Sunday, 13 December, 2009

कलिंग की युद्ध भूमि को देखकर

कई बरस पहले उड़ीसा गया था। उस वक्‍त धौलगिरि और कोणार्क देखकर कुछ कविताएं लिखी थीं। इतने साल गुजर गए हैं, लेकिन ये कविताएं मुझे आज भी अच्‍छी लगती हैं। अपने पाठक-मित्रों के लिए आज ये दो कविताएं प्रस्‍तुत कर रहा हूं।


एक

जहाँ लड़ा गया था युद्ध
वहाँ खेत खड़े हैं धान के
और काजू का लहलहाता जंगल


युद्ध भूमि क्या हमेशा
उपजाऊ ही होती है
या धरती चुकाती है
पिये गये रक्त का क़र्ज़ ?

दो

इतनी शांत है दया*
गोया अभी तक याद हो
गौतम से जो आया था
अशोक तक शान्ति का उपदेश


इसी जल में बहा होगा लाखों सैनिकों का रक्त
शान्त दया के सीने में अभी भी दबे होंगे
लाखों सैनिकों के कवच-कुण्डल अस्त्र-शस्त्र

एक नदी की गवाही क्या काफ़ी नहीं है
रक्तपात के ख़िलाफ़


दया से पूछो
नरसंहार देखकर
कितना रोयी होगी
पछाड़ें मार-मार
धौलगिरि की चट्टानों से


राम ने ली सरयू में जल-समाधि
अशोक ने लिया शांतिव्रत दया की साक्षी में


नदियों ने ही बचाया है
इंसान को हैवानियत से
नदियों ने ही बनाया है
पुरुष को पुरुषोत्‍तम


नदियों के इस बचाने और बनाने में ही छिपा है
नीर-क्षीर विवेक ॰



*दया - नदी का नाम

6 comments:

  1. आपकी दोनो कवितायें बेहद अच्छी है ..पहली कविता विशेषकर वह अपने आप में सम्पूर्ण कविता है । दूसरी कविता में बिम्बों की अधिकता है इसलिये वह और विस्तार की मांग करती है । इन अलग अल्ग बिम्बों पर अलग अलग विचार के साथ कई कवितायें लिखी जा सकती हैं।

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  2. धरती चुकाती है व्यर्थ बहाए रक्त कर क़र्ज़ ...अवश्य ....!!
    दया का जार जार रोना नज़र आना ही आपकी संवेदनशीलता को प्रकट करता है ...और फिर नदियाँ ही बनती है पुरुष को पुरषोत्तम...मान ही लिया आपने भी ...!!

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  3. भावपूर्ण रचना फोटो अच्छे लगे. आभार प्रस्तुति के लिए .....

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  4. Pahli kavita sabse adhik achhee lagee..halanki,bhaav doosaree rachnake bhee bahut achhe hain!

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  5. बेहतर...
    कलिंग की युद्ध भूमि वाकई उपजाऊ है...

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