Sunday 27 December 2009

एक किताब ने बनाया इतिहास



कई बार किसी लेखक की एक ही कृति इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है कि अनेक महत्वपूर्ण लेखकों की रचनाओं पर सदियों तक भारी पड़ती है। नोबल पुरस्कार के दूसरे ही वर्ष यानी 1902 में ऐसी ही एक ऐतिहासिक महत्व की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ रोम’ के लेखक थियोडोर मॉमसेन को पुरस्कृत किया गया। करीब 1,500 प्रकाशित रचनाओं के रचयिता मॉमसेन का जन्म 1817 में जर्मनी में हुआ। कई भाषाओं के जानकार मॉमसेन की प्रतिभा बहुमुखी थी। विद्वान शोधकर्ता, राजनेता, इतिहासकार, पुरातत्वविद, पत्रकार, न्यायविद और लेखक के रूप में मॉमसेन को उन्नीसवीं सदी के महानतम प्रतिभाशाली जर्मन रचनाकार के तौर पर जाना जाता है। रोम के इतिहास को लेकर तीन खण्डों में लिखे उनके विशालकाय ग्रंथ को आज भी आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। 1902 में नोबल पुरस्कार की दौड़ में उनके साथ महान रूसी लेखक लियो तोलस्तोय भी थे, जिन्हें कभी नोबल पुरस्कार नहीं मिला।

बहरहाल, मॉमसेन के पिता ने बचपन से अपने सुयोग्य पुत्र को जर्मन क्लासिक साहित्य और विक्टर ह्यूगो, बायरन और शेक्सपीयर जैसे रचनाकारों को पढने के लिए प्रेरित किया। प्रारंभ में उनकी शिक्षा-दीक्षा घर पर हुई और कालांतर में उन्हें पढने के लिए इटली और फ्रांस भेजा गया। उन्होंने साहित्य, इतिहास, विधि आदि कई विषयों में गहन अध्ययन किया। एक रचनाकार के रूप में मॉमसेन ने प्रारंभ में कविताएं लिखीं और टाइको और स्टॉर्म भाइयों के साथ पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने ईसाइयत से अपने मोहभंग की कविताएं प्रस्तुत कीं। मॉमसेन की रोम के इतिहास को लेकर 1854, 1855 और 1856 में प्रकाशित इस महती ग्रंथ में मॉमसेन ने ई.पू. 46 से लेकर रोमन साम्राज्य के पतन तक और जूलियस सीजर तक का इतिवृत लिखा। 1925 में जब जॉर्ज बर्नाड शॉ को नोबल पुरस्कार मिला तो उन्होंने मॉमसेन के प्रभाव को स्वीकार किया कि मॉमसेन को पढ़े बिना मैं ‘जूलियस सीजर एण्ड क्लियोपेट्रा’ नाटक नहीं लिख सकता था। इस पुस्तक का महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने रोमन साम्राज्य के इतिहास को समकालीन जर्मन राजनीति के बरक्स रखते हुए एक तुलनात्मक किस्म का इतिहास लिखकर यह दर्शाने की कोशिश की कि इतिहास से कैसे हम अपने समय के घट रहे इतिहास को देख सकते हैं। इसी बिंदु पर उनके काम की खासी आलोचना भी हुई, क्योंकि इतिहास के आईने में समकालीन राजनीति कभी भी स्वयं को देखना पसंद नहीं करती।

यह मॉमसेन की ही विराट प्रतिभा थी कि वे अपने समकालीन महान जर्मन राजनेता बिस्मार्क तक की खुली आलोचना कर सके। जर्मनी के एतिहासिक एकीकरण की शुरुआत करने वाले बिस्मार्क ने जब बर्लिन को जर्मनी की राजधानी बनाया तो मॉमसेन ने कहा, ‘बिस्मार्क ने देश की कमर तोड़ दी है।’ मॉमसेन चाहते थे कि उदारवादी और समाजवादी डेमोक्रेट्स के बीच सामंजस्य बिठाकर दोनों को राष्ट्र के विकास में साथ जोड़ा जाए, यहूदियों को मुख्यधारा में लाया जाए और एक बेहतर तालमेल वाले सौहार्द्रपूर्ण माहौल का निर्माण किया जाए। उस समय इसे अतिवादी विचार माना गया। बिस्मार्क ने मॉमसेन के विचार का प्रत्युत्तर देते हुए कहा कि एक पूर्ण रूप से तैयार राष्ट्र ही उदारवादी सरकार की इजाजत दे सकता है। बिस्मार्क के विचार में वह समय ऐसे विचार के लिए उपयुक्त नहीं था। अगर मॉमसेन की इतिहास दृष्टि से देखें तो उनके विचार को ना मानने से जर्मनी में नाजी विचारधारा को प्रश्रय मिला और हिटलर का उदय हुआ। मॉमसेन चाहते थे कि रोम के इतिहास का चौथा खण्ड लिखें, लेकिन विवादों और आलोचनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक वातावरण ने उन्हें रोक दिया। इस उद्देश्‍य से उन्होंने जो कुछ महत्वपूर्ण सामग्री एकत्र की और जितनी पाण्डुलिपि तैयार की वह 1880 में एक अग्नि दुर्घटना में जलकर खाक हो गई।

मॉमसेन ने 1863 से 1886 के बीच बर्लिन विश्‍वविद्यालय में अपने विद्यार्थियों को जो लेक्चर दिए, उनके नोट्स दो शिष्यों ने एकत्र कर उन्हें पुस्तकाकार प्रकाशित किया ‘ए हिस्ट्री ऑफ रोम अण्डर द एंपरर्स’। इस पुस्तक से रोमन साम्राज्य के बारे में मॉमसेन की इतिहास दृष्टि का पता चलता है, इसे जबर्दस्त खोज माना जाता है। इसमें मॉमसेन रोमन साम्राज्य के अधिकांश शासकों को निष्प्रभावी और दोयम दर्जे का सिद्ध करते हुए बताते हैं कि कमजोर शासकों के कारण ही आगे चलकर रोमन साम्राज्य पतन की ओर उन्मुख हुआ। इतिहास के शिलालेख और पुरालिपियों के अध्ययन में मॉमसेन की भूमिका पथप्रदर्शक की है। रोमन साम्राज्य के इतिहास के साथ मॉमसेन ने उनके संविधान, मुद्रा प्रबंधन, अर्थव्यवस्था, दण्ड संहिता और कई महत्वपूर्ण पहलुओं का विशद अध्ययन किया। इन विषयों पर लिखे गए उनके ग्रंथ आज भी विश्‍व के आधारभूत ग्रंथ माने जाते हैं।










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