Saturday 28 November 2009

दिसंबर के एक सर्द सफर की याद




लेखकों के साथ यूं तो बहुत-सी यात्राएं की हैं, लेकिन दिसंबर की कड़ाके की ठण्ड में किये गए दो लंबे सफर यादगार हैं। पहली याद दिसंबर 2005 की है, जब हम 25 लेखक दिल्ली से वाघा के रास्ते पाकिस्तान जा रहे थे। मैं पहली विदेश यात्रा के जोम में था, इसलिए दो-चार पैग ज्‍यादा लेकर बैठा था। सुबह करीब छह बजे आंख खुली तो ब्‍लैकआउट की वजह से याद ही नहीं आया कि बस में मैंने सामान रखा भी था कि नहीं। मैंने साथी लेखकों की तरफ देखा तो ज्‍यादातर सोए हुए थे, चंद्रकांत देवताले ही जागृत थे। मैंने उनसे पूछा तो उन्‍होंने आश्‍वस्‍त किया कि तुम्‍हारा सामान रख दिया गया था। लेकिन मैं असमंजस में था। बस एक ही खयाल आ रहा था कि कहीं बस रुके तो डिक्‍की खुलवाकर देख लूं। घने कोहरे की वजह से बस बहुत धीरे चल रही थी। लुधियाना से आगे सुबह के नौ बजे सबकी इच्छा हुई कि अब चाय पीनी चाहिए, सो एक ढाबे पर रुक गए। इलाहाबाद के एक बुजुर्ग शायर कोहरे में किसी खुले स्थान पर हल्के होकर आए तो उनके पीछे-पीछे एक नौजवान लाठी लेकर गुस्से में पंजाबी में गालियां बकता आ गया। लंबी बहस के बाद मामला समझ में आया कि बुजुर्गवार जिस जगह हल्के होकर आए हैं वहां एक बड़ा होटल है, जो कोहरे की वजह से दिखाई नहीं दिया। पच्चीस लोगों में महिलाएं भी थीं, जिनकी वजह से नौजवान शांत हो सका और उसके होटल में चाय-ना'श्‍ते के वादे पर मामला हंसी-खुशी में निपट सका। अगर कोहरा ना होता तो हम वाघा सुबह के सात बजे पहुंच सकते थे, लेकिन पहुंचे बारह बजे।

लाहौर रेल्वे स्टेशन पर जब हम सांझ ढले सात बजे अपनी गाड़ी का इंतजार कर रहे थे, तो दो डिब्बों में लेखकों का बंटवारा होना था कि छह सीटों वाले डिब्बे में कौन बैठेगा और बीस वाले में कौन? आखिर तय हुआ कि सूफी मत के छह लेखक अलग हो जाएंगे और बाकी सब एक साथ। इन छह में कवि राजेंद्र शर्मा अनचाहे ही फंस गए। खैर, हम बीस लेखक एक डिब्बे में बैठ तो गए, लेकिन यह समझ में नहीं आया कि रेल में और वो भी पाकिस्तान में रसरंजन कैसे होगा? बाद में पता चला कि हमारे पाकिस्तानी दोस्त छह फीट लंबे इरशाद अमीन ने रेल के सुरक्षा प्रहरियों को पहले ही समझा दिया था कि इस डिब्बे में हिंदुस्तानी लेखक-पत्रकार हैं। मैं जयपुर से ही ठण्ड में जकड़ा हुआ चला था। मुझे ऊपर वाली बर्थ पर जमना था, नीचे की बर्थ बुजुर्ग और लेखिकाओं के लिए थीं। मेरे नीचे वाली बर्थ पर चंद्रकांत देवताले बैठे थे। रेल का डिब्बा वातानुकूलित था, लेकिन सर्दी इतनी गजब की थी कि एसी के बावजूद कंपकंपी छूट रही थी। मेरे जैसे कई लेखक थे, जो इस भयानक सर्दी में गला तर करके सुकून पाना चाहते थे। हमारे मेजबान दोस्त ने जब अपना पिटारा खोला तो सबकी बांछें खिल गईं। वोदका के घूंट हलक में उतरे तो कंपकंपी कम हुई। गीत और गजलों की महफिल सज गई और चलती रेल में सुर और सुरा की सरिता बहने लगी। हमसफर पाकिस्तानी नागरिक भी इसमें मजा लेने लगे और सुबह होते-होते तो हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी यात्रियों में ऐसा भाईचारा स्थापित हो गया कि लेखिकाएं ही नहीं कई बुजुर्ग लेखक पाकिस्तानी यात्रियों के सफरी कटोरदानों में नाश्‍ता करते नजर आने लगे।
मेरी हालत सर्दी की वजह से खराब थी और दवाइयां कोई असर नहीं कर रही थीं। देवताले जी ने अपने बैग में से मेरे लिए सोंठ निकाली और कहा इसे चबाते रहो, तुम्हारे पान मसाले से बेहतर है यह। मैंने पान मसाला छोड़कर सोंठ चबाना शुरु किया तो कराची पहुंचते-पहुंचते इतना आराम मिला कि अगले दिन पता ही नहीं चला कि कब-कैसे सीने में जमा बलगम गायब हो गया और बंद नाक खुल गई।

कराची से लौटते वक्त हम लोग एक नॉन एसी बस में रवाना हुए। बॉर्डर एरिया और डाकू-लुटेरों के भय के कारण सारे शीशे बंद कर दिए गए। बहुत घुटन होने लगी तो हवा के लिए कण्डक्टर ने छत वाली खिड़की खोल दी। रेतीले इलाके की धूल बस में समाने लगी और विभूति नारायण राय की हालत खराब होने लगी। वो खिड़की बंद करनी पड़ी। सेवण के शाहबाज कलंदर की दरगाह की जियारत कर हम ब्रिटिश जमाने के गेस्ट हाउस में रात बिताने पहुंचे। सुबह पांच बजे ही हमें जगा दिया गया, मोहन्जोदड़ो जाने के लिए। छह बजे नाश्‍ता लग गया। एकाध वीर लेखक नहा धोकर तैयार हो गए थे। आलोचक खगेंद्र ठाकुर इतनी सुबह चार परांठे खा चुके थे और सबको चकित कर दिया था। बाहर निकले तो जिंदगी की अब तक की सबसे खूबसूरत सुबह देखी। सिंध नदी कोहरे में लिपटी हुई मंथर गति से बह रही थी और आसमान में सूरज के आने से पहले का सुरमई और सुनहले रंगों का कैनवस मंडा हुआ था। एक तरफ दरगाह की रोशनी थी और दूसरी जानिब सूर्यदेव की कलाकारी। हम तमाम लेखक इस रंगीन सुबह के मोहपाश में इस कदर जकड़ गए थे कि चंद्रकांत देवताले और कमला प्रसाद ने कहा कि अपने कैमरे निकालो और इस सुबह को कैद कर लो, जिसमें हमारी तस्वीरें भी हों।


मोहन्जोदड़ो से लरकाना पहुंचे तो हमने अपने मेजबान दोस्तों से मिन्नत की कि कहीं कोई दुकान हो तो बता दें, हमारा कोटा खत्म हो चुका है। हमें जानकर ताज्जुब हुआ कि इतने बड़े नगर में शराब की कोई दुकान नहीं है, जबकि यहां हिंदुओं की अच्छी खासी आबादी है। हमें लगा कि हमारे मेजबान पक्के मुसलमान हैं। जब सब तरफ उम्मीदें खत्म हो चुकीं तो खयाल आया कि राय साहब और पवन कुमार के सामान में दो बोतलें हैं। दो दिन के सफर में एक नई पार्टी का गठन हो चुका था, जिसके महासचिव थे राय साहब। पार्टी की सदस्यता मुझ जैसे कुछ लोगों को प्राप्त हो चुकी थी, बाकी की विचाराधीन थी। राय साहब के पास जो बोतल थी, उसके बारे में वो इतना कुछ बता चुके थे कि उसे देखने भर से शायद हमारी प्यास शांत हो जाती। वे यह बोतल मॉरीशस से लाए थे, जिस पर मार्क ट्वेन की प्रसिद्ध उक्ति लिखी थी कि ईश्‍वर ने पहले मॉरीशस बनाया और फिर स्वर्ग। स्वर्ग मॉरीशस की नकल है।

सवाल यह था कि बस की छत पर तिरपाल में बंधे हमारे सामान में से वो बोतलें कैसे लाई जाए। लेखक के पास विचारों की कमी नहीं होती, इसलिए निरंतर चिंतन के बाद राय साहब की तबियत को आधार बनाया गया। उनकी दवा उनके सामान में बंद है, उसे निकालना है। बीच सड़क पर बस रुकवाई गई, खलासी के साथ कवि पवन कुमार बस की छत पर चढ़े और राय साहब के सूटकेस के साथ अपना बैग भी ले आए। अब रात आराम से गुजारी जा सकती थी। लेकिन सामान कम था और प्रत्याशी ज्यादा। देवताले जी ने मुझसे मनुहार की कि डेढ़ पैग से काम चल जाएगा। एक लेखिका ने भी सर्दी के कारण एक पैग की गुजारिश की। राय साहब की पार्टी की सदस्यता लेने वालों की तादाद बढ़ गई। उन्होंने घोषणा की कि समाजवाद की राह पर आगे चलना है, इसलिए यथासंभव कोशिश की जाएगी कि कोई तिश्‍नालब ना रह जाए। थोड़ी ही सही मिलेगी सबको। और सच में कोई तिश्‍नालब ना रहा। सबको मिली और एक सर्द सफर में सबको राहत मिली। लाहौर पहुंचे तो राय साहब की तबियत और बिगड़ गई। उन्हें वहां के सर गंगाराम अस्पताल ले जाया गया और सक्‍शन मशीन से उनका जमा कफ निकाला गया।
दिसंबर का दूसरा सर्द सफर डॉ. नामवर सिंह, शरद दत्‍त, प्रभुनाथ सिंह आजमी, कमला प्रसाद और राजेंद्र शर्मा के साथ भोपाल से छिंदवाड़ा पैसेंजर ट्रेन में फर्स्‍ट क्‍लास के कूपे में किया था, 2007 में। उस पर फिर कभी।

4 comments:

  1. वाह भई, वाह. कमाल हो गया प्रेमचंद जी. एक तो प्रेमचंद ऊपर से गांधी भी और शौक हरिलाल गांधी वाला. जबर्दस्त. वैसे आप के इस सफर के बारे में नूर जहीर की जबानी सुर्ख कारवां के हमसफर में पढ़ चुका हूं. पर उसमें ये स्पष्ट नहीं था कि आप शराबनोशी का ऐसा शौक रखते हैं.

    ReplyDelete
  2. भाई पंकज जी, मैं ना तो प्रेमचंद हूं और ना गांधी, मैं तो सिर्फ प्रेमचंद गांधी हूं। इसलिए उन दो महान आत्‍माओं से कोई संबंध ना जोड़ें। रही बात शौक की तो वो सबके अलग अलग होते हैं और कोई चोरी-चोरी करता है और किसी को बताता नहीं। हमने बता दिया तो क्‍या हुआ।

    ReplyDelete
  3. बहुत अच्छा किया बता दिया ...
    मगर सोंठ के इतने गुण जान कर अब पान मसाला तो छूट ही गया होगा ...शराबनोशी का फैसला आपका है ...मगर कहते हैं की पहले इंसान शराब पीता है ...फिर शराब इंसान को पीती है ...दूसरी स्टेज में आने से पहले संभल जाये तो स्वास्थय पर मेहरबानी होगी ...!!

    ReplyDelete
  4. यार ये लोग बाग़ इतना ख़ूबसूरत यात्रा वृत्तांत पढने के बाद भी सिर्फ़ शराब नोशी के प्रसंग में उलझ कर रह गए. दुखद है. इसे थोड़ा विस्तार दें और किसी पत्रिका में छपाएं.

    ReplyDelete

Indic Transliteration