Sunday 1 November 2009

विडम्बनाओं के भंवर में फंसा रचनाकार - सेमुएल योसफ एग्नान



एफ्रो एशियाई भाषा परिवार की हिब्रू भाषा को बाइबिल की पुरानी भाषा होने के कारण हमारी संस्कृत की तरह पवित्र भाषा के रूप में जाना जाता है। प्राचीनता के कारण इस दुर्लभ, दुर्भेद्य और इतनी पुरानी भाषा के आधुनिक साहित्य को अब तक सिर्फ एक बार नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। यह सौभाग्य मिला 1966 में इजराइल के सेमुएल योसफ एग्नान को। 17 जुलाई, 1888 को यूक्रेन के गैलीशिया नगर में जन्मे एग्नान उन चुनिंदा यहूदियों में हैं, जिन्हें विश्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह भी संयोग ही है कि 1966 में उनके साथ एक और यहूदी लेखिका नेली शेक्स को भी संयुक्त रूप से साहित्य का नोबल प्रदान किया गया। यहूदी समुदाय के विस्थापन के त्रासद इतिहास को इस प्रकार वैश्विक संवेदना का स्पर्श मिला। एग्नान का जबर्दस्त गद्य हमें यहूदियों के ऐतिहासिक संघर्ष और आधुनिक विश्व के साथ उसके त्रासद यथार्थ के चित्र दिखाता हुआ एक ऐसी दुनिया प्रस्तु‍त करता है, जिसमें मजहब, जाति, और नस्ल के आधार पर किसी का दमन नहीं होना चाहिए। लेकिन पूंजी के क्रूर खेल ने सदियों से मानवता का इसी प्रकार अहित किया है, जिसे हिब्रू में एग्नान की तरह लिखने वाले रचनाकार तमाम भाषाओं में मिल जाएंगे।


एग्नान ने पांच साल की उम्र से लिखना शुरु किया और जल्द ही उनकी प्रसिद्धि इस कदर फैल गई कि गायक उनके गीत गाने लगे। बीस बरस की उम्र में कविताएं और कहानियां प्रकाशित होने लगीं। खुद जीवन की राह बनाने के लिए एग्नान घर छोड़कर पहले फिलीस्तीन गए, फिर एक प्रकाशक के कहने पर जर्मनी में रहने लगे। लेकिन भाग्य की विडम्बना देखिए कि प्रथम विश्वयुद्ध ने एग्नान का सब कुछ समाप्त कर दिया। उनका घर आग की भेंट चढ़ गया और सब कुछ स्वाहा हो गया। पांच साल बाद फिर यहूदी विरोधी नाजी माहौल में उनका घर जला दिया गया। दो बार की आगजनी में उनकी पांच हजार किताबें और दो अधूरे उपन्यास, जिनमें एक के सात सौ पेज वे लिख चुके थे, और बहुत सी महत्वपूर्ण सामग्री खाक हो गई।

इतने झंझावातों के बीच 1931 में जब उनका उपन्यास ‘द ब्राइडल कैनोपी’ प्रकाशित हुआ तो हर तरफ से उनकी सराहना की गई। कहा गया कि आधुनिक हिब्रू को एक नया विश्वस्तरीय रचनाकार मिल गया है। इस उपन्यास में एग्नान ने एक ऐसे सरल, भोले और वृद्ध आस्थावान व्यक्ति का चरित्र लिखा जो उन्नीनवीं सदी के प्रारंभ में एक उजाड़ नगर में अपनी बेटी के लिए दूल्हा खोजने के लिए निकला। यह वही उजाड़ नगर था जिसमें एग्नान ने बचपन और किशोरावस्था के दिन बिताए थे। इस उपन्यास की सरवांतीस के महान उपन्यास ‘डॉन क्विक्‍जोट’ से तुलना की गई। अपनी स्मृतियों के शहर गैलीशिया और यरूशलम को एग्नान यहूदी मिथकों और इतिहास के माध्यम से अपनी तमाम रचनाओं में विविध प्रकार से खोजते रहे। ‘ए गेस्ट फॉर द नाइट’ में एग्नान ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद नष्ट हुए अपने शहर का मार्मिक चित्रण किया और इस उपन्यास के माध्यम से यूरोप में यहूदी समुदाय का भविष्य देखने का प्रयत्न किया। लेकिन उनका सबसे महत्वहपूर्ण उपन्यायस ‘द डे बिफोर यस्टरडे’ है, जिसमें बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में यहूदियों के सर्वनाश के बाद वैश्विक शरणार्थी बन जाने की महागाथा है। इस उपन्यास में एग्नान ने प्राचीन और तत्कालीन यहूदी जीवन को इस खूबसूरती के साथ पिरोया कि एक महानायक और एक कुत्ते की कथा ने समूचे यहूदी समुदाय की विडंबनाओं को पूरी शिद्दत से उजागर कर दिया।

17 फरवरी, 1970 को एग्नान का निधन हुआ। इस अवधि में उनकी दर्जनों किताबें प्रकाशित हुईं, जिनमें से कई का अंगेजी और जर्मन में अनुवाद हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी ने उनके अप्रकाशित साहित्य के सुव्युवस्थित प्रकाशन का काम किया। आज इजराइली साहित्य के युवा अध्येता निरंतर एग्नान के साहित्य पर शोध कर रहे हैं। मृत्यु से पूर्व उनकी प्रतिष्ठा का आलम यह था कि स्थानीय प्रशासन ने लेखक की शांति में खलल ना पड़े, यह ध्यान में रखते हुए उनके घर के पास से गुजरने वाली सड़क पर वाहनों का आवागमन बंद कर दिया गया और बाकायदा बोर्ड लगा दिया, ‘वाहनों का प्रवेश निषेध, लेखक काम पर है’।

एग्नान की रचनाएं यहूदियों के लिहाज से बेहद आधुनिक हैं, क्योंकि वे यहूदी समुदाय की बहुत सी धारणाओं को तोड़ते हुए इतिहास से निकलकर वर्तमान में जीने की बात करते हैं। लेकिन यहूदी धर्म के इतिहास और बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य में उनकी रचनाएं एक भिन्न किस्म का यहूदी पाठ प्रस्तुत करती हैं, जिसमें यहूदी समुदाय की वैयक्तिक और सामुदायिक पहचान का प्रश्न इतिहास और वर्तमान के बीच एक विडंबना की तरह अनुत्तरित रह जाता है। बदलते समय के बीच संस्कृतियों को बचाने का जो संकट पैदा होता है, उसे एग्नान ने खूबसूरती से बयान किया है, लेकिन यहूदी धर्म का आधुनिक जगत से मिलान करते हुए उसकी प्रासंगिकता की तलाश में उन्हें कुछ मूल्यवान नहीं मिलता और यही उनके लेखन और विषयवस्तु की सबसे बड़ी सीमा है। आलोचक लिपमैन बोडोफ के अनुसार एग्नान अतीत और भविष्य, धर्म और प्रकृति, अध्यात्म और विज्ञान, एकेश्वरवाद और बहुदेववाद, यहूदी परंपरा और यूनानी व रोमन संस्कृति, ईश्वर और प्रकृति... इन सबके बीच घूमते हुए बहुत सूक्ष्म विश्लेषण तो करते हैं लेकिन शायद नहीं जानते कि ऐसी रस्साकशी में विजेता साफ तौर पर किसी एक को नहीं कहा जा सकता। इसके साथ-साथ एग्नान की भाषा और कथावस्तु इतनी गंभीर और इस कदर संश्लिष्ट है कि मूल हिब्रू से उनका अनुवाद भी अत्यंत कठिन है। वजह यह भी है कि एग्नान ने अपनी रचनाओं में धर्मग्रंथों के विशद उद्धरण दिए हैं, जिन्हें सामान्य हिब्रू का ज्ञान रखने वाला भी नहीं समझ सकता। इसीलिए आलोचक उन्हें बहुत दुर्भेद्य और अनुवाद के लिहाज से अनुपयुक्त लेखक मानते हैं।

एग्नान ने अपने नोबल भाषण में जो महत्ववपूर्ण बातें कहीं उनमें दो का जिक्र बहुत जरूरी लगता है, क्योंकि वह भारतीय परंपरा से मिलता है। एग्नान ने अपने लेखन पर विभिन्न लेखकों और पुस्तकों से पड़े प्रभावों का जिक्र करते हुए कहा कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि कौनसी गाय के किस दूध से मेरा शरीर बना है, वैसे ही मेरे लिए लेखकों-प्रेरकों का जिक्र करना भी मुश्किल है। इसी प्रकार उन्होंने कहा था कि हमारी महान परंपरा के अनुसार किसी भी खुशी के अवसर को बिना ईश्वरीय आशीर्वाद या अनुकंपा के ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए, वो ईश्वर हमें आशीष दे जिसने इस रक्त–मांस-मज्जायुक्त देह में चेतना दी है। भारतीय काव्य परंपरा जैसा यह अद्भुत  आह्वान हमें विश्व्साहित्य में सेमुअल योसफ एग्नान की रचनाओं में मिलता है।
( यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय में 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में 25 अक्‍टूबर, 2009 को प्रकाशित हुआ।)


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