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Sunday, 13 November 2011

प्रेम का अंकशास्‍त्र


नौ ग्रहों में सबसे चमकीले शुक्र जैसी है उसकी आभा
आवाज़ जैसे पंचम में बजती बांसुरी
तीन लोकों में सबसे अलग वह
दूसरा कोई नहीं उसके जैसा

नवचंद्रमा-सी दर्शनीय वह
लुटाती मुझ पर सृष्टि का छठा तत्‍व प्रेम

नौ दिन का करिश्‍मा नहीं वह
शाश्‍वत है हिमशिखरों पर बर्फ की मानिंद

सात महासागरों के जल से निखारा है
कुदरत ने उसका नव्‍यरूप

खत्‍म हो जाएं दुनिया के सातों आश्‍चर्य
वह लाजिमी है मेरे लिए
जिंदगी में सांस की तरह
पृथ्‍वी पर हवा-पानी-धूप की तरह।

Monday, 7 November 2011

कराची में बकरा मण्‍डी

2005 में अपनी पहली पाकिस्‍तान यात्रा के दौरान कराची देखने का अवसर मिला। शहर कराची को लेकर कुछ कविताएं लिखी थीं। उनमें से एक कविता यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं। सब दोस्‍तों को ईद की दिली मुबारकबाद के साथ सबकी सलामती की कामनाओं के साथ।

न जाने कितनी दूर तक चली गई है
यह बल्लियों की बैरीकैडिंग
जैसे किसी वीवीआईपी के आने पर
सड़कें बांध दी जाती हैं हद में

आधी रात के बाद
जब पहली बार इधर से गुज़रे तो लगा
बकरे मिमिया रहे हैं
यहां इस विशाल अंधेरे मैदान में
और बकरीद आने ही वाली है

इस मण्‍डी से कुछ फर्लांग के फासले पर
हाईवे से गुज़रते हुए
कभी नहीं दिखा कोई बकरा
न सुनाई दी उसकी हलाल होती चीख़
एक ख़ामोशी ही बजती थी हवा में
कसाई के छुरे की तरह

एक सुबह मण्‍डी के पास से गुजरते हुए मालूम हुआ
बकरा मण्‍डी सिर्फ बकरों की नहीं
यहां भेड़, गाय, भैंस, ऊंट सब बिकते हैं

बुज़ुर्ग मेज़बान ने
बड़े दुख के साथ कहा,
'चारा नहीं है
मवेशी जिबह किये जा रहे हैं और
चाय के लिए पाउडर दूध इस्‍तेमाल होता है.
मसला यह नहीं कि मवेशी कम हो रहे हैं
मसला यह कि शहर कराची
इंसान और जानवर दोनों की मण्‍डी है।'

Monday, 24 October 2011

रोशनी और अंधेरे की कविताएं

ठीक से याद नहीं आता, लेकिन इन कविताओं को लिखे हुए 15 साल से अधिक हो चुके हैं। उस समय वैचारिक परिपक्‍वता नहीं थी, लेकिन जीवन-जगत को एक कवि की दृष्टि से देखने की कोशिश तो चलती ही रहती थी। उन दिनों ठोस गद्य की कविताएं लिखने का भी एक चलन चला था। अमूर्त विषयों पर भी खूब लिखा जाता था। उसी दौर में अंधरे और रोशनी के बारे में ये दो कविताएं लिखी गई थीं। दीपावली के अवसर पर आप सब मित्रों के लिए ये दो कविताएं प्रस्‍तुत हैं।

रोशनी के बारे में

वह जितनी पलकों के बाहर दिखती है उससे कहीं ज्‍यादा भीतर होती है। भीतर देखने की कोशिश प्रारंभ में एक अंधकार में उतरने की कोशिश होती है और शनै:-शनै: एक इंद्रधनुषी आभा में लिपटी दिखायी देती है रोशनी। प्राय: हम अंधकार से डरकर रोशनी से दूर चले जाते हैं। वस्‍तुत: यह डर अंधकार से अधिक भीतर की रोशनी का होता है।

रोशनी के विषय में बात करने पर अंधकार की चर्चा आ ही जाती है। दरअसल रोशनी नाम ही अंधकार की अनुपस्थिति का है। हालांकि अंधकार प्राय: सब जगह और मौकों पर उपस्थित रहता है यहां तक कि रोशनी की उपस्थिति में भी। यह हमारी ही सीमा है कि हम दोनों की उपस्थिति साथ-साथ देख पाते हैं या नहीं।

रोशनी के रंग भी होते हैं और इन रंगों में अक्‍सर काला रंग भी होता है। काली रोशनी में देखना ध्‍यान की शुरुआत है और उसमें विलीन होना मोक्ष की। मोक्ष भी एक प्रकार की रोशनी ही है।

रोशनी के बारे में इतना ही पता है कि वह अंधकार की बेटी है और पृथ्‍वी ही क्‍या ब्रह्मांड से भी पहले जन्‍म चुकी थी। वह गर्भ में पल रहे शिशु की आंख से लेकर दिग-दिगंत तक व्‍याप्‍त रहती है।

शाम जब हम दिया जलाते हैं और रोशनी को नमन करते हैं तो दरअसल हमारा नमन रोशनी से ज्‍यादा अंधकार के प्रति होता है जो हमें रोशनी की ओर ले जाता है।

अंधेरे के बारे में

रोशनी की अनुपस्थिति में काले रंग का पर्याय वह अपने भीतर समो लेता है कायनात के तमाम रंग। एक मां की तरह वह अपने गर्भ में रखता है अपना शिशु 'प्रकाश'। पूरे ब्रह्मांड में पैदल चलता है वह। जब वह दुलराता है हमें अपने कोमल हाथों से हमारी रगों में दौड़ने लगता है उसका शिशु।

काल के तीनों खंडों में व्‍याप्‍त रहता वह हमें मां के गर्भ से लेकर कब्र तक साथ देता है। उसके प्रति हमारी कृतज्ञता सूरज को शीश नवाने से प्रकट होती है।

व्‍यर्थ ही उससे भयभीत रहते हैं हम। दरअसल वह पैदा नहीं करता भय हमारे भीतर पहले से मौजूद रहता है भय।

अमावस और पूर्णिमा दोनों उसी के पर्व हैं। एक दिन वह चांद को धरती से पीठ लगाकर बच्‍चे को दूध पिलाती मां की तरह गोदी में खिलाता है तो दूसरे दिन मेले में कंधों पर बच्‍चे को बिठाए पिता की तरह चांद को लिए धरती के बीचों-बीच खड़ा हो जाता है।

तारों को सुलाने और सूरज को जगाने की ड्यूटी निभाता हुआ वह पृथ्‍वी के दोनों गोलार्द्धों में अपनी हाजिरी देता है।

Sunday, 25 September 2011

एक कविता बेटी के लिए

आज बेटियों का दिन है। मेरी बड़ी बेटी दृष्टि के जन्‍म पर यह कविता अपने आप फूटी थी, आत्‍मा की गहराइयों से। आज आप सब दोस्‍तों के लिए यह कविता दुनिया की तमाम बेटियों के नाम करता हूं।

दृष्टि तुम्‍हारे स्‍वागत में

दृष्टि
तुम्‍हारे स्‍वागत में
मरुधरा की तपती रेत पर बरस गयी
सावन की पहली बरखा
पेड़-पौधे लताएं लगीं झूमने
हर्ष और उल्‍लास में


बाघनखी* की चौखट छूती
लता भी नहा गयी
प्रेम की इस बरखा में
गुलाब के पौधे पर भी आज खिला
बड़ा लाल सुर्ख़ फूल
उसने भी कर लिया
सावन की पहली बूंदों का आचमन
अनार ने भी पी लिया
मीठा-मीठा पानी
अनार के दानों में
अब रच जाएगी मिठास
और सुर्ख़ होंगे
पीले-गुलाबी दाने

तुम्‍हारे स्‍वागत में बरखा ने
नहला दिया शहर को सावन के पहले छंद से
महका दिया धरती को सौंधी-सौंधी गंध से
मोगरे पी कर मेहामृत
बिखेर दी चारों दिशाओं में
ताज़ा फूलों की मादक गंध

यह महकता मोगरा
यह सौंधती मरुधरा
यह नहाया हुआ शहर
ये दहकने को आतुर अनार
मुस्‍कुराता गुलाब
बढ़ती-फैलती बाघनखी की लता
सब कर रहे हैं तुम्‍हारा स्‍वागत।

*बाघनखी एक खूबसूरत कांटेदार बेल।

Tuesday, 20 September 2011

दादा जी की स्‍मृति में

हम चाहे नास्तिक हों या आस्तिक, पारिवारिक संबंध आपको कभी भी अनास्‍थावान नहीं होने देते, यह कारण है कि नास्तिक लोग शायद आस्तिकों की तुलना में मानवीय और पारिवारिक संबंधों को कहीं ज्‍यादा सम्‍मान देते हैं। मेरे पिता जब आठवीं कक्षा में पढ़ते थे, तभी दादाजी की अकाल मृत्‍यु हो गई थी। मां तीन बरस की उमर में पहले ही छोड़कर जा चुकी थी। घर में और कोई नहीं था, माता-पिता की इकलौती संतान थे पिताजी। कड़ा संघर्ष कर उन्‍होंने अपनी राह बनाई। उनके मुंह से मैंने दादाजी के बारे में सिर्फ किस्‍से सुने हैं कि वे अपने पिता की तरह जीवट वाले थे, अकेले ही जंगली रास्‍तों से पैदल चले जाते थे। दादाजी मेहनत मजदूरी के लिए लाहौर जाते थे, वहीं रहते थे। लेकिन आजादी और बंटवारे के एक साल पहले ही दिल्‍ली आ गए थे। मैं बचपन से दादाजी के किस्‍से सुनते आया हूं। उन पर मैंने दो कविताएं लिखी हैं। एक कविता अपनी बड़ी बेटी को अपने दादाजी के साथ खेलते देखकर लिखी थी और दूसरी अपनी पहली पाकिस्‍तान यात्रा के समय। मैं घोर नास्तिक आदमी हूं लेकिन पितृपक्ष में अपने दादा-दादी को बहुत याद करता हूं।

वाघा सीमा पार करते हुए


पता नहीं पुराणों के देवता ने
तीन डग में समूची धरती
सच में नापी थी या नहीं
लेकिन यहां तो सचमुच
तीन कदम में दुनिया नपती है

पता नहीं दादाजी
किस साधन से आते-जाते थे
यह सरहद बनने से पहले
जिसे मैंने पैदल पार किया है
उनकी मौत के आधी सदी बाद

अगर दादाजी गए होंगे पैदल
तो मेरे कदमों को ठीक वहीं पड़ने दो सरज़मीने हिंद
जहां पुरखों के कदम पड़े थे
दादा के पांव पर पोते का पांव
एक ख्‍वाबीदा हक़ीक़त में ही पड़ने दो
ऐ मेरे वतन की माटी

हक़ीक़त में ना सही
इसी तरह मिलने दो
पोते को दादा से

ऐ आर-पार जाती हवाओ
दुआ करो
आने वाली पीढि़यां
यह सरहद वैसे ही पार करती रहें
जैसे पुरखे करते थे
बिना पासपोर्ट और वीजा के।

दादाजी

न तो घर में उनकी तस्‍वीर है
ना मैंने उन्‍हें देखा
बहुत छोटे थे पिता
जब दादाजी चले गए थे देह छोड़कर

मैं कल्‍पना में बनाता हूं उनकी तस्‍वीर
जो कभी पूरी नहीं होती
उनकी उम्र के किसी बजुर्ग से नहीं मिलती उनकी शक्‍ल
वह शक्‍ल जो मैं देखना चाहता हूं

उनके हाथों खरीदी गयी चीजों को छूकर चाहा मैंने
उन्‍हें अपने भीतर अनुभव करना
लेकिन असंभव था
चीजों से उनकी जीवंत उपस्थिति को अनुभव करना

नक्‍शे में मैंने लाहौर-कराची शहर भी देख डाले
जहां रहे थे दादाजी
दिल्‍ली तो सैंकड़ों बार गया
और गांव भी कई बार
मगर नहीं महसूस कर पाया मैं कि कैसे थे दादाजी

एक बुजुर्ग ने बताया कि
शक्‍ल-सूरत में वे मेरे जैसे थे
और डील-डौल में पिता जैसे
स्‍वभाव भी मेरे जैसा ही बताया
मैं फिर भी नहीं बना सका
अपनी कल्‍पना में दादाजी का चित्र

अपनी बेटी को देखता हूं मैं
पिता के साथ खेलते हुए
और बेटी की जगह खुद को पाता हूं
दादाजी की पीठ पर
घुड़सवार की मुद्रा में।


Monday, 12 September 2011

कुछ नई कविताएं

इधर मेरी कुछ कविताएं लखनऊ से प्रकाशित होने वाले जनसंदेश टाइम्‍स में प्रकाशित हुईं और फिर भाई प्रभात रंजन ने इन्‍हें जानकी पुल पर प्रकाशित किया। ये कविताएं अब आप सबके लिए यहां भी प्रस्‍तुत कर रहा हूं।

देह विमर्श

एक
परिचय सिर्फ इतना कि नाम-पता मालूम
मिलना शायद ही कभी हुआ
बात करना तो दूर का सपना
फिर भी बंध जाते दो प्राणी
एक पवित्र बंधन में

आनंद-उत्‍साह और ठिठोली भरे
कुछ रस्‍मी खेल-तमाशे
थोड़ी-थोड़ी खोलते
अपरिचय की गांठ
अंगुलियों के पोर
दूध भरे बर्तन में
जल्‍दी-जल्‍दी खोजते
कोई सिक्‍का या अंगूठी

हल्‍के-फुल्‍के स्‍पर्श
और मस्‍ती भरी चुहल से बनता एक पुल
जिस पर टहलने निकल पड़ते दो प्राणी
भय और आशंकाओं के साथ
एक लंबी यात्रा पर

गेह बसाने के लिए
मिली थी एक देह
ऐसा बंधा उससे नेह कि
देहयात्रा ही बन गई गेहयात्रा।

दो

कैसे तो कांपते थे हमारे अंग-प्रत्‍यंग
शुरु-शुरु में
एक दूसरे से छू जाने पर
एक बिजली-सी दौड़ जाती थी
जैसे आकाश से धरती के ओर-छोर तक

उन स्‍पर्शों का आदी हुआ
पहले यह शरीर
फिर इस देह की समूची चेतना

हम बेफिक्र हुए
एक दूसरे के आवागमन से
किंचित पराई देह भी
धीरे-धीरे लगने लगी
बिल्‍कुल अपनी जैसी

आंख फड़कना
खुजली चलना
और ऐसे ही ना जाने कितने संकेत
समझने लगी एक देह
पराई देह को लेकर।

तीन

नहीं उस देह में बसे प्राण से
कभी नहीं रहा कोई संबंध कोई नाता
फिर भी हमने गुजार दी
तमाम उम्र उसी के साथ

गोया दो दरख्‍त हों जंगल में
जिन्‍हें कुदरत ने उगा दिया हो साथ-साथ
और इतने पास कि
दूर होना सोचा भी ना जा सके।


फर्क

फर्क आंख का नहीं
फकत देखने का है

मछली की आंख से देखो
सारी दुनिया पानीदार है।

रंगों की कविता

इतना तो हरा कि
एक कैनवस भरा
नीली शस्‍य-श्‍यामला धरती जैसा

ठिठक जाती है नजर
रंगों के पारभासी संसार को देखते हुए
यह सफेद में से निकलता हुआ श्‍यामल है कि
श्‍याम से नमूदार होता उजला सफेद
जैसे जीवन में प्रेम

यह कच्‍चा हरा नई कोंपल-सा
फिर धीरे-धीरे पकता ठोस हरा-भरा
यह आदिम हरा है काई-सा
इस हरियल सतह के
कोमल खुरदुरेपन को छूकर देखो
वनस्‍पति की शिराओं-धमनियों में बहता
एक विरल-तरल संसार है यहां।

पक्षीगान

भोर में सुनता हूं
सांझ की गोधूलि बेला में सुनता हूं
परिंदों का संगीतमय गुंजनगान

सुबह उनकी आवाज में
नहीं होती प्रार्थना जैसी कोई लय
लगता है जैसे समवेत स्‍वर में गा रहे हों
चलो चलो काम पर चलो

संध्‍या समय उनके कलरव में
नहीं होता दिन भर का रोना-धोना
न आने वाले कल की चिंता

सूरज के डूबने से उगने तक
इतने मौन रहते हैं परिंदे
जैसे सूरज को जगाने और सुलाने का
जिम्‍मा उन्‍हीं के पास है।

सच और झूठ

सत की करणी
झूठ का हथौड़ा
चलते साथ थोड़ा-थोड़ा

झूठ की धमक से
हिलती सत की काया
डगमगाकर गिरती
कर्मों के मसाले में

झूठ का वेगवान अंधड़
तहस-नहस कर देता
सारे संतुलनों को
और कहीं सत्‍य पर प्रहार करते
झूठ का हथौड़ा जा गिरता
अनंत अंधकार की देग में

सत की करणी
फिर भी टिकी रहती
एक कारीगर के इंतजार में।

जामुन को देखकर

जामुन को देख खयाल आता है
जामुनी रंग से लबालब लोगों का

क्‍या उन्‍होंने कभी सोचा होगा
कितना जामुनी है उनका रंग
क्‍या जामुन को भी खयाल आता है
अपने जैसे रंग वाले शख्‍स को देखकर कि
अरे यह तो ठीक मेरे जैसा...

जामुन जैसा खास तिक्‍त स्‍वाद
और कहां है सृष्टि में
मेरे जेहन में कौंध जाते हैं
वो खूब गहरे गुलाबी होंठ
और याद आता है उनका जामुनी होना।

वोट

शुरुआती सालों में
मुझे लगता रहा कि
मेरे पास यही
सबसे शक्तिशाली चीज है
मैं चाहूं तो बदल सकता हूं
इस वोट से देश का भविष्‍य

धीरे-धीरे कागज के इस टुकड़े की
कीमत घटने लगी
जैसे घटती है करेंसी नोट की
और फिर मेरे लिए वोट रह गया
महज रद्दी कागज का पुरजा

बाद के बरसों में वह
हल्‍की लंबी बीप में बदलता चला गया
जैसे मैं इस महान गणतंत्र का
साधारण नागरिक
टेक्‍नोलोजी में चीख रहा हूं

ओह मैंने क्‍या किया
अपनी पूरी ताकत लगाकर चीखा भी तो
वह महज बीप निकली
आह जैसे
लोकतंत्र की चीख निकली।

पेंटिंग अर्पणा कौर की है।



Wednesday, 31 August 2011

इशरत के लिए

(एक असमाप्‍त लंबी कविता का पहला ड्राफ्ट )


इस जहां में हो कहां
इशरत जहां


तुम्‍हारा नाम सुन-सुन कर
पक ही गए हैं मेरे कान


आज फिर उस उजड़ी हुई
बगीची के पास से गुज़रा हूं तो
तुम्‍हारी याद के नश्‍तर गहरे चुभने लगे


तुम कैसे भूल सकती हो यह बगीची
यहीं मेरी पीठ पर चढ़कर
तुमने तोड़ी थीं कच्‍ची इमलियां
यहीं तुम्‍हारे साथ खाई थी
बचपन में जंगल जलेबी
माली काका की नज़रों से बचकर
हमने साथ-साथ चुराए थे
कच्‍चे अमरूद और करौंदों के साथ अनार


सुनो इशरत
इस बगिया में अब हमारे वक्‍त के
कुछ बूढ़े दरख्‍त ही बचे हैं
एक तो शायद वह नीम है
जिस पर चढ़ने की कोशिश में
तुम्‍हारे बांए पांव में मोच आ गई थी


लाख कोशिशों के बावजूद
नहीं नष्‍ट हुआ वह जटाजूट बरगद
जिसके विशाल चबूतरे पर जमी रहती थी
मोहल्‍ले भर के नौजवान-बुजुर्गों की महफिल


इसी बरगद की जटाओं पर झूलते हुए
हमने खेला था टार्जन-टार्जन
अब वह छोटा-सा शिवालय नहीं रहा
एक विशाल और भव्‍य मंदिर है यहां
नहीं रहे पुजारी काका
अब तो पीतांबर वर्दीधारी दर्जनों पुजारी हैं यहां
रात-दिन गाडि़यों की रेलपेल में
लगी रहती है भक्‍तों की भीड़
हमारे देखते-देखते वह छोटा-सा शिवालय
बदल गया प्राचीन चमत्‍कारी मंदिर में


बहुत कुछ बदल गया है इशरत
इसी बगीची के दूसरे छोर पर
करीब एक मील आगे चलकर
शिरीष, गुलमोहर, नीम, पीपल और बबूल के
घने दरख्‍तों से घिरी थी ना
सैय्यद बाबा की निर्जन-सी मजार
जहां शाम के वक्‍त आने से डरते थे लोग
कहते थे यहां पहाडि़यों से आते हैं
हिंसक वन्‍य जीव पास के तालाब में पानी पीने
वह छोटी-सी उपेक्षित मजार
तब्‍दील हो गई है दरगाह में
दरख्‍तों की हरियाली वहां अब
हरी ध्‍वजाओं में सिमट गई है

इस तेज़ी से बदलती दुनिया में
हमारे बचपन और स्‍मृतियों के साथ
ना जाने क्‍या-क्‍या छूटता चला गया
मन के एक हरियल कोने में
तुम्‍हारे नाम की चंचल चिडि़या
कूकती रही लगातार


गुज़रे वक्‍त के लिए मेरे पास
कोई ठीक शब्‍द नहीं
पाश की भाषा में कहूं तो यह सब क्‍या
हमारे ही वक्‍तों में होना था?
मज़हब और जाति के नाम पर
राजनीति का एक अंतहीन खूनी खेल
जिससे घायल होती रही
मेरे मन में बैठी
तुम्‍हारे नाम की नन्‍हीं चिडि़या
उसकी मीठी कूक
धीरे-धीरे बदल गई रूदन में


फिर जो गूंजा तुम्‍हारा नाम खबरों में
तो हैरत में पड़ गया था मैं...








Sunday, 24 July 2011

सतरंगी है सावन


तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ साथ
ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ साथ
                           *परवीन शाकिर

क्‍या घर, क्‍या जंगल और क्‍या बादल, सावन में तो यूं लगता है जैसे पूरी कायनात भीग रही है। पत्‍ता-पत्‍ता, बूटा-बूटा, रेशा-रेशा, जर्रा-जर्रा जिस वक्‍त भीगता है और हवा में एक मदमस्‍त कर देने वाली खुश्‍बू बिखेर देता है तो धरती और आकाश के बीच अमृत सरीखी पानी की बूंदें नाचने लगती हैं। कुदरत की ताल पर नाचते इन नन्‍हे-नन्‍हे पानी के कतरों पर जब सूर्यदेव की किरणें अपना स्‍नेह लुटाने आती हैं तो इस कायनात के तमाम रंग एक साथ कतार बांधकर खड़े हो जाते हैं सावन के स्‍वागत में। कुदरती रंगों की यह कतार इंसानी आंखों में इंद्रधनुष बन जाती है और एक ऐसे पावन दृश्‍य की रचना करती है कि इंसानी जज्‍बातों का समंदर मचलने लगता है। ऐसे में एक बार फिर परवीन शाकिर का शेर याद आता है:

धनक उतरती नहीं मेरे खून में जब तक
मैं अपने जिस्‍म की नीली रगों से जंग में हूं

धनक माने इंद्रधनुष के सातों रंग जब तक इंसान की जज्‍बाती नसों में नहीं उतरते, वो अपनी नीली नसों से ही लड़ता रहता है। किसे नहीं भाती रंगों की यह अनुपम सौगात, जो हमें यूं तो बारह महीने देखने को मिलती है, लेकिन बारिश में और खासकर सावन में सबसे ज्‍यादा दिखाई देती है। इस कुदरती करिश्‍मे को हमारी सभ्‍यता और संस्‍कृति में इतना पवित्र माना गया है कि हमारे बचपन में इसकी ओर अंगुली उठाना भी पाप माना जाता था और बड़े बुजुर्ग कहते थे कि इंद्रधनुष की ओर अंगुली उठाने से तुम्‍हारी अंगुलियां गल जाएंगी। ऐसी पवित्रता और किन कुदरती चीजों को लेकर है जरा सोचिए।

यूं दुनिया भर में इंद्रधनुष को लेकर कई किस्‍म के धार्मिक विश्‍वास हैं, हम तो इसे वर्षा ऋतु के देवता इंद्र का धनुष मानते हैं, लेकिन बंगाल में इसे भगवान राम का धनुष माना जाता है और इसीलिए इसे रामधनु कहते हैं। अरबी और इस्‍लामिक संस्‍कृति में भी इसे बादल और बारिश के फरिश्‍ते कुज़ह का धनुष मानते हैं।  यूनानी मिथकों में इसे वो रास्‍ता माना जाता है जो देवदूत आइरिस ने धरती और स्‍वर्ग के बीच बनाया था। बारिश से बाढ़ जैसी त्रासदियां भी जुड़ी होती हैं, इसीलिए मेसोपोटामिया के गिलगमेश महाकाव्‍य में इंद्रधनुष को माता इश्‍तर के गले का वो हार कहा गया है जो माता ने इस वचन के साथ आकाश में उठा लिया कि वह उन दिनों को कभी माफ नहीं करेगी, जिन्‍होंने भयानक बाढ़ में उसके बच्‍चों को लील लिया। ईसाई मिथकों में भी इंद्रधनुष को ईश्‍वर का ऐसा ही वचन माना जाता है। एक बात तो स्‍पष्‍ट है कि किसी भी सभ्‍यता और संस्‍कृति में इंद्रधनुष को बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं देखा गया और हो भी क्‍यों... कुदरत की इतनी नायाब और सुंदरतम कृति को कोई कैसे बुरा कह सकता है। सही बात तो यह है कि इंद्रधनुष सबसे ज्‍यादा युवा दिलों को सदियों से पसंद आता रहा है और नैसर्गिक प्रेम के प्रतीक के रूप में दुनिया भर की कविता में व्‍यक्‍त होता आया है। सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना ने एक प्रेम कविता में लिखा है-

मुझे चूमो / खुला आकाश बना दो
मुझे चूमो / जलभरा मेघ बना दो
मुझे चूमो / शीतल पवन बना दो
मुझे चूमो / दमकता सूर्य बना दो
फिर मेरे अनंत नील को इंद्रधनुष सा लपेट कर
मुझमें विलय हो जाओ।

विज्ञान में सबसे पहले अरस्‍तू ने इसकी व्‍याख्‍या की और उसके बाद पानी की बूंदों और सूरज की किरणों के इस अचरज भरे खेल को लेकर वैज्ञानिकों ने खूब दिमाग दौड़ाए और इसका पूरा खेल खेलकर रख दिया। लेकिन प्रकृति के इस चमत्‍कार को कवि, कलाकार और लेखकों ने रंगों और प्रकाश का खेल नहीं समझा, उनके लिए यह जादुई संसार विज्ञान की व्‍याख्‍याओं से टूटने वाला नहीं था। अंग्रेजी के महान कवि जॉन कीट्स ने महसूस किया कि न्‍यूटन ने इंद्रधनुष को लेकर रची गई तमाम कविताएं नष्‍ट कर डालीं, इसीलिए उन्‍होंने एक विता में लिखा, एक समय था जब स्‍वर्ग में एक दारुण इंद्रधनुष हुआ करता था। उन्‍होंने बड़े दुख के साथ आगे लिखा कि दर्शन और विज्ञान एक दिन तमाम मिथकों को जीत लेंगे और इंद्रधनुष को उधेड़ कर रख देंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और इंद्रधनुष का जादू साहित्‍य और कला में बरकरार रहा। इसीलिए इसकी शान में परवीन शाकिर ने लिखा,

धनक धनक मेरी पोरों के ख्‍वाब कर देगा
वो लम्‍स मेरे बदन को गुलाब कर देगा

कबा-ए-जिस्‍म के हर तार से गुजरता हुआ
किरन का प्‍यार मुझे आफताब कर देगा

रिचर्ड डॉकिंस ने कीट्स की मान्‍यता के उलट कहा था कि विज्ञान हमेशा ही अपनी प्रकृति से महान कविता को प्रेरित करता है। आप इस अवधारणा को परवीन के इन दो शेरों में बहुत गहराई से पहचान सकते हैं। कुदरत का एक बेमिसाल नजारा कैसे नायाब कविता को संभव बनाता है और कैसे विज्ञान के द्वारा खोले हुए रहस्‍य को एक कवयित्री अपनी कविता में बहुत प्‍यार से एक नई कल्‍पना का रूप देती है। कीट्स के बरक्‍स विलियम वर्ड्सवर्थ कहते हैं-

मेरा दिल उछलता है
जब मैं आकाश में एक इंद्रधनुष निहारता हूं
यही हुआ था जब मैं जन्‍मा था
अब जबकि मैं जवान हो गया हूं
तब भी यही होता है
जब मैं बूढा हो जाउंगा या मर जाउंगा
तब भी यही होगा
शिशु पिता है पुरुष का
और मैं कामना करता हूं कि
आने वाले मेरे तमाम दिन
नैसर्गि‍क पवित्रता से बंधे रहें।

दुनिया में जहां भी सामाजिक और सांस्‍कृतिक विविधता है, वहां उस वैविध्‍य को सुंदरतम रूप देने के लिए इंद्रधनुष की ही उपमा दी जाती है। हमारे देश में जो विराट सांस्‍कृतिक वैभव और विविधता है, उसे इंद्रधनुषी सांस्‍कृतिक छटा इसीलिए कहते हैं। दक्षिण अफ्रीका में हमारी तरह ही रंग-बिरंगा सांस्‍कृतिक संसार है, इसलिए वहां की पूरी संस्‍कृति को ही रेनबो कल्‍चर कहते हैं। इस तरह दुनिया में इंद्रधनुष एक ऐसे अकेले प्रतीक के रूप में सामने आता है जो विविधताओं के बावजूद एकता, सहअस्तित्‍व और सहजीवन को दर्शाता है। इस दुनिया में जितने धार्मिक विश्‍वास हैं, सांस्‍कृतिक मान्‍यताएं हैं और जितनी भी किस्‍म की विविधताएं हैं, वे सब हमें इंद्रधनुषी आभा में लिपटी इस प्रकृति की सबसे शानदार विरासत लगती हैं। यह विरासत हमें एक ऐसी दुनिया रचने-बसाने की प्रेरणा देती है जिसमें सारी असहमतियों और विभिन्‍नताओं के बावजूद हम एक साथ रह सकते हैं, क्‍योंकि इसी में वह कुदरती खूबसूरती है, जो धरती पर इंद्रधनुष रचती है। कितनी खूबसूरत कल्‍पना है कि इंद्रधनुष के सात रंगों में इस धरती के समस्‍त धर्म एक कतार में यूं झुककर धनुषबद्ध हो जाते हैं जैसे पृथ्‍वी को सिजदा कर रहे हों। इस जमीन पर ऐसे इंद्रधनुष रचने की जरूरत है, जो इंसान को इंसान से जोड़ें, जो भय से दुनिया को मुक्‍त करे। हमें वो इंद्रधनुष चाहिएं, जिनके रंगों में हम अपने आसपास की दुख और दारिद्र्य भरी दुनिया को खूबसूरत लिबासों में सजा सकें और उन्‍हें आसमानों की बुलंदियों पर इंद्रधनुष की तरह देख सकें। हमें विज्ञान की वह प्रकाशभरी दुनिया चाहिए जो कुदरत के इंद्रधनुषी रहस्‍यों को खोलती हुई इंसान को अज्ञान के सनातन अंधकार से बाहर निकाल कर इंद्रधनुष दिखाए। यूनानी मिथक में जो रास्‍ता देवदूत स्‍वर्ग से धरती के बीच बनाता है, वह रास्‍ता हमें जमीन पर स्‍वर्ग उतारने का बनाना है, जिसका प्रतीक है इंद्रधनुष। बादलों का जो फरिश्‍ता है, देवता है वह इस धरती पर हमारे खेत-खलिहानों को बारिश से इस कदर पूर दे कि कोई भूखा ना रहे और इंद्रधनुष को आधी रोटी का रंगीन टुकड़ा ना समझे। हमें इश्‍तर माता का वो हार जमीन पर लाना है जो देवी मां ने सैलाब में तबाह हुई संतानों के दुख में आकाश में उठा लिया। हमें बाढ़ में नहीं बारिश में इंद्रधनुष चाहिएं। मन को हर्षित करने वाली वह बारिश जो किसी का घर नहीं उजाड़े और देवताओं को किसी वचन की तरह अपनी संततियों को बचाने के लिए आसमान में इंद्रधनुष नहीं टांगना पड़े। हमें सिर्फ बारिश में नहीं हर मौसम में इंद्रधनुष चाहिएं। हम एक ऐसे बाग की कल्‍पना करते हैं जहां इस धरती के तमाम बाशिंदें बेखौफ तफरीह करने के लिए आएं और जब बारिश की फुहारें आसमानी अमृत बरसाने लगें तो हर कोई परवीन शाकिर की तरह गाता चले-

चिडि़या पूरी भीग चुकी है
और दरख्‍त भी पत्‍ता पत्‍ता टपक रहा है
घोसला कब का बिखर चुका है
चिडिया फिर भी चहक रही है
अंग अंग से बोल रही है
इस मौसम में भीगते रहना
कितना अच्‍छा लगता है।

और ऐसे मौसम में इंद्रधनुष को देखना भी कितना अच्‍छा लगता है।

(यह आलेख डेली न्‍यूज, जयपुर के रविवारीय परिशिष्‍ट हम लोग की टॉप स्‍टोरी के रूप में 24 जुलाई, 2011 को प्रकाशित हुआ।)
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Thursday, 26 May 2011

सिक्कों की किस्मत

साप्ताहिक पत्रिका ‘शुक्रवार’ में मेरी तीन कविताएं प्रकाशित हुई हैं। आज से ब्लॉग का सिलसिला फिर शुरू करते हैं।

सिक्के तल में पड़े रह जाते हैं
नदियां समंदर तक पहुंच जाती हैं

आस्था नदियों में है कि जल में
मालूम नहीं
पर श्रद्धा में अर्पित किए गए सिक्के
नदी के तल में हैं


आस्था का मूल्य
अगर एक सिक्का है
तो तल में जाने के बाद
आस्था खो देती है अपनी मूल्यवत्ता

निष्प्राण पत्थर
जल प्रवाह में किसी किनारे पहुंचकर
बन जाते हैं
आस्था के शालिग्राम
और सिक्के नदी तल में पड़े रह जाते हैं।