Sunday 9 May 2010

मां तुझे सलाम

c
दुनिया ही क्या समूची सृष्टि में मां को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। पशु-पक्षी जगत से लेकर मानव जगत में मां की महिमा अपरंपार है। सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को जन्म देने वाली मां को विश्‍व की समस्त संस्कृतियों में सबसे बड़ा दर्जा दिया गया है। भारत में तो मातृ पूजा हजारों साल से चली आ रही है। हम तो धरती को भी मां के रूप में पूजते हैं। दरअसल जिन स्थानों पर मनुष्य का जीवन भोजन के लिए प्रकृति पर अधिक निर्भर रहा, वहां के लोगों ने स्त्री की उर्वरता, पोषण की सामर्थ्य, ममता और सृजनात्मकता को नमन करते हुए मातृशक्ति की कल्पना की। आज हमारे खेतों में दिखाई देने वाली लाल प्रस्तर प्रतिमाएं प्राचीनकाल में मातृशक्ति के प्रतीक के रूप में हमारे पूर्वजों ने आरंभ की थीं। महान दर्शनशास्त्री डॉ. देवी प्रसाद चटोपाध्याय ने 'लोकायत' में लिखा है कि प्राचीन काल में बरसात से पहले लोग खेतों में उपजाउ लाल मिट्‌टी बिछा देते थे, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ऐसा करने से बारिश के बाद धरती रजस्वला हो जाएगी और खूब अन्न उपजाएगी, जैसे रजस्वला होने के बाद स्त्री में प्रजनन क्षमता विकसित हो जाती है। अब उस मान्यता के निशान भर बचे हैं, जिन्हें हम बालाजी के लाल रंग के कारण हनुमान का प्रतीक मानते हैं। दक्षिण भारत में वर्षा काल में समुद्र में पानी का रंग लाल हो जाने को लेकर मान्यता है कि समुद्र माता रजस्वला हो गई है। ऐसे बरसाती समय में मछुआरे समुद्र में मछली पकड ने नहीं जाते। वजह यह भी कि इसी समय मछलियां प्रजनन करती हैं, जो भारतीय परंपरा में भगवान के मत्स्य अवतार का एक रूप है।
भारत में जहां मां को शक्तिरूपा माना जाता है और गाय को उसका प्रतिरूप, वहीं ग्रीक संस्कृति में मां को गैया कहा जाता था। बौद्ध धर्म में तो भगवान बुद्ध के स्त्रीरूप में देवी तारा की महिमा गाई जाती है। रंग और विशेषताओं के अनुसार देवी तारा के दर्जनों रूपों की पूजा की जाती है। यहूदियों की बाइबिल के अनुसार कुल ५५ पैगंबर धरती पर आए उनमें से ७ स्त्रियां थीं। ईसाई समुदाय में तो मदर मैरी की महिमा का लंबा इतिहास है और प्रभु यीशु की माता को सर्वोपरि माना गया है। यूरोप के कई देशों में, खास तौर पर ब्रिटेन और आयरलैंड में तथा पुराने ब्रिटिश उपनिवेशी देशों में मदरिंग सण्डे मनाने की परंपरा आज भी विद्यमान है। वैसे अगर गौर से देखा जाए तो दुनिया के विभिन्न धर्मों में बहुत से ऐसे ईश्‍वर या देवदूत हुए हैं, जिन्हें मां ने ईश्‍वरीय इच्छा के लिए जन्म दिया, फिर वो चाहे राम हों, कृष्ण हों, ईसा मसीह हों, भगवान महावीर हों अथवा गणेश।
इस्लाम में मां को बहुत उच्च स्थान दिया गया है। पैगंबर मोहम्मद साहेब का कहना था कि जन्नत का दरवाजा मां के कदमों में है। अर्थात्‌ जिसने मां को नाराज किया या दुख पहुंचाया तो ऐसे इंसान को जन्नत में जगह नहीं मिलती। एक बार एक व्यक्ति ने पैगंबर मोहम्मद साहेब से पूछा कि हे खुदा के पैगंबर, मुझे समझाओ कि मैं किसके प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करूं? मोहम्मद साहेब ने कहा, 'तुम्हारी मां।' व्यक्ति ने फिर पूछा, 'इसके बाद?' मोहम्मद साहेब ने कहा, 'तुम्हारी मां।' उस आदमी ने फिर से पूछा, 'इसके बाद?' मोहम्मद साहेब ने कहा, 'तुम्हारी मां।'  बंदे ने चौथी बार पूछा, 'और उसके बाद?' मोहम्मद साहेब ने कहा, 'अपने पिता के प्रति।' इस्लामी देशों में मोहम्मद साहेब की बेटी फातिमा के जन्मदिन को मातृत्व का दिवस माना जाता है। बहुत से अरब देशों में २१ मार्च को मातृदिवस मनाया जाता है।
सूर्य को पिता और धरती को माता मानने वाले वाले यूनान में मार्च के किसी रविवार को यूनानी देवताओं की मां सिबेल के लिए समर्पित किया जाता था। वहीं से मदर्स डे की शुरुआत मानी जाती है। आज भी दुनिया के कई देशों में यही नियम कायम है। भारत में जहां साल में दो बार नवरात्रों के दौरान मातृशक्ति की पूजा की जाती है वहीं दुनिया के दूसरे देशों की विभिन्न संस्कृतियों में मातृशक्ति को अलग अलग समय पर नमन किया जाता है। विश्‍व के दर्जनों देशों में विश्‍व महिला दिवस को ही मातृत्व दिवस के रूप् में मनाया जाता है। थाईलैंड में महारानी श्रीकीत के जन्मदिन को मातृशक्ति का दिन माना जाता है, जो आज भी जीवित हैं। चीन में महान दार्शनिक मेंग जाई की मां के जन्मदिन को हाल के कुछ वर्षों से मातृदिवस के रूप में मनाया जाने लगा है। इण्डोनेद्गिाया में २२ दिसंबर को महिला एवं मातृत्व दिवस मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन १९३८ में इण्डोनेशियन वीमेन कांग्रेस का पहला सम्मेलन हुआ था। इजराइल में हेनेरिता जोल के जन्मदिन को मातृदिवस के तौर पर मनाया जाता है, जिसने जर्मन नाजियों के आक्रमण के समय हजारों यहूदियों की जान बचाई थी। नेपाल में वैशाख के कृष्णपक्ष में माता तीर्थ उत्सव मनाया जाता है। पनामा, मेक्सिको, बोलिविया जैसे कई देशों में मां के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए बाकायदा कानून बना कर एक दिन तय किया गया है। अमेरिका में मदर्स डे के लिए संघर्ष करने वाली अन्ना जार्विस को १९१४ में राष्ट्रपति विड्रो विल्सन द्वारा मई के दूसरे रविवार को आधिकारिक अवकाश घोषित करने पर सफलता मिली। लेकिन अन्ना को कुछ ही समय बाद अहसास हो गया कि उसकी कल्पना से परे जाकर यह उत्सव व्यापारियों के हाथों में जाकर 'हालमार्क होलीडे' हो गया।

वो नहीं बनना चाहती मां



एक तरफ जहां मां को लेकर दुनिया भर में श्रद्धाभाव है वहीं इसी दुनिया में ऐसी महिलाएं भी हैं जो मां नहीं बनना चाहतीं। नारीवादी समुदाय में एक नारा है जिसकी पैरोकार महिलाएं गर्व से कहती हैं 'चाइल्डलैस बाइ च्वाइस'। इनका मानना है कि बच्चे पैदा करने या ना करने का अधिकार एक स्त्री के पास होना चाहिए। जो दुनिया हम बना रहे हैं उसमें किसी बच्चे को जन्म देकर हम आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं? आज की आतंक और हिंसा भरी दुनिया में किसी भी मासूम को आखिर क्यों लाया जाए? इस धारा की कवयित्री शेरी एन स्लाटर 'मां के आंसू' कविता में लिखती है-

लड़का या लडकी, किसी भी बच्चे को

जन्म देना एक भयानक विचार है

इस बदसूरत और खतरनाक दुनिया में

.....

जहां एक सरकार कहती है

'आओ सेना में दाखिल हो जाओ'

मांओं के आंसुओं से कब्रिस्तानों में बाढ आ गई है

और मैं महसूस करती हूं कि

जो मेरे पास नहीं है वो मुझे नहीं चाहिए।


इसी तरह पॉला अमान लिखती है-

सेब और सांपों की चमकीली जगहों में

बस यही आवाजें गूंजती हैं

'दूधों नहाओ, पूतों फलो!'

'क्या तुम्हारा परिवार है?'

अजनबी लोग पूछते हैं

मानो, मेरी उम्र की औरत के पास

अपनी उर्वरता साबित कर

इस दुनिया को देने के लिए

फल के रूप में सिर्फ एक बच्चा ही बचा है

कवयित्री एलीसन सोलोमन बहुत खूबसूरती के साथ मातृत्वहीन महिला की ताकत बयान करते हुए कहती है-

मैंने पीरियड्‌स की बदसूरती
बयान करती कोई कविता नहीं देखी
वैसे पीरियड्‌स चमत्कारी भी होते हैं

.....

गहरे लाल फूल क्या हैं
सिर्फ एक खाली गर्भाशय के सबूत के सिवा?

.....

एक सूनी कोख भी खूबसूरत होती है....

मैं जानती हूं

एक बांझ औरत भी कविता लिखती है।
यह आलेख 'डेली न्‍यूज़' जयपुर के रविवारीय संस्‍करण 'हम लोग' में रविवार 9 मई, 2010 को प्रकाशित हुआ।
यहाँ प्रयोग की गई पेंटिंग इरान के मशहूर चित्रकार इमान मलेकी की है.

6 comments:

  1. माँ तुझे प्रणाम ...!!

    ReplyDelete
  2. माँ को समूचे विश्व के फ़लक से आपने देखने की सफल कोशिश की है ,माँ की प्रतिष्ठा तो हमारे देश मे भी है किन्तु एक स्त्री जिसमे माँ के रूप के साथ समाज के अन्य कई रिश्ते समाये होते है और उन सारे रिश्तो की जरूरत भी है समाज को ,लेकिन कुछ प्रतिशत को यदि छोड़ दें तो आज हमारा समाज परिवार इस पवित्र रिश्ते की गरिमा भूल चुका है ,तभी तो कोई कलम यह कहने को मजबूर हो जाती है कि मै माँ नही बनना चाहती ।

    ReplyDelete
  3. मातृत्व दिवस पर बहुत अच्छी पोस्ट लिखी आपने
    बहुत सी नयी जानकारी भी मिली ...

    कवयित्री शेरी एन की कवितायेँ अच्छी लगीं .....!!

    ReplyDelete
  4. माँ तो माँ ही होती है। माँ सरीखा कोई और नहीँ हो सकता।भगवान यदि होता है तो वह भी माँ के बराबर हरगिज नहीँ हो सकता क्योँ कि उसे भी कोई माँ ही ने जन्म दिया होगा।
    भाई प्रेम चंद जी क्या गज़ब लिखा है !विश्व साहित्य मेँ भी माँ तो माँ ही है।क्या गज़ब की तथा नवीन जानकारियां दी हैँ मुझे।गर्व है आप पर। बधाई के साथ ये भी कहूंगा- अपनी कलम मुझे दे दे ठाकुर!

    ReplyDelete
  5. एक उच्च-स्तरीय उत्कृष्ट ब्लॉग।
    — महेंद्रभटनागर
    E-Mail : drmahendra02@gmail.com
    Mobile : 081 097 300 48

    ReplyDelete

Indic Transliteration