Sunday 28 June 2009

फुरसत - मदन सैनी की कहानी


हिंदी और राजस्थानी में समान रूप से लिखने वाले प्रदेश के अत्यंत महत्वपूर्ण कथाकार मदन सैनी राजस्थान के ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने लोकसंस्कृति का गहन अध्ययन भी किया है और शोध भी। उनकी कहानियों की तरह उनके शोध निबंध भी समय-समय पर सराहे गये और पुरस्कृत किये गए। उनकी हिंदी और राजस्थानी कहानियों की दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और पुरस्कृत भी। मदन सैनी कम लिखते हैं, लेकिन उनकी कहानियों से गुजरने के बाद अहसास होता है कि मात्रा और गुणवत्ता में कितना भेद होता है। मदन सैनी की कहानी ’फुरसत’ एक ऐसे इंसान की कहानी है जो बुढापे और अकेलेपन के बीच निरंतर चिंतन करता हुआ पूरे समाज में उपहास का पात्र बन जाता है।
बासठ बरस के मघजी को यह बात कभी समझ में नहीं आई कि जिस बात को वो समझते हैं, उसे बाकी लोग क्यों नहीं समझते। उन्हें अपनी समझ पर पूरा भरोसा है और वो मानते हैं कि उनकी बात बिल्कुल सही है, भले ही दूसरे लोग समझें या नहीं। और इस बात के उनके पास पक्के सबूत भी हैं। माता-पिता के इकलौते पुत्र मघजी के पिता तो जिंदगी भर सेठों के खेत में मजदूरी करते रहे, लेकिन मघजी के होश संभालने के बाद घर की हालत दिन-ब-दिन बदलती चली गई। मघजी ने व्यापार में जो हाथ आजमाया तो उनकी सफलता की ऐसी कथा शुरु हुई कि गांव के बाहर चारों तरफ उनकी कीर्ति पताका फहरने लगी। उनकी बड़ी बेटी दुर्गा और मझले बेटे मोहन का ऐसे गाजे-बाजे के साथ ब्याह हुआ कि गांव और आस-पड़ौस में लोग दंग रह गए। उनके घर के सदस्य जब नित नए कपड़े-गहने पहनकर बाहर निकलते हैं तो लोगों की आंखें फटी रह जाती हैं।
मघजी को पता ही नहीं चला कि धीरे-धीरे कब उनके व्यापार की बागडोर उनके बेटे मोहन ने संभाल ली। उन्हें तो तब पता चला जब बेटे ने उन्हें आराम करने, घर सम्हालने और भगवत भजन की सलाह दी। समझदार को इशारा काफी, मघजी ने बेटे का कहा माना और ध्यान दूसरी तरफ लगाने की कोशिश की। लेकिन पहाड़ जैसा दिन काटना बिना कामधाम के खासा मुश्किल था। एक दिन सुबह-सुबह उन्होंने पत्नी से कहा कि इस तरह तो वक्त कैसे कटेगा, पता नहीं लड़के को भी क्या सूझी, उम्र और अनुभव को कोई मोल नहीं। पत्नी ने कहा, क्यों खून जलाते हो, पूजा-पाठ से वक्त नहीं कटता, तो बाहर घूमो, सुबह शाम दिशा-मैदान के लिए रेत के धोरों की तरफ ही चले जाया करो। मघजी उसी वक्त लोटा लेकर चल दिये।
मघजी एक धोरे पर बैठ सूरज की किरणों और चमकती बालू रेत का सौंदर्य देख रहे थे। उन्होंने सोचा, रेत और सागर की लहरों में क्या फर्क है, दोनों ही तूफान मचा सकती हैं, इन्हें अपने सौंदर्य का गुमान ही नहीं। विचारमग्न मघजी को अचानक अपनी अंगुलियों के पास सरसराहट महसूस हुई। देखा तो एक टीटण थी। टीटण गुबरैला की एक प्रजाति है, जिसे अपने काले रंग के कारण ’रामजी की भैंस’ भी कहा जाता है। मघजी ने उसे पकड़कर अलग फेंक दिया, लेकिन वो तो वापस उन्हीं के पास चली आई। मघजी उसे उठा-उठाकर फेंकते थक गए, लेकिन टीटण नहीं मानी। उन्होंने लोटे का पानी पिया और टीटण को लोटे में छोड़ दिया। मघजी ने ध्यान से देखा तो उन्हें वह भंवरे की तरह सुंदर लगी, वे सोचने लगे कवियों ने इस खूबसूरत जानवर पर कुछ नहीं लिखा, सौंदर्य में यह भंवरे से कहां कम है, उन्हें लगा टीटण के साथ भारी अन्याय हुआ है और उनके भीतर ज्ञान का नया प्रकाश हुआ है।
मघजी टीटण को हाथ में लेकर देखने लगे तो वह कूद पड़ी, उन्हें लगा, कहीं इस बिचारी को चोट तो नहीं लगी, उन्‍होंने उसे फिर हथेली पर रखा और लगे निरखने। अरे! यह छोटा-सा मुंह तो रेल के दानवी इंजन की तरह दिख रहा है, वैसा ही कालाकलूटा और विकराल। पता नहीं इस पर किसी का ध्यान गया कि नहीं। दुर्गा की मां को जाकर बताउंगा तो उसे बड़ी खुशी होगी। उन्होंने टीटण को फिर से लोटे में रखा और घर की तरफ चल दिये।
जाते ही माला फेरती पत्नी से बोले, माला छोड़कर जल्दी आओ, देखो मैं क्या लाया हूं, रेल का इंजन! आश्चर्य से पत्नी ने कहा, रेल का इंजन, और उन्होंने पत्नी की हथेली खोलकर लोटा उंडेल दिया। पत्नी बोली, ‘यह तो टीटण है... हटाओ हाथ में पेशाब कर दिया तो तीन दिन तक गंध नहीं जाएगी। उन्होंने पूछा, बता तो सही, यह कैसी लग रही है, वो बोली, घर से बाहर भगाओ इसे। पता नहीं बुढापे में क्या कौतुक लाए, लोग हंसेंगे, कुछ तो सफेद बालों की इज्जत रखो। मघजी पत्नी को फटकार कर कहने लगे, सामने पड़ी चीज दिखती नहीं, लेकिन गांव में तो समझदार लोगों की कोई कमी नहीं है।,
मघजी गांव में निकले तो सबसे पहले मुकना मिला तो उसे बुलाकर लोटे में दिखाया और पूछा, बता क्या है इसमें। उसने जवाब में टीटण कहा तो पूछा कि बता इसका मुंह कैसा है, रेल का इंजन जैसा नहीं लग रहा, मुकना ने कहा कि काका, तबियत तो ठीक है, कहीं भांग-गांजे की चपेट में तो नहीं आ गये। उसकी समझ को कमजोर बताकर वो आगे चल पड़े। पूरा दिन वो गांव की गलियों में फिरते रहे पर उनकी बात को मानने समझने वाला कोई नहीं मिला। मास्टर दीनदयाल का खयाल आया पर संध्याकाल देखकर विचार त्याग दिया।
सुबह स्कूल का समय होने से पहले ही मघजी मास्टरजी के यहां पहुंच गए। वे खाट पर बैठे कोई किताब पढ़ रहे थे। मघजी ने लोटा हाथ में लिए हुए ही राम-राम किया। कहा कि पूरे गांव में घूम लिया पर कोई दिमाग वाला आदमी नहीं मिला। किसी को नई बात सोचने-समझने की फुरसत ही नहीं है और कोई कहे तो सुनने को तैयार ही नहीं है। मास्टरजी ने हंसते हुए पूछा कि ऐसी क्या बात है। उन्होंने कहा, लोग फूल, तितली, भंवरे पर रीझते हैं पर इसमें नई बात क्या है, आप देखिए इस टीटण का नया रूप तो मुझे सबसे अलग दिखता है। कहकर उन्होंने लोटा उलट दिया। हल्की-सी आवाज के साथ टीटण गिर पड़ी और उसके एरियल और छहों पांव हिलने लगे। मास्टरजी के जैसे करंट लगा, वो उछलकर खड़े हुए और गुस्से में बोले, गांव में तो एक भी समझदार नहीं मिला, तुम्हारी अक्ल घास चरने चली गई क्या, जो मजाक करने के लिए टीटण ही मिली... मैंने सोचा था, भले आदमी हो, सुबह-सुबह कोई काम की बात करने आए हो। अब आप घर जाओ... नहीं तो बच्चे पत्थर मारना शुरु कर देंगे।
मघजी को लगा वे गलत जगह-गलत वक्त आ गए हैं। डगमगाते कदमों से घर पहुंचे और अपने कमरे में बंद हो गए। ना किसी से बोलचाल और ना किसी से कहासुनी। उन्हें पता नहीं चला कि इस वक्त खुद उनकी शक्ल चुपचाप आंसू बहाते मोर जैसी लग रही थी। जब पत्नी ने आकर उनकी हालत देखी तो पूछा कि कहीं कुछ दुख तो नहीं रहा, तंज में बोले, दुखे तेरा माथा। पत्नी ने कहा कि ऐसे क्यों बोलते हो, मैं समझदार नही हूं, दुर्गा की मां... मैं तो बिल्कुल बेवकूफ हूं, मूर्ख हूं। अब मैं क्या करूं, और उनकी आंखें छलछलाने लगीं, वो फफक-फफक कर रोने लगे।
दुर्गा की मां कहने लगी, हे बालाजी महाराज...ये इनको क्या हो गया बाबा, इतने अच्छे-भले आदमी का माथा कैसे फिर गया! आपके लिए जागरण करूंगी बाबा... इनकी आंखों के आंसू पोंछ दे बाबा।
इतने में ही किसी ने घर की कुण्डी बजाई। दुर्गा की मां अपने आंसू पोंछती बाहर गई तो देखा, एक लड़का चमचमाता लोटा लेकर खड़ा था। लड़के ने कहा, मास्टरजी ने लोटा भिजवाया है, सुबह मघजी उनके घर के बाहर छोड़ आए थे। मास्टरजी ने कहा है कि टीटण नहीं मिली, मिलते ही भिजवा देंगे।
दुर्गा की मां ने तुरंत लोटा लिया और दरवाजा बंद कर कुण्डी लगा ली।
कहानी अंश
बड़े-बड़े व्यापारियों को सलाह देने वाले मघजी को एक बार तो लगा उनकी समझ ही अपाहिज हो गई है। जिस समझ पर जिंदगी भर गर्व किया, उसे आज उन्हीं का सपूत बेकार साबित कर रहा है। लेकिन मघजी समझदार आदमी थे। सोच-समझकर घर रहने को ही अच्छा मान, मंदिर-देवालय, पूजापाठ में मन लगाने की जैसे-तैसे मंशा कर ही ली।
ऐसी मंशा करनी तो आसान थी, लेकिन इनमें मन लगाकर दिन काटना बहुत मुश्किल था। दिन उगता तो छिपना मुश्किल और छिप जाता तो उगना मुश्किल हो जाता। दिन बीते या रात मघजी को लगता जैसे युग बीत गया।
.......
दूर तक पसरी बालू की लहरों में मघजी अपने मन की नाव खे रहे थे कि अचानक उनके पांव की अंगुलियों के पास सरसराहट हुई। नीचे देखा तो एक टीटण थी। उन्होंने उसे हाथ में पकड़कर दूर फेंक दिया। लेकिन वो थोड़ी ही देर में वापस आ जाती। मघजी ने तीन-चार बार उसे फेंका, लेकिन वो असली टीटण थी, धरती का हठीला जीव। हमीर ने अपना हठ छोड़ा हो तो यह आज ही छोड़ दे।
मघजी थक गए। उन्होंने लोटे का पानी गटागट पिया और टीटण को लोटे में छोड दिया। इसके बाद उन्होंने टीटण को नजदीक से देखना शुरु कर दिया। अरे! ये तो बिल्कुल भंवरे जैसी लग रही है। भंवरा इतना नादीदा जीव और बिचारी टीटण की कोई बात ही नहीं करता। मघजी ने सोचा, इसी को कहते हैं संगत का असर... ये भंवरा भिनभिनाता गीत गाता तितलियों और फूलों के पास जा पहुंचा और कवियों की आंख का तारा बन गया। लेकिन बिचारी टीटण को कौन पूछे।
लेखक परिचय
मदन सैनी
जन्म- 3 मई, 1958
प्रकाशित कृतियां- फुरसत-राजस्थानी कहानी संग्रह
सफेदे और भेड़ें- हिंदी कहानी संग्रह
संपादन- रामरास, सीतपुराण, कृष्णावतार, रामरासौ
पुरस्कार- मुरलीधर व्यास कथा साहित्य पुरस्कार
एल.पी. तैस्सीतोरी गद्य पुरस्कार


2 comments:

  1. fonts bahut chhote hai..meri aankhen foot gayee..

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  2. समाज किसी को सठिया जाने के लिये भी मजबूर कर सकता है। क्या मैंने सही समझा?

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