Thursday 4 February 2010

घूंघट खोल, बढ़के बोल

महिलाओं के सफल शासन की हाल की झांकी से जाहिर है कि आने वाले दौर में घूंघट की घबराहट नहीं, हौसले के बोल सुनने को मिलेंगे।

देश करवट ले रहा है। यह सही है कि पंचायती शासन में अब तक ग्रामीण महिलाओं के नाम पर पुरूषों ने ही शासन किया है। लेकिन जिसने भी झिझक छोडकर सक्रियता दिखाई, उसने पुरूषों से बेहतर काम करके दिखाया। महिलाओं का आरक्षण 33 फीसदी से 50 फीसदी करने का प्रस्ताव आया, तो महिलाओं ने भी ठान लिया कि वे गांव के विकास में भागीदार बनकर दिखाएंगी। अब अनेक महिलाएं पंच, सरपंच बनकर देश को नई दिशा दे रही हैं और पुरूषों से बेहतर जनप्रतिनिधि साबित हो रही हैं।

पंचायती राज में पंच और सरपंच बनकर महिलाओं ने दिखा दिया है कि वे चौखट से चौबारे तक का सफर तय कर चुकी हैं। भले ही राजनीति के ककहरे से वाकिफ नहीं हों, पर अपनी जिम्मेदारियां वे बखूबी निभाती हैं। इन्हें सिर्फ अपने गांव के विकास से मतलब है। अब इन्हें हर कदम पर पतियों के सहारे की जरूरत नहीं रह गई है। पंचायती राज में महिलाओं के बढते कदम गांव-ढाणियों में विकास की गंगा बहा सकते हैं। राजस्थान के अलवर जिले में बहरोड के दूधवाल गांव की वार्ड पंच शांतिदेवी के कार्यकाल पर नजर डालें। उन्होंने गांव के स्कूल में कमरे बनवाए और पीने के पानी की व्यवस्था कर बुनियादी काम किया। ऎसे काम ज्यादातर पुरूष जनप्रतिनिधियों के लिए कम महत्‍व के होते हैं। पर महिला जनप्रतिनिधि उन आधारभूत मुद्दों को लेकर राजनीति में आगे आ रही हैं, जिनसे उनके क्षेत्र की जनता लाभान्वित होती है। ऎसा इसलिए भी है कि एक महिला होने के नाते वे भलीभांति समझती हैं कि लोगों की असली समस्याएं क्या हैं, जिनका वे खुद आए दिन सामना करती रही हैं। बीकानेर जिले के लूणकरणसर में गांव की महिलाओं के साथ मारपीट की समस्या आम थी। शराबी पति पत्नियों की कमाई हथियाकर उसे शराब में उडा देते थे। वार्ड पंच रहने के दौरान कांतादेवी नाई ने इसके लिए संघर्ष किया और सरपंच को कहा कि महिलाओं को उनकी मेहनत की कमाई अपने हाथों में मिलनी चाहिए। आज महिलाएं अपने पैसे की मालिक हैं।

भ्रष्टाचार नहीं होगा

गांवों में विकास के कई कार्य बरसों से अधूरे पडे रह जाते हैं। वजह साफ है, कुछ तो धनाभाव और कुछ भ्रष्टाचार। पुरूष सरपंच महिला वार्डपंच को भाव ही नहीं देते। लेकिन हौसला हो तो क्या नहीं हो सकता सिरोही जिले के चनार गांव की शिक्षित वार्ड पंच निमिषा बारोट ने अधूरे पडे सामुदायिक भवन के निर्माण को लेकर सरपंच को तैयार किया। एक साल से अधूरे पडे काम को पूरा करवाया और कोई भ्रष्टाचार नहीं होने दिया। ग्राम पंचायतों की राजनीति में जहां निमिषा जैसी उच्च शिक्षित महिलाएं आ रही हैं, वहीं अशिक्षित महिलाएं भी अब पढना-लिखना सीखकर अपना काम खुद देखने के प्रति गंभीर हो रही हैं। पंचायत की बैठकों में प्रस्ताव पढने से लेकर अंतिम रूप देने तक के काम को निष्ठापूर्वक निभाने में महिला जनप्रतिनिधि पूरी सक्रियता दिखा रही हैं। सिरोही के मोरधला गांव में लक्ष्मी बैरवा ने वार्ड पंच रहने के दौरान शराब की समस्या से निजात दिलाने के लिए मुहिम चलाई। बकौल लक्ष्मी, 'मैंने शराब पीकर उत्पात मचाने वालों के खिलाफ लडाई लडने के लिए 50 महिलाओं को अपने साथ लिया और मोर्चा खोल दिया। कानून ने भी हमारी मदद की और गांव को शराबियों से मुक्त कराया।'

आत्मविश्वास सामने है

कहा जाता है कि आरक्षित सीटों पर राजनीति के माहिर लोग अपने परिवार की स्त्रियों को आगे ला रहे हैं। यह बात एक हद तक सही भी है। लेकिन इसके बरक्स यह भी सच्चाई है कि अब महिला किसी की कठपुतली बनकर काम नहीं करती। अलवर में बानसूर के गांव बाढ मिलखपुर की उमा ने 12 साल की उम्र में खुद का बाल विवाह रूकवाया और 19 साल की उम्र में जाकर शादी की। शादी के बाद शराबी पति की शराब छुडवाई। उसका यह हौसला वार्ड पंच बनने पर भी जारी रहा और उसने गांव में शराब की दुकानों को बंद करवाकर ही चैन लिया।

पुरूषों को साथ देना होगा

पुरूष की भूमिका सहयोगी की हो गई है। स्त्री की एक नई छवि चुनावी राजनीति में बन रही है, जो उसे गहरा आत्मविश्वास देती है और अपने निर्णय खुद लेने के लिए प्रेरित करती है। राजसमंद जिले के गांव सिंदेसर कलां में वार्ड पंच रहने के दौरान तारा ने महिला-पुरूष के बीच होने वाले लिंगभेद को खत्म करने के लिए अपने ससुर के सामने आवाज उठाई। उसके ससुर पंचायत में सरपंच थे। तारा ने पंचायत में सबको बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए कोशिश की। अब पंचायत की सभी औरतें पुरूषों के साथ कुर्सियों पर बैठती हैं।

बदले हैं हालात

देश भर में पंचायतों की राजनीति को बदलने में बहुत-सी गैर सरकारी संस्थाओं का बडा योगदान है। 'द हंगर प्रोजेक्ट' जैसी कई संस्थाएं राजस्थान सहित देश के कई राज्यों में महिला जनप्रतिनिधित्व को बढाने और उन्हें मजबूत बनाने में जुटी हुई हैं। पिछले साल जयपुर में आयोजित महिला पंच-सरपंच सम्मेलन में महिलाएं आगे आईं तो अधिकारियों ने उनकी समस्याओं को गंभीरता से लेना शुरू किया और उनके काम तेजी से होने लगे। पिछले पंचायत चुनाव में 33 फीसदी महिला आरक्षण से अगर हालात में यह बदलाव दिखाई दिया तो इस दफा के 50 फीसदी आरक्षण और उसमें भी गैर आरक्षित सीटों पर भी चुनाव जीतकर आने वाली महिलाओं की संख्या को और जोड दें, तो हमें एक सुनहरे भविष्य के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं।

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