Sunday, 20 December 2009
गुनाहों का देवता: 50 बरस: सौ संस्करण
Wednesday, 1 April 2009
पिता के बहाने एक खोजयात्रा
हर बार की तरह मैंने बीते हफ्ते 'डेली न्यूज़' के अपने 'पोथीखाना स्तम्भ में एक नई और शानदार किताब की चर्चा की है। यहाँ पेश है वही स्तम्भ, अपने दोस्तों और प्रिय पाठकों के लिए।Sunday, 22 March 2009
भगत सिंह:क्रांतिपथ की सहयात्री किताबें
शहीदे आजम भगत सिंह को लेकर आम-अवाम में यही धारणा प्रचलित है कि एक नौजवान, देशप्रेम और स्वाधीनता के युवकोचित जोश के चलते आजादी के महासमर में वीरगति को प्राप्त हुआ। धीरे-धीरे ही सही लोगों में भगत सिंह को लेकर बनी-बनाई धारणाएं टूट रही हैं और भगत सिंह से संबंधित साहित्य का इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। खुद भगत सिंह ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ में लिखा है, ‘‘मैं 1925 तक एक रूमानी आदर्शवादी क्रांतिकारी ही था। तब तक हम सिर्फ दूसरों का अनुसरण ही करते थे। अब हमारे कंधों पर ही जिम्मेदारी आ गई...कुछ समय तक तो मुझे भी यही डर लगता रहा कि कहीं हमारा सारा कार्यक्रम ही तो निरर्थकता की ओर नहीं जा रहा। मेरे क्रांतिकारी जीवन में यही एक निर्णायक मोड़ था। मेरे दिलोदिमाग के गलियारों में यही गूंजता रहा ‘पढ़ो’। विरोधियों की तरफ से आने वाले सवालों से मुकाबला के लिए तैयार रहने के लिए पढो। खुद को अपनी राह के विचारों पर दृढ़ रहने के लिए पढ़ो। और फिर मैंने पढना शुरू कर दिया।’’ भगत सिंह के साथी और लाहौर षड़यंत्र केस के सहअभियुक्त जतींद्रनाथ सान्याल ने भगत सिंह की जीवनी में लिखा है कि भगत सिंह जबर्दस्त पढ़े हुए क्रांतिकारी थे और उनके अध्ययन के दायरे में समाजवाद से जुड़ा साहित्य प्रमुख था।भगतसिंह के जीवन के विभिन्न आयामों की खोज करते हुए शोधकर्ताओं को जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक अपने छोटे से जीवन काल में भगत सिंह ने क्रांतिकारी कामों में भाग लेते हुए सैंकडों पुस्तकें पढीं, जिनमें से तकरीबन तीन सौ किताबों की सूची बना ली गई है। इनमें भारतीय और विदेशी पुस्तकों की संख्या लगभग समान है। जेल में रहते हुए भगतसिंह जो किताबें पढते थे, उनसे उपयोगी और प्रेरक अंश वे एक डायरी में नोट कर लिया करते थे। कुछ वर्ष पूर्व ही यह जेल डायरी प्रकाश में आई और आते ही लोकप्रिय हो गई। इस जेल डायरी का प्रथम प्रकाशन जयपुर के विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी स्व. बी. हूजा ने किया था। भगतसिंह की इस डायरी को पढें तो पता चलता है कि उनकी रूचियों में कितनी विविधता रही। चार्ल्स डिकेंस की ‘पिकविक’ पढते हुए वे डायरी में नोट करते हैं, ‘मनुष्य जाति की सबसे रोमांचक और काबिलेमाफ कमजोरी है-प्रेम’। भगतसिंह की पढी कई किताबों के मामलों में तो यह भी देखा गया कि जिस पुस्तक या लेख से वे अत्यंत प्रभावित होते थे, उसका येनकेन प्रकारेण प्रचार-प्रसार करने में भी पीछे नहीं रहते थे। इसके लिए वे खुद ही अनुवाद भी कर देते थे और अपने साथियों को भी इसके लिए प्रेरित करते थे।
हमारे देखते देखते ही भगतसिंह को एक आदर्श क्रांतिकारी से पूजनीय महापुरूष बना दिया गया। भगतसिंह खुद इसके खिलाफ थे। उन्होंने जार्ज बर्नाड शा की पुस्तक ‘मैन एण्ड सुपरमैन पढते हुए अपनी डायरी में नोट किया, ‘एक मूर्ख राष्ट्र में प्रतिभाशाली व्यक्ति भगवान हो जाता है, हर कोई उसकी पूजा करता है, लेकिन कोई उसकी राह पर नहीं चलता।’ आज भी यही हो रहा है और होता रहेगा, अगर हम भगतसिंह को उसके विचारों के आधार पर स्वीकार कर लागू करने से भागेंगे तो यही होगा। लेकिन भगतसिंह को आजकल इसलिए भी खारिज किया जाता है कि उनके विचार जिस समाजवादी व्यवस्था का स्वप्न देखते थे, वह प्रयोग कुछ देशों में विफल हो चुका है। लेकिन हमें यह भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि एक अच्छा वैज्ञानिक एक प्रयोग की विफलता से कभी प्रयोग बंद नहीं करता, वह लगातार अपनी खोज जारी रखता है।
भगतसिंह ने जो विदेशी पुस्तकें पढीं उनमें आयरलैंड के स्वाधीनता संघर्ष से जुडी डेढ दर्जन किताबें आजादी के आंदोलन को आगे बढाने वाली थीं। ब्रिटिष साहित्य में भगतसिंह ने कविता, कहानी, नाटक और उपन्यास के अलावा वैचारिक पुस्तकें पढीं। इनमें चार्ल्स डिकेंस की ‘पिकविक’ और ‘ए टेल आफ टू सिटीज’, हाल कैने के रोमांटिक-राजनैतिक उपन्यास, जार्ज बर्नाड शा का विपुल साहित्य, गोल्डस्मिथ, शेक्सपीयर, बर्ट्रेंड रसैल, आस्कर वाइल्ड, विलियम मौरिस और हर्बर्ट स्पेंसर जैसे अनेक लेखकों की कोई चार दर्जन किताबें शामिल हैं।
रूसी साहित्य में भगतसिंह ने तोलस्तोय, गोर्की, दोस्तोयेव्स्की, बुखारिन, लेनिन, त्रात्स्की और स्टालिन जैसे लेखक, साहित्यकार, विचारक और राजनैतिक दर्शनशास्त्रियों और नेताओं की लगभग तीन दर्जन से अधिक किताबें पढीं। अपने आखिरी दिनों में वे लेनिन की जीवनी पढ रहे थे।
Sunday, 15 February 2009
कमलेश्वर की आंखों से देखो पाकिस्तान

नवंबर में मुंबई पर हुए आतंकी हमलों के बाद भारत-पाक संबंध एक अजीब तनाव और रस्साकशी के दौर से गुजर रहे हैं। इस माहौल में जब सब तरफ पाकिस्तान को लेकर गुस्सा है, एक लेखक-कलाकार समुदाय ही ऐसा है, जो मुश्किल हालात में भी अपना धैर्य नहीं खोता और ऐसे वक्त में हमें हिंदी के महान लेखक कमलेश्वर की किताब ‘आंखों देखा पाकिस्तान’ की याद आती है। यह किताब कमलेश्वर की पाकिस्तान यात्राओं के संस्मरणों और पाकिस्तान को लेकर लिखे गये विभिन्न पत्रकारी आलेखों का एक शानदार संकलन है, जिसके भीतर से गुजरते हुए एक अलग तरह का भावनात्मक और सांझी सांस्कृतिक विरासत के वारिस होने का अहसास होता है। इस किताब को पढ़ना एक प्रकार से अपने अड़ोस-पड़ोस को नितांत नये ढंग से देखना भी है। और इस देखने की प्रक्रिया में आप पायेंगे कि हम भारतीय हों या पाकिस्तानी, अंततः हम सदियों पुरानी एक दक्षिण एशियाई कौम हैं, जिसकी एक जैसी आबो-हवा है, जहां के मौसम एक हैं, जहां सागर, पहाड़ या जमीन से हमारी सरहदें मिलती हैं और एक होने का अहसास जगाती है।
दरअसल कमलेश्वर की इस किताब से पाकिस्तान को लेकर आम भारतीय में गहरे बैठी वो सारी गलतफहमियां दूर हो जाती हैं, जिसमें पाकिस्तान देश और पाकिस्तानी जनता को पूरी तरह एक मुस्लिम कट्टरपंथी और बंद समाज के तौर पर देखा जाता है। मशहूर लेखक अहमद नदीम कासमी से हुई एक मुलाकात में कमलेश्वर को पाकिस्तानी अवाम की आवाज सुनाई पड़ती है, जब कासमी साहब उनसे कहते हैं, ‘मजहब जो कर सकता था, उसने कर दिखाया, अब मजहबी पहचान से ज्यादा इंसानी पहचान की जरूरत है, जो अदब हमेशा से पैदा करता रहा है।... हमारे यहां तो बस छावनी कल्चर बची है और फौजी ब्यूराक्रेसी। यह अंग्रेजों की देन है। पाकिस्तानी फौज चार बार पाकिस्तान को जीत चुकी है... पर वो बुल्लेशाह, वारिसशाह और नानक के खानदानों को नहीं जीत पाई है... अपने सियासी हिंदू हुक्मरानों से कहिएगा कि वे यह गलती न करें। वे तुलसीदास, मीराबाई, रसखान और अमीर खुसरो के खानदान को नहीं जीत पायेंगे।’
ये बसंत के दिन हैं और पूरे दक्षिण एशिया में इसके अलग-अलग रंग और त्यौहार हैं, लेकिन पाकिस्तानी पंजाब में इसकी अलग ही छटा है। वहां इन दिनों पतंगें उड़ाई जाती हैं, जिसे लेकर कई सालों से कट्टरपंथी हंगामा मचाते रहे हैं लेकिन आम जनता उनकी परवाह किये बिना बसंत का त्यौहार मनाती है और तमाम फतवों के बावजूद लाहौर-मुल्तान में अवाम की इच्छाओं की प्रतीक पतंगें आसमानों में परवाज करती रहती हैं। बकौल कमलेश्वर, ‘आज के पाकिस्तान में बसंतोत्सव एक प्रगतिशील विचार का ही नहीं बल्कि आम जनता के विद्रोह और कट्टरपंथ के प्रतिकार का भी उत्सव बन गया है।... पंजाब का किसान इस्लामी तिथियों और तारीखों के कैलेण्डर के हिसाब से नहीं चलता, वह आज भी भारतीय मौसमों के आधार पर चलता है। पाकिस्तानी किसान आज भी मौसमों को चैत, बैसाख, जेठ, अषाढ़ आदि नामों से जानता और याद करता है।’
इस पुस्तक में पाकिस्तान के यात्रा संस्मरणों के अलावा एक खण्ड में भारत-पाक के बीच फैली कट्टरपंथियों की जमात को लेकर कुछ आलेख हैं, जो हर वक्त माहौल बिगाड़ने का खेल खेलते रहते हैं और कभी संबंधों को सामान्य नहीं होने देना चाहते। किताब में उन हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी कैदियों के पत्र भी हैं, जो भारतीय और पाकिस्तानी जेलों में बंद रहे और कमलेश्वर को रिहाई की उम्मीद में खत लिखते रहे। कमलेश्वर ने उन कैदियों की आवाज सुनी और उनकी रिहाई के लिए काफी प्रयास भी किये। किताब के इस खंड से पता चलता है कि सरहद के दोनों तरफ किस प्रकार अफसर शाही हावी है, जो बेगुनाह लोगों को अमानवीयता की हद तक जाकर एक आजाद जिंदगी जीने में बाधक बनती है। भारत-पाक संबंधों को एक वृहद सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में जानने के लिए एक बार पाकिस्तान को कमलेश्वर की आंखों से जरूर देखना चाहिए।
(यह आलेख १ फरवरी, २००९ को प्रकाशित हुआ।)

