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Wednesday, 31 August 2011

इशरत के लिए

(एक असमाप्‍त लंबी कविता का पहला ड्राफ्ट )


इस जहां में हो कहां
इशरत जहां


तुम्‍हारा नाम सुन-सुन कर
पक ही गए हैं मेरे कान


आज फिर उस उजड़ी हुई
बगीची के पास से गुज़रा हूं तो
तुम्‍हारी याद के नश्‍तर गहरे चुभने लगे


तुम कैसे भूल सकती हो यह बगीची
यहीं मेरी पीठ पर चढ़कर
तुमने तोड़ी थीं कच्‍ची इमलियां
यहीं तुम्‍हारे साथ खाई थी
बचपन में जंगल जलेबी
माली काका की नज़रों से बचकर
हमने साथ-साथ चुराए थे
कच्‍चे अमरूद और करौंदों के साथ अनार


सुनो इशरत
इस बगिया में अब हमारे वक्‍त के
कुछ बूढ़े दरख्‍त ही बचे हैं
एक तो शायद वह नीम है
जिस पर चढ़ने की कोशिश में
तुम्‍हारे बांए पांव में मोच आ गई थी


लाख कोशिशों के बावजूद
नहीं नष्‍ट हुआ वह जटाजूट बरगद
जिसके विशाल चबूतरे पर जमी रहती थी
मोहल्‍ले भर के नौजवान-बुजुर्गों की महफिल


इसी बरगद की जटाओं पर झूलते हुए
हमने खेला था टार्जन-टार्जन
अब वह छोटा-सा शिवालय नहीं रहा
एक विशाल और भव्‍य मंदिर है यहां
नहीं रहे पुजारी काका
अब तो पीतांबर वर्दीधारी दर्जनों पुजारी हैं यहां
रात-दिन गाडि़यों की रेलपेल में
लगी रहती है भक्‍तों की भीड़
हमारे देखते-देखते वह छोटा-सा शिवालय
बदल गया प्राचीन चमत्‍कारी मंदिर में


बहुत कुछ बदल गया है इशरत
इसी बगीची के दूसरे छोर पर
करीब एक मील आगे चलकर
शिरीष, गुलमोहर, नीम, पीपल और बबूल के
घने दरख्‍तों से घिरी थी ना
सैय्यद बाबा की निर्जन-सी मजार
जहां शाम के वक्‍त आने से डरते थे लोग
कहते थे यहां पहाडि़यों से आते हैं
हिंसक वन्‍य जीव पास के तालाब में पानी पीने
वह छोटी-सी उपेक्षित मजार
तब्‍दील हो गई है दरगाह में
दरख्‍तों की हरियाली वहां अब
हरी ध्‍वजाओं में सिमट गई है

इस तेज़ी से बदलती दुनिया में
हमारे बचपन और स्‍मृतियों के साथ
ना जाने क्‍या-क्‍या छूटता चला गया
मन के एक हरियल कोने में
तुम्‍हारे नाम की चंचल चिडि़या
कूकती रही लगातार


गुज़रे वक्‍त के लिए मेरे पास
कोई ठीक शब्‍द नहीं
पाश की भाषा में कहूं तो यह सब क्‍या
हमारे ही वक्‍तों में होना था?
मज़हब और जाति के नाम पर
राजनीति का एक अंतहीन खूनी खेल
जिससे घायल होती रही
मेरे मन में बैठी
तुम्‍हारे नाम की नन्‍हीं चिडि़या
उसकी मीठी कूक
धीरे-धीरे बदल गई रूदन में


फिर जो गूंजा तुम्‍हारा नाम खबरों में
तो हैरत में पड़ गया था मैं...








Tuesday, 24 August 2010

बहन

बहन

मां की कोख से
पैदा हुई लड़की का ही नाम नहीं है
उस रिश्‍ते का भी नाम है
जो पुरुष को मां के बाद
पहली बार
नारी का सामीप्‍य और स्‍नेह देता है

बहन
कलाई पर राखी बांधने वाली
लड़की का ही नाम नहीं है
उस रिश्‍ते का भी नाम है
जो पीले धागे को पावन बनाता है
एक नया अर्थ देता है

मां
पुरुष की जननी है
और पत्‍नी जीवन-संगिनी
             पुरुष के नारी-संबंधों के
                इन दो छोरों के बीच
पावन गंगा की तरह बहती
नदी का नाम है
बहन

Sunday, 20 June 2010

मेरे पिता... तेरा मान रहे... सम्मान रहे

प्राणी जगत में मनुष्य ही है जिसने रक्त संबंधों को सभ्यता के विभिन्न चरणों में नई गरिमा और नई पहचान दी है। एक आदर्श और मानवीय समाज की सतत परिकल्पना में पारिवारिक संबंधों के महानतम रूप में माता और पिता को सर्वोच्च स्थान दिया गया। मातृसत्तात्मक समाज से जब पितृसत्तात्मक व्यवस्था की नींव पड़ी तो सभ्यता, संस्कृति और समाज में परिवार के मुखिया पुरुष को राज्य के समान सत्ता मिली। जहां पहले राजा को संपूर्ण प्रजा के पालन का दायित्व था, वह परिवार में पालक पिता का हो गया। यहीं से परिवार में पिता और संतानों के बीच संबंधों का रोचक इतिहास आरंभ होता है। समाज में उत्पादन के साधनों के विकास के साथ जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ने लगा, परिवार की आय में वृद्धि होती गई, उसी परिमाण में पारिवारिक संबंधों का स्वरूप भी बदलता गया। इन संबंधों के बदलने में स्थानीय परिवेश और संस्कृति का भी उत्पादन के साधनों जितना ही महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों में हुए शोध, लेखन और समग्र विकास का विहगावलोकन करें तो यह बात पूरी तरह साफ हो जाएगी कि लगभग हर दशक में कम से कम एक पीढ़ी का पिता अपनी परवर्ती पीढ़ी के पिता से अलग दिखाई देता है। समाज में सांस्कृतिक स्तर पर परिवर्तन बहुत धीमी गति से होते हैं, इसलिए पारिवारिक संबंधों पर पड़ने वाला इनका प्रभाव बहुत देर से दिखाई देता है, लेकिन उत्पादन के साधनों यानी आर्थिक जगत में परिवर्तन तेजी से होते हैं, इसलिए ऐसे परिवर्तनों से पड़ने वाले प्रभाव तुरंत दिखाई देते हैं।

पालक पिता को परिवार के सभी सदस्यों की सर्वांगीण सुरक्षा को लेकर चिंता रहती है, इसलिए पिता की आशंकाएं और आकांक्षाएं पत्नी से लेकर संतानों पर ही केंद्रित रहती हैं। कुछ समय पहल कहीं यह पढ़ने को मिला कि परिवार में पुरुष को आंधी, तूफान, बारिश, भूकंप, आग, किसी के आने या जाने की आहट, शोर-शराबा और ऐसे ही खतरों को लेकर तुरंत सजग होना पड़ता है, क्योंकि इनसे पूरे परिवार को खतरा हो सकता है, जबकि महिलाएं उन खतरों को जल्दी पकड़ती हैं, जिनसे सिर्फ बच्चों को खतरा हो। एक पिता जहां अपने पुत्रों की आर्थिक सुरक्षा और नैतिक व्यवहार को लेकर जीवन भर सशंकित रहता है, वहीं पुत्रियों को लेकर उनके भावी वैवाहिक जीवन और विवाहपूर्व सदाचारी जीवन के बारे में चिंतित रहता है। यह कमोबेश आज भी चली आ रही सनातन चिंताएं हैं। पिछली दो सदियों का साहित्य उठाकर देख लीजिए हर जगह पिता की यही चिंताएं देखने को मिलेंगी। रूसी, यूरोपियन और अमेरिकी ही नहीं भारतीय साहित्य में भी इसके असंख्य उदाहरण बिखरे पड़े हैं। प्रेमचंद के ‘गोदान’ का होरी अपने पुत्र गोबर के भविष्य और झुनिया के साथ उसके प्रेमसंबंध को लेकर आज के किसी भी पिता की तरह चिंतित दिखाई देता है। पश्चिमी साहित्य में तो लंपट पिता अपने पुत्रों के चरित्र को लेकर हद दर्जे तक सशंकित दिखाई देते हैं। खास तौर पर रूसी उपन्यासों के पिता अपने पुत्रों के प्रति खलनायक नजर आ जाते हैं। इसका मुख्य कारण है उस काल खण्ड में पनपा सामंती व्यवहार, जो भू दास प्रथा, जमींदारी, उन्नत कृषि तकनीक और कृषि के अतिरिक्त अन्य आयस्रोतों के पनपने से परिवार के मुखिया पिता में विकसित होता है।

खैर, अगर हम एक सदी के हिंदी सिनेमा को गौर से देखें तो पिता और संतानों के बीच बदलते हुए अंतर्संबंध हर दौर में नजर आएंगे। हिंदी सिनेमा में तो सैंकड़ों फिल्में पिता और संतान के बीच के अंतर्विरोधों को लेकर ही बनी हैं। फिर वह राजकपूर का सिनेमा हो या राजकुमार हीरानी का। और दोनों के बीच अंतर्द्वंद्व मुख्य रूप से अमीरी गरीबी के बीच चुनाव, नैतिक और अनैतिक में से एक का पक्ष लेना या समय और समझ के हिसाब से स्वतंत्र निर्णय और पारंपरिकता को निभाने के बहुआयामी दबावों को लेकर होते हैं। हर व्यक्ति की तरह सभी पिता और उनकी संतानें अपने समय और भविष्य को लेकर अपने मन से जीवन जीने का स्वप्न देखते हैं और व्यवहार में भी यही कोशिश करते हैं। लेकिन समय इतनी तेजी से आगे बढ़ता है कि कोई भी पीढ़ी उसे पूरी तरह पकड़ नहीं पाती। इसी वजह से हर व्यक्ति नॉस्टेल्जिक होता है, उसे अपना बचपन और पिता के साथ बिताए दिन याद आते हैं, जो एक समय बाद यथार्थ के पथरीले फर्श पर मिट्टी के खिलौनों की तरह चकनाचूर हो जाते हैं।

संतान को लगता है, मेरे पिता ऐसे तो नहीं थे, उन्हें क्या हो गया है? दूसरी तरफ पिता को महसूस होता है कि मेरी परवरिश में ऐसी कौनसी कमी रह गई जो औलाद ऐसी निकल गई। भारतीय समाज में जब तक संयुक्त परिवार की व्यवस्था मजबूत रही, पारिवारिक संबंधों में भी सुदृढ़ता बनी रही, कारण यह कि एक साथ रहने से परिवार के पुरुषों को बहुत से सुरक्षा संबंधी मामलों में पारस्परिक अंतर्निभरता की वजह से निश्चिंतता रहती थी। लेकिन समय के साथ आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर जब संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार विकसित होने से असुरक्षा की भावना अधिक बलवती हुई तो घर टूटने लगे। जिन पिताओं ने अपने सुखद भविष्य की कामना में अपने पुत्र-पुत्रियों को उच्च शिक्षा दिलाई, कमाई के लिए विदेश भेजा, आज वे स्वयं एकाकी जीवन जी रहे हैं। बदले हुए समय में दूरियों ने संबंधों की मृदुलता कम कर दी है, पिता सांस्कृतिक रूप से आदरणीय और पूज्य हैं, लेकिन लाखों का नुकसान सह करना और लाखों रुपयों के साथ काम के कई दिन खर्च कर उनकी तीमारदारी करना आज की संतान के लिए अव्यावहारिक है, इसलिए हद से हद पैसे भेज देना और फोन पर चिंता करना जिम्मेदार संतान की निशानी रह गया है। पिता भी इस बात को जानते हैं कि एक समय उन्होंने खुद अपने पिता को सुनहरे स्वप्न दिखाकर लौटने के वादे के साथ कभी ना लौटने का संकल्प लिया था। इसीलिए आप देखेंगे कि पिछले कुछ बरसों में वृद्धाश्रमों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। कार्पोरेट स्तर पर इधर आलीशान ओल्ड एज या रिटायरमेंट होम भी बनने लगे हैं। यह सब पिता और संतानों के बीच हो रहे बदलावों के मुखर संकेत हैं और फिर यह बात स्‍पष्‍ट होती है कि उत्‍पादन के साधनों के साथ पारिवारिक संबंधों में भी परिवर्तन होते हैं।

लेकिन उन पिताओं की बात अलग है, जिन्होंने अपनी संतानों को अपनी अदम्य जिजीविषा से जीवनभर प्रेरित किए रखा। मुंशी प्रेमचंद के यशस्वी पुत्र अमृतराय ने प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ जीवन लिखी ‘कलम का सिपाही’, सज्जाद जहीर की रचनाकर पुत्री नूर जहीर ने पिता के साथ बिताए वर्षों के यादगार संस्मरण ‘मेरे हिस्से की रौशनाई’ में लिखे, जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा गांधी के नाम अविस्मरणीय पत्र लिखे, ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य में विशेष रूप से आजादी के बाद के साहित्य में पिता की बेहद मार्मिक छवियां मिलती हैं। आजादी के मोहभंग से उपजी पिताओं की निराशा, हताशा और कुंठाओं को अनेक लेखकों ने बहुत गहराई से रचा है। उदय प्रकाश की कहानी ‘तिरिछ’ में पिता की गैर मौजूदगी और उनकी ज्ञात-अज्ञात कारणों से हुई मौत हमारी पूरी व्यवस्था पर ही प्रश्‍नचिह्न लगा जाती है। पिछली सदी में पिता परिवार में संतानों के लिए भय का पर्याय हुआ करता था, जो अब थोड़ा बहुत मित्रवत हो गया है। विगत कुछ वर्षों में हुए वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि जिन परिवारों में पिता की पालन-पोषण में सक्रिय भूमिका रहती है, उनके बच्चे बहुत सी मानसिक और शारीरिक बीमारियों का शिकार होने से बच जाते हैं।

पिता और संतान के बीच का सारा द्वंद्व समय और समाज में चल रहे विचारों का होता है। ऐसा कभी कोई आदर्श समाज नहीं रहा, जिसमें सिर्फ श्रवण कुमार जैसी आदर्श और परम आज्ञाकारी संतानें हों, और ऐसी कोई कामना करना भी सिवा खामखयाली के कुछ नहीं है। हमारे कवि मित्र हरीश करमचंदाणी अपनी एक कविता में लिखते हैं, ‘क्या पिता की हर बात मानना संभव भी है?’ सच्चाई यह है कि बिना वैज्ञानिक ज्ञान या समझ के अपने पूर्ववर्तियों की बात को ठुकरा देना जितना नुकसानदेह होता है, उससे कहीं अधिक हानिकारक होता है अंधश्रद्धा से मान लेना। इस दुनिया को जितना आज्ञाकारी संतानों ने बनाया है उससे कहीं ज्यादा उन्होंने बनाया, जिन्होंने अपने पिता की इच्छाओं के विपरीत जाकर अपना मार्ग चुना और सफलता हासिल की। ईसाई धर्म में जिस धर्मगुरु को फादर कहते हैं, गैलीलियो ने उसी की सत्ता को चुनौती दी। चार्ल्स डार्विन ने अपने पिता की नाराजगी के बावजूद अपनी खोजें जारी रखीं। एक मशहूर शेर है कि ‘कुफ्र कुछ चाहिए, इस्लाम की रौनक के लिए’, तो कुछ हुक्म उदूलियां अनिवार्य हैं, मावनीय सभ्यता को आगे ले जाने के लिए। संतान का धर्म है पिता की व्यवस्था को आगे ले जाना और पिता का धर्म है कि बूढ़े दरख्तों की तरह घर-आंगन में अपने आशीर्वाद का साया फैलाते रहें। 

यह आलेख डेली न्‍यूज़ के रविवारीय परिशिष्‍ट 'हम लोग' में प्रकाशित हुआ। चित्र http://www.hoviscreations.com/ से साभार।

Sunday, 9 May 2010

मां तुझे सलाम

c
दुनिया ही क्या समूची सृष्टि में मां को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। पशु-पक्षी जगत से लेकर मानव जगत में मां की महिमा अपरंपार है। सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को जन्म देने वाली मां को विश्‍व की समस्त संस्कृतियों में सबसे बड़ा दर्जा दिया गया है। भारत में तो मातृ पूजा हजारों साल से चली आ रही है। हम तो धरती को भी मां के रूप में पूजते हैं। दरअसल जिन स्थानों पर मनुष्य का जीवन भोजन के लिए प्रकृति पर अधिक निर्भर रहा, वहां के लोगों ने स्त्री की उर्वरता, पोषण की सामर्थ्य, ममता और सृजनात्मकता को नमन करते हुए मातृशक्ति की कल्पना की। आज हमारे खेतों में दिखाई देने वाली लाल प्रस्तर प्रतिमाएं प्राचीनकाल में मातृशक्ति के प्रतीक के रूप में हमारे पूर्वजों ने आरंभ की थीं। महान दर्शनशास्त्री डॉ. देवी प्रसाद चटोपाध्याय ने 'लोकायत' में लिखा है कि प्राचीन काल में बरसात से पहले लोग खेतों में उपजाउ लाल मिट्‌टी बिछा देते थे, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ऐसा करने से बारिश के बाद धरती रजस्वला हो जाएगी और खूब अन्न उपजाएगी, जैसे रजस्वला होने के बाद स्त्री में प्रजनन क्षमता विकसित हो जाती है। अब उस मान्यता के निशान भर बचे हैं, जिन्हें हम बालाजी के लाल रंग के कारण हनुमान का प्रतीक मानते हैं। दक्षिण भारत में वर्षा काल में समुद्र में पानी का रंग लाल हो जाने को लेकर मान्यता है कि समुद्र माता रजस्वला हो गई है। ऐसे बरसाती समय में मछुआरे समुद्र में मछली पकड ने नहीं जाते। वजह यह भी कि इसी समय मछलियां प्रजनन करती हैं, जो भारतीय परंपरा में भगवान के मत्स्य अवतार का एक रूप है।
भारत में जहां मां को शक्तिरूपा माना जाता है और गाय को उसका प्रतिरूप, वहीं ग्रीक संस्कृति में मां को गैया कहा जाता था। बौद्ध धर्म में तो भगवान बुद्ध के स्त्रीरूप में देवी तारा की महिमा गाई जाती है। रंग और विशेषताओं के अनुसार देवी तारा के दर्जनों रूपों की पूजा की जाती है। यहूदियों की बाइबिल के अनुसार कुल ५५ पैगंबर धरती पर आए उनमें से ७ स्त्रियां थीं। ईसाई समुदाय में तो मदर मैरी की महिमा का लंबा इतिहास है और प्रभु यीशु की माता को सर्वोपरि माना गया है। यूरोप के कई देशों में, खास तौर पर ब्रिटेन और आयरलैंड में तथा पुराने ब्रिटिश उपनिवेशी देशों में मदरिंग सण्डे मनाने की परंपरा आज भी विद्यमान है। वैसे अगर गौर से देखा जाए तो दुनिया के विभिन्न धर्मों में बहुत से ऐसे ईश्‍वर या देवदूत हुए हैं, जिन्हें मां ने ईश्‍वरीय इच्छा के लिए जन्म दिया, फिर वो चाहे राम हों, कृष्ण हों, ईसा मसीह हों, भगवान महावीर हों अथवा गणेश।
इस्लाम में मां को बहुत उच्च स्थान दिया गया है। पैगंबर मोहम्मद साहेब का कहना था कि जन्नत का दरवाजा मां के कदमों में है। अर्थात्‌ जिसने मां को नाराज किया या दुख पहुंचाया तो ऐसे इंसान को जन्नत में जगह नहीं मिलती। एक बार एक व्यक्ति ने पैगंबर मोहम्मद साहेब से पूछा कि हे खुदा के पैगंबर, मुझे समझाओ कि मैं किसके प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करूं? मोहम्मद साहेब ने कहा, 'तुम्हारी मां।' व्यक्ति ने फिर पूछा, 'इसके बाद?' मोहम्मद साहेब ने कहा, 'तुम्हारी मां।' उस आदमी ने फिर से पूछा, 'इसके बाद?' मोहम्मद साहेब ने कहा, 'तुम्हारी मां।'  बंदे ने चौथी बार पूछा, 'और उसके बाद?' मोहम्मद साहेब ने कहा, 'अपने पिता के प्रति।' इस्लामी देशों में मोहम्मद साहेब की बेटी फातिमा के जन्मदिन को मातृत्व का दिवस माना जाता है। बहुत से अरब देशों में २१ मार्च को मातृदिवस मनाया जाता है।
सूर्य को पिता और धरती को माता मानने वाले वाले यूनान में मार्च के किसी रविवार को यूनानी देवताओं की मां सिबेल के लिए समर्पित किया जाता था। वहीं से मदर्स डे की शुरुआत मानी जाती है। आज भी दुनिया के कई देशों में यही नियम कायम है। भारत में जहां साल में दो बार नवरात्रों के दौरान मातृशक्ति की पूजा की जाती है वहीं दुनिया के दूसरे देशों की विभिन्न संस्कृतियों में मातृशक्ति को अलग अलग समय पर नमन किया जाता है। विश्‍व के दर्जनों देशों में विश्‍व महिला दिवस को ही मातृत्व दिवस के रूप् में मनाया जाता है। थाईलैंड में महारानी श्रीकीत के जन्मदिन को मातृशक्ति का दिन माना जाता है, जो आज भी जीवित हैं। चीन में महान दार्शनिक मेंग जाई की मां के जन्मदिन को हाल के कुछ वर्षों से मातृदिवस के रूप में मनाया जाने लगा है। इण्डोनेद्गिाया में २२ दिसंबर को महिला एवं मातृत्व दिवस मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन १९३८ में इण्डोनेशियन वीमेन कांग्रेस का पहला सम्मेलन हुआ था। इजराइल में हेनेरिता जोल के जन्मदिन को मातृदिवस के तौर पर मनाया जाता है, जिसने जर्मन नाजियों के आक्रमण के समय हजारों यहूदियों की जान बचाई थी। नेपाल में वैशाख के कृष्णपक्ष में माता तीर्थ उत्सव मनाया जाता है। पनामा, मेक्सिको, बोलिविया जैसे कई देशों में मां के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए बाकायदा कानून बना कर एक दिन तय किया गया है। अमेरिका में मदर्स डे के लिए संघर्ष करने वाली अन्ना जार्विस को १९१४ में राष्ट्रपति विड्रो विल्सन द्वारा मई के दूसरे रविवार को आधिकारिक अवकाश घोषित करने पर सफलता मिली। लेकिन अन्ना को कुछ ही समय बाद अहसास हो गया कि उसकी कल्पना से परे जाकर यह उत्सव व्यापारियों के हाथों में जाकर 'हालमार्क होलीडे' हो गया।

वो नहीं बनना चाहती मां



एक तरफ जहां मां को लेकर दुनिया भर में श्रद्धाभाव है वहीं इसी दुनिया में ऐसी महिलाएं भी हैं जो मां नहीं बनना चाहतीं। नारीवादी समुदाय में एक नारा है जिसकी पैरोकार महिलाएं गर्व से कहती हैं 'चाइल्डलैस बाइ च्वाइस'। इनका मानना है कि बच्चे पैदा करने या ना करने का अधिकार एक स्त्री के पास होना चाहिए। जो दुनिया हम बना रहे हैं उसमें किसी बच्चे को जन्म देकर हम आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं? आज की आतंक और हिंसा भरी दुनिया में किसी भी मासूम को आखिर क्यों लाया जाए? इस धारा की कवयित्री शेरी एन स्लाटर 'मां के आंसू' कविता में लिखती है-

लड़का या लडकी, किसी भी बच्चे को

जन्म देना एक भयानक विचार है

इस बदसूरत और खतरनाक दुनिया में

.....

जहां एक सरकार कहती है

'आओ सेना में दाखिल हो जाओ'

मांओं के आंसुओं से कब्रिस्तानों में बाढ आ गई है

और मैं महसूस करती हूं कि

जो मेरे पास नहीं है वो मुझे नहीं चाहिए।


इसी तरह पॉला अमान लिखती है-

सेब और सांपों की चमकीली जगहों में

बस यही आवाजें गूंजती हैं

'दूधों नहाओ, पूतों फलो!'

'क्या तुम्हारा परिवार है?'

अजनबी लोग पूछते हैं

मानो, मेरी उम्र की औरत के पास

अपनी उर्वरता साबित कर

इस दुनिया को देने के लिए

फल के रूप में सिर्फ एक बच्चा ही बचा है

कवयित्री एलीसन सोलोमन बहुत खूबसूरती के साथ मातृत्वहीन महिला की ताकत बयान करते हुए कहती है-

मैंने पीरियड्‌स की बदसूरती
बयान करती कोई कविता नहीं देखी
वैसे पीरियड्‌स चमत्कारी भी होते हैं

.....

गहरे लाल फूल क्या हैं
सिर्फ एक खाली गर्भाशय के सबूत के सिवा?

.....

एक सूनी कोख भी खूबसूरत होती है....

मैं जानती हूं

एक बांझ औरत भी कविता लिखती है।
यह आलेख 'डेली न्‍यूज़' जयपुर के रविवारीय संस्‍करण 'हम लोग' में रविवार 9 मई, 2010 को प्रकाशित हुआ।
यहाँ प्रयोग की गई पेंटिंग इरान के मशहूर चित्रकार इमान मलेकी की है.