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Monday, 31 January 2011

राजद्रोह और महात्‍मा गांधी का बयान

23 मार्च, 1922 को अदालत में महात्मा गांधी ने यह बयान दिया।

आज मानवाधिकार कार्यकर्ता और चिकित्‍सक डॉ. बिनायक सेन को राजद्रोह के आरोप में जेल में डाल दिया गया है। अंग्रेज सरकार ने महात्‍मा गांधी और हजारों देशभक्‍तों को उसी धारा 124-ए में जेल में डाल दिया था। 23 मार्च, 1922 को महात्‍मा गांधी ने अदालत में राजद्रोह के मामले में जो बयान दिया था, वह यहां प्रस्‍तुत है। इस बयान को आज के संदर्भ में पढ़ना एक नया अनुभव है। कल 30 जनवरी, 2011 को यह बयान मैंने बिनायक सेन के समर्थन में गांधी सर्किल पर आयोजित सभा में सुनाया था। आप भी पढ़ें और विचार करें।

''मैं स्वीकार करता हूं कि संभवतः भारत और इंग्लैंड की जनता को शांत करने के लिए ही मुख्य तौर पर यह मुकदमा चलाया गया है और इसमें मुझे यह विस्तार से बताना चाहिए कि कैसे और क्यों मैं एक निष्ठावान, वफादार और सहयोगी से एक हठी असंतुष्ट और असहयोगी के रूप में तब्दील हो गया हूं। मुझे अदालत को यह भी बताना ही चाहिए कि क्यों मैं भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति लगातार असंतोष पैदा करने का अपराधी सिद्ध किए जाने की मांग करता हूं।

मेरे सार्वजनिक जीवन का आरंभ 1893 में दक्षिण अफ्रीका के खराब वातावरण में हुआ। उस देश में ब्रिटिश सरकार के साथ पहला संपर्क बहुत अच्छा नहीं रहा। मुझे लगा कि एक मनुष्य और एक भारतीय होने के कारण मेरे कोई अधिकार नहीं हैं। सही बात तो यह कि मुझे यह अच्छी तरह पता चल गया कि एक मनुष्य के रूप में मेरे कोई अधिकार इसलिए नहीं हैं कि मैं एक भारतीय हूं।

लेकिन इससे मुझे कोई असमंजस नहीं हुआ। मैंने सोचा कि भारतीयों के साथ यह बर्ताव उस व्यवस्था के फोड़े हैं और उसके मूल में ही यह खामी है। मैंने सरकार का स्वेच्छा से और दिल से सहयोग किया। जब भी मुझे लगा कि इस व्यवस्था में खामी है मैंने खुले तौर पर इसकी आलोचना भी की, लेकिन कभी नहीं चाहा कि इसका पतन हो।

मैं अनचाहे ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ब्रिटिश संबंध के कारण भारत आर्थिक और राजनैतिक रूप से इस कदर असहाय हो गया है जितना इतिहास में कभी नहीं था। किसी भी आक्रमणकारी के खिलाफ एक निशस्त्र भारत के पास विरोध की कोई ताकत ही नहीं है, अगर उसे अपने सशस्त्र दुश्मन से मुकाबला करना हो। हालात ये हैं कि हमारे सबसे अच्छे लोग भी यह सोचते हैं कि भारत की कई पीढियों को स्वतंत्र गणराज्य बनने से पहले ही चुक जाएंगी। भारत इस कदर गरीब हो चुका है कि उसमें अकाल तक से लड़ने की ताकत नहीं रही। ब्रिटिश आगमन से पूर्व यहां लाखों कुटीर धंधों में कताई-बुनाई होती थी, जो इस देश के मामूली कृषि संसाधनों का पूरक और जरूरत भर होता था। वो कुटीर उद्योग जो भारत के अस्तित्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था आज हृदयहीन और अमानवीय प्रक्रिया के तहत ब्रिटिश आगमन के बाद नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है। छोटे कस्बों के बाशिंदे भी इतना जानते हैं कि भारत की भूखी जनता किस तरह जीवनहीन हो गई है। वे यह भी जानते हैं कि उनको मिलने वाला आराम उस दलाली को दर्शाता है जो उन्हें उस काम के बदले मिलती है जो वे विदेशी शोषक के लिए करते हैं और यह भी कि जनता को मिलने वाला मुनाफा और दलाली खत्म हो गया है। वे यह भी समझ गए है कि ब्रिटिश भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार जनता के निरंतर शोषण पर ही चलती है और इसी के लिए चलती है। यह कोई कुतर्क नहीं है और आंकड़ों की बाजीगरी से आप इस प्रमाण को झूठा सिद्ध नहीं कर सकते जो हजारों गांवों में नंगी आंखों से कंकालों के रूप में दिखाई देते हैं। मुझे कोई संदेह नहीं है, अगर कहीं ईश्वर है तो मानवता के विरुद्ध इतिहास के सबसे बड़े अपराध के लिए इंग्लैंड और भारत के शहरी नागरिकों को जवाब देना ही पड़ेगा। इस देश में तो कानून भी विदेशी शोषक की सेवा के लिए बनाए गए हैं। पंजाब मार्शल लॉ के अंतर्गत दर्ज किए गए मामलों में मेरा निष्पक्ष परीक्षण बताता है कि 95 प्रतिशत मामले पूरी तरह गलत थे। भारत में राजनैतिक मामलों में मेरा अनुभव इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि दस में से नौ मामलों में निर्दोष लोगों को फंसाया जाता है। उनका अपराध इतना ही है कि वो अपने वतन से प्रेम करते हैं। भारत की अदालतों में 100 में से 99 मामलों में यूरोपियनों के मुकाबले इंसाफ नहीं मिलता। यह कोई मनगढंत तस्वीर नहीं है। यह लगभग प्रत्येक भारतीय का अनुभव है अगर वह ऐसे किसी मामले में पड़ा हो। मेरे विचार से यह कानून के प्रशासन का शोषक के हित में वेश्यावृति करने जैसा है।

सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि देश के प्रशासन में लगे अंग्रेज और उनके भारतीय सहयोगी यह जानते ही नहीं कि वे उस अपराध में लगे हुए हैं जिसे मैंने बताने की कोशिश की है। मैं संतुष्ट हूं कि अंग्रेज और भारतीय अधिकारी पूरी ईमानदारी से यह विश्वास करते हैं कि वे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्थाओं में से एक का संचालन कर रहे हैं और भारत धीमे ही सही आगे बढ़ रहा है। वे नहीं जानते कि एक तरफ तो आतंकवाद की सूक्ष्म और प्रभावी व्यवस्था और शक्ति का संगठित प्रदर्शन है और दूसरी तरफ तमाम किस्म की शक्तियों और आत्मरक्षा से वंचित आम जनता है, इस सबसे लोगों का पुंसत्व समाप्त हो गया है और उनमें एक निठल्लापन भर गया है। इस दर्दनाक प्रवृति ने प्रशासकों तक को अपने कब्जे में ले लिया है जिससे लोग प्रशासन को कुछ समझते ही नहीं और प्रशासक आत्मछल के शिकार हो रहे हैं। धारा-124-ए जिसके तहत मुझे खुशी है कि आरोपी बनाया गया है, यह भारतीय दण्ड संहिता की शानदार धारा है, जिसे भारतीय नागरिकों के दमन के लिए बनाया गया है। कानून ना तो प्रेम की रचना कर सकता है और ना ही उसे संचालित कर सकता है। अगर कोई किसी व्यक्ति या व्यवस्था से प्रेम करता है तो उसे अपना अप्रेम या असंतोष भी व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए, जब तक कि वह किसी प्रकार से हिंसा की ओर ना जाए। लेकिन जिस धारा में मि. बैंकर (असहयोग आंदोलन में गांधी जी के सहयोगी) और मुझे दोषी करार दिया गया है उसके अंतर्गत जरा-सा असंतोष पैदा करना भी अपराध है। इस धारा के अंतर्गत दर्ज किए गए कुछ मामलों का अध्ययन किया है और मैं जानता हूं कि देश के सर्वश्रेष्ठ देशभक्तों को इस धारा के अंतर्गत आरोपी बनाया गया है। मैं इसे एक विशेषाधिकार मानता हूं और इसीलिए इस धारा के अंतर्गत आरोपी बनाए जाने की मांग करता हूं। मैंने अपने असंतोष के कारणों का संक्षेप में विवरण देने की कोशिश की है। किसी भी प्रशासक के प्रति मेरे मन और आत्मा में कोई व्यक्तिगत दुर्भाव नहीं है, क्या मैं सम्राट के प्रतिनिधि के प्रति थोड़ा भी असंतोष नहीं दिखा सकता। लेकिन मैं एक ऐसी सरकार के प्रति असंतोष रखना अपना नैतिक दायित्व मानता हूं, जिसने पुरानी किसी भी व्यवस्था से अधिक भारत का नुकसान किया है। भारत का पुरुषार्थ इतिहास में इतना कमतर कभी नहीं हुआ, जितना ब्रिटिश शासन में हुआ है। ऐसा विश्वास रखते हुए मैं मानता हूं कि इस व्यवस्था के प्रति प्रेम रखना एक अपराध है। मेरे लिए यह विशेषाधिकार की बात है कि मेरे विरुद्ध मेरे लिखे उन लेखों को सबूत के तौर पर पेश किया गया है जो मैं लिख सका।

सच में मैं विश्वासपूर्वक कहता हूं कि जिस अप्राकृतिक स्थिति में ये दो देश रह रहे हैं वहां मैंने असहयोग के माध्यम से भारत और इंग्लैंड दोनों की सेवा की है। मेरी विनम्र राय है कि बुराई के साथ असहयोग करना भी उतना ही बड़ा कर्तव्य है जितना अच्छाई के साथ सहयोग करना। लेकिन अतीत में बुरा करने वाले के साथ असहयोग जानबूझकर हिंसा के रूप में ही व्यक्त किया गया। मैं अपने देशवासियों को यह बताने की कोशिश कर रहा हूं कि हिंसक असहयोग बुराई को और बढ़ाएगा और यह भी कि हिंसा से बुराई को बल ही मिलेगा। बुराई का खात्मा तभी होगा जब हम हिंसा से पूरी तरह मुक्त हो जाएं। अहिंसा में यह भी निहित है कि हम बुराई के साथ असहयोग करने के लिए दंडित होने के लिए खुद को प्रस्तुत कर दें। इसलिए मैं यहां स्वयं को प्रसन्नता के साथ प्रस्तुत करता हूं कि कानून के तहत जो जानबूझकर किया गया अपराध है, और मेरे लिए यह एक नागरिक का सबसे बड़ा कर्तव्य है, उसके लिए मुझे बड़े से बड़ा दंड दिया जाए। न्यायाधीश महोदय, आपके पास अब एक ही सूरत बची रह गई है कि अगर आप समझते हैं कि आप जिस कानून को चला रहे हैं और वो गलत है, बुराई का साथ देने वाला है और मैं निर्दोष हूं तो आप अपने पद से इस्तीफा दें और इस तरह बुराई से अपने आपको दूर कर लें। अगर आप समझते हैं और मानते हैं कि यह व्यवस्था और आपके कानून का शासन इस देश की जनता के लिए अच्छा है और इसलिए मेरी गतिविधियां सार्वजनिक जीवन के लिए हानिकारक हैं तो मुझे गंभीर से गंभीर सजा दें।''

Sunday, 12 September 2010

भारतीय शासकीय मानसिकता और भाषा का सवाल

सितंबर का महीना मेरे लिए दो कारणों से महत्‍वपूर्ण है, जिसमें पहला कारण है इसे हिंदी माह के रूप में मनाना। कॉलेज की पढ़ाई तक कभी हिंदी माह के बारे में नहीं सुना था, क्‍योंकि एक तो मैं कॉमर्स का विद्यार्थी रहा और दूसरी तरफ साहित्‍य पढ़ने में ज्‍यादा मजा आता था, लिखना कम होता था और ऐसी कोई संगत नहीं थी जिसमें हिंदी माह के बारे में बातचीत या चर्चा हो। बैंक में नौकरी लगने के बाद इसकी जानकारी मिली। पूरे महीने ही नगर भर में हिंदी प्रतियोगिताओं की धूम मची रहती थी और हर जगह मुझे ही भेज दिया जाता था। पॉकेटबुक उपन्‍यासों से पीछा छूटने के बाद मैं कभी विमुख नहीं हुआ और ईमानदारी से कहता हूं कि शिवानी तक को मैं कभी नहीं पढ़ पाया। इसलिए गंभीर साहित्‍य की ओर ही मेरा झुकाव बना रहा। शुरुआत में इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने का जो किंचित उत्‍साह था वह निर्णायकों ने धूमिल कर दिया। दरअसल निर्णायकों के नाम पर हिंदी के खराब अध्‍यापक या छिटपुट मंचीय किस्‍म के कवि और विभागों के हिंदी अधिकारी आते थे, जिनकी साहित्‍य की समझ पर मुझे बाद में शक होने लगा था। मैं जबर्दस्‍ती भेजा जाता था, लेकिन जब कविमित्र ही निर्णायक के रूप में आने लगे तो मैंने प्रतियोगिताओं में भाग लेना बंद कर दिया। बहरहाल, उस दौर में मैं सोचता था कि जिस भाषा के हम लोग हैं, वे अगर कुछ करें तो लोगों को हिंदी में काम करने की ओर प्रवृत किया जा सकता है। इस बारे में कुछ समय तो मैंने बड़े उत्‍साह से काम किया, लेकिन जब देखा कि लोगों की रूचि ही नहीं है तो यह भी छोड़ दिया।

लेकिन मुझे लगता है कि बैंक हो या अन्‍य कोई संस्‍थान, लगभग सब जगह यही स्थिति है। और इसके पीछे लोगों की मानसिकता से कहीं अधिक व्‍यवस्‍था की मूलभूत खामियां हैं। दरअसल, हमने जो व्‍यवस्‍था का तंत्र अंग्रेजों से विरासत में पाया है, वह बना ही अंग्रेजी मानसिकता और संस्‍कृति से है, जिसमें हिंदी और भारतीय भाषाएं कहीं फिट नहीं होतीं। भाषा के साथ उसकी संस्‍कृति और परंपराएं जुड़ी होती हैं, और वे अविच्छिन्‍न होती हैं। भाषा और संस्‍कृति मनुष्‍य की मानसिकता का निर्माण करती हैं। हम लोग घरों में अपने माता-पिता से अगर अपनी आंचलिक बोली-बानी में बात करते हैं तो वह हमारी सांस्‍कृतिक परंपरा है। हमारे माता-पिता को भले ही हिंदी या अंग्रेजी आती हो, हम उनसे बात अपनी प्रिय बोली में ही करते हैं, क्‍योंकि उसकी जो अपनी मिठास है वह दूसरी भाषा में नहीं। (रामचंद्र गुहा ने इसे द्विभाषी मानसिकता कहा है। कुछ महीनों पहले ई.पी.डब्‍लू. में उनका भाषाचिंतन पर शानदार लेख पढ़ा था, उसे हर लेखक को पढना चाहिए।) खैर, आजादी के बाद जो व्‍यवस्‍था चली आ रही है, उसमें ले देकर अंग्रेजियत वाली श्रेष्‍ठताबोध की मानसिकता ही हावी है। यह मानसिकता हिंदी और अन्‍य भारतीय भाषाओं और बोलियों को ही नहीं उपेक्षित समुदायों और स्त्रियों को भी प्रताडि़त करती है और उन्‍हें उनका वाजिब हक मिलने देने से रोकती है। इसे भारतीय शासकीय मानसिकता कहा जा सकता है।

इस मानसिकता का निर्माण आजादी के बाद नहीं बहुत पहले हो चुका था, जब देवभाषा संस्‍कृत को श्रेष्‍ठ माना जाता था। संस्‍कृत का पठन-पाठन एक खास जाति तक यानी स्‍वयं तक सीमित कर ब्राह्मणों ने जिस व्‍यवस्‍था को अपने बुद्धि-चातुर्य से स्‍थापित किया, उसने बाकी पूरे समाज को श्रेष्‍ठ भाषा से दूर रखा, कामगार-दस्‍तकार और दूसरी जातियों के साथ स्त्रियों को भी अपनी देवभाषा से बाहर रखा और उल्‍लंघन होने पर कानों में पिघलता शीशा डालने जैसी दण्‍ड व्‍यवस्‍था भी बनाई। अपने ईश्‍वरवादी कर्मकाण्‍डों के जरिए ब्राह्मणों ने पूरी शासन व्‍यवस्‍था को अपने चंगुल में जकड़ रखा था और क्षत्रिय-वैश्‍य जैसे कुछ समुदायों को कामगार-दस्‍तकार जातियों से बड़ा सिद्ध कर एक विषमतावादी समाज की रचना कर रखी थी। कर्मप्रधान समुदायों को अपने कामकाज से ही फुर्सत नहीं थी कि वे शासन व्‍यवस्‍था के दूसरे पहलुओं पर भी सोच सकें। इस तरह एक ऐसी शासकीय मानसिकता का निर्माण हुआ, जिसमें कुछ श्रेष्‍ठ जातियां सब पर हावी थीं और सारे अधिकार उन्‍हीं के पास थे। इसलिए जब अंग्रेज आए तो उनकी जी-हुजूरी में इसी शासकीय मानसिकता से ग्रस्‍त जातियों के लोग ही पहले गए और सारे ओहदे-मनसब अंग्रेजों की चाकरी में ले लिए। कामगार जातियों को तो शासकीय मानसिकता वालों ने लालच देकर मॉरीशस, सूरीनाम और ब्रिटिश गुयाना जैसे निर्जन द्वीपों पर जहाजों में लदवा कर भिजवा दिया था।

आजादी के बाद शासकीय मानसिकता वाली श्रेष्‍ठ जातियों के लोग ही प्रभावकारी स्थिति में थे। उन्‍होंने सबसे पहले हिंदी और भारतीय भाषाओं के मुकाबले में अंग्रेजी को सर्वोच्‍च स्‍थान देकर एक तरफ तो अपनी ब्रिटिश राजभक्ति को सिद्ध किया, दूसरी तरफ हिंदी और अन्‍य भाषाओं के प्रति अपनी हिकारत को सार्वजनिक कर सिद्ध किया कि वे ब्राह्मणों द्वारा पोषित व्‍यवस्‍था को ही आगे ले जाएंगे, जिसमें शासन की भाषा या तो अंग्रेजी रहेगी, अन्‍यथा दूसरी किसी भी भाषा को ऐसा बना दिया जाएगा कि वह आम आदमी से दूर रहे और शासन में आम आदमी के बजाय शासकीय मानसिकता वाले श्रेष्ठिवर्ग का ही बोलबाला रहे। इसलिए हिंदी को राजभाषा बनाने के साथ ही यह षड़यंत्र रचा जाने लगा था कि इसे जनविमुख सरकारी भाषा कैसे बनाया जाए। आजमाया हुआ प्राचीन नुस्‍खा देवभाषा संस्‍कृत के रूप में था ही। इसलिए पहले तो जानबूझकर हिंदी से हिंदुस्‍तानी और तत्‍सम शब्‍दों को अस्‍पृश्‍य और त्‍याज्‍य कह कर वैसे ही निकाला गया, जैसे संस्‍कृत से कामगार-दस्‍तकार जातियों और स्त्रियों को वंचित किया गया था। शब्‍दकोश और शब्‍दावली बनाने का जिम्‍मा भी शासकीय मानसिकता वाले श्रेष्ठिवर्ग के पास था, इसलिए उन्‍होंने देवभाषा से ऐसे-ऐसे शब्‍दों की सर्जना की कि आम आदमी उस हिंदी से भी दूर भाग जाए और उसके लिए यह हिंदी भी अंग्रेजी की तरह ही अत्‍यंत जटिल और दुर्बोध हो जाए, जो उसकी अपनी भाषा नहीं है। बोलचाल की हिंदी को अपदस्‍थ कर किताबी किस्‍म की हिंदी विकसित करने का श्रेय उसी समुदाय को दिया जा सकता है जो अंग्रेजी और अंग्रेजों की चाटुकारिता में कई पीढि़यों तक लगा रहा।

हमारी व्‍यवस्‍था में चूंकि अंग्रेजियत हावी रही इसलिए वहां हिंदी या भारतीय भाषाएं पूरी तरह स्‍थापित नहीं हो पातीं। जब तक समूची कार्यप्रणाली और कार्यसंस्‍कृति को भारतीयों के अनुकूल नहीं बनाया जाता, तब तक भारतीय भाषाएं व्‍यवस्‍था में आवेदन पत्रों तक ही सीमित रहेगी। इसलिए पूरी व्‍यवस्‍था इसी में लगी रहती है कि राजकाज में हिंदी का यथासंभव प्रयोग हो। हमारी व्‍यवस्‍था के तमाम दस्‍तावेज अंग्रेजों द्वारा बनाए गए हैं और उनका घटिया अनुवाद हिंदी और दूसरी भाषाओं में देखने को मिलता है। मौलिकता हमारी व्‍यवस्‍था में दुर्गुण माना जाता है, हर जगह अंग्रेजी में लिखे को ही प्रामाणिक माना जाता है। यही भारतीय शासकीय मानसिकता है, जिसका जातिगत श्रेष्‍ठता से गहरा संबंध उजागर हो चुका है।

सितंबर का मेरे लिए एक और तरीके से महत्‍व है और उसका संबंध भारतीय स्‍वाधीनता संग्राम की एक ऐसी घटना से है जो मुझे कहीं ना कहीं भाषा के सवाल को जाति से जोड़कर देखने के लिए विवश करती है, क्‍योंकि उस घटना में भी शासकीय मानसिकता के दर्शन होते हैं। यह घटना है सितंबर, 1932 में पूना पैक्‍ट की। जब ब्रिटिश सरकार पूरी तरह तय कर चुकी थी कि 'कम्‍यूनल अवार्ड' के तहत अस्‍पृश्‍य जातियों को अल्‍पसंख्‍यकों और अन्‍य समुदायों की तरह अलग से संविधान में पृथक निर्वाचन की व्‍यवस्‍था की जाएगी तब महात्‍मा गांधी ने इसे भारत की एकता को खंडित करने वाला कदम बता कर यरवदा जेल में 20 सितंबर, 1932 को आमरण अनशन शुरु कर दिया था। गांधी जी की तबियत इस अनशन से बहुत तेजी से खराब होने लगी थी। डॉ. अंबेडकर जानते थे कि अगर इस अनशन से गांधी जी की मृत्‍यु हो जाती है तो देश भर के सवर्ण अछूतों का नरसंहार कर देंगे। इसलिए बेहद मानसिक दबाव और तनाव में डॉ. अंबेडकर ने गांधी जी के साथ 24 सितंबर, 1932 को यरवदा जेल में पूना पैक्‍ट किया था। इस समझौते के तहत पृथक निर्वाचन के बजाय दलितों के लिए अलग से सीटें आरक्षित करने और नौकरियों में भी आरक्षण का प्रावधान था। इस पैक्‍ट को लेकर बहुत विवाद हैं, दलितों के एक तबके का मानना है कि डॉ. अंबेडकर को गांधी जी के आगे नहीं झुकना चाहिए था। लेकिन भारतीय समाज के इतिहास में यह बहुत बड़ी ऐतिहासिक घटना है जो दर्शाती है कि बहुसंख्‍यक समाज को हर दौर में अपने ही हितों की कुर्बानी देनी पड़ती है फिर वो चाहे देश का मामला हो या भाषा का। कल्‍पना कीजिए कि अगर दलितों के आत्‍म निर्णय और पृथक निर्वाचन को कानूनी दर्जा मिल जाता तो क्‍या होता। एक और विभाजित भारत बनता, जिसमें दलितों की अपनी सत्‍ता होती और यह देश विभाजित सोवियत संघ के छोटे-छोटे देशों की तरह होता। लेकिन, भारतीय शासकीय मानसिकता कभी नहीं चाहती कि कोई उनकी बराबरी करे। इसीलिए गांधीजी चाहते थे कि हरिजन सबके साथ रहें, उसके लिए आरक्षण दिया जा सकता है, लेकिन विशेष दरजा नहीं। हिंदी और भारतीय भाषाओं को भी राजकाज में आरक्षण तो दे सकते हैं पूरी सत्‍ता नहीं दी जा सकती। भाषा के साथ भारतीय शासक मानसिकता का यही जातिवादी व्‍यवहार है। वह हिंदी को भी संस्‍कृतनिष्‍ठ बना देगा, लेकिन वंचितों की भाषा से हिंदी को अशुद्ध होने से बचाता रहेगा, बल्कि लगातार कोशिश करेगा कि हिंदी को संस्‍कृत कैसे बनाया जाए। इसके लिए अंग्रेजी से निसंकोच शब्‍द ले लेगा, लेकिन कामगारों और दस्‍तकारों की बोली-बानी को हिंदी के पवित्र सरकारी आंगन में नहीं आने देगा। जिन कामगारों को शासकीय मानसिकता वालों ने गिरमिटिया मजदूर बनाकर देश निकाला दे दिया था, उनकी हिंदी भी हिंदी है, लेकिन उसमें हिंदी की बोली-बानियों की मिठास अब भी बची हुई है, जबकि हमारी हिंदी से हमने कुजात बोलियों के शब्‍द वैसे ही बाहर निकाल दिए हैं जैसे सदियों से अछूतों को गांव के बाहर बसाते आए हैं।



















Tuesday, 24 August 2010

बहन

बहन

मां की कोख से
पैदा हुई लड़की का ही नाम नहीं है
उस रिश्‍ते का भी नाम है
जो पुरुष को मां के बाद
पहली बार
नारी का सामीप्‍य और स्‍नेह देता है

बहन
कलाई पर राखी बांधने वाली
लड़की का ही नाम नहीं है
उस रिश्‍ते का भी नाम है
जो पीले धागे को पावन बनाता है
एक नया अर्थ देता है

मां
पुरुष की जननी है
और पत्‍नी जीवन-संगिनी
             पुरुष के नारी-संबंधों के
                इन दो छोरों के बीच
पावन गंगा की तरह बहती
नदी का नाम है
बहन

Saturday, 17 October 2009

रोशनी के रंग हजार





रोशनी और अंधकार के बिना इस सृष्टि में कुछ भी संभव नहीं होता। अंधेरा था इसलिए रोशनी का जन्म हुआ। कह सकते हैं कि रोशनी अंधकार की बेटी है यानी उजाला तम का पुत्र है। चित्रकला में कहा जाता है कि सफेद कोई रंग नहीं है, वह रंगों की अनुपस्थिति से उपजी रिक्तता है। इस प्रकार रोशनी अंधकार की अनुपस्थिति है लेकिन रिक्तता नहीं, मानव समाज के लिए वह अंधकार से पैदा होने वाली रिक्तता की पूरक है। विज्ञान कहता है कि रोशनी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन यानी विद्युतचुंबकीय विकिरण है। लेकिन भारतीय मनीषा ने ईसा से छह सौ बरस पहले कह दिया था कि यह सृष्टि जिन पंचतत्वों से बनी है उसमें अग्नि बहुत महत्वपूर्ण है। अग्निरूपी इस रोशनी की मनुष्य सभ्यता में लाखों बरसों से प्रतिष्ठा रही है, देश-धर्म के बंधनों से बहुत ऊंचा स्थान रहा है रोशनी का। हर जाति, मजहब, देश, काल में रोशनी को पवित्र माना गया है तो इसीलिए कि रोशनी से मनुष्य का रिश्ता जन्‍म से शुरू होता है और गर्भावस्था के तम से मुक्त होने और रोशन दुनिया में आने की कामना उसे रोशनी के हजार रंगों की ओर लिए चलती है। कहने को रोशनी के सिर्फ सात रंग होते हैं, लेकिन यह मनुष्य ही है जिसने उसे हजारों आयाम दे दिए हैं। इंसान के लिए रोशनी अब सिर्फ दिन के उजाले और रात में काम आने वाली रोशनी भर नहीं, बल्कि जिंदगी के हर हिस्से में रोशनी फैला देने से है।

रोशनी का इतिहास
विज्ञान में रोशनी को पहले यह माना जाता था कि प्रकाश की संरचना पदार्थ जैसी है, जिसे आगे चलकर आइंस्टीन तक आते आते पूरी तरह नकार दिया गया। इस परंपरा में आदि मुस्लिम वैज्ञानिक इब्न अल हसैन के अलावा देकार्त, न्यूटन, रॉबर्ट हुक और थॉमस यंग की खोजों को नहीं भूला जा सकता। अब विज्ञान कहता है कि रोशनी एक प्रवाहमान चीज है। लेकिन सांस्कृतिक दृष्टिकोण से देखें तो भारत में दीपावली का त्यौहार जिस तरह भगवान राम के अयोध्या आगमन को लेकर मनाया जाता है, उसी तरह दुनिया भर में दीपोत्सव को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं, और लगभग सभी धर्मों और संस्कृतियों में रोशनी का उत्सव साल में एक बार जरूर मनाया जाता है। मसलन ईसाई समुदाय क्रिसमस को दीपावली की तरह मनाता है, इस्लाम में पैगंबर मोहम्मद साहब के जन्मदिन यानी बारावफात को चराग रोशन किये जाते हैं, सिक्ख समुदाय में गुरूनानक जन्मदिवस पर रोशनी सजाई जाती है, महावीर स्वामी की जयंती पर जैन और महात्मा बुद्ध की जयंती पर बौद्ध धर्मावलंबी अपने घर और पूजास्थलों को रोशन करते हैं। पारसी तो हैं ही अग्निपूजक। वैसे लगभग सभी धर्मों में पूजाघरों में दीपक जलाना या शमा रोशन करना प्रतिदिन का रिवाज है। मंदिर, मस्जिद, जिनालय, चैत्यालय में दीया और गिरजाघर में शमा रोशन करना वस्तुत: रोशनी की आराधना ही है। और इसके पीछे है मनुष्य की वह आदिम समझ जिसके चलते उसने प्रकृति की सबसे ताकतवर चीजों में अग्नि को सबसे उच्च स्थान दिया। जब पहली बार मनुष्य ने अग्नि का रौद्र रूप देखा होगा, फिर वो चाहे ज्वालामुखी से निकली हो, आकाश से बरसी हो या पेड़-पत्थररों के टकराने से पैदा हुई हो, तभी उसके प्रति भय मिश्रित श्रद्धा का भाव पैदा हुआ होगा। यही आगे चलकर दीपक या शमा जलाने में बदल गया। मानव सभ्य्ता का इतिहास रोशनी का इतिहास है, जिसमें येन केन प्रकारेण अंधकार से मुक्त होने और रोशन दुनिया बसाने की चाहत छुपी हुई है, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’।

रोशनी का दर्शन
सभ्यता के प्रारंभ से ही रोशनी मनुष्य के चिंतन का केंद्र रही है, इसीलिए रोशनी अपने भौतिक अर्थ और अभिप्राय: से आगे चलकर मनुष्य जीवन को सांगोपांग रूप से प्रकाशमान करने के व्यापक और विस्तृत अर्थ में तब्दील हो गई है। मानव समाज को कैसे एक ऐसी रोशन दुनिया बनाया जाए जिसमें किसी भी प्रकार का अंधकार ना हो, यह चिंतन सदियों से चला आ रहा है। भारतीय दर्शन परंपरा ने पहली बार रोशनी को इतने व्यापक और बहुलतावादी दृष्टिकोण से देखा और संपूर्ण सृष्टि को प्रकाशमान करने की परिकल्पना की। सबसे पहले सांख्य और वैशेषिक परंपरा के दार्शनिकों ने प्रकृति के मूल तत्वों पर चिंतन करते हुए प्रकाश को जीवन का महत्वपूर्ण कारक माना। महात्मा बुद्ध के अनुयायियों और जैन मुनियों ने इस परंपरा को समृद्ध करते हुए मनुष्य समाज को संपूर्णता में प्रकाशमान बनाने को लेकर मौलिक चिंतन किया, जिससे बहुत से नैतिक और सहज मानवीय मूल्यों की व्यापक परिकल्पना संभव हुई। इस प्रकार का प्रकाशमान चिंतन लगभग सभी धर्मों में हुआ और एक किस्म की वैश्विक सभ्य मानव समाज की सृष्टि के लिए रोशन खयालों की दुनिया का विस्तार हुआ।

हर तरफ रोशन हो दुनिया
आज के मानव समाज को हर तरफ रोशनी चाहिए, सिर्फ घरों की बिजली नहीं, लोगों के दिमाग भी रोशन होने चाहिए। शिक्षा की रोशनी हर ओर फैले, धार्मिक, राष्ट्रवादी और जातिवादी कट्टरता का अंधकार हटे, अंधविश्वास का तमस छंटे, समानता का प्रकाश फैले, मनुष्य जीवन के तमाम अंधकार दूर हों। दुनिया के सारे दीपोत्सव यही कामना करते हैं।
यूं दुनिया के विभिन्नि हिस्सों में मनाए जाने वाले लगभग सभी दीपोत्सव कृषक परंपरा से जुड़े हैं यानी फसल पकने के बाद के उत्सव हैं जिसमें नवान्न के साथ व्यक्ति और समुदाय की प्रगति की कामना जुड़ी हुई है। इस प्रकार देखा जाए तो यह दुनिया में किसी भी मनुष्य के भूखा ना रहने की कामना और स्वस्‍थ मानव समाज की परिकल्‍पना से जुड़ा दीपकामना का उत्सव है। आज के किसानों के हालात देखकर क्या हम एक बार फिर उस किसान के बारे में सोच सकते हैं जो बहुत बुरी हालत में है, आत्महत्या करने को मजबूर है। क्यों किसान के बेटे बंदूक उठा रहे हैं और क्यों खुशियों के पटाखों की जगह आतंक के खौफनाक धमाके हर ओर सुनाई दे रहे हैं। इन हालात में एक दीपक उनके नाम भी रोशन किया जाए, जो हमसे बिछुड़े और उनके नाम भी जो राह भटक कर अंधकार की राह जा रहे हैं। हर मजहब में जलने वाला दीपक मनुष्य के दिल और दिमागों को रोशन करे, इसी सोच के साथ सही मायनों में शुभ होगा दीपोत्सव।

सांध्य रवि ने कहा
मेरा साथ देगा कौन
सुनकर जगत सारा
रह गया निरूत्तर मौन
एक माटी के दीये ने कहा
नम्रता के साथ
जितना हो सकेगा
मैं करूंगा नाथ
रवींद नाथ टैगौर



यह आलेख जयपुर से प्रकाशित डेली न्‍यूज़ के रविवारीय 'हम लोग' की टॉप स्‍टोरी के रूप में 11 अक्‍टूबर, 2009 को प्रकाशित हुआ। चित्र गूगल से साभार।

Saturday, 15 August 2009

प्रतिबंध तो है



‘चरणदास चोर’ को लेकर प्रतिबंध की बात जहां से शुरू हुई थी, वह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण थी, इसलिए कि छत्तीसगढ़ सरकार के किसी नुमाइंदे ने इसका प्रतिवाद नहीं किया कि सरकार ने नाटक पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया। जब यह खबर अंग्रेजी अखबारों में छपी और इसके विरोध में बुद्धिजीवी, कलाकारों, साहित्य्कारों और संस्कृतिकर्मियों ने आवाज उठाई तब छत्तीसगढ़ सरकार माउण्ट आबू में ‘राजयोग’ कर रही थी। जहां तक मेरी जानकारी है, सरकार की ओर से इतने विरोध प्रदर्शन के बावजूद कुछ भी नहीं कहा गया है। निश्चय ही यह बेहद दुखद है। इस प्रकरण में सबसे पहले रविवार डॉट कॉम में राजेश अग्रवाल ने खुलासा किया और बताया कि ‘चरणदास चोर’ नाटक पर छत्तीसगड में कोई प्रतिबंध नहीं है। इतना अवश्य है कि राज्ये के सरकारी स्कूलों में पुस्तक वाचन कार्यक्रमों में इस किताब के वाचन पर प्रतिबंध है।
इस पूरे प्रकरण पर प्रसिद्ध कथाकार उदय प्रकाश ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। लेकिन कबाड़खाना में अशोक पाण्डे ने वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस नाटक की भूमिका का एक अंश पोस्ट कर इस बात की ताईद की है कि हबीब साहब सतनामी समुदाय के प्रति कितना गहरा प्रेम रखते थे। सतनामी गुरू बालदास की यह आपत्ति स्वाभाविक है कि इस भूमिका में सतनामी पंथ के आदिगुरू घासीदास को डाकू बताया गया है।
दरअसल सभी समुदायों और पंथों में आजकल एक नई धारा चल पड़ी है कि इतिहास का पुनर्लेखन किया जाए और इसे शुद्ध बनाया जाए। इस शुद्धतावादी आंदोलन में अपने इतिहास पुरूषों को महानायक बनाया जा रहा है और ज्ञात-अज्ञात गुरू महात्माओं की रचना की जा रही है। दलित, वंचित और आदिवासी समुदाय इसमें सबसे आगे हैं। क्यों कि सवर्णों के लिखे इतिहास में अधिकांश दलित-आदिवासी गुरू चोर-डाकू-लुटेरे बताए गए हैं। कोई भी समाज अपने आदर्शों को इस रूप में नहीं देखना चाहता। छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग को इस नाटक के वाचन पर प्रतिबंध लगाने की बजाय भूमिका से इस वाक्यांश को विलोपित करने का आदेश देना चाहिए था। लेकिन हमारे देश में सब जगह नीम हकीम हैं जो रोग ठीक करने के स्थान पर पुराने जर्राह की तरह अंग काटना उपायुक्त समझते हैं।
अब भी समय है, सरकार को चाहिए कि इस गलती को दुरूस्त कर दिया जाए, ताकि विद्यार्थियों को एक अच्छा नाटक पढने-सुनने को मिलता रहे।
मुझे यह पोस्ट लिखने के लिए ब्लॉगर मित्र वाणी शर्मा ने प्रेरित किया। उनके प्रति कृतज्ञता स्वरूप ही लिखी गई यह पोस्ट‍ उन्हीं को समर्पित है।
(इस पोस्ट में रविवार, कबाड़खाना और उदय प्रकाश के लिंक पढने के लिए रेखांकित टेक्स्ट को क्लिक करें, जो नीले रंग में है।)

Sunday, 9 August 2009

विरोध तो हमको करना ही होगा


हबीब तनवीर के बहुचर्चित नाटक ‘चरणदास चोर’ पर छत्‍तीसगढ सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है। सतनामी समाज के गुरू बालदास जी की मांग थी कि इसे प्रतिबंधित किया जाए। सरकार किसी धर्मगुरू को नाराज नहीं करना चाहती इसलिए तुरंत मांग पूरी कर दी। अंग्रेजों के बनाए कानून ड्रामेटिक परफार्मेंस एक्‍ट 1876 को भारत ही नहीं पाकिस्‍तान तक में जब चाहे कलाकारों पर लागू करते हुए अभिव्‍यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। उसी काले कानून को छत्‍तीसगढ सरकार ने ‘चरणदास चोर’ पर लगा दिया, जैसे इस नाटक से पता नहीं क्‍या हंगामा मच जाएगा। पिछले पैंतीस बरसों में इसके सैंकड़ों राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय प्रदर्शन हुए होंगे, कई तो खुद सरकारों ने आयोजित किए होंगे, लेकिन किसी को आपत्ति नहीं हुई। लगता है गुरू बालदास को कोई आकाशवाणी हुई होगी और रमन सरकार ने उसे मानते हुए राष्‍ट्रहित में कदम उठाते हुए यह पुण्‍य काम किया होगा। अब आराम से धर्म की ध्‍वजा फहरेगी और देश आगे बढेगा।

इस ब्रिटिश कानून को रद्द करने के लिए कई बार लिखा जा चुका है, लेकिन कुछ नहीं हुआ। एक बार मैंने सांसद, अभिनेता राज बब्‍बर से भी इस बारे में कहा था, उन्‍होंने आश्‍वासन दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। 16 अगस्‍त, 2005 को फिरोजाबाद सुरक्षित सीट से चुने गए सपा सांसद रामजी लाल सुमन ने लोकसभा में इस कानून को रद्द करने की मांग की थी, उसके बाद आज तक लोकसभा में किसी ने इस पर चर्चा नहीं की। 2001 में बांग्‍लादेश में इस कानून को रद्द कर दिया गया। पाकिस्‍तान में तो आए दिन सरकार कलाकारों को इस कानून से हांकती रहती है।
किसी नाटक के प्रदर्शन से सरकार पैंतीस साल बाद खफा होती है तो इसे क्‍या कहा जाए। गुरू बालदास ने 2004 में प्रतिबंध की मांग की थी और पांच साल बाद, हबीब साहब की मौत के बाद, सरकार ने रद्दी की टोकरी से मांग निकाल कर पूरी कर दी। चरणदास चोर ने प्रतिज्ञा की थी कि वह जिंदगी में कभी झूठ नहीं बोलेगा, इसीलिए उसकी जान चली गई। सतनामी गुरू और प्रदेश सरकार की शायद यही मंशा रही हो कि अब इस संदेश की कोई जरूरत नहीं है, लोगों को झूठ बोलने की आजादी होनी चाहिए। इसलिए नाटक पर प्रतिबंध लगा दिया।
इस पर जनसंस्‍कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्‍ण ने जो प्रतिक्रिया की है, उसे ध्‍यान में रखते हुए मेरा मानना है कि इसका व्‍यापक विरोध होना चाहिए। विरोध तो हमको करना ही होगा, क्‍योंकि बकौल फैज़ अहमद फैज़,
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्‍म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है
देख कि आहंगर की दुकां में
तुंद हैं शोले सुर्ख हैं आहन
खुलने लगे क़ुफलों के दहाने
फैला हर इक ज़ंज़ीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक्‍त बहुत है
जिस्‍म-ओ-ज़ुबां की मौत से पहले
बोल कि सच जि़ंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले

Wednesday, 5 August 2009

शिल्पा शेट्टी का चुंबन ले रहे हैं बाबाजी




नाग पंचमी के दिन शिल्‍पा शेट्टी एक मंदिर में पूजा करने गईं। पुजारी ने उन्‍हें किस तरह आशीर्वाद दिया, इसे वनइंडिया इन वेबसाइट ने उजागर किया है। इस पोस्‍ट के शीर्षक को क्लिक कर आप सीधे भी ये तस्‍वीरें देख सकते हैं।


जब रिचर्ड गेर ने शिल्‍पा का चुंबन लिया था तो जबर्दस्‍त हंगामा हुआ था। अब इसे आशीर्वाद बताया जा रहा है। फिलहाल तो आप तस्वीरें देखिये और ख़ुद ही सोचिये।


Sunday, 12 July 2009

सभी वासनाएं दुष्ट नहीं होतीं


समलैंगिकता को लेकर चल रही तमाम बहसों में इस बात की चर्चा नहीं हो रही कि साहित्य, कला, संस्कृति और दर्शन से लेकर विभिन्न ज्ञान अनुशासनों में समलैंगिक संबंधों को बहुत सामान्य ढंग से लिया जाता रहा है। और इसका इतिहास कोई दो-चार सौ नहीं हजारों साल पुराना है। प्राचीन यूनान में पुरूषों के बीच समलैंगिक संबंध बहुत ज्यादा होते थे। महान उपन्‍यासकार ई.एम. फोर्स्टर का लिखा प्रसिद्ध उपन्यास ‘मॉरिस’ उनकी मृत्यु के बाद जब 1978 में प्रकाशित हुआ तब पश्चिमी जगत को पता चला कि जिस संबंध को वे लोग दुष्कर्म मानते हैं वो उनके पथप्रदर्शक प्राचीन यूनान में अत्यंत सामान्य संबंध था। इस उपन्यास पर इसी नाम से 1987 में एक फिल्म भी बनी थी जिसे जेम्सं आइवरी ने निर्देशित किया था। सिकंदर और नेपोलियन की सेना में समलैंगिक संबंध सहज थे। आज भी दुनिया की प्राय: सभी सेनाओं में समलैंगिक संबंध सामान्यं माने जाते हैं। इसकी वजह साफ तौर पर लंबे समय तक स्त्री से दूर रहना है। कई देशों की सेनाओं और दूसरी नौकरियों में समलैंगिकों को सामान्य व्यक्ति की तरह सभी अधिकार मिले हुए हैं।

इस दुनिया में अनेक महानतम लेखक, कलाकार और दार्शनिक ऐसे हुए हैं जो समलैंगिक थे। मोनालिसा के महान चित्रकार और शल्य चिकित्सक लियोनार्दो विंसी, महान दार्शनिक सुकरात, महान चित्रकार माइकल एंजिलो, जॉन ऑव आर्क, अरस्तू, जूलियस सीजर, वर्जीनिया वुल्फ, महान संगीतकार चायकोवस्की, शेक्सपीयर, हेंस क्रिश्चियन एंडरसन, लार्ड बायरन, सिकंदर महान, अब्राहम लिंकन, नर्सिंग आंदोलन की प्रणेता फलोरेंस नाइटेंगल और अनेक महान लोगों के बारे में जानकारी मिलती है कि ये सब कम या अधिक मात्रा में समलैंगिक थे। इन महान लोगों के काम से दुनिया आज भी अभिभूत है तो इसका सीधा सा मतलब है कि यौन वृत्ति का प्रतिभा से कोई लेना देना नहीं है। हम यहां उदाहरण के लिए सिर्फ दो महान लोगों की चर्चा करेंगे जो समलैंगिक होते हुए भी महान काम करके गए।

पहले चर्चा माइकल एंजिलो की। 6 मार्च 1475 को इटली में जन्में इस महान कलाकार को अनेक विधाओं में महारत हासिल थी। वो कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुकार और इंजीनियर था। लियोनार्दो विंसी का समकालीन यह महान कलाकार यूरोप में पुनर्जागरण का नायक था। मात्र 24 साल की उम्र में उसने अपनी महान कलाकृति ‘पिएता’ रच दी थी, जिसमें सूली से उतारने के बाद ईसा मसीह अपनी मां मेरी की गोद में लेटे हुए हैं। माइकल एंजिलो को रोम के लगातार सात पोप, कई गिरजाघर और गुंबद बनाने का काम देते रहे और उसने दुनिया की अनुपम कलाकृतियां रचीं जो आज भी मानवीय सभ्यता और कला-संस्कृति की बेशकीमती धरोहर है। उसके रचे महान मूर्तिशिल्प ‘स्टेच्यू ऑव डेविड’ में आप उसकी कला का अद्भुत सौंदर्य ही नहीं वरन उसकी समलैंगिक छवि भी देख सकते हैं। सिस्टीन चैपल की छत पर बने महान चित्रों में ‘क्रिएशन ऑव एडम’ में माइकल एंजिलो की समलैंगिक मानसिकता को बहुत खूबसूरती के साथ देखा जा सकता है।

बीसवीं शताब्दी में जिन लेखिकाओं ने अपने लेखन से जबर्दस्त तहलका मचाया और साहित्य की दुनिया में नई राह बनाई उनमें वर्जीनिया वुल्‍फ का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। 1882 में लंदन में जन्मी इस महान लेखिका के साथ उसके सौतेले भाइयों ने बचपन में इस कदर दुराचार किया कि वो जिंदगी भर उन भयावह क्षणों को नहीं भूल पाई। तभी तो वो इतना कुछ लिख पाई जिसे हम आज नारीवादी लेखन कहते हैं। यह जानना भी कई बार कितना भयानक होता है कि इस विचार का जन्म कितनी अंतहीन यातनाओं से गुजरने के बाद हुआ है। वुल्फ की त्रासदी यह थी कि वो अकेली नहीं बल्कि उसकी बहनें भी भाइयों की कमसिन वासना का शिकार हुईं। वर्जीनिया ने शादी की किंतु कभी भी पति के साथ सामान्य स्त्री की तरह दैहिक आनंद के लिहाज से खुश नहीं रही। जिंदगी में उसकी बड़ी उम्र की महिलाएं गहरी मित्र रहीं। कुछ के साथ वर्जीनिया के शारीरिक संबंध भी रहे। यौन संबंधों के लिहाज से वुल्फ बहुत आजाद खयाल महिला थी। उसकी कहानियों में आप तत्कालीन उच्‍चमध्य्वर्गीय अंग्रेज समाज के भीतर व्याप्त दोमुही मानसिकता को साफ देख सकते हैं जिसमें स्त्री की हैसियत सजावटी गुडि्या से अधिक नहीं है। वर्जीनिया वुल्फ ने अपने उपन्यास द वॉयेज आउट, ऑरलैंडो और बिटविन द एक्ट्स में सेक्सु और पात्रों की मानसिक उथलपुथल का गजब का चित्रण है।
पश्चिमी जगत में ही नहीं पूर्वी जगत में भी यह आम बात रही है। हम सब जानते हैं लेकिन नैतिकता की दुहाई देकर इसे स्वीकारने से बचते हैं। धर्म के झण्डाबरदार लोग मानवीय संबंधों को हमेशा से ही धार्मिक कानून के दायरे में लाने की कोशिेशें करते हैं। याद कीजिए मीरा नायर की फिल्म ‘फायर’ के बाद मचा बवाल, जिसमें देवरानी-जेठानी के समलैंगिक संबंधों को बताया गया था। भारत की बात बाद में करेंगे, पहले चीन की चर्चा करते हैं, जहां प्राचीन काल से ही यानी तकरीबन 2600 साल पहले से साहित्य में समलैंगिक संबंधों को लेकर लिखा जाता रहा है। बाओयू के उपन्यास ‘ड्रीम ऑव रेड चेंबर’ से लेकर कैनेथ पाई के ‘क्रिस्टल बॉयज़’ तक चीनी साहित्य में समलैंगिक संबंधों की एक लंबी परंपरा मिलती है।


भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी ही क्या लगभग सभी भाषाओं के साहित्य_ में ही समलैंगिक संबंधों की चर्चा किसी ना किसी रूप में देखने को मिलती है। हालांकि लेखक इसे स्वींकार नहीं करेंगे, लेकिन यह भी सच्चाई है कि अनेक लेखकों में समलैंगिक संबंधों की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। अंग्रेजी के कवि अशोक राव अकेले लेखक हैं जो बरसों से खुद को गर्व से समलैंगिक कहते आए हैं और समलैंगिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष भी करते रहे हैं। इधर चल रही बहस में एक ब्लांगर ने उर्दू शायरी से चुनकर कई शेर उद्ध्रत किये हैं जिनसे पता चलता है कि रचनाकार को समलैंगिक कहा जा सकता है। हाफिज फारसी के बड़े शायर थे, उनका यह शेर देखिए,

गर आन तुर्क शीराजी बे-दस्तत आरद दिल-ए-मारा
बा खाल हिंदोश बख्श म समरकंद ओ बुखारा

अर्थात अगर यह तुर्क लड़का मेरे दिल की पुकार सुन ले तो इसके माथे पर लगे मस्से के लिए मैं समरकंद और बुखारा कुर्बान कर दूं।

अब महान शायर मीर का यह बयान देखिए,

तुर्क बच्चे से इश्क किया था रेख्ते मैंने क्या क्या कहे
रफता रफता हिंदुस्तान से शेर मेरा ईरान गया
या
मीर क्या सादे नैन उसके बीमार हुए जिसके सबब
उसी अत्तार के लौंडे से दवा लेते हैं

समकालीन उर्दू कविता में इफतिखार नसीम ‘इफती’ एकमात्र शायर हैं जो खुद के समलैंगिक होने की बात स्वीकार करते हैं। अब आप ख्वाजा हैदर अली आतिश का यह शेर देखिए,
जुलेखा को दिखाए आसमान तस्वीर युसूफ की
ये दिल दीवाना है जिसका परी-पैकर है वो लड़का

उर्दू शायरी में लोग दबी जुबान से समलैंगिक संबंधों की बात स्वीकार करते हैं। हिंदी में अभी तक ऐसा साहसी लेखक कोई नहीं सामने आया, अलबत्ता मनोहर श्याम जोशी ने अपने उपन्यासों में समलैंगिक संबंधों की खुली चर्चा की है, जिसे खूब दुत्कारा गया है। लेकिन साहित्य के अलावा संगीत और कला संस्कृति की दुनिया में समलैंगिक संबंध बहुत आम हैं। दबे छिपे ढंग से लोग इनकी चर्चा करते हैं, लकिन खुलकर स्वींकार नहीं करते। क्यों कि हमारे यहां ऐसे संबंधों को अभी भी अच्छी नजर से नहीं देखा जाता।

वयस्क व्यक्ति एक आत्मचेतस मनुष्य होता है और न्यायालय ने इसी आधार पर आपसी सहमति से समलैंगिक संबंधों को जायज और कानूनी माना है। साहित्य्, कला और संस्कृति की दुनिया के लोग सामान्य से अलग होते हैं, समाज में उनकी अलग प्रतिष्ठा होती है। वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ज्यादा अहमियत देते हैं, इसलिए यौन संबंधों में भी वे अगर सामान्य से अलग होते हैं तो उन्हें ऐसा करने की स्वंतंत्रता होती है। इस प्रकार के संबंधों को सहज लिया जाना चाहिए, क्योंकि महज यौन साथी चयन की प्रवृत्ति या प्राथमिकता के आधार पर आप किसी की प्रतिभा का आकलन नहीं कर सकते और न ही किसी को हेय या प्रेय कह सकते हैं। आधी सदी पहले ही विज्ञान यह मान चुका है कि समलैंगिक होने से कोई व्यक्ति दुराचारी या अनैतिक या मानसिक रूप से बीमार नहीं होता, फिर हमें विज्ञान की बात माननी चाहिए कि धर्म के कठमुल्लों की जो खुद कई किस्म के कुकर्मों में आए दिन लिप्त पाए जाते हैं। किसी भी व्यक्ति को जैसे दोस्त चुनने की आजादी है वो रहनी चाहिए, अब यह उन पर निर्भर है कि वो इस दोस्ती को कहां तक ले जाते हैं। कात्यायनी ने एक कविता में लिखा है, ‘सभी वासनाएं दुष्ट नहीं होतीं।‘

Tuesday, 3 March 2009

टूटती जंजीरें


यूं तो राजस्थान ही क्या पूरे भारत के ही पुरातनपंथी, जातिवादी और सामंती संस्कारों वाले समाजों में आज भी महिलाओं की और खासकर विधवाओं की स्थिति बेहद दयनीय है। अगर सामंती मूल्यों वाली जातियों की बात करें तो क्षत्रिय और ब्राह्मणों में औरतों की हालत आज भी भयावह है, जिसमें कम उम्र में विवाह, शिक्षा पर रोक, विधवा विवाह पर प्रतिबंध, जाति पंचायतों की निर्णायक भूमिका के साथ झूठी आन-बान और शान के नाम पर अपनी ही बेटियों को प्रताड़ित करना इतना आम है कि इसे लेकर आज भी तलवारें तन जाती हैं और स्त्रियों को नारकीय स्थितियों में जीना पड़ता है। राजस्थानी और हिंदी साहित्य में स्त्री के इन हालात को लेकर काफी कुछ लिखा गया है, लेकिन राजस्थान के उर्दू साहित्य में राजस्थानी स्त्री के इस विकट जीवन को, संभवतया पहली बार उर्दू की महत्वपूर्ण कथाकार सरवत खान ने ‘अंधेरा पग’ उपन्यास के रूप में चित्रित किया है। उर्दू साहित्य के इतिहास में साहसी स्त्री कथाकारों की जो परंपरा रशीद जहां से चली आई है, कहना न होगा कि सरवत खान ने उसे समृद्ध करने का अत्यंत सार्थक प्रयास किया है। वैसे उर्दू में गालिब के समकालीन हाली ने पहली बार ‘मुनाजाते बेवा’ अर्थात् ‘विधवा की प्रार्थना’ लिखी थी, क्योंकि क्या हिंदू क्या मुस्लिम, किसी भी भारतीय समाज में विधवा जीवन स्त्री के लिए एक अभिशाप ही रहा है।
सरवत खान ने अपने इस पहले उपन्यास में बीकानेर के ग्रामीण जनजीवन को केंद्र में रखकर राजपुरोहित समुदाय में एक विधवा युवती के अदम्य संघर्ष और उसकी विजय को चित्रित किया है। इस उपन्यास की खास बात यह है कि आज के समूचे स्त्री विमर्ष में से विधवा जीवन जिस प्रकार से गायब है, उसे भी यह केंद्र में रखता है और उन तमाम प्रश्नों पर सोचने के लिए विवश करता है, जिन पर सामंती संस्कारों वाले हमारे प्रदेश में आज भी बहुत गहराई से सोचने की जरूरत है।

एक लड़की है रूपकुंवर, जिसने कस्बे की पहली डाक्टर बनने का ख्वाब देखा था और स्कूली पढाई के बीच ही उसे विवाह के बंधन में बांध दिया गया। विवाह के तुरंत बाद ही वह विधवा हो गई और फिर शुरू हुआ उसकी अंतहीन तकलीफों का एक सिलसिला। अमावस की रात उसे ससुराल से पीहर के लिए ‘अंधेरा पग’ की रस्म के निभाने के लिए चुपचाप रवाना कर दिया जाता है। वह यह सोचकर पीहर आती है कि ससुराल के विधवा जीवन से मुक्ति मिलेगी, लेकिन पारंपरिक समाजों में स्त्री की मुक्ति कहीं नहीं है। इस बात का अहसास रूपकुंवर को पीहर आने पर होता है, जहां उसके लिए एक अंधेरी कोठरी इंतजार कर रही है। जिस कोठरी को वह बचपन से एक रहस्य की तरह देखती आई थी, वह कोठरी उसी की प्रतीक्षा में अपने भीतर सीलन और बदबू भरे बैठी थी। मां, बाप, दादी, चाचा, चाची, घर-परिवार और नौकरानियों के होते हुए भी वह अपने ही घर में पराई और अभिशप्त स्त्री का जीवन जीने के लिए मजबूर होती है।उसकी शहरवासी बुआ राजकुंवर, जिद करके उसे अपने साथ शहर ले जाती है और यह बात फैला दी जाती है कि रूपकुंवर बीमारी का इलाज कराने गई है। नगर में रूपकुंवर पढ़ाई में ऐसी जुट जाती है कि हर बार अव्वल आती है और सचमुच डॉक्टरी की पढ़ाई करने लग जाती है। सब ठीक चल रहा होता है, लेकिन एक दिन गांव का ही एक युवक रूपकुंवर का रहस्य खोल देता है और फिर जाति-समाज-गांव की पंचायत जुट जाती है, एक विधवा को उसका कथित ‘आदर्श जीवन’ जिलाने के लिए। रूपकुंवर अर्श से वापस फर्श पर आ जाती है, डॉक्टर बनने का सपना कहीं गुम हो जाता है। काली अंधियारी कोठरी में किताबों के साथ भी वह क्या करे? इस बीच उसके पिता उसकी हमउम्र नौकरानी के साथ रास रचा लेते हैं और जब वह गर्भवती हो जाती है तो उसे मरवा डालते हैं। रूपकुंवर को पता चलता है तो वह पुलिस में किसी तरह रपट दर्ज करवाती है और पुलिस के आने पर पता चलता है कि बच्चों को जिस सूखी बावड़ी की तरफ जाकर खेलने से हमेशा मना किया जाता था, वहां एक नहीं दो लाशें दफन थीं, एक ताजा और एक दो दशक पुरानी और दोनों ही औरतों की। उसकी मां पुलिस के सामने अपने सारे जेवरों की पोटली लाकर रख देती है और पुलिस वहां से चुपचाप चली जाती है। यहीं रूपकुंवर को अहसास होता है कि अब कोई चारा नहीं और वह अपनी किताबें उठाकर सहेली जैसी नौकरानी के साथ घर से बाहर ‘उजियारा पग’ बढ़ाती दूर निकल जाती है और घर वालों में से कोई उसे नहीं रोकता। एक था ससुराल जहां से उसे ‘अंधेरा पग’ लिए निकलना पड़ा और अब उसके सामने थी पूरी दुनिया, जिसमें उजाले उसकी राह देख रहे थे।

उर्दू साहित्य में सरवत खान के इस उपन्यास के महत्व को स्वीकारते हुए ही उर्दू के प्रसिद्ध आलोचक शकील सिद्दीकी ने खुद इसका हिंदी में अनुवाद भी किया और एक लंबी भूमिका भी लिखी है। उनके अनुसार सरवत खान की इस कृति ने ‘उर्दू उपन्यास के किसी हद तक निराशा से भरे परिदृश्य में एक हलचल पैदा की है, आस बंधाई है और उर्दू उपन्यास के सामाजिक आधार को नया विस्तार दिया है। उर्दू के वरिष्ठ साहित्यकार वारिस अलवी ने इस उपन्यास के बारे में लिखा है कि सरवत खान ने एक पुराने विषय को ऐसा रूप दिया है जिसमें विधवा का दुःख विद्रोह में बदल जाता है। राजस्थान के उर्दू साहित्य में इस उपन्यास को इसलिए याद किया जाएगा कि इसमें राजस्थानी भाषा और संस्कृति की गहरी मिठास भी पूरी तरह मौजूद है, जो उर्दू-हिंदी की गंगा-जमनी तहजीब की शानदार विरासत भी है।