Sunday 8 November 2009

प्रयोगधर्मिता से निकली राह : सुनीत घिल्डियाल का कला संसार



सुनीत घिल्डियाल राजस्‍थान के बेहद प्रशंसित और प्रतिष्ठित चित्रकार हैं। राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उनके काम को एक दर्जन से अधिक बार सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। देश-विदेश तक उनकी कलाकृतियां पहुंची हैं और सराही गई हैं। राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न कला शिविरों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। उनके चित्र चालीस से अधिक एकल व समूह प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किये गए हैं। हेमवतीनंदन बहुगुणा विश्‍वविद्यालय, गढ़वाल से कला में स्नातकोत्तर सुनीत वर्तमान में जयपुर में राजस्थान स्कूल आफ आर्ट में पढ़ा रहे हैं।
स्वभाव से बेहद हंसमुख, मिलनसार और निरंतर कला की धुन में मगन रहने वाले सुनीत घिल्डियाल का काम मुझे व्यक्तिगत रूप से उस वक्त से पसंद रहा है, जब वे पेंसिल ड्राइंग से अत्यंत अर्थवान चित्रों की रचना किया करते थे। यह बात करीब दो दशक पुरानी है। इस बीच सुनीत ने एक लंबी कला यात्रा की है, जिसमें वृहदाकार कैनवस से लेकर ताजा काष्ठ कलाकृतियों का अभिनव कला संसार समाहित है। मुझे इस पूरी कला यात्रा को देखकर महसूस होता है कि अब शायद सुनीत को अपना मनचाहा कला रूप या कहें कि माध्यम मिल गया है। पता नहीं क्यों ये पंक्तियां लिखते वक्त मुझे सुनीत की वो ड्राइंग बुक्स याद आ रही हैं, जिन्हें दिखाते हुए सुनीत एक-एक चित्र की गहन व्याख्या कर मुझे अपनी सृजनशीलता की गहराई से ही नहीं बल्कि अपनी विचार प्रक्रिया और उससे संबद्ध सृजन प्रक्रिया से प्रभावित किया करते थे। उस दौर में वे एक युवा कलाकार के तौर पर जिस आत्म संघर्ष की प्रक्रिया से गुजर रहे थे, वह आज जिस मुकाम पर आई है, उसमें सुनीत की बरसों की कलात्मक अंतर्यात्रा बहुत गहराई से रची-बसी है और मुझे गहरी आश्‍वस्ति देती है। उनके कला संसार की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे मूर्त और अमूर्त दोनों तरह के चित्र बनाते हैं और बहुधा उनके यहां दोनों का अत्यंत सुंदर समावेश देखने को मिलता है।



इन बरसों में सुनीत ने रंग और रेखाओं के साथ जो रिश्‍ता बनाया वह कागज, कैनवस से आगे चलकर काष्ठ कला के नए आयामों वाली कला में विकसित हुआ है। कला के सुधी प्रेक्षकों को याद होगा कि सुनीत अपनी ‘फेसेज’ चित्र श्रृंखला से बेहद चर्चित हुए थे, जिसमें उन्हें कई सम्मान-पुरस्कार हासिल हुए थे। पिछले एक दशक से सुनीत ने इस नई कला प्रविधि में देवदार की लकड़ी के पटरे पर कुरेद कर आकृतियां बनाई हैं और इनमें रंग भर कर बेहद खूबसूरत कलाकृतियों का सृजन किया है। लकड़ी पर सुनीत रंगों को कुछ इस प्रकार भरते हैं कि लकड़ी का अपना सौंदर्य भी बना रहे और रंगों की पारदर्षिता प्रेक्षक को नया कलात्मक आस्वाद प्रदान करे। कागज से काष्ठ तक की इस यात्रा को मैं सुनीत की चित्रकला में एक माध्यम भर की खोज हीं नहीं मानता, बल्कि मेरे लिए यह यात्रा सुनीत के चित्रों की अंतर्वस्तु की यात्रा भी है। क्योंकि मेरे लिए कला में माध्यम की खोज अंततः अंतर्वस्तु के बिना नहीं हो सकती। इसलिए मुझे सुनीत की इस नई कला प्रविधि में उनकी वर्षों की सतत कला साधना और गहरी विचार प्रक्रिया दृष्टिगत होती है।



सुनीत ने इस नई कला यात्रा को ‘टाइम एण्ड लाइफ-ए कण्टीन्युअस जर्नी’ शीर्षक दिया है। एक सृजनशील कलाकार के लिए यह शीर्षक उचित भी है, क्योंकि वह इस तरह अपनी पूरी सृजन यात्रा को बयां कर रहा होता है। इस यात्रा पथ में जितने उतार-चढाव हो सकते हैं, वे सब आपको उनकी कला में दिखाई देंगे। हंसी-खुशी के पल हों या किंचित अवसाद के, जीवन के चमकीले प्रकाशमान अवसर हों या गहरी स्मृतियां, सुनीत की कला में वो सब अपनी सदेह उपस्थिति दर्ज कराते हैं। दरअसल सुनीत के काम में आपको एक अजीब किस्म की गहरी संलग्नता दिखाई देती है, जो आपको पहली नजर में ठिठका देती है और जब आप एकबारगी ठहर कर उनके काम को देखने लगते हैं तो रंग और आकृतियों के व्यामोह में आप पूरी तरह खो जाते हैं। फिर आप अपनी स्मृतियों पर जोर डालने लगते हैं और आपके सामने आपका अपना स्मृतिलोक एक नए कलात्मक रूप में सामने दिखने लगता है। इस तरह सुनीत अपने प्रेक्षक को कई स्तरों पर देखने सोचने के लिए विवश करते हुए आधुनिक कला की अद्भुत कल्पनाशील सर्जनात्मक दुनिया से साक्षात कराते हैं। आधुनिक कला को अर्थहीन कहने वाले बहुतेरे लोग मिल जाएंगे, लेकिन ऐसे लोगों को भी सुनीत की कला, मेरा दावा है, एकबारगी तो गहराई से देखने और सोचने के लिए विवश करेगी ही।



सुनीत गढ़वाल, उत्तराखंड में जन्मे हैं और उनके कला संसार में वहां की खूबसूरत वादियों के साथ, सर्पिल राहें, पगडंडियां, फूलों से महकता परिवेश, जाड़ों में कांपता-सा सूरज, ग्रामीण जनजीवन में व्याप्त लोक रूपाकार, कठोर पहाड़ी जीवन का संघर्ष और इस सबके साथ राजस्थान के रेतीले धोरों की पीली उजास भरी दुनिया इस तरह एकाकार हो गई है कि दो विपरीत छोरों के अंचलों के तमाम रंग उनके काम में सहज दृष्टिगोचर होते हैं। सुनीत प्रारंभ से ही प्रयोगधर्मी रहे हैं और इस माध्यम में उनकी प्रयोगशीलता बहुत आगे निकल आई है, जहां वे काष्ठ पटरे को कैनवस की तरह इस्तेमाल करते हुए उसे कैनवस से अलग भी आकार देते हैं, यानी तयशुदा ज्यामितीय आकार से अलग एक किस्म का ‘लोक रूप’, जिसमें आपको कांकड़ पर विराजमान लोकदेवता के थान की याद आ जाए या फिर गांव-देहात में बिखरे लोक कलारूपों की।



सुनीत के काम की खूबी यही है कि इसमें हमारी जानी पहचानी दुनिया नए रूपाकारों में दिखाई देती है। इस बात को मैं विशेष रूप से कहना चाहता हूं कि आज के आधुनिक कला जगत में जब बहुतेरे कलाकारों की कला प्रेक्षक को एक अजीब किस्म से भयभीत करती है या सजावटी सामान की तरह दिखाई देती है, सुनीत की कला एक विचार प्रक्रिया से गुजरने और सहज ढंग से आधुनिक कला का आस्वाद लेने के लिए आमंत्रित करती है। सुनीत ने वर्षों की प्रयोगधर्मिता के बाद नए माध्यम की खोज करते हुए जो अंतर्यात्रा की है, वह एक और नए सुनीत की संभावना जगाती है, जो अगली बार कुछ और अर्थवान रचता हुआ, हमारे लिए नई कलात्मक दुनिया लेकर आएगा। इस अंतर्यात्रा का हासिल यह है तो इसका आगामी पड़ाव और बेहतर होगा, यही उम्मीद करनी चाहिए।


(सुनीत घिल्डियाल से ए-60, गोल मार्केट, जवाहर नगर, जयपुर, मोबाइल नंबर 09413622979 पर संपर्क किया जा सकता है। यह आलेख जयपुर से समांतर संस्‍थान द्वारा प्रकाशित की जाने वाली द्विमासिक पत्रिका 'संस्‍कृति मीमांसा' के जुलाई-अगस्‍त अंक में शाया हुआ।)





3 comments:

  1. सुनीत को बहुत बहुत बधाइयां। जयपुर के ज़माने से सुनीत से परिचय है। संभव है उन्हें भी मेरी स्मृति हो। राजस्थान स्कूल आफ आर्ट्स में कई बार जाना होता था। विद्यासागर जी, एकेश्वर हटवाल और सुनीत से मिलना होता था। रवीन्द्रभवन पर भी ये लोग मिलते थे।
    सुनीत का काम बहुत पसंद आता है। आपने ठीक याद दिलाया, इनके कुछ स्कैच मैने नभाटा के कला पृष्ठ पर भी छापे थे।

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  2. sunit ji ki kala dekh kar man sukhd aashcharya se bhar utha .. bahut bade kalaakar hain .. kabhi hamare shahar lucknow aayen ..

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  3. सुनीत जी के कुछ चित्रों से गुजरना अच्छा अहसास रहा...
    धन्यवाद...

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