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Sunday, 20 June 2010

मेरे पिता... तेरा मान रहे... सम्मान रहे

प्राणी जगत में मनुष्य ही है जिसने रक्त संबंधों को सभ्यता के विभिन्न चरणों में नई गरिमा और नई पहचान दी है। एक आदर्श और मानवीय समाज की सतत परिकल्पना में पारिवारिक संबंधों के महानतम रूप में माता और पिता को सर्वोच्च स्थान दिया गया। मातृसत्तात्मक समाज से जब पितृसत्तात्मक व्यवस्था की नींव पड़ी तो सभ्यता, संस्कृति और समाज में परिवार के मुखिया पुरुष को राज्य के समान सत्ता मिली। जहां पहले राजा को संपूर्ण प्रजा के पालन का दायित्व था, वह परिवार में पालक पिता का हो गया। यहीं से परिवार में पिता और संतानों के बीच संबंधों का रोचक इतिहास आरंभ होता है। समाज में उत्पादन के साधनों के विकास के साथ जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ने लगा, परिवार की आय में वृद्धि होती गई, उसी परिमाण में पारिवारिक संबंधों का स्वरूप भी बदलता गया। इन संबंधों के बदलने में स्थानीय परिवेश और संस्कृति का भी उत्पादन के साधनों जितना ही महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों में हुए शोध, लेखन और समग्र विकास का विहगावलोकन करें तो यह बात पूरी तरह साफ हो जाएगी कि लगभग हर दशक में कम से कम एक पीढ़ी का पिता अपनी परवर्ती पीढ़ी के पिता से अलग दिखाई देता है। समाज में सांस्कृतिक स्तर पर परिवर्तन बहुत धीमी गति से होते हैं, इसलिए पारिवारिक संबंधों पर पड़ने वाला इनका प्रभाव बहुत देर से दिखाई देता है, लेकिन उत्पादन के साधनों यानी आर्थिक जगत में परिवर्तन तेजी से होते हैं, इसलिए ऐसे परिवर्तनों से पड़ने वाले प्रभाव तुरंत दिखाई देते हैं।

पालक पिता को परिवार के सभी सदस्यों की सर्वांगीण सुरक्षा को लेकर चिंता रहती है, इसलिए पिता की आशंकाएं और आकांक्षाएं पत्नी से लेकर संतानों पर ही केंद्रित रहती हैं। कुछ समय पहल कहीं यह पढ़ने को मिला कि परिवार में पुरुष को आंधी, तूफान, बारिश, भूकंप, आग, किसी के आने या जाने की आहट, शोर-शराबा और ऐसे ही खतरों को लेकर तुरंत सजग होना पड़ता है, क्योंकि इनसे पूरे परिवार को खतरा हो सकता है, जबकि महिलाएं उन खतरों को जल्दी पकड़ती हैं, जिनसे सिर्फ बच्चों को खतरा हो। एक पिता जहां अपने पुत्रों की आर्थिक सुरक्षा और नैतिक व्यवहार को लेकर जीवन भर सशंकित रहता है, वहीं पुत्रियों को लेकर उनके भावी वैवाहिक जीवन और विवाहपूर्व सदाचारी जीवन के बारे में चिंतित रहता है। यह कमोबेश आज भी चली आ रही सनातन चिंताएं हैं। पिछली दो सदियों का साहित्य उठाकर देख लीजिए हर जगह पिता की यही चिंताएं देखने को मिलेंगी। रूसी, यूरोपियन और अमेरिकी ही नहीं भारतीय साहित्य में भी इसके असंख्य उदाहरण बिखरे पड़े हैं। प्रेमचंद के ‘गोदान’ का होरी अपने पुत्र गोबर के भविष्य और झुनिया के साथ उसके प्रेमसंबंध को लेकर आज के किसी भी पिता की तरह चिंतित दिखाई देता है। पश्चिमी साहित्य में तो लंपट पिता अपने पुत्रों के चरित्र को लेकर हद दर्जे तक सशंकित दिखाई देते हैं। खास तौर पर रूसी उपन्यासों के पिता अपने पुत्रों के प्रति खलनायक नजर आ जाते हैं। इसका मुख्य कारण है उस काल खण्ड में पनपा सामंती व्यवहार, जो भू दास प्रथा, जमींदारी, उन्नत कृषि तकनीक और कृषि के अतिरिक्त अन्य आयस्रोतों के पनपने से परिवार के मुखिया पिता में विकसित होता है।

खैर, अगर हम एक सदी के हिंदी सिनेमा को गौर से देखें तो पिता और संतानों के बीच बदलते हुए अंतर्संबंध हर दौर में नजर आएंगे। हिंदी सिनेमा में तो सैंकड़ों फिल्में पिता और संतान के बीच के अंतर्विरोधों को लेकर ही बनी हैं। फिर वह राजकपूर का सिनेमा हो या राजकुमार हीरानी का। और दोनों के बीच अंतर्द्वंद्व मुख्य रूप से अमीरी गरीबी के बीच चुनाव, नैतिक और अनैतिक में से एक का पक्ष लेना या समय और समझ के हिसाब से स्वतंत्र निर्णय और पारंपरिकता को निभाने के बहुआयामी दबावों को लेकर होते हैं। हर व्यक्ति की तरह सभी पिता और उनकी संतानें अपने समय और भविष्य को लेकर अपने मन से जीवन जीने का स्वप्न देखते हैं और व्यवहार में भी यही कोशिश करते हैं। लेकिन समय इतनी तेजी से आगे बढ़ता है कि कोई भी पीढ़ी उसे पूरी तरह पकड़ नहीं पाती। इसी वजह से हर व्यक्ति नॉस्टेल्जिक होता है, उसे अपना बचपन और पिता के साथ बिताए दिन याद आते हैं, जो एक समय बाद यथार्थ के पथरीले फर्श पर मिट्टी के खिलौनों की तरह चकनाचूर हो जाते हैं।

संतान को लगता है, मेरे पिता ऐसे तो नहीं थे, उन्हें क्या हो गया है? दूसरी तरफ पिता को महसूस होता है कि मेरी परवरिश में ऐसी कौनसी कमी रह गई जो औलाद ऐसी निकल गई। भारतीय समाज में जब तक संयुक्त परिवार की व्यवस्था मजबूत रही, पारिवारिक संबंधों में भी सुदृढ़ता बनी रही, कारण यह कि एक साथ रहने से परिवार के पुरुषों को बहुत से सुरक्षा संबंधी मामलों में पारस्परिक अंतर्निभरता की वजह से निश्चिंतता रहती थी। लेकिन समय के साथ आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर जब संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार विकसित होने से असुरक्षा की भावना अधिक बलवती हुई तो घर टूटने लगे। जिन पिताओं ने अपने सुखद भविष्य की कामना में अपने पुत्र-पुत्रियों को उच्च शिक्षा दिलाई, कमाई के लिए विदेश भेजा, आज वे स्वयं एकाकी जीवन जी रहे हैं। बदले हुए समय में दूरियों ने संबंधों की मृदुलता कम कर दी है, पिता सांस्कृतिक रूप से आदरणीय और पूज्य हैं, लेकिन लाखों का नुकसान सह करना और लाखों रुपयों के साथ काम के कई दिन खर्च कर उनकी तीमारदारी करना आज की संतान के लिए अव्यावहारिक है, इसलिए हद से हद पैसे भेज देना और फोन पर चिंता करना जिम्मेदार संतान की निशानी रह गया है। पिता भी इस बात को जानते हैं कि एक समय उन्होंने खुद अपने पिता को सुनहरे स्वप्न दिखाकर लौटने के वादे के साथ कभी ना लौटने का संकल्प लिया था। इसीलिए आप देखेंगे कि पिछले कुछ बरसों में वृद्धाश्रमों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। कार्पोरेट स्तर पर इधर आलीशान ओल्ड एज या रिटायरमेंट होम भी बनने लगे हैं। यह सब पिता और संतानों के बीच हो रहे बदलावों के मुखर संकेत हैं और फिर यह बात स्‍पष्‍ट होती है कि उत्‍पादन के साधनों के साथ पारिवारिक संबंधों में भी परिवर्तन होते हैं।

लेकिन उन पिताओं की बात अलग है, जिन्होंने अपनी संतानों को अपनी अदम्य जिजीविषा से जीवनभर प्रेरित किए रखा। मुंशी प्रेमचंद के यशस्वी पुत्र अमृतराय ने प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ जीवन लिखी ‘कलम का सिपाही’, सज्जाद जहीर की रचनाकर पुत्री नूर जहीर ने पिता के साथ बिताए वर्षों के यादगार संस्मरण ‘मेरे हिस्से की रौशनाई’ में लिखे, जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा गांधी के नाम अविस्मरणीय पत्र लिखे, ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य में विशेष रूप से आजादी के बाद के साहित्य में पिता की बेहद मार्मिक छवियां मिलती हैं। आजादी के मोहभंग से उपजी पिताओं की निराशा, हताशा और कुंठाओं को अनेक लेखकों ने बहुत गहराई से रचा है। उदय प्रकाश की कहानी ‘तिरिछ’ में पिता की गैर मौजूदगी और उनकी ज्ञात-अज्ञात कारणों से हुई मौत हमारी पूरी व्यवस्था पर ही प्रश्‍नचिह्न लगा जाती है। पिछली सदी में पिता परिवार में संतानों के लिए भय का पर्याय हुआ करता था, जो अब थोड़ा बहुत मित्रवत हो गया है। विगत कुछ वर्षों में हुए वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि जिन परिवारों में पिता की पालन-पोषण में सक्रिय भूमिका रहती है, उनके बच्चे बहुत सी मानसिक और शारीरिक बीमारियों का शिकार होने से बच जाते हैं।

पिता और संतान के बीच का सारा द्वंद्व समय और समाज में चल रहे विचारों का होता है। ऐसा कभी कोई आदर्श समाज नहीं रहा, जिसमें सिर्फ श्रवण कुमार जैसी आदर्श और परम आज्ञाकारी संतानें हों, और ऐसी कोई कामना करना भी सिवा खामखयाली के कुछ नहीं है। हमारे कवि मित्र हरीश करमचंदाणी अपनी एक कविता में लिखते हैं, ‘क्या पिता की हर बात मानना संभव भी है?’ सच्चाई यह है कि बिना वैज्ञानिक ज्ञान या समझ के अपने पूर्ववर्तियों की बात को ठुकरा देना जितना नुकसानदेह होता है, उससे कहीं अधिक हानिकारक होता है अंधश्रद्धा से मान लेना। इस दुनिया को जितना आज्ञाकारी संतानों ने बनाया है उससे कहीं ज्यादा उन्होंने बनाया, जिन्होंने अपने पिता की इच्छाओं के विपरीत जाकर अपना मार्ग चुना और सफलता हासिल की। ईसाई धर्म में जिस धर्मगुरु को फादर कहते हैं, गैलीलियो ने उसी की सत्ता को चुनौती दी। चार्ल्स डार्विन ने अपने पिता की नाराजगी के बावजूद अपनी खोजें जारी रखीं। एक मशहूर शेर है कि ‘कुफ्र कुछ चाहिए, इस्लाम की रौनक के लिए’, तो कुछ हुक्म उदूलियां अनिवार्य हैं, मावनीय सभ्यता को आगे ले जाने के लिए। संतान का धर्म है पिता की व्यवस्था को आगे ले जाना और पिता का धर्म है कि बूढ़े दरख्तों की तरह घर-आंगन में अपने आशीर्वाद का साया फैलाते रहें। 

यह आलेख डेली न्‍यूज़ के रविवारीय परिशिष्‍ट 'हम लोग' में प्रकाशित हुआ। चित्र http://www.hoviscreations.com/ से साभार।