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Tuesday, 1 February 2011

गुलाबी नगरी में लेखकों का मेला

जयपुर में साहित्य का महाकुंभ इस बार छठे वर्ष में प्रवेश कर भारतीय ही नहीं वैश्विक क्षितिज पर एक नई पहचान छोड़ गया, जिसमें साल दर साल पर्यटन नगरी जयपुर की पहचान साहित्य और संस्कृति के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में बनती दिखाई देती है। 21 जनवरी, 2011 की सुबह पारंपरिक वाद्य यंत्रों के तुमुल नाद के साथ आरंभ हुए लिटरेचर फेस्टिवल का आगाज मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत, विद्वान राजनेता डा. कर्ण सिंह और संस्कृत के अमेरिकी विद्वान पद्मश्री डा. शेल्डेन पोलक ने किया। इसके बाद नोबेल पुरस्कार से सम्मानित तुर्की के विश्वप्रसिद्ध उपन्यासकार ओरहान पामुक से खुले सत्र में संवाद हुआ। युवा लेखक चंद्रहास चौधुरी के साथ संवाद में ओरहान पामुक ने कहा कि पूरी दुनिया में लोगों के दिल एक जैसे हैं, मन एक जैसे हैं, बस सांस्कृतिक भिन्नता और रहन-सहन की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए दुनिया की किसी भी भाषा में लिखा जाने वाला साहित्य लोगों के मन को छूता है क्योंकि उन्हें अपने आसपास जैसी एक दूसरी दुनिया देखने को मिलती है। पामुक ने कहा कि भारत की पारंपरिक चिंतन प्रणाली में बहुत कुछ ऐसा है जो लोगों को अपने समय की सचाइयों को नए ढंग से देखकर लिखने के लिए प्रेरित कर सकता है। पामुक ने ‘आर्ट आफ नावल’ पर बात करते हुए कहा कि लेखक की अपनी राजनैतिक समझ होती है जो उसकी रचना प्रक्रिया में पक कर एक नए रूप में सामने आती है।

पांच दिन चले साहित्य के इस महाकुंभ में इस बार भारत सहित दुनिया के बीस से अधिक देशों के 220 से अधिक लेखकों ने भागीदारी की। दो बार के बुकर विजेता जे.एम. कोएट्जी के साथ अमेरिका से रिचर्ड फोर्ड और जेय मैकिरनरी जैसे अंग्रेजी के विख्यात लेखकों के साथ विक्रम सेठ, इरविन वेल्श और मोहसिन हामिद भी इस महामेले में शामिल हुए। इस सूची में वो लेखक, संपादक, लिटरेरी एजेंट और प्रकाशक शामिल नहीं हैं जो इस विशाल साहित्यिक मेले का लुत्फ उठाने दुनिया के कई कोनों से यहां पहुंचे। पिछले दो-तीन वर्षों से इस साहित्योत्सव में दक्षिण एशिया पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की गई है, जिसकी वजह से पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और भूटान जैसे पड़ौसी मुल्कों के लेखक भी इसमें शिरकत कर रहे हैं। इन प्रयासों से इस उपमहाद्वीप के देशों में सांस्कृतिक संबंध बेहतर बनाने में खासी सफलता मिल सकती है। पहली बार अफगानिस्तान के मशहूर लेखक अतीक रहीमी की इस उत्सव में भागीदारी हुई तो नेपाल से नाराण वागले और मंजुश्री थापा की आमद हुई।

हिंदी और भारतीय भाषाओं के लेखकों की इस उत्सव में भागीदारी साल दर साल बढती जा रही है। इस बार हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर कुछ नए विषयों पर कवि, लेखक और पत्रकारों के बीच रोचक और सार्थक संवाद हुए। जन्मशताब्दी वर्ष में अज्ञेय, नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह पर ओम थानवी, महेंद्र सुधांश और सुधीश पचौरी के बीच अविनाश के साथ संवाद हुआ। ‘‘ऐसी हिंदी कैसी हिंदी’’ पर मृणाल पांडे, रवीश कुमार, सुधीश पचौरी और प्रसून जोशी के बीच सत्‍यानंद निरूपम के संयोजन में रोमांचक बातचीत हुई। इसी तरह ‘नई भाषा नए तेवर’’ में गिरिराज किराडू, मोहल्ला लाइव के अविनाश और मनीषा पांडेय के बीच रवीश कुमार के साथ उत्तेजक चर्चा हुई। उर्दू जुबान को लेकर गीतकार जावेद अख्तर ने बहुत तल्खी के साथ कहा कि जुबानों का ताल्लुक मजहब से नहीं होता, इलाकों से होता है, लेकिन यह तकलीफ देने वाली बात है कि जहां उर्दू पढ़ने-लिखने वाले लोगों की कमी हो रही है, वहीं उर्दू सुनने वालों की तादाद में इजाफा हो रहा है। तेजी से लोकप्रिय हो रहे भोजपुरी सिनेमा पर भी एक सत्र में अविजीत घोष और कुमार शांता का अमिताव कुमार के साथ संवाद हुआ।

मराठी थिएटर, कश्मीर, रामायण और बुल्ले शाह पर भी कई सत्रों में खुलकर चर्चा हुई। बुल्ले शाह को भारत-पाक के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत आधार बताते हुए पत्रकार गायक मदनगोपाल ने कई नई जानकारियां देते हुए उनके कलाम को बेहद खूबसूरती से पेश किया। राजस्थान की राजधानी में आयोजित इस उत्सव में प्रदेश के हिंदी व राजस्थानी लेखकों की भी शिरकत रही। लेखकों में आपसी संवाद से पता चला कि इस बार राजस्थान से लेखकों का चयन अगर और बेहतर होता तो राजस्थान की समकालीन रचनाशीलता का एक बेहतर स्वरूप सामने लाया जा सकता था। स्थानीय लेखकों में इस बात को लेकर भी किंचित क्षोभ था कि इस बार आयोजन में उनकी भागीदारी के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी।

दक्षिण एशियाई साहित्य के लिए शुरु हुआ डीएससी पुरस्कार पहली बार अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार एच.एम. नकवी को हार्परकॉलिंस से प्रकाशित उपनके उपन्यास ‘होम बॉय’ के लिए प्रदान किया गया। दक्षिण एशिया के इस सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार में नकवी को पचास हजार अमेरिकी डॉलर और प्रतीक चिन्ह प्रदान किया गया। इस पुरस्कार के निर्णय से बहुत से लोगों को आश्‍चर्य भी हुआ, क्योंकि सब यही मान कर चल रहे थे कि यह पुरस्कार अमित चौधुरी को ‘द इम्मोर्टल्स’ पर दिया जाएगा। पुरस्कार के लिए चयनित अंतिम पांच लेखकों में अमित सबकी पहली पसंद थे।

पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए आयोजकों ने इस बार कार्यक्रम स्थल डिग्गी पैलेस का काफी विस्तार किया लेकिन आमजन और विद्यार्थियों की जबर्दस्त भागीदारी ने सिद्ध कर दिया कि इस साहित्योत्सव को लेकर उनमें बेहद उत्साह है और इसीलिए बावजूद तमाम इंतजामों के हर जगह लोगों की भीड़ छाई रही और लोगों को बैठने के लिए ही नहीं चलने के लिए भी जगह कम पड़ गई। अगली बार संभवतः आयोजकों को नई जगह तलाश करनी होगी, क्योंकि इसमें सिनेमा की मशहूर हस्तियों की उपस्थिति के वक्त तो बेकाबू भीड़ जमा हो जाती है, जो निश्चित रूप से आने वाले सालों में बढती जाएगी। साहित्य के इस विशाल मेले में प्रायोजकों की संख्या भी बढती जा रही है। साहित्य के नाम पर इस बढते हुए बाजारवाद को लेकर विगत तीन साल से जयपुर आ रहे एक अमेरिकी पत्रकार की टिप्पणी थी कि हर साल यह साहित्योत्सव व्यावसायिक अधिक होते जा रहा है जो बेहद चिंताजनक है।

यह रपट संपादित रूप में हिंदी आउटलुक के फरवरी 2011 अंक में प्रकाशित हुई है।



Saturday, 30 January 2010

अनुभवों का महामेला

जयपुर में पांच साल से होने वाला अंतर्राष्ट्रीय साहित्य उत्सव अब नई उंचाइयां छूने लगा है और जयपुर के पर्यटन उद्योग के साथ कदमताल करते हुए जयपुर की नई पहचान बन चुका है। चार साल पहले जब यह उत्सव शुरु हुआ था, तब किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि फिल्मी सितारों और अंग्रेजी तथा विदेशी लेखकों मुख्‍यत: विक्रम सेठ, सलमान रुश्‍दी, शोभा डे जैसे ख्यातनाम लोगों की चकाचौंध से लबरेज जयपुर इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल आगे चलकर इस रेगिस्तानी राजधानी को साहित्य के केंद्र में ले आएगा।

नगाड़ो की ताल और शंखनाद के साथ 21 जनवरी, 2010 की सुबह खुशगवार मौसम में डीएससी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का शुभारम्भ हुआ। मशहूर अंग्रेजी लेखक विलियम डैलरिंपल, गुलजार, अभिनेता राहुल बोस और कई देशी- विदेशी लेखकों की मौजूदगी में साहित्योत्सव का आगाज हुआ। विलियम डैलरिंपल ने 2006 से चले आ रहे उत्सव की मुख्य बातों का जिक्र करते हुए इस विश्‍व के अनूठे साहित्य उत्सवों में से एक बताया। नमिता गोखले ने साहित्योत्सव के प्रमुख सत्रों की जानकारी दी।

इस बार इस आयोजन में दलित लेखन को लेकर दो विशेष सत्र रखे गए, जिनमें लेखक कांचा इलैया ने जन विवेक, उनकी उपेक्षा, दलितों और अछूतों से जुड़ी सोच, भ्रांतियों, हिंदू होने की गलत विचारधारा जैसे मुद्दे पर बात की। उन्होंने हिंदूवाद को आत्मिक फासीवाद करार दिया। हिंदी लेखक ओम प्रकाश वाल्मिकी ने साहित्योत्सव के 5वें वश में दलित लेखन पर ध्यान दिए जाने पर आभार जताया। मराठी, तेलगु और दक्षिण भाषाओं में इस साहित्य में रचे जाने की बात करते हुए उन्होंने साहित्य के भी दलित होने का प्रश्‍न उठाया। पी. सिवकामी ने हरिजनों के योगदान की उपेक्षा, हरिजन शब्द का अर्थ गैर दलितों की पिटी-पिटाई सोच और रंगभेद पर बात की। अजय नावरिया ने ‘अब और नहीं’ सत्र में शिरकत करते हुए दलित लेखन के मूल प्रश्‍नों को रेखांकित किया। पंजाबी दलित लेखन पर एक विशेष सत्र आयोजित किया गया। भारतीय दलित लेखन को लेकर हिंदी की पहली द्विभाषी ऑनलाइन पत्रिका ‘प्रतिलिपि’ ने अपना केंद्रित अंक भी इस अवसर पर जारी किया।

इस बार के साहित्योत्सव में पड़ौसी मुल्कों के साथ संबंधों पर चर्चा करने के लिए पाकिस्तान, श्रीलंका से भी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता आए। पहली बार सिंधी भाषा को लेकर एक विशेष सत्र में चर्चा हुई, जिसमें पाकिस्तान से भी लेखक आए। हिंदी, राजस्थानी, उर्दू और संस्कृत साहित्य के भी सत्र हुए, जिनसे एक भारतीयता का अहसास हुआ। हालांकि उर्दू साहित्य से सिर्फ शीन. काफ. निजाम की शिरकत के कारण उर्दू वालों की थोड़ी नाराजगी भी रही। स्थानीय लेखकों में इस बात को लेकर खासी चर्चा रही कि पिछले साल विक्रम सेठ के सार्वजनिक मंच पर शराब पीने को लेकर विवाद खड़ा करने वाला दैनिक भास्कर अखबार इस दफा भाषा शृंखला का आयोजक बन गया।

इस विराट आयोजन में भाग लेने वाले नामी गिरामी लेखकों में नोबल पुरस्कार से सम्मानित कवि वोल शोयिंका का आगमन मुख्य आकर्षण रहा। उन्होंने अपनी रचनात्मक यात्रा के बारे में बात करते हुए कहानी कहने की कला, अपनी किताब के प्रकाशन और नोबेल पुरस्कार से जुड़े अनुभवों को सबके साथ साझा किया। फिल्मी हस्तियों में ओम पुरी, जावेद अख्तर, शबाना आजमी, गिरीश कर्नाड, प्रसून जोशी आदि ने शिरकत की। ओम पुरी ने कर्नाड के नाटक ‘तुगलक’ के अंशों का पाठ किया, वहीं उनकी पत्नी नंदिता ने ओम पुरी पर लिखी अपनी चर्चित पुस्तक के अंश पढ़े। गुलजार, जावेद अख्तर और प्रसून जोशी ने कविता पाठ किया। शबाना आजमी ने अपनी मां की पुस्तक के अंश सुनाए।

इस साहित्योत्सव की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहां लेखक खुद अपने पाठकों से मुखातिब होता है। वह रचना पाठ करता है, पाठकों के सवालों के जवाब देता है और पाठकों व प्रशंसकों के बीच एक सामान्य व्यक्ति की तरह रहता है। कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, सब एक साथ भोजन करते हैं और किसी को वीआईपी नहीं समझा जाता। पाठक अपने प्रिय लेखक या कलाकार के साथ बातचीत करने के साथ फोटो भी खिंचवा सकते हैं।

राष्ट्रीय व अंतर्राष्‍ट्रीय ख्यातिप्राप्त सैंकड़ों लेखकों-कलाकारों का यह महामेला पांच दिन तक चलता है, जिसमें साहित्य के अलावा इतिहास, भाषा, संस्कृति, कला, सिनेमा, क्रिकेट से लेकर जीवन के विविध पक्षों पर बात होती है। रोज कई किस्म के सांस्कृतिक आयोजन भाग लेने वालों का ज्ञानवर्द्धन और मनोरंजन करते हैं। नाटक, नृत्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला और साहित्य का यह कुंभ छोटी काशी कहे जाने वाले जयपुर का महत्वपूर्ण वार्षिक आयोजन बन गया है। स्थानीय लेखक इस बात की शिकायत जरूर करते हैं कि इसमें अंग्रेजी का वर्चस्व है और भारतीय भाषाओं को कम महत्व दिया जाता है।

यह आलेख 'आउटलुक' हिंदी मासिक के फरवरी, 2010 अंक में प्रकाशित हुआ।



Thursday, 29 January 2009

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल: सबको सबक सिखाता उत्सव

पिछले चार साल से जयपुर में चला आ रहा ‘जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल’ एशिया में जापान के बाद संभवतः सबसे बड़ा साहित्यिक उत्सव है। इस उत्सव की सबसे अहम बात यह है कि यह लगभग पूरी तरह निजी और कार्पोरेट प्रयासों प्रयासों से आयोजित होता है और इसमें दुनिया भर के लेखक और प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े लोग शिरकत करते हैं। हर साल इसमें भाग लेने वाले लेखकों, कलाकारों और प्रकाशकों की संख्या बढ़ती जा रही है। प्रारंभ में विभिन्न साहित्यिक हलकों से इस उत्सव की इस बात के लिए आलोचना होती थी कि इसमें सिर्फ अंग्रेजीदां विशिष्टजनों और प्रभुवर्गीय लेखकों का ही वर्चस्व रहता है। किंतु साल दर साल आयोजकों ने अपनी आलोचनाओं से जो कुछ सीखा है, उससे इसकी गुणवत्ता में ही नहीं, प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई है। यही वजह है कि भारतीय भाषाओं के साथ-साथ, अब इसमें राजस्थानी और उर्दू के साथ हमारी देवभाषा संस्कृत के लेखकों का भी प्रतिनिधित्व होने लगा है और अगर आयोजकों के किये गये वादों पर विश्वासकरें तो अगले साल से भारतीय भाषाई लेखकों के साथ-साथ राजस्थान की समृद्ध समकालीन रचनाशीलता को भी पहले से कहीं अधिक सम्मानजनक प्रतिनिधित्व मिलेगा। दरअसल इस संभावना के पीछे स्थानीय लेखकों की नाराजगी के समानांतर अंतर्राष्ट्रीय लेखकों का भी आग्रह है, जिसमें वे चाहते हैं कि अधिक से अधिक स्थानीय और भारतीय भाषाई लेखकों के साथ उनका रचनात्मक और आत्मीय संवाद कायम हो सके। अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखकों की भांति अन्य भाषाई लेखकों की भी अनुवाद के माध्यम से दुनिया भर में ख्याति है। इस उत्सव में आने वाले विदेशी लेखक और प्रकाशक जानते हैं कि अभी भी बहुत से ऐसे लेखक-रचनाकार मौजूद हैं, जिनकी रचनात्मकता अंतर्राष्ट्रीय स्तर की है और उसे व्यापक रूप से प्रतिष्ठित किया जा सकता है। विदेशी लेखकों के लिए इस प्रकार का संवाद भारतीय जनमानस को और अधिक नजदीकी से देखने का अवसर प्रदान करेगा।


जयपुर विरासत फाउंडेशन द्वारा आयोजित किये जाने वाले इस साहित्य उत्सव में इस बार पांच दिन में तकरीबन सौ के आसपास कार्यक्रम हुए, जिनमें साहित्य, समाज, प्रकाशन जगत, अनुवाद से लेकर कला, संगीत, धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद जैसे ज्वलंत विषयों पर भी खुलकर चर्चा हुई। हर शाम देश-विदेश के लोकप्रिय और लोक कलाकारों के संगीत कार्यक्रम खास आकर्षण का केंद्र रहे, तो आॅस्कर के लिए नामांकित ‘स्लमडाॅग मिलियनेयर’ का विशेष प्रदर्शन और वह भी इसके लेखक विकास स्वरूप की उपस्थिति में, उत्सव को अलग रंग दे गया। पुस्तक और चित्र प्रदर्शनियों ने माहौल को रचनात्मक रूप से समृद्ध किया। यहां पाठक अपने प्रिय लेखकों की किताबें, उनके हस्ताक्षरों सहित प्राप्त कर सके। इसमें भी खास बात यह रही कि अनेक पाठक अपनी मनपसंद किताबों को प्राप्त करने से सिर्फ इसलिए वंचित रहे कि आनन-फानन में ही किताबें बिक गईं। हमारे ही नगर के एक वरिष्ठ कवि की पुस्तक पहले दिन ही समाप्त हो गई और राजस्थान के लगभग सभी लेखकों की पुस्तकें हाथों-हाथ बिक गईं। इस उत्सव में अगर यह प्रतिबंध हटा दिया जाये कि इसमें भागीदार लेखकों की ही किताबें बिक्री के लिए उपलब्ध होंगी तो पाठकों को अन्य महत्वपूर्ण लेखकों की पुस्तकें भी खरीदने का मौका मिलेगा। इसमें विशेष रूप से भारतीय भाषाओं के लेखकों की पुस्तकों की अलग से प्रदर्षनी होनी चाहिए। आखिरकार हम भारतीय साहित्य और इसके साहित्यकारों के प्रोत्साहन में ही तो इस उत्सव का महत्व देखते हैं । सामान्य तौर पर इसकी उम्मीद नहीं कर सकते, वजह यह कि हम हिंदी समाज के लोग यह मानकर चलते हैं कि पाठक पढ़ना नहीं चाहता और हिंदी के प्रकाषक तो पाठक और लेखक को दो जुदा दुनिया के लोग मानकर चलते हैं। इसीलिए हिंदी का प्रकाषक सिर्फ सरकारी खरीद और पुस्तकालयों में किताबें खपाने की तरफ ही ध्यान देता है। इस उत्सव से कम से कम हिंदी के प्रकाषकों को यह तो सीखना ही चाहिए कि पाठक और लेखक के बीच आत्मीय संवाद के माध्यम से किताबों को वास्तविक पाठक तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है और इस प्रकार एक बड़े बाजार को पाया जा सकता है, तब शायद किसी प्रकाषक को सरकारी खरीद की आस में रिष्वतखोर सरकारी तंत्र की जी हुजूरी नहीं करनी पड़ेगी। अंग्रेजी का अच्छा प्रकाषक सिर्फ और सिर्फ पाठक पर ध्यान देता है, इसीलिए वहां लेखक की पहली किताब भी महत्वपुर्ण हो जाती है, जबकि हमारे यहां दर्जनों किताबें लिखने के बावजूद लेखक को कोई महत्व नहीं मिलता। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल निष्चिित रूप से अभी भी अंग्रेजीदां लोगों के पूर्ण प्रभाव में है। संभवतः यह एक अंतर्राष्टीय मजबूरी है, वैसे अगर आप कोई अखिल भारतीय आयोजन भी करें तो वह भी अंग्रेजी से मुक्त नहीं हो सकता। लेकिन इस किस्म के आयोजनों की खास खूबी यह होती है कि आपको एक साथ देष-दुनिया की कई भाषाएं सुनने को मिलती हैं। जैसे इस बार षक्तिदान कविया ने डिंगल में और के. सच्चिदानंदन ने मलयालम में कविता पाठ किया तो पाठक-श्रोताओं को एक बिल्कुल भिन्न तरह की भाषाओं को आस्वादन करने का मौका मिला। इसी तरह राजस्थानी और बांग्ला बाउल लोक कलाकारों के कार्यक्रम में भाषा के साथ संगीत की लय भी देखते ही बनती थी। विदेषी लेखक यही चाहते हैं, दरअसल भाषिक सौंदर्य का आस्वाद तमाम लेखकों को भाता है। मुझे एक अमेरिकी लेखक ने कहा कि मैं चाहता हूॅं कि यहां भारत की विभिन्न भाषाओं के लेखकों को उनकी मूल भाषा में सुनने का अवसर मिले, हम भले ही उसे आत्मसात न कर पायें, परंतु हम वाणी का सौंदर्य तो पहचान ही सकते हैं, हमारे लिए इसका संक्षिप्त अनुवाद हो जाये तो हम उसे और अच्छे ढंग से समझ सकेंगे। वैसे यह हमारी गलतफहमी है कि विदेषी हिंदी नहीं समझते। दरअसल भारत आने से पहले अधिकांष लेखक हिंदी का संक्षिप्त पाठ्यक्रम सीखकर आते हैं, जिसमें उन्हें सामान्य षिष्टाचार के साथ आम तौर पर काम आने वाली रोजमर्रा की हिंदी सिखाई जाती है। इसीलिए आपको कोई ना कोई विदेषी लेखक इस किस्म के समारोह में हिंदी बोलता दिखाई दे जायेगा।इस किस्म के आयोजनों की सबसे बड़ी कमी यह रहती है कि इनमें आम आदमी की चिंताओं के बजाय उन बातों को ज्यादा महत्व दिया जाता है, जिनसे उच्च और मध्य वर्ग का रिष्ता रहता है। यद्यपि आतंकवाद और धार्मिक कट्टरवाद जैसी चीजें सभी को समान रूप से प्रभावित करती हैं, जिन पर इस बार खुलकर चर्चा हुई, जिनमें भाग लेने वाले लोगों के साथ उपस्थित लोगों के संवाद से पता चला कि सामान्य भारतीय न तो धार्मिक कट्टरपंथ के साथ है और न ही वह उन्हें किसी किस्म से बढ़ावा देना पसंद करता है। फिर भी राजस्थान के मालीराम शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘ओ सतासर’ के अंष का पाठ किया तो गरीब किसान जीवन का दर्दनाक पहलू सामने आया और सरवत खान के ‘अंधेरा पग’ से राजपुरोहित समाज की सदियों पुरानी महिला विरोधी परंपराओं का दिल दहला देने वाला पक्ष उजागर हुआ। इस तरह के जमीन से जुड़े लेखकों की अगर अधिक से अधिक भागीदारी हो तो इस अंतर्राष्टीय साहित्य उत्सव में भारतीय जनजीवन का सच्चा लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जा सकता है।स्थानीय लेखकों के साथ इसमें कुल तीन सौ के करीब लेखक और प्रकाषकों ने भाग लिया। निष्चित रूप से इसमें भारतीय और राजस्थानी भागीदारी कम है, इसमें कम से कम प्रतिदिन दो सत्र भारतीय भाषाई लेखकों के लिए होने चाहिएं। इससे भारत के बहुभाषी, सांस्कृतिक वैविध्य वाले बहुरंगी भारतीय साहित्य की छवि दुनिया भर के लेखक-प्रकाषक जगत के सम्मुख प्रस्तुत होगी। इसी तरह भारत के भी प्रमुख प्रकाषकों को, खास तौर पर हिंदी प्रकाषकों को आमंत्रित किया जाना चाहिए, जिससे वे भी यह सीख सकें कि पाठक और लेखक के बीच की दूरी कम करने से किस प्रकार सबका हित सध सकता है। इस उत्सव से मुझ जैसे लेखक को कम से कम यही सीखने को मिला कि साहित्य की जाजम पर सब बराबर होते हैं, जिसमें कोई विषिष्ट नहीं होता, इसीलिए यू. आर. अनंतमूर्ति से लेकर तरूण तेजपाल तक सब एक लाइन में लगकर चाय लेते हैं और कुर्सी खाली मिलने पर जमीन पर ही बैठ जाते हैं। साहित्यकारों के लिए इस आयोजन से यह भी एक किस्म की सीख ही मिलती है कि गंभीर साहित्यिक आयोजनों की तरह लेखक-पाठक संवाद और रचना पाठ जैसे आयोजनों को भी बढ़ावा देना चाहिए। मीडिया में इस साहित्य उत्सव को खासा महत्व मिला, लेकिन इसमें एक तो बिला वजह के विवाद के कारण और दूसरी वजह सितारा लेखक और फिल्मी-मीडिया हस्तियों का आगमन रही। इस आयोजन में ज्यादातर मीडियाकर्मी लेखक-सितारों के साक्षात्कार ही लेते रहे। मेरे खयाल से अगर वे सत्रों में हुई चर्चा और रचना पाठ को महत्व देते तो अखबारों के आम पाठकों को साहित्यकारों की गंभीर चिंताओं और सरोकारों के बारे में भी जानकारी मिलती। उम्मीद है अगले बरस चीजें और सुधरेंगी और जयपुर का यह विष्व स्तरीय आयोजन और नई बुलंदियों को छूएगा।

( इस पोस्ट में वर्तनी की अशुद्धियाँ, फॉण्ट परिवर्तन के कारण हैं, पाठक-मित्र कृपया क्षमा करेंगे। यह आलेख जयपुर से प्रकाशित 'डेली न्यूज़' अखबार में २८ जनवरी २२०९००९ को प्रकाशित हुआ है। )