Sunday, 4 July 2010
जयपुर : अब दरख्तों की खैर नहीं...!
Wednesday, 13 May 2009
जयपुर बम धमाकों की बरसी पर सोचो

अब पत्ता भी हिलता है तो मेरा दिल कांप उठता है
- ओमप्रकाश ‘नदीम’
13 मई सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि एक ऐसी तारीख है, जिसे याद करना लगातार एक भयानक यातना से गुजरना है। वक्त का पहिया आंसुओं को सुखा देता है, लेकिन दिलोदिमाग पर पड़ी खौफ़ और दर्द की ख़राशों को नहीं मिटा सकता, बल्कि वो दिन याद आते ही दर्द की लकीरें कुछ ज्यादा लंबी हो जाती हैं। एक बरस पहले कुछ हमलावरों ने तीन सदी पुराने इस अमनपसंद गुलाबी शहर की शांति छीन ली थी, और इस एक बरस में ना जाने कितनी बार उस दिन को फिर से दोहराने की कोशिश भरी अफ़वाहों में यहां के बाशिंदे दहशत के साये में अपने हौसलों के दम पर जिंदादिली के साथ रोजमर्रा के जीवनसंघर्ष में शहर की पहचान को कायम रख सके हैं। लेकिन 13 मई की तारीख आज भी इस शहर के बाशिदों से ही नहीं यहां के कर्णधारों और कानून-व्यवस्था के अलमबरदारों से सवाल-दर-सवाल कर रही है कि ‘कहां गये वो वायदे वो सुख के ख्वाब क्या हुए’।
‘हर नई दुर्घटना पिछली दुर्घटनाओं को कार्यसूची से बाहर कर देती है’, क्या हम 13 मई की तरह फिर किसी हमले के इंतजार में लापरवाही के साथ आराम से बैठे यह नहीं सोच रहे कि यह मेरा काम नहीं, जो होगा देखा जाएगा, अभी तो कोई दिक्कत नहीं। हम ना खुद से सवाल करते हैं और न ही कर्णधारों से और यकीन मानिए हमारी आंखें तब भी नहीं खुलेंगी जब दूसरा हमला होगा। हम फिर एक खास समुदाय और पड़ोसी मुल्क पर गुस्सा होंगे और किसी ना किसी को उत्तरदायी ठहराते हुए अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेंगे और इसके बाद शुरू होगा आतंकवादी के नाम पर बेगुनाह लोगों और निर्दोष अल्पसंख्यकों को हिरासत में लेने और फिर निर्दोषों की सचाई सामने आने पर बगलें झांकने और नए सिरे से कार्यवाही की शुरूआत का एक अंतहीन सिलसिला। आखिर कब तक यह सब चलता रहेगा। इस एक बरस में हमने आखिर इसके सिवा देखा ही क्या है? पुलिस के तमाम दावों और मीडिया इन्वेस्टिगेशन के नाम पर बेगुनाह लोगों की जिंदगी बरबाद करने के सिवा हमने क्या किया आखिर। उस युवक के बारे में हम क्यों नहीं सोचते जिसने डॉक्टर बनने का ख्वाब ही नहीं देखा, बनने जा रहा था, उसकी जिंदगी बम धमाकों से नहीं हमारी जल्दबाजी से और लापरवाही से तबाह हुई, क्या वो बमकांड के पीडि़तों में शामिल नहीं है। ऐसे कितने लोग हैं, इसकी हमें ठीक-ठीक जानकारी भी नहीं है। वो तो अच्छा हुआ कि पोटा जैसा काला कानून नहीं था, वरना ऐसे निर्दोष जिंदगी भर जेलों में सड़ते रहते।
जिन घरों पर 13 मई के हमलों का कहर टूटा, उनकी हालत इन आंखों से देखी नहीं जाती। बचे हुए लोगों को इलाज के नाम पर क्या मिला, मृतकों के परिवारों को हर्जाने के नाम पर क्या हासिल हुआ, जिनका काम-धंधा चौपट हुआ वो कहां हैं, क्या हमने इन सवालों पर कभी ग़ौर किया है। पीयूसीएल की एक जन-सुनवाई में ऐसे सैंकड़ों सवाल उठाये गये थे, लेकिन यकीन मानिए अखबारों में उसका बेहद संक्षिप्त विवरण छपा, क्योंकि वो जन-सुनवाई 13 मई को नहीं हुई। मीडिया में अब आतंक की खबर भी जयंती-पुण्यतिथि की तरह ही बिकती है। आतंकवाद को इस कदर सांप्रदायिक रंग दे दिया गया है कि बेगुनाह अल्पसंख्यक की पैरवी करना आतंकवादियों के पक्ष में खड़ा होना माना जाता है। और बहुसंख्यक को आतंकवादी साबित होने के बाद भी गौरवान्वित किया जाता है और निर्दोष माना जाता है।
इस एक बरस में हम जरा भी नहीं चेते, आज भी उसी तरह लोग अपने वाहन बेतरतीबी से पार्क करते चले जा रहे हैं, कोई किसी को नहीं टोकता कि अपने वाहन पर सामान छोड़कर क्यों जा रहे हो। पुलिस शायद ही कभी किसी के सामान या वाहन की जांच करती है, लोग अपने साइकिल-दुपहियों पर इतना बड़ा माल-असबाब ले जाते हैं कि हैरत होती है। दिल्ली के अलावा दूसरे रास्तों से आने वाली बसों और दूसरी गाडियों में कौन क्या ला रहा है कोई नहीं देख रहा। दाढ़ी और टोपी के सिवा हम किसी पर शक नहीं करते। आज भी लोग उसी तरह अनजान लोगों को मकान किराये पर दे रहे हैं, चंद पैसों के लिए होटल, गेस्ट हाउस वाले किसी के पहचान दस्तावेज की मौलिकता या वैधता पर सवाल नहीं करते। क्या हम तभी जागेंगे जब 13 मई को किसी और तारीख में दोहराया जाएगा। बकौल शायर ओमप्रकाश नदीम -
उस पेड़ से उम्मीद फल की कोई क्या करे
आपस में जिसके गुंचा-ओ-ग़ुल में तनाव है
Tuesday, 3 March 2009
संघर्ष और जीवन की जयकथा

कुछ कलाकार हमेशा लीक से हटकर काम करने में विशवास करते हैं और तमाम किस्म की मुश्किलों के बीच भी अविचलित रहते हुए निरंतर अपने सृजन में रत रहते हैं। एकेश्वर हटवाल ऐसे ही कलाकार हैं, पूरी निष्ठा के साथ कला को समर्पित और मीडिया की चकाचौंध से दूर अपने अनूठे अंदाज में उद्देश्यपरक और जनपक्षधर कला का संसार रचते हुए। वे पहले-पहल अपनी ‘रिक्षावाला’ चित्र-श्रृंखला से चर्चित हुए थे। इसके बाद एकेश्वर ने लोक कलाकार-नर्तकों को अपने चित्रों में पूरी खूबसरती के साथ ही नहीं बल्कि सांगीतिक लय और कलात्मक उर्जा के साथ जीवंत किया। हमेशा कुछ अलग और सार्थक प्रयोग करने वाले एकेश्वर ने इस बार अपनी कला का माध्यम ही बदल डाला और मूर्तिशिल्प के साथ ब्लू पोटरी में आधुनिक चित्र बनाने की पहल की। इस नये काम की हाल ही एन एक प्रदर्शनी जवाहर कला केंद्र, जयपुर में आयोजित हुई तो एक सुखद आश्चर्य हुआ कि पिछले कई महीनों से एक सड़क दुर्घटना में घायल शरीर के कष्ट झेलते एकेश्वर ने एक नया अवतार लिया है। यह प्रदर्शनी उस दिन शुरू हुई जिस दिन बराक हुसैन ओबामा ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली। एकेश्वर के ब्लू पोटरी चित्रों में ओबामा भी है, जो पूरी दुनिया के अश्वेत और वंचितों के नए मसीहाई प्रतीक कहे जा रहे हैं।
मूर्तिकला एकेश्वर बरसों से पढ़ा रहे हैं, लेकिन पहली बार उन्होंने इस माध्यम में खुद काम किया है। और उनके मूर्तिशिल्प देखने से पता चलता है कि इस माध्यम पर उनकी कितनी गहरी पकड़ है और अपने गहन चाक्षुष अध्ययन से उन्होंने जिन लोक कलाकारों की कला को आत्मसात किया है, उसे मूर्तिशिल्प में ढालते हुए वे इस कदर तल्लीन हो जाते हैं कि दो कला-रूप एक दूसरे में बहुत खूबसूरती के साथ समाविष्ट हो जाते हैं। नृत्य और संगीत की लय को मूर्तिशिल्प में पकड़ पाना आसान नहीं है और सबसे बड़ी बात यह कि उसमें नवीनता का समावेश कैसे किया जाए? आखिरकार कला में नवीनता का सृजन ही तो सबसे महत्वपूर्ण बात है। जिंदगी के जिस पहलू को कला में व्यक्त किया जाता है, वह अगर प्रेक्षक को नवीनता का बोध नहीं कराता तो कैसी कला? देखे हुए को नये ढंग से दिखाना ही तो चाक्षुष कला है। कहना न होगा कि एकेश्वर ने इस दृष्टि से बहुत ही सुंदर और उत्कृष्ट काम किया है। इन मूर्तिशिल्पों में ढोल, मंजीरे और परात बजाते तथा नृत्य करते लोक कलाकार राजस्थान, मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ के होते हुए भी वैश्विक लगते हैं, क्योंकि एकेश्वर ने अपनी कलाभिव्यक्ति में उनको इस कदर रूपांतरित कर दिया है कि वे सृजनशील और श्रमजीवी कलाकार अधिक लगते हैं, पेशेवर कलाकार कम। और ऐसा करते हुए एकेश्वर इस बात का ध्यान रखते हैं कि लोक कलाकारों की सर्जनात्मक जिजीविषा और उर्जा ही शिल्प की ताकत बन जाए, स्त्री-पुरुष कलाकार का भेद मिट जाए और एक सार्वभौमिक लोक कलाकार की छवि प्रेक्षक के दिलो-दिमाग पर इस तरह रच-बस जाए कि उसके लिए देखे हुये कलाकार एक सर्वथा नए रूप में प्रकट हों और किंचित विस्मय के बाद वह दो कलाओं के इस महामिलन को एक नए चाक्षुष कला-आस्वाद के रूप में ग्रहण कर सके। इन मूर्तिशिल्पों में एक शिल्प रिक्षा वाले का भी है। इस शिल्प की खास बात यह है कि इसमें रिक्षा और चालक एकमेक हो गये हैं और लोक कलाकारों की भांति रिक्षाचालक भी अपनी विशिष्ट लय में किसी श्रमजीवी कलाकार की तरह सृजन में लीन दिखाई देता है।जयपुर की ब्लू पोटरी कला विश्वविख्यात है और राजस्थान के महान चित्रकार स्व. कृपालसिंह शेखावत ने इस कला को नए आयाम प्रदान किए। एकेश्वर हटवाल ने ब्लू पोटरी में सर्वथा नए प्रयोगशील काम की शुरूआत की है। इस प्रदर्शनी में एकेश्वर के तीस ब्लू पोटरी चित्रों को देखने के बाद बरबस ही इस बात पर हमारा ध्यान जाता है कि अभी भी आधुनिक कला को कितने नए माध्यमों में प्रवेश करना बाकी है। ब्लू पोटरी कला में अब तक पारंपरिक किस्म का चित्रांकन ही होता आया है और स्व. कृपालसिंह जी जैसे कलाकार भी उसमें इस किस्म के प्रयोग नहीं कर पाए थे। वैसे भी कृपालसिंह जी पारंपरिक कला को थोड़ी ज्यादा ही तवज्जोह दिया करते थे। बहरहाल, एकेश्वर ने इस लिहाज से ऐतिहासिक शुरूआत की है। इधर कुछ सालों से इस कला में यानी ब्लू पोटरी में प्रयोग और नवाचार तो हुए हैं, लेकिन कथ्य या अंतर्वस्तु के लिहाज से कोई खास उल्लेखनीय बदलाव नहीं देखने को मिले। जो थोड़े बहुत बदलाव हुए भी तो कृपालसिंह जी और उनके शिष्य रामगोपाल सैनी ने किए। एकेश्वर ने रामगोपाल सैनी के साथ मिलकर इस नए काम को पूरा किया। एकेश्वर के ब्लू पोटरी चित्र टाइल्स में बनाए गये हैं। अभी तक हम लोग टाइल्स में खास तौर पर सिरेमिक में, एक ही बदलाव देख पाए हैं कि वहां भी धार्मिक प्रतीक और देवी-देवता सजावटी चीजों की तरह प्रवेश कर गये हैं या पाश्चात्य नमूने और वस्त्रसज्जा के रूपाकार आए हैं। ऐसे में एकेश्वर का काम बेहद सुकून देता है कि टाइल्स में आप अश्वेत समुदाय के महानायक बराक हुसैन ओबामा से लेकर लोक कलाकार, नर्तक, संगीतकार, नृत्य में लीन गणपति, रिक्षाचालक, पहाड़ी मजदूर अर्थात् पिट्ठू, गधे और सुअर तक को एक कला संसार में दाखिल होते हुए देख सकते हैं। इस कला संसार में सब कुछ जीवन, संगीत और श्रम में रचा-बसा है। जीवन की पूरी लय और गति अपनी पूरी ताकत के साथ दिखाई देती है। एकेश्वर के कला संसार में अभिजात्य की कोई जगह नहीं है, वहां सिर्फ मेहनतकशों की सृजनशीलता है या जीवन के संघर्ष में मुब्तिला जानवर, जो अपनी मूक वाणी से मनुष्यों की तरह ही अपना दुख अभिव्यक्त करते हैं। चूंकि एकेश्वर ने खुद एक अत्यंत संघर्षशील जीवन जिया है और जी रहे हैं, इसलिए ‘संघर्ष’ उनकी कला के केंद्र में रहता है। यही संघर्ष कला में जब व्यक्त होता है तो एक सर्वथा नई दुनिया हमारे सामने आती है। हमें खुशी ही नहीं अत्यंत गर्व महसूस होता है, जब हम देखते हैं कि हमारे बीच एकेश्वर के रूप में एक ऐसा कलाकार मौजूद है, जो मनुष्य जाति के सांस्कृतिक संघर्ष को उसकी पूरी संवेदना के साथ व्यक्त करता है और जीवन की जयकथा गाता है।
Friday, 26 December 2008
राजस्थान में शराब बिक्री पर रोक...
पूरे शहर में अतिक्रमण को लेकर ख़बर बेचने वाला सबसे बड़ा अखबार अपने ही दफ्तर के सामने पार्किंग के नाम पर अतिक्रमण करता है...मजा तो तब आए जब यह अतिक्रमण ध्वस्त हो...अशोक जी शायद इस पर थोडी तवज्जोह देंगे...कि अपनी विशेष हैसियत के कारण कोई खामख्वाह सरकारी ज़मीन पर बेवजह अतिक्रमण ना करे।
अजीब बात है कि जनता के सवालों पे लड़ने वाले ख़ुद पे सवाल खड़े होने से बौखला जाते हैं॥
इस बार भी येही होगा...खाकसार से जुड़ी खबरें प्रतिबंधित कर दी जायेंगी... कुछ दरबारी पत्रकार इस पर मशविरा देंगे...और अपने ही साथी पत्रकार को दरवाजा दिखाने का मातम मनाएंगे.. कुछ बेहद खुश भी होंगे कि हे अल्लाह, हे इश्वर मेरा पत्ता नहीं कटा॥
हम जानते हैं कि मंदी कि मार बड़े अखबारों पर नहीं पड़ती॥ लेकिन मालिक को तो जो गुर्गे बता दें , सिखा दें वही सब कुछ है...

