Showing posts with label पाकिस्तान. Show all posts
Showing posts with label पाकिस्तान. Show all posts

Sunday, 15 March 2009

पाकिस्तान की सेना का व्यावसायिक चेहरा






इन दिनों हमारा पड़ौसी देश पाकिस्तान जिस दौर से गुजर रहा है, उसे देखते हुए अंदेशा होता है कि वहां कभी-भी फौजी तख्तापलट हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो यह बेहद बदकिस्मत वाकया होगा, लेकिन जब सियासी पार्टियां और नेता नाकामयाब हो जाएं, अवाम की इच्छाओं को पूरा नहीं करें और उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आए तो ऐसा होना पाकिस्तान जैसे मुल्क के लिए लाजिमी हो जाता है। वहां गुजश्ता बासठ में से बत्तीस बरस फौजी सरकार ने मुल्क चलाया है और आज पाकिस्तान के समाजी, सियासी और माशी मामलों में फौज की मौजूदगी इस कदर हावी हो गई है कि इक्तिसादी नजरिये से वहां मिलटिरी और बिजनेस शब्दों को जोड़कर एक ‘मिलबस’ जुमला ही चल पड़ा है। पाकिस्तानी फौज के इस जबर्दस्त किरदार को लेकर डा. आयशा सिद्दीका ने ‘मिलिटरी इंक. इनसाइड पाकिस्तान’स मिलिटरी इकोनोमी’ किताब लिखी, जो 2007 में शाया हुई। छपते ही इसे पाकिस्तान में बैन कर दिया गया। जिन दिनों यह किताब आई, हम लोग पाकिस्तान में थे। वहां दोस्तों ने कहा यार हमारे लिए तोहफे में कम से कम आयशा की किताब ही ले आते। दरअसल हमें खयाल ही नहीं आया था कि कोई किताब बैन होने के बाद इस कदर शोहरत हासिल कर लेती है। बरसों पहले हमारी एक दोस्त लंदन गई थीं और वो सलमान रश्दी की किताब ‘सेटेनिक वर्सेज’ छुपाकर लाईं तो हमें गजब का रोमांच महसूस हुआ था। बहरहाल, आयशा की यह किताब पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की अमेरिका बेस्ड वेबसाइट पर पीडीएफ फाइल के रूप में मौजूद है।



आयशा ने ग्यारह बरस तक पाकिस्तान नेवी के रिसर्च डिपार्टमेंट की डाइरेक्टर और आडिट डिफेंस सर्विसेज की डिप्टी डाइरेक्टर के रूप में काम किया और अपने तजुरबे से महसूस किया कि फौज मुल्क में एक ऐसी पैरेलल इकोनोमी चला रही है, जो जम्हूरियत के लिहाज से बिल्कुल ठीक नहीं है। और यह सब हो रहा है, जनता की गाढ़ी कमाई यानी करदाताओं के धन से। पाक सेना के कुछ कल्याणकारी संगठनों के नाम पर सरकार से अनुदान लेकर उस धन को सीधे खर्च करने के बजाय जमीनें खरीदने, व्यापारिक कार्यों में निवेश करने और इसी किस्म के व्यावसायिक कामों में उपयोग किया जाता है। इस प्रकार से प्राप्त जनधन के प्रबंधन और मूल्यांकन की कोई व्यवस्था नहीं है और इसीलिए बड़े अधिकारी वहां के सबसे अधिक पैसे वाले पूंजीपतियों के समान हैं। सेना का देश की व्यापारिक गतिविधियों में भाग लेना नई बात नहीं है, लेकिन जिन देशों में सेना इस किस्म की गतिविधियों में लगी रहती है, वहां सरकार सेना को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए व्यवसाय की इजाजत देती है। लेकिन पाकिस्तान में सरकार सैन्य बजट भी देती है और सेना, सैनिक विधवाओं के कल्याण के नाम पर शुरू हुए फौजी और शाहीन फौंडेशन जैसे कुल चार मुख्य संगठनों के नाम पर अनेक कार्पोरेट कंपनियों व उद्योगों का संचालन करती है, जिनमें से कुछ तो कराची स्टाक एक्सचेंज में सूचित कंपनियां हैं।



दरअसल कानून और देश के नाम पर पाकिस्तान में लोकतंत्र का जो नुकसान सेना ने किया उसका खामियाजा पूरे देश की जनता को उठाना पड़ रहा है। हम लोग अब तक यही समझते थे कि सेना ने कानून और व्यवस्था के नाम पर मुल्क की व्यवस्था को वश में कर रखा है। लेकिन आयशा की किताब से पता चलता है कि सेना ने किस प्रकार अपने हितों को साधने के लिए समूची राजनैतिक व प्रशासनिक व्यवस्था को लाचार बना रखा है और ऐसे हालात पैदा कर रखे हैं कि जिस प्रकार की समानांतर अर्थव्यवस्था पैदा की है उसे बदलना या समाप्त करना बेहद मुश्किल लगता है। यह किताब बताती है कि अगर पाकिस्तान में लोकशाही को मजबूत बनाना है तो एक प्रक्रिया के तहत लोकतांत्रिक सरकार द्वारा धीरे-धीरे सेना को अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से निकालकर बाहर करना होगा। क्योंकि सेना के विभिन्न अंग-उपांग रियल एस्टेट, बैंकिंग, शिक्षा, एयरलाइन, कार्गो व्यापार, निटवेयर और बीमा व्यवसाय से लेकर विभिन्न किस्म के कृषि आधारित व्यापारिक क्षेत्रों में काम कर रहे हैं और स्वायत्तता के नाम पर वे इस कदर स्वतंत्र हैं कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का कोई नियंत्रण नहीं है। इन संस्थाओं की कोई आडिट नहीं होती ।



आयशा के मुताबिक यह सब जनरल अयूब खां के जमाने में शुरु हुआ। आज एक मेजर जनरल पाकिस्तान में रिटायर होने पर लगभग तीस करोड़ का मालिक होता है। पाक सेना का यह व्यवसाय एक अनुमान के अनुसार देश के जीडीपी का चार और निजी क्षेत्र के व्यवसाय का सात से दस फीसद होता है। इसके पीछे कुछ तो वहां के कानून की खामियां भी जिम्मेदार हैं, जिसमें भूमि सुधार न होना भी एक बड़ी वजह है। एक पाकिस्तानी कानून के अंतर्गत सरकार अगर कोई जमीन नागरिकों के लिए विकासित करती है तो उसका दस प्रतिशत सेना को देना अनिवार्य है। सेना के बड़े अधिकारी तय करते हैं कि वे इस जमीन का क्या उपयोग करें। शहरी जमीन में आवासीय कालोनियां काट दी जाती हैं या सेना की सहायक संस्थाओं को व्यावसायिक उपयोग के लिए जमीन दे दी जाती हैं। अनेक मामलों में उच्च सैन्य अधिकारी अपने परिजनों के या अपने नाम बड़ी जमीन ले लेते हैं और यह सब बहुत मामूली दरों पर होता है। सेना को शहरों में या कहीं भी जमीन तीस से साठ रूपये प्रति एकड़ के भाव से सरकार से मिलती है और फिर इस जमीन पर प्लाट काटने के बाद इसकी कीमतें हजारों गुना बढ़ जाती हैं। इस तरह जमीनों का धंधा करती हुई सेना कारखाने और कंपनियां खोलकर भी स्वायत्त सत्ता का आनंद भोग रही है।



पाकिस्तान में जब भी लोकतांत्रिक सरकार का गठन होता है तो जनता मांग करती है कि सेना की भूमिका को सार्वजनिक जीवन में कम किया जाए। क्योंकि वहां अनेक लोक प्रशासन के पदों पर भी सैन्य अधिकारी कायम रहते हैं, विभिन्न निगमों और बोर्डों के निदेशक या अध्यक्ष के रूप में। लोकतांत्रिक सरकार ऐसा करती है तो सेना को बुरा लगता है और दोनों में टसल शुरू हो जाती है। आयशा की किताब को अगर पाकिस्तान में सेना की हैसियत का एक आईना मानें तो बेहद निराशा होती है और लगता है कि पाकिस्तान में सही मायने में लोकतांत्रिक सरकार का ख्वाब तभी पूरा हो सकता है जब पूरी जनता लामबंद हो जाए। क्योंकि वहां अभी भी लोकतंत्र की बागडोर बड़े जमींदारों और उद्योगपतियों के हाथों में ही है। और इस तरह सेना और पूंजीपतियों के दुष्चक्र में आम पाकिस्तानी मारा जा रहा है। आतंकवाद तो इस दुष्चक्र का एक पहलू है, जिससे पूरी दुनिया परेशान है।

Sunday, 15 February 2009

कमलेश्वर की आंखों से देखो पाकिस्तान



नवंबर में मुंबई पर हुए आतंकी हमलों के बाद भारत-पाक संबंध एक अजीब तनाव और रस्साकशी के दौर से गुजर रहे हैं। इस माहौल में जब सब तरफ पाकिस्तान को लेकर गुस्सा है, एक लेखक-कलाकार समुदाय ही ऐसा है, जो मुश्किल हालात में भी अपना धैर्य नहीं खोता और ऐसे वक्त में हमें हिंदी के महान लेखक कमलेश्वर की किताब ‘आंखों देखा पाकिस्तान’ की याद आती है। यह किताब कमलेश्वर की पाकिस्तान यात्राओं के संस्मरणों और पाकिस्तान को लेकर लिखे गये विभिन्न पत्रकारी आलेखों का एक शानदार संकलन है, जिसके भीतर से गुजरते हुए एक अलग तरह का भावनात्मक और सांझी सांस्कृतिक विरासत के वारिस होने का अहसास होता है। इस किताब को पढ़ना एक प्रकार से अपने अड़ोस-पड़ोस को नितांत नये ढंग से देखना भी है। और इस देखने की प्रक्रिया में आप पायेंगे कि हम भारतीय हों या पाकिस्तानी, अंततः हम सदियों पुरानी एक दक्षिण एशियाई कौम हैं, जिसकी एक जैसी आबो-हवा है, जहां के मौसम एक हैं, जहां सागर, पहाड़ या जमीन से हमारी सरहदें मिलती हैं और एक होने का अहसास जगाती है।
दरअसल कमलेश्वर की इस किताब से पाकिस्तान को लेकर आम भारतीय में गहरे बैठी वो सारी गलतफहमियां दूर हो जाती हैं, जिसमें पाकिस्तान देश और पाकिस्तानी जनता को पूरी तरह एक मुस्लिम कट्टरपंथी और बंद समाज के तौर पर देखा जाता है। मशहूर लेखक अहमद नदीम कासमी से हुई एक मुलाकात में कमलेश्वर को पाकिस्तानी अवाम की आवाज सुनाई पड़ती है, जब कासमी साहब उनसे कहते हैं, ‘मजहब जो कर सकता था, उसने कर दिखाया, अब मजहबी पहचान से ज्यादा इंसानी पहचान की जरूरत है, जो अदब हमेशा से पैदा करता रहा है।... हमारे यहां तो बस छावनी कल्चर बची है और फौजी ब्यूराक्रेसी। यह अंग्रेजों की देन है। पाकिस्तानी फौज चार बार पाकिस्तान को जीत चुकी है... पर वो बुल्लेशाह, वारिसशाह और नानक के खानदानों को नहीं जीत पाई है... अपने सियासी हिंदू हुक्मरानों से कहिएगा कि वे यह गलती न करें। वे तुलसीदास, मीराबाई, रसखान और अमीर खुसरो के खानदान को नहीं जीत पायेंगे।’
ये बसंत के दिन हैं और पूरे दक्षिण एशिया में इसके अलग-अलग रंग और त्यौहार हैं, लेकिन पाकिस्तानी पंजाब में इसकी अलग ही छटा है। वहां इन दिनों पतंगें उड़ाई जाती हैं, जिसे लेकर कई सालों से कट्टरपंथी हंगामा मचाते रहे हैं लेकिन आम जनता उनकी परवाह किये बिना बसंत का त्यौहार मनाती है और तमाम फतवों के बावजूद लाहौर-मुल्तान में अवाम की इच्छाओं की प्रतीक पतंगें आसमानों में परवाज करती रहती हैं। बकौल कमलेश्वर, ‘आज के पाकिस्तान में बसंतोत्सव एक प्रगतिशील विचार का ही नहीं बल्कि आम जनता के विद्रोह और कट्टरपंथ के प्रतिकार का भी उत्सव बन गया है।... पंजाब का किसान इस्लामी तिथियों और तारीखों के कैलेण्डर के हिसाब से नहीं चलता, वह आज भी भारतीय मौसमों के आधार पर चलता है। पाकिस्तानी किसान आज भी मौसमों को चैत, बैसाख, जेठ, अषाढ़ आदि नामों से जानता और याद करता है।’
इस पुस्तक में पाकिस्तान के यात्रा संस्मरणों के अलावा एक खण्ड में भारत-पाक के बीच फैली कट्टरपंथियों की जमात को लेकर कुछ आलेख हैं, जो हर वक्त माहौल बिगाड़ने का खेल खेलते रहते हैं और कभी संबंधों को सामान्य नहीं होने देना चाहते। किताब में उन हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी कैदियों के पत्र भी हैं, जो भारतीय और पाकिस्तानी जेलों में बंद रहे और कमलेश्वर को रिहाई की उम्मीद में खत लिखते रहे। कमलेश्वर ने उन कैदियों की आवाज सुनी और उनकी रिहाई के लिए काफी प्रयास भी किये। किताब के इस खंड से पता चलता है कि सरहद के दोनों तरफ किस प्रकार अफसर शाही हावी है, जो बेगुनाह लोगों को अमानवीयता की हद तक जाकर एक आजाद जिंदगी जीने में बाधक बनती है। भारत-पाक संबंधों को एक वृहद सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में जानने के लिए एक बार पाकिस्तान को कमलेश्वर की आंखों से जरूर देखना चाहिए।

(यह आलेख १ फरवरी, २००९ को प्रकाशित हुआ।)