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Sunday, 20 December 2009

गुनाहों का देवता: 50 बरस: सौ संस्करण



हिंदी में अगर साहित्य की लोकप्रिय किताबों की बात की जाए तो धर्मवीर भारती का उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ शीर्ष दस पुस्तकों में होगा। भारत की विभिन्न भाषाओं में इसके सौ के करीब संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और युवा वर्ग में आज भी यह खासी लोकप्रिय किताब है। इस लोकप्रियता का कारण अगर इसकी बेहद रोमांटिक प्रेम कहानी है तो इसके बरक्स प्रेम का एक उदात्त और बलिदानी स्वरूप भी है। इस उपन्यास की जितनी लोकप्रियता है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि हिंदी में इससे ज्यादा लोकप्रिय उपन्यास की चर्चा करेंगे तो एक के बाद एक कई नाम आते चले जाएंगे और बावजूद इसके ‘गुनाहों का देवता’ की पसंदगी अपनी जगह कायम रहेगी। इस पसंदगी के कारण जुदा हो सकते है, लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो एक खास वक्त में इसे पसंद करते थे, लेकिन अब यह उन्हें नहीं रूचता। खुद धर्मवीर भारती ही इस बात को कभी नहीं समझ पाए कि इसकी अपार लोकप्रियता के पीछे क्या कारण रहे।

प्रेम का निष्छल रूप उर्फ प्लेटोनिक लव की अवधारणा

जब यह उपन्यास प्रकाशित हुआ तब पूरे देश में आदर्शवाद की जबर्दस्त धूम थी। छठे दशक की किसी भी कला संस्कृति की विधा को ले लीजिए हर तरफ आदर्शवाद ही दिखाई देता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग तुरंत बाद के इस परिदृश्‍य में एक अजीब किस्म का जोश और जुनून था जिसमें बहुत कम लोग थे जो अंग्रेजों से मुक्ति के मोहभंग को यथार्थ में चित्रित कर रहे थे। नेहरूयुगीन आशावाद का एक जोम था, जिसमें पूरा देश बह रहा था। धर्मवीर भारती भी उस परिदृश्‍य के ही एक पात्र और कलाकार थे। वे उससे अलग कैसे रह सकते थे? आजादी के बाद के इस कालखण्ड में जो महत्वपूर्ण किताबें सामने आईं उनमें से अधिकांश में आत्मबलिदान को लेकर एक विचित्र किस्म का व्यामोह था। हर कोई कुरबान होना चाहता था, लेकिन किसी को पता नहीं था कि किस पर कुर्बान होना है। कोई अपनी कला पर कुर्बान था तो कोई अपनी प्रेमिका पर और बाकी सब किसी ना किसी मकसद को लेकर। बलिदानी होने की कामना कोई बुरी बात नहीं, लेकिन दिक्कत तब होती है जब आपके सामने कोई ठोस आदर्श नहीं हो। यह उपन्यास उसी दौर की कथा है जिसमें आदर्श का कोई एक स्वरूप नहीं था और सच्चाई यह भी है कि यथार्थ में आदर्श का कोई एक मानक और ठोस रूप हो भी नहीं सकता। और प्रेम में तो आदर्श वक्त के साथ बहुत तेजी से बदलते रहते हैं। इसलिए भारती जी के युवावस्था में लिखे इस उपन्यास में एक यूटोपियाई प्रेम है। दो युवा दिलों के बीच पनपने वाला अव्यक्त किस्म का प्रेम, जिसे दोनों जानते तो हैं, पर अनजान भी बने रहते हैं और एक दूसरे को बस किसी प्रकार सुखी देखना चाहते हैं। जिसे अंग्रेजी में प्लेटोनिक लव कहते हैं, जिसमें दैहिक संबंध के बिना अपने प्रेम का चरम रूप दो प्रेमी दिखाना चाहते हैं। चंदर और सुधा ऐसे ही प्रेमी हैं।

भोली नायिका का आदर्श बनाम प्रेक्टिकल ईसाई लडकी

सुधा के रूप में धर्मवीर भारती ने एक मासूम, चंचल, शोख और भोली नायिका का आदर्ष चरित्र गढ़ा, जिसके लिए चंदर अपने आपको बलिदान कर देता है। इसके बरक्स भारती जी ने पम्मी के रूप में एक व्यावहारिक युवती का चरित्र रचा, जो एक आजाद खयाल युवती है, लेकिन उसके भी अपने आदर्श हैं। वह भी देह से परे के प्रेम को महत्व देती है। लेकिन चंदर और पम्मी की पहली रोमांटिक मुलाकात को भारती जी इस वाक्य से खत्म कर बहुत कुछ कह देते हैं, जो दृश्‍य में नहीं कहा जा सकता था। ‘पम्मी उठी, वह भी उठा। बांस का मचान हिला। लहरों में हरकत हुई। करोड़ों साल से अलग और पवित्र सितारे हिले, आपस में टकराए और चूर-चूर होकर बिखर गए।’ पम्मी का आदर्श प्रेम और चंदर की पवित्रता क्या इस वाक्य में टूट कर बिखरते नहीं दिखाई देते। अंत में जाकर चंदर सुधा के सामने स्वीकार भी करता है, जब वह कहता है, ‘लेकिन तुमसे एक बात नहीं छिपाउंगा। वह यह कि ऐसे भी क्षण आए हैं जब पम्मी के समर्पण ने मेरे मन की सारी कटुता धो दी है..।’ पम्मी के प्रेम का फलसफा यह है कि आदर्शवादी प्यार की प्रतिक्रिया सेक्स की ही प्यास में होती है। चंदर को लिखे अपने अंतिम पत्र में पम्मी कहती भी है, ‘मैं जानती थी कि हम दोनों के संबंधों में प्रारंभ से इतनी विचित्रताएं थीं कि हम दोनों का संबंध स्थायी नहीं रह सकता था, फिर भी जिन क्षणों में हम दोनों एक ही तूफान में फंस गए थे, वे क्षण मेरे लिए मूल्य निधि रहेंगे।’

मध्यवर्ग की ढुलमुल मानसिकता और प्रेम का यथार्थ

अनिर्णय निम्न मध्य वर्ग की चारित्रिक विशेषता है, जिसे चंदर के व्यक्तित्व में बखूबी देखा जा सकता है। प्रेम में समर्पण और बलिदान में से उसने बलिदान को चुना और इस चुनाव ने दो युवाओं को दूर कर दिया। वह बेहद प्रतिभाशाली है, सुधा के पिता उसे पसंद भी करते हैं, लेकिन दो भिन्न जातियों के बीच कैसे एक संबंध विवाह तक पहुंच सकता है? इस पर सुधा के पिता का मौन बहुत कुछ कह देता है। वे भी तो उसी मध्यवर्गीय मानसिकता के शिकार हैं, जो छठे दशक में एक आदर्श समाज की परिकल्पना में सामाजिक जीवन में कोई बदलाव नहीं चाहता था। यथार्थ में घट रहे प्रेम को अनदेखा कर आदर्शवादी और आज्ञाकारी बना रहना इस उपन्यास के तमाम पात्रों की चारित्रिक विवशता है। प्रेम का आदर्श स्वरूप क्या हो इस पर हर कालखण्ड में बहस चलती रहती है। धर्मवीर भारती के इस उपन्यास की लोकप्रियता के बहुत से कारणों में संभवतः यह सबसे महत्वपूर्ण कारक है, कि इस उपन्यास में युवा मन, प्रेम और सेक्स को लेकर पहली बार इतनी खुलकर चर्चा की गई, जिसमें सामाजिक बंधनों के साथ एक आदर्शवादी प्रेम को ही अंतिम सत्य के तौर पर प्रतिष्ठित किया गया। इसीलिए सामान्य घर-परिवारों में माता-पिता ने इस उपन्यास को अपने अपनी संतानों के लिए वर्जित नहीं किया। मनुष्य को वैसे भी आदर्श अच्छे लगते हैं, इसलिए ‘गुनाहों का देवता’ हर काल में पसंद किया गया और किया जाता रहेगा।


देवदास का शाकाहारी संस्करण

जिन लोगों ने इस उपन्यास को अपनी युवावस्था में पढ़ा, उन्हें बीस-तीस बरस बाद अगर यह उपन्यास पढ़ने को दिया जाए तो अधिकांश को इसमें एक विचित्र बचकानापन नजर आता है। खुद भारती जी भी इसे कलात्मक रूप से अपरिपक्व उपन्यास मानते थे। इसमें बहुत से ऐसे विवरण हैं, जिन्हें अगर हटा दिया जाए तो भी इसकी कथावस्तु पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उपन्यास में कई जगह अति भावुकता है, कोरा आदर्शवाद है। मेरे जैसे कई पाठकों को यह शरत चंद्र के ‘देवदास’ का शाकाहारी संस्करण लगता है। जहां देवदास प्रेम में नाकाम होकर शराब की शरण में जाता है यानी एक भटकाव में जीता है, वहीं चंदर भी अनिर्णय में भटकता है। पारो की तरह सुधा भी अपने प्रेम के लिए कुछ नहीं कर पा सकने के लिए विवश है और अंत में दम तोड़ देती है। चंद्रमुखी की तरह पम्मी चंदर को राह पर लाने की कोशिश में खुद अपने पति के पास चली जाती है। देवदास और चंदर में फर्क इतना है कि देवदास की भांति चंदर आत्महंता बनने के बजाय सुविधाजनक राह पर चलते हुए बिनती के साथ जिंदगी गुजारने के लिए चल देता है। एक फिल्मी किस्म का समापन होता है, जिसमें अंत में सुधा की मृत्यु के बाद सब अपनी राह पर सुखी जीवन जीने के लिए चल पड़ते हैं और इन सबके पास एक आदर्श भरी दुनिया का स्वप्न है।

एक ना बन सकी फिल्म

इस उपन्यास की लोकप्रियता को भुनाने का एक फिल्मी प्रयास भी हुआ। अमिताभ बच्चन और रेखा को लेकर एक फिल्म का निर्माण शुरु हुआ था ‘एक था चंदर एक थी सुधा’ के नाम से। यह हिंदी सिनेमा का दुर्भाग्य ही है कि साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्में प्रायः अधबीच में ही दम तोड़ देती हैं। इस फिल्म के साथ भी यही हुआ, कुछ रीलें बनीं और फिर फिल्म डिब्बे में बंद हो गई। इसकी शूटिंग इलाहाबाद में हुई थी, जिसमें अमिताभ पर इलाहाबाद में साइकिल चलाने के दृश्‍य फिल्माए गए थे। एक पूरा गाना भी रफी की आवाज में रिकार्ड किया गया था, जिसे बाद में अधूरी फिल्मों के टुकड़े जोड़कर बनाई गई ‘फिल्म ही फिल्म’ शीर्षक फिल्म में इस्तेमाल किया गया।

Wednesday, 1 April 2009

पिता के बहाने एक खोजयात्रा

हर बार की तरह मैंने बीते हफ्ते 'डेली न्यूज़' के अपने 'पोथीखाना स्तम्भ में एक नई और शानदार किताब की चर्चा की है। यहाँ पेश है वही स्तम्भ, अपने दोस्तों और प्रिय पाठकों के लिए।
आतिश तासीर सिर्फ जन्म से मुसलमान हैं, वजह यह कि उनकी मां सिख हैं और एक पत्रकार होने के नाते उनकी मुलाकात एक संयोग से एक दिन पाकिस्तान के एक नेता से दिल्ली में होती है। कुछ दिनों की नजदीकियों से आतिश का जन्म होता है और पिता कभी पलटकर मां-बेटे की खैर-खबर नहीं लेते। मां ने बेटे को न केवल मुस्लिम नाम दिया, बल्कि परवरिश भी उसी रूप में करने की कोशिश की। अपने सिख भाई-बहनों के बीच पले-बढ़े आतिश उच्च शिक्षा प्राप्त कर पत्रकार बने और ‘टाइम’ जैसी पत्रिका से जुड़े। आतिश ने अपने पिता को सिर्फ एक तस्वीर में ही देखा था, लेकिन एक मुस्लिम होने के अहसास और उसकी वजह से उठने वाले कई सवाल उन्हें परेशान करने लगे तो उन्होंने इन सवालों के जवाब ढूंढने के लिए एक लंबी यात्रा शुरू की, जो अब एक किताब की शक्ल में सामने है, ‘स्ट्रेंजर टू हिस्ट्री-ए संस जर्नी थ्रू इस्लामिक लैंड्स।’

आतिश की पहली विडम्बना थी कि एक हिंदू भारतीय मां और पाकिस्तानी मुस्लिम पिता की संतान होने से एक बच्चे के मन में कितने किस्म के सवाल पैदा होते हैं। इन सवालों से जूझते हुए आतिश अपने मुस्लिम पाकिस्तानी पिता और उनके देश को जानने के लिए निकल पड़ते हैं। पिता आधुनिक हैं, शराब के शौकीन भी, लेकिन अपने आपको एक ‘सांस्कृतिक मुसलमान’ मानते हैं। आखिर यह सांस्कृतिक मुसलमान क्या है? अगर पूरी दुनिया की मुसलमान कौम एक है तो फिर इतने मुस्लिम देश क्यों हैं और क्यों आपस में लड़ते रहते हैं, क्यों पाकिस्तान से बांग्लादेश का जन्म होता है? ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने के लिए आतिश तासीर ने अपनी यात्रा शुरू की, इस्लाम के लिहाज से ऐतिहासिक और समृद्ध सांस्कृतिक नगर इस्ताम्बूल से। वहां से चलकर मक्का और ईरान होते हुए वे पाकिस्तान पहुंचते हैं, जहां अपने पिता से मिलते हैं। जिस दिन आतिश की पिता से मुलाकात होती है, उसी दिन पेशावर में बेनजीर भुट्टो की हत्या हो जाती है। आतिश के पिता सलमान तासीर हैं, जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेता हैं और पंजाब के गवर्नर हैं। आतिश की साहसी माँ हैं भारत की कद्दावर पत्रकार तवलीन सिंह।
आतिश अपनी किताब में लिखते हैं, ‘मैंने अपने पिता को आखिर खोज ही लिया, क्योंकि मैं उस अंधेरे मैं नहीं जीना चाहता था, जिसमें पिता के प्रति एक अजनबीपन जिंदगी भर बना रहे। अगर मैं अपने पिता से नहीं मिलता तो मैं जिंदगी भर उनके बारे में उन बातों से ही अंदाजा लगाता रहता, जो मेरी मां आस्थापूर्वक उनके बारे में मुझे बताती रही हैं। मुझे महसूस हुआ कि इस सब से तो मैं अपरिचय और अज्ञान के दायरे में बंधा रह जाउंगा। इतिहास को कभी भी आस्था और विशवास के सहारे स्वीकार नहीं किया जा सकता है।’ अपनी यात्रा में आतिश ने न केवल अपने पिता को खोजा, बल्कि उन सवालों से भी दो-चार हुए, जिनको लेकर भारत, पाक और बांग्लादेश के मुसलमान दुनिया के दूसरे मुल्कों के मुसलमानों से अलग सोच रखते हैं और अधिकाँश मुसलमान आधुनिकता को लेकर क्यों डर पाले रहते हैं। इन सवालों के जवाबों के लिए वे मुल्ला, मौलवी से लेकर आम लोगों तक से मिले। जो जवाब मिले वे परस्पर विरोधी और चौंकाने वाले थे।
तुर्की में आतिश की मुलाकात एक ऐसे चित्रकार से होती है, जो पक्का मजहबी मुसलमान है। एक दिन उसका दोस्त कार में रखी कुरान शरीफ उठाकर बाहर फेंक देता है और कहता है कि इसमें कुछ नहीं रखा। दरअसल तुर्की में सरकार पुलिस के बल पर इस्लामी कानून लागू करने के प्रयास करती है और इसीलिए चित्रकार का मित्र कुरान फेंक कर सरकार के प्रति अपनी नफरत जाहिर करता है। आप किसी भी व्यक्ति को जबर्दस्ती मजहबी नहीं बना सकते। इसी तरह तेहरान में आतिश की मुलाकात ऐसे मुसलमानों से होती है, जो गुपचुप तरीके से हरे रामा हरे कृष्णा संप्रदाय से जुड़े हुए हैं। तुर्की के मुसलमान जिस इस्लामी व्यवस्था का ख्वाब देखते हैं, वही ईरान में लागू होती है तो जनता परेशान होती है? इस्लाम और मुसलमानों के इन अंतर्विरोधों को आतिश तासीर ने बहुत खूबसूरती से और दिलचस्प अंदाज में उठाया है।
इस किताब को पढ़ते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आतिश की परवरिश एक सिख परिवार में हुई और आतिश के पिता को लेकर परिवार में जो नाराजगी और नफरत थी, वह बचपन से ही आतिश को घर में होते हुए भी घर से अलग होने के अहसास तले दबाये हुए थी। इसलिए आतिश की बहुत सी संकल्पनाओं से असहमत हुआ जा सकता है। लेकिन दिलचस्प अंतर्विरोधों को जानने, समझने और कुछ इस्लामी देशों की यात्रा करने के लिहाज से किताब जरूर पढ़ी जा सकती है।

Sunday, 22 March 2009

भगत सिंह:क्रांतिपथ की सहयात्री किताबें

शहीदे आजम भगत सिंह को लेकर आम-अवाम में यही धारणा प्रचलित है कि एक नौजवान, देशप्रेम और स्वाधीनता के युवकोचित जोश के चलते आजादी के महासमर में वीरगति को प्राप्त हुआ। धीरे-धीरे ही सही लोगों में भगत सिंह को लेकर बनी-बनाई धारणाएं टूट रही हैं और भगत सिंह से संबंधित साहित्य का इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। खुद भगत सिंह ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ में लिखा है, ‘‘मैं 1925 तक एक रूमानी आदर्शवादी क्रांतिकारी ही था। तब तक हम सिर्फ दूसरों का अनुसरण ही करते थे। अब हमारे कंधों पर ही जिम्मेदारी आ गई...कुछ समय तक तो मुझे भी यही डर लगता रहा कि कहीं हमारा सारा कार्यक्रम ही तो निरर्थकता की ओर नहीं जा रहा। मेरे क्रांतिकारी जीवन में यही एक निर्णायक मोड़ था। मेरे दिलोदिमाग के गलियारों में यही गूंजता रहा ‘पढ़ो’। विरोधियों की तरफ से आने वाले सवालों से मुकाबला के लिए तैयार रहने के लिए पढो। खुद को अपनी राह के विचारों पर दृढ़ रहने के लिए पढ़ो। और फिर मैंने पढना शुरू कर दिया।’’ भगत सिंह के साथी और लाहौर षड़यंत्र केस के सहअभियुक्त जतींद्रनाथ सान्याल ने भगत सिंह की जीवनी में लिखा है कि भगत सिंह जबर्दस्त पढ़े हुए क्रांतिकारी थे और उनके अध्ययन के दायरे में समाजवाद से जुड़ा साहित्य प्रमुख था।
भगतसिंह के जीवन के विभिन्न आयामों की खोज करते हुए शोधकर्ताओं को जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक अपने छोटे से जीवन काल में भगत सिंह ने क्रांतिकारी कामों में भाग लेते हुए सैंकडों पुस्तकें पढीं, जिनमें से तकरीबन तीन सौ किताबों की सूची बना ली गई है। इनमें भारतीय और विदेशी पुस्तकों की संख्या लगभग समान है। जेल में रहते हुए भगतसिंह जो किताबें पढते थे, उनसे उपयोगी और प्रेरक अंश वे एक डायरी में नोट कर लिया करते थे। कुछ वर्ष पूर्व ही यह जेल डायरी प्रकाश में आई और आते ही लोकप्रिय हो गई। इस जेल डायरी का प्रथम प्रकाशन जयपुर के विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी स्व. बी. हूजा ने किया था। भगतसिंह की इस डायरी को पढें तो पता चलता है कि उनकी रूचियों में कितनी विविधता रही। चार्ल्स डिकेंस की ‘पिकविक’ पढते हुए वे डायरी में नोट करते हैं, ‘मनुष्य जाति की सबसे रोमांचक और काबिलेमाफ कमजोरी है-प्रेम’। भगतसिंह की पढी कई किताबों के मामलों में तो यह भी देखा गया कि जिस पुस्तक या लेख से वे अत्यंत प्रभावित होते थे, उसका येनकेन प्रकारेण प्रचार-प्रसार करने में भी पीछे नहीं रहते थे। इसके लिए वे खुद ही अनुवाद भी कर देते थे और अपने साथियों को भी इसके लिए प्रेरित करते थे।
हमारे देखते देखते ही भगतसिंह को एक आदर्श क्रांतिकारी से पूजनीय महापुरूष बना दिया गया। भगतसिंह खुद इसके खिलाफ थे। उन्होंने जार्ज बर्नाड शा की पुस्तक ‘मैन एण्ड सुपरमैन पढते हुए अपनी डायरी में नोट किया, ‘एक मूर्ख राष्ट्र में प्रतिभाशाली व्यक्ति भगवान हो जाता है, हर कोई उसकी पूजा करता है, लेकिन कोई उसकी राह पर नहीं चलता।’ आज भी यही हो रहा है और होता रहेगा, अगर हम भगतसिंह को उसके विचारों के आधार पर स्वीकार कर लागू करने से भागेंगे तो यही होगा। लेकिन भगतसिंह को आजकल इसलिए भी खारिज किया जाता है कि उनके विचार जिस समाजवादी व्यवस्था का स्वप्न देखते थे, वह प्रयोग कुछ देशों में विफल हो चुका है। लेकिन हमें यह भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि एक अच्छा वैज्ञानिक एक प्रयोग की विफलता से कभी प्रयोग बंद नहीं करता, वह लगातार अपनी खोज जारी रखता है।
भगतसिंह ने जो विदेशी पुस्तकें पढीं उनमें आयरलैंड के स्वाधीनता संघर्ष से जुडी डेढ दर्जन किताबें आजादी के आंदोलन को आगे बढाने वाली थीं। ब्रिटिष साहित्य में भगतसिंह ने कविता, कहानी, नाटक और उपन्यास के अलावा वैचारिक पुस्तकें पढीं। इनमें चार्ल्स डिकेंस की ‘पिकविक’ और ‘ए टेल आफ टू सिटीज’, हाल कैने के रोमांटिक-राजनैतिक उपन्यास, जार्ज बर्नाड शा का विपुल साहित्य, गोल्डस्मिथ, शेक्सपीयर, बर्ट्रेंड रसैल, आस्कर वाइल्ड, विलियम मौरिस और हर्बर्ट स्पेंसर जैसे अनेक लेखकों की कोई चार दर्जन किताबें शामिल हैं।
यूरोपीय साहित्य में कार्ल मार्क्स की ‘पूंजी’, ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ और दो अन्य पुस्तकें, कार्लाइल की ‘फ्रेंच रिवोल्यूशन’, विक्टर ह्यूगो की ‘ला मिजरेबल’ और ‘नाइंटी थ्री’, रोजा लक्जमबर्ग, रूसो, हेगेल और जोसेफ मेजिनी की किताबों के अलावा नेपोलियन और गैरीबाल्डी की जीवनियां प्रमुख रूप से पढीं। अमेरिकी साहित्य में भगतसिंह ने अप्टोन सिंक्लेयर के आठ उपन्यास, जैक लण्डन का ‘आइरन हील’, एम्मा गोल्डमैन, स्काट नीरिंग, हेलेन केलर, जान डेवी और जान रीड की प्रसिद्ध किताब ‘टेन डेज देट शूक द वर्ल्ड’ सहित विभिन्न लेखकों की तीस से अधिक पुस्तकें पढीं।
रूसी साहित्य में भगतसिंह ने तोलस्तोय, गोर्की, दोस्तोयेव्स्की, बुखारिन, लेनिन, त्रात्स्की और स्टालिन जैसे लेखक, साहित्यकार, विचारक और राजनैतिक दर्शनशास्त्रियों और नेताओं की लगभग तीन दर्जन से अधिक किताबें पढीं। अपने आखिरी दिनों में वे लेनिन की जीवनी पढ रहे थे।

भारतीय साहित्य में भगतसिंह ने अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, पंजाबी और बांग्ला की कोई पांच दर्जन से अधिक पुस्तकों का अध्ययन किया। हिंदी, पंजाबी और उर्दू की नौ पत्रिकाओं से वे जुड़े रहे और उनमें लिखते रहे। भारतीय अंग्रेजी साहित्य में भगतसिंह ने पचास से अधिक पुस्तकें पढीं और वे गांधी जी की पत्रिका ‘यंग इण्डिया’ में भी रूचि लेते थे। हिंदी में उन्होंने साठ से अधिक पुस्तकें पढीं, जिनमें प्रेमचंद की ‘निर्मला’ और ‘सोजे वतन’, रामप्रसाद बिस्मिल, राधामोहन गोकुलजी, महात्मा गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी और लोकमान्य तिलक आदि की रचनाएं प्रमुख हैं। उर्दू और पंजाबी में वे मुख्य रूप से पत्रिकाएं पढते थे और जो किताबें उन्होंने पढीं, उनके रचनाकारों के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। अपने आखिरी वक्त तक भगतसिंह पढते रहे। जेल की कोठरी से फांसी के तख्ते तक जाते हुए भी वे लेनिन की जीवनी पढते रहे। जेलर के इस बाबत सवाल पूछने पर भगतसिंह ने कहा, ‘एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।’

Sunday, 15 February 2009

कमलेश्वर की आंखों से देखो पाकिस्तान



नवंबर में मुंबई पर हुए आतंकी हमलों के बाद भारत-पाक संबंध एक अजीब तनाव और रस्साकशी के दौर से गुजर रहे हैं। इस माहौल में जब सब तरफ पाकिस्तान को लेकर गुस्सा है, एक लेखक-कलाकार समुदाय ही ऐसा है, जो मुश्किल हालात में भी अपना धैर्य नहीं खोता और ऐसे वक्त में हमें हिंदी के महान लेखक कमलेश्वर की किताब ‘आंखों देखा पाकिस्तान’ की याद आती है। यह किताब कमलेश्वर की पाकिस्तान यात्राओं के संस्मरणों और पाकिस्तान को लेकर लिखे गये विभिन्न पत्रकारी आलेखों का एक शानदार संकलन है, जिसके भीतर से गुजरते हुए एक अलग तरह का भावनात्मक और सांझी सांस्कृतिक विरासत के वारिस होने का अहसास होता है। इस किताब को पढ़ना एक प्रकार से अपने अड़ोस-पड़ोस को नितांत नये ढंग से देखना भी है। और इस देखने की प्रक्रिया में आप पायेंगे कि हम भारतीय हों या पाकिस्तानी, अंततः हम सदियों पुरानी एक दक्षिण एशियाई कौम हैं, जिसकी एक जैसी आबो-हवा है, जहां के मौसम एक हैं, जहां सागर, पहाड़ या जमीन से हमारी सरहदें मिलती हैं और एक होने का अहसास जगाती है।
दरअसल कमलेश्वर की इस किताब से पाकिस्तान को लेकर आम भारतीय में गहरे बैठी वो सारी गलतफहमियां दूर हो जाती हैं, जिसमें पाकिस्तान देश और पाकिस्तानी जनता को पूरी तरह एक मुस्लिम कट्टरपंथी और बंद समाज के तौर पर देखा जाता है। मशहूर लेखक अहमद नदीम कासमी से हुई एक मुलाकात में कमलेश्वर को पाकिस्तानी अवाम की आवाज सुनाई पड़ती है, जब कासमी साहब उनसे कहते हैं, ‘मजहब जो कर सकता था, उसने कर दिखाया, अब मजहबी पहचान से ज्यादा इंसानी पहचान की जरूरत है, जो अदब हमेशा से पैदा करता रहा है।... हमारे यहां तो बस छावनी कल्चर बची है और फौजी ब्यूराक्रेसी। यह अंग्रेजों की देन है। पाकिस्तानी फौज चार बार पाकिस्तान को जीत चुकी है... पर वो बुल्लेशाह, वारिसशाह और नानक के खानदानों को नहीं जीत पाई है... अपने सियासी हिंदू हुक्मरानों से कहिएगा कि वे यह गलती न करें। वे तुलसीदास, मीराबाई, रसखान और अमीर खुसरो के खानदान को नहीं जीत पायेंगे।’
ये बसंत के दिन हैं और पूरे दक्षिण एशिया में इसके अलग-अलग रंग और त्यौहार हैं, लेकिन पाकिस्तानी पंजाब में इसकी अलग ही छटा है। वहां इन दिनों पतंगें उड़ाई जाती हैं, जिसे लेकर कई सालों से कट्टरपंथी हंगामा मचाते रहे हैं लेकिन आम जनता उनकी परवाह किये बिना बसंत का त्यौहार मनाती है और तमाम फतवों के बावजूद लाहौर-मुल्तान में अवाम की इच्छाओं की प्रतीक पतंगें आसमानों में परवाज करती रहती हैं। बकौल कमलेश्वर, ‘आज के पाकिस्तान में बसंतोत्सव एक प्रगतिशील विचार का ही नहीं बल्कि आम जनता के विद्रोह और कट्टरपंथ के प्रतिकार का भी उत्सव बन गया है।... पंजाब का किसान इस्लामी तिथियों और तारीखों के कैलेण्डर के हिसाब से नहीं चलता, वह आज भी भारतीय मौसमों के आधार पर चलता है। पाकिस्तानी किसान आज भी मौसमों को चैत, बैसाख, जेठ, अषाढ़ आदि नामों से जानता और याद करता है।’
इस पुस्तक में पाकिस्तान के यात्रा संस्मरणों के अलावा एक खण्ड में भारत-पाक के बीच फैली कट्टरपंथियों की जमात को लेकर कुछ आलेख हैं, जो हर वक्त माहौल बिगाड़ने का खेल खेलते रहते हैं और कभी संबंधों को सामान्य नहीं होने देना चाहते। किताब में उन हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी कैदियों के पत्र भी हैं, जो भारतीय और पाकिस्तानी जेलों में बंद रहे और कमलेश्वर को रिहाई की उम्मीद में खत लिखते रहे। कमलेश्वर ने उन कैदियों की आवाज सुनी और उनकी रिहाई के लिए काफी प्रयास भी किये। किताब के इस खंड से पता चलता है कि सरहद के दोनों तरफ किस प्रकार अफसर शाही हावी है, जो बेगुनाह लोगों को अमानवीयता की हद तक जाकर एक आजाद जिंदगी जीने में बाधक बनती है। भारत-पाक संबंधों को एक वृहद सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में जानने के लिए एक बार पाकिस्तान को कमलेश्वर की आंखों से जरूर देखना चाहिए।

(यह आलेख १ फरवरी, २००९ को प्रकाशित हुआ।)