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Sunday, 22 February 2009

खाद्यान्न संकट के कई रूप




इस बात को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब दुनिया के तमाम अखबारों में हैती के बाजारों में नमक-मिट्टी के बने बिस्किट बिकने की तस्वीरें छपी थीं। हैती में गरीबी और भूख से मारे लोगों के जून में हुए एक प्रदर्शन के दौरान एक प्रदर्शनकारी ने कहा, ‘अगर सरकार खाद्य पदार्थों की कीमतें कम नहीं कर सकती तो इसे चले जाना चाहिए। अगर पुलिस और संयुक्त राष्ट्रसंघ हम पर गोली चलाना चाहे तो चला दे, क्योंकि आखिरकार हम गोली से नहीं तो एक दिन भूख से मर जायेंगे।’ बरसों से हम दक्षिण अफ्रीका के कुछ देशों में भुखमरी से ग्रस्त कंकाल-पिंजर बच्चों की तस्वीरें देखते आ रहे हैं। आज विश्व के सैंतीस विकासशील देश भयानक खाद्य संकट से जूझ रहे हैं और इनमें से बीस देश तो अल्पविकसित देशों की श्रेणी में आते हैं।जरा गौर से सोचें तो यह दिनों-दिन गहराते उस खाद्यान्न संकट का एक पहलू है, जिसके बारे में बहुत गम्भीरता और विस्तार से चर्चा-विमर्श दुनिया के ज्यादातर देशों में नहीं हो रहा है। जिस भयानक आर्थिक मन्दी से अमेरिका और यूरोप के कई मुल्क आज गुजर रहे हैं, वह उस वक्त किस कदर खौफनाक होगी, जब दुनिया में आबादी के हिसाब से खाने को अन्न ही उपलब्ध नहीं होगा। बहुत सम्भव है आज की मन्दी का दौर जल्द ही खत्म हो जाये, लेकिन सोना, चांदी या पैसा कभी भी भोजन का विकल्प नहीं हो सकता। आज दुनिया खाद्यान्न के मामले में दूसरे विश्व युद्ध से भी पीछे चली गई है। एक समय में उपजे खाद्यान्न संकट के दौर में त्वरित उपाय के रूप में अधिक पैदावार देने वाली फसलों का जो विकल्प अपनाया गया था, वह आज कई मायनों में दुनिया के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। दूसरी तरफ कनाडा जैसे देश में केन्द्र सरकार सूअरपालकों को एक सूअर मारने के लिए 250 डालर दे रही है, क्योंकि वहां सूअरों का उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ गया है और कीमतें जबर्दस्त रूप से कम हो गई हैं, यह सूअरपालक के लिए घाटे का सौदा है जिसे सरकार पूरा कर रही है, वजह यह कि सुअरपालन में आने वाली लागत बढ़ गई है। कैसा विचित्र विरोधाभास है कि एक तरफ लोग भूख से मर रहे हैं और दूसरी तरफ उपलब्ध भोजन को नष्ट किया जा रहा है।
यह सब उन यूरो-अमेरिकी नीतियों का नतीजा है जो ‘विश्व ग्राम’ के नाम पर पूरी दुनिया पर थोपी जा रही हैं। विश्व बैंक, मुद्रा कोष और तमाम अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं ही नहीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी इन्हीं नीतियों पर अमल करते हुए दुनिया को जरा से मुनाफे के लिए बर्बाद करने को आमादा हैं। आज खुद अमेरिकी नागरिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और राजनेता दुनिया पर छाये इस खाद्यान्न संकट को लेकर बेहद चिंतित हैं और उन पुरानी किसानी पद्धतियों की ओर लौटने की बात करने लगे हैं, जिन्हें एक समय में अवैज्ञानिक, रूढिबद्ध और निरर्थक कहकर नकार दिया गया था। जिस अमोनियम नाइटेªट से बम और उर्वरक दोनों बनाये जा सकते हैं, उसका पहले हथियार बनाने में और बाद में खाद बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। आज इसके जो परिणाम पूरी दुनिया को भोगने पड़ रहे हैं, उनके बारे में अगर पहले सोचा जाता तो हालात इतने भयावह नहीं होते।
कहां गये वो खेत खलिहान
आज आप किसी भी बड़े शहर से बाहर निकलें तो सौ-पचास किमी तक आपको वो पुराने खेत-खलिहान नजर नहीं आयेंगे, जिन्हें आप बचपन से देखते आये हैं। बड़े नगरों का जिस कदर बेतहाशा विस्तार हो रहा है और टाउनशिप, सेज और औद्योगीकरण के नाम पर शहरों के नजदीकी खेत-खलिहान नष्ट हो रहे हैं, यह एक भयानक परिदृश्य को प्रतिबिम्बित करता है। आने वाले वर्षों में इन शहरों में पर्यावरण की दृष्टि से भयानक हादसे हो सकते हैं, क्योंकि महानगरों के नजदीक के खेत-खलिहान ही इनके चारों तरफ एक हरित पट्टी की संरचना करते थे, जो खत्म कर दी गई है। इतना ही नहीं इन बड़े नगरों के बाशिंदों के लिए अनाज, सब्जियों और दुग्धोत्पाद से लेकर पीने के पानी तक का संकट भी दिनोंदिन गहराता जायेगा। कारखाने जमीन को बंजर कर देंगे और भूजल का स्तर निरंतर घटता जायेगा, खाने-पीने की चीजें दूर-दराज से आयेंगी और आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जायेंगी। खेत-खलिहान की जगह इमारतों का जंगल एक बड़ा-सा बायलर होगा, जिसमें इन्सान सिर्फ एयरकन्दीशनर के कारण ही आराम से रह पायेगा, एयरकन्डीषनर यानी ओजोन परत को भेदने का मानवीय आविष्कार। खाने-पीने के लिए बड़े बाजार होंगे जिनमें वो सब उपलब्ध होगा, जिससे कुछ लोग मुनाफा कमायेंगे और आम आदमी हर तरह से ठगा जायेगा। सुगम और तीव्र परिवहन के नाम पर और वह भी खाद्यान्न आदि की आपूर्ति के लिए जो बड़े हाइवे बनाये जा रहे हैं वे प्रदूषण ही नहीं फैला रहे, बल्कि ग्रीनहाउस गैसों को भी बढा रहे हैं। आज आप किसी भी हाइवे पर चले जायें, वहां निर्दयी ढंग से हरे दरख्तों को काट दिया गया है और वहां चारों तरफ सीमेन्ट-कोलतार की तपती सड़कें सिर्फ और सिर्फ आग उगलती नजर आती हैं।
नकदी फसलों का जंजाल
नकदी फसलों का मतलब है अपनी आवश्यकता के बजाय बाजार की जरुरत के हिसाबसे ऐसी फसलों का उत्पादन जो अधिक मुनाफा ही नहीं दें, बल्कि विदेशों को निर्यात भी की जा सकें। तीसरी दुनिया के देशों में भारत कृषि उत्पाद निर्यात करने वाले देशों में नम्बर एक है, जहां दो करोड़ लोग रोज भूखे सोते हैं। निर्यात की जाने वाली ऐसी फसलों में देशी जरुरत का ध्यान नहीं रखा जाता और अनाज के बजाय तिलहन, दलहन और फलों के उत्पादन पर जोर दिया जाता है। दुनिया के तमाम देशों में किसान प्राकृतिक रूप से सूरज की रोशनी, प्राकृतिक खाद और बारिश या नहर के पानी से सदियों से खेती करते आये हैं। लेकिन आधुनिक कृषि तकनीकों के आविष्कार ने पिछले पचास बरसों में खेती-किसानी का पारम्परिक स्वरूप ही बदल कर रख दिया है। बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की महामन्दी और दूसरे विश्व युद्ध के बाद उपजे खाद्यान्न संकट के दौर में कृषि के आधुनिकीकरण की जबरदस्त वकालत की गई। नतीजतन रासायनिक खाद और उन्नत बीजों के माध्यम से कम समय में अधिकाधिक फसल पैदा करने और मुनाफा कमाने के लिए नकदी फसलों के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर बल दिया गया। जिन खेतों में साल में अलग-अलग किस्म की तीन-चार फसलें होती थीं, उनमें एक ही जिन्स की इस कदर अन्धाधुन्ध खेती की गई कि कुछ ही बरसों में सोना उगलने वाली धरती सीमेन्ट के फर्श की तरह कठोर और बंजर हो गई। हजारों-लाखों एकड़ जमीन हमने अपने ही हाथों बर्बाद कर दी। आज फिर से सोचा जा रहा है कि इन्सानी तरीकों से बंजर हुई जमीन को पशु-पक्षियों की प्राकृतिक खाद से वापस उपजाऊ बनाने की कोशिश की जाये और खेती के पारम्परिक तरीकों की ओर लौटा जाये।
खेती और पशुपालन में अलगाव
पहले किसान और पशुपालक की कोटि अलग-अलग नहीं थी। जो खेती करता था वही मवेशी भी पालता था। जानवर किसान के लिए दूध ही नहीं खाद भी पैदा करते थे। आधुनिक कृषि ने पशुपालन और खेती को अलग कर दिया। परिणाम यह हुआ कि कृषिभूमि से जानवरों के गायब होते ही जमीन की प्राकृतिक उर्वरता खत्म होने लगी और विशाल डेयरियों में पशुओं से अधिक दुग्धोत्पाद और मांस की प्राप्ति के लिए अन्धाधुन्ध प्रयोग किये जाने लगे। कई तरह के इंजेक्षन देकर और प्रोटीन खिलाकर जानवरों को इस कदर बीमार कर दिया गया कि आज वो ‘मैड काउ’ और ‘एन्थ्रेक्स’ से लेकर गम्भीर त्वचा रोगों और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के वाहक बन गये हैं। जो जानवर प्राकृतिक वातावरण में फलफूल रहे थे, वे कारखानों जैसी विशालकाय डेयरियों में न केवल बीमार होने लगे, बल्कि ग्रीनहाउस गैसों का भी बड़ी मात्रा में उत्पादन करने लगे। एक अमेरिकी अध्ययन के अनुसार दुनिया में 18 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसें सिर्फ पशुओं की वजह से पैदा होती हैं। अगर ये जानवर खुले खेत-चरागाहों में होते तो हालात दूसरे होते, एक तरफ तो खुद स्वस्थ रहते और दूसरी तरफ धरती की उर्वराशक्ति को बढाते। एक अन्य अध्ययन के अनुसार एक पाउण्ड मांस को तैयार करने में 5000 गैलन पानी अलग खर्च होता है। इन जानवरों के लिए चारा पैदा करने में भी भारी खर्च होता है, अगर वे खेतों में रहें तो उन पर होने वाला खर्च भी बहुत कम किया जा सकता है।
तत्वहीन अन्न का क्या करोगे
दुनिया में अधिक उत्पादन वाली फसलें अब गुणवत्ता की दृष्टि से बेकार सिद्ध हो रही हैं। एक तरफ तो बिना धूप-बारिश की अतिउत्पादक फसलें, कारखाना किस्म के कृषि उत्पादन, आधुनिक खाद्य-प्रसंस्करण प्रविधियों, रासायनिक खाद, कीटनाषक, कृषि-यांत्रिकी, पैकेजिंग और परिवहन के कारण खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है तो दूसरी तरफ पेट्रोलियम उर्जा के प्रयोग से प्राकृतिक उर्जा संसाधनों की खपत बेतहाशा बढ़ गई है। आज से सत्तर बरस पहले एक कैलोरी उर्जा से 2.3 कैलोरी खाद्य-शक्ति प्राप्त होती थी, और आज दस कैलोरी उर्जा से महज एक कैलोरी खाद्य-शक्ति प्राप्त होती है। इतना ही नहीं कम गुणवत्ता और रासायनिक प्रक्रिया से निकलने वाले खाद्य पदार्थों के कारण हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। अधिक मात्रा में पैदा होने वाला खाद्यान्न कई कारणों से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। जब मात्रात्मक दृष्टिकोण से अधिक उत्पादन पर जोर दिया जाता है तो सबसे पहले गुणवत्ता प्रभावित होती है। वजह यह कि प्राकृतिक रूप से होने वाले उत्पादन में समय, मौसम और उर्वरकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। रासायनिक प्रक्रिया और तकनीकी तरीके से की गई पैदावार बेमौसम और प्रकृतिविरुद्ध होती है, जिसमें मनुष्य का बेवजह दखल ज्यादा होता है। इसीलिए आप हर मौसम में आम तो खा सकते हैं, लेकिन स्वाद और सेहत के हिसाब से हो सकता है कि फलों का राजा आपके लिए कोई गम्भीर बीमारी लेकर आ जाये। अवशीतन गृहों में संरक्षित खाद्य पदार्थ प्रक्रियागत कारणों के चलते अगर अखाद्य नहीं भी होते तो भी उतने ताजा तो नहीं रहते जितने पड़ोस के खेत से आये खाद्यान्न होते हैं। बाजार में मिलने वाले फास्ट फूड में से ज्यादातर में कहने भर को भरपूर कैलोरी होती हैं, असलियत में तो कैलोरी के नाम पर वसा और कार्बोहाइड्रेट्स ही ज्यादा होते हैं, जो एक समय बाद गम्भीर बीमारियों के कारण बन जाते हैं।
इथोपिया से क्या सीखें
अपनी महान प्राचीन संस्कृति से पहचाने जाने वाला इथोपिया आज अकाल और भुखमरी के कारण हमेशा सुर्खियों में रहता है। यह सब 1970 के बाद हुआ। लेकिन कैसे, यह जानने के लिए थोड़ा पीछे चलें। इथोपिया की सबसे बड़ी नदी अवाश पर बड़े बांध बनाने के लिए विश्व बैंक-मुद्रा कोष ने सरकार को समझाया और कहा कि इसके बाद देश के दिन फिर जायेंगे। सिंचाई के लिए पानी होगा, बिजली होगी और हर तरफ समृद्धि होगी। सरकार ने सुझाव मान लिया। लेकिन बांधों के लिए जमीन साफ करने के लिए जंगल, खेत, खलिहान, चरागाह और गांव के गांव पानी में डुबोने पड़े। 50 लाख लोग काश्तकार से भिखारी हो गये। बांधों से नदी की उपजाऊ मिट्टी खेतों में नहीं पहुंची और खेत बंजर होने लगे। विष्व बैंक-मुद्रा कोष ने रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग की सलाह दी तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से महंगे उर्वरक खरीदे गये। उर्वरकों के कारण पर्यावरण सन्तुलन बिगड़ गया तो कीटनाशक भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से आयात करने पड़े। अत्यधिक आयात के कारण अर्थव्यवस्था और गड़बड़ा गई। बड़े बांधों के कारण उपजाऊ भूमि नष्ट हो गई और रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों ने जमीन के भीतर जाकर जमीन को विषाक्त और जहरीला बना दिया। खाद्यान्न उत्पादन घट गया और सरकार को अनाज आयात करने के लिए वापस विश्व बैंक और मुद्रा कोष की शरण में जाना पड़ा। दोनों ने सलाह दी कि नकदी फसलें उगाओ यानी कपास और गन्ना। इथोपिया ने अमीर देशों के लिए सस्ती कपास और सस्ता गन्ना उगाना प्रारम्भ किया तो खुद के देश में खाद्यान्न का संकट गहरा गया। अकाल देश का स्थायी भाव हो गया और विश्व व्यवस्था के नियंत्रकों ने कड़ी से कड़ी शर्तों पर कर्जे दिये। आज इथोपिया भयानक ऋण-दुष्चक्र में फंसा हुआ है, जिसकी पहचान है हड्डियों के ढांचे वाले बालक और नागरिक।
और यह हाल सिर्फ इथोपिया का ही नहीं हुआ। साइप्रस, कोलम्बिया, मोरक्को, जमैका, बोलिविया, जाम्बिया, बांग्लादेश, अर्जेन्टीना, जायरे, पेरू, ब्राजील, केन्या, तन्जानिया, फिलीपीन्स और मेक्सिको जैसे अनेक देशों के साथ भी लगभग यही हुआ। भारत के साथ भी ऐसा हो सकता है अगर हम नहीं चेते तो वह दिन दूर नहीं होगा।
एक पहलू यह भी...
एक तरफ जहां विश्व खाद्यान्न संकट का बोलबाला है, वहीं इन्स्टीट्यूट फार फूड एण्ड डवलपमेंट का मानना है कि दुनिया में खाद्यान्न का कोई संकट नहीं है, अगर संकट है तो वह है असमान वितरण और उचित नीतियों के इस्तेमाल नहीं करने का। इस संस्थान का कहना है कि पृथ्वी पर आज इतना अन्न पैदा होता है कि प्रत्येक इंसान को 3500 कैलोरी भोजन दिया जा सकता है, यानी मोटापा बढाने लायक। एक अमेरिकी अध्ययन के मुताबिक दुनिया के 78 प्रतिशत कुपोषित बच्चे उन देशों में रहते हैं, जहां खाद्यान्न का अतिरेक है। जिन देशों में हमेशा खाद्यान्न संकट रहता है वहां कुल उपलब्ध सिंचाई योग्य भूमि के महज दस से पैंतीस फीसद हिस्से में खेती की जाती है। उदाहरण के लिए चाड में सिर्फ दस प्रतिशत भूमि पर ही खेती होती है। भारत में भी लगभग यही स्थिति है, जहां अरबों एकड़ जमीन बेकार पड़ी है, इसे अगर गरीब भूमिहीन किसानों में निशुल्क बांट दिया जाये तो कोई खाद्यान्न संकट कभी सिर नहीं उठायेगा। दरअसल सारा झगड़ा इस बात का है कि औद्योगिक उत्पादन के रास्ते त्वरित विकास का सपना लेकर हमने कई दशकों तक खेती किसानी को हेय बना दिया और रसातल में जाने दिया। आज अगर हम फिर चेत जायें तो सारे संकट हल हो सकते हैं।