कई बरस पहले उड़ीसा गया था। उस वक्त धौलगिरि और कोणार्क देखकर कुछ कविताएं लिखी थीं। इतने साल गुजर गए हैं, लेकिन ये कविताएं मुझे आज भी अच्छी लगती हैं। अपने पाठक-मित्रों के लिए आज ये दो कविताएं प्रस्तुत कर रहा हूं।
एक
जहाँ लड़ा गया था युद्ध
वहाँ खेत खड़े हैं धान के
और काजू का लहलहाता जंगल
युद्ध भूमि क्या हमेशा
उपजाऊ ही होती है
या धरती चुकाती है
पिये गये रक्त का क़र्ज़ ?
दो
इतनी शांत है दया*
गोया अभी तक याद हो
गौतम से जो आया था
अशोक तक शान्ति का उपदेश
इसी जल में बहा होगा लाखों सैनिकों का रक्त
शान्त दया के सीने में अभी भी दबे होंगे
लाखों सैनिकों के कवच-कुण्डल अस्त्र-शस्त्र
एक नदी की गवाही क्या काफ़ी नहीं है
रक्तपात के ख़िलाफ़
दया से पूछो
नरसंहार देखकर
कितना रोयी होगी
पछाड़ें मार-मार
धौलगिरि की चट्टानों से
राम ने ली सरयू में जल-समाधि
अशोक ने लिया शांतिव्रत दया की साक्षी में
नदियों ने ही बचाया है
इंसान को हैवानियत से
नदियों ने ही बनाया है
पुरुष को पुरुषोत्तम
नदियों के इस बचाने और बनाने में ही छिपा है
नीर-क्षीर विवेक ॰
*दया - नदी का नाम
एक
जहाँ लड़ा गया था युद्ध
वहाँ खेत खड़े हैं धान के
और काजू का लहलहाता जंगल
युद्ध भूमि क्या हमेशा
उपजाऊ ही होती है
या धरती चुकाती है
पिये गये रक्त का क़र्ज़ ?
दो
इतनी शांत है दया*
गोया अभी तक याद हो
गौतम से जो आया था
अशोक तक शान्ति का उपदेश
इसी जल में बहा होगा लाखों सैनिकों का रक्त
शान्त दया के सीने में अभी भी दबे होंगे
लाखों सैनिकों के कवच-कुण्डल अस्त्र-शस्त्र
एक नदी की गवाही क्या काफ़ी नहीं है
रक्तपात के ख़िलाफ़
दया से पूछो
नरसंहार देखकर
कितना रोयी होगी
पछाड़ें मार-मार
धौलगिरि की चट्टानों से
राम ने ली सरयू में जल-समाधि
अशोक ने लिया शांतिव्रत दया की साक्षी में
नदियों ने ही बचाया है
इंसान को हैवानियत से
नदियों ने ही बनाया है
पुरुष को पुरुषोत्तम
नदियों के इस बचाने और बनाने में ही छिपा है
नीर-क्षीर विवेक ॰
*दया - नदी का नाम

