Monday 12 April 2010

समाज के लिए समर्पित लेखिका - पर्ल. एस. बक

अमेरिकी साहित्य के इतिहास में पर्ल एस. बक पहली महिला रचनाकार हैं, जिन्हें साहित्य में १९३८ में नोबल पुरस्कार मिला। अमेरिका में ईसाई मिशनरी परिवार में १८९२ में जन्मी पर्ल के जीवन का अधिकांश चीन में बीता। जन्म के बाद ही वे माता-पिता के साथ चीन आ गईं थीं। घर पर साहित्य की शौकीन मां ने अंग्रेजी और चीनी शिक्षक ने चीनी भाषा सिखाई। उस वक्त के चीन में जबर्दस्त उथलपुथल का दौर चल रहा था, इसलिए पर्ल के परिवार को कई बार जान बचाने के लिए कई जगह शरण लेनी पड़ी। पंद्रह साल की उम्र में पर्ल को शंघाई के एक बोर्डिंग स्कूल में विधिवत शिक्षा के लिए दाखिल करा दिया गया। उच्च शिक्षा के लिए उन्हें अमेरिका भेज दिया गया, जहां पर्ल ने मनोविज्ञान का अध्ययन किया। १९१४ में पर्ल वापस चीन आईं और स्कूल में अंग्रेजी पढाने लगीं। कृषि विज्ञानी डा. जॉन लॉसिंग बक से विवाह के बाद वे पति के साथ चीन के सुदूर स्थलों की यात्रा करती रहीं, जो कालांतर में उनके साहित्य में बेहद खूबसूरत ढंग से रूपायित हुआ। १९२४ में पर्ल अपनी मंदबुद्धि बेटी के इलाज के लिए अमेरिका पहुंची और बेटी की देखभाल के साथ साहित्य में एम.ए. भी करने लगीं।
१९२७ में वो वापस चीन लौट आईं, लेकिन चीन के गृहयुद्ध के हालात में बक परिवार को भागकर जापान में शरण लेनी पड़ीं। इसके बाद पर्ल कभी वापस चीन नहीं गईं। पर्ल इस बीच एशियाई समाज के विभिन्न पहलुओं को लेकर पत्र-पत्रिकाओं में लिखती रहीं। उनका यह लेखन आत्मकथात्मक था, जिसमें वे अपने निजी अनुभवों को चीन के बाहर की दुनिया के लोगों के साथ साझा करती थीं। एशिया मैगजीन  में उनकी कहानी 'ए चाइनीज वूमैन स्पीक्स' को व्यापक सराहना मिली। पर्ल ने चीनी साहित्य का विशेष रूप से प्राचीन चीनी साहित्य का गहन अध्ययन किया था। इसीलिए जब उनका पहला उपन्यास 'ईस्ट विंड : वेस्ट विंड' प्रकाशित हुआ तो पाठकों और आलोचकों का उनकी ओर ध्यान गया। इस उपन्यास में पर्ल ने एक चीनी महिला क्वेन लाई के जीचन संघर्ष का मार्मिक विवरण प्रस्तुत किया। लेकिन जब १९३१ में 'गुड अर्थ' प्रकाशित हुआ तो पर्ल को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। इस उपन्यास में पर्ल ने एक ऐसे चीनी किसान का जीवनवृत्त प्रस्तुत किया जो अपनी धरती से, अपने खेतों से, अपनी आबोहवा से गहरा प्रेम करता है। उसके पास पीढियों से संचित ज्ञान की संपदा है और वह अपनी ही दुनिया में मगन है और तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी जीने के लिए संघर्ष करता रहता है। पर्ल ने चीनी साहित्य की वर्णनशैली और बाइबिल जैसी गद्यात्मकता से अपने पहले उपन्यास को इतनी खूबसूरती से रचा कि पूरी दुनिया का इस पर ध्यान गया। इस उपन्यास की लोकप्रियता को देखते हुए १९३७ में इरविंग टालबर्ग ने सिडनी फ्रेंकलिन के निर्देशन में इस पर अत्यंत विश्‍वसनीय फिल्म भी बनाई। फिल्म में अभिनेत्री लुई रेनर को मुख्‍य भूमिका के लिए ऑस्कर मिला। इस उपन्यास की प्रकाशन के पहले वर्ष में १८ लाख प्रतियां बिकीं और दुनिया की तीस से अधिक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ। १९३२ में इस उपन्यास पर पर्ल को पुलित्जर पुरस्कार मिला।
'गुड अर्थ' की अपार लोकप्रियता ने पर्ल को प्रेरित किया तो इसके दो और भाग लिखे गए। १९३२ में 'संस' और १९३५ में 'ए हाउस डिवाइडेड' प्रकाशित हुए। इन दोनों उपन्यासों में पर्ल ने किसान की अगली पीढ़ी का वृत्तांत प्रस्तुत किया। इस उपन्यास त्रयी के साथ लिखे गए 'मदर' उपन्यास में पर्ल ने चीनी मां के आत्मबलिदान और संघर्ष की अत्यंत करुण कथा लिखी है। इसे पर्ल के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है। पर्ल ने अपने पिता एब्सालोम की रचनात्मक जीवनी 'फाइटिंग एंजेल' में और मां कैरोलीन की जीवनी 'द एक्जाइल' में इतनी खूबसूरत किस्सागोई की शैली में प्रस्तुत की कि आलोचकों के मुताबिक ये क्लासिक जीवनियां हैं। पर्ल का १९३५ में अपने पति से तलाक हो गया और उन्होंने अपने प्रकाशक रिचर्ड वाल्श से विवाह कर लिया। १९३८ में नोबल पुरस्कार प्रदान करते समय पर्ल के साहित्य की प्रशंसा करते हुए कहा गया कि पर्ल के लेखन ने नस्ली सीमाओं के पार जाकर मानवीय संवेदनाओं और सहानुभूति का मार्ग प्रशस्त किया है। पर्ल एस. बक ने जीवन में करीब ८० पुस्तकें लिखीं, जिनमें कहानी, उपन्यास और जीवनी के अलावा आलोचना, संस्मरण, कविता, निबंध, बालसाहित्य की कई विधाओं की पुस्तकें शामिल हैं। पर्ल के लेखन के केंद्र में सिर्फ चीनी जनजीवन ही नहीं जापानी और अमेरिकी जनजीवन भी रहा। उन्होंने महिला अधिकार, एशियाई संस्कृति, मिशनरी जीवन, युद्ध, दत्तक और पारगमन नियमों को लेकर भी प्रचुर मात्रा में लिखा। १९४९ में पर्ल ने बच्चों को गोद लेने के तत्कालीन नियमों का विरोध किया और मिश्रित नस्ल के अनाथ बच्चों के लिए संघर्ष किया। पर्ल ने व्यक्तिगत प्रयासों से मिश्रित नस्ल के बच्चों को आश्रय देने के लिए दुनिया की पहली गोद लेने वाली संस्था 'वेलकम हाउस' प्रारंभ की। १९६४ में पर्ल ने एशियाई बच्चों की दयनीय दरिद्रता और असमानता को लेकर पर्ल एस. बक फाउण्डेशन की स्थापना की। इसके बाद विभिन्न एशियाई देशों में पर्ल ने अनाथालय और शिक्षण संस्थान खोले। समाज सेवा के साथ पर्ल का लेखन भी चलता रहा। पर्ल ने अनेक चीनी रचनाकारों की कृतियों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। अपने अंतिम समय में पर्ल 'द गुड अर्थ' का चौथा खण्ड लिख रही थीं जो पूरा ना हो सका। ६ मार्च, १९७३ को ८० साल की उम्र में फेंफडों की बीमारी से पर्ल का निधन हुआ।

4 comments:

  1. शानदार लेख है...
    यक़ीनन, महिलाओं को इससे प्रेरणा मिलेगी...

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  2. साहित्य में नोबल पुरस्कार विजेता का समाजसेवा में योगदान का परिचय के लिए आपका बहुत आभार ...!!

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  3. बहुत ही आवश्यक जानकारी के लिए आभार
    पर्ल एस. बक की एक कहानी का हिन्दी अनुवाद आप यहाँ देख सकते हैं:
    http://www.srijangatha.com/Bhashantar1-13Mar_2k10

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