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Wednesday, 31 August 2011

इशरत के लिए

(एक असमाप्‍त लंबी कविता का पहला ड्राफ्ट )


इस जहां में हो कहां
इशरत जहां


तुम्‍हारा नाम सुन-सुन कर
पक ही गए हैं मेरे कान


आज फिर उस उजड़ी हुई
बगीची के पास से गुज़रा हूं तो
तुम्‍हारी याद के नश्‍तर गहरे चुभने लगे


तुम कैसे भूल सकती हो यह बगीची
यहीं मेरी पीठ पर चढ़कर
तुमने तोड़ी थीं कच्‍ची इमलियां
यहीं तुम्‍हारे साथ खाई थी
बचपन में जंगल जलेबी
माली काका की नज़रों से बचकर
हमने साथ-साथ चुराए थे
कच्‍चे अमरूद और करौंदों के साथ अनार


सुनो इशरत
इस बगिया में अब हमारे वक्‍त के
कुछ बूढ़े दरख्‍त ही बचे हैं
एक तो शायद वह नीम है
जिस पर चढ़ने की कोशिश में
तुम्‍हारे बांए पांव में मोच आ गई थी


लाख कोशिशों के बावजूद
नहीं नष्‍ट हुआ वह जटाजूट बरगद
जिसके विशाल चबूतरे पर जमी रहती थी
मोहल्‍ले भर के नौजवान-बुजुर्गों की महफिल


इसी बरगद की जटाओं पर झूलते हुए
हमने खेला था टार्जन-टार्जन
अब वह छोटा-सा शिवालय नहीं रहा
एक विशाल और भव्‍य मंदिर है यहां
नहीं रहे पुजारी काका
अब तो पीतांबर वर्दीधारी दर्जनों पुजारी हैं यहां
रात-दिन गाडि़यों की रेलपेल में
लगी रहती है भक्‍तों की भीड़
हमारे देखते-देखते वह छोटा-सा शिवालय
बदल गया प्राचीन चमत्‍कारी मंदिर में


बहुत कुछ बदल गया है इशरत
इसी बगीची के दूसरे छोर पर
करीब एक मील आगे चलकर
शिरीष, गुलमोहर, नीम, पीपल और बबूल के
घने दरख्‍तों से घिरी थी ना
सैय्यद बाबा की निर्जन-सी मजार
जहां शाम के वक्‍त आने से डरते थे लोग
कहते थे यहां पहाडि़यों से आते हैं
हिंसक वन्‍य जीव पास के तालाब में पानी पीने
वह छोटी-सी उपेक्षित मजार
तब्‍दील हो गई है दरगाह में
दरख्‍तों की हरियाली वहां अब
हरी ध्‍वजाओं में सिमट गई है

इस तेज़ी से बदलती दुनिया में
हमारे बचपन और स्‍मृतियों के साथ
ना जाने क्‍या-क्‍या छूटता चला गया
मन के एक हरियल कोने में
तुम्‍हारे नाम की चंचल चिडि़या
कूकती रही लगातार


गुज़रे वक्‍त के लिए मेरे पास
कोई ठीक शब्‍द नहीं
पाश की भाषा में कहूं तो यह सब क्‍या
हमारे ही वक्‍तों में होना था?
मज़हब और जाति के नाम पर
राजनीति का एक अंतहीन खूनी खेल
जिससे घायल होती रही
मेरे मन में बैठी
तुम्‍हारे नाम की नन्‍हीं चिडि़या
उसकी मीठी कूक
धीरे-धीरे बदल गई रूदन में


फिर जो गूंजा तुम्‍हारा नाम खबरों में
तो हैरत में पड़ गया था मैं...








Wednesday, 23 February 2011

ऑस्‍कर वाइल्‍ड की क्लासिक कहानी - बुलबुल और गुलाब

यह कहानी मेरी प्रिय प्रेम कहानियों में से एक है। पिछले दिनों प्रेम दिवस के पूर्व रविवार 13 फरवरी, 2011 को यह राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में प्रकाशित हुई। इस लंबी कहानी को अखबार के लिए कुछ संक्षिप्‍त किया गया है।

"उसने कहा है कि अगर मैं उसके लिए एक लाल गुलाब ले आऊँ तो वह मेरे साथ नृत्य करेगी! लेकिन मेरे बगीचे में तो एक भी लाल गुलाब नहीं है" अपने आप से बात करते हुए वह नौजवान रोने लगा।

बगल के दरख़्त पर घौसले में बैठी बुलबुल ने उसे रोते सुना और पत्तियों की तरफ देख वह आश्चर्यचकित हो उठी । वह रो रहा था और उसकी खूबसूरत आँखों के प्याले आँसुओं के मोतियों से भर गए! "ओह, जिंदगी में कभी-कभी खुशियाँ कितनी छोटी-छोटी चीजों पर टिकी होती हैं ! मेरा सारा ज्ञान और दर्शनशास्त्र का अध्ययन बेकार है। एक अदने से लाल गुलाब की चाहत ने मेरी जिंदगी नरक बना दी है।"

"कम से कम इस दुनिया में एक सच्चा प्रेमी तो है।" बुलबुल चहक उठी, "मैं रातों में जिस अनजान प्रेमी के लिए गाती थी, चांद-तारों को जिसकी कहानी सुनाती थी, वो आज मुझे मिल ही गया। इसके बाल लाल गुलाबी पारदर्शी फूल जैसे हैं, और होंठ जैसे सुर्ख गुलाब, ठीक वैसे ही जैसी उसकी चाहत है। लेकिन चेहरा कुम्हलाया हुआ, कांतिहीन, हाथी दांत जैसा पीला। दुःख और संताप की स्पष्ट छाप इसके माथे पर छपी है।"

नौजवान बुदबुदाया, ‘कल राजकुंवर ने नृत्य की शाम सजाई है। वो भी वहां होगी। काश अगर मैं उसे सुर्ख गुलाब ला दूं तो उसे अपनी बाँहों में भर सकूंगा , और वह मेरे काँधों पर अपना सर टिकाए रात भर मेरे साथ नाचेगी। लेकिन मेरे बगीचे में कोई सुर्ख गुलाब नहीं है, इसलिए मुझे अकेले ही बैठना होगा, और वह बाय कहती हुई मेरे करीब से गुज़र जायेगी।"

"यकीनन यह सच्चा प्रेमी है" , बुलबुल ने कहा। "इसके कष्ट पर मैं क्या गाऊँ ? क्या इसके दर्द में मेरा गाना वाजिब होगा? सच में प्रेम है ही ऐसी निराली चीज! यह मोती-माणिक से भी बड़ा है, ना तो इसे खरीद सकते और ना ही यह हाट-बाज़ारों में मिल सकता है।"

"साजिंदे गलियारे में अपनी जगहें लेते चले जायेंगे", नौजवान ने खुद से कहा, "वे अपने वाद्ययंत्रों के तंतुओं को छेड़ना शुरू करेंगे, और मेरी महबूबा उनकी धुनों पर तल्लीन होकर नाचने लगेगी। वह इस कदर नाचेगी कि उसके पांव जमीन को छुएंगे तक नहीं, और दरबार में मौजूद तमाम लोग अपनी चटकीली वेशभूषाओं में उसके चारों ओर मंडरा रहे होंगे। लेकिन वह मेरे साथ नहीं नाचेगी क्योंकि उसे देने के लिए लाल गुलाब जो नहीं है मेरे पास।" इतना कह कर वह निढाल हो घास पर गिर गया और अपना मायूस चेहरा हाथों में लेकर जार-जार रोने लगा।

हरे गिरगिट, सूर्य किरण के गिर्द मंडराती एक तितली और गुलबहार के फूल तक ने उस नौजवान से पूछा, ‘तुम क्यों रो रहे हो?’
"वह एक लाल गुलाब के लिए रो रहा है।" बुलबुल ने कहा।
"सिर्फ एक लाल गुलाब के लिए !!" सब चिल्लाये ! "कितना बेहूदा है यह रोना।" और नन्हा गिरगिट ठठा कर हँस पड़ा।

लेकिन बुलबुल उसके संताप का रहस्य जान चुकी थी। उसने अपना गीत बंद कर दिया और उस गूढ़ प्रेम के विषय में सोचने लगी। अचानक वह अपने साँवले बादामी परों को फैला कर आसमान में बहुत ऊँचे उड़ चली।

दरख्‍तों के पार एक घास के मैदान के बीचो-बीच एक खूबसूरत गुलाब का पौधा था। बुलबुल ने देखा और उसकी ओर उड़ गयी।

"मुझे एक लाल गुलाब दो" वह गिडगिडायी , "बदले में तुम्हारे लिए मैं अपना सबसे मीठा गीत दूंगी!"

लेकिन पौधे ने अपना सिर हिला दिया ! "मेरा गुलाब तो सफ़ेद हैं" उसने जवाब में कहा; "उतना ही सफ़ेद जितना समंदर का झाग होता है , और यह तो पहाड की चोटियों पर पड़ी बर्फ से भी ज्यादा सफ़ेद है ! लेकिन तुम धूपघड़ी के पास मेरे भाई के यहां जाओ, शायद वहां तुम्हारी चाहत पूरी हो जाए।"

जल्दी से उड़ती हुई बुलबुल उस गुलाब के पास गई और अपनी प्रार्थना दोहराई। गुलाब के इस पौधे ने कहा, ‘मेरे पास तो जलपरियों के बालों जैसे पीले फूल होते हैं। तुम्हें छात्रों की खिड़की के पास वाले मेरे भाई के यहां जाना होगा, शायद वह तुम्हारी मदद करे।’

बुलबुल ने उड़ान भरी और खिड़की के नीचे वाले गुलाब के पौधे के पास जाकर अपनी चाहत बताने लगी। पौधा बोला, ‘मेरे पास मूंगे से भी कई गुना लाल सुर्ख गुलाब हैं, लेकिन ठण्‍ड के मारे मेरी नसें जम गई हैं और पाले ने तो सर्दियों की शुरुआत में ही मेरी सारी कलियां नष्ट कर दी थीं। तूफान से मेरी सारी टहनियां टूट गई हैं। अब पूरे साल मुझ पर कोई फूल नहीं खिलेगा।’

दुखी बुलबुल दर्द से कराहती हुई चीखी, ‘मुझे सिर्फ एक लाल गुलाब चाहिए। क्यां किसी भी तरह से एक लाल गुलाब मिल सकता है?’ पौधे ने जवाब में कहा, ‘एक रास्ता है, लेकिन बहुत खतरनाक है। वो मैं तुम्हें नहीं बता सकता।’ बुलबुल बोली, ‘बताओ, मैं नहीं डरूंगी।’ गुलाब के पौधे ने कहा, ‘सुनो अगर तुम्हें लाल गुलाब चाहिए तो चांदनी रात में तुम्हें अपने संगीत और दिल के खून से मुझे सींचना होगा। रात भर तुम मेरे लिए गाओगी और तुम्हारे कलेजे में मेरा कांटा चुभा रहेगा। तुम्हारा लहू मेरी नसों में बहेगा और मेरा हो जाएगा।’ बुलबुल ने कहा, ‘एक लाल गुलाब के लिए जिंदगी का दांव बहुत बड़ा है।’... दुनिया की तमाम खूबसूरत चीजों की तरह जिंदगी सभी को प्यारी होती है, बावजूद इसके प्यार जिंदगी से बेहतर है, बड़ा है। बुलबुल उड़कर वापस अपने शाहबलूत के दरख्त वाले घोंसले के लिए उड़ चली।

वो नौजवान अभी भी घास पर लेटा हुआ था। बुलबुल बोली, ‘अब खुश हो जाओ, तुम्हें तुम्हांरा लाल गुलाब मिल जाएगा। मैं चांदनी रात में अपने गीत से उसे पैदा करूंगी और अपने कलेजे के लहू से उसे सींचूंगी। मैं यही कहने आई हूं कि तुम्ही सच्चे प्रेमी हो। प्रेम ही ईश्वर है।’

युवक ने देखा और सुना, लेकिन वह कुछ भी नहीं समझ सका। वह तो सिर्फ किताबों में पढ़ी बातें ही जानता था, बुलबुल की बात वह कैसे समझता। लेकिन शाहबलूत का वह बूढ़ा दरख्त़ समझ गया था, जिस पर बुलबुल का आशियाना था। उसने बुलबुल से कहा, ‘मेरी खातिर आखिरी बार गाओ मेरी प्यारी बुलबुल... तुम्हारे जाने के बाद मुझे बहुत अकेलापन महसूस होगा।’ और बूढ़े दरख्त की बातें सुन कर बुलबुल उसके लिए गाने लगी। जैसे ही उसने गाना बंद किया, वो नौजवान उठा और चल दिया। रास्ते में चलते हुए भी वह अपनी महबूबा के बारे में सोचता रहा। इसी सोच में वह अपने कमरे में गया और बिस्त‍र पर लेट गया। सोचते सोचते वह सपनों की मीठी नींद में चला गया।

आकाश में चांद दिखते ही बुलबुल उड़कर गुलाब के पौधे के पास पहुंच गई। बिना वक्त गंवाए उसने गुलाब की टहनी का लंबा सा कांटा अपने सीने में पैबस्त कर लिया और गाने लगी। सबसे पहले उसने युवा प्रेमियों के दिलों में पनपने वाले प्रेम का गीत गाया। पौधे के माथे पर एक खूबसूरत गुलाब खिल उठा। बुलबुल जैसे-जैसे गाती रही, गुलाब की पंखुडि़यां खुलती चली गईं। अभी गुलाब के फूल का रंग कोहरे की मानिंद था, रंगहीन सफेद सरीखा। उधर पौधा बुलबुल से बार-बार कह रहा था, ‘प्यारी बुलबुल, कांटे को अपने दिल में कस कर दबाओ, कहीं ऐसा ना हो कि फूल पूरा होने से पहले ही दिन निकल आए।’ बुलबुल ने पूरी ताकत से कांटे को कस लिया और गाना तेज कर दिया। अब वह दो आत्माओं में पनपने वाले अमर प्रेम के गीत गा रही थी।

फूल पर अब गुलाबी रंग छाने लगा था। हालांकि उसका अंदरूनी हिस्सा अभी भी सफेद ही था। अब तो सिर्फ बुलबुल के दिल का लहू ही उसे सुर्ख रंग दे सकता था। इसलिए पौधे ने फिर बुलबुल से जोर लगाने के लिए कहा। बुलबुल ने अपना पूरा दम लगा दिया और आखिरकार कांटा उसके दिल तक पहुंच गया। बुलबुल को भयानक दर्द हुआ और वह दर्द के मारे जोरों से गाने लगी। अब वह उस प्रेम के गीत गा रही थी जो मृत्यु पर जाकर खत्म होता है। बुलबुल की कोशिशें रंग लाईं और आखिरकार गुलाब पूरी तरह पूरब के आसमान जैसा सुर्ख लाल हो गया। बुलबुल की आवाज धीमी पड़ती जा रही थी। उसके पंख तेजी से फड़फड़ा रहे थे-आंखें बंद होती जा रही थीं। बुलबुल ने अब आखिरी तान छेड़ी। इसे सुनकर चांद बादलों में छिपना भूलकर एक जगह स्थिर हो गया। लाल गुलाब इसे सुनकर खुशी के मारे कांप उठा। उसने अपनी तमाम पंखुडियां खोल दीं। पूरे इलाके में एक चीख गूंज गई, जिसे सुनकर सपने देखते गडरिए जाग उठे।

पौधा मारे खुशी के चिल्लाया, ‘देखो, गुलाब पूरा हो गया, देखो।’ बुलबुल कुछ नहीं बोली। कांटा उसके कलेजे में गहरे धंसा हुआ था और वह घास पर मौत की गहरी नींद सो रही थी।

दोपहर में नौजवान ने खिड़की खोल कर देखा तो वह लगभग चीख ही पड़ा, ‘यह रहा मेरा लाल गुलाब, किस्मत का शानदार करिश्मा। मैंने जिंदगी में आज तक ऐसा खूबसूरत लाल गुलाब नहीं देखा।’ उसने झुक कर फूल तोड़ लिया।

हाथ में गुलाब लिए वह माशूका के घर की तरफ दौड़ चला। वहां दरवाजे पर बैठी महबूबा धागे की रील लपेट रही थी। वह चिल्लाया, ‘तुमने कहा था, अगर मैं लाल गुलाब ले आउं तो तुम मेरे साथ नाचोगी। यह दुनिया का सबसे खूबसूरत लाल गुलाब है। आज की रात तुम इसे छाती से लगाओगी। हमारे नाच के वक्ता गुलाब का यह फूल तुम्हें अहसास कराएगा कि मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूं।’

लेकिन लड़की ने चंचला स्त्री की तरह मुंह बनाते हुए कहा, ‘हुंह.. मुझे लगता है यह मेरे कपड़ों के रंग से मेल नहीं खाता। यूं भी बड़े सरदार के भतीजे ने मेरे लिए असली माणिक और मोतियों के गहने भेजे हैं। और सब जानते हैं कि गहने और माणिक-मोती फूलों से ज्यादा कीमती होते हैं।’

नौजवान क्रोध में चीखा, ‘तुम बेवफा हो।’ कह कर उसने गुलाब का वह फूल गली में फेंक दिया, जहां वह एक नाली में जाकर गिरा। एक घोड़ागाड़ी आई और फूल को कुचलते हुए निकल गई।

लड़की ने कहा, ‘बेवफा?... हुंह... वैसे भी तुम हो क्या? एक स्टूडेंट ही ना? मैं क्यों वफा करूं? तुम्हारे जूतों में तो सरदार के भतीजे की तरह चांदी के बक्कल भी नहीं होंगे।’ कहकर वह उठी और घर के भीतर चली गई।

नौजवान अपने कमरे में लौटते हुए बुदबुदाया, ‘यह इश्क भी क्यां वाहियात चीज है? तर्कशास्त्र के मुकाबले में तो यह आधी भी उपयोगी चीज नहीं है, क्यों कि इससे कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकता। जो चीजें नहीं होने वाली, उन्हीं को तो बताता है यह और क्या? इश्क हमें इस यकीन के लिए मजबूर करता है कि यह सच नहीं है, अवास्तविक है, अव्यावहारिक है और मेरी उम्र में तो व्यावहारिकता ही सब कुछ है। अब मैं वापस दर्शनशास्त्र की तरफ लौटूंगा और तत्व मीमांसा पढूंगा।

वह कमरे पर लौटा और धूल से अटी हुई एक पुस्तक उठाई और पढ़ने लग गया।





Sunday, 20 February 2011

पहले-पहले प्‍यार की पावन स्‍मृति में

भोर की पहली किरण की तरह आता है जिंदगी में पहला प्रेम और पूरे वजूद को इस तरह जकड़ लेता है जैसे आकाश में परिंदों का एक अंतहीन काफिला हमें उड़ाता लिए चला जा रहा हो। कोई नहीं जानता कि यह कब, क्यों और कैसे होता है, लेकिन जिसके जीवन में पहला प्रेम आता है उसके लिए ही नहीं दुनिया के किसी भी कवि-साहित्यकार के लिए इसे शब्दों में बांधना और उसका वर्णन करना बेहद मुश्किल होता है। बावजूद इसके अनेक रचनाकारों ने अपने प्रथम प्रेम को कविता, कहानी और उपन्यासों में बहुत सुंदर ढंग से बयान किया है। पहले प्यार को लेकर दुनिया की तमाम भाषाओं में लिखा भी गया है और हजारों की तादाद में फिल्में भी बनी हैं और आज भी ये पहले जितनी ही लोकप्रिय हैं। लेकिन हेलन केलर की यह बात अपनी जगह आज भी कायम है कि पहले प्रेम जैसी दुनिया की सबसे खूबसूरत चीजों को देख-सुन कर नहीं, दिल की अतल गहराइयों से ही महसूस किया जा सकता है। आस्थावान लोग इसे खुदा की सबसे अनूठी ईजाद कहते हैं और इसीलिए दुनिया के महानतम सूफी कवियों ने खुदा को ही अपने महबूब के रूप में मानकर अपनी शायरी में उसके रूप-सौंदर्य और महत्व को सिरजा है। जैसे बुल्ले शाह ने कहा है ‘अरे लोगों तुम्हारा क्या्, मैं जानूं मेरा खुदा जाने।’ पहला प्यार उस जादू का नाम है, जिसे बहुत-से लोग पता नहीं क्यों जीवन में महसूस करने से वंचित रह जाते हैं। इस जादू की माया ऐसी है कि जब यह पैदा होता है तो दिल, दिमाग और समूची चेतना यह मानने को तैयार नहीं होते कि एक दिन इसका अंत भी आएगा। प्रथम प्रेम के बारे में महान उपन्यासकार ऑस्कर वाइल्‍ड ने एक अद्भुत और सटीक बात कही है कि पुरुष हमेशा किसी स्त्री का पहला प्यार बनने के सपने देखता है और स्त्रियां पहले प्रेम को अंतिम मानकर चलती हैं। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि स्त्रियों के लिए पहला प्रेम ही अंतिम होता है, इसमें उनको खुशी मिलती है वो अनिर्वचनीय होती है और पहले प्रेम के साथ ही प्रेम में उनकी खुशियां समाप्त हो जाती हैं। इसके बाद वाले सारे प्रेम स्त्रियों के लिए एक हद तक निरर्थक होते हैं।

जिंदगी में कुछ चीजें कभी लौटकर वापस नहीं आतीं, जैसे किशोरावस्था या जवानी में कदम रखते ही पहले प्रेम का अनुभव। उसकी स्मृति बार-बार पलट कर आती है और एक मीठे-से दर्द की लहर हमारे वजूद को हिलाकर रख देती है। नब्बे फीसदी से अधिक मामलों में पहला प्रेम नाकाम होता है और यह नाकामयाबी जिंदगी के मायने बदलकर रख देती है। तभी जाकर समझ में आता है कि क्यों फैज अहमद फैज ने लिखा था, ‘हैं और भी गम जमाने में मुहब्बत के सिवा।’ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने इसीलिए पहले प्रेम के लिए कहा है कि ‘पहला प्यांर एक ऐसी मूर्खता है जिसमें जिज्ञासाओं का एक अनंत सिलसिला होता है और कोई भी सच्चीम स्वाभिमानी स्त्री इस चक्कर में नहीं पड़ती।’ जिंदगी की राह में आगे चलने पर वो सारी मूर्खताएं याद आती हैं, जिसमें एक नजर दीदार के लिए बेकरारी बेपनाह होती है, किसी ना किसी बहाने से प्रिय को खुश रखने के जतन पर जतन किए जाते हैं, भूख-प्यास, दिन रात किसी का खयाल नहीं रहता और जमाने भर को अपनी प्यारी-सी बेवकूफियों के लिए भुला दिया जाता है। कितना पछतावा होता है, जब उन अजीब हरकतों को जिंदगी के कठोर अनुभवों के बाद याद करते हुए खुद पर हंसी भी आती है और रोना भी।

असल में पहला प्यार एक खास उम्र में शारीरिक बदलावों के कारण विपरीत यौनाकर्षण से पैदा होता है। कहने में यह जितना आसान है, दरअसल है नहीं, क्योंकि महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन तक ने कहा है, ‘नहीं नहीं, यह तरीका नहीं चलेगा... पृथ्वी पर पहले प्यार जैसे जैवविज्ञानी पहलू को रसायन और भौतिकशास्त्र की शब्दांवली में तुम क्यों समझाने जा रहे हो।’ चलिए हम नहीं मानते कि इसे विज्ञान से सिद्ध किया जाए, लेकिन पहले प्रेम के कारण बहुत सी ऐसी चीजें जिंदगी में घटती हैं, जिनका इलाज आगे चलकर मनोविज्ञान को करना पड़ता है, क्योंकि पहले प्रेम की अतिशय स्मृति युवा दिलो-दिमाग को बहुत व्यथित करती है और वो इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं होता कि इसका अवसान होगा। इसीलिए सर्बियाई लेखक ब्रेनिस्लाव न्यूजिक कहते हैं कि पहला प्यार तभी खतरनाक होता है जब वो आखिरी भी हो जाए।

बहरहाल इस दुनिया में बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिनके जीवन में पहला प्रेम विवाह के बाद ही पैदा होता है और भारतीय समाज में तो यह एक बहुत बड़ा सच है। हमारे यहां तो कम उम्र में शादी का रिवाज आज भी जारी है। इस रिवाज की बदौलत ही शायद हमारे यहां विवाह जैसी संस्था इतनी कामयाब है, क्योंकि जिस उम्र में यौनाकर्षण जागृत होता है, उसी समय मां-बाप शादियां तय कर देते हैं और इस वजह से संभवत: पहले प्रेम का स्वाभाविक आकर्षण भावी जीवन साथी के प्रति पनप जाता है और यही विवाह के बाद दांपत्य् को मजबूती देता है। पहले प्रेम और भावी पति-पत्नी के लिए हमारे लोक जीवन में बहुत से लोकगीत, कहावतें और खेल बने हुए हैं। मुझे याद आता है कि बचपन में जब सावन के झूले लगते थे तो भाभियां अपनी नणदों से उनके भावी पति का नाम लेने के लिए खूब चुहल किया करती थीं और जब तक नाम नहीं बता दिया जाता था, तब तक झोटे देते हुए संटियां मारी जाती थी। नणदें भी भाभियों से अपने भैय्या का नाम पूछती थीं और इस तरह खूब मजे लिए जाते थे। अब वो पुराने रीति रिवाज खत्म होने के बाद परिदृश्य बदल गया है और प्राय: प्रथम प्रेम अब स्कूल और कॉलेज या घर, परिवार और रिश्तेदारियों में पनपने लगा है। बहरहाल हमारे लोक मानस में पहले प्रेम की अनेकों लोक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें ढोला-मरवण, जेठवा-ऊजळी, मूमल-महेंद्र, हीर-रांझा, सोहणी-महिवाल, ससी-पुन्‍नू, जसमा ओड़न आदि प्रमुख हैं।

पहले प्रेम की शुरुआत आजकल टेलीविजन, सिनेमा, क्रिकेट आदि लोकप्रिय माध्यमों के सितारों के जरिये होती है। एक जमाना था, जब हिंदी सिनेमा के नायक-नायिका ही हिंदी क्षेत्र में पहले प्रेम के पात्र हुआ करते थे। लड़कियां राजेश खन्ना के पोस्टरों से गंधर्व विवाह कर लिया करती थीं और नौजवान हेमा मालिनी, रेखा और मधुबाला आदि की तस्वी‍रें तकिए के नीचे दबाकर उनके सपनों में जीते थे। आजकल ज्यादातर किशोर और युवा अपना पहला प्रेम इन सेलिब्रिटी सितारों से करते हैं, लेकिन वास्तखविक पहला प्रेम दूसरी जगहों पर संभव होता है। पहला प्रेम प्राय: चेहरे की खूबसूरती, बातचीत, रहन-सहन के स्तर और अतिरिक्त प्रतिभा या मेधा के कारण पैदा होने वाले आकर्षण से पनपता है। वस्तुत: पहला प्रेम किसी भी इंसान के जीवन की पहली सबसे बड़ी परिघटना है, क्योंकि यह व्यक्ति को एक ऐसा अलौकिक और अवर्णनीय अहसास देकर जाता है, जिससे उसके बचपन और कैशोर्य का लगभग समापन होता है और अजीब उमंग व उत्साह से जीवन भरा-भरा लगने लगता है। आंखें बोलने लगती हैं और देह का अंग-अंग कुछ कहने लगता है, प्रकृति के सारे रंग एक नया अर्थ लेकर सामने आते हैं। मन काव्यमय हो जाता है और कुछ ना कुछ गुनगुनाने लगता है। चांद, सितारे, पेड़-पौधे, परिंदे, सुबह-शाम, दिन-रात सब कुछ इशारे करते नजर आते हैं और इंसान हरेक में अपने प्रिय को खोजने लगता है। जैसा कि कवयित्री एलिजाबेथ कहती हैं, ‘जब आप किसी से प्रेम करने लगते हैं तो आपकी तमाम इच्छाएं और हसरतें उसके लिए बाहर आने लगती हैं, आप सारी दुआओं में अपने प्रिय को याद करते हैं।’ बाकी दुनिया की नजरों में भले ही आपका प्रिय प्रेमपात्र अत्यंत साधारण और तुच्छ क्यों ना हो, आपके लिए संसार में उससे सुंदर कोई नहीं होता, क्यों कि आपका प्रेम ही उसे सौंदर्य देता है। इसीलिए किसी कवि ने कहा है कि आप उस स्त्री से इसलिए प्रेम नहीं करते हैं कि वह बेहद सुंदर है, बल्कि वह इसलिए खूबसूरत है कि आप उससे प्रेम करते हैं।

पहला प्रेम एक प्रकार से व्यक्ति को पूरी तरह बदल देता है। कुछ बदलाव सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक भी होते हैं। जीवन में पहली बार परिवार से इतर किसी के प्रति आकर्षण व्यंक्ति को समाज के प्रति प्रेमिल बनाता है और प्रेम के रूप में एक ऐसा उपहार मिलता है, जिससे उसके भाव जगत में संवेदनाओं को विस्फोट होता है। कायनात की बहुत-सी चीजों को लेकर भावनात्मक रिश्ता विकसित होता है, जो आगे चलकर कई किस्म की कलात्मंक अभिरूचियों में तब्दील होता है और व्यक्ति को संवेदनशील कलाकार जैसे संस्कार मिलते हैं। पहले प्रेम की सबसे खराब बात यह होती है कि यह अत्यंत क्षणिक आवेग की तरह आता है और इसमें मूर्खता और मासूमियत का इस कदर घालमेल होता है कि कम उम्र में यह चिड़चिड़ा बना देता है और एक अजीब-सी दीवानगी पैदा कर देता है, जो परिवार के लिए चिंताजनक हो जाता है। इसीलिए नीत्शे की बात सही लगती है कि प्रेम में हमेशा कुछ हद तक पागलपन होता है, लेकिन दूसरी तरफ देखें तो हर पागलपन के भी कुछ कारण होते हैं। इस पागलपन ने हमें उच्च कोटि के कलाकार और रचनाकार दिए हैं। बहुत-से लेखकों का कहना है कि उन्होंने आरंभ में अपने प्रिय प्रेमपात्र को प्रभावित करने के लिए ही लिखना शुरु किया था।

पहले प्यार और पहले आकर्षण के बारे में चाहे कुछ भी कहा जाए, यह मनुष्य जीवन का सबसे अनमोल उपहार है, जो जिसको नसीब होता है, वो भी रोता है और जिसे नहीं मिलता वह भी। जिंदगी के किसी ना किसी मोड़ पर प्रथम प्रेम की स्नेहिल और मासूम स्मृति हमेशा एक नया अहसास देकर जाती है और यूं लगता है जैसे खुश्बुओं का एक जबर्दस्त‍ झोंका दिलो-दिमाग को तरोताजा कर गया हो। अपनी ही एक कविता याद आती है:

पहला चुंबन और पहला आलिंगन
कभी नहीं भूलता कोई
भूलने के लिए और भी बहुत-सी चीजें हैं
मसलन बहुत सारे सुख
जो हमने साथ-साथ भोगे
उन दु:खों को नहीं भूलना प्रिय
जो हमने साथ-साथ काटे।

यह आलेख डेली न्‍यूज़, जयपुर के रविवारीय परिशिष्‍ट 'हम लोग' की आवरण कथा के रूप में 13 फरवरी, 2011 को प्रकाशित हुआ।









Sunday, 15 February 2009

वो पहला प्यार...



आधुनिक विश्व साहित्य में युवा मन के प्रेम को लेकर कथा-कहानी लिखने की परंपरा कम से कम ढाई सौ बरस पुरानी है। इस क्रम में सबसे पहली कृति सैम्युअल रिचर्ड्सन की ‘पामेला’ उर्फ ‘वर्च्यू रिवार्डेड’ है, जो 1740 में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद तो यूरोप में प्रेम और रोमांस को लेकर अफसाने लिखने की एक ऐसी परंपरा चल पड़ी कि आगे चलकर तो ऐसे किस्से-कहानियों के लिए ‘मिल्स एण्ड बून’ जैसे प्रकाशन गृह ही खुल गये। लेकिन यूरोप और दूसरे महाद्वीपों की अथाह प्रेमकथाओं के सागर में रूस के महान् कवि-कथाकार-उपन्यासकार इवान तुर्गनेव की सन् 1860 में prakaashit उपन्यासिका ‘प्रथम प्रेम’ अर्थात् ‘फर्स्ट लव’ एक ऐसी कृति है, जिसने दुनिया भर के नौजवानों के दिलों में जबर्दस्त उथल-पुथल मचाई है। सदा से माना जाता रहा है कि प्रत्येक प्रेमकथा अगर एक त्रासदी में खत्म होती है तो अमर होती है और शायद ही कोई प्रेमकथा हो जो सफल होने के कारण अमर हुई हो, यह तो सिर्फ हमारी भारतीय व्रत कथाओं में ही होता आया है, जहां एकनिष्ठ प्रेम और एकव्रती सफल दाम्पत्य जीवन को ही महानता का दर्जा प्राप्त है। लेकिन तुर्गनेव की उपन्यासिका एक ऐसी दर्दीली दास्तान है, जिसे पढ़ने के बाद उसके तमाम पात्रों से पाठक को गहरी सहानुभूति होती है, क्योंकि वे अपने समय के ऐसे पात्र हैं, जो प्रेम में दिलो-जान से डूबने के बाद भी कुछ हासिल नहीं कर पाते, उनका जीवन तो बस ’दुख ही जीवन की कथा रही’ में समाप्त हो जाता है।
यह कहानी सोलह साल के किशोर प्रेमी व्लादिमिर पेत्रोविच और इक्कीस बरस की जिनैदा अलेक्सान्द्रोव्ना के अद्भुत प्रेम की कथा है, जो अपनी राजकुमारी सदृश्य मां के साथ रूस के देहात में रहती है। व्लादिमिर अपने पिता के साथ रहता है। जिनैदा के परिवार को पुराने विरसे के कारण बस कहने भर के लिए इज्जत हासिल है, वरना उनकी हालत बिल्कुल गरीबों जैसी है। कच्ची उमर का व्लादिमिर अपने से थोड़ी पकी उमर की जिनैदा के प्यार में गिरफ्तार हो जाता है। व्लादिमिर के किशोर मन में जिनैदा की एक बहुत ही पवित्र और प्रेमिल छवि है, उसे जिनैदा के साथ बैठना, ढेर सारी बातें करना और उसे एकटक देखते रहना बहुत अच्छा लगता है। जिनैदा के व्लादिमिर जैसे और उससे भी बेहतर कई चाहने वाले खूबसूरत नौजवान पहले से ही मौजूद हैं। जिनैदा जाने-अनजाने व्लादिमिर से प्रेम का खेल उसी तरह खेलती है जैसे दूसरे लड़कों के साथ खेलती है। वह व्लादिमिर को प्रेम में छकाते हुए उसे अपने मोहजाल में फांस लेती है। बहुत दिनों बाद व्लादिमिर को पता चलता है कि जिनैदा उसे इसलिए चाहती है, क्योंकि असलियत में तो वह उसके पिता प्योत्र वसील्येविच को प्रेम करती है। एक किशोर-नौजवान के लिए यह कितनी अजीब बात है कि उसकी प्रेमिका उसके पिता से ही प्रेम करती है। बेचारा व्लादिमिर इसी चिंता में खोखला हुआ जाता है, और एक दिन तो वह खुद अपनी आंखों से अपने पिता को जिनैदा से प्रेमवार्ता करते हुए देख लेता है। उसके पिता जिनैदा के घर की खिड़की के बाहर खड़े बतिया रहे हैं और एक नाजुक डाली से उसके हाथ को सहला रहे हैं। जिनैदा डाली का सिरा चूम लेती है और पिता खिड़की से घर के भीतर कूद जाते हैं। व्लादिमिर को एक झटका लगता है और वह निराश हो वहां से चला जाता है।
व्लादिमिर की मां को किसी तरह इस बात का पता चल जाता है और वह अपने पति को अपनी नाराजगी जताती है। प्योत्र वसील्येविच लगभग रोते-गिड़गिड़ाते हुए पत्नी से माफी मांगते हैं। कुछ समय बाद व्लादिमिर के पिता की ह्रदयाघात से मृत्यु हो जाती है और व्लादिमिर भी मास्को आ जाता है। तीन-चार साल बाद व्लादिमिर को पता चलता है कि जिनैदा ने डोल्स्की नामक एक नौजवान जागीरदार से शादी कर ली थी, लेकिन बच्चे को जन्म देने के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। व्लादिमिर बरसों बाद डाइनिंग टेबल पर अपने दोस्तों के साथ अपने प्रथम प्रेम की कहानी सुना रहा है और सारी कहानी फ्लैश बैक में चलती है।
तुर्गनेव की यह कृति रूसी साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में भी क्लासिक मानी जाती है, जिसमें किशोर मन की प्रेमिल भावनाओं और उन्नीसवीं शताब्दी के रूसी समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों का एक यथार्थवादी चित्रण देखने को मिलता है। व्लादिमिर के पिता उस दौर के विलासी और लम्पट पुरुषों का प्रतिनिधि चरित्र है, तो जिनैदा के रूप में सौंदर्य के बल पर मर्दों को छकाने वाली उस दौर की युवा नारी है, जो गरीब होते हुए भी महज खानदानी विरासती तमगे के कारण सबकी चहेती है। युवा और कैशोर्य दिलों को छू लेने वाली यह उपन्यासिका दुनिया की तमाम भाषाओं में अनूदित होकर अद्भुत लोकप्रियता हासिल कर चुकी है। रूसी स्कूलों में तो ‘प्रथम प्रेम’ वहां के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है। हम भारतीय शायद ही कभी यह कल्पना कर पायें कि हमारे यहां इस किस्म की प्रेमकथाएं कभी स्कूलों में पढ़ाई जाएंगी। हमारे यहां तो नैतिकता की दुहाई देने वालों और संस्कृति की रक्षा में लगे सिपाहियों की पूरी फौजें तैयार हैं, जो प्रेम के नाम से ही बिदकती हैं। ऐसे लोगों को भी कम से कम एक बार तुर्गनेव का ‘प्रथम प्रेम’ जरूर पढ़ना चाहिए।
(यह 'डेली न्यूज़' के रविवारी परिशिष्ट 'हम लोग' के ८ फरवरी, २००९ के 'प्रेम अंक' में प्रकाशित हुआ।)