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Sunday, 22 August 2010

महंगाई ने किया बेहाल

अब सिर्फ साढ़े चार साल बचे हैं और इतने कम समय में संपूर्ण भारत को शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, लैंगिक समानता, रोजगार, भोजन, स्वच्छ पेयजल, शिशु और मातृ मृत्यु दर में कमी जैसे क्षेत्रों में संयुक्त राष्ट्र संघ से किए गए वायदे के अनुसार बड़े लक्ष्य हासिल करने हैं। जी हां, सन 2000 में भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ जिस मसौदे पर हस्ताक्षर किए थे, उसके अनुसार सन् 2015 तक आठ विभिन्न क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लक्ष्य प्राप्त किए जाने हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है आधी आबादी की गरीबी दूर करना और भूख मिटाना। हालात ये हैं कि 23 जून, 2010 को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की 70 प्रतिशत से भी अधिक जनता गरीबी की रेखा से नीचे रह रही है। क्या आगामी चार सालों में बीस प्रतिशत जनता को गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा सकेगा? यह सवाल इसलिए भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि माध्यमिक स्तर तक शिक्षा में लिंग भेद समाप्त करने और शत प्रतिशत लड़कियों को शिक्षा प्रदान करने का लक्ष्य 2205 तक निर्धारित किया गया था, लेकिन हासिल नहीं किया जा सका। 2015 तक गरीबी की दर को 24 प्रतिशत पर लाना है, जो अभी संभव नहीं दिख रहा है। पिछले दो सालों में हुई आर्थिक मंदी ने भुखमरी को 21 प्रतिशत तक बढ़ दिया है। यह स्थिति सिर्फ भारत की नहीं समूचे दक्षिण एशिया की है। उक्त रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो सालों में खाद्यान्न और अन्य खाद्य वस्तुओं के दाम 80 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं, जिसकी वजह से निर्धनतम लोगों के सामने भयानक भुखमरी का संकट खड़ा हो गया है। हाल ही पेट्रोलियम पदार्थों में की गई बढ़ोतरी इस संकट को और बढ़ाएगी। भुखमरी के लिहाज से मध्यप्रदेश और गुजरात की हालत दक्षिण अफ्रीका के सामालिया और कांगो जैसे देशों सी है। राजस्थान भी बहुत अच्छी दशा में नहीं है, लेकिन हालात तो यहां भी चिंताजनक ही हैं।

सहस्राब्दी विकास लक्ष्य यानी मिलेनियम डवलपमेंट गोल्स में युवाओं को अच्छा रोजगार उपलब्ध कराना भी शामिल है। इसीलिए नरेगा के बाद महानरेगा जैसी योजनाएं लाई गई हैं और सरकारी नौकरियों में जोरदार भर्ती के अभियान चल रहे हैं। इस दिशा में अगर दस साल पहले काम शुरु किया गया होता तो सोचिए कितने करोड़ बेरोजगारों को अब तक रोजगार मिल गया होता और उन हजारों नौजवानों की जान बच गई होती, जिन्होंने बेरोजगारी के कारण आत्महत्या का रास्ता चुना। दरअसल हमारी आदत ही हो गई है कि हम बिल्कुल आखिरी समय पर जाकर चेतते हैं, इसीलिए समय पर वांछित परिणाम हासिल नहीं हो पाते।

2015 तक देश के प्रत्येक बालक को प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराई जानी है, लेकिन हालत यह है कि आज भी देश के हजारों गांवों में स्कूल तक नहीं हैं। ऐसे में इस लक्ष्य को हासिल करना खासा मुश्किल काम है। इसी तरह पंद्रह से चौबीस साल की आयु के सभी स्त्री-पुरुषों को साक्षर किया जाना है। इसके लिए साक्षर भारत योजना युद्धस्तर पर चल रही है। तमाम ग्राम पंचायतों को इसके लिए बैंकों के माध्यम से विशेष रूप से फण्ड उपलब्ध करवाया जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक असमानता को समाप्त करने का लक्ष्य भी हासिल होता नहीं दिख रहा है। अभी भी देश की अधिकांश बालिकाएं शिक्षा से वंचित हैं और सरकार की तमाम योजनाओं के बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार होता नहीं दिख रहा है।

समाज में विभिन्न स्तरों पर व्याप्त लैंगिक भेद को समाप्त करने और महिला सशक्तिकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ही संसद में महिलाओं के लिए तैंतीस प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई। अब इसे समाज के अन्य हिस्सों में भी लागू करने की कवायद चल रही है। इसी तरह खेती के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं को पुरुषों के समान रोजगार दिया जाना है। इतना ही नहीं रोजगार में महिलाओं को प्रबंधकीय तंत्र में भी शामिल करना है, जिससे उच्च प्रशासनिक स्तर पर महिला और पुरुष का अनुपात कम किया जा सके। अगर ऐसा होता है तो आने वाले समय में समाज में कई स्तरों पर व्यापक बदलाव देखने को मिलेंगे। सहस्राब्दी विकास के आठ लक्ष्यों में से तीन लक्ष्य पूरी तरह महिलाओं से संबंधित हैं। लिंग भेद समाप्त करने के अलावा शिशु और मातृ मृत्यु दर को कम करने के लक्ष्य प्राप्त करने में महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका अहम साबित हो सकती है। देश के अनेक गांवों में प्राथमिक चिकित्सा सेवाएं सुलभ नहीं हैं और करोड़ों बच्चे बेमौत मारे जाते हैं। राजस्थान के पंचायत चुनावों में इस बार साठ हजार से ज्यादा महिलाएं जीत कर आई हैं। ये महिला पंच, सरपंच, उप सरपंच और प्रधान चाहें तो हर गांव में एक प्राथमिक चिकित्सा केंद्र खुलवा कर अपने गांव में होने वाली शिशुओं की ही नहीं गर्भवती माताओं की भी अकाल मृत्यु रोक सकती हैं। शिशु और माता की मृत्यु का सीधा संबंध माता के स्वास्थ्य से है, इसलिए अगर माता को सही पोषण मिले और नियमित स्वास्थ्य जांच हो और समय पर दवाइयां आदि मिले तो इस लक्ष्य को हासिल करना असंभव नहीं है। महिला जनप्रतिनिधि अपने गांव की महिलाओं को परिवार नियोजन और स्वास्थ्य के बारे में जागरूक करें तो नेता होने के कारण महिलाएं उनकी बात आसानी से मानेंगी और इसके बहुत सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। महिलाओं पर आए दिन होने वाली हिंसा रोकने में भी महिला जनप्रतिनिधि बेहद कारगर सिद्ध हो सकती हैं। सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों में एड्स, मलेरिया और अन्य बीमारियों से बचाव और चिकित्सा भी एक अहम मुद्दा है। इसे हासिल करने में पूरे समाज को ही योगदान करना होगा, फिर वो चाहे शिक्षक हों, स्वास्थ्यकर्मी हों या जनप्रतिनिधि।
पर्यावरण संरक्षण को लेकर अभी भी समाज में वैसी चेतना नहीं है, जिससे दिनोंदन बिगड़ते पर्यावरण को सुधारा जा सके। इसके लिए एक तरीका यह भी हो सकता है कि नरेगा के अंतर्गत होने वाले विभिन्न विकास कार्यों में पर्यावरण संरक्षण के कार्यों का दायरा बढ़ाया जाए। मसलन गांव में होने वाले विकास कार्यों में तीस प्रतिशत काम सिर्फ पर्यावरण संरक्षण के ही होना अनिवार्य कर दिया जाए तो कायापलट संभव है। इस काम में भी महिला जनप्रतिनिधियों की पहल प्रभावी हो सकती है। अगर प्रत्येक गांव में वाटरशेड डवलपमेंट योजना चलाई जाए तो जलसंकट से भी निजात मिल सकती है और पर्यावरण को भी संरक्षित किया जा सकता है। इससे गांव के पशुओं के लिए चारा भी उपलब्ध हो सकता है और गांवों में जलस्तर भी बढ़ाया जा सकता है।

सहस्राब्दी विकास लक्ष्य हासिल करना देखने में मुश्किल जरूर लगते हैं, लेकिन ये असंभव बिल्कुल नहीं हैं। यह जरूर हो सकता है कि हम 2015 तक इन लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाएं, लेकिन 2020 या 2025 तक तो कर ही सकते हैं। जरूरत इस बात की है कि प्रशासनिक मशीनरी और सभी स्तरों के जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल हो और सब मिलकर गंभीरतापूर्वक प्रयास करें।

















Sunday, 15 March 2009

पाकिस्तान की सेना का व्यावसायिक चेहरा






इन दिनों हमारा पड़ौसी देश पाकिस्तान जिस दौर से गुजर रहा है, उसे देखते हुए अंदेशा होता है कि वहां कभी-भी फौजी तख्तापलट हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो यह बेहद बदकिस्मत वाकया होगा, लेकिन जब सियासी पार्टियां और नेता नाकामयाब हो जाएं, अवाम की इच्छाओं को पूरा नहीं करें और उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आए तो ऐसा होना पाकिस्तान जैसे मुल्क के लिए लाजिमी हो जाता है। वहां गुजश्ता बासठ में से बत्तीस बरस फौजी सरकार ने मुल्क चलाया है और आज पाकिस्तान के समाजी, सियासी और माशी मामलों में फौज की मौजूदगी इस कदर हावी हो गई है कि इक्तिसादी नजरिये से वहां मिलटिरी और बिजनेस शब्दों को जोड़कर एक ‘मिलबस’ जुमला ही चल पड़ा है। पाकिस्तानी फौज के इस जबर्दस्त किरदार को लेकर डा. आयशा सिद्दीका ने ‘मिलिटरी इंक. इनसाइड पाकिस्तान’स मिलिटरी इकोनोमी’ किताब लिखी, जो 2007 में शाया हुई। छपते ही इसे पाकिस्तान में बैन कर दिया गया। जिन दिनों यह किताब आई, हम लोग पाकिस्तान में थे। वहां दोस्तों ने कहा यार हमारे लिए तोहफे में कम से कम आयशा की किताब ही ले आते। दरअसल हमें खयाल ही नहीं आया था कि कोई किताब बैन होने के बाद इस कदर शोहरत हासिल कर लेती है। बरसों पहले हमारी एक दोस्त लंदन गई थीं और वो सलमान रश्दी की किताब ‘सेटेनिक वर्सेज’ छुपाकर लाईं तो हमें गजब का रोमांच महसूस हुआ था। बहरहाल, आयशा की यह किताब पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की अमेरिका बेस्ड वेबसाइट पर पीडीएफ फाइल के रूप में मौजूद है।



आयशा ने ग्यारह बरस तक पाकिस्तान नेवी के रिसर्च डिपार्टमेंट की डाइरेक्टर और आडिट डिफेंस सर्विसेज की डिप्टी डाइरेक्टर के रूप में काम किया और अपने तजुरबे से महसूस किया कि फौज मुल्क में एक ऐसी पैरेलल इकोनोमी चला रही है, जो जम्हूरियत के लिहाज से बिल्कुल ठीक नहीं है। और यह सब हो रहा है, जनता की गाढ़ी कमाई यानी करदाताओं के धन से। पाक सेना के कुछ कल्याणकारी संगठनों के नाम पर सरकार से अनुदान लेकर उस धन को सीधे खर्च करने के बजाय जमीनें खरीदने, व्यापारिक कार्यों में निवेश करने और इसी किस्म के व्यावसायिक कामों में उपयोग किया जाता है। इस प्रकार से प्राप्त जनधन के प्रबंधन और मूल्यांकन की कोई व्यवस्था नहीं है और इसीलिए बड़े अधिकारी वहां के सबसे अधिक पैसे वाले पूंजीपतियों के समान हैं। सेना का देश की व्यापारिक गतिविधियों में भाग लेना नई बात नहीं है, लेकिन जिन देशों में सेना इस किस्म की गतिविधियों में लगी रहती है, वहां सरकार सेना को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए व्यवसाय की इजाजत देती है। लेकिन पाकिस्तान में सरकार सैन्य बजट भी देती है और सेना, सैनिक विधवाओं के कल्याण के नाम पर शुरू हुए फौजी और शाहीन फौंडेशन जैसे कुल चार मुख्य संगठनों के नाम पर अनेक कार्पोरेट कंपनियों व उद्योगों का संचालन करती है, जिनमें से कुछ तो कराची स्टाक एक्सचेंज में सूचित कंपनियां हैं।



दरअसल कानून और देश के नाम पर पाकिस्तान में लोकतंत्र का जो नुकसान सेना ने किया उसका खामियाजा पूरे देश की जनता को उठाना पड़ रहा है। हम लोग अब तक यही समझते थे कि सेना ने कानून और व्यवस्था के नाम पर मुल्क की व्यवस्था को वश में कर रखा है। लेकिन आयशा की किताब से पता चलता है कि सेना ने किस प्रकार अपने हितों को साधने के लिए समूची राजनैतिक व प्रशासनिक व्यवस्था को लाचार बना रखा है और ऐसे हालात पैदा कर रखे हैं कि जिस प्रकार की समानांतर अर्थव्यवस्था पैदा की है उसे बदलना या समाप्त करना बेहद मुश्किल लगता है। यह किताब बताती है कि अगर पाकिस्तान में लोकशाही को मजबूत बनाना है तो एक प्रक्रिया के तहत लोकतांत्रिक सरकार द्वारा धीरे-धीरे सेना को अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से निकालकर बाहर करना होगा। क्योंकि सेना के विभिन्न अंग-उपांग रियल एस्टेट, बैंकिंग, शिक्षा, एयरलाइन, कार्गो व्यापार, निटवेयर और बीमा व्यवसाय से लेकर विभिन्न किस्म के कृषि आधारित व्यापारिक क्षेत्रों में काम कर रहे हैं और स्वायत्तता के नाम पर वे इस कदर स्वतंत्र हैं कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का कोई नियंत्रण नहीं है। इन संस्थाओं की कोई आडिट नहीं होती ।



आयशा के मुताबिक यह सब जनरल अयूब खां के जमाने में शुरु हुआ। आज एक मेजर जनरल पाकिस्तान में रिटायर होने पर लगभग तीस करोड़ का मालिक होता है। पाक सेना का यह व्यवसाय एक अनुमान के अनुसार देश के जीडीपी का चार और निजी क्षेत्र के व्यवसाय का सात से दस फीसद होता है। इसके पीछे कुछ तो वहां के कानून की खामियां भी जिम्मेदार हैं, जिसमें भूमि सुधार न होना भी एक बड़ी वजह है। एक पाकिस्तानी कानून के अंतर्गत सरकार अगर कोई जमीन नागरिकों के लिए विकासित करती है तो उसका दस प्रतिशत सेना को देना अनिवार्य है। सेना के बड़े अधिकारी तय करते हैं कि वे इस जमीन का क्या उपयोग करें। शहरी जमीन में आवासीय कालोनियां काट दी जाती हैं या सेना की सहायक संस्थाओं को व्यावसायिक उपयोग के लिए जमीन दे दी जाती हैं। अनेक मामलों में उच्च सैन्य अधिकारी अपने परिजनों के या अपने नाम बड़ी जमीन ले लेते हैं और यह सब बहुत मामूली दरों पर होता है। सेना को शहरों में या कहीं भी जमीन तीस से साठ रूपये प्रति एकड़ के भाव से सरकार से मिलती है और फिर इस जमीन पर प्लाट काटने के बाद इसकी कीमतें हजारों गुना बढ़ जाती हैं। इस तरह जमीनों का धंधा करती हुई सेना कारखाने और कंपनियां खोलकर भी स्वायत्त सत्ता का आनंद भोग रही है।



पाकिस्तान में जब भी लोकतांत्रिक सरकार का गठन होता है तो जनता मांग करती है कि सेना की भूमिका को सार्वजनिक जीवन में कम किया जाए। क्योंकि वहां अनेक लोक प्रशासन के पदों पर भी सैन्य अधिकारी कायम रहते हैं, विभिन्न निगमों और बोर्डों के निदेशक या अध्यक्ष के रूप में। लोकतांत्रिक सरकार ऐसा करती है तो सेना को बुरा लगता है और दोनों में टसल शुरू हो जाती है। आयशा की किताब को अगर पाकिस्तान में सेना की हैसियत का एक आईना मानें तो बेहद निराशा होती है और लगता है कि पाकिस्तान में सही मायने में लोकतांत्रिक सरकार का ख्वाब तभी पूरा हो सकता है जब पूरी जनता लामबंद हो जाए। क्योंकि वहां अभी भी लोकतंत्र की बागडोर बड़े जमींदारों और उद्योगपतियों के हाथों में ही है। और इस तरह सेना और पूंजीपतियों के दुष्चक्र में आम पाकिस्तानी मारा जा रहा है। आतंकवाद तो इस दुष्चक्र का एक पहलू है, जिससे पूरी दुनिया परेशान है।