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Thursday, 31 December 2009

31 दिसंबर की रात




यह कहानी पिछले साल लिखी थी। आज 31 दिसंबर के दिन अपने दोस्‍तों और पाठकों के बीच इसे प्रस्‍तुत करते हुए थोड़ी झिझक हो रही है। वजह यह कि ब्‍लॉग पर पहली बार अपनी कहानी दे रहा हूं। पता नहीं पाठकों को पसंद आएगी कि नहीं।
बाहर बारिश हो रही है। पड़ोस में कहीं तेज आवाज में डीजे बज रहा है। नया साल अब कुछ ही घंटों में आने वाला है। मद्धम बारिश में यह शोर किसी शोकगीत की तरह लगता है। इस बारिश भरी जाड़े की रात की कोख से जो दिन निकलेगा, वह नया साल लेकर आएगा। कुछ भी तो नहीं बदलेगा, सिवाय एक केलेण्डर के या कहें कि कुछ दिन हमें नया सन् लिखने की आदत डालनी पड़ेगी। जीवन वैसे ही चलता रहेगा। मैं अभी की तरह यूं ही बिस्तर में दुबका पड़ा रहूंगा। अपनी हालत पर खुद ही तरस खाता रहूंगा और उम्मीद करता रहूंगा कि वह आएगी और मुझे झिंझोड़कर कहेगी, 'चलो बहुत हुआ रोना धोना, उठो और तैयार हो जाओ।'

खुशफहमियों में जीना इंसान की फितरत है। मैं भी वही कर रहा हूं। खिड़की से बाहर देखता हूं तो स्ट्रीट लाइट का पीलिया के रोगी जैसा प्रकाश बारिश की बूंदों में यूं लग रहा है जैसे मेरे दिल के घावों पर कोई सुइयां चुभो रहा है और पीला जर्द मवाद बूंद बूंद कर बरस रहा है। पता नहीं वह कौनसी घड़ी थी, जब मैं उससे प्यार कर बैठा? क्या वह सचमुच प्यार करने के काबिल है? उसमें ऐसा कुछ भी तो नहीं।

लम्बा और अण्डाकार चेहरा, जिस पर बड़ी और चौड़ी चौड़ी आंखें। मर्दों की तरह भरी-भरी काली भवें। पतले होंठ, निचला होंठ थोड़ा सा बड़ा। जब वह चुप रहती तो लगता, निचला होंठ कहीं गिर न पड़े। ठुड्डी और होंठों के बीच का फासला काफी कम। मेरा मन करता कि कभी कहकर देखूं कि जरा अपनी जीभ से यह घुमावदार ठुड्डी छूकर देखो। वह सचमुच नाराज हो जाती। गाल हल्के से पिचके हुए और उन पर बहुत बारीक गेहुंए रंग के रोंये, उसके सांवले रंग को ये रोंये गेहुंआ रंग देते। लम्बी गर्दन पर उभरी हुई नीली नसें। मुझे बेसाख्‍ता पद्मिनी का खयाल आता और मैं सोचता कि कि अगर इसका रंग गोरा होता तो नीली नसों के भीतर बहता रक्त भी दिखाई देता। आम लड़कियों के मुकाबले वह थोड़ी लम्बी थी छह फीट के करीब यानी मुझसे बामुश्किल एक आध इंच कम। अगर वह हाई हील पहनती तो मुझसे लम्बी लगती। हालांकि उसे हाई हील पहनना पसंद नहीं। चुस्त सलवार कमीज में उसकी लम्बाई और रोबदार लगती। उसके लम्बे हाथों में आश्चर्यजनक रूप से बेहद छोटी और पतली अंगुलियां। वह पतली तो नहीं लेकिन देह इतनी भरी हुई भी नहीं कि गदराया हुआ जिस्म कहा जा सके। बड़ी सादगी पसन्द। आम तौर पर सलवार कमीज और कभी-कभी साड़ी पहनती। सादे ढंग से बाल बनाती और बालों में नारियल या सरसों का तेल लगाती। कहने का मतलब यह कि उसके व्यक्तित्व में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे तुरन्त आकर्षित हुआ जा सके। फिर भी मैं क्यों उसके लम्बे बालों वाली पतली सी चोटी के पीछे फुन्दे सा लटक गया। दरअसल इसकी भी एक कहानी है। उन दिनों मैं इसी शहर के एक मोहल्ले में अपनी मौसी के यहां रहता था। मेरी परीक्षाएं खत्म हो चुकी थीं और मैं रिसर्च की तैयारी में जुटा हुआ था। गर्मी के दिन थे। मैं छत पर बैठकर पढ़ता था। पूरी पूरी रात। सुबह नौ बजे के आस पास जब मैं अखबार पढ़ रहा होता तो उसे सड़क पर बस स्टॉप की ओर जाते हुए देखता। हरे रंग का एक बैग उसके कंधे पर होता। वह लम्बी टांगों से तेज-तेज चलती। एक सुबह वह सामने से गुजरी तो अचानक उसकी चप्पल जवाब दे गई। वह गिरते गिरते बची और सधे कदमों से चलती चली गई। मैं उसके इस आत्मविश्वास पर मुग्ध हुआ। लेकिन इसमें आकर्षण जैसा कुछ नहीं था। मैं वापस अखबार में डूब गया, जहां पुलिस के आपरेशन मजनूं की खबर थी। मैंने डर के मारे उसका खयाल ही दिमाग से निकाल दिया।

रविवार का दिन था। एक प्रतियोगी परीक्षा के लिए मैं जल्दी तैयार होकर बस स्टॉप पर बस की राह देख रहा था। मैं जब बस में घुसा तो देखा कि वह मेरे पीछे पीछे बस में चढ़ रही है। बस में दो ही सीटें खाली थीं। हम साथ-साथ बैठ गए। वह बैठते ही एक किताब में डूब गई और मैं बाहर देखने लगा। कण्डक्टर ने किराया मांगा तो उसने वही स्टाप बताया जहां मुझे भी जाना था। पैसे देने के बाद मैंने कनखियों से देखा वह उसी परीक्षा की तैयारी में डूबी थी जिसके लिए मैं खाली हाथ जा रहा था। गंतव्य आया तो हम एक ही दिशा में आगे बढ़ते रहे। अब इसे संयोग ही कहिए कि हम दोनों एक ही कमरे में बैठे थे। एक दूसरे को देखने लायक दूरी जरूर थी हमारे बीच। परीक्षा देकर बाहर की तरफ निकलते हएु मैंने यूं ही पूछ लिया, 'कैसा हुआ पेपर?' उसने कहा, 'अच्छा।' मेरी हिम्मत बढ़ी और अगला सवाल दाग दिया 'हम एक ही मोहल्ले में रहते हैं।' उसने बेरुखी से कहा, 'जानती हूं।'

वापसी के लम्बे सफर में थोड़ी बहुत बातचीत हुई। वह विधवा मां की इकलौती संतान है। पिता दुर्घटना में मारे गए। मां को पिता की जगह क्लर्क की नौकरी मिल गई। मां बेटी किराए के घर में रहते हैं। उसने भी मेरी तरह एम.ए. कर लिया है। वह मुझसे उदासीन रहकर बातें करती रही। मैंने भी पल्ला झाड़ लिया था। लेकिन उसकी दुखदायी अवस्था यानी कि विधवा मां और किराये का मकान, मुझे बेचैन करने के लिए काफी था। इस घटना के बाद हमारी मुलाकातें थोड़ी सी अनौपचारिक होने लगीं।

एक दिन मैंने तय किया कि इस चिल्ल पौं वाले मोहल्ले में रहकर में रिसर्च का काम आगे नहीं बढ़ सकता। यहां आए दिन जागरण होते रहते हैं। जन्म दिन हो या कोई मौका, लोग जोर से डेक बजाना अपना फर्ज समझने हैं। नाई से लेकर पंसारी तक सुबह शाम भजनों के कैसेट बजाते रहते हैं। मैंने एक संभ्रान्त कॉलोनी में खाली पड़े मकान का गैरेज पोर्शन किराए पर ले लिया। मौसी ने कुछ नहीं कहा। शिफ्टिंग वाले दिन मैं पता नहीं क्यों सुबह उठकर बस स्टॉप पर चल दिया। उसके आने तक किसी बस में नहीं बैठा और जब वह आई तो उसके साथ बस में चढ़ गया। आज भीड़ थी। कोई सीट नहीं मिली। एक कोने में हम दोनों खड़े हो गए। मैंने उसे बताया कि मैं यहां से जा रहा हूं। उसने सिर्फ इतना कहा, 'अच्छा।' पता नहीं क्यों मेरा मुंह लटक गया था। उसने कहा, 'शहर तो यही है। मौसी की याद आए तो कभी भी आ सकते हैं। दूर थोड़े ही है।'

वह अपने कॉलेज चली गई और मैं वही बस स्टॉप के आस पास तब तक भटकता रहा जब तक वह नहीं आई। पहली बार वह मुझे देखकर मुस्कराई। 'सुबह से यहीं हो?' मैं चुप रहा। उसने एक रिक्शा वाले को इशारा किया और बोली, 'चलो बैठो।' मैं रिक्शे में बैठ गया। उसने बैठते ही रिक्शे वाले से कहा, 'क्वीन्स पार्क।' फिर मुझसे बोली, 'उदासी छोड़ दीजिए, हम कॉफी पीने चल रहे हैं।' वह पहली बार खिलखिलाई तो उसके पतले होंठों के पीछे सफेद दांतों की पंक्तियां चमकीं। मैं मंत्रमुग्ध बैठा रहा।

कॉफी के दौरान वह मुझे किसी अभिभावक की तरह पढ़ाई का ध्यान देने और बाकी फालतू चीजों से बचने के लिए कहती रही। मैं बस हूं हां करता रहा। वापसी में मैंने उससे पूछा कि अब कैसे और कहां मिलेंगे हम। उसने कहा वह शनिवार को कमरे पर आएगी। मुझे आश्चर्य भी हुआ और खुशी भी। ...मैं शनिवार का इंतजार करने लगा। शनिवार आया और चला गया। वह नहीं आई। सोमवार मैं उसके कॉलेज के दरवाजे पर जा बैठा। शाम हो गई, वह नहीं दिखी। मैं मौसी के यहां पहुंचा। मोहल्ले के हाल-चाल पूछे। कोई खास खबर नहीं थी। रात खाना खाकर उसके घर के सामने दो चार चक्कर लगाए ओर कमरे पर लौट आया। कॉलेानी में सन्नाटा छाया था और मेरे मन पर भी। उसके खयालों में पता नहीं कब नींद आ गई। बुरे बुरे खयाल आते रहे और बेमन से पढ़ाई भी चलती रही। मैं कमरे में बन्द हो गया। फिर एक शनिवार आ गया। मैंने कमरे को व्यवस्थित किया और इन्तजार में कान लगाए पढऩे की कोशिश करता रहा। दोपहर के तीन बजे लोहे का गेट खुलने की आवाज आई। मैंने झटपट टी शर्ट पहनी और दरवाजा खोला तो वह मुस्कुराती चली आ रही थी। पीली कमीज और सफेद सलवार में वह पहली बार मुझे बेहद आकर्षक लगी। मैं 'पिछले शनिवार मां बीमार थीं। उन्हें दमे का दौर पड़ा और अस्पताल ले जाना पड़ा। अब ठीक है।'

मैं निरूत्तर मौन रह गया। वह कुर्सी पर बैठ गई और मुझे देखने लगी। मैं झेंप गया और उसके लिए मटके से पानी लेने लगा। 'मेरे पास एक ही गिलास है।' कहकर मैंने उसे पानी थमाया तो वह मुंह ऊपर कर हलक में पानी उंडेलने लगी। गिलास वापस रखकर हम दोनों मौन बैठे रहे। उसने अपना हैण्डबैग एक तरफ रखा और खड़ी हो गई। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा तो मैं ढेर होने लगा। वह हौले से मेरा कंधा थपथपाने लगी। मैंने उसके दूसरे हाथ को थामा और पता नहीं कैसे और क्यों हम एक दूसरे से लिपट से गए। हम बस एक दूसरे की धड़कनें सुनते रहे बिल्कुल चुपचाप। वह मेरे बालों में अंगुलियां फिराती रही और मैं उसके नथुनों की गरमाहट अपनी गर्दन पर महसूस करता रहा।... उसके आने का यह सिलसिला चलता रहा। लेकिन उस दिन के बाद हम कभी एक दूसरे से नहीं लिपटे। बस हाथ थामे बैठै रहते। घर परिवार और पढ़ाई की बातें होतीं। कभी कभी हम साथ फिल्म देखने जाते या खाना खाने। इस तरह महीने गुजरते रहे। दिसम्बर की एक दोपहर उसने आकर बताया कि उसे एक नौकरी मिल गई है वह भी सरकारी। केन्द्र सरकार के एक संस्थान में। वह अगले दिन मां के साथ ज्वाइन करने जाएगी और ३१ दिसम्बर को मेरे साथ नया साल मनाने वह सहेली का बहाना बनाकर मेरे कमरे पर आएगी। हम बाजार से खाने पीने का सामान खरीदेंगे और इस कमरे में कैण्डल लाइट डिनर करेंगे।

इस बात को ज्यादा वक्त नहीं बीता। सिर्फ एक साल गुजरा है। मैं बाजार से खाने पीने का सामान सुबह ही खरीद लाया हूं। ठीक पिछले साल की तरह। पिछले साल ३१ दिसम्बर की रात बारिश नहीं हुई थी, सिर्फ बूंदें पड़ी थी। यह कैसा शगुन है? आधा घंटे बाद यह साल भी चला जाएगा। लेकिन मैं सोचता हूं कि आने वाला साल उसे नहीं तो कम से कम उसकी कोई खैर खबर ही लेकर आएगा। पहली जनवरी को आने वाले सूरज, क्या तुम अपनी किरणों के साथ उसे भी लेकर आओगे? अगर हां, तो मैं तुम्हारा स्वागत करता हूं।

Sunday, 13 September 2009

नंद भारद्वाज की कहानी ‘उलझन में अकेले’


राजस्थान के साहित्य को जिन रचनाकारों ने पिछले पचास बरसों में सबसे ज्यादा समृद्ध किया है उनमें नंद भारद्वाज का नाम बेहद आदर के साथ लिया जाता है। अत्यंत संघर्षपूर्ण जीवन परिस्थितियों से गुजर कर नंद भारद्वाज ने अखिल भारतीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया है। कविता, कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता और मीडिया जैसे विविध अनुशासनों में रचनाकर्म करने वाले नंद भारद्वाज के यहां आम आदमी का संघर्ष और उसके भविष्य को लेकर गहरी चिंताएं देखने को मिलती हैं। उनके समूचे रचनाकर्म में एक गहरी प्रतिबद्धता और ऐसी रचनात्मकता दिखाई देती है, जिससे उनके बहुआयामी रचनाकार के विविध आयाम परिलक्षित होते हैं। उनके चर्चित कविता संग्रह ‘हरी दूब का सपना’ पर 2008 का के.के. बिडला फाउण्‍डेशन द्वारा दिया जाने वाला प्रतिष्ठित बिहारी पुरस्कार पिछले दिनों राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदान किया जाएगा। इस अवसर पर प्रस्तुत है उनकी एक अत्यंत चर्चित कहानी ‘उलझन में अकेले’ । इस कहानी से नंद भारद्वाज की गहरी संवेदनशीलता और रचनात्मकता के कई पक्ष उजागर होते हैं।


रात काफी गहरा गई थी और बाहर बढ़ती सर्दी के तेवर उत्तरोत्तर तीखे होते जा रहे थे। तिबारी (बैठक) के बीचो-बीच जलते अलाव से निकलती अग्नि की अशान्त ज्वालाएं फिर मंदी पड़ गई थीं। थोड़ी देर पहले जिन लकड़ियों को अंगारों पर रखा गया था, वे जलकर खुद अंगारे बन गई थीं और अंगारे फिर नई लकड़ियों की आहुति मांग रहे थे। कुछ ठूंठ के टुकड़े अभी तक जल रहे थे और कुछ अधजले धुंआ उगलते-से आग में अपना अस्तित्व विलीन करने को तैयार हो रहे थे। मैंने कुछ पतळी लकड़ियों को अंगारों पर रखकर दो-एक लंबी फूंकें दी - फूंक के उत्ताप में सनसनाती हुई आग फिर से सचेतन हो गई। उस सचेतन आग की सलोनी ज्वालाओं से अपने ठंडे पड़ते हाथों को गर्म करते और धीमी पड़ती मुस्कान को गरमास के नजदीक रखते मुझे मंद होती ज्वालाएं कुछ फीकी पड़ती-सी लगी। एक सूखा ठूंठ मैंने उन धीमी पड़ती लपटों पर धीरे-से और रख दिया। अंगारों और लपटों के लगातार उकसावे में अलाव के चारों ओर एक बार फिर गरमास-सा व्याप्त हो गया था और मन में कहीं इस बात की तसल्ली भी हुई कि इस गरमास का कुछ असर जीसा (पिता) तक अवश्‍य पहुंच रहा होगा, जो अभी तक मेरे सामने अलाव के उस पार आंगन पर बिछी दरी पर अबोले बैठे थे।

मैं तय नहीं कर पा रहा था कि जीसा से कैसे बात शुरू की जाए, क्योंकि बात जो करनी थी वह तो शायद पहले ही उन तक पहुंच चुकी थी और जो कुछ कहना था उन्हीं को कहना था, मुझे तो फकत् इतना ही बताना था कि मेरे सामने फिलहाल दूसरा कोई रास्ता खुला नहीं है। यह एक अच्छा अवसर हाथ आया है और मैं अपनी भटकती किस्मत को एक बार इस जमींन पर टिकाना चाहता हूं, लेकिन वे समझने को तैयार हों तब न!

मन में कई तरह की शंकाएं उठ रही थी कि शायद जीसा मुझे लेकर बहुत तनाव में हों और छूटते ही उलाहनों से मुझे अबोला कर दें या नाराजगी दिखाते हुए यह उलाहना भी दे सकते हैं कि ‘जब मां-बाप की दी हुई कोई सीख-सलाह सुहाती ही न हो तो अकारथ पूछताछ की रीत क्यों रखनी... मन-मरजी की ही करनी हो तो करो फिर... पूछना किस बात का...मां-बाप कहां-किसे बाधा देने आते हैं... लेकिन वे कुछ बोलें तब न, एक स्थिर दीठ जलते ठूंठ पर टिकाए वे फकत् बैठे थे...गहरे सोच में डूबे...अबोले!
ठूंठ अब पूरी तरह आग की लपटों में घिर गया था और उसके चारों ओर से लपटें निकल रही थी। आग के पीले उजास में जीसा के चेहरे की ओर देखकर साफ लग रहा था कि वे नाराज होने की बजाय कुछ उदास हैं, और उनका चेहरा भावहीन-सा हो गया है।

भाभू (मां) बता रही थी, ‘पिछले डेढ़ महीने से तुम्हारे जीसा काफी बीमार रहे हैं। यों आठ-पहर खाट तो कभी नहीं पकड़ी, लेकिन बुखार, खांसी और दमे के कारण जीव में आराम कम ही रहता है। हमने तो कितनी ही झाड़-फूंक करवा ली, दवाई-फाकी भी देकर देख ली, लेकिन जीव में आराम तो कभी आता ही नहीं। कोई दुख-दर्द की बात पूछ लें तो बताते और नहीं। रोटी जीमने के नाम पर तो फकत् टंक टालते हैं, मुश्किल से एकाध रोटी या थोड़ा-बहुत खीच-दलिया ले लेते हैं। चिकनाई के लिए वैद्यजी ने यों भी मनाही करवा रखी है। अफीम, चाय और तंबाखू की मात्रा जरूर बढ़ गई है, जो एक बारगी तो कौन जाने सीधा होने में मदद करते होंगे, लेकिन आखिर तो ये चीजें हानि ही पहुंचाती है। कोई आया-गया भी आजकल कम ही सुहाता है। आधी रात तक अलाव के पास अकेले गुमसुम बैठे रहते हैं, कोई बतला ले तो बहुत कम बोलते हैं। बरजने-डांटने का स्वभाव तो जाने कहां चला गया।‘
‘‘आपने कभी इस बारे में कुछ पूछा नहीं। मैंने भाभू से पूछा।
कहने लगी, बताते कहां है, ज्यादा जोर देते हैं, तो खारी दीठ से सामने देखते रहते हैं, या फिर बोलेंगे तो फकत् इत्ती-सी बात कि ‘तुम्हें क्या करना है - दूसरा कोई काम नहीं है घर में और हमें चुप रह जाना पड़ता है।

क्या कारण हो सकता है, मैं दिन भर इसी बात पर सोच-विचार करता रहा। दिन में तिबारी एकदम सूनी पड़ी थी। जीसा घर में कहीं नहीं थे, शायद अपनी अफीम की खुराक के लिए किसी ठेकेदार की ओर गये होंगे! पूछने पर, भाभू ने यही बताया था।
‘‘तो किसी को साथ ले जाते, या किसी को भेजकर मंगवा लेते! तबियत ठीक न हो तो यों अकेले भेजना तो ठीक बात नहीं है ना।
‘‘किसी को बताएं तब न! यह तो मुकने रबारी ने थोड़ी देर पहले खबर दी थी कि आज बाबोसा सवेरे ही मूंडसर के रास्ते जा रहे थे। मूंडसर में जगमाल और दो-एक जने अफीम का धंधा करते हैं। यों हरेक पर विश्वास भी तो नहीं किया जा सकता। लोग बताते हैं कि आजकाल अफीम पर सरकार की ओर से एकदम पाबंदी हो रखी है। मैंने तो तेरे जीसा को बहुत समझाया कि एक बार हिम्मत करके इससे जान छुड़ाओ न! बिना बात इत्ती-सी किरची के लिये ना-कुछ लोगां की गरज़ें करनी पड़ती हैं। भाभू ने अपनी चिन्ता प्रकट कर दी।

‘‘यह व्यसन ऐसा ही होता है, भाभू! और वह इस अवस्था में छूटना तो और भी मुकिल है। एकबार शुरू हो जाने के बाद तो अच्छे-भले जवानों का धैर्य जवाब दे जाता है, इन्होंने तो सत्तर पार कर लिये हैं! मेरे साथ पढ़ने वाले कई लड़के-लड़कियों में मैंने यह ऐब देखा है, लेकिन जीसा की बात दूसरी है। वे इतने बरसों से सेवन करने के बाद भी इसके वश में नहीं हैं।

‘‘अरे बेटा, ये तो मुंह के ही नहीं लगाते थे। ये तो शिवदान के बिखे में टूट गये! इतने जोध-जवान बेटे का यों अकस्मात् उठ जाना, क्या कोई सही जा सकने वाली बात है..औलाद बूढ़े मां-बाप के जीने का आधार-सहारा होती है.... और जब यह सहारा ही हाथ से छिन जाए...तो जीना बोझ हो जाता है... यह बात कहते हुए भाभू का गला भर आया और आंखों से टलक-टलक आंसुओं की धारा-सी छूट गई।
शिवदानसिंह मेरे बड़े भाई थे। वे बी.एस.एफ. में सूबेदार-मेजर थे। तीन बरस पहले पड़ौसी मुल्क से झगड़ा हुआ तब वे अखनूर के हल्के में कहीं मोर्चे पर थे। उनकी टुकड़ी ने मोर्चा जीत भी लिया था, पर कौन जाने ईश्वर की क्या मर्जी थी, जब गोली-बारी एकदम बंद हो गई, तब वे बंकर से बाहर फकत् यह देखने आए थे कि कोई दुश्मन नजदीक-दूर तो नहीं है, और उसी वक्त किसी घायल दुश्मन ने तक कर ऐसा निशाना साधा कि उसकी गोली शिवदान की छाती को आर-पार बींध गई। फिर तो उसके साथियों ने उस अधमरे दुश्मन को गोलियों से छलनी कर दिया, लेकिन उससे शिवदान तो वापस सीधे नहीं हो पाए। दो दिन बाद काठ में बंधी उनकी मिट्टी ही घरवालों के पास पहुंची और तब से जीसा तो जैसे जीते-जी मरे-समान हो गये। उनके सीने में ऐसी बूज आई कि गले से चीख भी नहीं निकल पाई। भाभू और भाभीसा तो बेहाल थे ही, उन्हें संभालने में हम सभी का जैसे धैर्य ही जवाब दे गया था। भाभी को तो तीन दिन बाद जाते होश आया, लेकिन एक बार होश आने के बाद उन्होंने जल्दी ही अपने को संभाल लिया और खुद को इस असह्य वेदना का मुकाबला करने के लिए तैयार भी कर लिया। धन्य है उनकी हिम्मत को! उन्होंने अपनी चिन्ता छोड़, मुझे बुलाकर यह हिदायत दी कि नरपत बना, आप मेरी चिन्ता छोड़ें, आप जीसा का ध्यान रक्खें, उनका आपके भाई पर बहुत जीव था! वे अपनी तकलीफ किसी को नहीं बताएंगे! उस दिन से मेरी नज़र में भाभी की इज्जत बहुत बढ़ गई थी।
.......
जीसा ने अपनी इकहत्तर वर्षों की उम्र में कठिन समय देखा है। खुद बदलते जमाने और दुनियादारी की अच्छी सूझ-समझ रखते हैं। हो सकता है कि उनका वक्त थोड़ा दूसरा रहा हो, लेकिन फकत् चारणों के घर में जन्म लेने मात्र से उन्हें अपने हलके या समाज में ज्यादा मान-सम्मान या सुविधा मिल गई हो, उस बात की तो उन्होंने कभी आस भी नहीं रखी। लोकहित और न्याय की बात करनेवाले एक नेक इंसान के रूप में सींथळ और आस-पास के गांवों में पाबूदानसिंह का नाम किसी से अजाना नहीं था। अपने जमाने की पौशाल में कुछ पढ़ाई भी कर रखी थी। घर में कथा-भागवत, माताजी की चिरजें, तुलसीदासजी की रामायण और कितनी ही पौराणिक गाथाएं उन्हें कंठस्थ थीं। लोग उनसे सुनने के लिए नजदीक-दूर के कई गांवों से आते थे।
उनके पुरखों ने न कभी किसी दरबार में हाजरी भरी और न किसी की जागीरी में कोई ओहदा ही संभाला। उल्टे जागीरी जुल्म के विरोध में अपने भाई-संबंधियों से लड़ते ही रहे। मेरे दादाजी कभी गंगा रिसाले में अपनी टुकड़ी के मुखिया हुआ करते थे, उन्हीं के नाम आई यह सौ बीघा जमीन है, जो पिछले वर्षों में परिवार की जीवारी का आधार रही है।

हाथ के काम के लेखे तो मेरी भाभू भी कम नहीं थीं। वे तो जीसा से भी दो कदम आगे रहतीं। घर में चार-चार दूध देनेवाली गायें थीं। उन गाय-बछड़ों और ढोर-डांगरों की पूरी सार-संभाळ उनके ही जिम्मे रहती थी। फकत् एक गोरधन राईका और उसकी घरवाली उनके घर-बाहर के काम में थोड़ा हाथ बंटा देते, जो गरीब थे और उनकी ही शरण-सहारे से अपना पेट पालते थे, लेकिन यह धीणा और धान किस तरह अंवेरना है, यह देखने का काम तो भाभू का ही होता था। आगे चलकर भाभी ने भी कुछ अपना आपा और मन मिला दिया था। इस बार भाभू से बात करते हुए मुझे इस बात का अचंभा हुआ कि उन्होंने एक बार भी किसी बात में भाभी का जिक्र नहीं किया। यह बात मुझे पूछने पर ही पता लगी कि वे अपने पीहर जयपुर गई हुई हैं, उन्हें सरकार की तरफ से शहीद की विधवा के नाम पर कोई बडी इमदाद मिलने वाली है।

फौज में एक सिपाही या हवलदार की कितनी-सी वक़त होती है, यह बात खुद घर के बड़े बेटे शिवदान ने अपनी उन्नीस बरस की नौकरी में अच्छी तरह से समझ ली थी। बारहवीं पास करने के बाद वे बी.एस.एफ. में एक हवलदार के रूप में भरती हुए थे और इतने बरसों में फकत् सूबेदार-मेजर के ओहदे तक पहुंच पाए थे। जो तो उन्होंने नौकरी में रहते हुए प्राइवेट बी.ए. भी कर ली थी। खुद भाभी भी दसवीं पास थी, लेकिन भाई की हिदायत के कारण घर के किसी काम में पीछे नहीं रहतीं। वे कहतीं, अपने घर और खेत में काम करते किस बात की शर्म या शंका! उनकी दो बेटियां हैं और दोनों अच्छी पढ़ाई कर रही हैं। बड़ी बेटी सुगन को शिवदान ने खुद वनस्थली ले जाकर भर्ती करवा दिया था। सुगन ने पिछले साल सीनियर सेंकेण्ड्री की मेरिट लिस्ट में अपनी जगह बनाई और फिर पी.एम.टी की परीक्षा पास कर मेडिकल में दाखिला लेने में कामयाब रही। उससे छोटी मेघा भी कम नहीं है।
शिवदान का बारहवां बीतने के बाद भाभी के पिता और भाइयों ने बहुत निहौरे किये कि वे उनके साथ पीहर में रहें और दोनों बेटियों को शहर में रखकर पढ़ाएं, लेकिन उस वक्त तो भाभी ने साफ मनाही कर दी थी। कहा,‘’बाबोसा, यह मेरा अपना घर है और ये सास-ससुर ही अब मेरे मां-बाप हैं, मैं इन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।‘ जीसा को जब इस बात का पता लगा तो उन्हें अपनी इस बहू-बेटी पर बहुत गर्व हुआ और पहली बार उनकी आंखों में आंसू की दो बूंदें दिखाई दीं।

असल में शिवदान पर जीसा की बढ़ती उम्मीदों की एक बड़ी वजह खुद शिवदान की अपनी नयी सोच और घर को उस पुराने ढर्रे से बाहर निकाल लाने की उनकी जिजीविषा थी। गांव में बिजली आते ही उन्होंने सबसे पहले कोशिश करके घर में बिजली लगवाई। खेत की जमीन के नीचे गहराई में अथाह पानी था, उन्होंने सरकार और बैंक से मदद लेकर गांव में सबसे पहले अपने खेत में ट्यूब-वैल खुदवाया और खेती के लिए नये साधन-तरीके अपनाए। उन्हें छुट्टी भले ही कम मिलती हो, लेकिन दूर बैठे ही वे घर की व्यवस्था सुधारने में पूरी रुचि लेते थे। नये साधनों और तकनीक के कारण खेती की उपज भी चौगुनी हो गई। खुद शिवदान नौकरी से रिटायरमेंट लेकर घर की व्यवस्था संभालने के लिए आने के बारे में सोच रहे थे और इसी की खातिर उन्होंने अपने परिवार को गांव में ही बनाए रखा। खुद भाभी ने भी अपने पति की इस योजना को खूब बढ़ावा दिया और उनकी गैर-मौजूदगी में वे सारी जिम्मेदारियां निभाने को तैयार रहतीं, जो इस बदलाव के लिए जरूरी थीं।

घर की माली हालत में रातों-रात तब्दीली आ गई। खुद मुझे भी बड़े शहर में रहकर अपनी सी.ए. की पढ़ाई करते हुए कभी तंगी महसूस नहीं हुई। वे कोई मैनेजमेंट का कोर्स किये हुए आदमी नहीं थे, लेकिन उनकी व्यावहारिक बुद्धि अच्छे-अच्छे मैनेजमेंट किये हुओं को पीछे छोड़ देती। खुद मेरी पढ़ाई के खर्चे पर भी उनकी पूरी नज़र रहती। उन्हें भरम में रखकर कोई फिजूल-खर्ची कर लेना असंभव था। उनकी इच्छा थी कि मैं किसी बड़ी कंपनी में चार्टेड अकाउण्टेंट बनूं। इस मामले में जीसा की राय शुरू से ही अलग थी। वे कहते थे कि मैं भले सी.ए. करूं या एम.बी.ए., कोई सरकारी या प्राइवेट नौकरी की तजवीज करने की बजाय यदि अपनी खेती या घर के धंधे में रुचि लूं तो वह किसी भी नौकरी से ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। लेकिन मुझे भाई की राय ही ठीक लगती थी।
पिछले दो वर्षों में मैंने खूब मेहनत की थी और यह शायद उसी का नतीजा था कि एक भी साल बेकार गंवाए बिना मैंने सी.ए. की डिग्री समय पर हासिल कर ली। पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद कई जगह आवेदन-पत्र भिजवाये। कुछ बाहरी कंपनियों और बड़े बैंकों की मांग के अनुसार अपना बायोडेटा भेजकर इंतजार करता रहा कि कहीं से कोई बुलावा आयेगा। पहली कोशिश तो यही थी कि अपने ही आस-पास के किसी शहर में मन-रुचि का काम मिल जाए, तो घर से ज्यादा दूर जाने की नौबत न आए।
सी.ए. करने के बाद जब तक दूसरे काम की व्यवस्था नहीं हो गई, मैं बीकानेर की उसी कंपनी में बराबर काम करता रहा, जिसमें काम करते हुए मैंने अपनी शिक्षा पूरी की थी। यों कंपनी की साख अच्छी थी और देश के दूसरे शहरों में भी इसकी अपनी शाखाएं थी। उसके मालिक तो यहीं के निवासी थे, लेकिन कंपनी का हैड आफिस उन्होंने मुंबई में ही बना रक्खा था, जहां मैं पहले भी कई बार जा चुका था। मैं कंपनी के नये प्रोजेक्ट पर काम कर ही रहा था, तभी एक दिन मुझे मुंबई से इंटरव्यू के लिए बुलावा आ गया। कंपनी से तीन-चार दिन का अवकाश लेकर मैं मुंबई निकल गया।


इंटरव्यू अच्छा ही हुआ था, लेकिन मैं पूरी तरह आश्वस्त नहीं था। पांचवें दिन मैं वापस अपने शहर लौट आया और वापस कंपनी के काम में लग गया। महीना पूरा होने से पहले मुंबई से भी बुलावा आ गया। बुलावे पर जाने से पहले मुझे जीसा और भाभू से इजाजत लेनी जरूरी थी, क्योंकि शिवदान की अकाल मृत्यु के बाद जीसा ने अपनी सारी उम्मीदें और जिम्मेदारियां मुझ पर छोड़ रखी थीं और उनसे बिना पूछे कोई कदम उठाना तो और बड़ी गलती होती। मैं उन्हें यह समझाना चाहता था कि बैंक की यह नौकरी, जीवन में आगे बढ़ने का एक अच्छा मौका है, खुद भाई की भी यही राय थी कि मैं किसी बडी कंपनी से जुड़कर काम करूं।
‘‘जीसा, अपने लिए यह खुशी की बात है कि मुझे मुंबई से एक बड़ी बैंक में काम करने के लिए बुलावा आया है.... मैं आपकी इजाजत लेने के लिए आया हूं...! उन्होंने मुझे अगले हफ्ते ही मुंबई आने के लिए कहा है... आप कहें तो मैं कल ही उन्हें अपनी मंजूरी भेज दूं... आखिर मैंने ही हिम्मत जुटा कर जीसा के सामने अपनी इच्छा प्रकट कर दी। जीसा बिना कोई उत्तर दिये अलाव से उठती ज्वालाओं की ओर देखते रहे... उन्होंने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, फकत् एकबार मेरी ओर देखा और वापस नज़र नीची कर ली...वे शायद उत्तर तलाश कर रहे थे... किसी गहरी चिन्ता में डूबे हुए!

उन्हें यों चुप और गुमसुम बैठे देखकर मुझे चिन्ता भी हो रही थी। फिर यह भी लगा कि नौकरी के लिए इजाजत मांगना तो इतनी चिन्ता का कारण नहीं होना चाहिए, मैं खुद एकबारगी चिन्ता में पड़ गया और विचार करने लगा कि ऐसा क्या कारण हो सकता है, अगर बिना पूछे चला जाता तो जीसा और घरवालों का उम्र भर का उलाहना रह जाता और पूछ रहा हूं तो यह हाल है! मुझे अपने सामने एक-टक निहारते देखकर वे बोले, ‘बुलावा आ गया, वह तो बड़ी बात है, लेकिन यहां के घर-परिवार के बारे में क्या सोचा है, इसे किसके भरोसै छोड़ने का इरादा है... मेरी उम्र इकहत्तर पार कर गई है...इसी के आस-पास अपनी मां की जान लो... अब कोई दुबारा तो जवान होने से रहे... पीछे रही तुम्हारी भाभी और उनकी दोनों बेटियां, तो उनकी रखवाली और संरक्षण मुझे तो तुम्हारे ही जिम्मे दीखती है, अब विचार कर लो कि तुम्हें क्या करना चाहिए... जीसा ने संजीदा स्वर में अपनी समझ से पूरी बात बता दी थी।

अपने तर्क को और वजनी बनाते हुए उन्होंने फिर आगे बात बढ़ाई, ‘मुझे तो यह समझा दो कि इस घर में क्या आज तुम्हें अपने जिम्मे कोई काम नहीं दीखता कि सैकड़ों कोस दूर जाने को तैयार हो गये... यदि नौकरी का उद्देश्य ऊंची कमाई करना है, तो वह भी हिसाब लगाकर देख लो कि क्या कोई नौकरी तुम्हें इस घर के काम से बढ़कर कमाई दे सकती है। हो सकता है कि बडे़ शहर में रहने की कुछ नयी सुख-सुविधाएं मिल जाएं... लेकिन अपने पूर्वजों की बरसों की कमाई और साख से बनाया हुआ यह घर क्या तुम्हें इतना सुकून नहीं देता कि उसकी अनदेखी करके उन सुख-सुविधाओं को ज्यादा महत्व दे रहे हो... थोड़ा सोच-विचार कर फैसला करें नरपत बना, क्योंकि अब आप बड़े हो, बालिग हो गये हो और आनेवाले दिनों में इस घर के मुखिया भी होंगे... मैं तो आज ही तुमको यह जिम्मेदारी सौंपने को तैयार बैठा हूं... इतनी बात कहकर वे चुप हो गये, जैसे अब और कुछ कहने को बाकी न रहा हो। उन्होंने मेरी चेतना और मर्म पर पूरा दबाव बनाया था और अपने मन निश्चिंत हो गये थे कि उनकी इस सोच का मेरे पास कोई तोड़ नहीं हो सकता...!
मुझे अचरज हुआ कि जीसा बदले हुए हालात से परिचित होते हुए भी, जाने क्यों अनजान-से बन रहे थे। वे जानते थे कि शिवदान के स्वर्गवास के बाद इन तीन वर्षों में भाभी की सोच में काफी फर्क आ गया था और वह मुझे तो स्वाभाविक ही लग रहा था। आने वाले दिनों में उनकी दोनों बेटियां अपना भविष्य किसी बड़े शहर के आश्रय में ही खोजने में लगी हुई हैं... खुद भाभी को जयपुर में शहीद विधवा के नाम पर एक पेट्राल पंप चलाने की सुविधा मिलने वाली है...।
मैंने भाभू से बात की तो उन्होंने तो इसे हंसकर ही टाल दिया। खुद भाभू, जो कभी बहुत-सी दुधारू गायों की मालकिन हुआ करती थीं, अब एक गाय रखकर ही संतुष्ट हैं और इतनी ही घर की जरूरत मानती हैं। पिछले तीन वर्षों से खेती हिस्सेदारी के आधार पर हो रही है... खुद जीसा का यही सोच है कि अब इतनी ही पार पड़ जाए तो बहुत है! इससे अधिक न घर की जरूरत है और न सम्हालनी ही संभव। खुद लोगों को कहते फिरते हैं कि यदि नरपत को इतनी ऊंची पढ़ाई करवाई है, तो कोई एक जगह बांधकर बिठाने के लिए थोड़े ही करवाई है। मैं यह बात अच्छी तरह समझता हूं कि आज सभी अपने मन की उलझन में निपट अकेले हैं, अपने सवालों के उत्तर से वे अनजान नहीं हैं, लेकिन आश्चर्य की बात है कि वे आज मुझसे ही इसका उत्तर और निराकरण मांग रहे हैं।
अपनी बात पर और बल देते हुए वे बोले, ‘मुझे तो यह बताओ नरपत बना कि कल को तुम्हारी शादी होगी, दुल्हन आएगी... दीखती बात है कि उसे तुम अपने साथ ही रखना पसंद करोगे... यह भी हो सकता है कि जहां काम लगो, वहीं किसी के साथ घर बसाने का संयोग बना लो....इस लिहाज से मुझे नहीं लगता कि तुम्हें इस घर में या इस हलके में खुद के टिकाव की कोई गुंजाइश दीखती हो।‘
मैं अपनी जुबान पर आती यह बात कहना चाहता था कि ‘जीसा, पंछी अपनी उड़ान के जिस मुकाम पर किसी डाल पर अपना रातवासा लेता है, वह एक तरह से उसका घर ही हुआ करता है और उसे इतनी छूट तो देनी ही पड़ती है कि वह अपनी पहचान कायम रख सके। इनसान की यह खासियत मानी जाती है कि वह भले ही दुनिया में कहीं किसी कोने में रहे-जीए, वक्त आने पर वह अपनी ज़मीन और जड़ जरूर ढूंढ़ लेता है। मेरे भीतर आपके और अपने बड़ों के दिये हुए ये संस्कार आज भी कायम हैं, इसलिए उन्हें अपनी सीख और संस्कारों पर थोड़ा तो भरोसा रखना ही चाहिए। लेकिन उन्हें ऐसा उत्तर देना शायद छोटे-मुंह बड़ी बात होती, इसलिए प्रत्यक्ष में तो मैं कुछ भी नहीं कह सका।
मैं जानता था कि उनके सवालों के उत्तर उन्हीं के धरातल पर खड़े होकर देना आसान नहीं था। इसी उलझन में एक-बारगी मैं अपने आप में अकेला-सा हो गया। जीसा, भाभू और भाभीसा की अपनी उलझनें थीं। खुद मुझे ही इन सारी बातों पर नये सिरे से विचार करना था और वह भी किसी के मन को बिना कोई ठेस लगाए। घर-परिवार का अहित किये बिना, ऐसा निराकरण खोजना था, जो उस पुश्तैनी घर का और मेरी अपनी जिन्दगी का, दोनों का मान रख सके...

Sunday, 26 July 2009

आ फोटू अठै कयां - सत्यनारायण सोनी की कहानी


राजस्थानी के युवा और अत्यंत प्रतिभावान महत्वपूर्ण कहानीकारों में सत्यनारायण सोनी का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। चूंकि सोनी गांव में रहते हुए एक पारखी, सजग, और यथार्थवादी दृष्टि से गांव और वहां होने वाले निरंतर बदलावों को देखते हैं, इसलिए उनकी कहानियों में ग्रामीण परिवेश का कड़वा तीखा सच उजागर होता है। उनकी कहानियां आसपास के ग्रामीण परिवेश में फैली विसंगतियों और विद्रूपताओं को बहुत खूबसूरती के साथ बयान ही नहीं करतीं, बल्कि पाठक को बुरी तरह झिंझोड़ डालती हैं। सोनी की कहानियों को पढते हुए लगता है जैसे वे किसी भी साधारण घटना को अपने रचनाकौशल और गहरी अंतर्दृष्टि से एक नायाब कहानी बना देने का अद्भुत हुनर रखते हैं। उनके इसी कौशल और दृष्टि को बयान करती एक लाजवाब कहानी है, आ फोटू अठै कयां। प्रस्तुत है इस महत्वपूर्ण कहानी का सार-संक्षेप:-
14 अक्टूबर, 2007, आज ईद है। ईद से दो दिन चहले अजमेर शरीफ में बम फटा। दो मरे, बाइस जख्मी हुए। यह दर्दनाक हादसा देश के लिए शर्मनाक था। लोग इसमें पाकिस्तान का हाथ बताते। लेकिन... लेकिन, पाकिस्तान-हिंदुस्तान छोड़िए... पाकिस्तान में कौनसे इंसान नहीं बसते और हिंदुस्तान में कौनसे शैतान नहीं रहते। पाकिस्तान का ही एक इंसान ईद से एक दिन पहले की शाम नवभारत टाइम्स की ओर से आयोजित ‘दिल्ली मेरा दिल' कार्यक्रम में गजलें पेश करता है... गुलाम अली। श्रोता झूम रहे हैं। मेरे दोस्त, अंग्रेजी के प्राध्यापक राजेंद्र कासोटिया वहीं विराजमान हैं। वो मुझे मोबाइल पर गजलें सुनवाते हैं... लाइव। एक गजल के शेर थे-
कैसी चली है अबके हवा तेरे शहर में
बंदे भी हो गए हैं खुदा तेरे शहर में
क्या जाने क्या हुआ कि परेशां हो गए
इक लहजा रुक गई थी सबा तेरे शहर में
न दुश्मनी का ढब है न कुछ दोस्ती के तौर
दोनों का इक रंग हुआ तेरे शहर में
शायद उन्हें पता था कि खातिर है अजनबी
लोगों ने उसे लूट लिया तेरे शहर में।
शायर तो शायर है, इसमें हिंदुस्तान-पाकिस्तान क्या, और क्या हिंदू-मुसलमान?
लेकिन उस आदमी का क्या करें... जो पिछले दिनों रामस्वरूप किसान के बाहर वाले कमरे में आकर बैठ गया। कमरे में लगी तस्वीरों की तरफ अंगुली करते हुए पूछा, ये किसकी फोटो है? किसान जी ने बताया, किशोर कुमार की। उसने दूसरी फोटो की ओर इशारा कर पूछा, और ये? मोहम्मद रफी की। किसान जी रफी के जबर्दस्त फैन हैं, उनका बेटा कृष्ण भी। रफी का नाम लेते ही किसान जी के चेहरे पर चमक आ गई और आंखों में नूर। जैसे रफी का नाम लेने से ही उन्हें गर्व महसूस हुआ। लेकिन... लेकिन उस शख्स की आंखों में जैसे जहर बुझे तीर थे और वैसे ही उसके बोल, 'इस तुर्क की फोटो, आपके घर?' सुनते ही किसान जी के चेहरे की रंगत बदल गई, ‘भाई साब, पानी पीजिए और यहां से तुरंत चलते बनिए, मैं आपसे बात नहीं कर सकता।' और वो आदमी चला गया।
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आज ईद है। मेरी नींद भी नहीं खुली थी कि विजय का फोन आ गया।
'गुरूजी ईद मुबारक।'
'तुझे भी... और सुना।'
'गुरूजी ईद मुबारक का एक धांसू एसएमएस तैयार करके भेजो ना।'
क्यों भाई, तेरे को क्या जरूरत है?
'क्यों ईद अपनी नहीं है क्या?' वो हंसते हुए बोला और मैंने भी हंसते हुए कहा, 'अभी भेजता हूं।' इतने में ही महबूब अली का मैसेज आया,
'आज खुदा की हम पर हो मेहरबानी
करदे माफ हम लोगों की सारी नाफरमानी
ईद का दिन आज आओ मिल करें ये वादा
खुदा की ही राहों में हम चलेंगे सदा
सारे अजीजों अकरीबों को ईद मुबारक।'
इसी के साथ मलसीसर से आमीन खान का मैसेज आ गया-
'ईद-दिवाळी दोनूं आवै, ईं महीनै रै मांह।
हिन्दु-मुसळिम सगळा मिलै, घाल गळै में बांह।'
मैंने दोनों मैसेज विजय को भेज दिये।
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घर में रौनक है। आज बेटी नीतू अपनी सहेली मैमुना के घर जीमण पर जा रही है। वो तैयारी कर रही है। इसी बीच मुझे एक बात याद आई, जो नीतू को लेकर उसकी मैडम ने कही थी, 'नीतू की संगत सुधारो।' मैंने मैडम से तो ज्यादा सवाल नहीं किये, लेकिन मेरी चिंता बहुत बढ़ गई। शाम को मैंने बड़े प्रेम से नीतू को मैडम की बात बताई। सुनते ही वो तो रोने लगी...। ' पापा, मैडम मैमुना के कारण यह सब कहती हैं।' मुझे आश्‍चर्य हुआ, 'क्यों?' नीतू बोली, 'पापा, मैडम को मुसलमानों के बच्चे अच्छे नहीं लगते।'
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प्रमोद को भी मुश्‍ताक ने न्यौता दिया है। मिठाइयां उड़ेंगी। उसने भी मुश्‍ताक के लिए तोहफा पैक करवा लिया है। वो तैयार हुआ इतने में ही मुश्‍ताक आ गया अपनी गाड़ी लेकर, साथ में उसके दो और दोस्त भी थे। नीतू मैमुना और प्रमोद मुश्‍ताक के घर चल दिये।
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दिवाली के दिन नजदीक आ गए हैं। हारून आज भी नहीं आया। रंग पता नहीं कब होगा। पत्नी कहने लगी, 'पंद्रह साल हो गए, इस घर का तो मुहूर्त ही पता नहीं कब निकलेगा।' मैंने कहा, 'आज तो ईद है, हारून आज तो आएगा नहीं। ईद के अगले दिन काम लगाने की कह रहा था।' पत्नी बोली, 'तो पूछ लो ना फोन करके, अगर कल शुरू करे तो मैं आज ही सामने वाले दोनों कमरे खाली कर लूं। कंप्यूटर और बेड बाहर के कमरे में जचाना पड़ेगा।' हां भई पूछता हूं, कहकर मैंने हारून को मोबाइल लगाया। घण्टी की जगह ‘हरे रामा हरे कृष्णा' सुनाई पड़ा तो मैंने फोन काट दिया। सोचा, यह रिंगटोन हारून की नहीं हो सकती, शायद गलत नंबर लग गया है। फिर नंबर मिलाया, वही रिंगटोन। मैंने अजय को आवाज दी, वो आया। मैंने कहा कि बेटा जरा हारून का नंबर तो डायरी में देखकर बता। फिर नंबर मिलाया, फिर वही रिंगटोन। उधर फोन रिसीव हुआ और मेरे बोलने से पहले ही उसकी आवाज आई, 'गुरूजी राम राम।' मैंने भी राम-राम कहकर उसे ईद की मुबारकबाद दी। बदले में उसने मुझे ईद मुबारक कहा। मैंने पूछा, 'फोन तो तेरा ही है ना और ये रिंगटोन?' उसने कहा, 'क्यों गुरूजी अच्छी नहीं लगी?' मैंने बात टालने के मकसद से कहा, 'नहीं अच्छी है। हारून तू कल से काम लगा रहा है, तो सामान बाहर निकालना शुरू कर दें?' उसने कहा, 'हां गुरूजी, बाहर निकाल लो, कल सुबह आठ बजे आ जाउंगा।' मैंने कहा, 'ठीक है' और फोन काट दिया।
मैं सामान बाहर निकालने लगा। मैं एक कमरे की अलमारी खाली कर रहा था, इसी कमरे में सामने की तरफ पूजा का स्थान है। मतलब यहीं पर शिवजी और गणेशजी की मूर्तियां हैं। मां दुर्गा, लक्ष्मी और हनुमानजी की तस्वीरें लगी हुईं हैं। मैं कभी पूजापाठ नहीं करता और मेरी पत्नी को इस बात से बहुत शिकायत रहती है। वो है पक्की धार्मिक। स्कूल का दरवाजा नहीं देखा, लेकिन बच्चों की देखरेख करते हुए घर में ही पढ गई, और कुछ नहीं अक्षर तो बांच ही लेती है। कल ही बारह महीनों के व्रत त्योहारों की किताब खरीदी है। वो भी यहीं जमा रखी है।
अलमारी खाली करते हुए मेरी नजर पूजास्थल पर पड़ी। हनुमान जी और दुर्गा जी की तस्वीर के बीच मुझे एक नई तस्वीर नजर आई। हाथ में उठाकर देखी, एक पुराने पोस्टकार्ड पर अखबार की एक रंगीन कतरन चिपकी हुई थी। जिसके शीर्ष पर चांद और सितारे का चित्र और हिंदी और उर्दू में ऊपर-नीचे मोटे अक्षरों में ‘ईद मुबारक' लिखा हुआ था। मेरे हर्ष का पारावार नहीं था।
मैंने वो तस्वीर उठाई और आंगन में आकर पूछा, 'ये तस्वीर किसने लगाई पूजाघर में?'
'मैंने लगाई।' पत्नी के बोल थे। वो मुस्कुराती और मेरा मुंह देखती हुई फिर बोली, 'लेकिन आपको क्या तकलीफ है?'
मुझे क्या तकलीफ हो सकती है और इस बात से किसी को भी क्यों कोई तकलीफ होगी?
कहानी अंश
घर में रुणक है।
आज बेटी नीतू नै आपरी सहेली मैमुना रै घरां जीमण जावणो है। बा त्यारी करै।
इणी बीच म्हानै एक बात चेतै आवै, जकी नीतू री मैडम म्हनै कैयी ही कै नीतू री संगत सुधारो।
म्हैं घणा सवाल-जवाब नीं कर्या हा उण मैडम सूं, पण म्हारी चिंता बधगी ही। आथण घणै हेत सूं नीतू नै वा ओळमं-वाळी बात बताई। सुणर वा तो रोवण लागगी।...
'पापा, मैडम मैमुना खातर कैवै।'
म्हनै अचूंभो हुयो, ...'क्यूं?'
'मैडम नै मुसळमानां रा टाबर आछा कोनी लागै।'
.............................
लेखक परिचय
सत्यनारायण सोनी
जन्म 10 मार्च, 1969
प्रकाशित कृतियां
घमसाण (राजस्थानी कहानी संग्रह), पेडों का पालनहार लादू दादा, पैसों का पेड़, रंग बिरंगे फूल खिले
पुरस्कार-
१. मारवाड़ी सम्मेलन, मुम्बई का स्व. घनश्याम दास सराफ सर्वोत्तम राजस्थान साहित्य पुरस्कार- 1997
२. ज्ञान भारती, कोटा का स्व. गोरीशंकर कमलेश राजस्थानी साहित्य पुरस्कार- 1997
३. राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर का पैली पोथी पुरस्कार- 1997
दैनिक नवज्योति के रविवारीय परिशिष्‍ट में 26 जुलाई, 2009 को एक कहानी स्तंभ में प्रकाशित।

Tuesday, 21 July 2009

सजा-यात्रा - पुष्पा देवड़ा की कहानी






राजस्थान में साहित्यकार दंपतियों में रांगेय राघव और सुलोचना रांगेय राघव के बाद शरद देवड़ा और पुष्पा देवड़ा का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। आज हम पुष्पा देवड़ा की एक कहानी और उनके बारे में चर्चा करेंगे। स्व. शरद देवड़ा जैसे महान साहित्यकार की जीवनसंगिनी पुष्पा जी का जन्म पश्चिमी बंगाल के रानीगंज कस्बे में 13 जनवरी, 1945 को हुआ। कोलकाता में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और देवड़ा जी के साथ परिणय सूत्र में बंध जाने से बचपन का साहित्य प्रेम परवान चढ़ने लगा। बांग्ला और हिंदी दोनों भाषाओं पर उनका असाधारण अधिकार है। बहुत कम लोगों को जानकारी है कि विमल मित्र को हिंदी में लाने का श्रेय ही पुष्पा जी को है। आपने विमल मित्र, ताराशंकर वंद्योपाद्याय और अनेक महत्वपूर्ण बांग्ला लेखकों की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया। लगभग बीस उपन्यास और सैंकड़ों कहानियों को बांग्ला से आप हिंदी में लेकर आईं। अनुवाद और परिवार की व्यस्तता के चलते मौलिक लेखन काफी देर से प्रारंभ हुआ, इसलिए हिंदी में उनकी कहानियों का पहला संग्रह सोनाली गाथा तथा अन्य कहानियां 2005 में प्रकाशित हुआ। इन दिनों वे दांपत्य संबंधों पर एक उपन्यास और शरद देवड़ा के जीवन पर एक किताब लिख रही हैं। उनके कथा संसार में आपको दांपत्य जीवन के विविध दृश्‍य देखने को मिलते हैं। नारी मन को पुष्पा जी बहुत गहराई से भेदते हुए अत्यंत मर्मस्पर्शी प्रसंग निकालकर लाती हैं और पाठकों के मन में दर्द का एक गहरा अहसास पैबस्त कर देती हैं। किस प्रकार पुरुष स्त्री को छलता है और किस प्रकार वे छली जाती हैं, क्यों दांपत्य में जरा-सी बात से भयानक तनाव पैदा हो जाता है, इसे पुष्पाजी से बेहतर और कौन बयान कर सकता है। इसी को प्रमाणित करती हुई कहानी ‘सजा-यात्रा का सार-संक्षेप प्रस्तुत है।
मैं अपने पात्रों के साथ दिमागी उधेड़बुन में लगी थी कि सड़क से बढे़ आते हुए उस अजीबोगरीब शख्स की शक्ल उभरने लगी। टोपी, कमीज, धोती और अकड़ी हुई गर्दन में सोने की चेन, हाथों में बैग और पांवों में रबड़ के जूते। कल ही इनके बारे में जब पता चला तो इनकी अजीब शख्सियत का अहसास हुआ। इनसे ध्यान हटा तो उपर से आने वाले हंसी-ठट्ठे में अटक गया, रोज की तरह, कल भी तो ऐसा ही हुआ था।
हमारे उपर वाले फलैट की मिसेज मित्तल ही खुद परिचय करने आईं। मेरा तो खुद आगे बढकर बात करने में संकोच होता है। उन्होंने सिलसिला हमारी बेटी से शुरु किया जो दूसरी कक्षा में पढती है। यहां आने के दूसरे दिन ठेले वाले से सब्जी खरीदने मैं भी पहुंची बेटी के साथ। वो अनुराग से बेटी के बहाने बतियाने लगीं। वापसी में मेरे कहने पर वे हमारे यहां आईं। पता चला वे जौहरी परिवार से हैं। मेरे बारे में खुद ही कहने लगीं कि आपके बारे में सुना कि आप तो पति-पत्नी लेखक हैं, तभी सोच लिया कि आपसे दोस्ती करूंगी। वो हर प्रकार के सहयोग का वादा कर चली गईं तो बड़ी देर तो मैं उनके हंसमुख स्वभाव के बारे में सोचने लगी। मेरा लेखक मन और जानने के लिए व्याकुल हो उठा।
दूसरे दिन शाम जब मैं लिखने में और बेटी होमवर्क में लगी थी तो उपर से उन्होंने आवाज लगा हमें बुला लिया। जाने पर पता चला कि उनके खुशमिजाज बेटे-बेटी भी घर पर हैं। दोनों कालेज में पढ रहें हैं। घर के भीतर का जायजा लेने पर लगा ही नहीं कि ये जौहरी परिवार से हैं। सब कुछ अत्यंत साधारण। शोख बेटी, चंचल बेटा और हंसमुख मां से बातों के बीच चाय-नाश्‍ते में पता ही नहीं चला कैसे वक्त गुजर गया। एक गरजदार आवाज में जब दरवाजे पर खोलो शब्द गूंजा तो घर से अचानक हंसी गायब हुई और गंभीरता छा गई। बेटे ने कहा, बाउजी आ गए। प्रतिक्रिया में मैं भी अपने घर चल पड़ी। तभी इन महाशय पर एक नजर गई जो अभी सड़क से आ रहे हैं। घर तक आते हुए कई प्रश्‍न मेरे दिलोदिमाग में उमड़ते रहे। दो दिन गुजर गए। लेकिन आज उसी वक्त देखा कि बेटी ने जैसे ही घण्टी की आवाज सुन दरवाजा खोला मिसेज मित्तल और उनके बेटा-बेटी खड़े थे। बेटे पुनीत ने कहा कि हम पान खाने आए हैं। और इस तरह हमारी निकटता बढती गई।
एक दिन शाम छह बजे उन्होंने फिर बला लिया। आज वो बेहद उदास लग रही थीं। मैं बालकनी में उनके पास बैठी थी। मैंने पूछा बच्चे कहां गए, पता चला दोस्तों के यहां पढने गए हैं। इसके बाद तो उनका दुखों का बांध टूट पड़ा। कहने लगीं कि बहन मैंने तो अपनी नियति से समझौता कर लिया है, लेकिन बच्चे बड़े हो गए हैं। इनकी उपेक्षा और डांटडपट बर्दाश्‍त नहीं होती। बेटा तो इनकी सुनता नहीं, पर बेटी क्या करे। सुबह बेटा कालेज जा रहा था कि इन्होंने अपने साथ आफिस चलने के लिए कहा। बेटे ने कहा दो पीरियड बाद आ जाउंगा तो बिफर गए, कहने लगे, कौनसी नौकरी करनी है। लड़का भी बिफर गया और बोला, अब तो सीधे घर आउंगा और कहीं नहीं। इस पर वे और बिगड़ गए और लड़के को घर से निकल जाने के लिए कह दिया। मैं दोनों के बीच आ गई और कह दिया कि अगर ये घर से जाएगा तो मैं भी इसके साथ जाउंगी। इस पर कहने लगे, तुम मेरे पीछे आई हो या इसके, और गुस्से में ये बिना कुछ खाए घर से निकल गए। उदासी उनके चेहरे पर मुर्दनी की तरह छा गई थी। कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने अपने दर्द की परतें एक-एक कर खोल दीं।
मिसेज मित्तल ने कहा कि मैं अपने मां-बाप की इकलौती संतान हूं। विवाह के बाद अकेले पड़ गए हैं दोनों। वे चाहते हैं कि बेटा उनके साथ रहे और पढाई के साथ उनके हीरे-जवाहरात के कारोबार को भी संभाल ले। अगर मैं इसे वहां भेज दूं तो मेरा मन कैसे लगे, कभी सोचती हूं कि भेज ही दूं, जिंदगी तो संवर जाएगी। मैंने पूछा कि भाई साहब ऐसा क्यों करते हैं। कहने लगीं कि वे खुद को मालिक समझते हैं और यह भी कि हम सब उन पर आश्रित हैं। मुझे तो शुरु के कुछ सालों के अलावा इनका यही व्यवहार लगा है। और किसी पर तो इनकी हुकूमत चलती नहीं इसलिए सारा गुस्सा घर वालों पर निकालते हैं। आप ही बताइये कहां तक सहन करें, मैं पूरब चलूं तो ये पश्चिम चलेंगे। घर में डबल बैड की बात करो तो कहेंगे, जमीन पर सोना अच्छा लगता है। फ्रिज आने से बासी सब्जियां खाने को मिलेंगी, ट्यूबलाइट की रोशनी नहीं सुहाती। घर की सामान्य सुविधा की चीजें भी इन्हें इसलिए बुरी लगती हैं कि कहीं इन्कम टैक्स वालों को पता नहीं चल जाए। मुझसे रहा नहीं गया, डरते-डरते पूछ ही लिया, ऐसे में आपके निजी संबंध मेरा मतलब दैहिक संबंध। कहने लगीं कि इनके साथ तो मुझे अपनी हालत बाजारू औरत से भी गई गुजरी लगती है। उसकी कम से कम पैसे के लिए ही सही अपनी मरजी तो शामिल रहती है। समृद्ध परिवार की मिसेज मित्तल की जिंदगी के अंदरूनी कलह, दुख, क्रोध और घृणा के साथ उनकी बेबसी से मेरा मन अवसाद से भर गया। कैसे उनका दुख बटाउं, सामने सड़क पर मेरे पति आते दिखे तो मैं उनसे इजाजत ले घर आ गई।
मैं मिसेज मित्तल के बारे में गहराई से सोचने लगी। क्या सिर्फ कुसूर मित्तल साहब का ही है, क्या इसमें मिसेज मित्तल का कोई दोष नहीं, क्या वो किसी भी प्रकार से इन सब चीजों से निजात नहीं पा सकती थीं, उनकी त्रासदी मेरे मन को मथती रही और कोई समाधान नजर नहीं आया। इस बीच मेरे पति का दिल्ली तबादला हो गया और हम दिल्ली चले गए। फिर पांच साल तक जयुपर आना ही नहीं हुआ।
पांच साल बाद जब हम गाड़ी से जयपुर आ रह थे तो मुझे मिसेज मित्तल की याद सताने लगी। पता नहीं वो अब किस हाल में होंगी, उस बिल्डिंग के पास से गुजरते हुए मैंने देखा कि बालकनी में कोई चेहरा नहीं नजर आया। दूसरे दिन पतिदेव को किसी काम से जाना था, तो मैंने कहा कि मुझे मिसेज मित्तल से मिलना है आप मुझे वहां छोड़ दीजिएगा और वापसी में ले लेना।
दोपहर के तीन बजे मैं मिसेज मित्तल के बारे में सोचती हुई उनके दरवाजे पर पहुंची और कालबेल बजाई। दरवाजा खुलने पर उदास और निढाल मिसेज मित्तल दिखाई दीं। मेरे नमस्कार पर जबरन मुस्कुराने की कोशिश करती हुईं बोलीं, अरे इतने साल बाद अचानक कहां से प्रकट हो गईं, फिर हमारी बातों का सिलसिला चल पड़ा। उनमें कोई बदलाव नहीं आया था। घर की हालत अब भी वैसी ही थी। मैंने पूछा कि आपकी यह हालत कैसे हुई, घर में कोई नहीं है क्या, कहने लगीं कि बेटा तंग आकर आखिरकार मुंबई चला गया, बेटी की शादी हो गई। मित्तल साहब दो साल से सर्वाइकल स्पोंडेलाइटिस से पीड़ित होकर घर में ही रहते हैं। बिजनेस खत्म हो गया, अब हुंडियों का कारोबार करते हैं। पूरे दिन बही खातों में घुसे रहते हैं। ना कोई दवा लेते हैं और ना ही एक्सरसाइज करते हैं। पहले से ज्यादा तुनकमिजाज हो गए हैं। अब इनके कारण घर छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकती। ये घर मेरी कैद बन गया है।
मैंने पूछा कि दिन कैसे कटता होगा। बोलीं, खाना बनाकर इन्हें खिलाने के बाद इस खिड़की पर आकर बैठ जाती हूं। राह चलते लोगों को देखना, किताब, पत्रिकाएं पढना या पुराने एलबमों में तस्वीरें देखना, बस यही रह गया है। वो चाय के लिए उठने लगी तो मैंने ही मना कर दिया। इतनी देर में भी मित्तल साहब की मौजूदगी का अहसास नहीं हुआ तो पूछा कि क्या वो सो रहे हैं। दिन में क्या हमे तो रात में भी सोने के लिए गोलियां लेनी पड़ती हैं। मैंने पूछा कि क्या आपस में एक दूसरे की तकलीफ को लेकर बात भी नहीं करते, कहने लगीं, जिस आदमी को मेरी मानसिक तकलीफ का कभी खयाल नहीं आता वो शारीरिक तकलीफ के बारे में क्या पूछेगा, उसी वक्त मुझे नीचे गाड़ी का हार्न सुनाई दिया, ये मुझे लेने आ गए थे।
जाते वक्त मेरी नजर मिसेज मित्तल की खिड़की पर ही टिकी रहीं। जाली के पीछे वह छाया सी दिख रही थीं। मेरा मन गहरी उदासी से भर गया। इस नारी की सजा यात्रा कहां खत्म होगी, पत्नीत्व, मातृत्व कोई सुख नहीं। एक ही छत के नीचे तलाकशुदा जैसा जीवन। आखिर इसका कसूर क्या है।
कहानी अंश
वे क्षुब्ध स्वर में बोलीं, जिस तरह की जिंदगी मैं जी रही हूं, उसमें किसी भी तरह के संबंध में मेरी भागीदारी की तो गुंजाइश ही कहां है, उस वक्त मुझे अपनी स्थिति बाजारू औरत से भी गई गुजरी लगती है। उसमें उसकी मरजी तो शामिल रहती है, चाहे पैसे के लिए ही हो। मगर मैं, मुझे तो हर वक्त इनके साथ दो ध्रुवों की सी मानसिकता में जीना पड़ता है, लेकिन रात में सोते समय जब मरजी हो पति नाम का यह जीव मुझे अपनी लपेट में ले लेता है।
...
पुरुष द्वारा क्रिएट दर्दनाक परिस्थितियों को झेलती इस नारी की सजा यात्रा आखिर कहां जाकर खत्म होगी। उनकी दयनीय हालत और दर्दनाक परिस्थितियां मेरे संवेदनशील मन को यह सोवने पर विवश कर रही थीं कि क्या नारी जीवन इतनी बड़ी यातना भी हो सकता है, न पत्नीत्व का सुख है, ना मातृत्व की तुष्टि। उम्र के इस पड़ाव पर घर की रानी होने का गौरव महसूस करने की बजाय पति के साथ एक ही छत के नीचे तलाकशुदा-सा जीवन बिताने पर मजबूर इस स्त्री का आखिर कसूर क्या है।

Sunday, 19 July 2009

सजा-यात्रा - पुष्पा देवड़ा की कहानी

राजस्थान में साहित्यकार दंपतियों में रांगेय राघव और सुलोचना रांगेय राघव के बाद शरद देवड़ा और पुष्पा देवड़ा का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। आज हम पुष्पा देवड़ा की एक कहानी और उनके बारे में चर्चा करेंगे। स्व. शरद देवड़ा जैसे महान साहित्यकार की जीवनसंगिनी पुष्पा जी का जन्म पश्चिमी बंगाल के रानीगंज कस्बे में 13 जनवरी, 1945 को हुआ। कोलकाता में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और देवड़ा जी के साथ परिणय सूत्र में बंध जाने से बचपन का साहित्य प्रेम परवान चढ़ने लगा। बांग्ला और हिंदी दोनों भाषाओं पर उनका असाधारण अधिकार है। बहुत कम लोगों को जानकारी है कि विमल मित्र को हिंदी में लाने का श्रेय ही पुष्पा जी को है। आपने विमल मित्र, ताराशंकर वंद्योपाद्याय और अनेक महत्वपूर्ण बांग्ला लेखकों की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया। लगभग बीस उपन्यास और सैंकड़ों कहानियों को बांग्ला से आप हिंदी में लेकर आईं। अनुवाद और परिवार की व्यस्तता के चलते मौलिक लेखन काफी देर से प्रारंभ हुआ, इसलिए हिंदी में उनकी कहानियों का पहला संग्रह सोनाली गाथा तथा अन्य कहानियां 2005 में प्रकाशित हुआ। इन दिनों वे दांपत्य संबंधों पर एक उपन्यास और शरद देवड़ा के जीवन पर एक किताब लिख रही हैं। उनके कथा संसार में आपको दांपत्य जीवन के विविध दृश्‍य देखने को मिलते हैं। नारी मन को पुष्पा जी बहुत गहराई से भेदते हुए अत्यंत मर्मस्पर्शी प्रसंग निकालकर लाती हैं और पाठकों के मन में दर्द का एक गहरा अहसास पैबस्त कर देती हैं। किस प्रकार पुरुष स्त्री को छलता है और किस प्रकार वे छली जाती हैं, क्यों दांपत्य में जरा-सी बात से भयानक तनाव पैदा हो जाता है, इसे पुष्पाजी से बेहतर और कौन बयान कर सकता है। इसी को प्रमाणित करती हुई कहानी ‘सजा-यात्रा का सार-संक्षेप प्रस्तुत है।
मैं अपने पात्रों के साथ दिमागी उधेड़बुन में लगी थी कि सड़क से बढे़ आते हुए उस अजीबोगरीब शख्स की शक्ल उभरने लगी। टोपी, कमीज, धोती और अकड़ी हुई गर्दन में सोने की चेन, हाथों में बैग और पांवों में रबड़ के जूते। कल ही इनके बारे में जब पता चला तो इनकी अजीब शख्सियत का अहसास हुआ। इनसे ध्यान हटा तो उपर से आने वाले हंसी-ठट्ठे में अटक गया, रोज की तरह, कल भी तो ऐसा ही हुआ था।
हमारे उपर वाले फलैट की मिसेज मित्तल ही खुद परिचय करने आईं। मेरा तो खुद आगे बढकर बात करने में संकोच होता है। उन्होंने सिलसिला हमारी बेटी से शुरु किया जो दूसरी कक्षा में पढती है। यहां आने के दूसरे दिन ठेले वाले से सब्जी खरीदने मैं भी पहुंची बेटी के साथ। वो अनुराग से बेटी के बहाने बतियाने लगीं। वापसी में मेरे कहने पर वे हमारे यहां आईं। पता चला वे जौहरी परिवार से हैं। मेरे बारे में खुद ही कहने लगीं कि आपके बारे में सुना कि आप तो पति-पत्नी लेखक हैं, तभी सोच लिया कि आपसे दोस्ती करूंगी। वो हर प्रकार के सहयोग का वादा कर चली गईं तो बड़ी देर तो मैं उनके हंसमुख स्वभाव के बारे में सोचने लगी। मेरा लेखक मन और जानने के लिए व्याकुल हो उठा।
दूसरे दिन शाम जब मैं लिखने में और बेटी होमवर्क में लगी थी तो उपर से उन्होंने आवाज लगा हमें बुला लिया। जाने पर पता चला कि उनके खुशमिजाज बेटे-बेटी भी घर पर हैं। दोनों कालेज में पढ रहें हैं। घर के भीतर का जायजा लेने पर लगा ही नहीं कि ये जौहरी परिवार से हैं। सब कुछ अत्यंत साधारण। शोख बेटी, चंचल बेटा और हंसमुख मां से बातों के बीच चाय-नाश्‍ते में पता ही नहीं चला कैसे वक्त गुजर गया। एक गरजदार आवाज में जब दरवाजे पर खोलो शब्द गूंजा तो घर से अचानक हंसी गायब हुई और गंभीरता छा गई। बेटे ने कहा, बाउजी आ गए। प्रतिक्रिया में मैं भी अपने घर चल पड़ी। तभी इन महाशय पर एक नजर गई जो अभी सड़क से आ रहे हैं। घर तक आते हुए कई प्रश्‍न मेरे दिलोदिमाग में उमड़ते रहे। दो दिन गुजर गए। लेकिन आज उसी वक्त देखा कि बेटी ने जैसे ही घण्टी की आवाज सुन दरवाजा खोला मिसेज मित्तल और उनके बेटा-बेटी खड़े थे। बेटे पुनीत ने कहा कि हम पान खाने आए हैं। और इस तरह हमारी निकटता बढती गई।
एक दिन शाम छह बजे उन्होंने फिर बला लिया। आज वो बेहद उदास लग रही थीं। मैं बालकनी में उनके पास बैठी थी। मैंने पूछा बच्चे कहां गए, पता चला दोस्तों के यहां पढने गए हैं। इसके बाद तो उनका दुखों का बांध टूट पड़ा। कहने लगीं कि बहन मैंने तो अपनी नियति से समझौता कर लिया है, लेकिन बच्चे बड़े हो गए हैं। इनकी उपेक्षा और डांटडपट बर्दाश्‍त नहीं होती। बेटा तो इनकी सुनता नहीं, पर बेटी क्या करे। सुबह बेटा कालेज जा रहा था कि इन्होंने अपने साथ आफिस चलने के लिए कहा। बेटे ने कहा दो पीरियड बाद आ जाउंगा तो बिफर गए, कहने लगे, कौनसी नौकरी करनी है। लड़का भी बिफर गया और बोला, अब तो सीधे घर आउंगा और कहीं नहीं। इस पर वे और बिगड़ गए और लड़के को घर से निकल जाने के लिए कह दिया। मैं दोनों के बीच आ गई और कह दिया कि अगर ये घर से जाएगा तो मैं भी इसके साथ जाउंगी। इस पर कहने लगे, तुम मेरे पीछे आई हो या इसके, और गुस्से में ये बिना कुछ खाए घर से निकल गए। उदासी उनके चेहरे पर मुर्दनी की तरह छा गई थी। कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने अपने दर्द की परतें एक-एक कर खोल दीं।
मिसेज मित्तल ने कहा कि मैं अपने मां-बाप की इकलौती संतान हूं। विवाह के बाद अकेले पड़ गए हैं दोनों। वे चाहते हैं कि बेटा उनके साथ रहे और पढाई के साथ उनके हीरे-जवाहरात के कारोबार को भी संभाल ले। अगर मैं इसे वहां भेज दूं तो मेरा मन कैसे लगे, कभी सोचती हूं कि भेज ही दूं, जिंदगी तो संवर जाएगी। मैंने पूछा कि भाई साहब ऐसा क्यों करते हैं। कहने लगीं कि वे खुद को मालिक समझते हैं और यह भी कि हम सब उन पर आश्रित हैं। मुझे तो शुरु के कुछ सालों के अलावा इनका यही व्यवहार लगा है। और किसी पर तो इनकी हुकूमत चलती नहीं इसलिए सारा गुस्सा घर वालों पर निकालते हैं। आप ही बताइये कहां तक सहन करें, मैं पूरब चलूं तो ये पश्चिम चलेंगे। घर में डबल बैड की बात करो तो कहेंगे, जमीन पर सोना अच्छा लगता है। फ्रिज आने से बासी सब्जियां खाने को मिलेंगी, ट्यूबलाइट की रोशनी नहीं सुहाती। घर की सामान्य सुविधा की चीजें भी इन्हें इसलिए बुरी लगती हैं कि कहीं इन्कम टैक्स वालों को पता नहीं चल जाए। मुझसे रहा नहीं गया, डरते-डरते पूछ ही लिया, ऐसे में आपके निजी संबंध मेरा मतलब दैहिक संबंध। कहने लगीं कि इनके साथ तो मुझे अपनी हालत बाजारू औरत से भी गई गुजरी लगती है। उसकी कम से कम पैसे के लिए ही सही अपनी मरजी तो शामिल रहती है। समृद्ध परिवार की मिसेज मित्तल की जिंदगी के अंदरूनी कलह, दुख, क्रोध और घृणा के साथ उनकी बेबसी से मेरा मन अवसाद से भर गया। कैसे उनका दुख बटाउं, सामने सड़क पर मेरे पति आते दिखे तो मैं उनसे इजाजत ले घर आ गई।
मैं मिसेज मित्तल के बारे में गहराई से सोचने लगी। क्या सिर्फ कुसूर मित्तल साहब का ही है, क्या इसमें मिसेज मित्तल का कोई दोष नहीं, क्या वो किसी भी प्रकार से इन सब चीजों से निजात नहीं पा सकती थीं, उनकी त्रासदी मेरे मन को मथती रही और कोई समाधान नजर नहीं आया। इस बीच मेरे पति का दिल्ली तबादला हो गया और हम दिल्ली चले गए। फिर पांच साल तक जयुपर आना ही नहीं हुआ।
पांच साल बाद जब हम गाड़ी से जयपुर आ रह थे तो मुझे मिसेज मित्तल की याद सताने लगी। पता नहीं वो अब किस हाल में होंगी, उस बिल्डिंग के पास से गुजरते हुए मैंने देखा कि बालकनी में कोई चेहरा नहीं नजर आया। दूसरे दिन पतिदेव को किसी काम से जाना था, तो मैंने कहा कि मुझे मिसेज मित्तल से मिलना है आप मुझे वहां छोड़ दीजिएगा और वापसी में ले लेना।
दोपहर के तीन बजे मैं मिसेज मित्तल के बारे में सोचती हुई उनके दरवाजे पर पहुंची और कालबेल बजाई। दरवाजा खुलने पर उदास और निढाल मिसेज मित्तल दिखाई दीं। मेरे नमस्कार पर जबरन मुस्कुराने की कोशिश करती हुईं बोलीं, अरे इतने साल बाद अचानक कहां से प्रकट हो गईं, फिर हमारी बातों का सिलसिला चल पड़ा। उनमें कोई बदलाव नहीं आया था। घर की हालत अब भी वैसी ही थी। मैंने पूछा कि आपकी यह हालत कैसे हुई, घर में कोई नहीं है क्या, कहने लगीं कि बेटा तंग आकर आखिरकार मुंबई चला गया, बेटी की शादी हो गई। मित्तल साहब दो साल से सर्वाइकल स्पोंडेलाइटिस से पीड़ित होकर घर में ही रहते हैं। बिजनेस खत्म हो गया, अब हुंडियों का कारोबार करते हैं। पूरे दिन बही खातों में घुसे रहते हैं। ना कोई दवा लेते हैं और ना ही एक्सरसाइज करते हैं। पहले से ज्यादा तुनकमिजाज हो गए हैं। अब इनके कारण घर छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकती। ये घर मेरी कैद बन गया है।
मैंने पूछा कि दिन कैसे कटता होगा। बोलीं, खाना बनाकर इन्हें खिलाने के बाद इस खिड़की पर आकर बैठ जाती हूं। राह चलते लोगों को देखना, किताब, पत्रिकाएं पढना या पुराने एलबमों में तस्वीरें देखना, बस यही रह गया है। वो चाय के लिए उठने लगी तो मैंने ही मना कर दिया। इतनी देर में भी मित्तल साहब की मौजूदगी का अहसास नहीं हुआ तो पूछा कि क्या वो सो रहे हैं। दिन में क्या हमे तो रात में भी सोने के लिए गोलियां लेनी पड़ती हैं। मैंने पूछा कि क्या आपस में एक दूसरे की तकलीफ को लेकर बात भी नहीं करते, कहने लगीं, जिस आदमी को मेरी मानसिक तकलीफ का कभी खयाल नहीं आता वो शारीरिक तकलीफ के बारे में क्या पूछेगा, उसी वक्त मुझे नीचे गाड़ी का हार्न सुनाई दिया, ये मुझे लेने आ गए थे।
जाते वक्त मेरी नजर मिसेज मित्तल की खिड़की पर ही टिकी रहीं। जाली के पीछे वह छाया सी दिख रही थीं। मेरा मन गहरी उदासी से भर गया। इस नारी की सजा यात्रा कहां खत्म होगी, पत्नीत्व, मातृत्व कोई सुख नहीं। एक ही छत के नीचे तलाकशुदा जैसा जीवन। आखिर इसका कसूर क्या है।
कहानी अंश
वे क्षुब्ध स्वर में बोलीं, जिस तरह की जिंदगी मैं जी रही हूं, उसमें किसी भी तरह के संबंध में मेरी भागीदारी की तो गुंजाइश ही कहां है, उस वक्त मुझे अपनी स्थिति बाजारू औरत से भी गई गुजरी लगती है। उसमें उसकी मरजी तो शामिल रहती है, चाहे पैसे के लिए ही हो। मगर मैं, मुझे तो हर वक्त इनके साथ दो ध्रुवों की सी मानसिकता में जीना पड़ता है, लेकिन रात में सोते समय जब मरजी हो पति नाम का यह जीव मुझे अपनी लपेट में ले लेता है।
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पुरुष द्वारा क्रिएट दर्दनाक परिस्थितियों को झेलती इस नारी की सजा यात्रा आखिर कहां जाकर खत्म होगी। उनकी दयनीय हालत और दर्दनाक परिस्थितियां मेरे संवेदनशील मन को यह सोवने पर विवश कर रही थीं कि क्या नारी जीवन इतनी बड़ी यातना भी हो सकता है, न पत्नीत्व का सुख है, ना मातृत्व की तुष्टि। उम्र के इस पड़ाव पर घर की रानी होने का गौरव महसूस करने की बजाय पति के साथ एक ही छत के नीचे तलाकशुदा-सा जीवन बिताने पर मजबूर इस स्त्री का आखिर कसूर क्या है।

रब्बो - रामकुमार ओझा की कहानी


राजस्थान के साहित्यिक इतिहास में रामकुमार ओझा एक ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने सृजन की शास्त्रीय शर्तों और परंपराओं को तोड़ते हुए अपनी अलग राह बनाई और कथा साहित्य में ऐसे किरदारों की रचना की जो आम होते हुए भी खास हो जाते हैं। रचना का वातावरण और लेखक की दृष्टि मिलकर ऐसे देशज पात्रों की रचना करते हैं, जो जीवन समर में संघर्ष करते हुए कभी हार नहीं मानते। प्रकृति और मानव को एक दूसरे से अंतर्ग्रथित कर देने वाले महान रचनाकार रामकुमार ओझा का जन्म 8 जुलाई, 1926 को हुआ। ग्यारह बरस की उम्र से शुरु हुआ ओझा जी के लेखन और प्रकाशन का सिलसिला 8 अक्टूबर, 2001 को उनके महाप्रयाण के साथ थमा। वे राजस्थान के उन गिने-चुने लेखकों में हैं, जिनकी रचनाएं ‘कल्पना और ‘विशाल भारत जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।
ओझा हिंदी और राजस्थानी में समान रूप से लिखते थे और उनका ग्रामीण परिवेष और जनजीवन से बहुत गहरा रिश्‍ता था। दोनों भाषाओं में रामकुमार ओझा के कविता संग्रह, कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हुए। अभी भी उनकी कई रचनाएं अप्रकाशित हैं। ओझा जी के विपुल कथा संसार में ‘रब्बो एक ऐसी कहानी है जो समाज की दोमुंही मानसिकता पर जबर्दस्त प्रहार करती है। अच्छे-भले लोग कैसे दूसरों को नापाक निगाहों से देखते हैं और खुद के दामन पर लगे दागों को नहीं देखते। ऐसे लोग हमारे आस-पास फैले पड़े हैं। प्रस्तुत है ऐसे ही लोगों को बेनकाब करती कहानी रब्बो का सार संक्षेप।
बकौल बुजुर्गान उस मोहल्ले में औबास यानी आवारा लौंडों की तादाद न के बराबर थी। शातिर लौंडियां तो थी ही नहीं। हालांकि कमसिन और बला की खूबसूरत लड़कियां स्कूल, कालेज, मंदिर, मजार पर जातीं और कुछ ज्यादा ही बनी-ठनी निकलतीं तो हंगामा मच जाता। आवारा लौंडे ताकते-झांकते, फिल्मी नगमों के टुकड़े उछालते और मजनूई अंदाज में मायूस हो जाते। लड़कियां चुपचाप यूं चली जातीं कि बुजुर्ग समझते लड़कियां शर्मसार हैं और चाहने वालों को लगे कि उनकी जानिब भी कोई जां-निसार है। हमउम्र लड़कियों में आपस में जलन होती अगर लौंडे किसी खास को ज्यादा तवज्जोह देते। एक दिन मोहल्ले के रास्तों से एक बिल्कुल जुदा किस्म की लड़की गुजरने लगी। सयानेपन में औरत बन चुकी इस लड़की के जिस्म में हाल ही में दिलकश उभार आया था और इसकी चाल बड़ी शातिर, लेकिन लिबास बेहद सादा था। उसके पांव जमीं को नहीं छूते, वो उड़ी-उड़ी जाती। लौंडों के दिलों पर छुरियां चली जातीं कि कोई चलचलाती आतिश है जो मोहल्ले की लड़कियों से जुदा है। उसे देख बुत बने रह जाते, ना मिसरे उछाल पाते ना आहें भर पाते। एक दाउद ही था जो मौके की तलाश में था।
मगर उस कुमकुमे को रोज-ब-रोज गुजरते देख, मोहल्ले के बुजुर्ग लोग होशियार हो गए, माएं बनीं खातूनें खबरदार हो गईं। यह शरीफों का मोहल्ला है, जहां दीनदार मुसलमान, नौकरीपेशा कायस्थ, अमृत छके सिख, कदीमी बाशिंदे हिंदू और होटलों का कारोबार करने वाले एंग्लो इंडियन रहते हैं। गरज कि यह सारे हिंदुस्तान के शरीफों का मोहल्ला है। यहां की मां, बेटियां, बहनें, बूवा-फूफियां सबकी साझी धरोहर है। बस बीवियां जुदा हैं। लड़कियां जाहिरा तौर पर आवारा नहीं हैं। लेकिन वे चाहतीं कि लौंडे उन्हें छेड़ें और वे नाराजगी जाहिर करें। उन्हें पता था कि उनके घर वाले जानते हैं कि वे कैसी लड़कियां हैं, लेकिन वे चुप रहते। वो इसलिए कि वालिदान जानते थे कि उनकी औलादें मजनूं के जात की थीं। मोहल्ले में दुश्‍मनियां छुपी हुई और मुरौवत जाहिर थी। सदर दरवाजे बंद रहते और खातूनों की तांक-झांक खिड़कियों की फांकों से चलती।
मगर प्रोफेसर इमतियाज का सदर दरवाजा हमेशा खुला रहता। मुहल्ला शाहीदान से रब्बो आती, सीधे दरवाजे में घुस जाती और फिर दरवाजा बंदा हो जाता। फिर शुरु होता तांक-झांक और सरगोशियों का सिलसिला। बुजुर्गों के मुताबिक रब्बो को हया नाम की चीज छू भी न गई थी। दिन ढले आती और आधी रात जाती। दिखावे की भी लोकलाज नहीं। नजर झुकाकर नहीं सीधी आंख में आंख डाले चलती जाती। कुंवारी जान इमतियाज और चढ़ती परवान रब्बो। तौबा! तौबा!
मोहल्ले की औरतों ने तो तौबा कर ली थी मगर मर्दों को पता नहीं था कि रब्बो कालेज में उनकी लड़कियों की हमक्लास है या कि बेहद खास है। वो नहीं जानते कि आए दिन कितनी लड़कियों को राह भटकने से बचाती है रब्बो। मगर बुजुर्गों को लगता कि वो बेहया है। मौलवी मीर मुश्‍ताक, सरदार सूबेदार सिंह और मुंशी गुलशन नंदा मोहल्ले की अमन-अस्मत कमेटी के सदर-वदर थे। सब एकराय थे कि इमतियाज को मोहल्ला छोड़ने का नोटिस दे दिया जाए और ना माने तो जबरन बेदखल कर दिया जाए।
एक दिन शाम इस कमेटी के बुजुर्ग पहुंचे इमतियाज के घर। रब्बो ने दरवाजा खोला तो एकबारगी तो सबकी नजरें अटक गईं। संभलकर भीतर गए तो इमतियाज का हुलिया देख सकते में आ गए। बदन पर सिर्फ तहमद लपेटे प्रोफेसर किताबों के बीच पड़ा था। बुजुर्गों ने उसके सलाम का जवाब देने के बजाय उस पर सवालों और नसीहतों की बौछार शुरु कर दी। इमतियाज चुप खड़ा रहा, लेकिन रब्बो ने एक सवाल को लपककर पकड़ लिया।
‘यह लड़की... यानी कि मैं... यहां हर रोज दिन ढले क्यों आती हूं, एक जवान लड़की क्यों आती होगी, बुजुर्ग इस हकीकत से बेखबर तो नहीं।
सब चुप। काफी देर बाद एक बुजुर्ग बोले, तो हम शक को अब सबूत मानें।
रब्बो जवाब देने के बजाय हंसने लगी। उसकी नजरें सबके लिए आइना बन गईं, जिसमें सबको अपने घर, आंगन, छज्जे-बालकनियां और वहां के नजारे दिखाई देने लगे। मौलवी मीर की लौंडिया बारजे में खड़ी किसी को इशारे कर ही थी कि उसके बगल वाले घर के छज्जे पर एक गुड़मुड़ कागज गिरा और इसके बदले में एक पुर्जा हवा में उड़ा।... सूबेदारसिंह का हमपेशा ठेकेदार उसे घर से निकलने के बाद दरवाजे पर सरदारनी से उसके बारे में पूछता है तो सरदारनी कहती है, ओए तू मर्द होके एना डरदा क्यूं हेगा... रेशमीलाल की औरत दाई से लड़की की लाज बचाने के लिए मिन्नतें कर रही है।... गुलशन की बेटी बड़ी दिलेर है। प्यार किया है कोई गुनाह नहीं।
उफ! बुजुर्गों ने एक दूसरे को टहोका लगाया, लड़की बेशर्म है, पता नहीं और क्या बोल जाए।
और वे बिना नोटिस दिए ही निकल लिए। इमतियाज ने रब्बो को टोका, तुमने सच्चाई क्यों नहीं बताई, खामख्वाह उलझ पड़ी।
रब्बो का दुनियादारी भरा जवाब था।
किताबी फलसफे से दुनिया का दस्तूर अलग होता है। कौन मानता है कि आप थीसिस में मेरी मदद करते हैं। नैतिकता की सच्चाई को अनैतिक लोग कभी नहीं मानते। उनके लिए संतोषजनक जवाब वही है, जिसे वे नंगई के साथ नकारते हैं। अब हम और वे हमराज हैं। वो अब मेरी आवाजाही को दरगुजर करेंगे क्योंकि वे जानते हैं कि हम भी गुनहगारों के हमजात हैं।
आधी रात जब वो वापस जा रही थी तो मौलवी बारजे पर टहल रहे थे। सूबेदारसिंह के अहाते में कुत्ते की जंजीर खुली हुई थी। मुंशी के घर तकरार चल रही थी और लाला की दुकान बंद थी। एंग्लो-इंडियन रेस्तरां में चहलपहल थी। खाली गली में अकेला दाउद बिजली के खंभे से चिपका खड़ा था। रब्बो को देख उसने कुछ मिसरे उछाले, रब्बो ने सहज भाव से लपका तो उसका हौसला बढ़ गया। चलती लड़कियों दुपट्टे लपकने का महारती दाउद उस पर झपट्टा मारता उससे पहले ही रब्बो ने अपना दुपट्टा उछाला और झटके के साथ उसकी गर्दन पर कस दिया। दाउद को रब्बो ने ललकारा तो बेचारे का पायजामा चिंदी-चिंदी हो गया और वो बड़ी मुश्किल से जान छुड़ाकर भागा। उसके शागिर्द पहले ही भाग चुके थे।
अगली शाम पूरा मोहल्ला मौन था। रब्बो को देख पनवाड़ी ने रेडियो की आवाज बंद कर दी। अंधेरे के बावजूद कुत्ते उस पर भौंके नहीं। कोई अंगुली नहीं उठी। खिड़कियों से किसी ने तांक-झांक नहीं की। आधी रात सबके माथों पर स्याह दाग थे। सब हम-गुनाह थे। किसी ने कोई हंगामा नहीं किया, क्योंकि रब्बो सबको सरेराह नंगा करने की जुर्रत संजोए थी।
कहानी अंश
वह चलती तो ऐसी लगती कि मुअत्तर और मुनव्वर लौ चली जाती है, मगर उसकी बू गुगुलू जैसी है। जाफरानी नहीं। उसके जिस्म की गोलाई में कशिश तो है, मगर उसकी उठान दहकते कुमकुमे जैसी है कि लौंडे उसे देख दम-ब-खुद व साकित हो इस्तादा खड़े रहें और यह मुतहरिक जलजला-सी गुजरती गयी। कोई उस पर फिल्मी-क्लास गानों के तोड़े ना उछाल पाया कि वे अल-शुरु में ही उससे कट गये। उससे किनारा कर गये। बस एक दाउद था कि मौके की तलाश में बना रहा।
ःःःःःःःःःःःःःः
किताबी फलसफे से दुनिया का दस्तूर जुदा होता है, इसलिए मैं उलझी प्रोफेसर साहब। कौन मानता है कि आप दयानतदारी के नाते थीसिस में मेरी इमदाद करते हैं। अख्लाक की हकीकत को बद-अख्लाक लोग कभी तस्लीम नहीं करते। उनके निकट तसल्लीबख्श उत्तर वही है जो वे खुद पूरी नंगई के साथ नकारते हैं। स्याहफाम लोग दूसरों को स्याही में डूबा देख कर नाराज नहीं खुश होते हैं। अब हम और वे हम-राज हैं। और वे तुमसे नाराज नहीं, खुश हैं। नंगों के हमाम में तुम भी उनमें से एक हो। वे जरा पर्दानशीनी के तलबगार जरूर हैं। मेरी आवाजाही को अब वे दरगुजर करेंगे, क्योंकि मेरे जवाब ने उनको तस्कीन दी है कि हम भी गुनहगारों के हमजात हैं।
रामकुमार ओझा
प्रकाशित कृतियां
कविता संग्रह: निशीथ
उपन्यास- रावराजा, अश्‍वत्थामा
कहानी संग्रह-करवट, सूरज अभी मरा नहीं, सिराजी तथा अन्य कहानियां, आदमी वहशी हो जएगा, तथा राजस्‍थानी में परकरती-पुरुष री कहाणियां।

Sunday, 5 July 2009

चश्मदीद मुज़रिम : हसन जमाल की कहानी


राजस्थान के जिन रचनाकारों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाता है उनमे हसन जमाल सबसे अलग दिखाई देते हैं। वे अपनी समर्थ लेखनी और साफगोई के चलते अक्सर विवादों में भी छाए रहते हैं। लेकिन एक कथाकार के नाते उनकी रचनाएं पाठकों को बहुत कुछ सोचने-समझने के लिए विवश करती हैं। 21अगस्त, 1942 को जोधपुर में जन्में हसन जमाल पिछले पांच 21 दशकों से अर्थात किशोरावस्था से ही साहित्य-सृजन की दुनिया में सक्रिय हैं। अब तक उनकी नौ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और प्रदेश की हिंदी एवं उर्दू अकादमियों से भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। पिछले डेढ़ दशक से वे उर्दू-हिंदी की गंगा-जमनी तहजीब की एकमात्र पत्रिका ‘शेष’ का संपादन कर रहे हैं, जिसे बहुत सम्मान के साथ लेखक-पाठकों का प्यार हासिल हुआ है। इस पत्रिका के अबतक 53 अंक निकल चुके हैं। हसन जमाल बहुत अच्छे अनुवादक भी हैं और उनके किये अनुवाद बेहद पसंद कियेगए हैं। उर्दू और हिंदी पर समान अधिकार होने के कारण हसन जमाल की कहानियों में भाषा के लिहाज से एकखास किस्म की रवानी मिलती है जो पाठक को ताजगी का अहसास कराती है। उनकी कहानियों में ‘ चश्मदीद मुजरिम’ एक अलग तरह की कहानी है, जो पहली बार ‘इण्डिया टुडे’ में छपने के बाद खासी चर्चित हुई और फिरइसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। किसी अपराध का गवाह होना कितना कष्टकारी होता है और ऐसे व्यक्ति कोकितनी मानसिक यंत्रणाओं से गुजरना पड़ता है, इसका जीवंत दस्तावेज है ‘ चश्मदीद मुजरिम’। प्रस्तुत है कहानीका सार-संक्षेप।

मैं कोई बहुत शरीफ आदमी नही हूं। इससे पहले भी मैंने लड़कियों को आदिम लिबास में देखा है, लेकिन हर इंसानकी तरह मैंने भी वैसा दिखने की कोशिश की है, जैसा कि कोई सच में होता नहीं है। ‘बनने’ और ‘होने’ की इसी कशमकश में जिंदगी गुजरती जाती है। इसी ‘होने’ की वजह से मेरा मौका-ए-वारदात पर मौजूद होना संभव हुआ।वे छह थे, मैं सातवां हो सकता था, लेकिन मुझे लगा यह गलत हो रहा है। आपके लिहाज से मैं डरपोक या कायर होसकता हूं। डरपोक नैतिकता की दुहाई ज्यादा देते हैं। लेकिन मैं बुजदिल नहीं था, क्योंकि ऐसे खेल में पहले भीशरीक हो चुका था। इसीलिए जब रणधीर ने एक चिड़िया फंसने की बात कह कर बुलाया तो बहन के सवालियाचेहरे पर निगाह डालने के बाद चुपचाप जीना उतर आया। पता नहीं क्यूं लगा जैसे बहन मेरे साथ हास्टल चली आईथी।

सुनसान हास्टल में वो छह यार थे। उस कमरे का दरवाजा भिड़ा था, जिसे हल्के से धकेलकर मैंने देखा, नग्नलड़की की परकटी चिड़िया की तरह चीखें निकल रही थीं। मनोज उसे दबोचे हुए था। मैंने एक नजर देख दरवाजाबंद कर दिया। आज पहली बार मेरे साथ ऐसा हुआ, मुझे लगा यह गलत हो रहा है। जैसे कोई चोर सोचे कि चोरी करना ठीक नहीं है। उस भयंकर उठापटक में एकबारगी मेरी निगाहें उस लड़की से मिलीं तो सिहर गया था मैं। जैसेमेरी छोटी बहन क्लिक हो गई, वह मेरे साथ ही थी जैसे। ऐसा कभी नहीं हुआ, नशे और जोश में तो कभी नहीं।

बगल वाले कमरे का अधखुला दरवाजा पार कर मैं भीतर गया तो सबकी बांछें खिल गईं। कांच के छोटे-छोटेगिलास थामे वे घबराए-से बैठे थे। रणधीर ने मेरे लिए जगह बनाते हुए कहा, ‘आ बैठ, मन्नू ने देर लगा दी, वेटकरना पड़ेगा। पंडत, एक पेग इसके लिए भी बना, ताकि जिगरा खुल जाए।’ खिड़की में रखी बोतल आधी खाली थी, पास में कंडोम का पैकेट पड़ा था। एड्स का भय। हम डरे, सहमे लोग बड़ों की नजरें बचा कर जिंदगी का मजा़ चुरानेको कामयाबी और एडवेंचर मानते थे। भविष्य में तो अंधेरा ही लिखा था।

मैंने पेग नहीं लिया। इससे पहले ये दोस्त मुझे बेगाने ना लगे। पहली बार मुझे लगा मैं गलत जगह आ गया हूं औरमैं बिना कुछ कहे बाहर निकल आया। रात मुझे अफसोस हुआ कि मैंने बहती गंगा में हाथ क्यों नहीं धोया, खुद कोमैंने खूब धिक्कारा। सुबह के अखबार सामूहिक बलात्कार की खबरों से भरे थे। मैं जूड़ी बुखार में बेसुध था और उसीहालत में पुलिस मुझे ले गई।

लड़की ने बताया कि वे सात थे। वो छह पता नहीं कहां गायब हुए और मैं बिना मशक्कत के पुलिस के हाथ लगगया। पहली बार थर्ड डिग्री से वास्ता पड़ा तो मेरी चूलें हिल गईं, होश फाख्ता हो गए। मेरे तमाम इन्कार के बावजूदमैं कानूनन मुजरिम था, क्योंकि मौका-ए-वारदात पर मौजूद था। दस लाख की आबादी में से मैं ही क्यों मौजूद था, दूसरे तमाम लड़के, चौकीदार, वार्डन और प्रिंसिपल क्यों मौजूद नहीं थे? अब तो अदालत तय करेगी कि मैं मुजरिमथा कि बेकसूर? कानून की सारी जंग झूठ के पुलिंदों में से सच्चाई निकालने में जाया हो जाती है और जो अंत मेंनिकल कर आता है, वो कागज का सच होता है बस।

मैं एक चश्मदीद मुजरिम हूं और मुझे कानून के बारे में यह सब कहने का हक नहीं है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट कीतमाम हिदायतों के बावजूद मुझे उन गुफाओं से गुजरना पड़ा, जहां हरे पन्नों की हवा के बिना इंसान दम घुटने सेमर जाए। उस अंधी गुफा से मुझे पता नहीं किसने बचाया। उस लड़की ने मुझे सातवें के तौर पर पहचान लिया औरमेरी बेगुनाही की गवाही भी दे दी। लेकिन ‘आईओ’ के सामने जो सवाल किया उसका जवाब मेरे पास आज भी नहींहै... ‘इसने मुझे बचाया क्यों नहीं?’

मैं उससे यह तो नहीं कह सकता था कि मैं भी वहां राल टपकाते चला गया था। आज अपने बचाव में खुद कोइन्नोसेंट’ कहना पड़ रहा है, लेकिन मेरा दिल जानता है, मैं कितना इन्नोसेंट था। वो छह थे और मैं बाहरी आदमीथा। ‘ चौकीदार थड़ी पर बीड़ी फूंक रहा था, वार्डन गर्ल फ्रेंड के साथ पिकनिक पर था और प्रिंसिपल राजनीति में मशगूल। मैं क्या कर सकता था। रोज हजारों जुर्म हमारी आंखों के सामने होते हैं, लेकिन हम क्या कर पाते हैं? खैरबाद में पता चला कि रणधीर से लड़की के संबंध पहले से थे। उस दिन कुछ ज्यादती हो गई। दोस्तों का भला करनेके चक्कर में उसकी सारी स्टूडेंट पालिटिक्स डूब गई।

पुलिस उनकी तलाश में मुझे उन सब जगहों पर ले गई जहां वे हो सकते थे। मगर वे सब गायब थे। उनके बस नामरह गए थे। एक हंगामा मचा था और सरकार तथा पुलिस की नाक का सवाल था कि एक भी मुजरिम गिरफ्त मेंनहीं आया। सबसे पहले बंटी पकड़ा गया, फिर मनोज। लगा बाकी भी जल्द पकड़े जाएंगे। अखबारों में इस कांड कीखबरें सिमटती गईं। पुलिस की मिली भगत का रोना रोया गया। रणधीर किसी नेताजी का साला था। उनके फार्महाउस पर छापा मारने की हिम्मत कौन करे? रणधीर के अलावा बाकी तीन भी जल्दी पकड़े गये। पुलिस की जांच में आखिर मामला यह बना कि वे दरअसल पांच ही थे, लड़की का गणित कमजोर था।

चार्जशीट पेश होने के बाद मेरे सर पर और बड़ी बलाएं आ गईं। मेरा चश्मदीद गवाह होना ही सबसे बड़ा जुर्मसाबित हुआ। दोस्त अब दुश्मन हो गए थे। इतना दहशतजदा तो मैं पुलिस हिरासत में भी नहीं था। मुझे धमकियांमिलने लगीं कि मैं दोस्तों के खिलाफ कुछ बोला तो मेरा क्या हश्र होगा। मैं घबराहट में इस-उस रिश्तेदार के यहांपनाह लेने लगा। मेरी जिंदगी अब दोस्तों के रहमोकरम पर थी। पता नहीं कुत्ते-बिल्ली का यह खेल कब तकचलेगा।

ट्रायल शुरु हुई है, लडकी को भरोसा है कि मेरे बयान से उसका केस मजबूत होगा और गुनहगारों को सजा मिलेगी।लेकिन मेरी दहशत रोज बढती जा रही है। मैं खौफजदा हूं और चारों तरफ अंधेरा छाया है। क्या मेरा वहां मौजूदहोना ही सबसे बड़ा जुर्म है? मेरी राय तो यही है कि आप चश्मदीद होने से बचिए, वर्ना आप भी मेरी तरह मुसीबतमें पड़ जाएंगे।

कहानी अंश

उस भयंकर उठापटक में एक पल को मेरी निगाह उस लड़की की आंखों पर जा टिकी थी। मैं ठीक से कह नहींसकता कि उसमें किसी तरह की इल्तिजा थी या मुझे भी मनोज का एक साथी समझकर नफरत से उसने मुझे देखाथा। इतना जरूर याद है कि उससे निगाहें मिलते ही मैं सिहर गया था। जाने क्यों, उस वक्त मेरे सामने छोटी बहनक्लिक हो गई थी। मैं कह चुका हूं, वह मेरे साथ ही थी। अमूमन ऐसा नहीं होता, खास तौर से नशे और जोश कीहालत में।

.....

मुलजिमान के खिलाफ चार्जशीट पेश होने के बाद मैंने यह समझ लिया कि बला टली। लेकिन यह मेरीखामखयाली थी। अब मेरे सर पर ज्यादा बड़ी बलाएं मंडरा रही थीं। मैं चश्मदीद गवाह था और यही मेरा सबसे बड़ाजुर्म साबित हुआ। कल तक जो मेरे दोस्त थे, आज वे दुश्मनों से भी बुरा बरताव कर रहे थे। वे घात में थे और मैंबचाव में। मैं इतना दहशतजदा तो पुलिस कस्टडी में भी न था।

लेखक परिचय

जन्मः 21 अगस्त, 1942 जोधपुर

प्रकाशित कृतियां

बाल-साहित्यः अनाथ, बालिश्त भर दर्द, दीनू की दुनिया

कहानी-संग्रहः कुरान की कहानियां, अंश-अंश-दंश, आबगीना, तीसरा सफर, ये फैसला किसका था और चश्मदीद मुजरिम

पुरस्कार-सम्मानः ‘अनाथ’ को बाल साहित्य प्रतियोगिता में ज्ञानभारती पुरस्कार, लखनउ।

अंश-अंश-दंश’ को राजस्थान ग्रेजुएट सर्विस एसोसियेशन , मुंबई द्वारा सम्मान।

‘तीसरा सफर’ को राज. साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा रांगेय राघव कथा पुरस्कार।

राज. उर्दू अकादमी और राज. वक्फ बोर्ड द्वारा सम्मानित।









Sunday, 28 June 2009

फुरसत - मदन सैनी की कहानी


हिंदी और राजस्थानी में समान रूप से लिखने वाले प्रदेश के अत्यंत महत्वपूर्ण कथाकार मदन सैनी राजस्थान के ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने लोकसंस्कृति का गहन अध्ययन भी किया है और शोध भी। उनकी कहानियों की तरह उनके शोध निबंध भी समय-समय पर सराहे गये और पुरस्कृत किये गए। उनकी हिंदी और राजस्थानी कहानियों की दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और पुरस्कृत भी। मदन सैनी कम लिखते हैं, लेकिन उनकी कहानियों से गुजरने के बाद अहसास होता है कि मात्रा और गुणवत्ता में कितना भेद होता है। मदन सैनी की कहानी ’फुरसत’ एक ऐसे इंसान की कहानी है जो बुढापे और अकेलेपन के बीच निरंतर चिंतन करता हुआ पूरे समाज में उपहास का पात्र बन जाता है।
बासठ बरस के मघजी को यह बात कभी समझ में नहीं आई कि जिस बात को वो समझते हैं, उसे बाकी लोग क्यों नहीं समझते। उन्हें अपनी समझ पर पूरा भरोसा है और वो मानते हैं कि उनकी बात बिल्कुल सही है, भले ही दूसरे लोग समझें या नहीं। और इस बात के उनके पास पक्के सबूत भी हैं। माता-पिता के इकलौते पुत्र मघजी के पिता तो जिंदगी भर सेठों के खेत में मजदूरी करते रहे, लेकिन मघजी के होश संभालने के बाद घर की हालत दिन-ब-दिन बदलती चली गई। मघजी ने व्यापार में जो हाथ आजमाया तो उनकी सफलता की ऐसी कथा शुरु हुई कि गांव के बाहर चारों तरफ उनकी कीर्ति पताका फहरने लगी। उनकी बड़ी बेटी दुर्गा और मझले बेटे मोहन का ऐसे गाजे-बाजे के साथ ब्याह हुआ कि गांव और आस-पड़ौस में लोग दंग रह गए। उनके घर के सदस्य जब नित नए कपड़े-गहने पहनकर बाहर निकलते हैं तो लोगों की आंखें फटी रह जाती हैं।
मघजी को पता ही नहीं चला कि धीरे-धीरे कब उनके व्यापार की बागडोर उनके बेटे मोहन ने संभाल ली। उन्हें तो तब पता चला जब बेटे ने उन्हें आराम करने, घर सम्हालने और भगवत भजन की सलाह दी। समझदार को इशारा काफी, मघजी ने बेटे का कहा माना और ध्यान दूसरी तरफ लगाने की कोशिश की। लेकिन पहाड़ जैसा दिन काटना बिना कामधाम के खासा मुश्किल था। एक दिन सुबह-सुबह उन्होंने पत्नी से कहा कि इस तरह तो वक्त कैसे कटेगा, पता नहीं लड़के को भी क्या सूझी, उम्र और अनुभव को कोई मोल नहीं। पत्नी ने कहा, क्यों खून जलाते हो, पूजा-पाठ से वक्त नहीं कटता, तो बाहर घूमो, सुबह शाम दिशा-मैदान के लिए रेत के धोरों की तरफ ही चले जाया करो। मघजी उसी वक्त लोटा लेकर चल दिये।
मघजी एक धोरे पर बैठ सूरज की किरणों और चमकती बालू रेत का सौंदर्य देख रहे थे। उन्होंने सोचा, रेत और सागर की लहरों में क्या फर्क है, दोनों ही तूफान मचा सकती हैं, इन्हें अपने सौंदर्य का गुमान ही नहीं। विचारमग्न मघजी को अचानक अपनी अंगुलियों के पास सरसराहट महसूस हुई। देखा तो एक टीटण थी। टीटण गुबरैला की एक प्रजाति है, जिसे अपने काले रंग के कारण ’रामजी की भैंस’ भी कहा जाता है। मघजी ने उसे पकड़कर अलग फेंक दिया, लेकिन वो तो वापस उन्हीं के पास चली आई। मघजी उसे उठा-उठाकर फेंकते थक गए, लेकिन टीटण नहीं मानी। उन्होंने लोटे का पानी पिया और टीटण को लोटे में छोड़ दिया। मघजी ने ध्यान से देखा तो उन्हें वह भंवरे की तरह सुंदर लगी, वे सोचने लगे कवियों ने इस खूबसूरत जानवर पर कुछ नहीं लिखा, सौंदर्य में यह भंवरे से कहां कम है, उन्हें लगा टीटण के साथ भारी अन्याय हुआ है और उनके भीतर ज्ञान का नया प्रकाश हुआ है।
मघजी टीटण को हाथ में लेकर देखने लगे तो वह कूद पड़ी, उन्हें लगा, कहीं इस बिचारी को चोट तो नहीं लगी, उन्‍होंने उसे फिर हथेली पर रखा और लगे निरखने। अरे! यह छोटा-सा मुंह तो रेल के दानवी इंजन की तरह दिख रहा है, वैसा ही कालाकलूटा और विकराल। पता नहीं इस पर किसी का ध्यान गया कि नहीं। दुर्गा की मां को जाकर बताउंगा तो उसे बड़ी खुशी होगी। उन्होंने टीटण को फिर से लोटे में रखा और घर की तरफ चल दिये।
जाते ही माला फेरती पत्नी से बोले, माला छोड़कर जल्दी आओ, देखो मैं क्या लाया हूं, रेल का इंजन! आश्चर्य से पत्नी ने कहा, रेल का इंजन, और उन्होंने पत्नी की हथेली खोलकर लोटा उंडेल दिया। पत्नी बोली, ‘यह तो टीटण है... हटाओ हाथ में पेशाब कर दिया तो तीन दिन तक गंध नहीं जाएगी। उन्होंने पूछा, बता तो सही, यह कैसी लग रही है, वो बोली, घर से बाहर भगाओ इसे। पता नहीं बुढापे में क्या कौतुक लाए, लोग हंसेंगे, कुछ तो सफेद बालों की इज्जत रखो। मघजी पत्नी को फटकार कर कहने लगे, सामने पड़ी चीज दिखती नहीं, लेकिन गांव में तो समझदार लोगों की कोई कमी नहीं है।,
मघजी गांव में निकले तो सबसे पहले मुकना मिला तो उसे बुलाकर लोटे में दिखाया और पूछा, बता क्या है इसमें। उसने जवाब में टीटण कहा तो पूछा कि बता इसका मुंह कैसा है, रेल का इंजन जैसा नहीं लग रहा, मुकना ने कहा कि काका, तबियत तो ठीक है, कहीं भांग-गांजे की चपेट में तो नहीं आ गये। उसकी समझ को कमजोर बताकर वो आगे चल पड़े। पूरा दिन वो गांव की गलियों में फिरते रहे पर उनकी बात को मानने समझने वाला कोई नहीं मिला। मास्टर दीनदयाल का खयाल आया पर संध्याकाल देखकर विचार त्याग दिया।
सुबह स्कूल का समय होने से पहले ही मघजी मास्टरजी के यहां पहुंच गए। वे खाट पर बैठे कोई किताब पढ़ रहे थे। मघजी ने लोटा हाथ में लिए हुए ही राम-राम किया। कहा कि पूरे गांव में घूम लिया पर कोई दिमाग वाला आदमी नहीं मिला। किसी को नई बात सोचने-समझने की फुरसत ही नहीं है और कोई कहे तो सुनने को तैयार ही नहीं है। मास्टरजी ने हंसते हुए पूछा कि ऐसी क्या बात है। उन्होंने कहा, लोग फूल, तितली, भंवरे पर रीझते हैं पर इसमें नई बात क्या है, आप देखिए इस टीटण का नया रूप तो मुझे सबसे अलग दिखता है। कहकर उन्होंने लोटा उलट दिया। हल्की-सी आवाज के साथ टीटण गिर पड़ी और उसके एरियल और छहों पांव हिलने लगे। मास्टरजी के जैसे करंट लगा, वो उछलकर खड़े हुए और गुस्से में बोले, गांव में तो एक भी समझदार नहीं मिला, तुम्हारी अक्ल घास चरने चली गई क्या, जो मजाक करने के लिए टीटण ही मिली... मैंने सोचा था, भले आदमी हो, सुबह-सुबह कोई काम की बात करने आए हो। अब आप घर जाओ... नहीं तो बच्चे पत्थर मारना शुरु कर देंगे।
मघजी को लगा वे गलत जगह-गलत वक्त आ गए हैं। डगमगाते कदमों से घर पहुंचे और अपने कमरे में बंद हो गए। ना किसी से बोलचाल और ना किसी से कहासुनी। उन्हें पता नहीं चला कि इस वक्त खुद उनकी शक्ल चुपचाप आंसू बहाते मोर जैसी लग रही थी। जब पत्नी ने आकर उनकी हालत देखी तो पूछा कि कहीं कुछ दुख तो नहीं रहा, तंज में बोले, दुखे तेरा माथा। पत्नी ने कहा कि ऐसे क्यों बोलते हो, मैं समझदार नही हूं, दुर्गा की मां... मैं तो बिल्कुल बेवकूफ हूं, मूर्ख हूं। अब मैं क्या करूं, और उनकी आंखें छलछलाने लगीं, वो फफक-फफक कर रोने लगे।
दुर्गा की मां कहने लगी, हे बालाजी महाराज...ये इनको क्या हो गया बाबा, इतने अच्छे-भले आदमी का माथा कैसे फिर गया! आपके लिए जागरण करूंगी बाबा... इनकी आंखों के आंसू पोंछ दे बाबा।
इतने में ही किसी ने घर की कुण्डी बजाई। दुर्गा की मां अपने आंसू पोंछती बाहर गई तो देखा, एक लड़का चमचमाता लोटा लेकर खड़ा था। लड़के ने कहा, मास्टरजी ने लोटा भिजवाया है, सुबह मघजी उनके घर के बाहर छोड़ आए थे। मास्टरजी ने कहा है कि टीटण नहीं मिली, मिलते ही भिजवा देंगे।
दुर्गा की मां ने तुरंत लोटा लिया और दरवाजा बंद कर कुण्डी लगा ली।
कहानी अंश
बड़े-बड़े व्यापारियों को सलाह देने वाले मघजी को एक बार तो लगा उनकी समझ ही अपाहिज हो गई है। जिस समझ पर जिंदगी भर गर्व किया, उसे आज उन्हीं का सपूत बेकार साबित कर रहा है। लेकिन मघजी समझदार आदमी थे। सोच-समझकर घर रहने को ही अच्छा मान, मंदिर-देवालय, पूजापाठ में मन लगाने की जैसे-तैसे मंशा कर ही ली।
ऐसी मंशा करनी तो आसान थी, लेकिन इनमें मन लगाकर दिन काटना बहुत मुश्किल था। दिन उगता तो छिपना मुश्किल और छिप जाता तो उगना मुश्किल हो जाता। दिन बीते या रात मघजी को लगता जैसे युग बीत गया।
.......
दूर तक पसरी बालू की लहरों में मघजी अपने मन की नाव खे रहे थे कि अचानक उनके पांव की अंगुलियों के पास सरसराहट हुई। नीचे देखा तो एक टीटण थी। उन्होंने उसे हाथ में पकड़कर दूर फेंक दिया। लेकिन वो थोड़ी ही देर में वापस आ जाती। मघजी ने तीन-चार बार उसे फेंका, लेकिन वो असली टीटण थी, धरती का हठीला जीव। हमीर ने अपना हठ छोड़ा हो तो यह आज ही छोड़ दे।
मघजी थक गए। उन्होंने लोटे का पानी गटागट पिया और टीटण को लोटे में छोड दिया। इसके बाद उन्होंने टीटण को नजदीक से देखना शुरु कर दिया। अरे! ये तो बिल्कुल भंवरे जैसी लग रही है। भंवरा इतना नादीदा जीव और बिचारी टीटण की कोई बात ही नहीं करता। मघजी ने सोचा, इसी को कहते हैं संगत का असर... ये भंवरा भिनभिनाता गीत गाता तितलियों और फूलों के पास जा पहुंचा और कवियों की आंख का तारा बन गया। लेकिन बिचारी टीटण को कौन पूछे।
लेखक परिचय
मदन सैनी
जन्म- 3 मई, 1958
प्रकाशित कृतियां- फुरसत-राजस्थानी कहानी संग्रह
सफेदे और भेड़ें- हिंदी कहानी संग्रह
संपादन- रामरास, सीतपुराण, कृष्णावतार, रामरासौ
पुरस्कार- मुरलीधर व्यास कथा साहित्य पुरस्कार
एल.पी. तैस्सीतोरी गद्य पुरस्कार


Saturday, 13 June 2009

गाभाचोर-भरत ओला की कहानी




ऐसा जबर्दस्त चोर आज तक नहीं सुना। एक दो नहीं कोई बीसियों घरों में चोरी हुई और चोरी में कोई बर्तन, गहने या रूपया पैसा नहीं गया। सबके यहां से चोर सिर्फ औरतों के कपड़े ही चुराकर ले जाता। गांव भर में बस एक ही चर्चा कि कोई चोर है जो सिर्फ औरतों के कपडे चुराता है] पता नहीं यह किसी जादू टोने वाले तांत्रिक का ही कोई काम हो। साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार से सम्‍मानित राजस्‍थानी के समर्थ कथाकार भरत ओला की इस कहानी का नायक एक स्कूल मास्टर है] जो स्कूल में भी इसी चोर की चर्चा से यह सोचने के लिए मजबूर है कि आखिर ऐसा कौनसा चोर है जो यह काम कर रहा है। वो जब स्कूल पहुंचता है तो चपरासी महेश कुमार जवानी में निकलने वाले मुहांसो को फोड़ता मिलता है। स्कूल के सब मास्टर भी चोर चर्चा में लगे मिलते हैं। पता चलता है कि चोर नहाती हुई स्त्रियों के कपड़े चुरा ले भागा। एक मास्टर का चोर के बारे में तर्क है कि चोर को पहली बार चोरी में कपड़ों के साथ कोई गहना हाथ लग गया होगा और अब वो इसीलिए कपड़े चुरा रहा है, क्योंकि हमारे यहां स्त्रियां नहाते वक्त गहने उतारकर कपड़ों के साथ रख देती हैं। खैर, जितने मुंह उतनी बातें।
एक मास्टर जी का कहना था कि कोई गरीब चोर होगा, जो अपनी स्त्री के लिए कपड़े चुराता होगा, बेचारा अपनी पत्नी को फटे कपड़ों में कैसे देख सकता है। दूसरे मास्टरजी कहते हैं कि वो चोर कपड़े ही नहीं अधोवस्त्र भी चुराता है। गांव भर में कई दिनों तक इस चोर की चोरियों की खासी चर्चा रही, लेकिन समय के साथ बातें मंद पड़ती गईं। लेकिन कपड़े चोरी होने का सिलसिला नहीं रुका। या तो औरतों ने ही अपने कपड़े चोरी होने की बातें किसी बदनामी से बचने के लिए और बिना वजह चर्चा में आने के डर से अपने घर वालों को बतानी बंद कर दीं या लोगों ने ही। वैसे भी एक ही किस्म की चर्चा बहुत ज्यादा दिनों तक चलती भी नहीं रह सकती।
कथा का नायक एक रात सोते समय घर के बाहर कोई खटका सुनकर उठ जाता है। दरवाजा खोलते ही चांदनी रात में वह जो देखता है तो देखता ही रह जाता है। स्कूल का चपरासी महेश कुमार अलगनी पर से नायक की पत्नी के कपड़े उतार रहा था। कपड़े उतारकर वह दोनों हाथों से उन्हें भींचकर मुंह के आगे लगा रहा था। महेश कपड़ों को किसी गंजेड़ी की तरह गहरा कश लगाने के अंदाज में सूंघ रहा था और नाक में से धुआं निकालने के अंदाज में सांस बाहर छोड़ रहा था। मास्टर के बदन में आग लग गई, आखिर उसी की आंखों के सामने महेश उसी की पत्नी के कपड़े सूंघ रहा था। उसके मुंह से गालियों का एक भभका निकलने को था कि अचानक उसके सामने महेश का सार्वजनिक चेहरा तैर गया। एक मिलनसार, हमदर्द, आज्ञाकारी, शांत और मृदुभाषी महेश कपड़ा चोर नहीं हो सकता। मास्टर चुपचाप भीतर चला जाता है।
सुबह होने पर पत्नी भी शायद दूसरी महिलाओं की तरह बदनामी के डर से कपड़ों की बात नहीं करती। रोज की तरह मास्टर स्कूल जाता है, महेश हमेशा की तरह दुआ-सलाम करता है। लेकिन मास्टर को लगता है कि महेश उसके सामने सहज नहीं है और आंखें नहीं मिला पा रहा है। मास्टर को गुस्सा तो रात से ही आ रहा था, लेकिन वह थोड़ा सोच विचार कर समय आने पर उससे बात करने के बारे में सोचता है। स्कूल की छुट्टी होने पर सब चले जाते हैं और मास्टर दिशा मैदान के लिए निकल जाता है। लौटकर वापस स्कूल आता है और महेश से हाथ धुलवाने के लिए कहता है। महेश पानी लाकर हाथ धुलवाता है, तो हाथ धोते वक्त मास्टर के हाथ महेश की धुनाई के लिए मचल उठते हैं। वह रगड़-रगड़ कर हाथ धोते हुए अपने गुस्से को काबू में रखता है। हाथ धुलाकर महेश तौलिया लेकर आता है। मास्टर महेश से हौले से पूछता है, ‘महेश, तुम्हें पता है, कपड़ाचोर कौन है
महेश के मुंह का सारा तेज भंग हो गया और चेहरा फक्क हो गया। महेश ठीक उसी जगह जहां हाथ धोने से कीचड़-सा हो गया था, मास्टर के पैरों में गिर गया, ‘गुरुजी...गुरुजी...! मुझे माफ कर दो। मुझे बख्श दो गुरुजी।... यह मेरे वश की बात नहीं है गुरुजी...सारा दिन इसके लिए मैं खुद को धिक्कारता रहता हूं, लेकिन शाम होते ही मुझे जनाना कपड़ों की गंध चैन नहीं लेने देती। मेरा गुनाह माफ करो गुरुजी, गरीब आदमी हूं। गुरुजी...गुरुजी...!
अचानक मास्टर को एक खोई हुई गंध की बेतरह याद आती है। उसे लगता है कि जैसे कपड़े चुराने वाला महेश नहीं वह खुद है। उसे महसूस होता है कि उम्र के कितने वर्ष वह भी ऐसी ही गंध का पीछा करता रहा था, वह गंध जो रोज मिलकर भी उससे जुदा ही है। वह सरपट घर की ओर चल देता है। घर के पास पहुंचने पर उसे खयाल आता है कि क्या आज की रात फिर किसी औरत के कपड़े चोरी होंगे। उत्तर में उसके अंतर से एक मुस्कान उठकर पूरे वजूद को घेर लेती है।
सुविख्यात कवयित्री कात्यायनी ने एक कविता में लिखा है, सभी वासनाएं अश्‍लील नहीं होतीं। इस कहानी पर भी यही बात लागू होती है। नौजवानी के दौर में युवक-युवतियां सब इसी किस्म के अनुभवों से गुजरते हैं। कहानी और कहानीकार की खूबी यह है कि वह महेश को बड़े मानवीय ढंग से निर्दोष ठहराते हुए मनुष्य की नैसर्गिक भावना और आवेगों को इस किस्म की ‘चोरी के लिए उत्तरदायी बताते हैं। मुझे एक ब्यूटी पार्लर संचालक मित्र ने बताया कि उनके यहां एक डाक्टर अक्सर आकर बैठ जाता था और चुपचाप बैठा स्त्रियों के बाल कटते हुए देखता रहता था। उस स्त्री के जाने के बाद वह उसके कटे हुए बालों में से एक लट उठाता और जेब में रखकर ले जाता। यह कितनी अजीब दुनिया है जिसमें एक पढे़ लिखे डाक्टर को बालों की लट से और चपरासी महेश को जनाना कपडों की गंध से तृप्ति मिलती है। मानवमन में ना जाने कितनी गुफाएं हैं जिनके भीतर पैठना अभी भी साहित्य और कलाओं की दुनिया में शेष है।
लेखक परिचय
जन्‍म – 6 अगस्‍त, 1963
कृतियां
कहानी संग्रह- जीव री जात, सेक्‍टर नंबर पांच
कविता- सरहद के आर-पार
उपन्‍यास- घुळगांठ
सम्‍मान-पुरस्‍कार जीव री जात पर केंद्रीय साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार और मुरलीधर व्‍यास राजस्‍थानी कथा साहित्‍य पुरस्‍कार के अलावा बीसियों सम्‍मान-पुरस्‍कार

Monday, 8 June 2009

पटाक्षेप नहीं होगा- डा. हेतु भारद्वाज की कहानी


राजस्थान के जिन साहित्यकारों को अखिल भारतीय स्तर पर पहचाना जाता है उनमें डा. हेतु भारद्वाज का नाम प्रमुखता के साथ लिया जा सकता है। वे पिछले पांच दशकों से कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और आलोचना के साथ सामाजिक सरोकारों और सांस्कृतिक चिंताओं को केंद्र में रखकर विविध प्रकार का चिंतनपरक लेखन कर रहे हैं। उनकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और आज भी वे निरंतर सृजन कर रहे हैं। डा. भारद्वाज के सृजन संसार का फलक बहुत व्यापक है और उसमें मनुष्य की कमजोरियां ही नहीं उसका अदम्य साहस, जीवन संघर्ष और एक लोकतांत्रिक समाज के भीतर चलने वाली गहरी उथल-पुथल का जीवंत वर्णन देखने को मिलता है। अनेक सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित डा. हेतु भारद्वाज की रचनाओं में बदलाव के प्रति एक गहरा आकर्षण और असमानता, शोषण, अन्याय और समझौतावादी प्रवृत्ति के विरुद्ध जबर्दस्त प्रतिरोध है। उनकी सैंकड़ों कहानियों में कई साल पहले लिखी गई कहानी ‘पटाक्षेप नहीं होगा’ आज भी पढ़ने पर ऐसी लगती है, जैसे यह आज ही की कहानी हो। एक बड़े रचनाकार की यही विशेषता भी होती है कि उसकी रचना काल का अतिक्रमण कर हर युग में अपने समय की रचना लगती है। इस कहानी की एक और खासियत यह भी है कि शिल्प के स्तर पर यह नाटक के विविध सोपानों की तरह आगे बढ़ती है और अंत में इसका नाटक की तरह पटाक्षेप नहीं होता, क्योंकि जो परिस्थितियां इस कहानी में हैं वे शास्वत हैं और अगर पाठक हालिया लोकसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में इसे पढ़ेंगे तो यह और समीचीन लगेगी।
यह कहानी देश की आजादी से शुरु होती है, जिसमें देश के साथ ही रामनेर गांव की आजादी की बात से कथाकार पूरे माहौल की रचना करता है। गांव का ठाकुर पहले की तरह ही मुखिया बना हुआ है, ब्राह्मण उसके पूज्य सहयोगी हैं और शेष निर्धन वंचित जातियों के लोग इनके शोषण के लिए अभिशप्त। इस कहानी में कोई पात्र नहीं है, फिर भी गांव में रहने वाले कुछ किरदार हैं जो रामनेर की तरह किसी भी गांव के हो सकते हैं। इस गांव में समतावादी समाज के नाम पर लोकतंत्र का जो नाटक पहले चुनावों से चला आ रहा है वह आज भी जारी है।
आजादी के बाद जो कुछ बदलाव इस गांव में हुए उनमें स्कूल और डाकखाना खुलने के अलावा दस गुना लगान जमा करवा कर किसानों का स्वयं जमीन मालिक बन जाना था। ठाकुर की जमींदारी से कुछ को तो मुक्ति मिली और कुछ अभी भी ठाकुर-ब्राह्मणों के रहमोकरम पर ही थे। इस तरह के बदलाव के साथ गांव में लोकतंत्र को भी आना ही था। पहली बार ग्राम पंचायत के चुनाव आये गांव वाले समझे ही नहीं कि क्या करना है। इस पर मुखिया ने गांव में सभा बुलाकर सबसे राय पूछी कि किसे प्रधान बनाया जाए। उसके पंडित मित्र ने उसे ही प्रधान बने रहने की बात कही, बदले में उसने बुढापे का बहाना बनाया और पंडित के कहने पर ठाकुर के बेटे रामसिंह को सर्वसम्मति से प्रधान चुन लिया गया और बाकी चुनाव भी सर्वसम्मति से हो गये। मुखिया ने बाद में गांव वालों को बताया कि निर्विरोध चुनाव के कारण गांव का नाम पंडित नेहरू तक गया है। गांव वाले बहुत खुश हुए।
रामनेर गांव में आबादी के लिहाज से ठाकुर-ब्राह्मण तो बराबर थे, कुछ और दलित जातियों के भी घर थे, लेकिन चमारों की संख्या इन सबसे बहुत ज्यादा थी,। इस बात को चमार नहीं जानते थे, क्योंकि उनकी हैसियत ही ऐसी नहीं थी। हालांकि इनमें से कुछ के पास जमीन भी थी और पैसे भी। गांव के स्कूल में रामसिंह ने कच्ची-पक्की इमारत बनवा दी और अपने गुर्गे को नियुक्ति दिलवा दी, वही डाकखाने का भी काम देखने लगा। इस उद्दंड गुर्गे ने पढाने के बजाय बच्चों को पीटा ज्यादा और बच्चे शिक्षा के मामले में फिसड्डी ही रहे। गांव में बदलाव की पहली बयार दो ब्राह्मण भाइयों महेंद्र और बलबीर के दिल्ली जाकर काम करने की खबर से आई। इनका पिता स्वाभिमानी था और मुखिया से दबता नहीं था। नाराज मुखिया ने उसे जमीन से बेदखल कर जबरन अपना कब्जा जमा लिया। पुलिस भी कुछ नहीं कर सकी और आखिरकार एक दिन गांव के पास नहर किनारे उसकी लाश मिली। उसके अनाथ बच्चों को मामा दिल्ली ले गया, कुछ पढ़ाया और सरकारी आफिस में चपरासी लगवा दिया। दोनों कभी-कभार गांव आकर घर की मरम्मत करवा जाते। इनके मन में भी मुखिया के विरुद्ध गहरा आक्रोश था।
दोनों भाई जान गये थे कि निर्विरोध चुनाव मुखिया की रणनीति का हिस्सा थे। दिल्ली में रहने कारण वे जानते थे कि अगर चमारों को संगठित कर दिया जाए तो मुखिया के आतंक से गांव को मुक्ति मिल सकती है। उन्होंने दिल्ली में ही तय कर लिया था कि अगले चुनाव में वे थोड़े बहुत पढ़े लिखे, समझदार और आर्थिक रूप से किंचित समर्थ फगना को चुनाव लड़वाएंगे। चुनाव घोषित होते ही वे गांव आ गए और फगना से चर्चा की। फगना को उनकी बात में दम लगा और फिर सारे चमार एक हो गए। मुखिया और सवर्णों को जब पता चला तो उन्हें बलवीर-महेंद्र पर बहुत गुस्सा आया। उन्हें हर तरह से समझाने की कोशिशें हुईं, लोभ-लालच भी दिया और डराया-धमकाया भी। लेकिन वे अड़े रहे। मुखिया ने चमारों को बुलाकर समझाया तो जो ठाकुर की दया पर निर्भर थे, वे पसर गये, जाति के मामले में क्या करते। ठाकुर ने कहा कि चुपचाप साथ देना नहीं तो देख लेना। इस तरह चमारों में अदृश्य फूट पड़ गई। चुनाव का नतीजा वही निकला जिसकी आशंका थी। चमारों की फूट से रामसिंह ने फगना को भारी मतों से पराजित किया। बलवीर और महेंद्र को मुखिया ने बुलाकर खूब लानत-मलामत की। दोनों ने कहा कि यह आखिरी चुनाव थोड़े ही है। मुखिया ने कहा, ‘तुम्हारे लिए तो आखिरी ही समझो।’ दोनों भाई पराजय से टूटे फगना के पास गये और हिम्मत बंधाई। दोनों ने कहाकि अपने लोगों को संगठित करने में लगे रहो, अगले चुनाव में सबको दिखा देंगे। उसी रात कुछ लोगों ने महेंद्र-बलबीर को बुरी तरह पीट डाला। सुबह फगना और कुछ लोग दोनों को मरहम-पट्टी के लिए कस्बे ले गये। थाने गये तो पुलिस ने डांटकर भगा दिया। दोनों भाई वहीं से दिल्ली चले गये।




गांव में जातिवादी माहौल घना हो गया। विधान के अनुसार पंचायत के चुनाव तीन साल में एक बार होने थे, लेकिन सूखा और बाढ़ जैसे बहानों से चुनाव टलते रहे और सात साल तक रामसिंह ही प्रधानी करता रहा। गांव में जातिवादी वैमनस्य बढ़ने लगा, लेकिन फगना के कारण चमारों में आई चेतना से वे ठाकुर-ब्राह्मण गठजोड़ का डटकर मुकाबला करने लगे। रामसिंह इस बीच पंचायत के पैसों से खुद का विकास और तेजी से करता रहा। मुखिया की मौत के बाद वह और निरंकुश हो गया। फिर चुनावों की घोषणा हुई तो चमार बहुत खुश हुए। फगना महेंद्र-बलवीर के पास दिल्ली गया। इस बार वे आने के लिए राजी न थे, लेकिन फगना के कहने पर चुनाव से एक सप्ताह पहले गांव आने के लिए मान गए। दोनों गांव आए तो देखा चमारों में जबर्दस्त जोश था। लेकिन रामसिंह भी कम नहीं था, उसने शुरु से ही इनकी राह में कांटे बिछाना प्रारंभ कर दिया था। पहले तो इन्हें वोटर लिस्ट नहीं मिली और जब मिली तो देखा कि उसमें दोनों भाइयों के साथ चमारों के उन लोगों के भी नाम नहीं हैं जो बाहर रहते हैं, जबकि ब्राह्मण-ठाकुरों में सबके नाम थे। इसके बावजूद चमारों के वोट अब भी बाकी सबसे ज्यादा थे, यानी जीत का गणित चमारों के पक्ष में था और वे आश्वस्त थे।
चुनाव से पहले पोलिंग पार्टी आई, जिसका चुनाव अधिकारी संयोग से ठाकुर ही था। रामसिंह ने उसे रात को दावत पर बुलाया, दारू पिलाई तो जाति के नाम पर और रिश्वत में मिले रुपयों के कारण अधिकारी ने रामसिंह को हर हाल में जीतने की रणनीति बताई। सुबह पोलिंग के वक्त जब शुरु में मतदाता नहीं पहुंचे तो अधिकारी दोनों के एजेंटों को चाय पिलाने ले गया। एक घण्टे बाद वे लोग लौटे तो वोटर आने लगे थे। चमारों की औरतें आईं तो पता चला उनके वोट तो पहले ही दिये जा चुके हैं। खूब हंगामा हुआ। साफ था कि रामसिंह ने एक घण्टे में उतने वोट डलवा दिये जिससे वो जीत सके और हुआ भी यही वो करीब सौ वोटों से जीत गया।
फगना ने लोगों की सलाह पर अदालत में चुनाव के खिलाफ रिट लगाई और अगले चुनाव तक मुकदमा चलता रहा। रामसिंह के धांधली से प्रधान बन जाने से गांव में सवर्ण-दलित संघर्ष और गहरा गया। फगना ने केंद्र तक के दलित नेताओं तक पहुंच बना ली तो रामसिंह ने सवर्ण नेताओं से। दोनों अपने नेताओं को गांव में लाकर सभाएं कराने लगे और गांव में अलग किस्म की जातीय राजनीति का उभार हुआ। दोनों तरफ गुण्डों की तादाद बढ़ गई और आए दिन संघर्ष होने लगा। रामसिंह पंचायत के पैसों से कागजों में गांव का विकास करता रहा और खुद भी माल हड़पता रहा। फिर चुनाव आए तो रामसिंह को लगा अब चुनाव जीतना आसान नहीं है तो उसने नई रणनीतियों पर सोचना शुरु कर दिया। ब्राह्मण-ठाकुरों की मीटिंगा बुलाकर पूछा कि क्या करना है। खुद चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया और कहा कि इस बार सब मिलकर तय करें। उसने अपने विश्वस्त चमार लच्छीराम का नाम चला दिया। चमार पहले तो खुश हुए फिर निराश कि इससे तो रामसिंह की ही सत्ता चलती रहेगी। उनमें दो गुट बन गये। रामसिंह के सिखाने से लच्छीराम का जोश दोगुना हो गया और वह अपने जाति भाइयों के कहने पर भी मैदान से नहीं हटा।
पर्चा दाखिल करने वाले दिन रामसिंह ने चुपके से अपने बेटे नाहरसिंह का भी फार्म भरवा दिया। आखिर में नाम वापस लेने के बाद तीन उम्मीदवार रह गये, नाहरसिंह, लच्छीराम और इतवारी चमार यानी दो दलित और एक सवर्ण। चुनाव का नतीजा तय था, क्योंकि रामसिंह ने खेल ही ऐसा खेला था। चमारों के वोट बट गये और नाहरसिंह अपने दादा और पिता की परंपरा आगे बढाता हुआ प्रधान बन गया। आजादी से पहले उसका दादा गांव का मुखिया था और अब तीसरी पीढी में वह था। यह सिलसिला खत्म नहीं हुआ ना? जब तक इस नाटक का पटाक्षेप नहीं होगा, समाज नहीं बदलेगा।
कहानी अंश
मैंने पहले ही कहा कि यह एक गांव की कहानी है और इसमें कोई पात्र नहीं है। पर जो लोग इस कहानी में विद्यमान हैं, उन्हें इसी गांव का कैसे कहूं। वैसे वे लोग इस गांव के हिस्से भर हैं। रामनेर गांव की यह कहानी एक अनवरत चलने वाला नाटक है। पर यह नाटक नहीं है, कहानी है। इस नाटक की शुरुआत भारत को आजादी मिलने के बाद शुरु हुई थी और नाटक बराबर चल रहा है, बिना किसी पटाक्षेप के।
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पर यह भी तो अंतिम चुनाव नहीं था और रामनेर में समतावादी समाज की स्थापना का सिलसिला जारी था। सिलसिला तो जारी रहना चाहिए-आजादी से पहले केसरीसिंह रामनेर का मुखिया था। आजादी के बाद उसका पुत्र रामसिंह तीन बार रामनेर गांव का प्रधान चुना गया, फिर रामसिंह के पुत्र नाहरसिंह ने प्रधान-पद का चुनाव जीता।
पर यह सिलसिला खत्म नहीं हुआ न? इस नाटक का पटाक्षेप नहीं होगा, तभी तो यह समाज बदलेगा।






लेखक परिचय






जन्म:15, जनवरी, 1937


प्रकाशित कृतियाँ


कहानी संग्रह: तीन कमरों का मकान, ज़मीन से हटकर, चीफ साहब आ रहे हैं, तीर्थ यात्रा, सुबह-सुबह, पटाक्षेप नहीं होगा, रास्ते बंद नहीं होते।


उपन्यास: बनती बिगड़ती लकीरें


आलोचना: परिवेश की चुनौतियां और साहित्य, हिन्दी कहानी में मानव प्रतिमान, संस्कृति और साहित्य सहित कुल दस पुस्तकें।


व्यंग्य संग्रह: छिपाने को छिपा जाता


नाटक: आधार की खोज


सम्मान-पुरस्कार: राजस्थान साहित्य अकादेमी द्वारा 'कथा पुरस्कार' (अब रांगेय राघव पुरस्कार) और विशिष्ट साहित्यकार सम्मान

Sunday, 31 May 2009

सूझती दीठ-अन्नाराम सुदामा की कहानी



राजस्थानी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने में जिन महान रचनाकारों का योगदान है] उनमें अन्नाराम सुदामा का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। 86 वर्षीय सुदामा जी हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में समान रूप से लिखते रहे हैं और अब तक दोनों भाषाओं में उनकी कविता] कहानी] उपन्यास नाटक] बाल साहित्य और यात्रा संस्मरणों की दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। राजस्थान के ग्रामीण जनजीवन में नित्य होने वाली घटनाओं को वे अत्यंत पारखी नजर से देखते हुए गहरी सामाजिक चेतना से सराबोर रचनाएं लिखते हैं और यही उनके लेखन की विशेषता है। राजस्थान के ग्राम्य जीवन की संवेदना, मानवीय सरोकार और विविध छवियां आप अन्नाराम सुदामा के साहित्य से गुजरे बिना देख ही नहीं सकते। वे राजस्थानी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जिनके यहां अभावों में जीते मनुष्य की चेतना और विपरीत हालात से संघर्ष इतनी शिद्दत के साथ मौजूद होते हैं कि स्वयं पाठक भी एकबारगी लेखक और उसके अद्भुत जीवट वाले पात्रों के साथ खड़ा हो जाता है। अन्नाराम सुदामा के विपुल साहित्य में ‘सूझती दीठ, एक ऐसी कहानी है, जो अकाल से ग्रस्त एक सामान्य निर्धन ग्रामीण स्त्री के संघर्ष के बीच उसकी वैज्ञानिक दृष्टि को ही नहीं उसके नैतिक बल और साहस को बहुत गहराई के साथ रेखांकित करती है। पढ़े-लिखे पात्रों के माध्यम से चेतना जगाना आसान होता है, लेकिन सुदामा तो अपने निरक्षर पात्रों से ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समता-बंधुत्व की बात अत्यंत सहज रूप से पैदा कर देते हैं। इस एक कहानी से आप उनकी रचनात्मकता का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।
तुलसी को गांव छोड़कर कस्बे में आए तीनेक महीने हुए हैं। लगातार पड़ते अकाल के इस तीसरे साल वह यहां आई है। दो साल तो उसने जैसे-तैसे काट दिये, घर तो वो फिर भी चला लेती लेकिन गाय-बछड़ों का क्या करे। तीन जानवरों के लिए रोज पचास-साठ रुपये का बीस-बाइस किलो चारा कहां से आए। चरागाह से लेकर खेत तक सब सफाचट मैदान हुए पड़े हैं। गांव में जब कोई आस नहीं दिखी तो तुलसी अपनी बूढ़ी सास, पांच साल के लड़के और आठ साल की लड़की वाले परिवार को लेकर इस कस्बे में चली आई।
गांव की एक नाइन के परिचय से उसे एक मोहल्ले में एक सेठ का छह सौ गज का बाड़ा बीस रुपये महीने में किराये पर मिल गया। सेठ ने इस शर्त पर बाड़ा दिया था कि कहने पर एक-दो दिनों में ही खाली करना होगा। तुलसी ने शर्त मान ली और नाइन ने जिम्मेदारी ले ली। बाड़ा क्या था, बाहर एक पक्का अहाता, भीतर एक कमरा और बाकी खुली जगह। इस बाड़े में कभी जलावन की लकड़ियां और चारा होता था, लेकिन सालों से देखभाल के अभाव में पूरा बाड़ा उजाड़ पड़ा था, जिसमें मकड़ी और चमगादड़ों का डेरा था। तुलसी ने बेटे-बेटी के साथ मिलकर इस जगह को रहने लायक बनाया। कमरे के आधे हिस्से में चार बोरी चारा और आधे में रहने का ठीया बनाया। बाहर के अहाते में चौका-चूल्हा जमाया और खुले में गाय और बछड़ा-बछड़ी। रोज दोनों वक्त आठ किलो दूध होता, जिसमें थोड़ा बचाकर बाकी तुलसी बेच देती। दिन में मां-बेटी पापड़ बेल कर पांच छह रुपये कमा लेती। इस तरह घर की गाड़ी चलने लगी।
एकाध बार सेठानी ने तुलसी को घर में बुलाया और दाल-दलिया पिसवाने-बीनने का काम कराया। काम के बाद सेठानी ने उसे मजदूरी के बदले बच्चों के लिए दो कटोरी सब्जी देनी चाही तो तुलसी साफ मना कर गई। तुलसी ने कहा कि घर में प्याज-पोदीने की चटनी और पालक की सब्जी रखी है। सेठानी ने पूछा कि तुलसी ब्राह्मण होकर प्याज खाती है तो जवाब में वह कहती है कि इंसान के लिए तो चोरी, छल-कपट और चुगली जैसे अवगुण भी मना है लेकिन कौन मानता है। इस महंगाई के दौर में गरीब आदमी क्यों सब्जी खाये, प्याज की गांठ सामने हो तो रोटी सहज ही गले से नीचे उतर जाती है। तुलसी के जवाब के आगे सेठानी निरुत्तर हो गई। तुलसी वापस आ गई।
तुलसी के बाड़े के पास एक सरकारी जमीन पर पोकरण की तरफ से आए मजदूरों ने अस्थायी बसेरा बना रखा है। ये भी तुलसी की तरह ही अकाल का भारी वक्त काटने आए हैं। यहां कई बीमार बूढ़े रात-दिन खांसते रहते हैं। बच्चे दिन में आसपास से कचरा, लकड़ी, कागज आदि बीनते हैं, जिनसे कुछ आमदनी भी हो जाती है और शाम के वक्त खाना पकाने के लिए जलावन भी। जवान आदमी-औरतें सड़क के किनारे रेत डालने के काम में मजूरी करते हैं।
एक दिन सुबह-सुबह पांच-सात औरतें तुलसी के दरवाजे पर आ पहुंची। इनमें से एक ने दो दिन पहले तुलसी से मिलकर बच्चों के लिए दूध देने की विनती की थी कि वे रोज नकद पैसे देंगी, बस बदले में अच्छा दूध मिल जाए। तुलसी ने हामी भर दी। अब ये मजदूर महिलाएं तुलसी की नई ग्राहक बन गईं थीं।
एक रोज सूरज उगने से पहले ही सेठ का एक नौकर आया और कहा कि आज सेठ ने सारा दूध मंगाया है। सेठ के घर इतने दूध की क्या जरूरत, पता चला कि आज सेठ के पिताजी का श्राद्ध है, जिसके लिए गाय के शुद्ध दूध से हवेली के चारों तरफ लकीर निकाली जाएगी। तुलसी ने सोचा, चार किलो दूध रेत में बहा दिया जाएगा, इसका मतलब रोगियों का आधार, निरोगियों का बल और देश की संपत्ति आखिर वह क्यों बेचे, उसने नौकर से कह दिया कि जाकर सेठ से कह दो कि आज कहीं ओर से दूध का इंतजाम कर लें, मैं नहीं दे सकूंगी।
नौकर के बाद खुद सेठ चला आया। सेठ ने कहा कि दूध तो कहीं भी मिल जाएगा लेकिन ज्यादा तो मिलावट वाला मिलता है और तुमने नौकर से ना कह दी। उसने सेठ से कहाकि सच्ची बात तो यह है कि मैं रेत में बिखराने के लिए दूध नहीं बेचती। सेठ ने कहाकि वो चाहे धूल में मिलाए या कुछ भी करे उसे तो पैसों से मतलब होना चाहिए, वह ज्यादा पैसे दे सकता है। लेकिन तुलसी नहीं मानी तो नहीं ही मानी। इस पर सेठ को गुस्सा आ गया और उसने कह दिया कि आज की आज बाड़ा खाली हो जाना चाहिए। तुलसी ने कह दिया कि वह इस सुविधा की खातिर अपनी समझ पर पर्दा नहीं गिरने देगी। उदासी की हल्की रेखा चेहरे पर तैर गई। सेठ भांप गया और आज ही बाड़ा खाली करने की कहकर चला गया।
सेठ घर गया तो सेठानी को सारी बात बताई तो सेठानी ने कहा कोई बात नहीं, दूध तो कहीं से भी ले आएंगे। सेठ ने बताया कि उसने तुलसी को आज ही बाड़ा खाली करने के लिए कह दिया है। सेठानी ने कहाकि वह तो बाड़े की देखभाल ठीक कर रही है और कभी-कभार बिना किसी लोभ के वह आकर मेरा कुछ काम भी कर देती है। अलग किस्म की औरत है वह। हमें उससे क्यों बराबरी करनी चाहिए। सेठ ने कहा, अगर तुम ऐसा सोचती हो तो ठीक है, अगर शाम तक तुलसी आती है तो तुम ही उसे रहने के लिए कह देना, मैं तो अपने मुंह से नहीं कहूंगा।
दो दिन से तुलसी की सास का दमा का रोग जोर मार रहा था और लड़के को भी मलेरिया बुखार हो रखा था। लेकिन तुलसी को तो इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि इतनी जल्दी जगह का इंतजाम कैसे होगा, उसने कोशिश करने की सोची और कुछ खा-पीकर जगह ढूंढने निकल पड़ी। उसने ठान लिया था कि सेठ के आगे जाकर हाथ नहीं फैलाएगी, किसी साधारण गुवाड़ी में उसके स्वभाव को देखते हुए जगह मिल ही जाएगी। और आखिर ढूंढ़ने पर उसे एक अकेली मालिन के पास कामचलाउ जगह मिल ही गई। उसे अपना सामान ढोने और लगाने में बहुत असुविधा तो हुई, लेकिन मां-बेटी लगी रही और दो बजे तक भूखे पेट बिना पानी पिये काम करती रही। ढाई बजे वह सेठ के यहां जा पहुंची।
सेठ अपनी गद्दी पर बैठा पान खा रहा था, देखते ही बोला, तेरे दूध नहीं देने से मेरा काम थोड़े ही रुका, पैसों के बदले दूध की कोई कमी थोड़े ही है।
तुलसी ने कहा, आप पर लक्ष्मी की कृपा है आप चार किलो क्या चार मण दूध से लकीर खींचो। लेकिन मेरी मान्यता है कि यही दूध अगर धूल में ना गिराकर भूखी-प्यासी जनता को पिलाते तो उसमें प्राणों का संचार होता, आपको आशीष मिलती और आपके पिता की आत्मा को कहीं ज्यादा खुशी मिलती।
सेठ ने कहा कि इन बातों को छोड़ और एक बार घर जाकर सेठानी से मिल ले। तुलसी ने कहा कि उनसे तो मिलती रहूंगी, लेकिन पहले आप यह चाबी सम्हालो। सेठ ने कहा, चाबी, बाड़ा खाली कर दिया क्या। हां, कहकर तुलसी चुपचाप चल दी। सेठ जाती हुई तुलसी की पीठ ऐसे देखता रहा, जैसे किसी अफीमची का नशा उतर गया हो।
कहानी अंश
समझदार तो कार्तिक लगते ही अपना-अपना पशुधन लेकर शहर के पास जा पहुंचे और नासमझ में से ज्यादातर के जानवर दो बरस में ही भूख की मार से रेत खा-खाकर सिधार गए। तुलसी ने देख लिया, अब यहां किसी हालत में गुजारा नहीं होगा, जल्दी से जल्दी किसी कस्बे की तरफ कूच करने में ही भलाई है। वहां पशुओं का भी पेट पाल लूंगी और परिवार का भी। परिवार में पांच बरस का एक लड़का, एक आठ साल की लड़की और दमे की रोगी एक बूढ़ी सास। देहरी को सीस नवा कर वह एक कस्बे की तरफ चल दी।
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वो आधा मिनट सोचने लगी, लकीर खींची जाएगी, थोड़ी दूर में नहीं, हवेली के चारों तरफ, वो भी पानी से नहीं दूध से। मतलब चार किलो दूध रेत में बिखेरा दिया जाएगा, किसके काम आएगा वो दूध, वो तो रोगियों का आधार है और निरोगियों का बल। देश की संपत्ति को इस तरह धूल में डालने के लिए बेचूं तो मेरी समझ ही खराब है।
सहसा उसकी आंखों के आगे उसके पास रहने वाले बीमार बच्चे, बुझते हुए और चाय के लिए तरसते बुजुर्ग औरत-आदमी, हारे थके मजूर नाच उठे। उसने कहा, ‘भाई, सेठजी को मेरी तरफ से हाथ जोड़कर कह देना कि दूध का इंतजाम कहीं ओर से कर लें, मैं नहीं दे सकूंगी।
लेखक परिचय
जन्मः 23 मई, 1923
शिक्षाः एम.ए.
कृतियां
उपन्यास- मैकती कायाः मुळकती धरती, आंधी अर आस्था, मैवै रा रूंख, डंकीजता मानवी, घर-संसार और अचूक इलाज
कहानी संग्रह- आंधै नै आंख्यां और गळत इलाज
कविता- पिरोळ में कुत्ती ब्याई, व्यथा-कथा अर दूजी कवितावां
यात्रा संस्मरण- दूर-दिसावर
नाटक- बंधती अंवळाई
बाल उपन्यास- गांव रो गौरव
सम्मान पुरस्कार
केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, सूर्यमल्ल मीसण पुरस्कार, मीरा सम्मान, सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार सम्मान आदि कई पुरस्कार और सम्मान।
( दैनिक नवज्योति में रविवार 31 मई, 2009 को प्रकाशित।)