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Tuesday, 1 February 2011

गुलाबी नगरी में लेखकों का मेला

जयपुर में साहित्य का महाकुंभ इस बार छठे वर्ष में प्रवेश कर भारतीय ही नहीं वैश्विक क्षितिज पर एक नई पहचान छोड़ गया, जिसमें साल दर साल पर्यटन नगरी जयपुर की पहचान साहित्य और संस्कृति के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में बनती दिखाई देती है। 21 जनवरी, 2011 की सुबह पारंपरिक वाद्य यंत्रों के तुमुल नाद के साथ आरंभ हुए लिटरेचर फेस्टिवल का आगाज मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत, विद्वान राजनेता डा. कर्ण सिंह और संस्कृत के अमेरिकी विद्वान पद्मश्री डा. शेल्डेन पोलक ने किया। इसके बाद नोबेल पुरस्कार से सम्मानित तुर्की के विश्वप्रसिद्ध उपन्यासकार ओरहान पामुक से खुले सत्र में संवाद हुआ। युवा लेखक चंद्रहास चौधुरी के साथ संवाद में ओरहान पामुक ने कहा कि पूरी दुनिया में लोगों के दिल एक जैसे हैं, मन एक जैसे हैं, बस सांस्कृतिक भिन्नता और रहन-सहन की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए दुनिया की किसी भी भाषा में लिखा जाने वाला साहित्य लोगों के मन को छूता है क्योंकि उन्हें अपने आसपास जैसी एक दूसरी दुनिया देखने को मिलती है। पामुक ने कहा कि भारत की पारंपरिक चिंतन प्रणाली में बहुत कुछ ऐसा है जो लोगों को अपने समय की सचाइयों को नए ढंग से देखकर लिखने के लिए प्रेरित कर सकता है। पामुक ने ‘आर्ट आफ नावल’ पर बात करते हुए कहा कि लेखक की अपनी राजनैतिक समझ होती है जो उसकी रचना प्रक्रिया में पक कर एक नए रूप में सामने आती है।

पांच दिन चले साहित्य के इस महाकुंभ में इस बार भारत सहित दुनिया के बीस से अधिक देशों के 220 से अधिक लेखकों ने भागीदारी की। दो बार के बुकर विजेता जे.एम. कोएट्जी के साथ अमेरिका से रिचर्ड फोर्ड और जेय मैकिरनरी जैसे अंग्रेजी के विख्यात लेखकों के साथ विक्रम सेठ, इरविन वेल्श और मोहसिन हामिद भी इस महामेले में शामिल हुए। इस सूची में वो लेखक, संपादक, लिटरेरी एजेंट और प्रकाशक शामिल नहीं हैं जो इस विशाल साहित्यिक मेले का लुत्फ उठाने दुनिया के कई कोनों से यहां पहुंचे। पिछले दो-तीन वर्षों से इस साहित्योत्सव में दक्षिण एशिया पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की गई है, जिसकी वजह से पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और भूटान जैसे पड़ौसी मुल्कों के लेखक भी इसमें शिरकत कर रहे हैं। इन प्रयासों से इस उपमहाद्वीप के देशों में सांस्कृतिक संबंध बेहतर बनाने में खासी सफलता मिल सकती है। पहली बार अफगानिस्तान के मशहूर लेखक अतीक रहीमी की इस उत्सव में भागीदारी हुई तो नेपाल से नाराण वागले और मंजुश्री थापा की आमद हुई।

हिंदी और भारतीय भाषाओं के लेखकों की इस उत्सव में भागीदारी साल दर साल बढती जा रही है। इस बार हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर कुछ नए विषयों पर कवि, लेखक और पत्रकारों के बीच रोचक और सार्थक संवाद हुए। जन्मशताब्दी वर्ष में अज्ञेय, नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह पर ओम थानवी, महेंद्र सुधांश और सुधीश पचौरी के बीच अविनाश के साथ संवाद हुआ। ‘‘ऐसी हिंदी कैसी हिंदी’’ पर मृणाल पांडे, रवीश कुमार, सुधीश पचौरी और प्रसून जोशी के बीच सत्‍यानंद निरूपम के संयोजन में रोमांचक बातचीत हुई। इसी तरह ‘नई भाषा नए तेवर’’ में गिरिराज किराडू, मोहल्ला लाइव के अविनाश और मनीषा पांडेय के बीच रवीश कुमार के साथ उत्तेजक चर्चा हुई। उर्दू जुबान को लेकर गीतकार जावेद अख्तर ने बहुत तल्खी के साथ कहा कि जुबानों का ताल्लुक मजहब से नहीं होता, इलाकों से होता है, लेकिन यह तकलीफ देने वाली बात है कि जहां उर्दू पढ़ने-लिखने वाले लोगों की कमी हो रही है, वहीं उर्दू सुनने वालों की तादाद में इजाफा हो रहा है। तेजी से लोकप्रिय हो रहे भोजपुरी सिनेमा पर भी एक सत्र में अविजीत घोष और कुमार शांता का अमिताव कुमार के साथ संवाद हुआ।

मराठी थिएटर, कश्मीर, रामायण और बुल्ले शाह पर भी कई सत्रों में खुलकर चर्चा हुई। बुल्ले शाह को भारत-पाक के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत आधार बताते हुए पत्रकार गायक मदनगोपाल ने कई नई जानकारियां देते हुए उनके कलाम को बेहद खूबसूरती से पेश किया। राजस्थान की राजधानी में आयोजित इस उत्सव में प्रदेश के हिंदी व राजस्थानी लेखकों की भी शिरकत रही। लेखकों में आपसी संवाद से पता चला कि इस बार राजस्थान से लेखकों का चयन अगर और बेहतर होता तो राजस्थान की समकालीन रचनाशीलता का एक बेहतर स्वरूप सामने लाया जा सकता था। स्थानीय लेखकों में इस बात को लेकर भी किंचित क्षोभ था कि इस बार आयोजन में उनकी भागीदारी के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी।

दक्षिण एशियाई साहित्य के लिए शुरु हुआ डीएससी पुरस्कार पहली बार अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार एच.एम. नकवी को हार्परकॉलिंस से प्रकाशित उपनके उपन्यास ‘होम बॉय’ के लिए प्रदान किया गया। दक्षिण एशिया के इस सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार में नकवी को पचास हजार अमेरिकी डॉलर और प्रतीक चिन्ह प्रदान किया गया। इस पुरस्कार के निर्णय से बहुत से लोगों को आश्‍चर्य भी हुआ, क्योंकि सब यही मान कर चल रहे थे कि यह पुरस्कार अमित चौधुरी को ‘द इम्मोर्टल्स’ पर दिया जाएगा। पुरस्कार के लिए चयनित अंतिम पांच लेखकों में अमित सबकी पहली पसंद थे।

पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए आयोजकों ने इस बार कार्यक्रम स्थल डिग्गी पैलेस का काफी विस्तार किया लेकिन आमजन और विद्यार्थियों की जबर्दस्त भागीदारी ने सिद्ध कर दिया कि इस साहित्योत्सव को लेकर उनमें बेहद उत्साह है और इसीलिए बावजूद तमाम इंतजामों के हर जगह लोगों की भीड़ छाई रही और लोगों को बैठने के लिए ही नहीं चलने के लिए भी जगह कम पड़ गई। अगली बार संभवतः आयोजकों को नई जगह तलाश करनी होगी, क्योंकि इसमें सिनेमा की मशहूर हस्तियों की उपस्थिति के वक्त तो बेकाबू भीड़ जमा हो जाती है, जो निश्चित रूप से आने वाले सालों में बढती जाएगी। साहित्य के इस विशाल मेले में प्रायोजकों की संख्या भी बढती जा रही है। साहित्य के नाम पर इस बढते हुए बाजारवाद को लेकर विगत तीन साल से जयपुर आ रहे एक अमेरिकी पत्रकार की टिप्पणी थी कि हर साल यह साहित्योत्सव व्यावसायिक अधिक होते जा रहा है जो बेहद चिंताजनक है।

यह रपट संपादित रूप में हिंदी आउटलुक के फरवरी 2011 अंक में प्रकाशित हुई है।



Sunday, 29 August 2010

अपनी ही धुन का कवि पाब्लो नेरूदा

भारतीय कविता पर जिन विदेशी साहित्यकारों का सबसे ज्यादा असर रहा है उनमें पाब्लो नेरूदा का नाम सबसे उपर है। नेरूदा उन गिने-चुने विदेशी लेखकों में हैं जिनकी जन्म शताब्दी भारत में व्यापक पैमाने पर मनाई गई और इस अवसर पर उन पर कई भाषाओं में केंद्रित पत्रिकाओं के विशेषांक और कई पुस्तकाकार प्रकाशन हुए। 12 जुलाई, 1904 को रेल्वे कर्मचारी पिता और अध्यापिका माता के यहां चिली में जन्मे पाब्लो नेरूदा की मां का जन्म के दो महीने बाद ही निमोनिया से निधन हो गया। पिता ने दूसरी शादी की और दो सौतेले भाई-बहनों के साथ नेरूदा का लालन-पालन हुआ। पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा लेखक-कवि बने, इसलिए उन्होंने प्रारंभ में नेरूदा के इस रुझान का विरोध भी किया, क्योंकि वे चाहते थे कि बेटा दुनियादार आदमी बने और लेखक-कवि बनने का ख्वाब छोड़ दे। लेकिन चिली के जंगलों में बालसुलभ कौतूहल में घंटों घूमने वाले और कई किस्म के कीट-पतंगों और फूल-पत्तियों का संग्रह करने वाले नेरूदा अपनी धुन के पक्के थे। फिर आरंभिक शिक्षा के दौरान नेरूदा को गेब्रिएला मिस्त्राल जैसी कवयित्री शिक्षिका का सान्निध्य मिला, जिन्हें आगे चल कर नोबल पुरस्कार मिला। नेरूदा की पहली कविता अपनी दिवंगत मां की स्मृति में थी, जो कहीं विस्मृत हो गई। पहली रचना तेरह बरस की उम्र में ही एक स्थानीय अखबार में एक निबंध ‘उत्साह और उद्यमशीलता’ के रूप में प्रकाशित हुई। पाब्लो नेरूदा का मूल नाम रिकार्डो एलीज़र नेफ्टाली रीस वाय बेसाआल्टो था। लेकिन पिता के डर से उन्होंने अपना नाम पाब्लो नेरूदा रख लिया जो दो महान लेखकों जेन नेरूदा और पॉल वरलाइन के मिश्रण से बना था। सोलह साल की उम्र तक आते-आते उनके बदले हुए नाम से रचनाएं प्रचुर मात्रा में पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। पढ़ने की नेरूदा को इतनी जबर्दस्त धुन थी कि कम उम्र में ही उन्होंने कस्बे की लाइब्रेरी की तमाम किताबें पढ़ डालीं।

सत्रह साल की आयु में वे चिली विश्‍वविद्यालय में फ्रेंच भाषा पढ़कर अध्यापक बनने का सपना लेकर गए। लेकिन जल्द ही यह सपना त्याग कर वे पूर्णकालिक कवि हो गए। उन्नीस की उम्र में पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ ‘बुक ऑफ ट्वाइलाइट्स’। अगले साल ‘ट्वेंटी लव पोएम्स एण्ड ए सोंग ऑफ डिस्पेयर’ ने पाब्लो की ख्याति रातों-रात बढ़ा दी। इतनी कम उम्र में ऐसी खूबसूरत प्रेम कविताओं की वजह से पाब्लो को जबर्दस्त आलोचना और प्रशंसा समान रूप से मिली। उन्‍मुक्‍त प्रेम की उद्दाम भावनाओं की कविताओं के इस संग्रह का कालांतर में विश्‍व की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और आज भी ये उनकी सर्वाधिक बिक्री वाला संग्रह है। इस संग्रह में एक कविता में उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर की ‘गीतांजलि’ से उद्धृत करते हुए कविगुरू को सम्मान दिया था। भारत के साथ नेरूदा का रिश्‍ता कालांतर में और मजबूत होता गया। पाब्लों की प्रसिद्धि तो फैल रही थी, लेकिन गरीबी पिंड नहीं छोड़ रही थी। पैसा कमाने की कई योजनाएं बनाते और हर बार असफल हो जाते। इसलिए वे राजनयिक सेवा में एक नौकरी के लिए 1927 में नितांत अनजान जगह रंगून जा पहुंचे। इसके बाद वो कोलंबो, बटाविया और सिंगापुर भी रहे। बटाविया, जावा में पाब्लो की मुलाकात डच बैंककर्मी मैरिका से हुई, जिसके साथ उन्होंने पहला विवाह किया। राजनयिक सेवा के दौरान पाब्लो जहां भी रहे, वहां के साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं का अध्ययन कर अपनी कविताओं में निरंतर प्रयोग करते रहे और विभिन्न संस्कृतियों को अपने काव्य में रचते रहे।

चिली वापस लौटने के बाद उनकी नियुक्ति अर्जेंटीना और स्पेन में की गई। यहां उन्हें लोर्का और राफाएल जैसे कवि-साहित्यकारों से हुई। 1934 में पहली बेटी का जन्म हुआ, जो लगातार बीमारी के कारण जल्द ही चल बसी। इस बीच उनका पत्नी की तरफ से रुझान घटता गया और 1936 में तलाक हो गया। इसके बाद पाब्लो ने अर्जेंटाइन डेलिया से विवाह किया जो उनसे बीस साल छोटी थी। स्पेन में जब गृहयुद्ध छिड़ गया तो पाब्लो नेरूदा राजनैतिक तौर पर बेहद गंभीर हो गए और वामपंथी विचारों से प्रभावित हुए। स्पेन में जब लोर्का की हत्या की गई तो वे उग्र वामपंथी हो गए और परिणाम स्वरूप ‘स्पेन इन द हार्ट’ कविता संग्रह प्रकाश में आया। 1937 में स्वदेश वापसी के बाद पाब्लो नेरूदा की कविताएं पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंग गईं, जिनमें आतताइयों का प्रखर विरोध और जनता का प्रबल समर्थन मुखरित हुआ।

राजनयिक सेवा के दौरान उनकी नियुक्ति मेक्सिको में हुई जहां वे ऑक्टोविया पाज जैसे महान कवि से मिले। अपने राजनैतिक विचारों के कारण नेरूदा को देश और नौकरी दोनों को छोड़ना पड़ा। लेकिन वे कभी भी अपने राजनैतिक विचारों से विमुख नहीं हुए और इसका आगे चलकर उन्हें फायदा भी मिला। उनके लिए कविता हमेशा मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज रही। 1950 में उनका विराट कविता संग्रह ‘केंटो जनरल’ प्रकाशित हुआ, जिसमें उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कविता ‘माचू पिच्चू के शिखर’ भी शामिल थी। इस कविता का हिंदी में कई कवियों ने अनुवाद किया है और भारतीय साहित्य में नेरूदा की यह सबसे लोकप्रिय कविताओं में से है। इंका सभ्यता के एक उजड़े हुए नगर के बहाने यह कविता सभ्यता और संस्कृति का विहंगम विमर्श प्रस्तुत करती है, जिसमें मनुष्य के प्रयत्नों की गंध और उसके स्वप्नों की बहुत सुंदर छवियां देखने को मिलती हैं। जब चिली में उनके विचारों की सरकार की स्थापना हुई तो वे स्वदेश लौट आए और 1958 में ‘एक्सट्रावैगारियो’ काव्य संग्रह प्रकाश में आया। उनकी ख्याति बतौर कवि और राजनेता चिली में चरम पर थी और उनके अनुवाद निरंतर प्रकाशित होते जा रहे थे। बतौर राजनेता वे सीनेटर चुने गए।

1971 में जब उन्हें नोबल पुरस्कार दिया गया तो वे स्वाभाविक तौर पर इसके हकदार माने गए। क्‍योंकि करीब दस साल से हर बार उनका नाम संभावितों की सूची में होता था और अंत में किसी अन्‍य लेखक को नोबल घोषित हो जाता था। बहरहाल, उन्होंने आपने नोबल भाषण में नोबल पुरस्कार उन तमाम लोगों को समर्पित किया जो उनकी कविता में किसी भी रूप में आए। पाब्लो नेरूदा के लिए कहा जाता है कि दुनिया की तमाम भाषाओं में वे बीसवीं सदी के महानतम कवि हैं। नेरूदा ने चार बार भारत की यात्रा की। पहली बार नवंबर, 1927 में वे मद्रास आए, जहां उन्होंने भारतीय महिलाओं पर बेहतरीन कविताएं लिखीं। इसके बाद दिसंबर, 1928 में वे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में शामिल हुए, जहां मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी आदि राष्ट्रीय नेताओं से मिले। भारतीय स्वाधीनता संग्राम से नेरूदा ने प्रभावित होकर लिखा कि यह पूरे एशिया का जागरण था। 1951 में वे विश्‍व शांति परिषद के प्रतिनिधि के तौर पर प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से मिलने आए। यहीं उन्होंने ‘इंडिया 1951’ कविता लिखी, ‘धरती का गर्भ/एक बंद गलियारा जहां इतिहास के अंगूर पकते हैं/पुराने ग्रह-नक्षत्रों की प्राचीन बहन है भारत की धरती।’ अंतिम बार नेरूदा 1957 में बांग्ला कवि विष्णु डे के निमंत्रण पर भारत आए। 23 सितंबर 1973 को उनका निधन हुआ।
यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 29 अगस्‍त, 2010 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।









Sunday, 18 July 2010

सत्‍ता के मानवीयकरण की हिमायत

नोबल पुरस्कार के इतिहास में साहित्य में सर्वाधिक पुरस्कार जर्मन भाषा के हिस्से में हैं, लेकिन बहुत-से ऐसे जर्मनभाषी लेखकों को भी मिले, जो जर्मनी मूल के नहीं थे या अपने मूल वतन से विस्थापित होकर किसी अन्य देश में रहे। दक्षिण-पूर्वी यूरोप के छोटे-से देश बल्गारिया को साहित्य में एक मात्र नोबल पुरस्कार 1981 में एलियास कैनेटी को 1981 में मिला। 25 जुलाई, 1905 को बल्गारिया के डेन्यूब नदी किनारे एक छोटे से नगर में कैनेटी का जन्म हुआ। सफल यहूदी व्यापारी माता-पिता के सबसे बड़े बेटे कैनेटी के बचपन के मात्र छह साल बल्गारिया में गुजरे और फिर परिवार इंग्लैंड चला गया। लेकिन यहां आते ही कैनेटी के पिता का अचानक निधन हो गया और मां परिवार को लेकर विएना चली आईं। यहीं से कैनेटी की आरंभिक शिक्षा प्रारंभ हुई। मां ने जर्मन भाषा पर जोर दिया, जो उस माहौल में अनिवार्य था। कुछ साल विएना में रहने के बाद परिवार ज्यूरिख चला गया और वहां से अंततः फ्रेंकफर्ट, जहां कैनेटी ने हाई स्कूल पास की। कैनेटी ने ग्यारह बरस की उम्र में लिखना आरंभ कर दिया था और 16 साल की उम्र में तो पहला काव्यनाटक ‘जूनियस ब्रूटस’ प्रकाशित भी हो गया था। उच्च अध्ययन के लिए कैनेटी एक बार फिर विएना गए, जहां उनके लेखन की नई शुरुआत हुई। हालांकि कैनेटी दर्शनशास्त्र और साहित्य पढना चाहते थे, किंतु दाखिला लिया रसायन विज्ञान में। विएना के साहित्यिक हलकों में उनका परिचय का सिलसिला आगे बढ़ता गया और वे लिखने लगे। राजनैतिक रूप से उनका झुकाव वामपंथ की तरफ था, इसीलिए 1927 के मशहूर जुलाई विद्रोह में भी कैनेटी ने सक्रिय भाग लिया और गिरफ्तार हुए। ब्लैक फ्राइडे के नाम से मशहूर इस विद्रोह का कैनेटी की मानसिकता पर गहरा प्रभाव पड़ा, इसी को आधार बनाकर कालांतर में जब कैनेटी ने अपने लेखन में मुख्य स्थान दिया तो उनकी ख्याति अंतर्राष्ट्रीय हो गई। राजनीति और लेखन के साथ पढ़ाई चलती रही और 1929 में उन्होंने रसायनशास्त्र में पी.एच.डी. की डिग्री लेकर विज्ञान को अलविदा कह दिया। इसके बाद अमेरिकी लेखक अप्टॉन सिंक्लेयर के उपन्यासों का अनुवाद करते हुए और रंगमंच के लिए हास्य और प्रयोगधर्मी एब्सर्ड नाटक लिखते हुए कैनेटी ने अपनी विराट रचनात्मकता को बरकरार रखा।

अपने विद्यार्थी जीवन में कैनेटी एक बार बर्लिन गए, जहां बर्तोल्त ब्रेख्त और आइजैक बाबेल जैसे कई मशहूर नाटककारों से मुलाकात हुई। तभी कैनेटी ने तय कर लिया था कि वे मनुष्य के हास्यास्पद पागलपन को केंद्र में रखकर उपन्यासों की शृंखला लिखेंगे। करीब सात साल बाद इस विचार को ‘डाई ब्लैंगडंग’ उपन्यास में कैनेटी ने मूर्त रूप दिया। किस तरह राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों को बरगला कर बेवकूफ बनाया जाता है और जनता भी धर्म और सत्ता की चकाचौंध में पगला जाती है, इसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों और काल्पनिक कथा के माध्यम से कैनेटी ने विलक्षण ढंग से दर्शाया। यह उपन्यास अपने समय से पहले प्रकाशित हुआ, इसलिए तत्काल इस पर ध्यान नहीं गया, लेकिन दूसरे विश्‍वयुद्ध की समाप्ति के बाद और खास तौर पर अंग्रेजी में अनुवाद के बाद इसकी ख्याति विश्‍वव्यापी हुई। नाजी सरकार ने उपन्यास को प्रतिबंधित कर दिया था। बाद में अनुवाद होने पर टॉमस मान और आइरिश मर्डोक जैसे आलोचक साहित्यकारों ने इस उपन्यास को ‘क्राउड सायक्लोजी’ का विश्‍वसाहित्य का बेहतरीन उपन्यास बताया था।

जब नाजी जर्मनी ने ऑस्ट्रिया को अपने कब्जे में ले लिया तो कैनेटी देश छोड़कर पहले पेरिस और फिर इंग्लैंड चले गए और वहीं रहने लगे। नाटक, डायरी, यात्रा विवरण और निबंध लिखते हुए कैनेटी ने 1960 में अपनी एक और अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक पूरी की, ‘क्राउड्स एण्ड पावर।’ इस पुस्तक के आरंभ में वे यहां से अपना विश्‍लेषण शुरु करते हैं कि भीड़ की मानसिकता आदिकाल से ही बचे रहने के लिए संघर्ष की होती है और किसी के भी बचने का सबसे आसान उपाय है दूसरे की हत्या कर देना। कैनेटी विस्तार से बताते हैं कि भीड़ क्यों और कैसे हिटलर जैसे नेतृत्व के आदेशों की पालना करती है। उनकी मान्यता है कि अगर नेतृत्व को मानवीय बनाया जाए तो भीड़ द्वारा होने वाले नरसंहारों से बचा जा सकता है। लेकिन कैनेटी यह नहीं बता पाते कि नेतृत्व को कैसे मानवीय बनाया जाए।

दरअसल कैनेटी के लेखन की केंद्रीय चिंता यही है कि सत्ता को कैसे अत्यधिक मानवीय बनाया जाए, ताकि अवाम के बीच भेदभाव ना पनप सकें और लोग सामूहिक रूप से एक दूसरे को मारने पर उतारू ना हो जाएं। और अपनी इस चिंता को वे जिस कलात्मक सौंदर्य के साथ व्यक्त करते हैं, वह विश्‍वसाहित्य में दुर्लभ है। मृत्यु और मानवीय संवेदना से ओतप्रोत समाज की कल्पना करते हुए कैनेटी काफ्का के साहित्य का अनूठा विश्‍लेषण करते हैं, जो ‘काफ्का’ज अदर ट्रायल: द लैटर्स टू फेलिस’ में सामने आता है। पत्र शैली में लिखी इस किताब में कैनेटी काफ्का के दुतरफा संघर्ष को बताते हैं, जिसमें सिर्फ दो विकल्प हैं, या तो मध्यवर्गीय आरामतलब जिंदगी के मजे लो अन्यथा वैयक्तिक निर्वासन भोगो। काफ्का जीवन और रचना दोनों में कैसे यह संघर्ष कर रहे थे, इसे कैनेटी ने काफ्का की प्रेमिका फेलिस के नाम काल्पनिक पत्रों के माध्यम से बताने का सराहनीय काम किया। ‘द कंसाइंस ऑफ द वर्ड’ में कैनेटी कहते हैं कि इस दुनिया को बचाने, नया अर्थ देने और अधिक मानवीय बनाने में लेखक की बहुत बड़ी भूमिका होती है। कैनेटी को नोबल पुरस्कार के अलावा विश्‍व साहित्य में करीब दर्जन भर प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से समादृत किया गया। 13 अगस्त, 1994 को ज्यूरिख में मृत्यु से पूर्व एलियास कैनेटी ने तीन खण्डों में अपनी वृहद् आत्मकथा और यात्रा संस्मरणों की एक पुस्तक भी लिखी।

Sunday, 27 June 2010

गल्प का विराट शिल्पी : सॉल बैलो

‘लोग अपनी जिंदगी पुस्तकालयों में खत्म कर सकते हैं। उन्हें सावधान करने की जरूरत है।’ ऐसी रोचक टिप्पणी विश्‍वसाहित्य में सॉल बैलो के सिवा और कौन कर सकता है। बेहद मामूली और सामान्य से दिखने वाले इंसानों के भीतर कितनी किस्मों के चरित्र हो सकते हैं, यह जानना हो तो सॉल बैलो को पढ़िये, जहां हंसते, खिलखिलाते, धीर-गंभीर, आवारा, हताश, उन्मुक्त, मस्त, पस्त और ना जाने कितने चरित्र अपने पूरे वजूद के साथ सिनेमा की तरह चलते-फिरते नजर आते हैं। इन चरित्रों के सर्जक सॉल बैलो के यहूदी माता-पिता 1913 में रूस से कनाडा पहुंचे। यहीं 10 जून, 1915 को सॉल बैलो का जन्म हुआ। एक पराए देश में संघर्षपूर्ण तरीके से जीवनयापन करते माता-पिता के साथ सॉल बैलो का बचपन गुजरा, जिसमें मां के वो पुराने किस्से शामिल थे, जब मां सुनाया करती थी कि रूस में वो कैसे नौकर-चाकरों से भरे घर में रहती थी। अलग-अलग राष्ट्रीयताओं वाले अपने हमशहरी लोगों के बीच नौ बरस की उम्र तक सॉल बैलो कनाडा के मांट्रियल शहर में रहे। यहां पिता अब्राहम शराब का गैरकानूनी कारोबार करते थे। एक बार पिता को पीटा गया। इसके बाद परिवार अमेरिका के शिकागो शहर चला आया। यहां पिता ने नया आयात व्यापार शुरु किया। यहीं सॉल बैलो की शिक्षा हुई। धार्मिक विचारों वाली मां चाहती थी कि सॉल बैलो संगीत के क्षेत्र में जाए, लेकिन सॉल बैलो को यह पसंद नहीं था। किशोरावस्था में एच. बी. स्टो का विश्‍वप्रसिद्ध उपन्यास ‘अंकल टॉम’स कैबिन’ पढ़कर सॉल बैलो ने तय कर लिया कि लेखक बनना है।
सत्रह साल की उम्र में मां की मृत्यु से सॉल बैलो बेहद विचलित हो गए। स्कूली शिक्षा के बाद सॉल बैलो साहित्य में ही उच्च शिक्षा लेना चाहते थे, लेकिन उन दिनों यहूदियों के खिलाफ हर तरफ बेहद नफरत का माहौल था और विश्‍वविद्यालयों के मानविकी विभागों में तो बहुत ही खराब वातावरण था। लिहाजा सॉल बैलो ने साहित्य के बजाय नृतत्वशास्त्र और समाजविज्ञान में पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान साहित्य के एक प्रोफेसर ने उनसे कह दिया कि कोई यहूदी ऐसी अंग्रेजी नहीं सीख सकता, जिससे लेखक बना जाए। बात चुभने वाली थी, लेकिन सॉल बैलो ने तो बचपन में ही लेखक बनने की ठान ली थी। वे लिखते रहे, लेकिन प्रकाशन नहीं हुआ। उन्होंने अध्यापक की नौकरी की और एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के संपादन विभाग में भी कुछ समय काम किया। दो साल वे अमेरिकन मर्चेंट मैरीन में रहे। इस बीच उन्होंने अपना पहला उपन्यास लिखा, ‘डैंजलिंग मैन’। 1944 में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ, जिसमें एक निराश बेरोजगार युवक की संघर्षगाथा, डायरी शैली में कही गई है। तीन साल बाद दूसरा उपन्यास आया ‘द विक्टिम’, जो एक अधेड़ यहूदी व्यक्ति की कथा है, जिसे भय है कि किसी बदकिस्मती के चलते उसके साथ सब कुछ बुरा हो रहा है। ये दोनों उपन्यास साहित्य की दुनिया में सॉल बैलो के सामान्य उपन्यास माने जाते हैं, खुद सॉल बैलो पहले उपन्यास को ‘एम.ए.’ और दूसरे को ‘पी.एच.डी.’ मानते थे।
1953 में जब उनका तीसरा उपन्यास ‘द एडवेंचर्स ऑफ ऑगी मार्च’ आया तो सॉल बैलो की धूम मच गई। आधुनिक आम अमेरिकी व्यक्ति के बचपन से लेकर बड़े होने तक की रोमांचक, हास्य और व्यंग्य से भरपूर गाथा सॉल बैलो ने ऐसी खूबसूरत किस्सागो शैली में प्रस्तुत की कि आलोचकों ने कहा कि अमेरिकी साहित्य का डॉन क्विक्जोट अब पैदा हुआ है। बेहद गरीबी का मारा ऑगी शहरी जीवन की विद्रूपताओं, झूठ, छल, प्रपंच और अजीब मानसिकताओं से भरे चरित्रों के बीच आम अमेरिकी की उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें जनता किसी भी तरह जल्दी अमीर बनने और आरामतलब जिंदगी जीने का स्वप्न देख कर जीती है। इस उपन्यास में सॉल बैलो भावातिरेक से बचते हुए विशुद्ध यथार्थ के साथ एक ऐसी कथा रचते हैं, जिसमें आगे आने वाली घटनाओं का कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। बेचारा नायक अचानक धनवान बनने के बाद तुरंत ही कंगाल हो जाता है और हर हाल में मस्त रहता है। इस उपन्यास की लोकप्रियता से विचलित हुए बिना सॉल बैलो ने अपने अगले उपन्यास में पूरी शैली बदल डाली और ‘सीज द डे’ में एक असफल अभिनेता की मार्मिक कथा लिखी, जो अपनी विफलता के चलते पत्नी, बच्चे और पिता सबसे अलग-थलग पड़ जाता है। द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद अमेरिकी समाज में उपजे हालात और पारस्परिक संबंधों में आए व्यापक बदलाव को इस उपन्यास ने जितना बेहतरीन ढंग से रूपायित किया उतना किसी ने नहीं। इसीलिए इसे बीसवीं सदी का श्रेष्ठतम अमेरिकी उपन्यास कहा जाता है। अपने पांचवें उपन्यास ‘हैंडरसन द रेन किंग’ में सॉल बैलो एक ऐसे धनी अधेड़ व्यक्ति की कथा कहते हैं जो कोई अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति और ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। इस अतृप्त प्यास को लेकर वह अफ्रीका के गांवों में पहुंच जाता है और कई रोमांचक घटनाओं के बीच नए अनुभव हासिल करता है। उसे महसूस होता है कि आत्मा, शरीर और बाहरी दुनिया के बीच कोई शत्रुता नहीं है और सौहार्द्रपूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
सॉल बैलो की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे पुराकथाओं जैसा गल्प रचते हुए अपने समय और समाज को अनेक आयामों में देखते हैं, जहां तमाम भागमभाग और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मनुष्य को एक सहज, संतोषी और सौहार्द्रपूर्ण जीवन की ओर ले जाने का मार्ग दिखाई देता है। सॉल बैलो का अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यास ‘हरजोग’ एक ऐसे अधेड़ यहूदी की कथा है जो पत्नी द्वरा त्याग दिया गया है और जिस स्त्री के साथ रहता है, वह उससे विवाह नहीं करना चाहती। गहरी अनास्था और हताशा के बीच वह अपने दोस्तों, परिजनों, महान विद्वानों, दार्शनिकों और भगवान के नाम पत्र लिखता रहता है, लेकिन इन पत्रों को किसी को नहीं भेजता। इन पत्रों के माध्यम से ही उसकी मानसिकता और उलझन भरी कहानी पता चलती है। इसी तरह मि. सैमलर’स प्लेनेट में एक ऐसे विद्वान प्रोफेसर की कहानी है जो खुद एक प्रलय से बच कर आया है, लेकिन अजीब पागलपन का शिकार होने की वजह से लोगों को भविष्य के विचित्र वायदे करता रहता है। उसका मानना है कि अधिकाधिक सुविधाभोगी जीवन से ही मनुष्य की तकलीफें बढ़ रही हैं।
अमेरिका के नेशनल बुक अवार्ड के लिए छह बार नामांकित होने और तीन बार पुरस्कृत होने वाले सॉल बैलो एकमात्र रचनाकार हैं। लेखन के लिए उन्हें पुलित्जर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। जब 1976 में उन्हें नोबल पुरस्कार दिया गया तो उन्हें इसका वाजिब हकदार माना गया। जन्म से कनाडाई होने के कारण, कनाडा के इतिहास में सिर्फ उन्हीं को साहित्य के लिए यह सम्मान मिला। सॉल बैलो के लेखन को लेकर बहुत से लोगों का मानना है कि उनके अधिकांश उपन्यासों में उनकी अपनी निजी जिंदगी से जुड़ी हुई चीजें हैं, जैसे उनका यहूदी होना, साहित्य के साथ समाजशास्त्र और नृतत्वशास्त्र पढ़ाना, एक के बाद एक पांच-पांच शादियां करना और घूम-घूम कर नई जगहें देखना। खुद सॉल बैलो भी मानते थे कि एक लेखक की रचनाओं में ऐसा होना सहज है। साहित्य की दुनिया में कहा जाता है कि सॉल बैलो बीसवीं शताब्दी के ऐसे महान रचनाकार थे, जिन्होंने रूसी, यूरोपीय, अंग्रेजी और अमेरिकी क्लासिक उपन्यास परंपरा को नया जीवन दिया और सरवांतीस, दोस्तोयेव्स्की, डिकेंस और टॉलस्टोय जैसे सर्वकालिक महान रचनाकारों की शैली को आत्मसात करते हुए आधुनिक उपन्यास को नई बुलंदियों पर पहुंचाया। 5 अप्रेल, 2005 को 90 वर्ष की उम्र में सॉल बैलो का ब्रुकलिन में निधन हुआ।

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्‍ट में 'विश्‍व के साहित्‍यकार' स्‍तंभ में 27 जून, 2010 को प्रकाशित हुआ।

Monday, 7 June 2010

विवादास्पद और वर्जित विषयों की रचनाकार : एलफ्रीडे जेलीनेक

यूरोप के छोटे-से देश ऑस्ट्रिया के साहित्य की तरफ दुनिया का ध्यान पहली बार तब आकर्षित हुआ जब नोबल पुरस्कार के 110 साल के इतिहास में पहली बार 2004 में, यहां की चर्चित नाटककार और उपन्यासकार ऐलफ्रीडे जेलेनीक को दुनिया के सबसे बड़े साहित्य सम्मान से नवाजा गया। इस पर खासा विवाद भी हुआ, क्योंकि यूरोप के स्वतंत्र समाज में भी जेलीनेक के लेखन को कई लोग अश्‍लीलता की श्रेणी में मानते हैं, लेकिन ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि जेलीनेक अपनी विवादास्पद लेखन शैली में कितनी चिंता और गहराई के साथ सामाजिक विद्रूपताओं को बेनकाब कर रही हैं। उनकी लेखनशैली और विवादित विषयों पर लिखने के मूल में जाएं तो कारण आसानी से समझ में आता है।

जेलीनेक का जन्म 20 अक्टूबर, 1946 को स्तीरिया प्रांत में हुआ। पिता चेक-यहूदी मूल के थे और मां विएना के प्रतिष्ठित परिवार से थीं। दूसरे विश्‍वयुद्ध के दौरान पैतृक परिवार के बहुत से लोग नाजियों की बर्बरता के चलते मारे गए और जेलीनेक के पिता जिंदा बचने वालों में से एक थे। जेलीनेक की मां की इच्छा थी कि जेलीनेक कम उम्र में ही संगीत की दुनिया में नाम कमाए और यही सोचकर वे बेटी को लेकर विएना चली आईं जहां एक छोटे-से घर में मां-बेटी रहने लगे। मां के कठोर अनुशासन और जिद के आगे चार साल की उम्र में ही जेलीनेक को संगीत का कड़ा अभ्यास शुरु करना पड़ा। सामान्य शिक्षा के साथ संगीत का गहन अभ्यास करते हुए जेलीनेक ने 14 साल की उम्र में पियानो के लिए विशेष शिक्षा के लिए एक मशहूर संस्था में प्रवेश लिया। 4 साल बाद हाई स्कूल पास कर उन्होंने विएना विश्‍वविद्यालय में रंगमंच, कला और इतिहास विषयों के अध्ययन के लिए दाखिला लिया। इस बीच जेलीनेक कविताएं लिखने लगीं थीं और सत्रह साल की उम्र में पहली कविता प्रकाशित हुई। विश्‍वविद्यालय की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वो साहित्य की दुनिया में आ गई। पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और गद्य रचनाओं का नियमित प्रकाशन होने लगा और 1967 में पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ। कविता के साथ जेलीनेक ने महिलाओं की समस्याओं को लेकर नाटक लिखना शुरु किया तो खासी शोहरत मिलने लगी। नारी की यौन प्रश्‍नाकुलता को जेलीनेक ने बड़ी शिद्दत से उठाया और पुरुष वर्चस्व को चुनौती दी। इस बीच छात्र संगठनों से जुड़ाव के कारण उनके लेखन में नारी समस्याओं के साथ दूसरी सामाजिक समस्याएं भी समाहित होने लगीं। 1970 में उनका एक उपन्यास बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसे हिंदी में ‘हम बच्चे नहीं चारा हैं’ कहा जा सकता है। इस उपन्यास में एक तरफ तो खुद जेलेनीक के बचपन का प्रभाव है और दूसरी तरफ छात्रों के साथ रहने के अनुभवों से उपजी संवेदनशीलता। किस प्रकार मां-बाप बच्चों पर अपने सपने लाद देते हैं और उनके स्वप्न छीन लेते हैं, इसे व्यंग्यात्मक शैली में जेलीनेक ने बहुत खूबसूरती से दर्शाया है। जेलीनेक की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें 1973 में ऑस्ट्रिया की राष्ट्रीय छात्रवृति प्रदान की गई।

1972 में दूसरा उपन्यास आया, जिसमें जेलीनेक ने ऑस्ट्रियाई समाज की आमबोलचाल की भाषा और संस्कृति को लेकर विद्रोही तेवर में कड़ी आलोचना करते हुए बताया कि बेहतर जीवन का दावा बिल्कुल झूठा है और वो समाज में कहीं दिखाई नहीं देता। महिलाओं के लिए वर्जित विषयों पर लिखते हुए जेलीनेक ने सारी परंपराएं तोड़ दीं और देश की चर्चित महिलाओं में शुमार हो गईं। 1974 में वे कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बन गईं और लेखन के साथ राजनीति में भी सक्रिय हो गईं। अगले ही साल उनका उपन्यास ‘वूमन एज लवर्स’ बहुत लोकप्रिय हुआ, इसे जर्मन भाषा पढ़ने वाले तमाम देश में प्रशंसा मिली। जेलीनेक के लेखन की खासियत यह है कि वो जो कथानक बुनती हैं, उसमें परिस्थितियां बहुत उलझी हुईं और जटिल होती हैं। पाठक हतप्रभ रह जाता है कि इस समाज में हिंसा और दमन इतने रूपों में व्याप्त है कि सहसा हमारा ध्यान ही नहीं जाता। दमन के शिकार लोगों को किस प्रकार बेबसी के साथ घुटने टेकने पड़ते हैं? मनोरंजन उद्योग किस तरह लोगों की चेतना को कुंद कर देता है और लोग वर्ग एवं लिंग के आधार पर होने वाले अन्याय के किसी भी प्रकार के प्रतिरोध के काबिल नहीं रह जाते? ऑस्ट्रियाई साहित्य में जेलीनेक जैसा स्वर पहली बार देखा गया है, इससे पहले के साहित्य में समाज की आलोचना तो होती थी, लेकिन बहुत संभ्रांत ढंग से।

जेलीनेक का उपन्यास ‘लस्ट’ दुनिया की कई कई भाषाओं में अनूदित होने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। इस उपन्यास में उन्होंने बुनियादी तौर पर सभ्यता और संस्कृति को लेकर ही कई सवाल उठाए हैं। जेलीनेक का मानना है कि जब तक समाज में महिलाओं पर होने वाली हर स्तर की हिंसा खत्म नहीं होगी, इस कथित सभ्यता पर सवाल उठते रहेंगे। उनकी लेखनी को किसी खास तरह से व्याख्यायित करना संभव नहीं है, क्योंकि उनके लेखन का दायरा बहुत विस्तृत है। गहरी काव्यात्मकता और व्यंग्य के साथ जेलीनेक अपने कथानक के साथ चलने वाली आवाजों को भी पूरा महत्व देते हुए एक अजीब किस्म का रसायन बनाती हैं कि पहले पाठ में सामान्य पाठक के पल्ले कुछ नहीं पड़ता, लेकिन धीरे-धीरे रहस्य खुलने लगते हैं, साथ होने वाली घटनाएं आवाजों के माध्यम से एक पूरे संसार की रचना करती हैं, जिसमें लेखिका का दर्द पूरी संवेदनशीलता के साथ प्रकट होता है। हिंदी में एक प्रकाशक ने ‘लस्ट’ को मूल जर्मन से अनुवाद करवा कर छापा तो है, लेकिन अनुवादक ने देशज अनुवाद करने के प्रयास में जो कुछ किया वह भारतीय माहौल में अश्‍लीलता ही माना जाएगा। इसलिए प्रकाशक ने इसे जारी नहीं किया है।

एलफ्रीडे जेलीनेक बहुत मुखर लेखिका हैं। उन्होंने अपने देश की दक्षिणपंथी पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का खुलकर विरोध किया तो सरकार ने उन पर देशद्रोही होने का आरोप लगा दिया। लेकिन जेलीनेक की मुखरता का कोई अंत नहीं है। उन्हें लेखन के लिए उपन्यास और नाटकों पर कई पुरस्कार और सम्मान मिले। 2004 में जब नोबल पुरस्कार की घोषणा हुई तो वे लेने नहीं गई। उन्होंने कहा कि इतना बड़ा सम्मान मिलना प्रसन्नता की बात है, लेकिन मुझसे कई बड़े रचनाकार हैं, जो इसके हकदार हैं। करीब दो दशकों से वे अपने घर में ही रहती हैं और कहीं आती जाती नहीं। उन्हें सामाजिक जीवन से और प्रशंसकों की भीड़ से बड़ा डर लगता है। कठोर अनुशासन में बीते बचपन का असर ही है यह शायद कि जेलीनेक हवाई जहाज में बैठने से और बाजार जाकर खरीदारी करने से भी डरती हैं। उनके लेखन में व्याप्त भय और हिंसा का वातावरण वैश्विक है, लेकिन कितनी बड़ी विडंबना है कि दुनिया को भय से मुक्ति का मार्ग दिखाने वाली कलमकार अपने ही डर की वजह से विएना के अपने ही घर में खुद कैद होकर बैठी है।

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 6 जून, 2010 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।













Sunday, 30 May 2010

सर्बिया का चमकीला नक्षत्र - ईवो आंद्रिक

दो साल की उम्र में जिस बालक को पिता अनाथ छोड़ जाएं, उस के भविष्य की कल्पना ही भयावह होती है। लेकिन जीवट हो तो इंसान क्या नहीं कर सकता? ऐसा ही हुआ, 1961 के नोबल पुरस्कार विजेता कथाकार-उपन्यासकार ईवो आंद्रिक के साथ। 9 अक्टूबर, 1892 को जन्मे ईवो को पिता की मृत्यु के बाद मां के साथ ननिहाल आना पड़ा और आरंभिक वर्ष वहीं गुजारने पड़े। ईवो का जन्म आस्ट्रिया-हंगरी के अधीन प्राचीन ऑटोमान साम्राज्य में हुआ, जो पहले यूगोस्लाविया का भाग था और आज बोस्निया और हर्जेगोविना देश का हिस्सा है। शुरुआत में ईवो ने जिम्नास्टिक की शिक्षा ली और कालांतर में उच्च अध्ययन के लिए कई विश्‍वविद्यालयों में पढ़ाई की। 19 साल की उम्र में ईवो की पहली कविता एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुई। युवावस्था में ही आंद्रिक क्रांतिकारी छात्र संगठनों से जुड़ गए थे, इसलिए उनके लेखन और व्यवहार में भी क्रांति के स्वर उभरने लगे थे। ईवो वैचारिक रूप से साम्राज्यवाद के खिलाफ थे और यूगोस्लाविया के समर्थक थे, इसलिए उपनिवेशवादी सरकार ने प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान ईवो आंद्रिक को जेल में डाल दिया। जेल में रहने के दौरान आंद्रिक ने क्रांतिकारी साहित्य का भरपूर अध्ययन किया। लेकिन रूस की सफल क्रांति के बाद बने यूगोस्लाविया गणराज्य में ईवो आंद्रिक को जेल से रिहाई मिली।

प्रथम विश्‍वयुद्ध की समाप्ति के बाद ईवो आंद्रिक ने चार विश्‍वविद्यालयों में स्लाविक भाषा और साहित्य का अध्ययन किया और ‘तुर्की शासनकाल में बोस्नियाई संस्कृति का इतिहास’ विषय पर शोध किया। 1920 में उन्हें यूगोस्लावियाई प्रशासनिक सेवा में ले लिया गया, जहां बीस वर्ष तक उन्होंने कई महत्वपूर्ण राजनयिक पदों पर काम करते हुए अपनी लेखन यात्रा जारी रखी। ईवो की कविताएं अब तमाम महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं और उन्होंने लेखन के साथ विश्‍व साहित्य से अनुवाद का काम भी शुरु कर दिया था। 1920 में पहली कहानी के प्रकाशन के साथ ही ईवो आंद्रिक ने कविता से किनारा कर लिया और पूरी तरह गद्य के लिए समर्पित हो गए। कहानी लेखन में ईवो ने सदियों पुरानी यूगोस्लावियाई लोक संस्कृति को रूपायित करते हुए वहां की कैथोलिक, यहूदी और मुस्लिम समुदाय की समृद्ध विरासत और संघर्षशील जनता के दुख दर्द को शानदार अभिव्यक्ति दी।

दस साल में उनकी कहानियों के कई संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें सबका शीर्षक ‘कहानियां’ था। द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान यूगोस्लाविया पर नाजी आक्रमण के बाद ईवो अपनी राजनयिक सेवा छोड़कर स्वदेश वापस लौट आए। लौटते ही नाजियों ने ईवो को उनके घर में ही नजरबंद कर दिया। इस अवधि में ईवो ने अपना सर्वश्रेष्ठ लेखन किया जो 1945 में उपन्यास त्रयी के रूप में प्रकाशित हुआ। इस त्रयी में ‘द ब्रिज ऑन द्रीना’, ‘बोस्नियन क्रॉनिकल’ और ‘द वूमन फ्राम सरायेवो’ को जबर्दस्त लोकप्रियता हासिल हुई। पूर्वी बोस्निया में द्रीना नदी पर एक प्राचीन पुल के माध्यम से ईवो ने बोस्नियाई ग्रामीण समुदाय के चार सदियों के संघर्षमय जीवन को पहली बार विश्‍व के समक्ष रखा। यहां पुल और नदी जीवंत चरित्र के रूप में सामने आते हैं। यह पुल पूरब और पश्चिम को जोड़ने वाले घटक के तौर पर उभरता है, जिसे प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया जाता है। ‘बोस्नियन क्रॉनिकल’ में संस्कृतियों के संघर्ष को ईवो ने अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। नेपोलियन के विश्‍वविजयी अभियान के बाद फ्रांसिसी शासन के दौरान किस तरह तुर्की और यूरोपीय संस्कृतियों में जबरदस्त टकराव होता है, इसे महज सात साल के दौरान एक कथासूत्र में पिरोकर ईवो आंद्रिक ने दर्शाया। ‘द वूमन फ्राम सरायेवो’ में एक नौकरानी की धनलोलुपता को ईवो ने एक नीतिकथा की शैली में औपन्यासिकता प्रदान की। यह नौकरानी अच्छी खासी खाती पीती महिला है, लेकिन पैसों को लेकर उसके लालच का कोई अंत नहीं है।

दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद ईवो आंद्रिक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए और कई वर्षों तक वे यूगोस्लावियाई लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। इस अवधि में ईवो ने सैंकडों कहानियां, यात्रा संस्मरण, सामयिक विषयों पर लेख और कुछ लघु उपन्यास लिखे। पांचवे दशक में यूगोस्लाविया में सामाजिक यथार्थवाद और आधुनिकता को लेकर लंबी बहस चली, जिसमें ईवो आधुनिकता के पक्ष में खड़े थे और अंततः उनके पक्ष की ही जीत हुई। 1960 तक आते-आते ईवो आंद्रिक की रचनाओं का दुनिया की अनेक भाषाओं में अनुवाद होने लगा था और वे सर्वाधिक अनूदित सर्बियाई लेखक हो चुके थे। यूगोस्लाविया के वे सबसे सम्मानित, चर्चित और महत्वपूर्ण व्यक्तियों में थे। 1959 में जाकर ईवो ने चित्रकार मिलिका बेबिक से विवाह किया। 1961 में उन्हें नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। सर्बियाई भाषा के वे पहले साहित्यकार थे, जिन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित होने का गौरव मिला। उनकी नोबल प्रशस्ति में कहा गया कि ईवो आंद्रिक के लेखन में आधुनिक मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि के साथ पुराकथाओं जैसी मानव नियति के दर्शन होते हैं। मानवता के प्रति ईवो गहरा अनुराग और प्रेम महसूस करते हैं लेकिन सबसे बड़ी बुराई के तौर पर दुनिया में मौजूद भय और हिंसा से मुंह नहीं मोड़ते। ईवो आंद्रिक ने अपने देश के इतिहास से मानव की नियति कथाओं को लेकर महाकाव्यात्मक शक्ति से अभिव्यक्त किया है। हिंदी में उनकी कुछ कहानियों का अनुवाद हुआ है। करीब तीन दशक पहले ईवो की उपन्यास त्रयी के पहले उपन्यास को साहित्य अकादमी ने ‘द्रीना नदी का पुल’ शीर्षक से प्रकाशित किया था, जो अब अनुपलब्ध है। ईवो आंद्रिक के लेखन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक निजी और देशज कथा को वैश्विक आयाम देते हैं और इसीलिए सुदूर बोस्निया के बाशिंदों की कहानी भी अपनी-सी लगने लगती है। 13 मार्च, 1975 को 83 बरस की उम्र में ईवो आंद्रिक का निधन हुआ। उनकी मृत्यु के बाद बोस्निया में उनका स्मारक और संग्रहालय बनाया गया। ईवो आंद्रिक आज भी दुनिया में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले सर्बियाई लेखक हैं।

Sunday, 16 May 2010

बेचैन आत्‍मा का कवि : इयुजीनियो मोन्‍ताले

समकालीन भारतीय कविता, विशेष रूप से हिंदी कविता को विश्‍व के जिन कवियों ने बेहद प्रभावित किया है, उनमें इतालवी कवि इयुजीनियो मोंताले का नाम प्रमुख है। आधुनिक इतिहास, दर्शन, प्रेम और मानवीय अस्तित्व की विविध दुविधाओं और बेचैनियों को गीतात्मक सौंदर्य और अबूझ रहस्यों के साथ प्रस्तुत करने वाले मोंताले को 1975 में नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया था। 12 अक्टूबर, 1896 को व्यापारी परिवार में जन्मे मोंताले छह भाई-बहिनों में सबसे छोटे थे। खराब सेहत के चलते बचपन में पढ़ाई आधी-अधूरी रही। संगीत का शौक था और गायक बनने का सपना लिए मोंताले संगीत सीखने लगे। लेकिन अपने गुरु की असामयिक मृत्यु से विचलित हो मोंताले ने संगीत शिक्षा छोड दी और साहित्य की तरफ चले आए। उनकी रूचि इतालवी और यूरोपीय साहित्य के साथ दर्शनशास्त्र में थी। परिवार में सबसे छोटे होने के कारण उन्हें अपने मन से कुछ भी करने की स्वतंत्रता थी। इसलिए कुछ दिन उन्होंने एकाउंटेंट की नौकरी भी की और प्रथम विश्‍वयुद्ध में सैन्य अधिकारी के रूप में देश की सेवा भी की। लेकिन किताबों के प्रति अपने अगाध प्रेम की वजह से वे पूरी तरह साहित्य की दुनिया में लौट आए। पुस्तकालयों में घंटों बैठकर पढते और लिखते। कई पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हुए उन्होंने कुछ समय एक प्रकाशन संस्थान में भी काम किया। 1928 में वे एक अनुसंधान पुस्तकालय के निदेशक नियुक्त किए गए, जहां से उनकी आलोचना यात्रा आरंभ होकर नए आयामों तक पहुंची।

मोंताले राजनैतिक तौर पर फासीवाद के विरोधियों के साथ थे, इसलिए उनका पहला कविता संग्रह 'बोन्स ऑफ द कटलफिश' 1925 में फासीवाद विरोधी प्रकाशक पिएरो गोबेती ने प्रकाशित किया। मोंताले परिवार गर्मियों के दिन  एक छोटे से गांव लिगूरिया में बिताया करता था। मोंताले ने अपने पहले संग्रह की कविताओं में उसी गांव के श्रमशील लोगों की जिंदगी, उस वातावरण में अपने एकांतिक अस्तित्व और उसमें छाई हुई हताशा और नैराश्‍य के बीच वहां के प्राकृतिक सौंदर्य को अपनी विशिष्ट शैली में प्रस्तुत किया। प्रथम विश्‍वयुद्ध की निरर्थकता ने समूचे यूरोपीय साहित्य को प्रभावित किया और मोंताले भी इससे अछूते नहीं रहे। मोंताले के पहले संग्रह में एक प्रसिद्ध कविता की अंतिम पंक्तियां हैं-

आज हमारे पास आपसे कहने के लिए इतना भर है कि
हम वो नहीं हैं कि जो हम होना नहीं चाहते

1933 में मोंताले की मुलाकात यहूदी-अमेरिकी शोधकर्ता इरमा ब्रेंडिस से हुई और जल्द ही उनकी मित्रता मशहूर हो गई। दांते पर शोधरत इरमा को लोग दांते की प्रेमिका बिएत्रिस की तरह मोंताले की बिएत्रिस कहने लगे। 1938 में फासीवादी सरकार ने आते ही मोंताले को निदेशक के पद से हटा दिया। अगले साल उनका सबसे महत्वपूर्ण संग्रह 'द ऑकेजंस' प्रकाशित हुआ। इसे इतालवी साहित्य में प्रथम विश्‍वयुद्ध के बाद की सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक माना जाता है। इस संग्रह में एक तरफ तो फासीवाद के विरोध में स्वर उठाती कविताएं हैं तो दूसरी तरफ इरमा को क्लीजिया के रूप में संबोधित कर लिखी गई प्रेम कविताएं हैं। मानव मन की अनंत गहराइयों का उत्खनन करते हुए मोंताले अपने निजी संसार को भी कविता में अपनी दुरूह शैली में सार्वजनिक बना देते हैं। बेहद निजी और अबूझ संसार को अपनी कविता में रचते हुए मोंताले व्यक्तिगत रूप से भी गैर सांसारिक हो जाते हैं। संगीत की दुनिया में उन्हें सुकून मिलता है और वे इटली के सबसे बड़े अखबार कूरियर डेला सेरा के लिए अपने नियमित स्तंभ में संगीत की चर्चा करते रहते हैं। अपनी कविता की एकांतिक दुनिया और दुरुहता के बारे एक बार उन्होंने कहा था, 'एक कवि कभी नहीं जानता और अक्सर जान ही नहीं पाता कि वह किस पाठक को संबोधित कर लिख रहा है।'
 
लंबे समय तक मोंताले कविता की दुनिया से दूर रहे और विश्‍व के महान साहित्यकारों की रचनाओं का इतालवी में अनुवाद करते रहे। दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद वे मिलान चले गए। यहां वे अपनी आत्मकथा लिखने लगे जो कई सालों में कई बार प्रकाशित होते अंततः दो खण्डों में पूरी हुई। 1956 में उनका महत्वपूर्ण संग्रह 'द स्टोर्म एण्ड अदर पोएम्स' प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद उपजी स्थितियों का काव्यात्मक और आलोचनात्मक आख्‍यान है। इसमें हिटलर, मुसोलिनी और क्लीजिया के साथ स्वयं कवि अपने समय की निर्मम आलोचना करता हुआ जंग की खिलाफत करता है और मानवता की बात करता है। चौथा संग्रह 'सेतूरा' 1962 में प्रकाशित हुआ। इसमें मोंताले बेहद व्यंग्यात्मक लहजे में दुनिया की विद्रूपताओं का वर्णन करते हैं। 'धुंधली-सी रोशनी हुई/जब इंसान ने सोचा/कि वह छछूंदरों और झींगुरों से बहुत बड़ा है।'

1967 में उन्हें इटली की सीनेट का आजीवन सदस्य बनाया गया। उन्हें मिलान, केंब्रिज और रोम विद्गवविद्यालयों ने मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की। 1975 में उन्हें नोबल पुरस्कार मिला। 12 सितंबर 1981 को उनका निधन हुआ। मोंताले की मृत्यु के बाद 1996 में प्रकाशित उनकी डायरी कवियों, काव्यप्रेमियों और आलोचकों के बीच बहुत लोकप्रिय है।

Sunday, 25 April 2010

कलम से खुदाई करने वाले शेमस हीनी

आयरलैंड के कवियों में शेमस हीनी ऐसे कवि हैं, जिनकी कविताओं ने देश-काल की सीमाओं को लांघते हुए हर काव्यप्रेमी का दिल जीता है। १३ अप्रेल, १९३९ को एक किसान परिवार में जन्मे शेमस हीनी ने अपने ग्रामीण परिवेश में जो कुछ बचपन से देखा-भोगा, उसे अपनी कवितओं में इस खूबसूरती के साथ रूपांतरित किया कि पर्यटन के नक्‍शों में दिखाए जाने वाले आयरलैंड के सुहावने दृश्‍यों से अलग वहां की धरती के नैसर्गिक सौंदर्य के दर्शन होते हैं। और इस सौंदर्य में आयरलैंड की खूबसूरत वादियां ही नहीं, वहां का समूचा प्राणिजगत और श्रमशील जनता भी दिखाई देती है। देहात में अपनी आरंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद १९५७ में हीनी अंग्रेजी भाषा और साहित्य के अध्ययन के लिए बेलफास्ट के क्वींस विश्‍वविद्यालय चले गए। यहां वे उस समय के मशहूर अंग्रेजी कवि टेड ह्‌यूज की कविताओं के संपर्क में आए और समकालीन कविता की दुनिया से जुड़ते चले गए। १९६१ में स्नातक होने के बाद वे एक स्कूल में अध्यापन करने लगे। इस बीच कई कवि-साहित्यकारों के संपर्क में आने से हीनी की कविता समृद्ध होने लगी। १९६२ में उन्होंने कविताएं प्रकाशन के लिए भेजना शुरु किया और धीरे-धीरे उनकी कविताएं लोगों का ध्यान आकर्षित करने लगीं। कविताओं के साथ हीनी अखबारों के लिए लेख आदि भी लिखते रहे। क्वींस विश्‍वविद्यालय के प्राध्यापक फिलिप हॉब्सबाम ने युवा कवियों का एक समूह बनाया और शेमस हीनी को उसमें शामिल किया। अब हीनी कवियों की एक ऐसी वृहत्तर दुनिया से जुड गए, जिसके तार लंदन तक से जुडे हुए थे।
१९६५ में लेखिका मैरी डेवलिन से विवाह के साथ ही क्वींस विश्‍वविद्यालय के वार्षिक समारोह में उनकी ग्यारह कविताओं की पुस्तिका प्रकाशित हुई, जिसने लोगों को एक बार फिर शेमस हीनी की कविताओं पर गंभीरता से सोचने के लिए विवश किया। १९६७ में उनका पहला कविता संग्रह 'डैथ ऑफ ए नेचुरलिस्ट' प्रकाशित हुआ तो अंग्रेजी साहित्य की दुनिया में शेमस हीनी का जबर्दस्त स्वागत हुआ। भाषा, विषयवस्तु और शिल्प की दृष्टि से यह संग्रह अंग्रेजी काव्य संसार की एक नई और अनूठी आवाज के रूप में सामने आया। इस पर हीनी को कई सम्मान और पुरस्कार मिले। अगले साल हीनी माइकल लोंग्ली के साथ एक कविता यात्रा पर निकले तो कई जगह कविता पाठ के दौरान हीनी को व्यापक सराहना मिली। १९६९ में उनका दूसरा काव्य संग्रह 'डोर इन टू द डार्क' प्रकाशित हुआ। उनकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी और हर तरफ से उनकी कविताओं की मांग थी। तीन साल बाद तीसरा संग्रह 'विंटरिंग आउट' आया और इसके साथ ही शेमस हीनी आयरलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका में काव्यपाठ के लिए बुलाए जाने लगे। १९७५ में उनका चौथा और अत्यंत महत्वपूर्ण काव्य संकलन 'नॉर्थ' प्रकाशित हुआ। इसके साथ ही शेमस हीनी की कविताएं अंग्रेजी साहित्य की दुनिया से बाहर भी लोगों का ध्यान आकर्षित करने लगीं, क्यांकि अब लोग उनकी कविताओं का अपनी भाषाओं में अनुवाद करने लगे थे। १९७६ में 'फील्ड वर्क' के रूप में चौथा संग्रह प्रकाश में आया। अब शेमस हीनी इतने बडे कवि के रूप में स्थापित हो चुके थे कि उनकी कविताओं के संचयन प्रकाशित होने लगे थे।
आयरलैंड सरकार ने जब राष्ट्रीय कला परिषद का गठन किया तो शेमस हीनी को सर्वोच्च सम्मान देते हुए उसका सदस्य मनोनीत किया। स्कूल से कॉलेज और विश्‍वविद्यालयों में पढ़ाते हुए वे अमेरिकी विश्‍वविद्यालयों तक अध्यापन के लिए गए, लेकिन उनके भीतर का आयरिश मन अंततः आयरलैंड में ही रमा और वे वहीं के होकर रह गए। एक बार पेंग्विन ने समकालीन ब्रिटिश कविता के एक संचयन में उन्हें शामिल किया तो स्वाभिमानी शेमस हीनी ने चार पंक्तियों में इसका प्रतिरोध किया, 'ध्यान रहे, मेरा पासपोर्ट हरे रंग का है, हमारा कोई जाम, नहीं उठेगा महारानी के नाम।'
साहित्य के साथ हीनी का जुडाव रंगमंच की दुनिया से भी बना रहा और वे एक थियेटर कंपनी के संचालक मंडल में रहे। कविता के अलावा वे समसामयिक विषयों पर भी लगातार लिखते रहे। ऐसे लेखों का १९८८ में प्रकाशित एक संकलन 'द गवर्नमेंट ऑफ द टंग' बहुत लोकप्रिय हुआ। १९८९ में वे हार्वर्ड विश्‍वविद्यालय में पांच साल के लिए प्रोफेसर ऑफ पोएट्री चुने गए। रंगमंच के लिए लिखे उनके नाटक 'द क्योर एट ट्रॉय' और 'सीइंग थिंग्स' बेहद लोकप्रिय हुए।
इतने लोकप्रिय और महत्वपूर्ण रचनाकार को जब १९९५ में नोबल पुरस्कार दिया गया तो किसी को आश्‍चर्य नहीं हुआ क्योंकि वे इसके सच्चे हकदार थे। नोबल पुरस्कार देते हुए उनकी प्रशस्ति में कहा गया कि उनका काम गीतात्मक सौंदर्य और उच्च नैतिक मूल्यों की गहराई से लबरेज है, जो रोजमर्रा की जिंदगी के अचरजों और जीवित इतिहास को शक्ति प्रदान करता है। आलोचक ओला लार्समो के अनुसार शेमस हीनी की कविता में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वहां एक जबर्दस्त अनुभव उद्‌घाटित होता है। जो कुछ दृश्‍यमान है और इस दृश्‍यमान को जितना कुछ व्यक्त किया जा सकता है, इन दो स्थितियों के बीच जो फासला है, उसे शेमस हीनी की कविता अगर पाटती नहीं तो कम से कम नापती जरूर है। अपने पिता को गड्‌ढ़ा खोदते हुए देखकर लिखी शेमस हीनी की कविता 'डिगिंग' में इसे आरंभिक तौर पर पहचाना जा सकता है, हीनी लिखते हैं:-

भगवान कसम, वो बूढा बेलचा चला सकता है
अपने बूढे बाप की तरह
लेकिन मेरे पास उसका अनुकरण करने के लिए
कोई बेलचा नहीं हैं

मेरी अंगुली और अंगूठे के बीच
एक गोल-मटोल कलम है
मैं इसी से खुदाई करूंगा।

७१ वर्षीय शेमस हीनी इन दिनों डबलिन में रहते हैं। नोबल पुरस्कार के बाद उन्हें टी.एस. इलियट पुरस्कार सहित अनेक सम्मान-पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।
 
यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 25 अप्रेल, 2010 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।

Monday, 12 April 2010

समाज के लिए समर्पित लेखिका - पर्ल. एस. बक

अमेरिकी साहित्य के इतिहास में पर्ल एस. बक पहली महिला रचनाकार हैं, जिन्हें साहित्य में १९३८ में नोबल पुरस्कार मिला। अमेरिका में ईसाई मिशनरी परिवार में १८९२ में जन्मी पर्ल के जीवन का अधिकांश चीन में बीता। जन्म के बाद ही वे माता-पिता के साथ चीन आ गईं थीं। घर पर साहित्य की शौकीन मां ने अंग्रेजी और चीनी शिक्षक ने चीनी भाषा सिखाई। उस वक्त के चीन में जबर्दस्त उथलपुथल का दौर चल रहा था, इसलिए पर्ल के परिवार को कई बार जान बचाने के लिए कई जगह शरण लेनी पड़ी। पंद्रह साल की उम्र में पर्ल को शंघाई के एक बोर्डिंग स्कूल में विधिवत शिक्षा के लिए दाखिल करा दिया गया। उच्च शिक्षा के लिए उन्हें अमेरिका भेज दिया गया, जहां पर्ल ने मनोविज्ञान का अध्ययन किया। १९१४ में पर्ल वापस चीन आईं और स्कूल में अंग्रेजी पढाने लगीं। कृषि विज्ञानी डा. जॉन लॉसिंग बक से विवाह के बाद वे पति के साथ चीन के सुदूर स्थलों की यात्रा करती रहीं, जो कालांतर में उनके साहित्य में बेहद खूबसूरत ढंग से रूपायित हुआ। १९२४ में पर्ल अपनी मंदबुद्धि बेटी के इलाज के लिए अमेरिका पहुंची और बेटी की देखभाल के साथ साहित्य में एम.ए. भी करने लगीं।
१९२७ में वो वापस चीन लौट आईं, लेकिन चीन के गृहयुद्ध के हालात में बक परिवार को भागकर जापान में शरण लेनी पड़ीं। इसके बाद पर्ल कभी वापस चीन नहीं गईं। पर्ल इस बीच एशियाई समाज के विभिन्न पहलुओं को लेकर पत्र-पत्रिकाओं में लिखती रहीं। उनका यह लेखन आत्मकथात्मक था, जिसमें वे अपने निजी अनुभवों को चीन के बाहर की दुनिया के लोगों के साथ साझा करती थीं। एशिया मैगजीन  में उनकी कहानी 'ए चाइनीज वूमैन स्पीक्स' को व्यापक सराहना मिली। पर्ल ने चीनी साहित्य का विशेष रूप से प्राचीन चीनी साहित्य का गहन अध्ययन किया था। इसीलिए जब उनका पहला उपन्यास 'ईस्ट विंड : वेस्ट विंड' प्रकाशित हुआ तो पाठकों और आलोचकों का उनकी ओर ध्यान गया। इस उपन्यास में पर्ल ने एक चीनी महिला क्वेन लाई के जीचन संघर्ष का मार्मिक विवरण प्रस्तुत किया। लेकिन जब १९३१ में 'गुड अर्थ' प्रकाशित हुआ तो पर्ल को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। इस उपन्यास में पर्ल ने एक ऐसे चीनी किसान का जीवनवृत्त प्रस्तुत किया जो अपनी धरती से, अपने खेतों से, अपनी आबोहवा से गहरा प्रेम करता है। उसके पास पीढियों से संचित ज्ञान की संपदा है और वह अपनी ही दुनिया में मगन है और तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी जीने के लिए संघर्ष करता रहता है। पर्ल ने चीनी साहित्य की वर्णनशैली और बाइबिल जैसी गद्यात्मकता से अपने पहले उपन्यास को इतनी खूबसूरती से रचा कि पूरी दुनिया का इस पर ध्यान गया। इस उपन्यास की लोकप्रियता को देखते हुए १९३७ में इरविंग टालबर्ग ने सिडनी फ्रेंकलिन के निर्देशन में इस पर अत्यंत विश्‍वसनीय फिल्म भी बनाई। फिल्म में अभिनेत्री लुई रेनर को मुख्‍य भूमिका के लिए ऑस्कर मिला। इस उपन्यास की प्रकाशन के पहले वर्ष में १८ लाख प्रतियां बिकीं और दुनिया की तीस से अधिक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ। १९३२ में इस उपन्यास पर पर्ल को पुलित्जर पुरस्कार मिला।
'गुड अर्थ' की अपार लोकप्रियता ने पर्ल को प्रेरित किया तो इसके दो और भाग लिखे गए। १९३२ में 'संस' और १९३५ में 'ए हाउस डिवाइडेड' प्रकाशित हुए। इन दोनों उपन्यासों में पर्ल ने किसान की अगली पीढ़ी का वृत्तांत प्रस्तुत किया। इस उपन्यास त्रयी के साथ लिखे गए 'मदर' उपन्यास में पर्ल ने चीनी मां के आत्मबलिदान और संघर्ष की अत्यंत करुण कथा लिखी है। इसे पर्ल के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है। पर्ल ने अपने पिता एब्सालोम की रचनात्मक जीवनी 'फाइटिंग एंजेल' में और मां कैरोलीन की जीवनी 'द एक्जाइल' में इतनी खूबसूरत किस्सागोई की शैली में प्रस्तुत की कि आलोचकों के मुताबिक ये क्लासिक जीवनियां हैं। पर्ल का १९३५ में अपने पति से तलाक हो गया और उन्होंने अपने प्रकाशक रिचर्ड वाल्श से विवाह कर लिया। १९३८ में नोबल पुरस्कार प्रदान करते समय पर्ल के साहित्य की प्रशंसा करते हुए कहा गया कि पर्ल के लेखन ने नस्ली सीमाओं के पार जाकर मानवीय संवेदनाओं और सहानुभूति का मार्ग प्रशस्त किया है। पर्ल एस. बक ने जीवन में करीब ८० पुस्तकें लिखीं, जिनमें कहानी, उपन्यास और जीवनी के अलावा आलोचना, संस्मरण, कविता, निबंध, बालसाहित्य की कई विधाओं की पुस्तकें शामिल हैं। पर्ल के लेखन के केंद्र में सिर्फ चीनी जनजीवन ही नहीं जापानी और अमेरिकी जनजीवन भी रहा। उन्होंने महिला अधिकार, एशियाई संस्कृति, मिशनरी जीवन, युद्ध, दत्तक और पारगमन नियमों को लेकर भी प्रचुर मात्रा में लिखा। १९४९ में पर्ल ने बच्चों को गोद लेने के तत्कालीन नियमों का विरोध किया और मिश्रित नस्ल के अनाथ बच्चों के लिए संघर्ष किया। पर्ल ने व्यक्तिगत प्रयासों से मिश्रित नस्ल के बच्चों को आश्रय देने के लिए दुनिया की पहली गोद लेने वाली संस्था 'वेलकम हाउस' प्रारंभ की। १९६४ में पर्ल ने एशियाई बच्चों की दयनीय दरिद्रता और असमानता को लेकर पर्ल एस. बक फाउण्डेशन की स्थापना की। इसके बाद विभिन्न एशियाई देशों में पर्ल ने अनाथालय और शिक्षण संस्थान खोले। समाज सेवा के साथ पर्ल का लेखन भी चलता रहा। पर्ल ने अनेक चीनी रचनाकारों की कृतियों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। अपने अंतिम समय में पर्ल 'द गुड अर्थ' का चौथा खण्ड लिख रही थीं जो पूरा ना हो सका। ६ मार्च, १९७३ को ८० साल की उम्र में फेंफडों की बीमारी से पर्ल का निधन हुआ।

Sunday, 14 March 2010

साहसी और प्रतिभावान लेखक: वोले शोयिंका

नाइजीरिया जैसे छोटे से देश को विश्‍व साहित्य में एकमात्र नोबल पुरस्कार दिलाने का श्रेय महान अश्‍वेत कवि, नाटककार और उपन्यासकार वोले शोयिंका को जाता है। शोयिंका पहले अश्‍वेत अफ्रीकी रचनाकार हैं, जिन्हें 1986 में नोबल पुरस्कार मिला। कई बार भारत आ चुके शोयिंका हाल ही में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भी आए थे। 13 जुलाई, 1934 को नाइजीरिया की योरूबा जनजाति के एक प्रतिष्ठित परिवार में वोले शोयिंका का जन्म हुआ। इनका परिवार आदिम जनजातीय परंपराओं और मिथकीय ज्ञान को सहेज कर रखने वाला परिवार था। बचपन से ही शोयिंका को अपनी इस पैतृक संपदा को गहराई से जानने-समझने का अवसर मिला, जो आगे चलकर उनके रचनाकर्म का एक विशिष्ट पक्ष बन गया। अश्‍वेत अफ्रीकी जनजातियों में लोकनाट्य, कला और संगीत की समृद्ध परंपरा रही है, जो भारतीय लोक परंपराओं की भांति लोकजीवन में अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम है। अभिव्यक्ति की इसी परंपरा ने शोयिंका को विशिष्ट बनाया। यही वजह है कि नाइजीरिया में कालेज में पढ़ाई के दौरान शोयिंका ने भ्रष्टाचार विरोधी और न्यायप्रिय छात्रों का एक संगठन बनाया और जनसंघर्ष की राजनीति में कूद पड़े। 1954 में वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए। लीड्स विश्‍वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करते हुए शोयिंका ने यूरोपीय साहित्य का विशद् अध्ययन किया। इसी बीच उन्होंने दो महत्वपूर्ण नाटक लिखे, ‘द स्वैम्प ड्वैलर्स’ और ‘द लायन एण्ड द ज्वैल’। दोनों ही नाटक लंदन में मंचित हुए और खासे मशहूर हुए। इन नाटकों में खुद शोयिंका नाटककार होने के साथ अभिनेता भी रहे।

शोयिंका के जन्म के समय नाइजीरिया एक ब्रिटिश उपनिवेश था। 1960 में वापसी के वक्त आजादी की फिजा में लौटे और अफ्रीकी नाटकों के अध्ययन में जुट गए। नौजवानों के लिए उन्होंने एक नाट्य संस्था का भी गठन किया और रंगमंच के अलावा, रेडियो, टेलीविजन के लिए भी लिखने लगे। वतन की आजादी को लेकर लिखा गया उनका नाटक ‘ए डांस आफ द फोरेस्ट’ बहुत मकबूल हुआ। 1962 में वे इफे विश्‍वविद्यालय में अंग्रेजी के व्याख्याता नियुक्त हुए और 1965 में लागोस विश्‍वविद्यालय में वरिष्ठ व्याख्याता के रूप में अध्यापन करने लगे। इसी वर्ष एक नाइजीरियाई प्रांत के चुनावों में सरकार की धांधली को लेकर शोयिंका एक रेडियो स्टेशन पर बंदूक लेकर पहुंचे और विजयी नेता के भाषण की जगह अपनी तीखी प्रतिक्रिया प्रसारित की, जिसकी वजह से सरकार ने उस रेडियो स्टेशन को जब्त कर लिया। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और दो साल बाद रिहा किया गया। 1967 में गृहयुद्ध के दौरान शोयिंका को तानाशाह सरकार ने फिर से एकांत कारावास में डाल दिया, जहां से उन्हें 1969 में रिहाई मिली। जेल में शोयिंका ने टिश्‍यू पेपर पर कविताएं लिखीं। अपने जेल अनुभव उन्होंने ‘द मैन डाइड- प्रिजन नोट्स आफ वोले शोयिंका’ पुस्तक में प्रकाशित किए। वे सिर्फ नाइजीरियाई तानाशाही का ही नहीं, दुनिया की तमाम तानाशाह सरकारों का विरोध करते रहे हैं। इसी कारण उन पर समय-समय पर हमले भी होते रहे हैं। जनरल सानी अबाचा ने तो शोयिंका के लिए मौत का फरमान ही जारी कर दिया था। शोयिंका को मोटर साइकिल पर चोरी छिपे देश छोड़के भागना पड़ा। वे अमेरिका और कई देशों में गए और विश्‍व के नेताओं से मिलकर अपने देश को तानाशाही से मुक्ति दिलाने के लिए विमर्श करते रहे। उनके प्रयासों से ही नाइजीरिया में नागरिक प्रशासन की स्थापना हो सकी। वापसी में जनता ने उनका नायकों की तरह स्वागत किया।

उनकी रचनाओं में 1965 में प्रकाशित उपन्यास ‘द इंटरप्रेटर्स’ अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस उपन्यास में शोयिंका ने नाइजीरिया के दो शहरों इबाडान और लागोस के क्लबों में मिलने वाले बुद्धिजीवियों का वृतांत लिखा है, जो लगातार इस बात पर अपने-अपने ढंग से विचार करते हैं कि नाइजीरियाई वास्तविकता क्या है?  इस जटिल उपन्यास को विश्‍वसाहित्य में जेम्स जायस और विलियम फाकनर के सृजन के समकक्ष माना जाता है। शोयिंका के नाटकों में अफ्रीकी लोक कला रूपों की प्रचुरता के साथ पश्चिमी व यूरोपीय आधुनिकता का गजब का संगम मिलता है। उनकी कविताओं में आदिम अफ्रीकी लोकविश्‍वास और मनुष्य के अंतर्संबंधों का बेहद खूबसूरत वर्णन मिलता है। उन्होंने पाश्‍चात्य साहित्य के अध्ययन से जो दृष्टि प्राप्त की, उसके माध्यम से उन्होंने अपनी योरूब जनजाति के देवताओं को नए रूप में देखते हुए विलक्षण कविताएं लिखीं। दुनिया भर में चल रहे जनसंघर्षों के प्रबल प्रवक्ता वोले शोयिंका ने नेल्सन मंडेला से लेकर आम आदमी तक के लिए सैंकडों कविताएं लिखी हैं, जिसने दुनिया भर के संघर्षरत लोग प्रेरित होते हैं और उनकी रचनाओं के माध्यम से अपने सतत संघर्षों को धार देते हैं। शोयिंका की कविताओं का एक पूरा संग्रह हिंदी के वरिष्‍ठ कवि वीरेंद्र कुमार बरनवाल ने करीब दो दशक पूर्व किया था, जिसे ज्ञानपीठ ने 'विश्‍व भारती' शृंखला में प्रकाशित किया था।

हिंदी में उनकी कविताओं का काफी अनुवाद हुआ है। वरिष्ठ कवि वीरेंद्र कुमार बरनवाल ने तो एक पूरा संग्रह ही शोयिंका की कविताओं का अनुवाद कर दिया, जिसे भारतीय ज्ञानपीठ ने ‘विष्व भारती’ शृंखला में दो दषक पहले प्रकाषित किया था। वोले शोयिंका आज भी निरंतर लिख रहे हैं, लेकिन संयोग से उनकी गद्य रचनाएं हिंदी में कम ही प्रकाषित हुई हैं।
यह आलेख संपादित रूप में राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 14 मार्च, 2010 को प्रकाशित हुआ।



























Sunday, 21 February 2010

आधुनिक अरबी का महान रचनाकार - नजीब महफूज

अरबी साहित्य के इतिहास में पहला और अब तक का अंतिम नोबल पुरस्कार मिस्त्र के नजीब महफूज को 1988 में मिला। लेकिन नजीब इस पुरस्कार से तीन दशक पहले ही अरबी भाषा के इतिहास में वो मुकाम बना चुके थे, जिसमें वे बाल्जाक, तोलस्तोय और चार्ल्‍स डिकेंस के समकक्ष नजर आते हैं। उनके उपन्यासों को लेकर माना जाता है कि आधुनिक अरबी में उपन्यास विधा की शुरूआत संभवत उन्होंने ही की है। उनके उपन्यासों पर अरबी में अनेक चर्चित फिल्मों का निर्माण हुआ है और उन्हें आधुनिक अरबी साहित्य का विश्व में सर्वश्रेष्ठ लेखक माना जाता है। हालांकि बाहरी विश्व में उनको नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद ही पहचाना गया और दुनिया की कई भाषाओं में उनकी कृतियों का अनुवाद हुआ। नोबेल पुरस्कार मिलने की कई वजहों में से एक यह भी रही कि नजीब महफूज ने इस्लामिक जगत में सलमान रूश्दी के खिलाफ दिए गए फतवे की जबर्दस्त भर्त्‍सना की और 'सैटेनिक वर्सेज' के लिए रूश्दी की भी कडी आलोचना की। यद्यपि इसी कारण से उनकी कई कृतियों को मध्य-पूर्व के कई देशों में प्रतिबंधित भी कर दिया गया और उन पर जानलेवा हमले भी हुए। लेकिन इस साहसी लेखक ने अविचलित रहते हुए कट्टरपंथियों के आगे कभी घुटने नहीं टेके।

11 दिसंबर, 1911 को कैरो के एक उपनगर में निम्न मध्यवर्गीय परिवार में जन्में नजीब सात भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। बचपन में मां ने खूब पढने और संग्रहालय दिखाने के बहाने इतिहास से परिचय कराने का जो सिलसिला चलाया वह आगे चलकर साहित्य के संस्कारों में परिणत हुआ। प्रारंभिक शिक्षा के बाद दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर करने पर पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए नजीब महफूज भी प्रशासनिक सेवा में चले गए। इस बीच उन्होंने ढेरों किताबें लिखीं, जिनमें उपन्यास, कहानियां, संस्मरण, इतिहास, वृतांत आदि शामिल हैं। नगीब अखबारों के लिए नियमित स्तंभ लिखते थे और उनके कई उपन्यास अखबारों में धारावाहिक प्रकाशित हुए। उन्होंने अनेक फिल्मों की पटकथा और कहानियां लिखीं, जो खासी प्रसिद्ध हुई। नजीब महफूज चाहते थे कि वे मिस्त्र का आधुनिक इतिहास उपन्यासों के रूप में लिखें, इसलिए प्रारंभ में उन्होंने 30 उपन्यासों की शृंखला पर काम करते हुए तीन उपन्यास लिखे, लेकिन बाद में इस परियोजना को बदल कर खुद को इतिहास के बजाय वर्तमान पर केंद्रित कर लिया। इस क्रम में उन्होंने एक उपन्यास त्रयी लिखी जो बेहद मशहूर हुई। इस त्रयी में नजीब ने 'पैलेस वाक', 'पैलेस ऑफ डिजायर' और 'शुगर स्ट्रीट' उपन्यास लिखे। इन उपन्यासों में प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर 1950 तक तीन पीढियों का जीवंत इतिहास था। इस बीच सत्ता परिवर्तन से विचलित नगीब ने अपनी रचनाएं प्रकाशित करना बंद कर दिया और सात साल बाद प्रकाशन की दुनिया में वापस लौटै। इसके बाद उन्होंने 'चिटचैट ऑन द नील' उपन्यास लिखा, जो काफी लोकप्रिय हुआ । इस्लाम, यहूदी और ईसाई धर्म के विविध पक्षों की कडी आलोचना करने वाले उपन्यास 'चिल्ड्रेन ऑफ अवर ऎली' को सिवाय लेबनान के समूचे अरब जगत में प्रतिबंधित कर दिया गया और आरोप में कहा गया कि नजीब ने इन धर्मो का कथित तौर पर अपमान किया है। नजीब महफूज ने अपने बाद के तमाम उपन्यास और कहानियों के केंद्र में धर्म की पारंपरिक व्याख्या और आधुनिक विचारों को एक मंच पर लाने का प्रयास करते हुए यह सोच रखी है कि आधुनिक विचारों के साथ सामंजस्य बिठाए बिना किसी भी धार्मिक विश्वास को आगे ले जाना मुश्किल है। जब मिस्त्र ने इजराइल से अमरीका की साक्षी में कैंप डेविड शांति संधि पर हस्ताक्षर किए तो नजीब पहले लेखक थे, जिन्होंने उस संधि का समर्थन किया और पूरी अरब दुनिया से दुश्मनी मोल ली। इस वजह से उनकी किताबों को प्रतिबंध का भी सामना करना पडा, लेकिन वे इस सबसे बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए।

मिस्त्र के बाल्जाक कहे जाने वाले नजीब महफूज ने हालांकि कभी मिस्त्र के बाहर की दुनिया नहीं देखी, लेकिन उनकी रचनाओं में आने वाले विचार बताते हैं कि वे कितनी बडी और महान वैश्विक सोच के लेखक हैं। उनकी रचनाओं में दुनिया के श्रेष्ठतम विचार समाहित हैं और यूरोपीय और आधुनिकतावादी विचारों से उनका साहित्य लबरेज है। अपने दृढ विचारों के कारण नजीब महफूज हमेशा अतिवादियों की हिटलिस्ट में रहे, लेकिन उन्होंने अपनी वैचारिक दृढता में कभी कमी नहीं आने दी। 30 अगस्त, 2006 को नजीब महफूज ने अंतिम सांस ली।

राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्‍ट में 21 फरवरी, 2010 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' स्‍तंभ में प्रकाशित।





Sunday, 31 January 2010

ममता और वात्‍सल्‍य की कवयित्री : गेब्रिएला मिस्‍त्राल

साहित्य में नोबल पुरस्कार पाने वाली पहली लेटिन अमेरिकी कवयित्री गेब्रिएला मिस्त्राल का आरंभिक जीवन बड़ी कठिनाइयों में गुजरा। तीन साल की आयु में पिता की मृत्यु के बाद मां और बड़ी बहन के साथ संघर्ष करते हुए गेब्रिएला ने पंद्रह वर्ष की आयु में छद्मनाम से कविताएं लिखना  शुरु किया।  धीरे-धीरे स्थानीय अखबारों में कविताएं प्रकाशित होने लगीं। 7 अप्रेल, 1889 को चिली के विक्यूना गांव में जन्मी गेबिएला का मूल नाम लूसिला गोडोय था, लेकिन अपने दो प्रिय कवियों के नामों को मिला कर अपना छद्मनाम रखा । जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही एक रेलकर्मी रोमिलियो यूरेता से प्रेम हुआ लेकिन अज्ञात कारणों से प्रेमी ने आत्महत्या कर ली। इस हादसे से विचलित कवयित्री गहरे शोक में डूब गई और उसने मृत्यु के गीत लिखना शुरु कर दिया। बीस वर्ष की आयु में इस दुर्घटना ने मिस्त्राल को उस काव्य परंपरा का सूत्रपात करने का अवसर दिया जो लेटिन अमेरिकी साहित्य में पहले कभी नहीं हुआ अर्थात जीवन और मृत्यु को लेकर गहरी संवेदनाओं से ओतप्रोत कविताएं सामने आईं। पच्चीस वर्ष की आयु में चिली की राष्ट्रीय काव्य प्रतियोगिता में गेब्रिएला की मृत्यु गीतों की पुस्तक को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

छोटे बच्चों को पढ़ाकर जीवनयापन करते हुए गेब्रिएला ने तमाम विपरीत परिस्थतियों के बावजूद निरंतर कविता लिखना जारी रखा। उनकी कविता और लेखन के केंद्र में चिली की लचर शिक्षा प्रणाली थी, जिसकी वजह से गरीब बच्चों, खासकर गांवों के बच्चों को अच्छी शिक्षा से वंचित रहना पड़ता था। गेब्रिएला अखबारों में इस पर निरंतर लिखती थीं, इससे स्कूल प्रशासन नाराज रहता था। इसी नाराजगी के कारण पहले स्कूल ने उन्हें जबरन स्कूल से निकाल दिया। कई स्कूलों में अध्यापन करते हुए वे 1921 में चिली के सबसे प्रतिष्ठित सेंटियागो हाई स्कूल की प्रिंसिपल बनीं। इस बीच वे एक स्कूल में 16 साल के पाब्लो नेरुदा से मिलीं और नेरुदा को यूरोपियन कवियों को पढ़ने की सलाह दी। प्रिंसिपल बनने के बाद उनका दूसरा कविता संग्रह आया तो वे अचानक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात हो गईं। इस संग्रह में उन्होंने बच्चों और ईसाई धर्म को लेकर प्रार्थना की शैली में कविताएं प्रस्तुत की थीं। तीन वर्ष बाद तीसरे कविता संग्रह में पूरी तरह बच्चों को लेकर कविताएं लिखीं। प्रिंसिपल बनने के कुछ समय बाद गेब्रिएला को मेक्सिको में स्कूली शिक्षा और पुस्तकालय व्यवस्था में सुधार करने के लिए बुला लिया गया। मेक्सिको से वे अमेरिका और यूरोप चली गईं। वहां वे मुख्य रूप से फ्रांस और इटली में रहीं, और अखबारों के लिए विपुल मात्रा में लिखा। साथ ही साथ वे लीग आफ नेशंस के बौद्धिक प्रकोष्ठ के लिए काम करती रहीं।

गेब्रिएला मिस्त्राल के लेखन में बच्चों के लिए गहरे प्रेम और वात्सल्य को अभिव्यक्ति मिली है। वे बच्चों को ईश्‍वर का प्रतिरूप मानती थीं। एक ईसाई संत ने कहा था कि गेब्रिएला मिस्त्राल की तमाम कविताएं प्रार्थना गीतों की तरह हैं। भारत में उनकी प्रसिद्ध कविता ‘उसका नाम है आज’ बहुत प्रसिद्ध है। यह कविता एस.ओ.एस. बालग्राम का आदर्श गीत बन गई है। गेब्रिएला ने कभी विवाह नहीं किया, लेकिन उनके भीतर मातृत्व की जो अद्भुत धारा अविरल प्रवाहित होती है वह विश्‍व साहित्य में उन्हें नोबल पुरस्कार तक ले गई। 1945 में नोबल पुरस्कार प्रदान करते हुए नोबल कमेटी ने कहा कि अपने मातृत्व भरे हाथें से गेबिएला मिस्त्राल एक ऐसा पेय प्रस्तुत करती हैं, जो धरती का स्वाद देता है और मनुष्य के दिलों को तृप्त करता है। उनकी कविता का निर्झर कभी नहीं थमेगा और लोगों की प्यास बुझाता रहेगा। और निश्‍चय ही गेब्रिएला मिस्त्राल की काव्यधारा 1954 में उनकी मृत्यु के बाद भी विश्‍व साहित्य में अमर है। पाब्लो नेरुदा जैसे कवि को दिशा दिखाने वाली गेब्रिएला को आज भी दुनिया की तमाम भाषाओं में पूरी श्रद्धा के साथ पढ़ा जाता है।

गेब्रिएला मिस्त्राल से मेरा पहला परिचय करीब बीस वर्ष पहले तब हुआ था, जब एक गैर सरकारी संगठन के लिए काम करते हुए मैंने उनकी कविता ‘उसका नाम है आज’ का अनुवाद किया था। हालांकि इस कविता से परिचय एस. ओ. एस. बालग्राम में बालिकाओं को निःशुल्क ट्यूशन पढ़ाने के दौरान हो चुका था, लेकिन उस समय यह पता नहीं था कि यह कविता गेब्रिएला मिस्त्राल की है। प्रस्तुत है कविता:

उसका नाम है आज

हम अपराधी हैं
बहुत सी गलतियों और भूलों के
लेकिन हमारा सबसे बड़ा अपराध है
बच्चों को निस्‍सहाय छोड़ देना
जीवन निर्झर को नकार देना

हमारी जरूरत की बहुत सी चीजें प्रतीक्षा कर सकती हैं
बच्चा प्रतीक्षा नहीं कर सकता

यही है वह वक्त
जब आकार ले रही हैं उसकी अस्थियां
बन रहा है रक्त
और विकसित हो रही हैं उसकी इंद्रियां

उसे हम जवाब नहीं दे सकते ‘कल’
उसका नाम है ‘आज’

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 31 जनवरी, 2010 को प्रकाशित हुआ।





Wednesday, 20 January 2010

मोगली का सर्जक-रूडयार्ड किपलिंग



अगर जन्म के आधार पर नागरिकता मानी जाए तो मुंबई में जन्मे रूडयार्ड किपलिंग पहले भारतीय थे, जिन्हें 1907 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। किपलिंग अंग्रेजी भाषा के पहले लेखक थे, जिन्हें अब तक रिकार्ड सबसे कम उम्र यानी 42 वर्ष की आयु में नोबल पुरस्कार मिला। 30 दिसंबर, 1865 को जन्मे किपलिंग के पिता जे.जे. स्कूल आफ आर्ट्स के प्रारंभिक शिक्षकों में थे। पांच साल की उम्र में किपलिंग को तीन वर्षीय बहन एलिस के साथ पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया। छह बरस तक दोनों भाई-बहनों को एक परिवार के बेहद कठोर अनुशासन में रहना पड़ा। इसके बाद किपलिंग को स्कूल में दाखिल करा दिया गया, जहां की आजाद और खुली हवा में एक रचनाकार के तौर पर किपलिंग में साहित्य के अंकुर फूटे। यहां के अनुभव कई बरस बाद ‘स्टॉकी एंड कंपनी’ कहानी संग्रह के रूप में प्रकाश में आए। स्कूल के बाद आगे की पढ़ाई के लिए किपलिंग को ऑक्सफोर्ड विश्‍वविद्यालय में प्रवेश लेना था, लेकिन आर्थिक हालात इजाजत नहीं देते थे। इसलिए पिता ने किपलिंग के लेखन कौशल को देखते हुए हिंदुस्तान में उसके लिए एक नौकरी ढूंढ़ ली। इस बीच पिता लाहौर चले गए थे, जहां वे मेयो कालेज आफ आर्ट के प्रिंसिपल और लाहौर म्यूजियम के क्यूरेटर थे। युवा किपलिंग को उन्होंने एक साप्ताहिक अखबार में सहायक संपादक की नौकरी दिला दी।

सत्रह साल से भी कम उम्र में अखबार में काम शुरु करने वाले किपलिंग की 21 साल की आयु में कविताओं की पहली किताब प्रकाशित हुई ‘डिपार्टमेंटल डिट्टीज़’। इसी वर्ष नए संपादक ने किपलिंग को अखबार के लिए कहानियां लिखने के लिए कहा तो युवा किपलिंग की लेखनी चल पड़ी। अगले साल से गर्मियों की छुट्टियों में शिमला जाने का सिलसिला शुरु हुआ तो किपलिंग ने शिमला के जनजीवन और प्रकृति को अपनी कहानियों में बेहद खूबसूरती से चित्रित किया। इस बीच 1887 में उन्हें ‘पायोनियर’ अखबार में तबादला कर इलाहाबाद भेज दिया गया। 1888 में पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ ‘प्लेन टेल्स फ्राम द हिल्स’। इसके बाद एक बरस में किपलिंग के छह कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। विशेष संवाददाता के रूप में किपलिंग को राजपूताना भेजा गया, जहां बूंदी में उन्हें एक उपन्यास का विचार सूझा। इस यात्रा के अनुभव अखबार में तो छपे ही पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुए। अगले साल किसी विवाद के कारण किपलिंग को अखबार से छुट्टी दे दी गई। वहां से छह महीने का वेतन अग्रिम मिला और अपनी सात किताबों के अधिकार बेचकर किपलिंग ने एक लेखक के तौर पर जीवनयापन करने का निश्‍चय किया और लंदन के लिए रवाना हो गए।

लंदन में उन्होंने एक कहानी संग्रह और एक कविता संग्रह लिखा, जिनमें भारतीय जनजीवन और ब्रिटिश सैनिकों के अनुभवों का सजीव चित्रण किया गया है। 1894 में किपलिंग ने अपनी विश्‍वविख्यात कृति ‘जंगल बुक’ की रचना की, जिसे आज भी बाल साहित्य की श्रेणी में अप्रतिम माना जाता है। भेड़ियों द्वारा उठाकर जंगल में ले जाए गए बच्चे मोगली की कहानियां इस कदर लोकप्रिय हुईं कि इस पर कई फिल्में और धारावाहिक विश्‍व भर में बने। आज भी यह बच्चों की लोकप्रिय पुस्तक है। स्काउट आंदोलन के प्रणेता बैडन पावेल ने ‘जंगल बुक’ से प्रेरणा लेकर स्काउटिंग के कई कार्यक्रमों की संरचना की। किपलिंग ने इसकी सफलता से उत्साहित होकर इसका दूसरा भाग भी लिखा। इसके बाद वे फिर से कहानियां लिखने लगे और 1899 तक तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। बूंदी में बैठकर उन्होंने जिस उपन्यास की कल्पना की थी वह 1901 में ‘किम’ के रूप में सामने आया। अनाथ आइरिश किशोर किम और बौद्ध भिक्षु तेशू लामा की रोमांचक हिमालय यात्रा और दोनों की अपने-अपने स्तर पर आत्म और अस्मिता की खोजयात्रा बेहद रोचक है। यूं तो इस उपन्यास के दीवाने पूरी दुनिया में हैं, लेकिन यह पंडित नेहरू की भी प्रिय पुस्तकों में रही है।

किपलिंग ने अपने जीवन में यात्राएं बहुत कीं, इसलिए उनके पास दुनिया के कई देशों के अनुभव थे, बहुत से लोगों के जीवन में झांकने का उन्हें मौका मिला, और सबसे बड़ी बात यह कि किपलिंग बेहद कल्पनाशील रचनाकार थे। इसलिए यथार्थ और कल्पना के अद्भुत सम्मिश्रण से वे जबर्दस्त कहानियां, उपन्यास और यात्रा संस्मरण लिख सके। उनकी कल्पनाशीलता इसी से पहचानी जा सकती है कि मोगली जैसे पात्र की रचना उन्होंने अखबार में पढ़ी एक खबर के आधार पर की और उसके इर्द-गिर्द महान बालसाहित्य का सृजन किया। उनके लेखन में ब्रिटिश सैनिकों की पीड़ा, सैनिक होने का गर्व, पराए देश में परिजनों से दूर रहने का दुख, आम भारतीय इंसान का सहज जीवन और यहां का विविधरंगी परिदृश्‍य बखूबी देखने को मिलता है। अंग्रेजी साहित्य में भारतीय जनजीवन का जीवंत और प्रामाणिक चित्रण संभवतः पहली बार किपलिंग ने ही किया। ‘गंगादीन’ जैसे मामूली चरित्र को किपलिंग ने एक कविता से अमरत्व प्रदान कर दिया, जो सैनिकों के लिए महज पानी लाता था। किपलिंग को भारतीय नामों और चीजों से इस कदर लगाव था कि जब अमेरिका में उन्होंने अपना घर बनाया तो उसका नाम रखा ‘‘नौलखा’’। यह नाम लाहौर किले की नौलखा बारादरी से उन्हें सूझा था। किपलिंग की प्रारंभिक पुस्तकों के कवर पर सौभाग्य और समृद्धि के प्रतीक के रूप में स्वास्तिक और सूंड में कमल पकड़े हाथी के चित्र प्रकाशित होते थे, लेकिन कालांतर में जर्मन नाजियों द्वारा स्वास्तिक अपनाए जाने पर अपनी तमाम किताबों से उन्होंने स्वास्तिक हटवा दिए।

किपलिंग की प्रकाशित पुस्तकों की सूची पचास से अधिक है, लेकिन एक ‘जंगल बुक’ ही उन्हें विश्‍वसाहित्य में अमर रखने के लिए पर्याप्त है। पाठकों को उनकी वो रोमांटिक कहानियां बेहद अच्छी लगती हैं, जिनमें अंग्रेज सुदूर देशों की साहसिक यात्राएं करते हैं और विजय प्राप्त करते हैं। हालांकि किपलिंग पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद का पोषक और समर्थक होने के आरोप लगते रहे हैं, किंतु उनके प्रशंसकों का कहना है कि उनकी कहानियों और उपन्यासों के पात्र उपनिवेशवादी मानसिकता के हैं और उसी रूप में किपलिंग ने उनका चित्रण किया है। खुद किपलिंग एक सच्चे देशप्रेमी होने के नाते ब्रिटिश राज की भले ही जयगाथा गाते रहे हों, लेकिन उन्होंने कई बार ब्रिटिश राज के दरबारी कवि और नाइट की पदवी को ठुकराया। 18 जनवरी, 1936 को पेप्टिक अल्सर से किपलिंग का देहांत हुआ।

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्‍ट में 17 जनवरी, 2010 को 'विश्व के साहित्यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।

Sunday, 27 December 2009

एक किताब ने बनाया इतिहास



कई बार किसी लेखक की एक ही कृति इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है कि अनेक महत्वपूर्ण लेखकों की रचनाओं पर सदियों तक भारी पड़ती है। नोबल पुरस्कार के दूसरे ही वर्ष यानी 1902 में ऐसी ही एक ऐतिहासिक महत्व की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ रोम’ के लेखक थियोडोर मॉमसेन को पुरस्कृत किया गया। करीब 1,500 प्रकाशित रचनाओं के रचयिता मॉमसेन का जन्म 1817 में जर्मनी में हुआ। कई भाषाओं के जानकार मॉमसेन की प्रतिभा बहुमुखी थी। विद्वान शोधकर्ता, राजनेता, इतिहासकार, पुरातत्वविद, पत्रकार, न्यायविद और लेखक के रूप में मॉमसेन को उन्नीसवीं सदी के महानतम प्रतिभाशाली जर्मन रचनाकार के तौर पर जाना जाता है। रोम के इतिहास को लेकर तीन खण्डों में लिखे उनके विशालकाय ग्रंथ को आज भी आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। 1902 में नोबल पुरस्कार की दौड़ में उनके साथ महान रूसी लेखक लियो तोलस्तोय भी थे, जिन्हें कभी नोबल पुरस्कार नहीं मिला।

बहरहाल, मॉमसेन के पिता ने बचपन से अपने सुयोग्य पुत्र को जर्मन क्लासिक साहित्य और विक्टर ह्यूगो, बायरन और शेक्सपीयर जैसे रचनाकारों को पढने के लिए प्रेरित किया। प्रारंभ में उनकी शिक्षा-दीक्षा घर पर हुई और कालांतर में उन्हें पढने के लिए इटली और फ्रांस भेजा गया। उन्होंने साहित्य, इतिहास, विधि आदि कई विषयों में गहन अध्ययन किया। एक रचनाकार के रूप में मॉमसेन ने प्रारंभ में कविताएं लिखीं और टाइको और स्टॉर्म भाइयों के साथ पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने ईसाइयत से अपने मोहभंग की कविताएं प्रस्तुत कीं। मॉमसेन की रोम के इतिहास को लेकर 1854, 1855 और 1856 में प्रकाशित इस महती ग्रंथ में मॉमसेन ने ई.पू. 46 से लेकर रोमन साम्राज्य के पतन तक और जूलियस सीजर तक का इतिवृत लिखा। 1925 में जब जॉर्ज बर्नाड शॉ को नोबल पुरस्कार मिला तो उन्होंने मॉमसेन के प्रभाव को स्वीकार किया कि मॉमसेन को पढ़े बिना मैं ‘जूलियस सीजर एण्ड क्लियोपेट्रा’ नाटक नहीं लिख सकता था। इस पुस्तक का महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने रोमन साम्राज्य के इतिहास को समकालीन जर्मन राजनीति के बरक्स रखते हुए एक तुलनात्मक किस्म का इतिहास लिखकर यह दर्शाने की कोशिश की कि इतिहास से कैसे हम अपने समय के घट रहे इतिहास को देख सकते हैं। इसी बिंदु पर उनके काम की खासी आलोचना भी हुई, क्योंकि इतिहास के आईने में समकालीन राजनीति कभी भी स्वयं को देखना पसंद नहीं करती।

यह मॉमसेन की ही विराट प्रतिभा थी कि वे अपने समकालीन महान जर्मन राजनेता बिस्मार्क तक की खुली आलोचना कर सके। जर्मनी के एतिहासिक एकीकरण की शुरुआत करने वाले बिस्मार्क ने जब बर्लिन को जर्मनी की राजधानी बनाया तो मॉमसेन ने कहा, ‘बिस्मार्क ने देश की कमर तोड़ दी है।’ मॉमसेन चाहते थे कि उदारवादी और समाजवादी डेमोक्रेट्स के बीच सामंजस्य बिठाकर दोनों को राष्ट्र के विकास में साथ जोड़ा जाए, यहूदियों को मुख्यधारा में लाया जाए और एक बेहतर तालमेल वाले सौहार्द्रपूर्ण माहौल का निर्माण किया जाए। उस समय इसे अतिवादी विचार माना गया। बिस्मार्क ने मॉमसेन के विचार का प्रत्युत्तर देते हुए कहा कि एक पूर्ण रूप से तैयार राष्ट्र ही उदारवादी सरकार की इजाजत दे सकता है। बिस्मार्क के विचार में वह समय ऐसे विचार के लिए उपयुक्त नहीं था। अगर मॉमसेन की इतिहास दृष्टि से देखें तो उनके विचार को ना मानने से जर्मनी में नाजी विचारधारा को प्रश्रय मिला और हिटलर का उदय हुआ। मॉमसेन चाहते थे कि रोम के इतिहास का चौथा खण्ड लिखें, लेकिन विवादों और आलोचनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक वातावरण ने उन्हें रोक दिया। इस उद्देश्‍य से उन्होंने जो कुछ महत्वपूर्ण सामग्री एकत्र की और जितनी पाण्डुलिपि तैयार की वह 1880 में एक अग्नि दुर्घटना में जलकर खाक हो गई।

मॉमसेन ने 1863 से 1886 के बीच बर्लिन विश्‍वविद्यालय में अपने विद्यार्थियों को जो लेक्चर दिए, उनके नोट्स दो शिष्यों ने एकत्र कर उन्हें पुस्तकाकार प्रकाशित किया ‘ए हिस्ट्री ऑफ रोम अण्डर द एंपरर्स’। इस पुस्तक से रोमन साम्राज्य के बारे में मॉमसेन की इतिहास दृष्टि का पता चलता है, इसे जबर्दस्त खोज माना जाता है। इसमें मॉमसेन रोमन साम्राज्य के अधिकांश शासकों को निष्प्रभावी और दोयम दर्जे का सिद्ध करते हुए बताते हैं कि कमजोर शासकों के कारण ही आगे चलकर रोमन साम्राज्य पतन की ओर उन्मुख हुआ। इतिहास के शिलालेख और पुरालिपियों के अध्ययन में मॉमसेन की भूमिका पथप्रदर्शक की है। रोमन साम्राज्य के इतिहास के साथ मॉमसेन ने उनके संविधान, मुद्रा प्रबंधन, अर्थव्यवस्था, दण्ड संहिता और कई महत्वपूर्ण पहलुओं का विशद अध्ययन किया। इन विषयों पर लिखे गए उनके ग्रंथ आज भी विश्‍व के आधारभूत ग्रंथ माने जाते हैं।










Sunday, 29 November 2009

अर्थवान की तलाश में निरर्थकता के दर्शन का लेखक - अल्बैर कामू



भारत में जिन विदेशी रचनाकारों को सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है, उनमें अल्बैर कामू एक ऐसा नाम है, जिनकी रचनाओं का भारत की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। 1957 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित कामू, रूडयार्ड किपलिंग के बाद दूसरे ऐसे साहित्य़कार हैं जिन्हें महज 44 वर्ष की आयु में वैश्विक प्रतिष्ठा मिली। 7 नवंबर, 1913 को अल्जी़रिया के कृषि मजदूर पिता के घर में जन्मे कामू ने शुरुआत में अत्यंत संघर्षपूर्ण जीवन जीया। जन्म को एक साल भी नहीं हुआ था कि पिता की युद्ध में मृत्यु हो गई। मां की एक हादसे में सुनने-बोलने की क्षमता आधी रह गई थी। लेकिन विधवा मां ने अपने इस इकलौते सपूत के पालन-पोषण में कोई कमी नही रखी। कामू ने छात्रवृत्ति से अपनी शिक्षा जारी रखी। कई किस्म की छोटी-मोटी नौकरियां करते हुए वे एक अखबार के संपादक बने। 22 बरस की उम्र में दर्शनशास्त्र की शिक्षा प्राप्त करते ही दर्शनशास्त्र पर लिखे लेखों की पुस्तक प्रकाशित हुई तो अल्जीरिया में एक लेखक के रूप में कामू की ख्या‍ति फैल गई।


रंगमंच, पत्रकारिता, वामपंथी राजनीति और दार्शनिक-सामाजिक गतिविधियों के बीच कामू ने अपना पहला उपन्या‍स ‘अजनबी’ लिखा और एक उपन्यासकार के तौर पर उनकी कलम का लोहा माना जाने लगा। इस पहले उपन्यास ने बीसवीं सदी के अस्तित्ववादी दर्शन को एक विशाल कैनवास प्रदान किया। जर्मनी के नाजीवाद के कुकृत्यों को कामू ने धर्म, राजनीति, दर्शन और मानव अस्तित्व के सवालों के कटघरे में खड़ा कर यह सिद्ध करने की कोशिश की कि नाजीवाद एक निरर्थक और अमानवीय विचार है, जिसकी वजह से मनुष्य जाति का ही भविष्य संकट में पड़ गया है। इस उपन्यास के साथ ही कामू के सुप्रसिद्ध दार्शनिक लेख ‘मिथ ऑफ सिसिफस’ का प्रकाशन हुआ। इस पुस्तक में कामू ने निरर्थकतावाद के दर्शन को प्रस्तुत किया। कामू की मान्यता थी कि एक अदृश्य ईश्वर की कपोल कल्पना में बनाई गई इस दुनिया में अर्थ, एकता या समरूपता की खोज करना निरर्थक है। ग्रीक मिथक सिसिफस के माध्यम से कामू ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया कि संघर्ष का अपना आनंद है, भले ही वह लोगों की नजरों में निरर्थक हो और सबसे बड़ी बात यह कि सारी निरर्थकता के बावजूद आत्महत्या कोई विकल्प नहीं है, बल्कि विद्रोह और क्रांति ही विकल्प है।

1947 में कामू का एक और विश्वप्रसिद्ध उपन्यास ‘प्लेग’ प्रकाशित हुआ। एक शहर में प्लेग की महामारी फैलने का यह रोमांचक दस्तावेज है, जिसमें कामू की कलम पाठक की समूची चेतना को इस कदर झिंझोड़ कर रख देती है कि पाठक खुद को रोगी समझने लग जाए। विश्वसाहित्य में किसी महामारी की त्रासदी को लेकर लिखा गया संभवत: यह अकेला उपन्यास है। चिकित्सक, मरीज, पत्रकार, प्रशासन और पूरे नगर का महामारी के आतंक में जीता हुआ वातावरण इतनी गहरी संवेदना और लेखकीय संलग्नता के साथ लिखा गया है कि नियति और मानवीय स्थितियों को लेकर ढेरों सवाल उठ खड़े होते हैं। इस उपन्यास की हर पंक्ति अपने भीतर एक से अधिक अर्थ व्यक्त करती हुई पाठक की चेतना को कई स्तरों पर सोचने के लिए विवश करती है। इस उपन्‍यास को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजियों के खिलाफ फ्रांसिसी विद्रोह का प्रतीकात्मक आख्यान भी माना जाता है।

कामू की मान्यता थी कि उपन्यास दर्शनशास्त्र को दृश्य और बिंबों में व्यक्त करने के अलावा कुछ नहीं है। दर्शन और साहित्य के साथ राजनीति में समान विचारों के कारण प्रारंभ में अल्बैर कामू और ज्यां पाल सार्त्र की जबर्दस्त दोस्ती रही, लेकिन आगे चलकर राजनैतिक विचारों में मतभेद के कारण यह दोस्ती टूट गई। कामू और सार्त्र दोनों को अस्तित्ववाद का प्रवर्तक माना जाता है, लेकिन दोनों ने ही इससे इन्कार किया, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद के लेखकों में इन दोनों की प्रसिद्धि विश्वव्यापी रही। कामू ने अपने दार्शनिक और राजनैतिक विचारों के कारण बहुत से मित्रों को भी दुश्मन बना डाला था। वामपंथी झुकाव के बावजूद उन्होंने सोवियत रूस, पोलैंड और जर्मनी की सरकारों के कई निर्णयों की खुलकर आलोचना की। कामू के विचारों में मानवाधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और इसीलिए उन्होंने मृत्युदण्ड की जबर्दस्‍त आलोचना की। सार्त्र से संबंध विच्छेद से पहले कामू ने 1951 में ‘द रिबेल’ पुस्‍तक लिखी, जिसमें सत्ता के विरुद्ध मानव के विद्रोह के विभिन्न स्‍वरूपों और सिद्धांतों की गहरी पड़ताल की गई है।

1956 में कामू का एक और महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुआ ‘पतन’। इसमें एक धार्मिक व्‍यक्ति किसी बार में बैठकर एक अजनबी के सामने अपने द्वारा किये गए अपराध स्वीकार करता है। इस प्रकार कामू जहां धार्मिकता के आवरण में छिपे पाखण्डों को उजागर करते हैं वहीं ज्यां बैप्टिस्ट के चरित्र के कथनों के माध्यम से आधुनिक व्यक्ति पर भी प्रहार करते हैं जो बार में बैठकर अपने गुनाह स्वीकार करता है। कामू ने अपने जीवन में ढेरों कहानियां और नाटक भी लिखे, जिनमें ‘कलिगुला’ नाटक बेहद प्रसिद्ध है। अल्जीरिया उस वक्त फ्रांस का उपनिवेश था, इसलिए कामू मुक्ति संग्राम के सिपाही भी थे। उनके दर्शन में इसीलिए विद्रोही विचारों की व्याप्ति मिलती है। कामू अपने देश को लेकर एक विशाल उपन्यास की रचना करना चाहते थे, जिसमें अल्जीरिया की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास को एक बड़े व्यापक परिदृश्य पर प्रस्तुत करना चाहते थे। एक उपन्यास और कई कहानियां उनकी अधूरी रह गईं। 4 जनवरी, 1960 को एक कार दुर्घटना में उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। निधन के बाद उनकी बेटी कैथरीन ने उनकी अप्रकाशित रचनाओं को प्रकाशित कराया। 1970 में ‘ए हैप्पी डैथ’ का प्रकाशन हुआ, जिसमें ‘अजनबी’ से मिलती जुलती कहानी है। 1995 में ‘द फर्स्ट मैन’ प्रकाशित हुआ, यह कामू का अधूरा उपन्यास है, जिसमें कामू ने अल्जीरिया में अपने बचपन के दिनों की यादें आत्मकथा के रूप में लिखी हैं। कामू ने अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था कि अगर किसी भी चीज का कोई अर्थ नहीं है तो तुम सही हो, लेकिन फिर भी कुछ है जो अर्थवान है। कामू के साहित्य से उन्हीं अर्थवान चीजों को जानने और समझने की शक्ति मिलती है जो तमाम निरर्थकताओं के बावजूद अपने आप में ही नहीं मनुष्य जाति के लिए भी अर्थवान हैं। हिंदी में कामू की अधिकांश साहित्यिक रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं, दार्शनिक विषयों पर लिखी पुस्तकें अभी आना बाकी हैं।

( यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 29, नवंबर, 2009 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।)

Sunday, 1 November 2009

विडम्बनाओं के भंवर में फंसा रचनाकार - सेमुएल योसफ एग्नान



एफ्रो एशियाई भाषा परिवार की हिब्रू भाषा को बाइबिल की पुरानी भाषा होने के कारण हमारी संस्कृत की तरह पवित्र भाषा के रूप में जाना जाता है। प्राचीनता के कारण इस दुर्लभ, दुर्भेद्य और इतनी पुरानी भाषा के आधुनिक साहित्य को अब तक सिर्फ एक बार नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। यह सौभाग्य मिला 1966 में इजराइल के सेमुएल योसफ एग्नान को। 17 जुलाई, 1888 को यूक्रेन के गैलीशिया नगर में जन्मे एग्नान उन चुनिंदा यहूदियों में हैं, जिन्हें विश्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह भी संयोग ही है कि 1966 में उनके साथ एक और यहूदी लेखिका नेली शेक्स को भी संयुक्त रूप से साहित्य का नोबल प्रदान किया गया। यहूदी समुदाय के विस्थापन के त्रासद इतिहास को इस प्रकार वैश्विक संवेदना का स्पर्श मिला। एग्नान का जबर्दस्त गद्य हमें यहूदियों के ऐतिहासिक संघर्ष और आधुनिक विश्व के साथ उसके त्रासद यथार्थ के चित्र दिखाता हुआ एक ऐसी दुनिया प्रस्तु‍त करता है, जिसमें मजहब, जाति, और नस्ल के आधार पर किसी का दमन नहीं होना चाहिए। लेकिन पूंजी के क्रूर खेल ने सदियों से मानवता का इसी प्रकार अहित किया है, जिसे हिब्रू में एग्नान की तरह लिखने वाले रचनाकार तमाम भाषाओं में मिल जाएंगे।


एग्नान ने पांच साल की उम्र से लिखना शुरु किया और जल्द ही उनकी प्रसिद्धि इस कदर फैल गई कि गायक उनके गीत गाने लगे। बीस बरस की उम्र में कविताएं और कहानियां प्रकाशित होने लगीं। खुद जीवन की राह बनाने के लिए एग्नान घर छोड़कर पहले फिलीस्तीन गए, फिर एक प्रकाशक के कहने पर जर्मनी में रहने लगे। लेकिन भाग्य की विडम्बना देखिए कि प्रथम विश्वयुद्ध ने एग्नान का सब कुछ समाप्त कर दिया। उनका घर आग की भेंट चढ़ गया और सब कुछ स्वाहा हो गया। पांच साल बाद फिर यहूदी विरोधी नाजी माहौल में उनका घर जला दिया गया। दो बार की आगजनी में उनकी पांच हजार किताबें और दो अधूरे उपन्यास, जिनमें एक के सात सौ पेज वे लिख चुके थे, और बहुत सी महत्वपूर्ण सामग्री खाक हो गई।

इतने झंझावातों के बीच 1931 में जब उनका उपन्यास ‘द ब्राइडल कैनोपी’ प्रकाशित हुआ तो हर तरफ से उनकी सराहना की गई। कहा गया कि आधुनिक हिब्रू को एक नया विश्वस्तरीय रचनाकार मिल गया है। इस उपन्यास में एग्नान ने एक ऐसे सरल, भोले और वृद्ध आस्थावान व्यक्ति का चरित्र लिखा जो उन्नीनवीं सदी के प्रारंभ में एक उजाड़ नगर में अपनी बेटी के लिए दूल्हा खोजने के लिए निकला। यह वही उजाड़ नगर था जिसमें एग्नान ने बचपन और किशोरावस्था के दिन बिताए थे। इस उपन्यास की सरवांतीस के महान उपन्यास ‘डॉन क्विक्‍जोट’ से तुलना की गई। अपनी स्मृतियों के शहर गैलीशिया और यरूशलम को एग्नान यहूदी मिथकों और इतिहास के माध्यम से अपनी तमाम रचनाओं में विविध प्रकार से खोजते रहे। ‘ए गेस्ट फॉर द नाइट’ में एग्नान ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद नष्ट हुए अपने शहर का मार्मिक चित्रण किया और इस उपन्यास के माध्यम से यूरोप में यहूदी समुदाय का भविष्य देखने का प्रयत्न किया। लेकिन उनका सबसे महत्वहपूर्ण उपन्यायस ‘द डे बिफोर यस्टरडे’ है, जिसमें बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में यहूदियों के सर्वनाश के बाद वैश्विक शरणार्थी बन जाने की महागाथा है। इस उपन्यास में एग्नान ने प्राचीन और तत्कालीन यहूदी जीवन को इस खूबसूरती के साथ पिरोया कि एक महानायक और एक कुत्ते की कथा ने समूचे यहूदी समुदाय की विडंबनाओं को पूरी शिद्दत से उजागर कर दिया।

17 फरवरी, 1970 को एग्नान का निधन हुआ। इस अवधि में उनकी दर्जनों किताबें प्रकाशित हुईं, जिनमें से कई का अंगेजी और जर्मन में अनुवाद हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी ने उनके अप्रकाशित साहित्य के सुव्युवस्थित प्रकाशन का काम किया। आज इजराइली साहित्य के युवा अध्येता निरंतर एग्नान के साहित्य पर शोध कर रहे हैं। मृत्यु से पूर्व उनकी प्रतिष्ठा का आलम यह था कि स्थानीय प्रशासन ने लेखक की शांति में खलल ना पड़े, यह ध्यान में रखते हुए उनके घर के पास से गुजरने वाली सड़क पर वाहनों का आवागमन बंद कर दिया गया और बाकायदा बोर्ड लगा दिया, ‘वाहनों का प्रवेश निषेध, लेखक काम पर है’।

एग्नान की रचनाएं यहूदियों के लिहाज से बेहद आधुनिक हैं, क्योंकि वे यहूदी समुदाय की बहुत सी धारणाओं को तोड़ते हुए इतिहास से निकलकर वर्तमान में जीने की बात करते हैं। लेकिन यहूदी धर्म के इतिहास और बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य में उनकी रचनाएं एक भिन्न किस्म का यहूदी पाठ प्रस्तुत करती हैं, जिसमें यहूदी समुदाय की वैयक्तिक और सामुदायिक पहचान का प्रश्न इतिहास और वर्तमान के बीच एक विडंबना की तरह अनुत्तरित रह जाता है। बदलते समय के बीच संस्कृतियों को बचाने का जो संकट पैदा होता है, उसे एग्नान ने खूबसूरती से बयान किया है, लेकिन यहूदी धर्म का आधुनिक जगत से मिलान करते हुए उसकी प्रासंगिकता की तलाश में उन्हें कुछ मूल्यवान नहीं मिलता और यही उनके लेखन और विषयवस्तु की सबसे बड़ी सीमा है। आलोचक लिपमैन बोडोफ के अनुसार एग्नान अतीत और भविष्य, धर्म और प्रकृति, अध्यात्म और विज्ञान, एकेश्वरवाद और बहुदेववाद, यहूदी परंपरा और यूनानी व रोमन संस्कृति, ईश्वर और प्रकृति... इन सबके बीच घूमते हुए बहुत सूक्ष्म विश्लेषण तो करते हैं लेकिन शायद नहीं जानते कि ऐसी रस्साकशी में विजेता साफ तौर पर किसी एक को नहीं कहा जा सकता। इसके साथ-साथ एग्नान की भाषा और कथावस्तु इतनी गंभीर और इस कदर संश्लिष्ट है कि मूल हिब्रू से उनका अनुवाद भी अत्यंत कठिन है। वजह यह भी है कि एग्नान ने अपनी रचनाओं में धर्मग्रंथों के विशद उद्धरण दिए हैं, जिन्हें सामान्य हिब्रू का ज्ञान रखने वाला भी नहीं समझ सकता। इसीलिए आलोचक उन्हें बहुत दुर्भेद्य और अनुवाद के लिहाज से अनुपयुक्त लेखक मानते हैं।

एग्नान ने अपने नोबल भाषण में जो महत्ववपूर्ण बातें कहीं उनमें दो का जिक्र बहुत जरूरी लगता है, क्योंकि वह भारतीय परंपरा से मिलता है। एग्नान ने अपने लेखन पर विभिन्न लेखकों और पुस्तकों से पड़े प्रभावों का जिक्र करते हुए कहा कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि कौनसी गाय के किस दूध से मेरा शरीर बना है, वैसे ही मेरे लिए लेखकों-प्रेरकों का जिक्र करना भी मुश्किल है। इसी प्रकार उन्होंने कहा था कि हमारी महान परंपरा के अनुसार किसी भी खुशी के अवसर को बिना ईश्वरीय आशीर्वाद या अनुकंपा के ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए, वो ईश्वर हमें आशीष दे जिसने इस रक्त–मांस-मज्जायुक्त देह में चेतना दी है। भारतीय काव्य परंपरा जैसा यह अद्भुत  आह्वान हमें विश्व्साहित्य में सेमुअल योसफ एग्नान की रचनाओं में मिलता है।
( यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय में 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में 25 अक्‍टूबर, 2009 को प्रकाशित हुआ।)