Thursday 31 December 2009

31 दिसंबर की रात




यह कहानी पिछले साल लिखी थी। आज 31 दिसंबर के दिन अपने दोस्‍तों और पाठकों के बीच इसे प्रस्‍तुत करते हुए थोड़ी झिझक हो रही है। वजह यह कि ब्‍लॉग पर पहली बार अपनी कहानी दे रहा हूं। पता नहीं पाठकों को पसंद आएगी कि नहीं।
बाहर बारिश हो रही है। पड़ोस में कहीं तेज आवाज में डीजे बज रहा है। नया साल अब कुछ ही घंटों में आने वाला है। मद्धम बारिश में यह शोर किसी शोकगीत की तरह लगता है। इस बारिश भरी जाड़े की रात की कोख से जो दिन निकलेगा, वह नया साल लेकर आएगा। कुछ भी तो नहीं बदलेगा, सिवाय एक केलेण्डर के या कहें कि कुछ दिन हमें नया सन् लिखने की आदत डालनी पड़ेगी। जीवन वैसे ही चलता रहेगा। मैं अभी की तरह यूं ही बिस्तर में दुबका पड़ा रहूंगा। अपनी हालत पर खुद ही तरस खाता रहूंगा और उम्मीद करता रहूंगा कि वह आएगी और मुझे झिंझोड़कर कहेगी, 'चलो बहुत हुआ रोना धोना, उठो और तैयार हो जाओ।'

खुशफहमियों में जीना इंसान की फितरत है। मैं भी वही कर रहा हूं। खिड़की से बाहर देखता हूं तो स्ट्रीट लाइट का पीलिया के रोगी जैसा प्रकाश बारिश की बूंदों में यूं लग रहा है जैसे मेरे दिल के घावों पर कोई सुइयां चुभो रहा है और पीला जर्द मवाद बूंद बूंद कर बरस रहा है। पता नहीं वह कौनसी घड़ी थी, जब मैं उससे प्यार कर बैठा? क्या वह सचमुच प्यार करने के काबिल है? उसमें ऐसा कुछ भी तो नहीं।

लम्बा और अण्डाकार चेहरा, जिस पर बड़ी और चौड़ी चौड़ी आंखें। मर्दों की तरह भरी-भरी काली भवें। पतले होंठ, निचला होंठ थोड़ा सा बड़ा। जब वह चुप रहती तो लगता, निचला होंठ कहीं गिर न पड़े। ठुड्डी और होंठों के बीच का फासला काफी कम। मेरा मन करता कि कभी कहकर देखूं कि जरा अपनी जीभ से यह घुमावदार ठुड्डी छूकर देखो। वह सचमुच नाराज हो जाती। गाल हल्के से पिचके हुए और उन पर बहुत बारीक गेहुंए रंग के रोंये, उसके सांवले रंग को ये रोंये गेहुंआ रंग देते। लम्बी गर्दन पर उभरी हुई नीली नसें। मुझे बेसाख्‍ता पद्मिनी का खयाल आता और मैं सोचता कि कि अगर इसका रंग गोरा होता तो नीली नसों के भीतर बहता रक्त भी दिखाई देता। आम लड़कियों के मुकाबले वह थोड़ी लम्बी थी छह फीट के करीब यानी मुझसे बामुश्किल एक आध इंच कम। अगर वह हाई हील पहनती तो मुझसे लम्बी लगती। हालांकि उसे हाई हील पहनना पसंद नहीं। चुस्त सलवार कमीज में उसकी लम्बाई और रोबदार लगती। उसके लम्बे हाथों में आश्चर्यजनक रूप से बेहद छोटी और पतली अंगुलियां। वह पतली तो नहीं लेकिन देह इतनी भरी हुई भी नहीं कि गदराया हुआ जिस्म कहा जा सके। बड़ी सादगी पसन्द। आम तौर पर सलवार कमीज और कभी-कभी साड़ी पहनती। सादे ढंग से बाल बनाती और बालों में नारियल या सरसों का तेल लगाती। कहने का मतलब यह कि उसके व्यक्तित्व में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे तुरन्त आकर्षित हुआ जा सके। फिर भी मैं क्यों उसके लम्बे बालों वाली पतली सी चोटी के पीछे फुन्दे सा लटक गया। दरअसल इसकी भी एक कहानी है। उन दिनों मैं इसी शहर के एक मोहल्ले में अपनी मौसी के यहां रहता था। मेरी परीक्षाएं खत्म हो चुकी थीं और मैं रिसर्च की तैयारी में जुटा हुआ था। गर्मी के दिन थे। मैं छत पर बैठकर पढ़ता था। पूरी पूरी रात। सुबह नौ बजे के आस पास जब मैं अखबार पढ़ रहा होता तो उसे सड़क पर बस स्टॉप की ओर जाते हुए देखता। हरे रंग का एक बैग उसके कंधे पर होता। वह लम्बी टांगों से तेज-तेज चलती। एक सुबह वह सामने से गुजरी तो अचानक उसकी चप्पल जवाब दे गई। वह गिरते गिरते बची और सधे कदमों से चलती चली गई। मैं उसके इस आत्मविश्वास पर मुग्ध हुआ। लेकिन इसमें आकर्षण जैसा कुछ नहीं था। मैं वापस अखबार में डूब गया, जहां पुलिस के आपरेशन मजनूं की खबर थी। मैंने डर के मारे उसका खयाल ही दिमाग से निकाल दिया।

रविवार का दिन था। एक प्रतियोगी परीक्षा के लिए मैं जल्दी तैयार होकर बस स्टॉप पर बस की राह देख रहा था। मैं जब बस में घुसा तो देखा कि वह मेरे पीछे पीछे बस में चढ़ रही है। बस में दो ही सीटें खाली थीं। हम साथ-साथ बैठ गए। वह बैठते ही एक किताब में डूब गई और मैं बाहर देखने लगा। कण्डक्टर ने किराया मांगा तो उसने वही स्टाप बताया जहां मुझे भी जाना था। पैसे देने के बाद मैंने कनखियों से देखा वह उसी परीक्षा की तैयारी में डूबी थी जिसके लिए मैं खाली हाथ जा रहा था। गंतव्य आया तो हम एक ही दिशा में आगे बढ़ते रहे। अब इसे संयोग ही कहिए कि हम दोनों एक ही कमरे में बैठे थे। एक दूसरे को देखने लायक दूरी जरूर थी हमारे बीच। परीक्षा देकर बाहर की तरफ निकलते हएु मैंने यूं ही पूछ लिया, 'कैसा हुआ पेपर?' उसने कहा, 'अच्छा।' मेरी हिम्मत बढ़ी और अगला सवाल दाग दिया 'हम एक ही मोहल्ले में रहते हैं।' उसने बेरुखी से कहा, 'जानती हूं।'

वापसी के लम्बे सफर में थोड़ी बहुत बातचीत हुई। वह विधवा मां की इकलौती संतान है। पिता दुर्घटना में मारे गए। मां को पिता की जगह क्लर्क की नौकरी मिल गई। मां बेटी किराए के घर में रहते हैं। उसने भी मेरी तरह एम.ए. कर लिया है। वह मुझसे उदासीन रहकर बातें करती रही। मैंने भी पल्ला झाड़ लिया था। लेकिन उसकी दुखदायी अवस्था यानी कि विधवा मां और किराये का मकान, मुझे बेचैन करने के लिए काफी था। इस घटना के बाद हमारी मुलाकातें थोड़ी सी अनौपचारिक होने लगीं।

एक दिन मैंने तय किया कि इस चिल्ल पौं वाले मोहल्ले में रहकर में रिसर्च का काम आगे नहीं बढ़ सकता। यहां आए दिन जागरण होते रहते हैं। जन्म दिन हो या कोई मौका, लोग जोर से डेक बजाना अपना फर्ज समझने हैं। नाई से लेकर पंसारी तक सुबह शाम भजनों के कैसेट बजाते रहते हैं। मैंने एक संभ्रान्त कॉलोनी में खाली पड़े मकान का गैरेज पोर्शन किराए पर ले लिया। मौसी ने कुछ नहीं कहा। शिफ्टिंग वाले दिन मैं पता नहीं क्यों सुबह उठकर बस स्टॉप पर चल दिया। उसके आने तक किसी बस में नहीं बैठा और जब वह आई तो उसके साथ बस में चढ़ गया। आज भीड़ थी। कोई सीट नहीं मिली। एक कोने में हम दोनों खड़े हो गए। मैंने उसे बताया कि मैं यहां से जा रहा हूं। उसने सिर्फ इतना कहा, 'अच्छा।' पता नहीं क्यों मेरा मुंह लटक गया था। उसने कहा, 'शहर तो यही है। मौसी की याद आए तो कभी भी आ सकते हैं। दूर थोड़े ही है।'

वह अपने कॉलेज चली गई और मैं वही बस स्टॉप के आस पास तब तक भटकता रहा जब तक वह नहीं आई। पहली बार वह मुझे देखकर मुस्कराई। 'सुबह से यहीं हो?' मैं चुप रहा। उसने एक रिक्शा वाले को इशारा किया और बोली, 'चलो बैठो।' मैं रिक्शे में बैठ गया। उसने बैठते ही रिक्शे वाले से कहा, 'क्वीन्स पार्क।' फिर मुझसे बोली, 'उदासी छोड़ दीजिए, हम कॉफी पीने चल रहे हैं।' वह पहली बार खिलखिलाई तो उसके पतले होंठों के पीछे सफेद दांतों की पंक्तियां चमकीं। मैं मंत्रमुग्ध बैठा रहा।

कॉफी के दौरान वह मुझे किसी अभिभावक की तरह पढ़ाई का ध्यान देने और बाकी फालतू चीजों से बचने के लिए कहती रही। मैं बस हूं हां करता रहा। वापसी में मैंने उससे पूछा कि अब कैसे और कहां मिलेंगे हम। उसने कहा वह शनिवार को कमरे पर आएगी। मुझे आश्चर्य भी हुआ और खुशी भी। ...मैं शनिवार का इंतजार करने लगा। शनिवार आया और चला गया। वह नहीं आई। सोमवार मैं उसके कॉलेज के दरवाजे पर जा बैठा। शाम हो गई, वह नहीं दिखी। मैं मौसी के यहां पहुंचा। मोहल्ले के हाल-चाल पूछे। कोई खास खबर नहीं थी। रात खाना खाकर उसके घर के सामने दो चार चक्कर लगाए ओर कमरे पर लौट आया। कॉलेानी में सन्नाटा छाया था और मेरे मन पर भी। उसके खयालों में पता नहीं कब नींद आ गई। बुरे बुरे खयाल आते रहे और बेमन से पढ़ाई भी चलती रही। मैं कमरे में बन्द हो गया। फिर एक शनिवार आ गया। मैंने कमरे को व्यवस्थित किया और इन्तजार में कान लगाए पढऩे की कोशिश करता रहा। दोपहर के तीन बजे लोहे का गेट खुलने की आवाज आई। मैंने झटपट टी शर्ट पहनी और दरवाजा खोला तो वह मुस्कुराती चली आ रही थी। पीली कमीज और सफेद सलवार में वह पहली बार मुझे बेहद आकर्षक लगी। मैं 'पिछले शनिवार मां बीमार थीं। उन्हें दमे का दौर पड़ा और अस्पताल ले जाना पड़ा। अब ठीक है।'

मैं निरूत्तर मौन रह गया। वह कुर्सी पर बैठ गई और मुझे देखने लगी। मैं झेंप गया और उसके लिए मटके से पानी लेने लगा। 'मेरे पास एक ही गिलास है।' कहकर मैंने उसे पानी थमाया तो वह मुंह ऊपर कर हलक में पानी उंडेलने लगी। गिलास वापस रखकर हम दोनों मौन बैठे रहे। उसने अपना हैण्डबैग एक तरफ रखा और खड़ी हो गई। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा तो मैं ढेर होने लगा। वह हौले से मेरा कंधा थपथपाने लगी। मैंने उसके दूसरे हाथ को थामा और पता नहीं कैसे और क्यों हम एक दूसरे से लिपट से गए। हम बस एक दूसरे की धड़कनें सुनते रहे बिल्कुल चुपचाप। वह मेरे बालों में अंगुलियां फिराती रही और मैं उसके नथुनों की गरमाहट अपनी गर्दन पर महसूस करता रहा।... उसके आने का यह सिलसिला चलता रहा। लेकिन उस दिन के बाद हम कभी एक दूसरे से नहीं लिपटे। बस हाथ थामे बैठै रहते। घर परिवार और पढ़ाई की बातें होतीं। कभी कभी हम साथ फिल्म देखने जाते या खाना खाने। इस तरह महीने गुजरते रहे। दिसम्बर की एक दोपहर उसने आकर बताया कि उसे एक नौकरी मिल गई है वह भी सरकारी। केन्द्र सरकार के एक संस्थान में। वह अगले दिन मां के साथ ज्वाइन करने जाएगी और ३१ दिसम्बर को मेरे साथ नया साल मनाने वह सहेली का बहाना बनाकर मेरे कमरे पर आएगी। हम बाजार से खाने पीने का सामान खरीदेंगे और इस कमरे में कैण्डल लाइट डिनर करेंगे।

इस बात को ज्यादा वक्त नहीं बीता। सिर्फ एक साल गुजरा है। मैं बाजार से खाने पीने का सामान सुबह ही खरीद लाया हूं। ठीक पिछले साल की तरह। पिछले साल ३१ दिसम्बर की रात बारिश नहीं हुई थी, सिर्फ बूंदें पड़ी थी। यह कैसा शगुन है? आधा घंटे बाद यह साल भी चला जाएगा। लेकिन मैं सोचता हूं कि आने वाला साल उसे नहीं तो कम से कम उसकी कोई खैर खबर ही लेकर आएगा। पहली जनवरी को आने वाले सूरज, क्या तुम अपनी किरणों के साथ उसे भी लेकर आओगे? अगर हां, तो मैं तुम्हारा स्वागत करता हूं।

10 comments:

  1. bahut hi achchi kahaani...padh kar achcha laga

    http://blogs.rediff.com/gopigoswami

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  2. सर,
    एक सांस में पढ़ गया ...पूरी कहानी!वैसे ही आप के मुरीद है...पर आज आपकी लेखनी का कमाल देख बहुत आनंद आया...मन में ऐसी ही कल्पना लिए कितनी बालाएं हमारे दिल में गहरी बसी हुई है..नव वर्ष की शुभ कामनाएं!

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  3. badhai...khubsoorat kahani hai!

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  4. आलेख और कविता के बाद अब कहानी भी ....
    ब्लॉग के पाठकों पर बहुत एहसान ....:)

    नव वर्ष की बहुत शुभकामनायें ....!!

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  5. आपके और आपके परिवार के लिए नया वर्ष मंगलमय हो !!

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  6. Kahaani umda hai. Pravah achha hai, pathak ki utkantha kahani ke ant tak banane men safal rahi... aapko nav varsh ki shubh kamnayen.

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  7. bahut achhi kahani...dil ko choo gyi....

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  8. bahut achhi kahani...dil ko choo gyi....

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  9. I deeply appreciate that you put this story on the blog. Please share more stories on this blog----

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