Sunday, 10 October, 2010

राम सजीवन की प्रेमकथा

यह जवाहर कला केंद्र की फ्राइडे थियेटर की हमेशा जैसी चहल-पहल भरी शाम थी। मेरे जैसे कई दर्शकों के मन में जिज्ञासा थी कि हिंदी के अद्भुत कथाकार उदय प्रकाश की चर्चित कहानी ‘राम सजीवन की प्रेमकथा’ को योग्य युवा रंगकर्मी अभिषेक गोस्वामी कैसे प्रस्तुत करेंगे? रंगायन सभागार में जब रोशनियां गुल हुईं तो अंधेरे में अभिषेक की आवाज में राम सजीवन के गांव से देश की राजधानी के सबसे महत्वपूर्ण विश्‍वविद्यालय तक पहुंचने की संक्षिप्त, पर रोचक कथा और राम सजीवन की पूरी सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि जैसे-जैसे उजागर होती गई, मंच पर छाया अंधेरा भी छंटने लगा। कुर्ते-पायजामें में राम सजीवन राजधानी के विश्‍वविद्यालय में दाखिल हुए तो उनकी मित्र मंडली ने उनके आंरभिक अनुभवों और उनके बिहारी लहजे को लेकर उनकी मुश्किलों को एक एक कर बयान करना शुरु किया तो राम सजीवन की कथा रोचक ढंग से आगे बढने लगी। गंवई पृष्ठभूमि के राम सजीवन के लिए चीजों को देखने का गंवई अंदाज दर्शकों को गुदगुदाने लगा। किसी ने कितनी कीमत के जूते या कपड़े पहन रखे हैं इसे राम सजीवन क्विंटल धान या गेहूं में बयान करते तो दर्शकों के ठहाके लगते। इसी प्रक्रिया में राम सजीवन विश्‍वविद्यालय में सहपाठी छात्रों के कौतूहल का विषय बनते गए और विषमता और समाजवादी समाज की बहसों में वे वामपंथ के मार्ग पर चलते चले गए।

क्हानी में रोचक मोड़ तब आता है जब विश्‍वविद्यालय में लड़कियों को भी प्रवेश की अनुमति मिल जाती है और राम सजीवन होस्टल के जिस कमरे में रहते हैं उसकी बालकनी के ठीक सामने एक छात्रा अनिता चांदीवाला आ जाती है। बड़े बाप की बेटी अनिता लंदन से पढ़कर आई है। राम सजीवन उसे बालकनी में निसंकोच खड़ी देखते हैं तो उसके हाव-भाव से उन्हें लगने लगता है कि उन दोनों में प्रेम हो गया है और यह प्रेम मौन संवादों में मुखरित हो रहा है। वे अपने मित्रों से इस प्रसंग की चर्चा करते हैं और उपहास का पात्र बनते चले जाते हैं। इस इकतरफा प्रेमकथा का बुखार जब चरम पर पहुंचता है तो राम सजीवन देशी-विदेशी प्रेम कवितएं पत्रों में लिख कर अनिता को भेजने लगते हैं, जिसकी शिकायत वार्डन से की जाती है। अंततः मित्र लोग जबर्दस्ती राम सजीवन को गांव भेज देते हैं। एक साल बाद गांव से लौटने पर भी राम सजीवन सामान्य नहीं होते। लेकिन इस एक बरस में बहुत कुछ बदल जाता है, अनिता वापस लंदन चली जाती है और विश्‍वविद्यालय में माहौल बदल जाता है, उनका कमरा बदल दिया जाता है।

इकतरफा प्रेम की इस असाधारण प्रेमकथा को अभिषेक ने जिस रंगशैली में मंच पर प्रस्तुत किया वह बेहद प्रभावी और प्रयोगवादी है। आधुनिक कहानी को वायस ओवर, मादक संगीत और कई पात्रों के माध्यम से कहने में जो कमाल अभिषेक ने किया है वह काबिले तारीफ है। कलाकारों ने जिस तन्मयता से अभिनय किया, वह कहानी का प्रवाह टूटने नहीं देता और एक किरदार की कथा को कई किरदारों से कहलाने का नवाचार रंगमंच की असीम संभावनाओं भरी दुनिया को व्यक्त करत है। प्रकाश योजना और कई किस्म के रंग उपकरणों का जिस कुशलता के साथ अभिषेक इस्तेमाल करते हैं, वह कहानी को कई रूपों में व्यंजित और व्याख्यायित करता है। एक भोली-भाली मासूम प्रेमकथा राजधानी के आर्थिक विषमता भरे माहौल में कैसे उपहास का पात्र बन जाती है, भावनाएं जहां हर तरह से रौंद दी जाती है और व्यवस्था किसी मासूम प्रेमकथा को परवान नहीं चढ़ने देती। निश्‍चय ही एक विशिष्ट किस्म का रंग अनुभव है अभिषेक गोस्वामी की ‘राम सजीवन की प्रेमकथा।’

4 comments:

  1. बढिया है...

    जवाहर कला केंद्र की फ्राइडे थियेटर पर कुछ और जानकारी चाहूँगा. कृपया मेल भेजें

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  2. अखबार में इस नाटक के मंचन की खबर पढ़ी तो इसकी कथा पढने की उत्सुकता हो गयी थी ...
    कुछ विवरण तो मिला आपकी पोस्ट में ...!

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  3. प्रेम जी आपने इतना उम्दा वृत्तांत लिखा है कि कल यह नाटक न देख पाने का जो अफसोस मेरे मन में था वह काफी हद तक कम हो गया है. बधाई!

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  4. उदय जी की इस अद्भुत कहानी को मैंने जाने कितनी बार पढ़ा .... और हर बार कुछ नया मिला जब भी पढ़ा ... प्रेम की मासूमियत और उसकी त्रासदी को बिल्कुल नए शिल्प मे रचा है उदय जी ....... मुझे तो वह सीन बार बार याद आता है जब राम सजीवन अपने हॉस्टल की बालकनी मे खड़े होकर शमशेर की कविता को मन ही मन बुदबुदाते हैं ------

    हाँ तुम मुझसे करो प्यार
    जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं ,
    जिनको वह गहराई तक दबा नहीं पाती ।
    जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं ....
    तुम मुझसे करो प्यार
    जैसे मै तुमसे करता हूँ ...।

    अभिषेक गोस्वामी के निर्देशन मे मंचित यह कहानी जरूर लाजवाब रही होगी ....काश हम देख पाते ,या कभी लखनऊ मे मंचित होती यह कहानी !!!

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