Monday 4 October 2010

तुम्हारे शहर में

जब भी इस शहर में दाखिल होता हूँ


तुम्हारी याद आती है

वो तुम्हारा मोरपंखी नीला सूट

आँखों के आगे आसमान की तरह छा जाता है



वो दिन अब भी याद आते हैं

जब तुम्हारी मुस्कान में

चाँद का अक्स चमकता था

और हमारी बातों में परिन्दों का गान सुनाई देता था



वो तुम्हारा हरा कढ़ाईदार सूट

एक सरसब्ज बागीचा था

जो तुम्हारी देह-धरा को अलौकिक बनाता था



जब तुम झिड़कती थीं मुझे

मैं बच्चा हो जाता था

और तुम्हारी नाराज़गी पर

बुजुर्ग बनना पड़ता था मुझे



वो दिन अब नहीं लौटेंगे मम्मो

लेकिन मैं हूँ कि

बार-बार लौट आता हूँ इस शहर में

पता नहीं अब हम कभी मिलें न मिलें

पता नहीं इस विशाल शहर के किस कोने-अन्तरे में

तुम सम्भाल रही होंगी अपना घर

और एक मैं हूँ कि

हर फुरसत में सड़कों पर

खोजता फिरता हूँ

वही मोरपंखी नीला और हरा कढ़ाईदार सूट 

5 comments:

  1. ओह !!! इतनी मार्मिकता ? ऐसा प्रेम मे ही हो सकता .....! लेकिन ऐसा प्रेम मे ही क्यूँ होता है ? प्रेम मे ही आप उम्र की हदों को लांघकर कभी बच्चे और कभी बूढ़े बन सकते हैं ! स्मृतियों की आवाजाही प्रेम मे ही संभव है....! बहुत खूबसूरत कविता !!!

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  2. प्रेम को आप बहुत शिद्दत से याद कर रहे हैं ..प्रेम में बच्चा बनना और कभी बुजुर्ग .... और वह काढायीदार सूट... छोटी छोटी ऐसी ही बातें प्रेम को कितना कीमती बना देती हैं .. सच में बहुत सुन्दर लिखा है आपने .. दिल से बधायी !!

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  3. bahut hi marmik aur man ko choone wali abhivyakti.....

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  4. Aap ka pata Jansatta se mila. Aap ka blog dekh kar bahut khushi hui. Naya hun abhi, sikh raha hun is blogging ki duniya mein. Lekin ek jagah itne sare logon ko dekh kar bahut accha laga. Sabko dhire dire padhubga. Bahut dhanyawad aur mubarakbad aap ko iske liye.
    Nagrik
    nagriknavneet.blogspot.com

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