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Saturday, 20 August 2011

आंदोलन से उठे सवाल


भ्रष्‍टाचार भारत सहित तीसरी दुनिया में खास तौर एशियाई देशों में एक विकराल समस्‍या है, जिससे आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्‍सा परेशान है। सभी देशों में इससे निपटने के कानून भी बने हुए हैं, बावजूद इसके भ्रष्‍टाचार रुकने का नाम नहीं ले रहा। भारत में ही देखा जाए तो बैंकिंग और बीमा सहित अनेक सेवा क्षेत्रों में तथा बहुत से राज्‍यों में लोकपाल और लोकायुक्‍त काम कर रहे हैं। इसके साथ ही विभिन्‍न विभागों में सतर्कता अधिकारी भी यही भूमिका निभा रहे हैं। बावजूद इसके आए दिन इन क्षेत्रों में भ्रष्‍टाचार की खबरें आती रहती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि लोकपाल, लोकायुक्‍त या सतर्कता अधिकारी कोई निष्क्रिय संस्‍था है। इन संस्‍थाओं के होने मात्र से आम जनता में यह विश्‍वास गहरा होता है कि इस व्‍यवस्‍था में कार्यपालिका और न्‍यायपालिका के बीच एक जगह है, जहां से न्‍याय मिलने की उम्‍मीद की जा सकती है। मोरारजी देसाई  की अध्‍यक्षता में 1966 में गठित प्रशासनिक सुधार आयोग ने केंद्रीय स्‍तर पर जनलोकपाल और राज्‍य स्‍तर पर लोकायुक्‍त की द्विस्‍तरीय व्‍यवस्‍था के लिए सिफारिश की थी। 1968 से लोकपाल और लोकायुक्‍त के लिए संसद और विधान सभाओं में कई विधेयक पारित हुए हैं। लेकिन केंद्रीय स्‍तर पर जनलोकपाल गठित करने की दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। वर्तमान में चल रहे अन्‍ना हजारे के आंदोलन में यही मांग है कि देश में केंद्रीय स्‍तर पर जनलोकपाल के रूप में एक ऐसी नियामक संस्‍था गठित कर दी जाए जो जनप्रतिनिधियों द्वारा किए जाने वाले भ्रष्‍टाचार पर भी अंकुश लगा सके। पिछले कुछ सालों से यह लगातार देखने में आया है कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि बड़े पैमाने पर भ्रष्‍टाचार कर बच निकलते हैं। इसी तरह न्‍यायपालिका में भी व्‍यापक भ्रष्‍टाचार फैला हुआ है, जिसे काबू करना वर्तमान परिस्थितियों में बहुत मुश्किल नजर आता है। अगर जनलोकपाल जैसी एक नियामक संस्‍था हो तो जनप्रतिनिधियों और न्‍यायपालिका को कुछ हद तक दुरुस्‍त किया जा सकता है।



लेकिन पहला सवाल यहीं से उठता है कि क्‍या संसद और न्‍यायपालिका के भ्रष्‍टाचार से आम आदमी का कोई लेना देना है जो इतनी बड़ी संख्‍या में लोग अन्‍ना के समर्थन में सड़कों पर आ रहे हैं। दरअसल आम आदमी जिस भ्रष्‍टाचार से परेशान है वह जनलोकपाल से नहीं खत्‍म होने वाला। साधारण नागरिक को शायद ही कभी किसी जनप्रतिनिधि या न्‍यायपालिका के उच्‍च स्‍तर पर बैठे लोगों के भ्रष्‍टाचार का सामना करना पड़ता हो। जनता के पास उस भ्रष्‍ट मशीनरी से लड़ने के लिए पहले से ही बहुत से विकल्‍प लोकतंत्र में मौजूद हैं। लेकिन हमारा समाज बहुधा भीड़ की मानसिकता से चलता है। उसे लगता है कि अन्‍ना के आंदोलन में भाग लेने से राशन वाला भी ठीक किया जा सकता है, इसलिए वह उसके साथ हो लेता है। इसमें कोई शक नहीं कि भ्रष्‍टाचार चाहे जिस स्‍तर पर हो, उसका परिणाम अंतत: आमजन को भोगना होता है। इसलिए उसकी भागीदारी को निरुद्देश्‍य भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन जनता के इस व्‍यापक उभार को चलाने वाली शक्तियां और भी हैं, जिनकी तरफ इधर ध्‍यान नहीं दिया जा रहा। सोचिए कि जनलोकपाल के गठन से सर्वाधिक लाभ किसे होगा? देश की सर्वोच्‍च मशीनरी में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार से कौन सबसे ज्‍यादा परेशान है? और जब खुद अन्‍ना हजारे कह चुके हैं कि जनलोकपाल के गठन से भ्रष्‍टाचार शत प्रतिशत नहीं साठ प्रतिशत तक कम हो सकेगा। यानी चालीस प्रतिशत भ्रष्‍टाचार तो फिर भी मौजूद रहेगा। इसका सीधा अर्थ हुआ कि सर्वोच्‍च स्‍तर पर व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त लोगों को चालीस फीसदी का फायदा या नुकसान होगा। अब शायद उन लोगों की पहचान आसान हो जाएगी जिन्‍हें इस विधेयक के पारित होने से लाभ होगा।



हाल ही हुए टूजी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले में हम देख चुके हैं कि ए. राजा और उनके साथियों ने सैंकड़ों करोड़ का घोटाला किया। जा‍हिर है जनलोकपाल के गठन के बाद इस घोटाले में साठ फीसद कमी आएगी। यानी जनप्रतिनिधियों को चालीस प्रतिशत कम मिलेगा और यही न्‍यायपालिका के उच्‍च पदों पर पदस्‍थ लोगों के साथ होगा। इस प्रकार देश का एक वर्ग जो अब तक उच्‍च पदों पर व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार से दुखी है, उसे साठ प्रतिशत का मुनाफा होगा और यह ध्‍यान में रखिए कि ये आम आदमी नहीं हैं। ये लोग ही आम जनता को अपने लाभ के लिए अन्‍ना के आंदोलन के लिए तैयार कर रहे हैं, एसएमएस-ईमेल आदि किए जा रहे हैं।



लेकिन सरकार ने जनलोकपाल बिल का जो मसौदा तैयार किया है वह जनप्रतिनिधियों और न्‍यायपालिका को इसके दायरे से बाहर रखता है। इस तरह सरकार ने जनलोकपाल के नाम पर एक सामान्‍य सी संस्‍था बनाने का इरादा किया है जो महज फोन-इंटरनेट के जरिये होने वाली बातचीत और संदेशों की निगरानी करेगी। जाहिर है सरकार का इरादा ही नहीं है कि न्‍यूजीलैंड और अन्‍य देशों की तरह कोई सर्वोच्‍च लोकपाल का गठन हो। सरकार के नुमाइंदे कतई नहीं चाहते कि कोई उन पर निगरानी करने वाली संस्‍था बने। इसके लिए उनके पास अपने तर्क हैं कि संविधान में संसद और न्‍यायपालिका के पास सर्वोच्‍च अधिकार सुरक्षित हैं और संसद से ऊपर कुछ नहीं हो सकता। लेकिन हमारे संविधाननिर्माताओं ने कभी स्‍वप्‍न में भी कल्‍पना नहीं की होगी कि इस देश में एक दिन ऐसा भी आएगा, जब चुने हुए जनप्रतिनिधियों पर भी लगाम कसने की जरूरत आन पड़ेगी। इसलिए जनता में जो चेतना जाग्रत हुई है वह हमारे देश के लोकतंत्र के लिए बहुत शुभ संकेत है कि वक्‍त आने पर वह उठ खड़ी हो सकती है।



लेकिन इस आंदोलन को सरकारी मशीनरी ने जिस ढंग से निपटाने की कोशिश की है, वह निरंतर सरकार को हास्‍यास्‍पद बनाती गई है। एक बहुमतों के वाली सरकार के पास इससे बेहतर विकल्‍प थे, जिनसे वह आराम से आंदोलन से निपट सकती थी। मसलन सरकार चाहती तो टीम अन्‍ना के साथ मिलकर उनकी भावनाओं के अनुरूप जनलोकपाल बिल का मसौदा तैयार कर सकती थी। जब विधेयक संसद में रखा जाता तो वह बहस के जरिए उसे खारिज या पारित करवा सकती थी, क्‍योंकि उनके पास बहुमत है। अगर विधेयक सरकार की मंशाओं के अनुरूप नहीं भी होता तो राष्‍ट्रपति से भी वापस करवाने का मौका तो सरकार के पास था ही। लेकिन सरकार ने ऐसे विकल्‍पों पर विचार करने के बजाय दमनकारी तरीकों से आंदोलन से निपटने का रास्‍ता अख्तियार किया जो जन आक्रोश का बायस बना। हमारे खबरिया चैनलों को बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल गया और पंद्रह अगस्‍त के दिनों में मध्‍यवर्ग में जागने वाली देशभक्ति की भावना को व्‍यक्‍त करने का अवसर मिल गया।



अब जबकि सरकार और टीम अन्‍ना के बीच अनशन और आंदोलन को लेकर समझौता हो चुका है, यह साफ हो गया है कि जनलोकपाल के नाम पर सरकार अपनी पसंद का विधेयक ही लाएगी और भ्रष्‍टाचार मुक्ति के नाम पर महज लीपापोती की कार्यवाही होगी। जहां तक आंदोलन की बात है, वह भी अब अधिक चलने वाला नहीं है, क्‍योंकि मध्‍यवर्ग के दम पर आप कोई लंबा आंदोलन नहीं चला सकते। हालांकि मध्‍यवर्ग ही है जो इतिहास में क्रांतिकारी भूमिका निभाता आया है, लेकिन तभी जब वह अपने से नीचे के लोगों के आंदोलन में साथ दे। दुर्भाग्‍य से यह आंदोलन मध्‍यवर्ग के बीच ही सिमटा हुआ है, जिसमें वास्‍तविक जन कहीं नहीं है। इसलिए वह आधे दिन के अवकाश, बाजार बंद, रैली, प्रदर्शन, प्रभात फेरी, मोमबत्‍ती जलाना तो सुविधाजनक रूप से कर सकता है, लेकिन गरीब किसान और मजदूर की तरह बेमियादी आंदोलन नहीं कर सकता। बदली हुई परिस्थितियों में मध्‍यवर्ग सांकेतिक आंदोलन से अधिक कुछ भी करने में असमर्थ है, क्‍योंकि उसके पास ना तो समय है और न ही सब कुछ दांव पर लगाने की सामर्थ्‍य।



भ्रष्‍टाचार एक गंभीर चुनौती है लेकिन कानून बना कर इसे खत्‍म नहीं किया जा सकता। जब सड़क पर वाहन चलाने के नियमों का ही पालन नहीं होता तो जनलोकपाल या कोई भी नियामक संस्‍था कैसे भ्रष्‍टाचार खत्‍म करेगी? भ्रष्‍ट या अनैतिक होना अब इस देश में व्‍यक्तिगत तौर पर ही संभव रह गया है। हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र ही ऐसा है कि हमारे लिए किसी भी सीमा तक नैतिक पतन एक सामान्‍य बात हो गई है। इतने बड़े घोटाले हो चुके हैं और हो रहे हैं कि सब कुछ सामान्‍य लगता है। राजनीति ने भ्रष्‍टाचार को नैतिक बना दिया है। जो भ्रष्‍ट नहीं है, वही आज अनैतिक या कि मिसफिट है। चुनाव आयोग की तमाम कवायद के बावजूद चुनावों में सिर्फ धनबल या बाहुबल से ही जीतना संभव रह गया है। ऐसे में कोई लोकपाल भी क्‍या कर लेगा? क्‍योंकि जब सरकार ने साफ कर दिया है कि वह अपने से ऊपर कोई नियंत्रक नहीं चाहती तो यह भी साफ है कि भ्रष्‍टाचार के बारे में पूरी गंभीरता से चिंता व्‍यक्‍त करती सरकार को ग़म तो बहुत है मगर अफसोस के साथ। और अफसोस कि इस देश में मध्‍यवर्ग की कथित दूसरी आजादी का स्‍वप्‍न अधूरा है। मध्‍यवर्ग के लिए अफसोस व्‍यक्‍त करने का मुख्‍य कारण यह कि उसे राजधानी में गरीब, मजदूर, आदिवासियों, कर्मचारियों और किसानों के बुनियादी सवालों पर होने वाले धरने या प्रदर्शन से सिर्फ ट्रेफिक जाम की चिंता सताती है और जिस आंदोलन में संघी-भाजपाई कूद पड़ें वह देशभक्ति साबित करने का बायस बन जाता है।

Sunday, 15 August 2010

63 साल की आज़ादी और 36 का आंकड़ा

मनुष्य मात्र के लिए किसी भी स्वतंत्र देश में आजादी का अर्थ और व्यावहारिक अभिप्राय बहुआयामी होता है। किसी विदेशी शासन का जुआ उतार फेंकने भर से देश के नागरिकों को आजादी नहीं मिलती, बल्कि आजादी का मतलब है स्वदेशी शासन में प्रत्येक नागरिक को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ने के समान अवसर उपलब्ध हों, लिंग, धर्म, जाति, संप्रदाय और नस्ल आदि में से किसी भी आधार पर भेदभाव न तो समाज में हो और ना ही शासन या व्यवस्था के स्तर पर। देश में उपलब्ध प्राकृतिक और आर्थिक संसाधनों का सामुदायिक हित में प्रयोग किया जाए और प्रत्येक नागरिक को बिना भेदभाव के इन संसाधनों के समुचित प्रयोग का अधिकार हो। अगर भारत की आजादी के विगत 63 सालों का विश्‍लेषण करें तो पता चलेगा कि हम भारतीय आज भी बहुत से मामलों में एक स्वाधीन लोकतांत्रिक देश के सच में स्वाधीन नागरिक नहीं हैं। हमारी आजादी आज भी अधूरी है, क्योंकि हमारे यहां जाति, धर्म और लिंग के अलावा प्रांत और अंचल जैसे कई आधारों पर आज भी जबर्दस्त भेदभाव है, जिसके शोले कश्‍मीर से कन्याकुमारी और मुंबई से सुदूर उत्तर-पूर्व तक सुलगते देखे जा सकते हैं।
आजादी का मतलब है लोगों को स्वतंत्रतापूर्वक अपने आनंद से जीने का अधिकार हो और जनता सुरक्षा की भावना के साथ खुश होकर कहीं भी रह सके। इस आधार पर देखें तो हम कहीं भी आजाद नहीं हैं। आम आदमी ना तो घर में सुरक्षित है ना ही बाहर। कानून की पालना और व्यवस्था बनाए रखने के लिए जो संस्थाएं बनाई गई हैं वे नाकामयाब सिद्ध हो रही हैं। एक लोकतांत्रिक समाज में कानून और व्यवस्था का अर्थ यह होता है कि लोगों की सहमति से जीवन स्वातंत्र्य के लिए कायदे कानून बनाए जाएं और उनकी पालना के लिए माकूल इंतजाम इस तरह किए जाएं कि जनता को कम से कम असुविधा हो और सामान्य जनजीवन बाधित ना हो। लेकिन हम देख रहे हैं कि लोगों की सुविधा के नाम पर देश में बड़े रसूखदार और पूंजीपतियों के हित में नए से नए कानून बनाए जा रहे हैं। अकेले छत्तीसगढ़ राज्य में बहुराष्ट्रीय कंपनियों से दो हजार से अधिक करार राज्य सरकार द्वारा खनिज और वन संपदा के दोहन के लिए किए गए हैं। इसका प्रतिवाद करने वाले आदिवासियों का बुरी तरह दमन किया जा रहा है। अपना हक मांगने वाले लोगों का अगर सरकार गोली से जवाब देती है तो यह कहां की आजादी है? सन 1776 में अमेरिकी आजादी के घोषणा पत्र में इसे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार सरकार द्वारा जनता को विद्रोह के लिए उकसाने वाला कृत्य कहा गया था। वस्तुतः स्वतंत्रता का सिद्धांत कहता है कि जनता को सहज जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए। लेकिन व्यवहार में हम देखते हैं कि उपनिवेशवादी ब्रिटिश सरकार की तरह जनता के मूलभूत अधिकारों का राज्य द्वारा कदम-कदम पर हनन किया जा रहा है। इसीलिए महात्मा गांधी ने सौ बरस पहले ही कह दिया था कि अगर अंग्रेजी शासन को हटाकर वैसा ही शासन अगर भारत में स्थापित करना है तो यह दासता ही भली है। व्यवहार में हम देख ही रहे हैं कि सत्ता का चरित्र कमोबेश औपनिवेशिक ही है और हमारी राजनीति की दिशा निरंतर जनोन्मुखी होने के बजाय पूंजीपति रक्षक की हो गई है।
स्वाधीनता का तकाजा कहता है कि लोगों की निजता के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए और आम जीवन में सरकार का दखल कम से कम होना चाहिए। लेकिन बढ़ते अपराधों की रोकथाम में नाकाम सरकारें नए-नए थाने बनाकर हर कदम पर पुलिस और पहरेदार बिठाकर सोचती है कि इससे अपराध रुक जाएंगे। आजादी का मतलब होता है कि कम से कम सरकारी दखल हो और जितना भी दखल हो वह लोगों की अनुमति से होना चाहिए। एक स्वस्थ सुरक्षित लोकतांत्रिक समाज में व्यक्ति को निर्भय जीने का अधिकार होता है, लेकिन हमने एक ऐसी व्यवस्था बना रखी है, जो कहने को लोगों को समान अवसर देती है, लेकिन निरक्षता और गरीबी का मारा व्यक्ति या तो अपराध की राह पकड़ता है या भीख मांगने के लिए मजबूर होता है। लोकतंत्र में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को जनसेवक की भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन प्रचलित व्यवहार में हम देखते हैं कि सरकारी कर्मचारी-अधिकारी जनता को सहयोग की बजाय परेशान करते हैं। जनता की सुरक्षा और स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए शासन अनिवार्य है, लेकिन अतिशासन निजता का हनन करता है। इसीलिए महात्मा गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ में अपने मन के शासन को स्वराज कहा था, जो आम आदमी के लिए आज भी एक सपना ही है।
लोकतंत्र में न्याय, शांति, स्वतंत्रता और समृद्धि को मनुष्य मात्र का प्राकृतिक अधिकार माना जाता है। राज्य का यह बुनियादी कर्तव्य है कि इन अधिकारों के लिए काम करे, क्योंकि स्वतंत्रचेता व्यक्ति का निर्माण भी राज्य का दायित्व है। अगर किसी समाज में लोगों को ये आधारभूत अधिकार मिलते हैं तो वह समाज तेजी से विकास करता है और राष्ट्र को आगे ले जाता है। इन अधिकारों की बहाली के लिए सरकार ने जो व्यवस्था कार्यपालिका और न्यापालिका के रूप में बनाई है उनके काम की गति देखकर सहज ही कहा जा सकता है कि जनता का क्या हाल होगा। लोग बरसों से न्याय की आशा में अदालतों और सरकारी दफ्तरों में भटकते रहते हैं और एक दिन संसार से कूच कर जाते हैं। उदाहरण के लिए आदिवासी बहुल राज्य छत्तीसगढ़ में जिस दिन टाटा के साथ खनिज दोहन के लिए मसौदे पर हस्ताक्षर हुए उससे अगले दिन ही यानी 05 जून, 2005 से राज्य में सलवा जुड़ूम शुरु हो गया। आनन-फानन में 644 गांवों का ‘पवित्रीकरण’ कर दिया गया, अर्थात् गांव जला दिए गए। छह सौ आदिवासी न्याय मांगने के लिए अदालत की शरण में गए, लेकिन एक भी आदिवासी को न्याय नहीं मिला। क्या इसी के लिए आजादी के आंदोलन में लाखों आदिवासियों ने अंग्रेजों से मरते दम तक लोहा लिया था? आदिवासी अंचलों में चल रही हिंसा के संदर्भ में गांधी जी का ‘हिंद स्वराज’ में लिखा यह कथन बहुत मानीखेज़ है। ‘अशांति असल में असंतुष्टि है। यह असंतुष्टि बड़े काम की चीज़ है। एक व्यक्ति जब तक अपने वर्तमान से संतुष्ट रहता है तब तक उसे उस अवस्था से बाहर निकालना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए कोई भी सुधार असंतुष्टि से ही शुरु होता है। जब हम किसी चीज का इस्तेमाल बंद कर देते हैं तब हम उसे फेंक देते हैं।’
स्वतंत्र देश में समूची व्यवस्था में निर्णय का अधिकार जनता के पास होता है, जनप्रतिनिधि अपने सदनों में जनता की ओर से निर्णय लेते हैं। लेकिन अक्सर देखा गया है कि विभिन्न सदनों में लिए जाने वाले निर्णयों में से अधिकांश जनहित में नहीं होते, चाहे वे नए टैक्सों की शक्ल में हों या नए निर्माण कार्य अथवा कानून की शक्ल में। राजधानी जयपुर में खासा कोठी पर निर्मित पुल के बारे में अब सरकार खुद ही स्वीकार कर रही है कि यह गलत बना दिया गया। निश्चित रूप से ऐसे निर्णय जनहित के नाम पर जनता की सुविधा और सहूलियत के लिहाज से कलंक हैं, जिनके पीछे कुछ लोगों का निहित स्वार्थ छुपा होता है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों और कार्यपालिका की भूमिका पर भी प्रश्‍नचिह्न लग जाता है। फिर गांधी जी का ब्रिटिश संसद के बारे में कहा गया कथन याद आता है, ‘‘प्रधानमंत्री संसद के कल्याण के बजाय अपनी शक्तियों के लिए ज्यादा चिंतित नजर आते हैं। उनकी पूरी ताकत अपनी पार्टी की सफलता सुनिश्चित करने पर केंद्रित रहती है। उनकी शाश्‍वत चिंता यह नहीं होती कि संसद ठीक से काम करे। कई किस्म के लाभ उठाने के लिए वे निश्चित रूप से कुछ लोगों को मान-सम्मान की घूस भी देते हैं।’’
आज हमारी आजादी का 63वां साल है, यह अवसर इस बात पर पुनर्विचार करने का है कि कैसे हर व्यक्ति को वास्तविक स्वतंत्रता मिले, जिससे वह स्वयं के साथ देश के विकास के बारे में सोचे और एक सरस, सरल, अपराधमुक्त, निर्भय, स्वस्थ और स्वतंत्र विचारशील समाज का निर्माण करने में अपना सर्वस्व लगा दे। मार्टिन लूथर किंग ने कहा था, ‘तुम मेरी जान ले सकते हो, लेकिन मेरे जीने का अधिकार नहीं छीन सकते। तुम मुझसे मेरी आजादी छीन सकते हो, लेकिन मेरी स्वतंत्रता का अधिकार नहीं छीन सकते। तुम मेरी आशाएं छीन सकते हो, तुम चाहो तो मुझसे खुशी की कामना भी छीन सकते हो, लेकिन तुम खुशी की खोज के अधिकार को नहीं छीन सकते।’’ मनुष्य के लिए आनंद और खुशी ही स्वतंत्रता है। आइये इसका जश्‍न मनाएं, लेकिन एक नागरिक की जिम्मेदारियों के साथ, क्योंकि स्वतंत्रता के साथ दायित्वबोध भी जुड़ा हुआ है।

यह आलेख डेली न्‍यूज़, जयपुर के स्‍वाधीनता दिवस परिशिष्‍ट 'देश मेरा रंगरेज' में प्रकाशित हुआ।