Sunday 31 January 2010

ममता और वात्‍सल्‍य की कवयित्री : गेब्रिएला मिस्‍त्राल

साहित्य में नोबल पुरस्कार पाने वाली पहली लेटिन अमेरिकी कवयित्री गेब्रिएला मिस्त्राल का आरंभिक जीवन बड़ी कठिनाइयों में गुजरा। तीन साल की आयु में पिता की मृत्यु के बाद मां और बड़ी बहन के साथ संघर्ष करते हुए गेब्रिएला ने पंद्रह वर्ष की आयु में छद्मनाम से कविताएं लिखना  शुरु किया।  धीरे-धीरे स्थानीय अखबारों में कविताएं प्रकाशित होने लगीं। 7 अप्रेल, 1889 को चिली के विक्यूना गांव में जन्मी गेबिएला का मूल नाम लूसिला गोडोय था, लेकिन अपने दो प्रिय कवियों के नामों को मिला कर अपना छद्मनाम रखा । जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही एक रेलकर्मी रोमिलियो यूरेता से प्रेम हुआ लेकिन अज्ञात कारणों से प्रेमी ने आत्महत्या कर ली। इस हादसे से विचलित कवयित्री गहरे शोक में डूब गई और उसने मृत्यु के गीत लिखना शुरु कर दिया। बीस वर्ष की आयु में इस दुर्घटना ने मिस्त्राल को उस काव्य परंपरा का सूत्रपात करने का अवसर दिया जो लेटिन अमेरिकी साहित्य में पहले कभी नहीं हुआ अर्थात जीवन और मृत्यु को लेकर गहरी संवेदनाओं से ओतप्रोत कविताएं सामने आईं। पच्चीस वर्ष की आयु में चिली की राष्ट्रीय काव्य प्रतियोगिता में गेब्रिएला की मृत्यु गीतों की पुस्तक को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

छोटे बच्चों को पढ़ाकर जीवनयापन करते हुए गेब्रिएला ने तमाम विपरीत परिस्थतियों के बावजूद निरंतर कविता लिखना जारी रखा। उनकी कविता और लेखन के केंद्र में चिली की लचर शिक्षा प्रणाली थी, जिसकी वजह से गरीब बच्चों, खासकर गांवों के बच्चों को अच्छी शिक्षा से वंचित रहना पड़ता था। गेब्रिएला अखबारों में इस पर निरंतर लिखती थीं, इससे स्कूल प्रशासन नाराज रहता था। इसी नाराजगी के कारण पहले स्कूल ने उन्हें जबरन स्कूल से निकाल दिया। कई स्कूलों में अध्यापन करते हुए वे 1921 में चिली के सबसे प्रतिष्ठित सेंटियागो हाई स्कूल की प्रिंसिपल बनीं। इस बीच वे एक स्कूल में 16 साल के पाब्लो नेरुदा से मिलीं और नेरुदा को यूरोपियन कवियों को पढ़ने की सलाह दी। प्रिंसिपल बनने के बाद उनका दूसरा कविता संग्रह आया तो वे अचानक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात हो गईं। इस संग्रह में उन्होंने बच्चों और ईसाई धर्म को लेकर प्रार्थना की शैली में कविताएं प्रस्तुत की थीं। तीन वर्ष बाद तीसरे कविता संग्रह में पूरी तरह बच्चों को लेकर कविताएं लिखीं। प्रिंसिपल बनने के कुछ समय बाद गेब्रिएला को मेक्सिको में स्कूली शिक्षा और पुस्तकालय व्यवस्था में सुधार करने के लिए बुला लिया गया। मेक्सिको से वे अमेरिका और यूरोप चली गईं। वहां वे मुख्य रूप से फ्रांस और इटली में रहीं, और अखबारों के लिए विपुल मात्रा में लिखा। साथ ही साथ वे लीग आफ नेशंस के बौद्धिक प्रकोष्ठ के लिए काम करती रहीं।

गेब्रिएला मिस्त्राल के लेखन में बच्चों के लिए गहरे प्रेम और वात्सल्य को अभिव्यक्ति मिली है। वे बच्चों को ईश्‍वर का प्रतिरूप मानती थीं। एक ईसाई संत ने कहा था कि गेब्रिएला मिस्त्राल की तमाम कविताएं प्रार्थना गीतों की तरह हैं। भारत में उनकी प्रसिद्ध कविता ‘उसका नाम है आज’ बहुत प्रसिद्ध है। यह कविता एस.ओ.एस. बालग्राम का आदर्श गीत बन गई है। गेब्रिएला ने कभी विवाह नहीं किया, लेकिन उनके भीतर मातृत्व की जो अद्भुत धारा अविरल प्रवाहित होती है वह विश्‍व साहित्य में उन्हें नोबल पुरस्कार तक ले गई। 1945 में नोबल पुरस्कार प्रदान करते हुए नोबल कमेटी ने कहा कि अपने मातृत्व भरे हाथें से गेबिएला मिस्त्राल एक ऐसा पेय प्रस्तुत करती हैं, जो धरती का स्वाद देता है और मनुष्य के दिलों को तृप्त करता है। उनकी कविता का निर्झर कभी नहीं थमेगा और लोगों की प्यास बुझाता रहेगा। और निश्‍चय ही गेब्रिएला मिस्त्राल की काव्यधारा 1954 में उनकी मृत्यु के बाद भी विश्‍व साहित्य में अमर है। पाब्लो नेरुदा जैसे कवि को दिशा दिखाने वाली गेब्रिएला को आज भी दुनिया की तमाम भाषाओं में पूरी श्रद्धा के साथ पढ़ा जाता है।

गेब्रिएला मिस्त्राल से मेरा पहला परिचय करीब बीस वर्ष पहले तब हुआ था, जब एक गैर सरकारी संगठन के लिए काम करते हुए मैंने उनकी कविता ‘उसका नाम है आज’ का अनुवाद किया था। हालांकि इस कविता से परिचय एस. ओ. एस. बालग्राम में बालिकाओं को निःशुल्क ट्यूशन पढ़ाने के दौरान हो चुका था, लेकिन उस समय यह पता नहीं था कि यह कविता गेब्रिएला मिस्त्राल की है। प्रस्तुत है कविता:

उसका नाम है आज

हम अपराधी हैं
बहुत सी गलतियों और भूलों के
लेकिन हमारा सबसे बड़ा अपराध है
बच्चों को निस्‍सहाय छोड़ देना
जीवन निर्झर को नकार देना

हमारी जरूरत की बहुत सी चीजें प्रतीक्षा कर सकती हैं
बच्चा प्रतीक्षा नहीं कर सकता

यही है वह वक्त
जब आकार ले रही हैं उसकी अस्थियां
बन रहा है रक्त
और विकसित हो रही हैं उसकी इंद्रियां

उसे हम जवाब नहीं दे सकते ‘कल’
उसका नाम है ‘आज’

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 31 जनवरी, 2010 को प्रकाशित हुआ।





3 comments:

  1. अच्छी जानकारियों से लबरेज़ आलेख...
    कविता निहायत ही खूबसूरत...

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  2. भाई प्रेमचंद जी ,
    आपके ब्लॉग पर भ्रमण कर खूब लुत्फ़ उठाया | आपके ब्लॉग में समाजिक सरोकारों की महक व् धमक से रु-ब-रु होकर आनंद आया | आपने मिटटी की सोंधी महक एवं संवाद को बिम्बायित किया है | बधाई हो! मेरे ब्लॉग पर भी पधारो सायबा !
    गुलाम नबी
    आज़ाद न्यूज़
    www.gulamnabi86.blogspot.com

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