Sunday 29 November 2009

अर्थवान की तलाश में निरर्थकता के दर्शन का लेखक - अल्बैर कामू



भारत में जिन विदेशी रचनाकारों को सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है, उनमें अल्बैर कामू एक ऐसा नाम है, जिनकी रचनाओं का भारत की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। 1957 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित कामू, रूडयार्ड किपलिंग के बाद दूसरे ऐसे साहित्य़कार हैं जिन्हें महज 44 वर्ष की आयु में वैश्विक प्रतिष्ठा मिली। 7 नवंबर, 1913 को अल्जी़रिया के कृषि मजदूर पिता के घर में जन्मे कामू ने शुरुआत में अत्यंत संघर्षपूर्ण जीवन जीया। जन्म को एक साल भी नहीं हुआ था कि पिता की युद्ध में मृत्यु हो गई। मां की एक हादसे में सुनने-बोलने की क्षमता आधी रह गई थी। लेकिन विधवा मां ने अपने इस इकलौते सपूत के पालन-पोषण में कोई कमी नही रखी। कामू ने छात्रवृत्ति से अपनी शिक्षा जारी रखी। कई किस्म की छोटी-मोटी नौकरियां करते हुए वे एक अखबार के संपादक बने। 22 बरस की उम्र में दर्शनशास्त्र की शिक्षा प्राप्त करते ही दर्शनशास्त्र पर लिखे लेखों की पुस्तक प्रकाशित हुई तो अल्जीरिया में एक लेखक के रूप में कामू की ख्या‍ति फैल गई।


रंगमंच, पत्रकारिता, वामपंथी राजनीति और दार्शनिक-सामाजिक गतिविधियों के बीच कामू ने अपना पहला उपन्या‍स ‘अजनबी’ लिखा और एक उपन्यासकार के तौर पर उनकी कलम का लोहा माना जाने लगा। इस पहले उपन्यास ने बीसवीं सदी के अस्तित्ववादी दर्शन को एक विशाल कैनवास प्रदान किया। जर्मनी के नाजीवाद के कुकृत्यों को कामू ने धर्म, राजनीति, दर्शन और मानव अस्तित्व के सवालों के कटघरे में खड़ा कर यह सिद्ध करने की कोशिश की कि नाजीवाद एक निरर्थक और अमानवीय विचार है, जिसकी वजह से मनुष्य जाति का ही भविष्य संकट में पड़ गया है। इस उपन्यास के साथ ही कामू के सुप्रसिद्ध दार्शनिक लेख ‘मिथ ऑफ सिसिफस’ का प्रकाशन हुआ। इस पुस्तक में कामू ने निरर्थकतावाद के दर्शन को प्रस्तुत किया। कामू की मान्यता थी कि एक अदृश्य ईश्वर की कपोल कल्पना में बनाई गई इस दुनिया में अर्थ, एकता या समरूपता की खोज करना निरर्थक है। ग्रीक मिथक सिसिफस के माध्यम से कामू ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया कि संघर्ष का अपना आनंद है, भले ही वह लोगों की नजरों में निरर्थक हो और सबसे बड़ी बात यह कि सारी निरर्थकता के बावजूद आत्महत्या कोई विकल्प नहीं है, बल्कि विद्रोह और क्रांति ही विकल्प है।

1947 में कामू का एक और विश्वप्रसिद्ध उपन्यास ‘प्लेग’ प्रकाशित हुआ। एक शहर में प्लेग की महामारी फैलने का यह रोमांचक दस्तावेज है, जिसमें कामू की कलम पाठक की समूची चेतना को इस कदर झिंझोड़ कर रख देती है कि पाठक खुद को रोगी समझने लग जाए। विश्वसाहित्य में किसी महामारी की त्रासदी को लेकर लिखा गया संभवत: यह अकेला उपन्यास है। चिकित्सक, मरीज, पत्रकार, प्रशासन और पूरे नगर का महामारी के आतंक में जीता हुआ वातावरण इतनी गहरी संवेदना और लेखकीय संलग्नता के साथ लिखा गया है कि नियति और मानवीय स्थितियों को लेकर ढेरों सवाल उठ खड़े होते हैं। इस उपन्यास की हर पंक्ति अपने भीतर एक से अधिक अर्थ व्यक्त करती हुई पाठक की चेतना को कई स्तरों पर सोचने के लिए विवश करती है। इस उपन्‍यास को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजियों के खिलाफ फ्रांसिसी विद्रोह का प्रतीकात्मक आख्यान भी माना जाता है।

कामू की मान्यता थी कि उपन्यास दर्शनशास्त्र को दृश्य और बिंबों में व्यक्त करने के अलावा कुछ नहीं है। दर्शन और साहित्य के साथ राजनीति में समान विचारों के कारण प्रारंभ में अल्बैर कामू और ज्यां पाल सार्त्र की जबर्दस्त दोस्ती रही, लेकिन आगे चलकर राजनैतिक विचारों में मतभेद के कारण यह दोस्ती टूट गई। कामू और सार्त्र दोनों को अस्तित्ववाद का प्रवर्तक माना जाता है, लेकिन दोनों ने ही इससे इन्कार किया, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद के लेखकों में इन दोनों की प्रसिद्धि विश्वव्यापी रही। कामू ने अपने दार्शनिक और राजनैतिक विचारों के कारण बहुत से मित्रों को भी दुश्मन बना डाला था। वामपंथी झुकाव के बावजूद उन्होंने सोवियत रूस, पोलैंड और जर्मनी की सरकारों के कई निर्णयों की खुलकर आलोचना की। कामू के विचारों में मानवाधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और इसीलिए उन्होंने मृत्युदण्ड की जबर्दस्‍त आलोचना की। सार्त्र से संबंध विच्छेद से पहले कामू ने 1951 में ‘द रिबेल’ पुस्‍तक लिखी, जिसमें सत्ता के विरुद्ध मानव के विद्रोह के विभिन्न स्‍वरूपों और सिद्धांतों की गहरी पड़ताल की गई है।

1956 में कामू का एक और महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुआ ‘पतन’। इसमें एक धार्मिक व्‍यक्ति किसी बार में बैठकर एक अजनबी के सामने अपने द्वारा किये गए अपराध स्वीकार करता है। इस प्रकार कामू जहां धार्मिकता के आवरण में छिपे पाखण्डों को उजागर करते हैं वहीं ज्यां बैप्टिस्ट के चरित्र के कथनों के माध्यम से आधुनिक व्यक्ति पर भी प्रहार करते हैं जो बार में बैठकर अपने गुनाह स्वीकार करता है। कामू ने अपने जीवन में ढेरों कहानियां और नाटक भी लिखे, जिनमें ‘कलिगुला’ नाटक बेहद प्रसिद्ध है। अल्जीरिया उस वक्त फ्रांस का उपनिवेश था, इसलिए कामू मुक्ति संग्राम के सिपाही भी थे। उनके दर्शन में इसीलिए विद्रोही विचारों की व्याप्ति मिलती है। कामू अपने देश को लेकर एक विशाल उपन्यास की रचना करना चाहते थे, जिसमें अल्जीरिया की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास को एक बड़े व्यापक परिदृश्य पर प्रस्तुत करना चाहते थे। एक उपन्यास और कई कहानियां उनकी अधूरी रह गईं। 4 जनवरी, 1960 को एक कार दुर्घटना में उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। निधन के बाद उनकी बेटी कैथरीन ने उनकी अप्रकाशित रचनाओं को प्रकाशित कराया। 1970 में ‘ए हैप्पी डैथ’ का प्रकाशन हुआ, जिसमें ‘अजनबी’ से मिलती जुलती कहानी है। 1995 में ‘द फर्स्ट मैन’ प्रकाशित हुआ, यह कामू का अधूरा उपन्यास है, जिसमें कामू ने अल्जीरिया में अपने बचपन के दिनों की यादें आत्मकथा के रूप में लिखी हैं। कामू ने अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था कि अगर किसी भी चीज का कोई अर्थ नहीं है तो तुम सही हो, लेकिन फिर भी कुछ है जो अर्थवान है। कामू के साहित्य से उन्हीं अर्थवान चीजों को जानने और समझने की शक्ति मिलती है जो तमाम निरर्थकताओं के बावजूद अपने आप में ही नहीं मनुष्य जाति के लिए भी अर्थवान हैं। हिंदी में कामू की अधिकांश साहित्यिक रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं, दार्शनिक विषयों पर लिखी पुस्तकें अभी आना बाकी हैं।

( यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 29, नवंबर, 2009 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।)

3 comments:

  1. अल्बैर कामू पर आप पहले भी लिख चुके हैं शायद ...
    निरर्थकता और आत्महत्या पर उनके विचार... उनकी कृतियों की जानकारी प्रदान करने के लिए आभार ....!!

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  2. अल्बैर कामू पर आप पहले भी लिख चुके हैं शायद ...
    निरर्थकता और आत्महत्या पर उनके विचार... उनकी कृतियों की जानकारी प्रदान करने के लिए आभार ....!!

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  3. कामू कि हिंदीमे अनुवादित किताबोकी जानकारी चाहिये

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