Sunday 15 February 2009

वो पहला प्यार...



आधुनिक विश्व साहित्य में युवा मन के प्रेम को लेकर कथा-कहानी लिखने की परंपरा कम से कम ढाई सौ बरस पुरानी है। इस क्रम में सबसे पहली कृति सैम्युअल रिचर्ड्सन की ‘पामेला’ उर्फ ‘वर्च्यू रिवार्डेड’ है, जो 1740 में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद तो यूरोप में प्रेम और रोमांस को लेकर अफसाने लिखने की एक ऐसी परंपरा चल पड़ी कि आगे चलकर तो ऐसे किस्से-कहानियों के लिए ‘मिल्स एण्ड बून’ जैसे प्रकाशन गृह ही खुल गये। लेकिन यूरोप और दूसरे महाद्वीपों की अथाह प्रेमकथाओं के सागर में रूस के महान् कवि-कथाकार-उपन्यासकार इवान तुर्गनेव की सन् 1860 में prakaashit उपन्यासिका ‘प्रथम प्रेम’ अर्थात् ‘फर्स्ट लव’ एक ऐसी कृति है, जिसने दुनिया भर के नौजवानों के दिलों में जबर्दस्त उथल-पुथल मचाई है। सदा से माना जाता रहा है कि प्रत्येक प्रेमकथा अगर एक त्रासदी में खत्म होती है तो अमर होती है और शायद ही कोई प्रेमकथा हो जो सफल होने के कारण अमर हुई हो, यह तो सिर्फ हमारी भारतीय व्रत कथाओं में ही होता आया है, जहां एकनिष्ठ प्रेम और एकव्रती सफल दाम्पत्य जीवन को ही महानता का दर्जा प्राप्त है। लेकिन तुर्गनेव की उपन्यासिका एक ऐसी दर्दीली दास्तान है, जिसे पढ़ने के बाद उसके तमाम पात्रों से पाठक को गहरी सहानुभूति होती है, क्योंकि वे अपने समय के ऐसे पात्र हैं, जो प्रेम में दिलो-जान से डूबने के बाद भी कुछ हासिल नहीं कर पाते, उनका जीवन तो बस ’दुख ही जीवन की कथा रही’ में समाप्त हो जाता है।
यह कहानी सोलह साल के किशोर प्रेमी व्लादिमिर पेत्रोविच और इक्कीस बरस की जिनैदा अलेक्सान्द्रोव्ना के अद्भुत प्रेम की कथा है, जो अपनी राजकुमारी सदृश्य मां के साथ रूस के देहात में रहती है। व्लादिमिर अपने पिता के साथ रहता है। जिनैदा के परिवार को पुराने विरसे के कारण बस कहने भर के लिए इज्जत हासिल है, वरना उनकी हालत बिल्कुल गरीबों जैसी है। कच्ची उमर का व्लादिमिर अपने से थोड़ी पकी उमर की जिनैदा के प्यार में गिरफ्तार हो जाता है। व्लादिमिर के किशोर मन में जिनैदा की एक बहुत ही पवित्र और प्रेमिल छवि है, उसे जिनैदा के साथ बैठना, ढेर सारी बातें करना और उसे एकटक देखते रहना बहुत अच्छा लगता है। जिनैदा के व्लादिमिर जैसे और उससे भी बेहतर कई चाहने वाले खूबसूरत नौजवान पहले से ही मौजूद हैं। जिनैदा जाने-अनजाने व्लादिमिर से प्रेम का खेल उसी तरह खेलती है जैसे दूसरे लड़कों के साथ खेलती है। वह व्लादिमिर को प्रेम में छकाते हुए उसे अपने मोहजाल में फांस लेती है। बहुत दिनों बाद व्लादिमिर को पता चलता है कि जिनैदा उसे इसलिए चाहती है, क्योंकि असलियत में तो वह उसके पिता प्योत्र वसील्येविच को प्रेम करती है। एक किशोर-नौजवान के लिए यह कितनी अजीब बात है कि उसकी प्रेमिका उसके पिता से ही प्रेम करती है। बेचारा व्लादिमिर इसी चिंता में खोखला हुआ जाता है, और एक दिन तो वह खुद अपनी आंखों से अपने पिता को जिनैदा से प्रेमवार्ता करते हुए देख लेता है। उसके पिता जिनैदा के घर की खिड़की के बाहर खड़े बतिया रहे हैं और एक नाजुक डाली से उसके हाथ को सहला रहे हैं। जिनैदा डाली का सिरा चूम लेती है और पिता खिड़की से घर के भीतर कूद जाते हैं। व्लादिमिर को एक झटका लगता है और वह निराश हो वहां से चला जाता है।
व्लादिमिर की मां को किसी तरह इस बात का पता चल जाता है और वह अपने पति को अपनी नाराजगी जताती है। प्योत्र वसील्येविच लगभग रोते-गिड़गिड़ाते हुए पत्नी से माफी मांगते हैं। कुछ समय बाद व्लादिमिर के पिता की ह्रदयाघात से मृत्यु हो जाती है और व्लादिमिर भी मास्को आ जाता है। तीन-चार साल बाद व्लादिमिर को पता चलता है कि जिनैदा ने डोल्स्की नामक एक नौजवान जागीरदार से शादी कर ली थी, लेकिन बच्चे को जन्म देने के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। व्लादिमिर बरसों बाद डाइनिंग टेबल पर अपने दोस्तों के साथ अपने प्रथम प्रेम की कहानी सुना रहा है और सारी कहानी फ्लैश बैक में चलती है।
तुर्गनेव की यह कृति रूसी साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में भी क्लासिक मानी जाती है, जिसमें किशोर मन की प्रेमिल भावनाओं और उन्नीसवीं शताब्दी के रूसी समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों का एक यथार्थवादी चित्रण देखने को मिलता है। व्लादिमिर के पिता उस दौर के विलासी और लम्पट पुरुषों का प्रतिनिधि चरित्र है, तो जिनैदा के रूप में सौंदर्य के बल पर मर्दों को छकाने वाली उस दौर की युवा नारी है, जो गरीब होते हुए भी महज खानदानी विरासती तमगे के कारण सबकी चहेती है। युवा और कैशोर्य दिलों को छू लेने वाली यह उपन्यासिका दुनिया की तमाम भाषाओं में अनूदित होकर अद्भुत लोकप्रियता हासिल कर चुकी है। रूसी स्कूलों में तो ‘प्रथम प्रेम’ वहां के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है। हम भारतीय शायद ही कभी यह कल्पना कर पायें कि हमारे यहां इस किस्म की प्रेमकथाएं कभी स्कूलों में पढ़ाई जाएंगी। हमारे यहां तो नैतिकता की दुहाई देने वालों और संस्कृति की रक्षा में लगे सिपाहियों की पूरी फौजें तैयार हैं, जो प्रेम के नाम से ही बिदकती हैं। ऐसे लोगों को भी कम से कम एक बार तुर्गनेव का ‘प्रथम प्रेम’ जरूर पढ़ना चाहिए।
(यह 'डेली न्यूज़' के रविवारी परिशिष्ट 'हम लोग' के ८ फरवरी, २००९ के 'प्रेम अंक' में प्रकाशित हुआ।)

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