Sunday 13 September 2009

नंद भारद्वाज की कहानी ‘उलझन में अकेले’


राजस्थान के साहित्य को जिन रचनाकारों ने पिछले पचास बरसों में सबसे ज्यादा समृद्ध किया है उनमें नंद भारद्वाज का नाम बेहद आदर के साथ लिया जाता है। अत्यंत संघर्षपूर्ण जीवन परिस्थितियों से गुजर कर नंद भारद्वाज ने अखिल भारतीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया है। कविता, कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता और मीडिया जैसे विविध अनुशासनों में रचनाकर्म करने वाले नंद भारद्वाज के यहां आम आदमी का संघर्ष और उसके भविष्य को लेकर गहरी चिंताएं देखने को मिलती हैं। उनके समूचे रचनाकर्म में एक गहरी प्रतिबद्धता और ऐसी रचनात्मकता दिखाई देती है, जिससे उनके बहुआयामी रचनाकार के विविध आयाम परिलक्षित होते हैं। उनके चर्चित कविता संग्रह ‘हरी दूब का सपना’ पर 2008 का के.के. बिडला फाउण्‍डेशन द्वारा दिया जाने वाला प्रतिष्ठित बिहारी पुरस्कार पिछले दिनों राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदान किया जाएगा। इस अवसर पर प्रस्तुत है उनकी एक अत्यंत चर्चित कहानी ‘उलझन में अकेले’ । इस कहानी से नंद भारद्वाज की गहरी संवेदनशीलता और रचनात्मकता के कई पक्ष उजागर होते हैं।


रात काफी गहरा गई थी और बाहर बढ़ती सर्दी के तेवर उत्तरोत्तर तीखे होते जा रहे थे। तिबारी (बैठक) के बीचो-बीच जलते अलाव से निकलती अग्नि की अशान्त ज्वालाएं फिर मंदी पड़ गई थीं। थोड़ी देर पहले जिन लकड़ियों को अंगारों पर रखा गया था, वे जलकर खुद अंगारे बन गई थीं और अंगारे फिर नई लकड़ियों की आहुति मांग रहे थे। कुछ ठूंठ के टुकड़े अभी तक जल रहे थे और कुछ अधजले धुंआ उगलते-से आग में अपना अस्तित्व विलीन करने को तैयार हो रहे थे। मैंने कुछ पतळी लकड़ियों को अंगारों पर रखकर दो-एक लंबी फूंकें दी - फूंक के उत्ताप में सनसनाती हुई आग फिर से सचेतन हो गई। उस सचेतन आग की सलोनी ज्वालाओं से अपने ठंडे पड़ते हाथों को गर्म करते और धीमी पड़ती मुस्कान को गरमास के नजदीक रखते मुझे मंद होती ज्वालाएं कुछ फीकी पड़ती-सी लगी। एक सूखा ठूंठ मैंने उन धीमी पड़ती लपटों पर धीरे-से और रख दिया। अंगारों और लपटों के लगातार उकसावे में अलाव के चारों ओर एक बार फिर गरमास-सा व्याप्त हो गया था और मन में कहीं इस बात की तसल्ली भी हुई कि इस गरमास का कुछ असर जीसा (पिता) तक अवश्‍य पहुंच रहा होगा, जो अभी तक मेरे सामने अलाव के उस पार आंगन पर बिछी दरी पर अबोले बैठे थे।

मैं तय नहीं कर पा रहा था कि जीसा से कैसे बात शुरू की जाए, क्योंकि बात जो करनी थी वह तो शायद पहले ही उन तक पहुंच चुकी थी और जो कुछ कहना था उन्हीं को कहना था, मुझे तो फकत् इतना ही बताना था कि मेरे सामने फिलहाल दूसरा कोई रास्ता खुला नहीं है। यह एक अच्छा अवसर हाथ आया है और मैं अपनी भटकती किस्मत को एक बार इस जमींन पर टिकाना चाहता हूं, लेकिन वे समझने को तैयार हों तब न!

मन में कई तरह की शंकाएं उठ रही थी कि शायद जीसा मुझे लेकर बहुत तनाव में हों और छूटते ही उलाहनों से मुझे अबोला कर दें या नाराजगी दिखाते हुए यह उलाहना भी दे सकते हैं कि ‘जब मां-बाप की दी हुई कोई सीख-सलाह सुहाती ही न हो तो अकारथ पूछताछ की रीत क्यों रखनी... मन-मरजी की ही करनी हो तो करो फिर... पूछना किस बात का...मां-बाप कहां-किसे बाधा देने आते हैं... लेकिन वे कुछ बोलें तब न, एक स्थिर दीठ जलते ठूंठ पर टिकाए वे फकत् बैठे थे...गहरे सोच में डूबे...अबोले!
ठूंठ अब पूरी तरह आग की लपटों में घिर गया था और उसके चारों ओर से लपटें निकल रही थी। आग के पीले उजास में जीसा के चेहरे की ओर देखकर साफ लग रहा था कि वे नाराज होने की बजाय कुछ उदास हैं, और उनका चेहरा भावहीन-सा हो गया है।

भाभू (मां) बता रही थी, ‘पिछले डेढ़ महीने से तुम्हारे जीसा काफी बीमार रहे हैं। यों आठ-पहर खाट तो कभी नहीं पकड़ी, लेकिन बुखार, खांसी और दमे के कारण जीव में आराम कम ही रहता है। हमने तो कितनी ही झाड़-फूंक करवा ली, दवाई-फाकी भी देकर देख ली, लेकिन जीव में आराम तो कभी आता ही नहीं। कोई दुख-दर्द की बात पूछ लें तो बताते और नहीं। रोटी जीमने के नाम पर तो फकत् टंक टालते हैं, मुश्किल से एकाध रोटी या थोड़ा-बहुत खीच-दलिया ले लेते हैं। चिकनाई के लिए वैद्यजी ने यों भी मनाही करवा रखी है। अफीम, चाय और तंबाखू की मात्रा जरूर बढ़ गई है, जो एक बारगी तो कौन जाने सीधा होने में मदद करते होंगे, लेकिन आखिर तो ये चीजें हानि ही पहुंचाती है। कोई आया-गया भी आजकल कम ही सुहाता है। आधी रात तक अलाव के पास अकेले गुमसुम बैठे रहते हैं, कोई बतला ले तो बहुत कम बोलते हैं। बरजने-डांटने का स्वभाव तो जाने कहां चला गया।‘
‘‘आपने कभी इस बारे में कुछ पूछा नहीं। मैंने भाभू से पूछा।
कहने लगी, बताते कहां है, ज्यादा जोर देते हैं, तो खारी दीठ से सामने देखते रहते हैं, या फिर बोलेंगे तो फकत् इत्ती-सी बात कि ‘तुम्हें क्या करना है - दूसरा कोई काम नहीं है घर में और हमें चुप रह जाना पड़ता है।

क्या कारण हो सकता है, मैं दिन भर इसी बात पर सोच-विचार करता रहा। दिन में तिबारी एकदम सूनी पड़ी थी। जीसा घर में कहीं नहीं थे, शायद अपनी अफीम की खुराक के लिए किसी ठेकेदार की ओर गये होंगे! पूछने पर, भाभू ने यही बताया था।
‘‘तो किसी को साथ ले जाते, या किसी को भेजकर मंगवा लेते! तबियत ठीक न हो तो यों अकेले भेजना तो ठीक बात नहीं है ना।
‘‘किसी को बताएं तब न! यह तो मुकने रबारी ने थोड़ी देर पहले खबर दी थी कि आज बाबोसा सवेरे ही मूंडसर के रास्ते जा रहे थे। मूंडसर में जगमाल और दो-एक जने अफीम का धंधा करते हैं। यों हरेक पर विश्वास भी तो नहीं किया जा सकता। लोग बताते हैं कि आजकाल अफीम पर सरकार की ओर से एकदम पाबंदी हो रखी है। मैंने तो तेरे जीसा को बहुत समझाया कि एक बार हिम्मत करके इससे जान छुड़ाओ न! बिना बात इत्ती-सी किरची के लिये ना-कुछ लोगां की गरज़ें करनी पड़ती हैं। भाभू ने अपनी चिन्ता प्रकट कर दी।

‘‘यह व्यसन ऐसा ही होता है, भाभू! और वह इस अवस्था में छूटना तो और भी मुकिल है। एकबार शुरू हो जाने के बाद तो अच्छे-भले जवानों का धैर्य जवाब दे जाता है, इन्होंने तो सत्तर पार कर लिये हैं! मेरे साथ पढ़ने वाले कई लड़के-लड़कियों में मैंने यह ऐब देखा है, लेकिन जीसा की बात दूसरी है। वे इतने बरसों से सेवन करने के बाद भी इसके वश में नहीं हैं।

‘‘अरे बेटा, ये तो मुंह के ही नहीं लगाते थे। ये तो शिवदान के बिखे में टूट गये! इतने जोध-जवान बेटे का यों अकस्मात् उठ जाना, क्या कोई सही जा सकने वाली बात है..औलाद बूढ़े मां-बाप के जीने का आधार-सहारा होती है.... और जब यह सहारा ही हाथ से छिन जाए...तो जीना बोझ हो जाता है... यह बात कहते हुए भाभू का गला भर आया और आंखों से टलक-टलक आंसुओं की धारा-सी छूट गई।
शिवदानसिंह मेरे बड़े भाई थे। वे बी.एस.एफ. में सूबेदार-मेजर थे। तीन बरस पहले पड़ौसी मुल्क से झगड़ा हुआ तब वे अखनूर के हल्के में कहीं मोर्चे पर थे। उनकी टुकड़ी ने मोर्चा जीत भी लिया था, पर कौन जाने ईश्वर की क्या मर्जी थी, जब गोली-बारी एकदम बंद हो गई, तब वे बंकर से बाहर फकत् यह देखने आए थे कि कोई दुश्मन नजदीक-दूर तो नहीं है, और उसी वक्त किसी घायल दुश्मन ने तक कर ऐसा निशाना साधा कि उसकी गोली शिवदान की छाती को आर-पार बींध गई। फिर तो उसके साथियों ने उस अधमरे दुश्मन को गोलियों से छलनी कर दिया, लेकिन उससे शिवदान तो वापस सीधे नहीं हो पाए। दो दिन बाद काठ में बंधी उनकी मिट्टी ही घरवालों के पास पहुंची और तब से जीसा तो जैसे जीते-जी मरे-समान हो गये। उनके सीने में ऐसी बूज आई कि गले से चीख भी नहीं निकल पाई। भाभू और भाभीसा तो बेहाल थे ही, उन्हें संभालने में हम सभी का जैसे धैर्य ही जवाब दे गया था। भाभी को तो तीन दिन बाद जाते होश आया, लेकिन एक बार होश आने के बाद उन्होंने जल्दी ही अपने को संभाल लिया और खुद को इस असह्य वेदना का मुकाबला करने के लिए तैयार भी कर लिया। धन्य है उनकी हिम्मत को! उन्होंने अपनी चिन्ता छोड़, मुझे बुलाकर यह हिदायत दी कि नरपत बना, आप मेरी चिन्ता छोड़ें, आप जीसा का ध्यान रक्खें, उनका आपके भाई पर बहुत जीव था! वे अपनी तकलीफ किसी को नहीं बताएंगे! उस दिन से मेरी नज़र में भाभी की इज्जत बहुत बढ़ गई थी।
.......
जीसा ने अपनी इकहत्तर वर्षों की उम्र में कठिन समय देखा है। खुद बदलते जमाने और दुनियादारी की अच्छी सूझ-समझ रखते हैं। हो सकता है कि उनका वक्त थोड़ा दूसरा रहा हो, लेकिन फकत् चारणों के घर में जन्म लेने मात्र से उन्हें अपने हलके या समाज में ज्यादा मान-सम्मान या सुविधा मिल गई हो, उस बात की तो उन्होंने कभी आस भी नहीं रखी। लोकहित और न्याय की बात करनेवाले एक नेक इंसान के रूप में सींथळ और आस-पास के गांवों में पाबूदानसिंह का नाम किसी से अजाना नहीं था। अपने जमाने की पौशाल में कुछ पढ़ाई भी कर रखी थी। घर में कथा-भागवत, माताजी की चिरजें, तुलसीदासजी की रामायण और कितनी ही पौराणिक गाथाएं उन्हें कंठस्थ थीं। लोग उनसे सुनने के लिए नजदीक-दूर के कई गांवों से आते थे।
उनके पुरखों ने न कभी किसी दरबार में हाजरी भरी और न किसी की जागीरी में कोई ओहदा ही संभाला। उल्टे जागीरी जुल्म के विरोध में अपने भाई-संबंधियों से लड़ते ही रहे। मेरे दादाजी कभी गंगा रिसाले में अपनी टुकड़ी के मुखिया हुआ करते थे, उन्हीं के नाम आई यह सौ बीघा जमीन है, जो पिछले वर्षों में परिवार की जीवारी का आधार रही है।

हाथ के काम के लेखे तो मेरी भाभू भी कम नहीं थीं। वे तो जीसा से भी दो कदम आगे रहतीं। घर में चार-चार दूध देनेवाली गायें थीं। उन गाय-बछड़ों और ढोर-डांगरों की पूरी सार-संभाळ उनके ही जिम्मे रहती थी। फकत् एक गोरधन राईका और उसकी घरवाली उनके घर-बाहर के काम में थोड़ा हाथ बंटा देते, जो गरीब थे और उनकी ही शरण-सहारे से अपना पेट पालते थे, लेकिन यह धीणा और धान किस तरह अंवेरना है, यह देखने का काम तो भाभू का ही होता था। आगे चलकर भाभी ने भी कुछ अपना आपा और मन मिला दिया था। इस बार भाभू से बात करते हुए मुझे इस बात का अचंभा हुआ कि उन्होंने एक बार भी किसी बात में भाभी का जिक्र नहीं किया। यह बात मुझे पूछने पर ही पता लगी कि वे अपने पीहर जयपुर गई हुई हैं, उन्हें सरकार की तरफ से शहीद की विधवा के नाम पर कोई बडी इमदाद मिलने वाली है।

फौज में एक सिपाही या हवलदार की कितनी-सी वक़त होती है, यह बात खुद घर के बड़े बेटे शिवदान ने अपनी उन्नीस बरस की नौकरी में अच्छी तरह से समझ ली थी। बारहवीं पास करने के बाद वे बी.एस.एफ. में एक हवलदार के रूप में भरती हुए थे और इतने बरसों में फकत् सूबेदार-मेजर के ओहदे तक पहुंच पाए थे। जो तो उन्होंने नौकरी में रहते हुए प्राइवेट बी.ए. भी कर ली थी। खुद भाभी भी दसवीं पास थी, लेकिन भाई की हिदायत के कारण घर के किसी काम में पीछे नहीं रहतीं। वे कहतीं, अपने घर और खेत में काम करते किस बात की शर्म या शंका! उनकी दो बेटियां हैं और दोनों अच्छी पढ़ाई कर रही हैं। बड़ी बेटी सुगन को शिवदान ने खुद वनस्थली ले जाकर भर्ती करवा दिया था। सुगन ने पिछले साल सीनियर सेंकेण्ड्री की मेरिट लिस्ट में अपनी जगह बनाई और फिर पी.एम.टी की परीक्षा पास कर मेडिकल में दाखिला लेने में कामयाब रही। उससे छोटी मेघा भी कम नहीं है।
शिवदान का बारहवां बीतने के बाद भाभी के पिता और भाइयों ने बहुत निहौरे किये कि वे उनके साथ पीहर में रहें और दोनों बेटियों को शहर में रखकर पढ़ाएं, लेकिन उस वक्त तो भाभी ने साफ मनाही कर दी थी। कहा,‘’बाबोसा, यह मेरा अपना घर है और ये सास-ससुर ही अब मेरे मां-बाप हैं, मैं इन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।‘ जीसा को जब इस बात का पता लगा तो उन्हें अपनी इस बहू-बेटी पर बहुत गर्व हुआ और पहली बार उनकी आंखों में आंसू की दो बूंदें दिखाई दीं।

असल में शिवदान पर जीसा की बढ़ती उम्मीदों की एक बड़ी वजह खुद शिवदान की अपनी नयी सोच और घर को उस पुराने ढर्रे से बाहर निकाल लाने की उनकी जिजीविषा थी। गांव में बिजली आते ही उन्होंने सबसे पहले कोशिश करके घर में बिजली लगवाई। खेत की जमीन के नीचे गहराई में अथाह पानी था, उन्होंने सरकार और बैंक से मदद लेकर गांव में सबसे पहले अपने खेत में ट्यूब-वैल खुदवाया और खेती के लिए नये साधन-तरीके अपनाए। उन्हें छुट्टी भले ही कम मिलती हो, लेकिन दूर बैठे ही वे घर की व्यवस्था सुधारने में पूरी रुचि लेते थे। नये साधनों और तकनीक के कारण खेती की उपज भी चौगुनी हो गई। खुद शिवदान नौकरी से रिटायरमेंट लेकर घर की व्यवस्था संभालने के लिए आने के बारे में सोच रहे थे और इसी की खातिर उन्होंने अपने परिवार को गांव में ही बनाए रखा। खुद भाभी ने भी अपने पति की इस योजना को खूब बढ़ावा दिया और उनकी गैर-मौजूदगी में वे सारी जिम्मेदारियां निभाने को तैयार रहतीं, जो इस बदलाव के लिए जरूरी थीं।

घर की माली हालत में रातों-रात तब्दीली आ गई। खुद मुझे भी बड़े शहर में रहकर अपनी सी.ए. की पढ़ाई करते हुए कभी तंगी महसूस नहीं हुई। वे कोई मैनेजमेंट का कोर्स किये हुए आदमी नहीं थे, लेकिन उनकी व्यावहारिक बुद्धि अच्छे-अच्छे मैनेजमेंट किये हुओं को पीछे छोड़ देती। खुद मेरी पढ़ाई के खर्चे पर भी उनकी पूरी नज़र रहती। उन्हें भरम में रखकर कोई फिजूल-खर्ची कर लेना असंभव था। उनकी इच्छा थी कि मैं किसी बड़ी कंपनी में चार्टेड अकाउण्टेंट बनूं। इस मामले में जीसा की राय शुरू से ही अलग थी। वे कहते थे कि मैं भले सी.ए. करूं या एम.बी.ए., कोई सरकारी या प्राइवेट नौकरी की तजवीज करने की बजाय यदि अपनी खेती या घर के धंधे में रुचि लूं तो वह किसी भी नौकरी से ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। लेकिन मुझे भाई की राय ही ठीक लगती थी।
पिछले दो वर्षों में मैंने खूब मेहनत की थी और यह शायद उसी का नतीजा था कि एक भी साल बेकार गंवाए बिना मैंने सी.ए. की डिग्री समय पर हासिल कर ली। पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद कई जगह आवेदन-पत्र भिजवाये। कुछ बाहरी कंपनियों और बड़े बैंकों की मांग के अनुसार अपना बायोडेटा भेजकर इंतजार करता रहा कि कहीं से कोई बुलावा आयेगा। पहली कोशिश तो यही थी कि अपने ही आस-पास के किसी शहर में मन-रुचि का काम मिल जाए, तो घर से ज्यादा दूर जाने की नौबत न आए।
सी.ए. करने के बाद जब तक दूसरे काम की व्यवस्था नहीं हो गई, मैं बीकानेर की उसी कंपनी में बराबर काम करता रहा, जिसमें काम करते हुए मैंने अपनी शिक्षा पूरी की थी। यों कंपनी की साख अच्छी थी और देश के दूसरे शहरों में भी इसकी अपनी शाखाएं थी। उसके मालिक तो यहीं के निवासी थे, लेकिन कंपनी का हैड आफिस उन्होंने मुंबई में ही बना रक्खा था, जहां मैं पहले भी कई बार जा चुका था। मैं कंपनी के नये प्रोजेक्ट पर काम कर ही रहा था, तभी एक दिन मुझे मुंबई से इंटरव्यू के लिए बुलावा आ गया। कंपनी से तीन-चार दिन का अवकाश लेकर मैं मुंबई निकल गया।


इंटरव्यू अच्छा ही हुआ था, लेकिन मैं पूरी तरह आश्वस्त नहीं था। पांचवें दिन मैं वापस अपने शहर लौट आया और वापस कंपनी के काम में लग गया। महीना पूरा होने से पहले मुंबई से भी बुलावा आ गया। बुलावे पर जाने से पहले मुझे जीसा और भाभू से इजाजत लेनी जरूरी थी, क्योंकि शिवदान की अकाल मृत्यु के बाद जीसा ने अपनी सारी उम्मीदें और जिम्मेदारियां मुझ पर छोड़ रखी थीं और उनसे बिना पूछे कोई कदम उठाना तो और बड़ी गलती होती। मैं उन्हें यह समझाना चाहता था कि बैंक की यह नौकरी, जीवन में आगे बढ़ने का एक अच्छा मौका है, खुद भाई की भी यही राय थी कि मैं किसी बडी कंपनी से जुड़कर काम करूं।
‘‘जीसा, अपने लिए यह खुशी की बात है कि मुझे मुंबई से एक बड़ी बैंक में काम करने के लिए बुलावा आया है.... मैं आपकी इजाजत लेने के लिए आया हूं...! उन्होंने मुझे अगले हफ्ते ही मुंबई आने के लिए कहा है... आप कहें तो मैं कल ही उन्हें अपनी मंजूरी भेज दूं... आखिर मैंने ही हिम्मत जुटा कर जीसा के सामने अपनी इच्छा प्रकट कर दी। जीसा बिना कोई उत्तर दिये अलाव से उठती ज्वालाओं की ओर देखते रहे... उन्होंने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, फकत् एकबार मेरी ओर देखा और वापस नज़र नीची कर ली...वे शायद उत्तर तलाश कर रहे थे... किसी गहरी चिन्ता में डूबे हुए!

उन्हें यों चुप और गुमसुम बैठे देखकर मुझे चिन्ता भी हो रही थी। फिर यह भी लगा कि नौकरी के लिए इजाजत मांगना तो इतनी चिन्ता का कारण नहीं होना चाहिए, मैं खुद एकबारगी चिन्ता में पड़ गया और विचार करने लगा कि ऐसा क्या कारण हो सकता है, अगर बिना पूछे चला जाता तो जीसा और घरवालों का उम्र भर का उलाहना रह जाता और पूछ रहा हूं तो यह हाल है! मुझे अपने सामने एक-टक निहारते देखकर वे बोले, ‘बुलावा आ गया, वह तो बड़ी बात है, लेकिन यहां के घर-परिवार के बारे में क्या सोचा है, इसे किसके भरोसै छोड़ने का इरादा है... मेरी उम्र इकहत्तर पार कर गई है...इसी के आस-पास अपनी मां की जान लो... अब कोई दुबारा तो जवान होने से रहे... पीछे रही तुम्हारी भाभी और उनकी दोनों बेटियां, तो उनकी रखवाली और संरक्षण मुझे तो तुम्हारे ही जिम्मे दीखती है, अब विचार कर लो कि तुम्हें क्या करना चाहिए... जीसा ने संजीदा स्वर में अपनी समझ से पूरी बात बता दी थी।

अपने तर्क को और वजनी बनाते हुए उन्होंने फिर आगे बात बढ़ाई, ‘मुझे तो यह समझा दो कि इस घर में क्या आज तुम्हें अपने जिम्मे कोई काम नहीं दीखता कि सैकड़ों कोस दूर जाने को तैयार हो गये... यदि नौकरी का उद्देश्य ऊंची कमाई करना है, तो वह भी हिसाब लगाकर देख लो कि क्या कोई नौकरी तुम्हें इस घर के काम से बढ़कर कमाई दे सकती है। हो सकता है कि बडे़ शहर में रहने की कुछ नयी सुख-सुविधाएं मिल जाएं... लेकिन अपने पूर्वजों की बरसों की कमाई और साख से बनाया हुआ यह घर क्या तुम्हें इतना सुकून नहीं देता कि उसकी अनदेखी करके उन सुख-सुविधाओं को ज्यादा महत्व दे रहे हो... थोड़ा सोच-विचार कर फैसला करें नरपत बना, क्योंकि अब आप बड़े हो, बालिग हो गये हो और आनेवाले दिनों में इस घर के मुखिया भी होंगे... मैं तो आज ही तुमको यह जिम्मेदारी सौंपने को तैयार बैठा हूं... इतनी बात कहकर वे चुप हो गये, जैसे अब और कुछ कहने को बाकी न रहा हो। उन्होंने मेरी चेतना और मर्म पर पूरा दबाव बनाया था और अपने मन निश्चिंत हो गये थे कि उनकी इस सोच का मेरे पास कोई तोड़ नहीं हो सकता...!
मुझे अचरज हुआ कि जीसा बदले हुए हालात से परिचित होते हुए भी, जाने क्यों अनजान-से बन रहे थे। वे जानते थे कि शिवदान के स्वर्गवास के बाद इन तीन वर्षों में भाभी की सोच में काफी फर्क आ गया था और वह मुझे तो स्वाभाविक ही लग रहा था। आने वाले दिनों में उनकी दोनों बेटियां अपना भविष्य किसी बड़े शहर के आश्रय में ही खोजने में लगी हुई हैं... खुद भाभी को जयपुर में शहीद विधवा के नाम पर एक पेट्राल पंप चलाने की सुविधा मिलने वाली है...।
मैंने भाभू से बात की तो उन्होंने तो इसे हंसकर ही टाल दिया। खुद भाभू, जो कभी बहुत-सी दुधारू गायों की मालकिन हुआ करती थीं, अब एक गाय रखकर ही संतुष्ट हैं और इतनी ही घर की जरूरत मानती हैं। पिछले तीन वर्षों से खेती हिस्सेदारी के आधार पर हो रही है... खुद जीसा का यही सोच है कि अब इतनी ही पार पड़ जाए तो बहुत है! इससे अधिक न घर की जरूरत है और न सम्हालनी ही संभव। खुद लोगों को कहते फिरते हैं कि यदि नरपत को इतनी ऊंची पढ़ाई करवाई है, तो कोई एक जगह बांधकर बिठाने के लिए थोड़े ही करवाई है। मैं यह बात अच्छी तरह समझता हूं कि आज सभी अपने मन की उलझन में निपट अकेले हैं, अपने सवालों के उत्तर से वे अनजान नहीं हैं, लेकिन आश्चर्य की बात है कि वे आज मुझसे ही इसका उत्तर और निराकरण मांग रहे हैं।
अपनी बात पर और बल देते हुए वे बोले, ‘मुझे तो यह बताओ नरपत बना कि कल को तुम्हारी शादी होगी, दुल्हन आएगी... दीखती बात है कि उसे तुम अपने साथ ही रखना पसंद करोगे... यह भी हो सकता है कि जहां काम लगो, वहीं किसी के साथ घर बसाने का संयोग बना लो....इस लिहाज से मुझे नहीं लगता कि तुम्हें इस घर में या इस हलके में खुद के टिकाव की कोई गुंजाइश दीखती हो।‘
मैं अपनी जुबान पर आती यह बात कहना चाहता था कि ‘जीसा, पंछी अपनी उड़ान के जिस मुकाम पर किसी डाल पर अपना रातवासा लेता है, वह एक तरह से उसका घर ही हुआ करता है और उसे इतनी छूट तो देनी ही पड़ती है कि वह अपनी पहचान कायम रख सके। इनसान की यह खासियत मानी जाती है कि वह भले ही दुनिया में कहीं किसी कोने में रहे-जीए, वक्त आने पर वह अपनी ज़मीन और जड़ जरूर ढूंढ़ लेता है। मेरे भीतर आपके और अपने बड़ों के दिये हुए ये संस्कार आज भी कायम हैं, इसलिए उन्हें अपनी सीख और संस्कारों पर थोड़ा तो भरोसा रखना ही चाहिए। लेकिन उन्हें ऐसा उत्तर देना शायद छोटे-मुंह बड़ी बात होती, इसलिए प्रत्यक्ष में तो मैं कुछ भी नहीं कह सका।
मैं जानता था कि उनके सवालों के उत्तर उन्हीं के धरातल पर खड़े होकर देना आसान नहीं था। इसी उलझन में एक-बारगी मैं अपने आप में अकेला-सा हो गया। जीसा, भाभू और भाभीसा की अपनी उलझनें थीं। खुद मुझे ही इन सारी बातों पर नये सिरे से विचार करना था और वह भी किसी के मन को बिना कोई ठेस लगाए। घर-परिवार का अहित किये बिना, ऐसा निराकरण खोजना था, जो उस पुश्तैनी घर का और मेरी अपनी जिन्दगी का, दोनों का मान रख सके...

5 comments:

  1. बहुत सशक्त अभिव्यक्ति है ..घर और परिवार में गुंथा व्यक्ति जिसके पास संस्कारों की थाती है जिसे सब सहेजना भी है उसे अपनी राह भी बनानी है ....मन को छू गयी कहानी इतनी अच्छी कहानी पढाने के लिए धन्यवाद .

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  2. कहानी के शिल्प, कथ्य और भाषा पर कुछ कहने का सामर्थ्य नहीं है, हां आपका आभार व्यक्त करना चाहता हूं इस कहानी को हम तक पहुंचाने के लिये.

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  3. बहुत सुन्दर कहानी हैशैली कमाल की है बधाई

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  4. बेहतरीन गजलों से परिचय कराने के लिए आभार!

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