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Tuesday, 3 March 2009

संघर्ष और जीवन की जयकथा





कुछ कलाकार हमेशा लीक से हटकर काम करने में विशवास करते हैं और तमाम किस्म की मुश्किलों के बीच भी अविचलित रहते हुए निरंतर अपने सृजन में रत रहते हैं। एकेश्वर हटवाल ऐसे ही कलाकार हैं, पूरी निष्ठा के साथ कला को समर्पित और मीडिया की चकाचौंध से दूर अपने अनूठे अंदाज में उद्देश्यपरक और जनपक्षधर कला का संसार रचते हुए। वे पहले-पहल अपनी ‘रिक्षावाला’ चित्र-श्रृंखला से चर्चित हुए थे। इसके बाद एकेश्वर ने लोक कलाकार-नर्तकों को अपने चित्रों में पूरी खूबसरती के साथ ही नहीं बल्कि सांगीतिक लय और कलात्मक उर्जा के साथ जीवंत किया। हमेशा कुछ अलग और सार्थक प्रयोग करने वाले एकेश्वर ने इस बार अपनी कला का माध्यम ही बदल डाला और मूर्तिशिल्प के साथ ब्लू पोटरी में आधुनिक चित्र बनाने की पहल की। इस नये काम की हाल ही एन एक प्रदर्शनी जवाहर कला केंद्र, जयपुर में आयोजित हुई तो एक सुखद आश्चर्य हुआ कि पिछले कई महीनों से एक सड़क दुर्घटना में घायल शरीर के कष्ट झेलते एकेश्वर ने एक नया अवतार लिया है। यह प्रदर्शनी उस दिन शुरू हुई जिस दिन बराक हुसैन ओबामा ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली। एकेश्वर के ब्लू पोटरी चित्रों में ओबामा भी है, जो पूरी दुनिया के अश्वेत और वंचितों के नए मसीहाई प्रतीक कहे जा रहे हैं।

मूर्तिकला एकेश्वर बरसों से पढ़ा रहे हैं, लेकिन पहली बार उन्होंने इस माध्यम में खुद काम किया है। और उनके मूर्तिशिल्प देखने से पता चलता है कि इस माध्यम पर उनकी कितनी गहरी पकड़ है और अपने गहन चाक्षुष अध्ययन से उन्होंने जिन लोक कलाकारों की कला को आत्मसात किया है, उसे मूर्तिशिल्प में ढालते हुए वे इस कदर तल्लीन हो जाते हैं कि दो कला-रूप एक दूसरे में बहुत खूबसूरती के साथ समाविष्ट हो जाते हैं। नृत्य और संगीत की लय को मूर्तिशिल्प में पकड़ पाना आसान नहीं है और सबसे बड़ी बात यह कि उसमें नवीनता का समावेश कैसे किया जाए? आखिरकार कला में नवीनता का सृजन ही तो सबसे महत्वपूर्ण बात है। जिंदगी के जिस पहलू को कला में व्यक्त किया जाता है, वह अगर प्रेक्षक को नवीनता का बोध नहीं कराता तो कैसी कला? देखे हुए को नये ढंग से दिखाना ही तो चाक्षुष कला है। कहना न होगा कि एकेश्वर ने इस दृष्टि से बहुत ही सुंदर और उत्कृष्ट काम किया है। इन मूर्तिशिल्पों में ढोल, मंजीरे और परात बजाते तथा नृत्य करते लोक कलाकार राजस्थान, मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ के होते हुए भी वैश्विक लगते हैं, क्योंकि एकेश्वर ने अपनी कलाभिव्यक्ति में उनको इस कदर रूपांतरित कर दिया है कि वे सृजनशील और श्रमजीवी कलाकार अधिक लगते हैं, पेशेवर कलाकार कम। और ऐसा करते हुए एकेश्वर इस बात का ध्यान रखते हैं कि लोक कलाकारों की सर्जनात्मक जिजीविषा और उर्जा ही शिल्प की ताकत बन जाए, स्त्री-पुरुष कलाकार का भेद मिट जाए और एक सार्वभौमिक लोक कलाकार की छवि प्रेक्षक के दिलो-दिमाग पर इस तरह रच-बस जाए कि उसके लिए देखे हुये कलाकार एक सर्वथा नए रूप में प्रकट हों और किंचित विस्मय के बाद वह दो कलाओं के इस महामिलन को एक नए चाक्षुष कला-आस्वाद के रूप में ग्रहण कर सके। इन मूर्तिशिल्पों में एक शिल्प रिक्षा वाले का भी है। इस शिल्प की खास बात यह है कि इसमें रिक्षा और चालक एकमेक हो गये हैं और लोक कलाकारों की भांति रिक्षाचालक भी अपनी विशिष्ट लय में किसी श्रमजीवी कलाकार की तरह सृजन में लीन दिखाई देता है।जयपुर की ब्लू पोटरी कला विश्वविख्यात है और राजस्थान के महान चित्रकार स्व. कृपालसिंह शेखावत ने इस कला को नए आयाम प्रदान किए। एकेश्वर हटवाल ने ब्लू पोटरी में सर्वथा नए प्रयोगशील काम की शुरूआत की है। इस प्रदर्शनी में एकेश्वर के तीस ब्लू पोटरी चित्रों को देखने के बाद बरबस ही इस बात पर हमारा ध्यान जाता है कि अभी भी आधुनिक कला को कितने नए माध्यमों में प्रवेश करना बाकी है। ब्लू पोटरी कला में अब तक पारंपरिक किस्म का चित्रांकन ही होता आया है और स्व. कृपालसिंह जी जैसे कलाकार भी उसमें इस किस्म के प्रयोग नहीं कर पाए थे। वैसे भी कृपालसिंह जी पारंपरिक कला को थोड़ी ज्यादा ही तवज्जोह दिया करते थे। बहरहाल, एकेश्वर ने इस लिहाज से ऐतिहासिक शुरूआत की है। इधर कुछ सालों से इस कला में यानी ब्लू पोटरी में प्रयोग और नवाचार तो हुए हैं, लेकिन कथ्य या अंतर्वस्तु के लिहाज से कोई खास उल्लेखनीय बदलाव नहीं देखने को मिले। जो थोड़े बहुत बदलाव हुए भी तो कृपालसिंह जी और उनके शिष्य रामगोपाल सैनी ने किए। एकेश्वर ने रामगोपाल सैनी के साथ मिलकर इस नए काम को पूरा किया। एकेश्वर के ब्लू पोटरी चित्र टाइल्स में बनाए गये हैं। अभी तक हम लोग टाइल्स में खास तौर पर सिरेमिक में, एक ही बदलाव देख पाए हैं कि वहां भी धार्मिक प्रतीक और देवी-देवता सजावटी चीजों की तरह प्रवेश कर गये हैं या पाश्चात्य नमूने और वस्त्रसज्जा के रूपाकार आए हैं। ऐसे में एकेश्वर का काम बेहद सुकून देता है कि टाइल्स में आप अश्वेत समुदाय के महानायक बराक हुसैन ओबामा से लेकर लोक कलाकार, नर्तक, संगीतकार, नृत्य में लीन गणपति, रिक्षाचालक, पहाड़ी मजदूर अर्थात् पिट्ठू, गधे और सुअर तक को एक कला संसार में दाखिल होते हुए देख सकते हैं। इस कला संसार में सब कुछ जीवन, संगीत और श्रम में रचा-बसा है। जीवन की पूरी लय और गति अपनी पूरी ताकत के साथ दिखाई देती है। एकेश्वर के कला संसार में अभिजात्य की कोई जगह नहीं है, वहां सिर्फ मेहनतकशों की सृजनशीलता है या जीवन के संघर्ष में मुब्तिला जानवर, जो अपनी मूक वाणी से मनुष्यों की तरह ही अपना दुख अभिव्यक्त करते हैं। चूंकि एकेश्वर ने खुद एक अत्यंत संघर्षशील जीवन जिया है और जी रहे हैं, इसलिए ‘संघर्ष’ उनकी कला के केंद्र में रहता है। यही संघर्ष कला में जब व्यक्त होता है तो एक सर्वथा नई दुनिया हमारे सामने आती है। हमें खुशी ही नहीं अत्यंत गर्व महसूस होता है, जब हम देखते हैं कि हमारे बीच एकेश्वर के रूप में एक ऐसा कलाकार मौजूद है, जो मनुष्य जाति के सांस्कृतिक संघर्ष को उसकी पूरी संवेदना के साथ व्यक्त करता है और जीवन की जयकथा गाता है।