां ही नहीं, वहां का समूचा प्राणिजगत और श्रमशील जनता भी दिखाई देती है। देहात में अपनी आरंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद १९५७ में हीनी अंग्रेजी भाषा और साहित्य के अध्ययन के लिए बेलफास्ट के क्वींस विश्‍वविद्यालय चले गए। यहां वे उस समय के मशहूर अंग्रेजी कवि टेड ह्‌यूज की कविताओं के संपर्क में आए और समकालीन कविता की दुनिया से जुड़ते चले गए। १९६१ में स्नातक होने के बाद वे एक स्कूल में अध्यापन करने लगे। इस बीच कई कवि-साहित्यकारों के संपर्क में आने से हीनी की कविता समृद्ध होने लगी। १९६२ में उन्होंने कविताएं प्रकाशन के लिए भेजना शुरु किया और धीरे-धीरे उनकी कविताएं लोगों का ध्यान आकर्षित करने लगीं। कविताओं के साथ हीनी अखबारों के लिए लेख आदि भी लिखते रहे। क्वींस विश्‍वविद्यालय के प्राध्यापक फिलिप हॉब्सबाम ने युवा कवियों का एक समूह बनाया और शेमस हीनी को उसमें शामिल किया। अब हीनी कवियों की एक ऐसी वृहत्तर दुनिया से जुड गए, जिसके तार लंदन तक से जुडे हुए थे।
१९६५ में लेखिका मैरी डेवलिन से विवाह के साथ ही क्वींस विश्‍वविद्यालय के वार्षिक समारोह में उनकी ग्यारह कविताओं की पुस्तिका प्रकाशित हुई, जिसने लोगों को एक बार फिर शेमस हीनी की कविताओं पर गंभीरता से सोचने के लिए विवश किया। १९६७ में उनका पहला कविता संग्रह 'डैथ ऑफ ए नेचुरलिस्ट' प्रकाशित हुआ तो अंग्रेजी साहित्य की दुनिया में शेमस हीनी का जबर्दस्त स्वागत हुआ। भाषा, विषयवस्तु और शिल्प की दृष्टि से यह संग्रह अंग्रेजी काव्य संसार की एक नई और अनूठी आवाज के रूप में सामने आया। इस पर हीनी को कई सम्मान और पुरस्कार मिले। अगले साल हीनी माइकल लोंग्ली के साथ एक कविता यात्रा पर निकले तो कई जगह कविता पाठ के दौरान हीनी को व्यापक सराहना मिली। १९६९ में उनका दूसरा काव्य संग्रह 'डोर इन टू द डार्क' प्रकाशित हुआ। उनकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी और हर तरफ से उनकी कविताओं की मांग थी। तीन साल बाद तीसरा संग्रह 'विंटरिंग आउट' आया और इसके साथ ही शेमस हीनी आयरलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका में काव्यपाठ के लिए बुलाए जाने लगे। १९७५ में उनका चौथा और अत्यंत महत्वपूर्ण काव्य संकलन 'नॉर्थ' प्रकाशित हुआ। इसके साथ ही शेमस हीनी की कविताएं अंग्रेजी साहित्य की दुनिया से बाहर भी लोगों का ध्यान आकर्षित करने लगीं, क्यांकि अब लोग उनकी कविताओं का अपनी भाषाओं में अनुवाद करने लगे थे। १९७६ में 'फील्ड वर्क' के रूप में चौथा संग्रह प्रकाश में आया। अब शेमस हीनी इतने बडे कवि के रूप में स्थापित हो चुके थे कि उनकी कविताओं के संचयन प्रकाशित होने लगे थे।
आयरलैंड सरकार ने जब राष्ट्रीय कला परिषद का गठन किया तो शेमस हीनी को सर्वोच्च सम्मान देते हुए उसका सदस्य मनोनीत किया। स्कूल से कॉलेज और विश्‍वविद्यालयों में पढ़ाते हुए वे अमेरिकी विश्‍वविद्यालयों तक अध्यापन के लिए गए, लेकिन उनके भीतर का आयरिश मन अंततः आयरलैंड में ही रमा और वे वहीं के होकर रह गए। एक बार पेंग्विन ने समकालीन ब्रिटिश कविता के एक संचयन में उन्हें शामिल किया तो स्वाभिमानी शेमस हीनी ने चार पंक्तियों में इसका प्रतिरोध किया, 'ध्यान रहे, मेरा पासपोर्ट हरे रंग का है, हमारा कोई जाम, नहीं उठेगा महारानी के नाम।'
साहित्य के साथ हीनी का जुडाव रंगमंच की दुनिया से भी बना रहा और वे एक थियेटर कंपनी के संचालक मंडल में रहे। कविता के अलावा वे समसामयिक विषयों पर भी लगातार लिखते रहे। ऐसे लेखों का १९८८ में प्रकाशित एक संकलन 'द गवर्नमेंट ऑफ द टंग' बहुत लोकप्रिय हुआ। १९८९ में वे हार्वर्ड विश्‍वविद्यालय में पांच साल के लिए प्रोफेसर ऑफ पोएट्री चुने गए। रंगमंच के लिए लिखे उनके नाटक 'द क्योर एट ट्रॉय' और 'सीइंग थिंग्स' बेहद लोकप्रिय हुए।
इतने लोकप्रिय और महत्वपूर्ण रचनाकार को जब १९९५ में नोबल पुरस्कार दिया गया तो किसी को आश्‍चर्य नहीं हुआ क्योंकि वे इसके सच्चे हकदार थे। नोबल पुरस्कार देते हुए उनकी प्रशस्ति में कहा गया कि उनका काम गीतात्मक सौंदर्य और उच्च नैतिक मूल्यों की गहराई से लबरेज है, जो रोजमर्रा की जिंदगी के अचरजों और जीवित इतिहास को शक्ति प्रदान करता है। आलोचक ओला लार्समो के अनुसार शेमस हीनी की कविता में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वहां एक जबर्दस्त अनुभव उद्‌घाटित होता है। जो कुछ दृश्‍यमान है और इस दृश्‍यमान को जितना कुछ व्यक्त किया जा सकता है, इन दो स्थितियों के बीच जो फासला है, उसे शेमस हीनी की कविता अगर पाटती नहीं तो कम से कम नापती जरूर है। अपने पिता को गड्‌ढ़ा खोदते हुए देखकर लिखी शेमस हीनी की कविता 'डिगिंग' में इसे आरंभिक तौर पर पहचाना जा सकता है, हीनी लिखते हैं:-

भगवान कसम, वो बूढा बेलचा चला सकता है
अपने बूढे बाप की तरह
लेकिन मेरे पास उसका अनुकरण करने के लिए
कोई बेलचा नहीं हैं

मेरी अंगुली और अंगूठे के बीच
एक गोल-मटोल कलम है
मैं इसी से खुदाई करूंगा।

७१ वर्षीय शेमस हीनी इन दिनों डबलिन में रहते हैं। नोबल पुरस्कार के बाद उन्हें टी.एस. इलियट पुरस्कार सहित अनेक सम्मान-पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।
 
यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 25 अप्रेल, 2010 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।

Monday, 12 April 2010

समाज के लिए समर्पित लेखिका - पर्ल. एस. बक

अमेरिकी साहित्य के इतिहास में पर्ल एस. बक पहली महिला रचनाकार हैं, जिन्हें साहित्य में १९३८ में नोबल पुरस्कार मिला। अमेरिका में ईसाई मिशनरी परिवार में १८९२ में जन्मी पर्ल के जीवन का अधिकांश चीन में बीता। जन्म के बाद ही वे माता-पिता के साथ चीन आ गईं थीं। घर पर साहित्य की शौकीन मां ने अंग्रेजी और चीनी शिक्षक ने चीनी भाषा सिखाई। उस वक्त के चीन में जबर्दस्त उथलपुथल का दौर चल रहा था, इसलिए पर्ल के परिवार को कई बार जान बचाने के लिए कई जगह शरण लेनी पड़ी। पंद्रह साल की उम्र में पर्ल को शंघाई के एक बोर्डिंग स्कूल में विधिवत शिक्षा के लिए दाखिल करा दिया गया। उच्च शिक्षा के लिए उन्हें अमेरिका भेज दिया गया, जहां पर्ल ने मनोविज्ञान का अध्ययन किया। १९१४ में पर्ल वापस चीन आईं और स्कूल में अंग्रेजी पढाने लगीं। कृषि विज्ञानी डा. जॉन लॉसिंग बक से विवाह के बाद वे पति के साथ चीन के सुदूर स्थलों की यात्रा करती रहीं, जो कालांतर में उनके साहित्य में बेहद खूबसूरत ढंग से रूपायित हुआ। १९२४ में पर्ल अपनी मंदबुद्धि बेटी के इलाज के लिए अमेरिका पहुंची और बेटी की देखभाल के साथ साहित्य में एम.ए. भी करने लगीं।
१९२७ में वो वापस चीन लौट आईं, लेकिन चीन के गृहयुद्ध के हालात में बक परिवार को भागकर जापान में शरण लेनी पड़ीं। इसके बाद पर्ल कभी वापस चीन नहीं गईं। पर्ल इस बीच एशियाई समाज के विभिन्न पहलुओं को लेकर पत्र-पत्रिकाओं में लिखती रहीं। उनका यह लेखन आत्मकथात्मक था, जिसमें वे अपने निजी अनुभवों को चीन के बाहर की दुनिया के लोगों के साथ साझा करती थीं। एशिया मैगजीन  में उनकी कहानी 'ए चाइनीज वूमैन स्पीक्स' को व्यापक सराहना मिली। पर्ल ने चीनी साहित्य का विशेष रूप से प्राचीन चीनी साहित्य का गहन अध्ययन किया था। इसीलिए जब उनका पहला उपन्यास 'ईस्ट विंड : वेस्ट विंड' प्रकाशित हुआ तो पाठकों और आलोचकों का उनकी ओर ध्यान गया। इस उपन्यास में पर्ल ने एक चीनी महिला क्वेन लाई के जीचन संघर्ष का मार्मिक विवरण प्रस्तुत किया। लेकिन जब १९३१ में 'गुड अर्थ' प्रकाशित हुआ तो पर्ल को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। इस उपन्यास में पर्ल ने एक ऐसे चीनी किसान का जीवनवृत्त प्रस्तुत किया जो अपनी धरती से, अपने खेतों से, अपनी आबोहवा से गहरा प्रेम करता है। उसके पास पीढियों से संचित ज्ञान की संपदा है और वह अपनी ही दुनिया में मगन है और तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी जीने के लिए संघर्ष करता रहता है। पर्ल ने चीनी साहित्य की वर्णनशैली और बाइबिल जैसी गद्यात्मकता से अपने पहले उपन्यास को इतनी खूबसूरती से रचा कि पूरी दुनिया का इस पर ध्यान गया। इस उपन्यास की लोकप्रियता को देखते हुए १९३७ में इरविंग टालबर्ग ने सिडनी फ्रेंकलिन के निर्देशन में इस पर अत्यंत विश्‍वसनीय फिल्म भी बनाई। फिल्म में अभिनेत्री लुई रेनर को मुख्‍य भूमिका के लिए ऑस्कर मिला। इस उपन्यास की प्रकाशन के पहले वर्ष में १८ लाख प्रतियां बिकीं और दुनिया की तीस से अधिक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ। १९३२ में इस उपन्यास पर पर्ल को पुलित्जर पुरस्कार मिला।
'गुड अर्थ' की अपार लोकप्रियता ने पर्ल को प्रेरित किया तो इसके दो और भाग लिखे गए। १९३२ में 'संस' और १९३५ में 'ए हाउस डिवाइडेड' प्रकाशित हुए। इन दोनों उपन्यासों में पर्ल ने किसान की अगली पीढ़ी का वृत्तांत प्रस्तुत किया। इस उपन्यास त्रयी के साथ लिखे गए 'मदर' उपन्यास में पर्ल ने चीनी मां के आत्मबलिदान और संघर्ष की अत्यंत करुण कथा लिखी है। इसे पर्ल के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है। पर्ल ने अपने पिता एब्सालोम की रचनात्मक जीवनी 'फाइटिंग एंजेल' में और मां कैरोलीन की जीवनी 'द एक्जाइल' में इतनी खूबसूरत किस्सागोई की शैली में प्रस्तुत की कि आलोचकों के मुताबिक ये क्लासिक जीवनियां हैं। पर्ल का १९३५ में अपने पति से तलाक हो गया और उन्होंने अपने प्रकाशक रिचर्ड वाल्श से विवाह कर लिया। १९३८ में नोबल पुरस्कार प्रदान करते समय पर्ल के साहित्य की प्रशंसा करते हुए कहा गया कि पर्ल के लेखन ने नस्ली सीमाओं के पार जाकर मानवीय संवेदनाओं और सहानुभूति का मार्ग प्रशस्त किया है। पर्ल एस. बक ने जीवन में करीब ८० पुस्तकें लिखीं, जिनमें कहानी, उपन्यास और जीवनी के अलावा आलोचना, संस्मरण, कविता, निबंध, बालसाहित्य की कई विधाओं की पुस्तकें शामिल हैं। पर्ल के लेखन के केंद्र में सिर्फ चीनी जनजीवन ही नहीं जापानी और अमेरिकी जनजीवन भी रहा। उन्होंने महिला अधिकार, एशियाई संस्कृति, मिशनरी जीवन, युद्ध, दत्तक और पारगमन नियमों को लेकर भी प्रचुर मात्रा में लिखा। १९४९ में पर्ल ने बच्चों को गोद लेने के तत्कालीन नियमों का विरोध किया और मिश्रित नस्ल के अनाथ बच्चों के लिए संघर्ष किया। पर्ल ने व्यक्तिगत प्रयासों से मिश्रित नस्ल के बच्चों को आश्रय देने के लिए दुनिया की पहली गोद लेने वाली संस्था 'वेलकम हाउस' प्रारंभ की। १९६४ में पर्ल ने एशियाई बच्चों की दयनीय दरिद्रता और असमानता को लेकर पर्ल एस. बक फाउण्डेशन की स्थापना की। इसके बाद विभिन्न एशियाई देशों में पर्ल ने अनाथालय और शिक्षण संस्थान खोले। समाज सेवा के साथ पर्ल का लेखन भी चलता रहा। पर्ल ने अनेक चीनी रचनाकारों की कृतियों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। अपने अंतिम समय में पर्ल 'द गुड अर्थ' का चौथा खण्ड लिख रही थीं जो पूरा ना हो सका। ६ मार्च, १९७३ को ८० साल की उम्र में फेंफडों की बीमारी से पर्ल का निधन हुआ।

Sunday, 14 March 2010

साहसी और प्रतिभावान लेखक: वोले शोयिंका

नाइजीरिया जैसे छोटे से देश को विश्‍व साहित्य में एकमात्र नोबल पुरस्कार दिलाने का श्रेय महान अश्‍वेत कवि, नाटककार और उपन्यासकार वोले शोयिंका को जाता है। शोयिंका पहले अश्‍वेत अफ्रीकी रचनाकार हैं, जिन्हें 1986 में नोबल पुरस्कार मिला। कई बार भारत आ चुके शोयिंका हाल ही में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भी आए थे। 13 जुलाई, 1934 को नाइजीरिया की योरूबा जनजाति के एक प्रतिष्ठित परिवार में वोले शोयिंका का जन्म हुआ। इनका परिवार आदिम जनजातीय परंपराओं और मिथकीय ज्ञान को सहेज कर रखने वाला परिवार था। बचपन से ही शोयिंका को अपनी इस पैतृक संपदा को गहराई से जानने-समझने का अवसर मिला, जो आगे चलकर उनके रचनाकर्म का एक विशिष्ट पक्ष बन गया। अश्‍वेत अफ्रीकी जनजातियों में लोकनाट्य, कला और संगीत की समृद्ध परंपरा रही है, जो भारतीय लोक परंपराओं की भांति लोकजीवन में अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम है। अभिव्यक्ति की इसी परंपरा ने शोयिंका को विशिष्ट बनाया। यही वजह है कि नाइजीरिया में कालेज में पढ़ाई के दौरान शोयिंका ने भ्रष्टाचार विरोधी और न्यायप्रिय छात्रों का एक संगठन बनाया और जनसंघर्ष की राजनीति में कूद पड़े। 1954 में वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए। लीड्स विश्‍वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करते हुए शोयिंका ने यूरोपीय साहित्य का विशद् अध्ययन किया। इसी बीच उन्होंने दो महत्वपूर्ण नाटक लिखे, ‘द स्वैम्प ड्वैलर्स’ और ‘द लायन एण्ड द ज्वैल’। दोनों ही नाटक लंदन में मंचित हुए और खासे मशहूर हुए। इन नाटकों में खुद शोयिंका नाटककार होने के साथ अभिनेता भी रहे।

शोयिंका के जन्म के समय नाइजीरिया एक ब्रिटिश उपनिवेश था। 1960 में वापसी के वक्त आजादी की फिजा में लौटे और अफ्रीकी नाटकों के अध्ययन में जुट गए। नौजवानों के लिए उन्होंने एक नाट्य संस्था का भी गठन किया और रंगमंच के अलावा, रेडियो, टेलीविजन के लिए भी लिखने लगे। वतन की आजादी को लेकर लिखा गया उनका नाटक ‘ए डांस आफ द फोरेस्ट’ बहुत मकबूल हुआ। 1962 में वे इफे विश्‍वविद्यालय में अंग्रेजी के व्याख्याता नियुक्त हुए और 1965 में लागोस विश्‍वविद्यालय में वरिष्ठ व्याख्याता के रूप में अध्यापन करने लगे। इसी वर्ष एक नाइजीरियाई प्रांत के चुनावों में सरकार की धांधली को लेकर शोयिंका एक रेडियो स्टेशन पर बंदूक लेकर पहुंचे और विजयी नेता के भाषण की जगह अपनी तीखी प्रतिक्रिया प्रसारित की, जिसकी वजह से सरकार ने उस रेडियो स्टेशन को जब्त कर लिया। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और दो साल बाद रिहा किया गया। 1967 में गृहयुद्ध के दौरान शोयिंका को तानाशाह सरकार ने फिर से एकांत कारावास में डाल दिया, जहां से उन्हें 1969 में रिहाई मिली। जेल में शोयिंका ने टिश्‍यू पेपर पर कविताएं लिखीं। अपने जेल अनुभव उन्होंने ‘द मैन डाइड- प्रिजन नोट्स आफ वोले शोयिंका’ पुस्तक में प्रकाशित किए। वे सिर्फ नाइजीरियाई तानाशाही का ही नहीं, दुनिया की तमाम तानाशाह सरकारों का विरोध करते रहे हैं। इसी कारण उन पर समय-समय पर हमले भी होते रहे हैं। जनरल सानी अबाचा ने तो शोयिंका के लिए मौत का फरमान ही जारी कर दिया था। शोयिंका को मोटर साइकिल पर चोरी छिपे देश छोड़के भागना पड़ा। वे अमेरिका और कई देशों में गए और विश्‍व के नेताओं से मिलकर अपने देश को तानाशाही से मुक्ति दिलाने के लिए विमर्श करते रहे। उनके प्रयासों से ही नाइजीरिया में नागरिक प्रशासन की स्थापना हो सकी। वापसी में जनता ने उनका नायकों की तरह स्वागत किया।

उनकी रचनाओं में 1965 में प्रकाशित उपन्यास ‘द इंटरप्रेटर्स’ अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस उपन्यास में शोयिंका ने नाइजीरिया के दो शहरों इबाडान और लागोस के क्लबों में मिलने वाले बुद्धिजीवियों का वृतांत लिखा है, जो लगातार इस बात पर अपने-अपने ढंग से विचार करते हैं कि नाइजीरियाई वास्तविकता क्या है?  इस जटिल उपन्यास को विश्‍वसाहित्य में जेम्स जायस और विलियम फाकनर के सृजन के समकक्ष माना जाता है। शोयिंका के नाटकों में अफ्रीकी लोक कला रूपों की प्रचुरता के साथ पश्चिमी व यूरोपीय आधुनिकता का गजब का संगम मिलता है। उनकी कविताओं में आदिम अफ्रीकी लोकविश्‍वास और मनुष्य के अंतर्संबंधों का बेहद खूबसूरत वर्णन मिलता है। उन्होंने पाश्‍चात्य साहित्य के अध्ययन से जो दृष्टि प्राप्त की, उसके माध्यम से उन्होंने अपनी योरूब जनजाति के देवताओं को नए रूप में देखते हुए विलक्षण कविताएं लिखीं। दुनिया भर में चल रहे जनसंघर्षों के प्रबल प्रवक्ता वोले शोयिंका ने नेल्सन मंडेला से लेकर आम आदमी तक के लिए सैंकडों कविताएं लिखी हैं, जिसने दुनिया भर के संघर्षरत लोग प्रेरित होते हैं और उनकी रचनाओं के माध्यम से अपने सतत संघर्षों को धार देते हैं। शोयिंका की कविताओं का एक पूरा संग्रह हिंदी के वरिष्‍ठ कवि वीरेंद्र कुमार बरनवाल ने करीब दो दशक पूर्व किया था, जिसे ज्ञानपीठ ने 'विश्‍व भारती' शृंखला में प्रकाशित किया था।

हिंदी में उनकी कविताओं का काफी अनुवाद हुआ है। वरिष्ठ कवि वीरेंद्र कुमार बरनवाल ने तो एक पूरा संग्रह ही शोयिंका की कविताओं का अनुवाद कर दिया, जिसे भारतीय ज्ञानपीठ ने ‘विष्व भारती’ शृंखला में दो दषक पहले प्रकाषित किया था। वोले शोयिंका आज भी निरंतर लिख रहे हैं, लेकिन संयोग से उनकी गद्य रचनाएं हिंदी में कम ही प्रकाषित हुई हैं।
यह आलेख संपादित रूप में राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 14 मार्च, 2010 को प्रकाशित हुआ।



























Sunday, 21 February 2010

आधुनिक अरबी का महान रचनाकार - नजीब महफूज

अरबी साहित्य के इतिहास में पहला और अब तक का अंतिम नोबल पुरस्कार मिस्त्र के नजीब महफूज को 1988 में मिला। लेकिन नजीब इस पुरस्कार से तीन दशक पहले ही अरबी भाषा के इतिहास में वो मुकाम बना चुके थे, जिसमें वे बाल्जाक, तोलस्तोय और चार्ल्‍स डिकेंस के समकक्ष नजर आते हैं। उनके उपन्यासों को लेकर माना जाता है कि आधुनिक अरबी में उपन्यास विधा की शुरूआत संभवत उन्होंने ही की है। उनके उपन्यासों पर अरबी में अनेक चर्चित फिल्मों का निर्माण हुआ है और उन्हें आधुनिक अरबी साहित्य का विश्व में सर्वश्रेष्ठ लेखक माना जाता है। हालांकि बाहरी विश्व में उनको नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद ही पहचाना गया और दुनिया की कई भाषाओं में उनकी कृतियों का अनुवाद हुआ। नोबेल पुरस्कार मिलने की कई वजहों में से एक यह भी रही कि नजीब महफूज ने इस्लामिक जगत में सलमान रूश्दी के खिलाफ दिए गए फतवे की जबर्दस्त भर्त्‍सना की और 'सैटेनिक वर्सेज' के लिए रूश्दी की भी कडी आलोचना की। यद्यपि इसी कारण से उनकी कई कृतियों को मध्य-पूर्व के कई देशों में प्रतिबंधित भी कर दिया गया और उन पर जानलेवा हमले भी हुए। लेकिन इस साहसी लेखक ने अविचलित रहते हुए कट्टरपंथियों के आगे कभी घुटने नहीं टेके।

11 दिसंबर, 1911 को कैरो के एक उपनगर में निम्न मध्यवर्गीय परिवार में जन्में नजीब सात भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। बचपन में मां ने खूब पढने और संग्रहालय दिखाने के बहाने इतिहास से परिचय कराने का जो सिलसिला चलाया वह आगे चलकर साहित्य के संस्कारों में परिणत हुआ। प्रारंभिक शिक्षा के बाद दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर करने पर पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए नजीब महफूज भी प्रशासनिक सेवा में चले गए। इस बीच उन्होंने ढेरों किताबें लिखीं, जिनमें उपन्यास, कहानियां, संस्मरण, इतिहास, वृतांत आदि शामिल हैं। नगीब अखबारों के लिए नियमित स्तंभ लिखते थे और उनके कई उपन्यास अखबारों में धारावाहिक प्रकाशित हुए। उन्होंने अनेक फिल्मों की पटकथा और कहानियां लिखीं, जो खासी प्रसिद्ध हुई। नजीब महफूज चाहते थे कि वे मिस्त्र का आधुनिक इतिहास उपन्यासों के रूप में लिखें, इसलिए प्रारंभ में उन्होंने 30 उपन्यासों की शृंखला पर काम करते हुए तीन उपन्यास लिखे, लेकिन बाद में इस परियोजना को बदल कर खुद को इतिहास के बजाय वर्तमान पर केंद्रित कर लिया। इस क्रम में उन्होंने एक उपन्यास त्रयी लिखी जो बेहद मशहूर हुई। इस त्रयी में नजीब ने 'पैलेस वाक', 'पैलेस ऑफ डिजायर' और 'शुगर स्ट्रीट' उपन्यास लिखे। इन उपन्यासों में प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर 1950 तक तीन पीढियों का जीवंत इतिहास था। इस बीच सत्ता परिवर्तन से विचलित नगीब ने अपनी रचनाएं प्रकाशित करना बंद कर दिया और सात साल बाद प्रकाशन की दुनिया में वापस लौटै। इसके बाद उन्होंने 'चिटचैट ऑन द नील' उपन्यास लिखा, जो काफी लोकप्रिय हुआ । इस्लाम, यहूदी और ईसाई धर्म के विविध पक्षों की कडी आलोचना करने वाले उपन्यास 'चिल्ड्रेन ऑफ अवर ऎली' को सिवाय लेबनान के समूचे अरब जगत में प्रतिबंधित कर दिया गया और आरोप में कहा गया कि नजीब ने इन धर्मो का कथित तौर पर अपमान किया है। नजीब महफूज ने अपने बाद के तमाम उपन्यास और कहानियों के केंद्र में धर्म की पारंपरिक व्याख्या और आधुनिक विचारों को एक मंच पर लाने का प्रयास करते हुए यह सोच रखी है कि आधुनिक विचारों के साथ सामंजस्य बिठाए बिना किसी भी धार्मिक विश्वास को आगे ले जाना मुश्किल है। जब मिस्त्र ने इजराइल से अमरीका की साक्षी में कैंप डेविड शांति संधि पर हस्ताक्षर किए तो नजीब पहले लेखक थे, जिन्होंने उस संधि का समर्थन किया और पूरी अरब दुनिया से दुश्मनी मोल ली। इस वजह से उनकी किताबों को प्रतिबंध का भी सामना करना पडा, लेकिन वे इस सबसे बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए।

मिस्त्र के बाल्जाक कहे जाने वाले नजीब महफूज ने हालांकि कभी मिस्त्र के बाहर की दुनिया नहीं देखी, लेकिन उनकी रचनाओं में आने वाले विचार बताते हैं कि वे कितनी बडी और महान वैश्विक सोच के लेखक हैं। उनकी रचनाओं में दुनिया के श्रेष्ठतम विचार समाहित हैं और यूरोपीय और आधुनिकतावादी विचारों से उनका साहित्य लबरेज है। अपने दृढ विचारों के कारण नजीब महफूज हमेशा अतिवादियों की हिटलिस्ट में रहे, लेकिन उन्होंने अपनी वैचारिक दृढता में कभी कमी नहीं आने दी। 30 अगस्त, 2006 को नजीब महफूज ने अंतिम सांस ली।

राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्‍ट में 21 फरवरी, 2010 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' स्‍तंभ में प्रकाशित।





Wednesday, 20 January 2010

मोगली का सर्जक-रूडयार्ड किपलिंग



अगर जन्म के आधार पर नागरिकता मानी जाए तो मुंबई में जन्मे रूडयार्ड किपलिंग पहले भारतीय थे, जिन्हें 1907 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। किपलिंग अंग्रेजी भाषा के पहले लेखक थे, जिन्हें अब तक रिकार्ड सबसे कम उम्र यानी 42 वर्ष की आयु में नोबल पुरस्कार मिला। 30 दिसंबर, 1865 को जन्मे किपलिंग के पिता जे.जे. स्कूल आफ आर्ट्स के प्रारंभिक शिक्षकों में थे। पांच साल की उम्र में किपलिंग को तीन वर्षीय बहन एलिस के साथ पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया। छह बरस तक दोनों भाई-बहनों को एक परिवार के बेहद कठोर अनुशासन में रहना पड़ा। इसके बाद किपलिंग को स्कूल में दाखिल करा दिया गया, जहां की आजाद और खुली हवा में एक रचनाकार के तौर पर किपलिंग में साहित्य के अंकुर फूटे। यहां के अनुभव कई बरस बाद ‘स्टॉकी एंड कंपनी’ कहानी संग्रह के रूप में प्रकाश में आए। स्कूल के बाद आगे की पढ़ाई के लिए किपलिंग को ऑक्सफोर्ड विश्‍वविद्यालय में प्रवेश लेना था, लेकिन आर्थिक हालात इजाजत नहीं देते थे। इसलिए पिता ने किपलिंग के लेखन कौशल को देखते हुए हिंदुस्तान में उसके लिए एक नौकरी ढूंढ़ ली। इस बीच पिता लाहौर चले गए थे, जहां वे मेयो कालेज आफ आर्ट के प्रिंसिपल और लाहौर म्यूजियम के क्यूरेटर थे। युवा किपलिंग को उन्होंने एक साप्ताहिक अखबार में सहायक संपादक की नौकरी दिला दी।

सत्रह साल से भी कम उम्र में अखबार में काम शुरु करने वाले किपलिंग की 21 साल की आयु में कविताओं की पहली किताब प्रकाशित हुई ‘डिपार्टमेंटल डिट्टीज़’। इसी वर्ष नए संपादक ने किपलिंग को अखबार के लिए कहानियां लिखने के लिए कहा तो युवा किपलिंग की लेखनी चल पड़ी। अगले साल से गर्मियों की छुट्टियों में शिमला जाने का सिलसिला शुरु हुआ तो किपलिंग ने शिमला के जनजीवन और प्रकृति को अपनी कहानियों में बेहद खूबसूरती से चित्रित किया। इस बीच 1887 में उन्हें ‘पायोनियर’ अखबार में तबादला कर इलाहाबाद भेज दिया गया। 1888 में पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ ‘प्लेन टेल्स फ्राम द हिल्स’। इसके बाद एक बरस में किपलिंग के छह कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। विशेष संवाददाता के रूप में किपलिंग को राजपूताना भेजा गया, जहां बूंदी में उन्हें एक उपन्यास का विचार सूझा। इस यात्रा के अनुभव अखबार में तो छपे ही पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुए। अगले साल किसी विवाद के कारण किपलिंग को अखबार से छुट्टी दे दी गई। वहां से छह महीने का वेतन अग्रिम मिला और अपनी सात किताबों के अधिकार बेचकर किपलिंग ने एक लेखक के तौर पर जीवनयापन करने का निश्‍चय किया और लंदन के लिए रवाना हो गए।

लंदन में उन्होंने एक कहानी संग्रह और एक कविता संग्रह लिखा, जिनमें भारतीय जनजीवन और ब्रिटिश सैनिकों के अनुभवों का सजीव चित्रण किया गया है। 1894 में किपलिंग ने अपनी विश्‍वविख्यात कृति ‘जंगल बुक’ की रचना की, जिसे आज भी बाल साहित्य की श्रेणी में अप्रतिम माना जाता है। भेड़ियों द्वारा उठाकर जंगल में ले जाए गए बच्चे मोगली की कहानियां इस कदर लोकप्रिय हुईं कि इस पर कई फिल्में और धारावाहिक विश्‍व भर में बने। आज भी यह बच्चों की लोकप्रिय पुस्तक है। स्काउट आंदोलन के प्रणेता बैडन पावेल ने ‘जंगल बुक’ से प्रेरणा लेकर स्काउटिंग के कई कार्यक्रमों की संरचना की। किपलिंग ने इसकी सफलता से उत्साहित होकर इसका दूसरा भाग भी लिखा। इसके बाद वे फिर से कहानियां लिखने लगे और 1899 तक तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। बूंदी में बैठकर उन्होंने जिस उपन्यास की कल्पना की थी वह 1901 में ‘किम’ के रूप में सामने आया। अनाथ आइरिश किशोर किम और बौद्ध भिक्षु तेशू लामा की रोमांचक हिमालय यात्रा और दोनों की अपने-अपने स्तर पर आत्म और अस्मिता की खोजयात्रा बेहद रोचक है। यूं तो इस उपन्यास के दीवाने पूरी दुनिया में हैं, लेकिन यह पंडित नेहरू की भी प्रिय पुस्तकों में रही है।

किपलिंग ने अपने जीवन में यात्राएं बहुत कीं, इसलिए उनके पास दुनिया के कई देशों के अनुभव थे, बहुत से लोगों के जीवन में झांकने का उन्हें मौका मिला, और सबसे बड़ी बात यह कि किपलिंग बेहद कल्पनाशील रचनाकार थे। इसलिए यथार्थ और कल्पना के अद्भुत सम्मिश्रण से वे जबर्दस्त कहानियां, उपन्यास और यात्रा संस्मरण लिख सके। उनकी कल्पनाशीलता इसी से पहचानी जा सकती है कि मोगली जैसे पात्र की रचना उन्होंने अखबार में पढ़ी एक खबर के आधार पर की और उसके इर्द-गिर्द महान बालसाहित्य का सृजन किया। उनके लेखन में ब्रिटिश सैनिकों की पीड़ा, सैनिक होने का गर्व, पराए देश में परिजनों से दूर रहने का दुख, आम भारतीय इंसान का सहज जीवन और यहां का विविधरंगी परिदृश्‍य बखूबी देखने को मिलता है। अंग्रेजी साहित्य में भारतीय जनजीवन का जीवंत और प्रामाणिक चित्रण संभवतः पहली बार किपलिंग ने ही किया। ‘गंगादीन’ जैसे मामूली चरित्र को किपलिंग ने एक कविता से अमरत्व प्रदान कर दिया, जो सैनिकों के लिए महज पानी लाता था। किपलिंग को भारतीय नामों और चीजों से इस कदर लगाव था कि जब अमेरिका में उन्होंने अपना घर बनाया तो उसका नाम रखा ‘‘नौलखा’’। यह नाम लाहौर किले की नौलखा बारादरी से उन्हें सूझा था। किपलिंग की प्रारंभिक पुस्तकों के कवर पर सौभाग्य और समृद्धि के प्रतीक के रूप में स्वास्तिक और सूंड में कमल पकड़े हाथी के चित्र प्रकाशित होते थे, लेकिन कालांतर में जर्मन नाजियों द्वारा स्वास्तिक अपनाए जाने पर अपनी तमाम किताबों से उन्होंने स्वास्तिक हटवा दिए।

किपलिंग की प्रकाशित पुस्तकों की सूची पचास से अधिक है, लेकिन एक ‘जंगल बुक’ ही उन्हें विश्‍वसाहित्य में अमर रखने के लिए पर्याप्त है। पाठकों को उनकी वो रोमांटिक कहानियां बेहद अच्छी लगती हैं, जिनमें अंग्रेज सुदूर देशों की साहसिक यात्राएं करते हैं और विजय प्राप्त करते हैं। हालांकि किपलिंग पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद का पोषक और समर्थक होने के आरोप लगते रहे हैं, किंतु उनके प्रशंसकों का कहना है कि उनकी कहानियों और उपन्यासों के पात्र उपनिवेशवादी मानसिकता के हैं और उसी रूप में किपलिंग ने उनका चित्रण किया है। खुद किपलिंग एक सच्चे देशप्रेमी होने के नाते ब्रिटिश राज की भले ही जयगाथा गाते रहे हों, लेकिन उन्होंने कई बार ब्रिटिश राज के दरबारी कवि और नाइट की पदवी को ठुकराया। 18 जनवरी, 1936 को पेप्टिक अल्सर से किपलिंग का देहांत हुआ।

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्‍ट में 17 जनवरी, 2010 को 'विश्व के साहित्यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।

Monday, 28 December 2009

2009 के नौ नौजवान


गुजश्‍ता साल में राजस्थान के नौजवानों ने साहित्य, कला और संस्कृति की दुनिया में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस कदर नाम कमाया है कि आज की युवा पीढ़ी की प्रतिभा और कर्मशीलता देखकर हर किसी को नाज होता है। हमने राजस्थान के समूचे सांस्कृतिक परिदृश्‍य पर एक विहंगम दृष्टि डाली तो सुखद आश्‍चर्य हुआ कि साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में निरंतर नए लोग आ रहे हैं और पिछले कुछ सालों से सक्रिय संस्कृतिकर्मियों ने निरंतर उपस्थिति से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। गुजरते हुए 2009 के नौ युवा लेखक-कलाकारों का चयन करना खासा मुश्किल काम है। फिर भी हमने विभिन्न क्षेत्रों के वरिष्ठ संस्कृतिकर्मियों से बातचीत के आधार पर साल के नौ प्रतिबद्ध, समर्पित, सक्रिय और प्रतिभावान युवाओं का चयन किया है। 35 वर्ष से कम आयु के ऐसे नौजवान जिन्होंने इस वर्ष खास उपलब्धि हासिल की और अपनी प्रतिभा के दम पर सुनहरे भविष्य के संकेत दिए। इनके अतिरिक्त ऐसे युवा भी हैं, जिन्होंने अपनी सक्रियता से उम्मीदें जगाई हैं। इन सभी नौजवानों को सौ-सौ सलाम।

ग़ज़ल की दुनिया का नया सितारा: मोहम्मद वकील


टेलीविजन से सिनेमा तक की दुनिया में नाम कमा चुके युवा ग़ज़ल गायक मोहम्मद वकील इस बरस अपने नए एलबम ‘गुजारिश’ की वजह से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहे गए। इस एलबम की ‘स्क्रीन’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका ने प्रशंसा की। इस एलबम में मो. वकील ने संगीत के महान दिग्गज कलाकारों मसलन बेगम अख्तर, बड़े गुलाम अली खां, मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और जगजीत सिंह को आदरांजलि दी है। ग़ज़ल सम्राट उस्ताद अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन के इस प्रतिभावान शिष्य से संगीत की दुनिया को बहुत उम्मीदें हैं।

सितार का नया जादूगर: अंकित भट्ट


मशहूर सितारवादक पं. शशिमोहन भट्ट के पोते युवा सितारवादक अंकित भट्ट ने इस साल की शुरुआत ही अहमदाबाद के प्रसिद्ध सप्तक समारोह में सितारवादन से की। संगीत में सर्वोच्च अंकों के साथ एम.ए. करने पर अंकित को राज्यपाल ने सम्मानित किया। गोवा, मुंबई, दिल्ली, जयपुर और देश के विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगीत सम्मेलनों और जुगलबंदी कार्यक्रमों में शिरकत कर यह सिद्ध किया कि वह सितार का नया जादूगर है। इसी बरस अंकित को मुंबई का प्रसिद्ध सुरमणि सम्मान प्रदान किया गया।

साहित्य का उभरता नक्षत्र: राहुल सोनी


लेखक, अनुवादक और संपादक राहुल सोनी भारत की पहली पांडुलिपि संपादन सेवा ‘राइटर्स साइड’ के संपादक हैं। इस साल उनके द्वारा संपादित पुस्तक  मैन एशियन लिटरेरी अवार्ड के लिए नामांकित हुई। राहुल ने केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, उदय प्रकाश, उदयन वाजपेयी, गगन गिल आदि बहुत से हिंदी साहित्यकारों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। इन दिनों वे धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’, गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘तिरोहित’ और श्रीकांत वर्मा के काव्य संग्रह ‘मगध’ का अंग्रेजी में अनुवाद कर रहे हैं।  राहुल द्वारा संपादित पुस्तकें पेंगुइन, हे हाउस, सेडार, हार्पर कोलिंस, यात्रा बुक्स आदि प्रतिष्ठित प्रकाशनों से प्रकाशित हुई हैं। इसी बरस राहुल को प्रतिष्ठित ईस्‍ट एंग्लिया विश्‍वविद्यालय, ब्रिटेन ने वर्ष 2010 के लिए चार्ल्‍स वालेस फेलोशिप प्रदान करने की घोषणा की है। राहुल हिंदी की पहली द्विभाषी वेब पत्रिका 'प्रतिलिपि' के, गिरिराज किराडू के साथ संस्‍थापक-संपादक हैं।

रंगमंच की नई प्रतिभा: दिनकर शर्मा


साबिर खान जैसे समर्पित वरिष्ठ रंगकर्मी के हाथों ढलकर जयपुर के जिन युवा कलाकारों ने इस वर्ष अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया उनमें दिनकर शर्मा बेहद प्रतिभाशाली हैं। दर्जनों नाटकों में अभिनय कर चुके दिनकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दौलत वैद के साथ ‘बेहद नफरत के दिनों में’ नाटक में निर्देशन आदि में सहयोग किया। इसके अतिरिक्त दो नाट्य कार्यशालाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस वर्ष भारत सरकार के कला व संस्कृति मंत्रालय की प्रतिष्ठित जूनियर छात्रवृत्ति के लिए दिनकर शर्मा का चयन किया गया। इस छात्रवृत्ति के तहत दिनकर स्तानिस्लाव्स्की और बर्तोल्त ब्रेख्त की अभिनय दृष्टि का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे। राजस्थान के रंगमंच को इस युवा कलाकार से बहुत आशाएं हैं।

फिल्म, कला और साहित्य की त्रिवेणी: निधि सक्सेना


कविता से शुरुआत कर चित्रकला और मूर्तिकला से होते हुए निधि सक्सेना ने डाक्यूमेंट्री और धारावाहिकों की दुनिया में इस साल पदार्पण किया है। कोई एक दर्जन से अधिक डाक्यूमेंट्री फिल्में एक साल में बनाने वाली निधि ने इन फिल्मों में लेखन और निर्देशन भी स्वयं किया है। इस बरस के आखिर में निधि ने राजस्थान के शास्त्रीय संगीत को लेकर जयपुर दूरदर्शन पर अपना पहला स्वतंत्र धारावाहिक ‘राग रेगिस्तानी’ शुरु किया है, जिसमें दिग्गज संगीतकारों के साथ निधि ने उनकी कला को अंतरंगता से पहचानने और सामने लाने की कोशिश की है। इसके अलावा विभिन्न कला प्रदर्शनियों में निधि के चित्र और मूर्तिशिल्प भी इस वर्ष प्रदर्षित हुए और पर्याप्त सराहे गए।

राजस्थानी का कल्पनाशील कवि: मदन गोपाल लढ़ा


राजस्थानी भाषा में ‘म्हारी पांती री चिंतावां’ कविता संग्रह से चर्चा में आए युवा कवि और कथाकार मदन गोपाल लढ़ा लगातार सक्रिय हैं। हिंदी और गुजराती में उन्होंने काफी अनुवाद किए हैं। पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होकर पाठकों और आलोचकों का ध्यान खींचती रही हैं। मनुज देपावत, भत्तमाल जोशी और चंद्रसिंह बिरकाळी सम्मान से सम्मानित इस प्रतिभावान युवा राजस्थानी लेखक को इस साल कमला गोईन्का फाउण्डेशन, मुंबई की ओर से प्रतिष्ठित किशोर कल्पनाकांत सम्मान से नवाजा गया।

भवाई में समाई निष्ठा


राजस्थानी लोक नृत्यों की प्रवीण युवा नृत्यांगना निष्ठा अग्रवाल ने भवाई जैसे मुश्किल नृत्य को इस कदर साध लिया है कि भारत सरकार के कला व संस्कृति मंत्रालय की ओर से इस वर्ष निष्ठा को राष्ट्रीय युवा छात्रवृत्ति के लिए चुना गया। देश भर में निष्ठा ने भवाई के सैंकडों कार्यक्रम प्रस्तुत कर राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की है। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, पंजाब और राजस्थान सरकार द्वारा सम्मानित इस युवा नृत्यांगना ने राजस्थानी लोक नृत्य को नए आयाम दिए हैं और उम्मीद जगाई है कि उनके रहते राजस्थानी लोक नृत्यों का भविष्य बहुत उज्ज्वल है।

आम आदमी का चितेरा: सोहन जाखड़


चित्रकला में राजस्थान के जिन युवा चित्रकारों ने इस साल सबसे ज्यादा सक्रिय रहकर अपनी प्रतिभा और लगन से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई उनमें सोहन जाखड़ का नाम इसलिए भी लिया जाना चाहिए कि इस युवा कलाकार के चित्र राष्ट्रीय ही नहीं अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित हुए। एक बरस में छह प्रदर्शनियां और विभिन्न कला शिविरों में शिरकत करने वाले सोहन की चित्रकृति को सूदबी जैसी प्रतिष्ठित संस्था ने न्यूयार्क में नीलामी के लिए चुना। इसी साल उनके चित्रों की दिल्ली, मुंबई और सिंगापुर में प्रदर्शनियां हुईं। सोहन के चित्रों में आम भारतीय आदमी के संघर्षपूर्ण जीवन को गहरी संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया गया है, इसीलिए समकालीन कला में उनकी अलग पहचान बनी है।

गहरे बिंबों का सर्जक: राजेन्‍द्र प्रसाद


बहुत से युवा चित्रकार प्रारंभ से ही अपनी अलग सोच और कल्पनाशीलता से एक खास पहचान बना लेते हैं। ऐसे कलाकारों में राजेन्‍द्र प्रसाद भी हैं, जिनके चित्र उनसे बेहद उम्मीदें जगाते हैं। राजेन्‍द्र का काम राजस्थान में उस परंपरा का काम है, जिसे पी.एन. चोयल जैसे महान चित्रकारों ने विकसित किया। लोक में बिखरे चित्राम और बिंबों को राजेन्‍द्र ने बहुत खूबसूरती के साथ पकड़ा है। इस साल राजेन्‍द्र ने जे.आर.एफ. में सफलता हासिल की और अनेक कला प्रदर्शनियों व शिविरों में भाग लेकर अपनी कला के प्रति बेहद आश्‍वस्त किया है। इस वर्ष राजेन्‍द्र को कला मेले में और एक पोस्टर प्रतियोगिता में भी पुरस्कृत किया गया।

इन कलाकारों और रचनाकारों के अलावा भी अनेक युवाओं ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई और अपनी सर्जनात्मकता से सबका ध्यान आकर्षित किया। संगीत की दुनिया में सलिल भट्ट को प्री ग्रैमी नोमिनेशन मिला, गायन में जयपुर के अल्लाह रक्खा, दिव्या शर्मा जांगिड़ व बीकानेर के समर्थ जाह्नवे, जोधपुर के दीपक क्षीरसागर गिटार वादन में, जयपुर के विनायक सेठ वायलिन में और विनायक शर्मा सितार में अपनी प्रतिभा से वर्षपर्यंत चर्चित रहे। चित्रकला में अमित शर्मा हारित, गौरी शंकर सोनी, हरि कुमावत, राम खिलाड़ी सैनी, आकाश चोयल, पवन शर्मा, अजय मिश्रा और बहुत से कलाकार हैं। साहित्य में गौरव सोलंकी,  पल्लव, मिहिर पण्ड्या और गिरिराज किराडू सरीखे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त लेखक हैं, जो निरंतर सक्रिय हैं। युवा कथाकार रामकुमार सिंह की दूसरी कहानी 'तुझे हम वली समझते, जो न बादाख्‍वार होता' संगमन-2009 में चर्चा के केंद्र में रही। साहित्‍य अकादमी से अब तक रिकॉर्ड सबसे कम उम्र में सम्‍मानित राजस्‍थानी कवयित्री संतोष मायामोहन का दूसरा काव्‍य संग्रह 'जळविरह' आया। रंगमंच के क्षेत्र में जयपुर की सारिका पारीक और धौलपुर के नरेश पाल सिंह चौहान ने दूसरे प्रयास में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिला पाया। वहीं अभिषेक गोस्‍वामी और गगन मिश्रा ने थिएटर इन एजूकेशन के माध्यम से नई पीढ़ी में रंगमंच को लोकप्रिय बनाने में खासे सक्रिय रहे। उर्दू साहित्य के लिहाज से ‘आबशार’ की गुलजार के साथ युवा शायरों के साथ वर्कशॉप से साल का आगाज हुआ, लेकिन नए शायरों में आदिल रज़ा मंसूरी और ब्रजेश अंबर के अलावा किसी ने प्रभावित नहीं किया।