Sunday 27 September 2009

इस सादगी पे बलि बलि जाएं...




जब से दुनिया में मंदी आई है लोग सादा जीवन अपनाने की बात करने लगे हैं। लेकिन सादगी भरा जीवन कोई नई बात नहीं है, भारतीय परंपरा में ऋषि-मुनियों के जमाने से सादा जीवन उच्च विचार की बात चलती आई है। प्रत्येक मनुष्य को अपनी जिंदगी अपने अलग ढंग से जीने का हक है। हर इंसान अपनी रूचियों के कारण सादा अथवा फैशनपरस्त जीवन शैली अपनाता है। कोई चाहकर भी उच्च जीवन शैली नहीं अपना सकता तो कोई सामर्थ्य के बावजूद बेहद सादगी भरा जीवन जीता है। बहुत से ऐसे लोग भी होते हैं जो किसी महापुरूष के विचारों से प्रभावित होकर सादा जीवन अपनाने लगते हैं। कुल मिलाकर हर व्यक्ति का अपना स्टाइल स्टेटमेंट होता है, जिससे उसकी जीवनशैली बनती है। कुछ लोग वक्त के हिसाब से अपने को बदल लेते हैं और उसी के अनुरूप जीते हैं। मनुष्य का मन कभी स्थिर नहीं रहता इसलिए सामान्य तौर पर अपने परिवार, मित्र-मण्डली या किसी प्रिय के कहने पर वो खुद को बदल भी लेता है और कई बार अपनी जिद के चलते खुद को बदलने से इन्कार भी कर देता है। सादा जीवन का मतलब सिर्फ कपड़ों के चुनाव, खान-पान और यात्रा के साधनों में कमखर्ची नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक आदर्श भी है। बहुत से लोगों को अपने पेशे की विवशताओं के कारण एक खास किस्म की जीवनशैली सार्वजनिक जीवन में अपनानी पड़ सकती है। ऐसे लोग व्‍यक्तिगत जीवन में अपने आदर्श जीवन को जीने की कोशिश करते हैं। इस तरह दोहरा जीवन जीते हैं।



सादगी के आयाम

सादा जीवन मानव जाति के लिए एक जीवन मूल्य है। इसे तेरहवीं सदी के संत थॉमस एक्विनास ने इस तरह परिभाषित किया है कि जब मनुष्य को कोई लक्ष्य एक ही साधन से प्राप्त हो सकता है तो उसके लिए बहुत से साधनों का इस्ते‍माल करना बेकार की बात है, क्योंकि कुदरत ने एक चीज प्राप्त करने के लिए एक ही साधन बनाया है। इस बात को इस तरह समझा जा सकता है कि व्यक्ति को स्वस्थ जीवन के लिए खाद्य और पेय पदार्थों की जरूरत होती है, अब इसके लिए न्यूनतम आवश्यकता देश-काल के अनुसार भिन्न -भिन्न हो सकती हैं। लेकिन सिर्फ पेट भरने के लिए हजारों खर्च कर देना कहां तक उचित है। यह फिजूलखर्ची तो है ही, बल्कि एक प्रकार से देखा जाए तो उपलब्ध संसाधनों की बर्बादी भी है। इसी तरह जब मनुष्य का काम साधारण कपड़ों के दो-चार जोड़ों से तन ढंकने से चल सकता है तो नित नए महंगे कपड़े पहनना और खरीदना बर्बादी है। एक सामान्य वाहन से अगर घर का काम चल सकता है तो परिवार के प्रत्येाक सदस्य के लिए नित नए वाहन खरीदना उचित नहीं कहा जा सकता। सादगी भरा जीवन गरीबी की नहीं सौम्यता और सहज जीवन जीने की शैली है, जिसका निहितार्थ यह है कि व्‍यक्ति इस पृथ्वी पर उपलब्ध संसाधनों का अपनी आवश्यकताओं से अधिक इस्तेामाल नहीं करेगा और शेष संसाधन उन लोगों के लिए छोड़ देगा, जिनके पास जीने के लिए अनिवार्य संसाधन भी उपलब्ध नहीं हैं।

सादगी का फैशन

आजकल सादगी का फैशन भी चल पड़ा है। फैशन एक प्रकार की प्रतिस्पंर्धा ही है जिसमें एक दूसरे से बेहतर और अलग दिखने की कोशिश की जाती है। आपने बहुत से हाई प्रोफाइल लोगों को कुछ खास मौकों पर सादा सूती या खादी के कपड़ों में देखा होगा। ये लाग आम तौर पर ऐसा नहीं करते, मतलब सादगी उनके लिए फैशन है, जिससे आम लोगों की नजर में वे इस सादगी की वजह से ही खास हो जाते हैं। फैशन के इस दौर में कभी हेय समझी जाने वाली चीजें भी नए फैशन के रूप में चल पड़ी हैं। जैसे आदिवासी और जनजातीय पहनावा और आभूषण आज की हाई क्लास सोसायटी का फैशन हो गया है। ग्रामीण समाज में दैनंदिन उपयोग की चीजें सजावटी सामान की तरह ड्राइंग रूम की शोभा बन गई हैं। यह सादगी नहीं सादगी का फैशन है जो पहले चीजों से घृणा करता है और खुद अपनाकर उसे एंटीक बना देता है।

सरकार की सादगी बनाम सादगी की राजनीति

इन दिनों केंद्र से लेकर राज्य सरकारें सादगी का गुणगान कर रही हैं। यह कितनी बेतुकी बात है कि सरकार और राजनेता सादगी की बात कर रहे हैं। उन्हें तो हर वक्त ही सादगी भरा जीवन अपनाना चाहिए, क्योंकि सरकारी फिजूलखर्ची तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में कभी भी जायज नहीं ठहराई जा सकती। इन दिनों चल रही सरकारी सादगी दरअसल एक प्रकार का नाटक है, जिसमें जनता के बीच संवेदनशील सरकार का भ्रम पैदा किया जा रहा है। इस प्रकार सरकार जनता के उन सवालों को टालने की कोशिश में कामयाब हो जाती है, जिनसे उसे हालिया दौर में संघर्ष करना पड़ सकता है। मसलन बैंक-बीमा जैसे कई उद्योगों में नए वेतनमानों के मुद्दे को सरकार मंदी के नाम पर सादगी की आड़ में टाल सकती है और इससे जनता के बीच एक किस्म की लोकप्रियता हासिल कर सकती है। राजनीति में सादगी एक जबर्दस्ती लोकप्रियतावादी फैशन है, जिसमें जनता को आकर्षित करने के तमाम प्रयत्न किए जाते हैं। और राजनीति में सादगी का फैशन नया नहीं है, यह तो पंडित नेहरू के जमाने से चला आ रहा है। उस वक्त लोहिया जी ने हिसाब लगाकर बताया था कि एक दिन में नेहरू जी पर कितना खर्च होता है। आदिवासी और ग्रामीण जनता के बीच उनके जैसे कपड़े पहनना भी राजनीति का फैशन है, इससे नेताओं को खूब लोकप्रियता हासिल होती है।

सादगी का दर्शन बनाम सादगी का इतिहास

लिखित इतिहास में सादगी का पहला उदाहरण गौतम बुद्ध के काल में मिलता है। महात्मा बुद्ध ने अपने अपने अनुयायियों से अपनी आवश्यकताओं को न्यूतनतम करने के लिए कहा था। उन्होंने स्वयं अपनी जरूरतों को कम कर दिया था। बुद्ध ने अपने श्रमण में भिक्षुकों को कहा था कि भिक्षा में अगर एक दिन की आवश्यकता जितना मिल जाए तो उसके बाद भीख नहीं मांगनी चाहिए और एक भिक्षुक को निरंतर अपनी आवश्यकताएं कम करते जाना चाहिए। इसके बाद महावीर स्वामी ने भी सादगी पर जोर दिया था। बुद्ध-महावीर से लेकर महात्मा गांधी जैसे अनेक महापुरूषों ने मनुष्य को अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर सादा जीवन जीने का उपदेश दिया। गांधी जी का जीवन तो आज भी सादगी का जबर्दस्त उदाहरण है। सादगी पर उनके जैसा चिंतन और व्यावहारिक प्रयोग विश्व के लिए अमूल्य धरोहर है। आज भी हजारों-लाखों लोग उनके विचारों से सादगी भरा जीवन जीने के लिए प्रेरित होते हैं। गांधीजी तो आवश्यकता से अधिक किसी भी वस्तु की प्राप्ति या उपभोग को एक प्रकार की हिंसा ही मानते थे। उनकी मान्‍यता थी कि कुदरत प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति तो कर सकती है लेकिन लोभ-लालच को पूरा नहीं कर सकती। इस तरह से देखा जाए तो उच्च जीवन शैली एक प्रकार से लोभ और लालच की संस्‍कृति है, जो प्रकृतिविरोधी और मानवताविरोधी है।

सादगी की तकनीकी और अर्थशास्त्र

सादगी को लेकर दुनिया भर में आधुनिक तकनीकी विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री बरसों से खासकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चिंतन करते आए हैं और उनका निष्कर्ष है कि आधुनिक तकनीक का अगर उचित ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो विश्व में व्याप्त बहुत सी समस्या‍एं सुलझाई जा सकती हैं। इस दृष्टि से ब्रिटिश अर्थशास्त्री ई.एफ. शुमाखर की विश्वप्रसिद्ध किताब ‘स्मा‍ल इज़ ब्यू्टीफुल’ ने दुनिया भर के सादगीपसंद लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इस पुस्तक में वैश्वीकरण के जवाब में एक वैकल्पिक किस्म की उत्पादन और वितरण की व्यावहारिक और स्थायी व्यवस्था प्रस्तावित की गई है, जिसे अपनाकर सभी राष्ट्र अपने उपलब्ध संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करते हुए विकास कर सकते हैं। यह पुस्तक हिंदी में भी प्रकाशित हो चुकी है। इसी प्रकार ग्लोबल वार्मिंग के बढते खतरे को लेकर दुनिया के हजारों तकनीकी विशेषज्ञों ने सादगी भरे वैकल्पिक संसाधनों और तकनीक की वकालत की है, जिसके अनुसार इंटरनेट जैसे संचार साधनों का अधिकाधिक इस्तेमाल कर संवाद को सहज सुगम और तीव्र ही नहीं बल्कि पर्यावरण हितैषी भी बनाया जा सकता है। इससे कागज का इस्तेामाल कम होगा और हजारों-लाखों पेड़ बचाए जा सकेंगे। ‘फूड माइल्स‘ नामक एक आंदोलन के अनुसार खेत से थाली तक खाद्यान्न को जितनी दूरी तय करनी पड़ती है, उसे स्थानीय उत्पादन से कम करके करोड़ों बैरल पेट्रोलियम उत्पाद बचाए जा सकते हैं। स्वैच्छिक सादगी के प्रवक्ता कहते हैं कि विज्ञापन के माध्यम से उपभोक्ता‍वाद का प्रचार-प्रसार बिल्कुल गलत है। वे तो टेलीविजन के बजाय सामुदायिक टीवी और रेडियो की बात करते हैं।

आजकल लोगों के पास समय की कमी रहती है, इसलिए सादगी भरे जीवन का मतलब यह नहीं कि समय की बर्बादी की जाए। महान पत्रकार स्व. राजेंद्र माथुर बेहद सादगीपसंद थे। वे समय बचाने के लिए हवाई जहाज से यात्रा करते थे किंतु अपने खादी के झोले में महज एक जोड़ी कपड़े और किताब रखते थे। सादगी का असल मतलब यह है कि सामान्य सहज रूप से जिंदगी की गाड़ी चलती रहे और अपने किसी भी किस्म के आचरण से समुदाय और प्रकृति को कोई नुकसान नहीं पहुंचे।


1 comment:

  1. सादगी के फैशन और राजनीती से बहुत अलग है सादगी की तकनीक और अर्थशास्त्र ...सादगी रहन सहन के साथ विचारों में भी हो ताकि जीवन सरल और सहज जिया जा सके ...सादगी के सभी आयामों को प्रस्तुत करते इस लेख के लिए बहुत आभार ...
    दशहरे की हार्दिक शुभकामनायें ..!!

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