Sunday 18 April 2010

मेरी कविताओं का लक्ष्‍य सामाजिक है - हेमंत शेष

के. के. बिरला फाउण्‍डेशन की ओर से इस वर्ष का बिहारी पुरस्कार हिंदी के विशिष्ट कवि हेमंत शेष को घोषित किया गया है। पिछले दिनों दैनिक हिंदुस्‍तान, दिल्‍ली से संदेश आया कि आप हेमंत जी पर लेख लिखें या उनसे बातचीत कर हमें भेजें। मैंने तय किया कि किताबें पढ़कर लिखने के बजाय बातचीत करना बेहतर रहेगा। हेमंत शेष जैसे कवि से बातें कर उनकी कविता और काव्‍य धारणाओं को लेकर बहुत से संशय लेखक समाज में हैं, शायद उनमें से कुछ का निराकरण हो। यही सोचकर मैं हेमंत शेष से बातचीत करने उनके घर चला गया। यहां प्रस्‍तुत बातचीत का एक हिस्‍सा दैनिक हिंदुस्‍तान के रविवारीय में 18 अप्रेल, 2010 को प्रकाशित हुआ है। टेपरिकॉर्डर से मैंने फिलहाल वही हिस्‍से चुने हैं जो अखबार के लिए उपयुक्‍त हो सकते थे। इस बातचीत को और विस्‍तार दिया जाएगा, यह मेरी ही नहीं खुद हेमंत जी की भी इच्‍छा है कि और मुद्दों पर उनसे बेबाक बातचीत की जाए। यहां प्रस्‍तुत इस साक्षात्‍कार में मैंने सायास अपने सवालों को छोटा रखा है, जब कवि खुद अपनी बात कह रहा हो तो बात करने वाले को मौन रहकर उसकी बात ध्‍यान से सुननी चाहिए। जब विस्‍तार से इस वार्तालाप को लिखूंगा, तब सवाल भी विस्‍तृत होंगे और उन पर अपनी राय इत्‍यादि भी। बहरहाल, प्रस्‍तुत है वार्तालाप के प्रमुख अंश।

बचपन में आपको रचनात्मकता के संस्कार किस रूप में मिले?

मेरा जन्म साहित्यिक संस्कारों वाले परिवार में हुआ। मेरी मां संस्कृत और समाजशास्त्र में एम.ए. हैं और कई वर्ष तक उन्होंने जयपुर के एल.बी.एस. कॉलेज में पढ़ाया भी है। मेरे पिता को कहानी आलोचना के लिए 'कहानी दर्शन' पुस्तक पर राज. साहित्य अकादमी का पहला पुरस्कार मिला। मेरा बचपन ननिहाल में बीता। मेरे मामा कलानाथ शास्त्री संस्कृत, हिंदी और कई भाषाओं के विद्वान हैं, उनसे मिलने बहुत से विद्वान रचनाकार आया करते थे। वहां हम बच्चों के खेल भी अंत्याक्षरी और समस्यापूर्ति जैसे होते थे। तो उस वातावरण में एक रचनात्मक आधार मिला।

लेकिन वह परिवार तो शास्त्रीय परंपराओं वाले साहित्य का परिवार रहा है। वहां से आप आधुनिक साहित्य की तरफ कैसे आए?

मैं सातवीं या आठवीं में पढ़ता था। उस वक्त हरीश भादानी जी ने 'वातायन' में मेरी पहली कहानी प्रकाद्गिात की थी, 'सलीब पर टंगा शहर'। उस वक्त लोगों ने कहा कि यह कैसी कहानी है, क्योंकि उस कहानी का शीर्षक ही नहीं, विषयवस्तु और शिल्प भी अलग था। फिर मैंने दो-चार कहानियां और लिखीं। मुझे लगा कि कहानी की जगह कविता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, तो १९६८ से १९७० तक मैंने अपने आपको पूरी तरह कविता के लिए समर्पित कर दिया। उस दौरान उत्साह बढाने वाली कई घटनाएं घटीं। मेरी पहली कविता 'अपरंच' शीर्षक से, १९७० में बद्री विशाल पित्ती के संपादन में 'कल्पना' में छपी। इसी साल मेरी तीन कविताएं धर्मवीर भारती जी ने 'धर्मयुग' में प्रकाद्गिात की। इसके बाद प्रकाश जैन ने 'लहर' में मेरी तीसरी कविता छापी। इन तीन पत्रिकाओं में छपने का सीधा मतलब था कि साहित्य की दुनिया में आपको प्रवेश मिल गया है। इसके बाद तो 'बिंदु' में नंद चतुर्वेदी ने छापा और उस समय की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित होने लगीं। शुरु-शुरु में प्रकाशन को लेकर बहुत उत्साह था, जो क्रमश: कम होता गया। इस क्रम में किताबें भी प्रकाशित होती रहीं।

मैं भी आपकी तरह कहानी से कविता की ओर आया था। मुझे लगता था कि कहानी में कविता से ज्यादा मेहनत करनी पड ती है। अब तो लगता है दोनों में ही मेहनत बराबर लगती है। लेकिन कहानी से कविता की तरफ आने से आपकी कविताओं में एक चीज जो साफ दिखाई देती है, और खास तौर पर लंबी कविताओं में, वह यह कि यहां कथा तत्व प्रचुर मात्रा में हैं।
श्रम वाली आपकी बात सही है, दोनों समान श्रम मांगती हैं। लेकिन आप देखेंगे कि बहुत से श्रेष्ठ गद्यकारों के यहां आपको गद्य में काव्यात्मकता दिखाई देती है, जैसे निर्मल वर्मा, ज्ञानरंजन और विनोद कुमार शुक्ल के यहां। विधाओं में इस किस्म की आवाजाही चलती रहती है। लेकिन मुझे लगता है कि गद्य के लिए जैसा मन चाहिए, जैसी वस्तुगत निरपेक्ष दृष्टि चाहिए, वैज्ञानिक दृष्टि और तटस्थता चाहिए, अगर आपका मन वैसा नहीं है, जैसा गद्यकार का होता है तो आपको कविता लिखनी चाहिए। नंद चतुर्वेदी कहते हैं कि गद्य में विनोद होना चाहिए, सरसता होनी चाहिए, निरा शुष्क गद्य नहीं होना चाहिए। तो मुझे लगता है कि हम अच्छा गद्यकार बनना चाहते हैं, लेकिन बनते नहीं हैं क्योंकि वह हमारा रास्ता नहीं है। मुझे लगता है कि स्वभाव की अनुकूलता के कारण ही आप विधा का चुनाव करते हैं। कविता बहुत संश्लिष्ट विधा है, जबकि गद्य में बात अलग होती है। जैसा कि ऑक्टोविया पाज कहते हैं कि कविता दो पंक्तियों के बीच है, पंक्तियों में नहीं।

आप हिंदी में लंबी कविताएं लिखने वाले विरल कवियों में हैं। हमारे यहां विजेंद्र और सवाई सिंह शेखावत हैं, जो आपकी तरह लंबी कविताएं लिखते हैं। आपके यहां तो एक ही विषय पर केंद्रित कविता ही पूरी किताब की शक्ल में है।

जब आपको लगता है कि समाज के विभिन्न पहलुओं पर एक ही विषय के इर्द-गिर्द टिप्पणियां करनी हैं तभी लंबी कविता संभव होती है। 'जारी इतिहास के विरुद्ध' और 'कृपया अन्यथा न लें' कविताओं में आप देख सकते हैं कि भाषा के स्तर पर, शिल्प के स्तर पर बहुत सारे प्रयोग हैं, लेकिन वे सब विषय को गहराई देने के लिए, उसे घनीभूत करने के लिए हैं। लंबी कविता आपको चुनौती देती है कि आप कितने स्तरों पर रचाव कर सकते हैं और निरंतरता बना रख सकते हैं।

आपके पुरस्कृत संग्रह 'जगह जैसी जगह' में भी और इससे पूर्व के संग्रहों में भी एक चीज साफ दिखाई देती है और वो यह कि आपकी कविताओं में स्मृतियों का प्रत्याख्‍यान है।

सही कहा आपने, यह मेरी बरसों की सायास कोशिश का परिणाम है। एक रचनाकार का अपने देश-काल या समय के साथ क्या संबंध होना चाहिए। हम सब जानते हैं कि आप समय को पीछे नहीं ले जा सकते। तो दो-तीन तरह का संबंध आपकी भाषा से उस काल-चेतना का होता है। जो चला गया उसके ना लौट सकने का अवसाद और उसे पुनर्जीवित ना कर सकने की आपकी असामर्थ्य। जो कुछ हुआ, उसमें आपकी कितनी भूमिका है या नहीं, वह आप उस कालखण्ड से बाहर आकर ही देख पाते हैं। काल एक वृहत्तर सत्ता है, समय उसकी बहुत छोटी इकाई है। तत्व विज्ञान और खगोल भौतिकी के बहुत से ऐसे पहलू हैं, जो एक कवि को आकर्षित करते हैं। मेरी कविताओं में बहुधा स्मृतियां एक तरह की दार्शनिक प्रद्गनाकुलता को प्रस्तुत करती हैं। लेकिन मेरी कविताओं में आईं स्मृतियां कोई व्यतीत राग नहीं हैं, एक पूरा समाज और कालखण्ड उनके साथ जुड़ा है।

आपके इस पुरस्कृत संगह में एक शानदार कविता है 'एक चिड़िया का कंकाल', मेरे खयाल से आपकी सर्वश्रेष्ठ कविताओं में से एक।

हां, यह वास्तविक कविता है। उस वक्त मैं भरतपुर में था, तब घना में रोज जाना होता था। वो अद्‌भृत जगह है। मुझे लगता है कि जब १६ वर्ग किमी में इतनी तरह के पंखों वाले, इतनी तरह की विशेषताओं वाले, इतनी सारी प्रजातियों के पक्षी एक साथ रह सकते हैं तो मनुष्य क्यों नहीं रह सकते? इतनी तरह के धर्म-जाति और संप्रदायों में बंटा समाज एक साथ क्यों नहीं रह सकता। वहां रहकर मुझे लगा, मनुष्य समाज को बहुत कुछ सीखना है चिडियों के समाज से। मैंने उस चिडिया का कंकाल देखकर सोचा कि इस दृश्‍य को क्या तत्काल किसी वृहत्तर संदर्भ से जोडा जा सकता है। आम तौर पर लोगों की शिकायत रहती है कि आपकी कविता में समाज नहीं है, मुझे यह कहने का अवसर दीजिए कि जो है, उसे देखा जाना चाहिए, नहीं तो बहुत सी चीजें हो सकती हैं। संसार में किसी भाषा में कोई ऐसा कवि नहीं हुआ, जिसने शोषण, अत्याचार या पूंजीवाद के पक्ष में लिखा हो। स्वभावतः प्रत्येक कवि प्रगतिशील होता है क्योंकि कवि होना ही प्रगतिशील होना है।

आपकी कविता में कहीं-कहीं निरंतर धार्मिक पाखण्ड का एक विरोध या उपहास दिखाई देता है, 'नींद में मोहनजोदडो' में एक ऐसी ही कविता है 'क्या न होगा धर्मग्रंथों में?' आप धर्म के प्रति बेहद निर्मम दृष्टि रखते हुए उसकी आलोचना करते हैं?

धर्मग्रंथों या धर्म के प्रति आपकी अगर आलोचनात्मक दृष्टि हो तो आप दूसरी बहुत-सी चीजों से बच सकते हैं। धर्म एक बहुत बडी संस्था है और अपने समय के प्रति सजग कवि को उसकी रूढियों का विरोध करना ही चाहिए। मुझे लगता है कि इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया, इसलिए मुझे कह देना चाहिए कि मेरी नितांत व्यक्तिगत कविताएं भी अंततः सामाजिक ही हैं और मेरी तमाम कविताओं का लक्ष्य सामाजिक ही है। मेरी प्रत्येक कविता समाज के किसी बडे सत्य पर ही जाकर समाप्त होती है।

आपने कविताओं के साथ चित्र भी बनाए हैं, संगीत में भी आपकी दिलचस्पी रही है, इस आवाजाही को क्या कहेंगे? आपकी कविताओं में लेकिन आपकी तरह के बहुआयामी रूचियों वो कवियों की तरह संगीत सुनते हुए या चित्र देखते हुए जैसी कविताएं नहीं मिलेंगी।

मैं समझता हूं कि जो कुछ अमूर्त है, शब्द के माध्यम से आप उसी का तो स्थापत्य कर रहे हैं। हमारे यहां कला में कैमरे के आविष्कार के बाद यथार्थवादी चित्रकला समाप्त हो गई है। चित्रकला में कहते हैं कि सबसे खराब चित्र वह है जिसमें बने फूल को देखकर तितली उस पर बैठ जाए। मैंने दौसा की चांद बावड़ी को जब पहली बार देखा तो वो अद्‌भुत अनुभव था, लेकिन मैं उस पर तत्काल कुछ नहीं कर सका। बहुत दिनों बाद उसको लेकर चित्र बनाए। उन चित्रों में आप एकदम नहीं कह सकते कि यह चांद बावडी है, लेकिन उसकी ज्यामितीय संरचना और मानसपटल पर पडे प्रभाव को आप उनमें देख सकते हैं। मुझे लगता है कि चित्रों के शीर्षक नहीं देने चाहिएं, क्योंकि वो प्रेक्षक की विचार दृष्टि को सीमित कर देते हैं। चित्रों में अमूर्तन प्रेक्षक के लिए ठीक है किंतु कविता में इतना अमूर्तन नहीं होना चाहिए कि जो कुछ आप कहना चाहते हैं वह पाठक तक पहुंचे ही नहीं। जब मैं कविता नहीं लिख रहा होता हूं तो चित्र बनाता हूं और फिर कविता में लौट आता हूं। मेरी रचनात्मकता के लिए कविता, चित्रकला और संगीत एक दूसरे का विस्तार ही है। ये सब आपने आप में एक संपूर्ण संसार है और इनमें खोना आनंददायक है। संगीत सुनने की और चित्र देखने की चीज है, उस पर कविता क्यों लिखी जाए, मौन क्यों न रहा जाए।

आपकी कविताओं में सचिवालय, विकास प्राधिकरण और प्रधानमंत्री आते हैं और एक राजनैतिक वक्तव्य भी आप इनके माध्यम से देते हैं।

सचिवालय अपने आप में एक चरित्र है और प्रधानमंत्री भी और नगर नियोजक संस्था भी। अब पता नहीं यह कविता कितनी कविता है लेकिन 'नाला अमानीशाह' कविता में आप देखेंगे कि कैसे एक शहर को नगर विकास प्राधिकरण नष्ट कर रहा है। अखबार में इसके प्रकाशन के बाद प्राधिकरण के आयुक्त मेरे पास आए और बोले आपने तो एक कविता में हम सबको लपेट लिया। मैं उस वक्त वहीं कार्यरत था, मैंने कहा, हां आप लोगों ने उस नाले को खत्म कर दिया है जो मेरे लिए इस नगर की शानदार विरासत है।

आप अपनी पीढ़ी के कवियों से अलग मिजाज की कविताएं लिखते रहे, समकालीनता के आतंक से लगभग मुक्त रह कर लिखना कैसे संभव हुआ?

यह बहुत मुश्किल होता है, लेकिन मुझे इसका फायदा भी हुआ कि मैं अपने मन की कविताएं लिख सका। धारा के विरुद्ध लिखना आसान नहीं होता, इसके नुकसान भी होते हैं, लेकिन अंततः आप अपना काम कर लेते हैं। मैं सबको बराबर पढता रहा हूं, लेकिन मेलजोल से बचता रहा हूं। मुझे लगता रहा कि कहीं जाकर समय खराब करने के बजाय अपने अध्ययन, मनन और सृजन पर समय लगाया जाए। मैं अपने समय के सभी लेखकों को बहुत आलोचनात्मक दृष्टि से गहराई से पढता हूं, हालांकि इसको जाहिर कम करता हूं, शायद लोग इस वजह से नाराज भी होते होंगे।

कविता के लिए आपको इससे पहले भी कोई सम्मान पुरस्कार मिला?

नहीं, मुझे तो आश्‍चर्य भी हुआ कि यह पुरस्‍कार  कैसे घोषित हुआ? हिंदी में आजकल इतने पुरस्कार हो गए हैं कि किसी को नहीं मिले तो अचरज होता है। लेकिन मुझे आज तक कोई पुरस्कार नहीं मिला। राज. साहित्य अकादमी का भी नहीं, खैर वो तो मुझे लेखक भी नहीं मानते।

प्रशासनिक सेवा के साथ कवि मन को बनाए रखना कैसे संभव कर पाए? लोगों के साथ आपका व्यवहार कैसा रहता है?

मुझे प्रशासनिक सेवा में आने का बहुत फायदा भी हुआ। इतनी तरह के झूठ, छल, छद्‌म, अदालतें, झूठी गवाहियां देखीं हैं कि समाज को व्यापक और बड़े रूप में देखना संभव हुआ। साधारण मनुष्य होकर आप यह सब नहीं देख सकते। कवि और प्रशासनिक अधिकारी होने का लाभ यह है कि किसी गरीब, वंचित, दलित, मजदूर, किसान या सर्वहारा की नियमों के अंतर्गत जितनी मदद कर सकते हैं, वो संहज ढंग से हो सकता है। कोई लाचार बडी दूर चलकर आपसे किसी आस में मिलने आता है, तो उसकी आप ठीक से बात सुन लें, इसी से वह संतुष्ट हो जाता है, नियमानुसार मदद कर दें तो हर्ज ही क्या है, आखिर आप इसी के लिए तो बैठे हैं। किसी अन्य सेवा में होता तो शायद मैं इतना कुछ नहीं कर पाता, जितना यथासंभव कर पाया हूं।

14 comments:

  1. यह बातचीत ही ठीक रहती है शायद...
    कविताओं से इतर...व्यक्तित्व को जानने समझने में...

    बेहतर...

    ReplyDelete
  2. आज सुबह ही हिन्दुस्तान मे ये साक्षात्कार पढा था बाकी विस्तृत जानकारी यहाँ मिल गयी…………………हेमंत जी को पुरस्कार की बहुत बहुत बधाई।

    ReplyDelete
  3. bahut khub


    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

    ReplyDelete
  4. sunda....
    हेमंत जी को पुरस्कार की बहुत बहुत बधाई।

    ReplyDelete
  5. हाँ यही तो आया है आज !!!!!!! बधाई ।

    ReplyDelete
  6. bhai prem chand gandhi ji,
    Ganganagar se jane ke bad aadrniy hemant shesh ji se milne man karta rehta tha lekin awsar hi nahin mila.ve prashasnik adhikari ke roop me vyast or main adhikariyon ke adhinast.khar!
    Is sakshatkar se milane jaisa kam kar diya aap ne.aapko sadhuwad!hemant ji ki bewak baton se aanand aaya.
    aap bhi jordar cheej ho!badhai ho!

    ReplyDelete
  7. Hemant shesh ko badhai. Ye such hai ki hemant kabhi purskaron ke peechhe nahi bhage. kuchh kavi apne ko kavita se sidhh karate hai ,kuchh purskaron se.

    ReplyDelete
  8. Badhai... Hemant ji ko puruskar ki...aapko batcheet main Dil kholkar kahlvane ke liye...

    ReplyDelete
  9. इतनी विस्तृत वार्ता के लिए आभार..हेमंत जी कि कविताएं छोटे से चंदोवे मे आकाश बांधने जैसी होती हैं..और सामाजिक सत्य को कविता के माध्यम से पाने की उनकी कही गयी उक्त सर्वथा सटीक बनती है..

    ReplyDelete
  10. हेमंत जी को पुरस्कार की बहुत बधाई ...प्रशासनिक सेवाओं में रहते हुए कवि मन को बचाए रखना जिगर की बात है ...मगर यह भी सही है कि इन सेवाओं के तीखे अनुभव संवेदनशील व्यक्ति को सामाजिक सरोकार से जोड़े रखते हैं ...कविता के माध्यम से भी ...

    ReplyDelete
  11. आज इस बातचीत को तसल्ली से पढ़ा. आपने काफी कुछ महत्वपूर्ण कहलवा लिया है हेमंत जी से. बधाई! मुझे तो इस बातचीत के अगले/विस्तृत अंश का इंतज़ार है.

    ReplyDelete
  12. अर्थपूर्ण बातचीत के लिए बधाई!

    ReplyDelete

Indic Transliteration