Showing posts with label साहित्य. Show all posts
Showing posts with label साहित्य. Show all posts

Sunday, 2 August 2009

साहित्‍य में दोस्‍ती और लवलीन की अन्तिम कविता




साहित्‍य –संस्‍कृति की दुनिया में दोस्‍ती कुछ ज्‍यादा ही महत्‍व रखती है। वजह यह कि इन क्षेत्रों में काम भले ही व्‍यक्ति अकेले करता हो, मित्र समुदाय एक दूसरे को निखारने, संवारने और उत्‍साह बढाने में बेहद मददगार साबित होते हैं। बौद्धिक दुनिया में अब तक की सबसे महान दोस्‍ती का उदाहरण कार्ल मार्क्‍स और फ्रेडरिक एंगेल्‍स से बड़ा कोई नहीं मिलता। इन दोस्‍तों ने मिलकर जो काम किया उसे इस दुनिया के सबसे परिवर्तनकारी कामों में शुमार किया जाता है। जब मार्क्‍स का निधन हुआ तो उनकी शवयात्रा में बमुश्किल बीस लोग थे। उनमें एंगेल्‍स भी थे। अपने मित्र की मृत्‍यु पर बोलते हुए एंगेल्‍स ने जो कहा, वो आज भी प्रासंगिक है। एंगेल्‍स ने कहा था, ‘आने वाली दुनिया या तो मार्क्‍स के पक्ष में होगी या इसके खिलाफ, इसके सिवा कोई विकल्‍प नहीं होगा।‘
साहित्‍य की दुनिया में देखें तो सबसे बड़ी दोस्तियों में ज्‍यां पाल सार्त्र और सीमान दा बोउवा की दोस्‍ती रही। एक महान दार्शनिक और दूसरी स्‍त्री स्‍वाधीनता की प्रबल पक्षधर इन दो महान हस्तियों ने साहित्‍य की दुनिया की सबसे प्रसिद्ध मित्रता निभाई। जब सार्त्र ने सीमोन से पूछा कि तुम मुझसे शादी करना चाहती हो या जिंदगी भर की दोस्‍ती, तो सीमोन ने जवाब में दोस्‍ती मांगी और दोनों बिना शादी किये आजीवन साथ रहे। विश्‍व साहित्‍य में इस किस्‍म की दोस्तियों के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। हमारे यहां भी खासकर हिंदी उर्दू साहित्‍य में अपने समय की मशहूर हस्तियों ने जबर्दस्‍त दोस्तियां निभाई हैं और इनके विविध प्रसंगों को लेकर काफी लिखा गया है। खुद लेखकों ने एक दूसरे पर संस्‍मरण लिखते हुए दोस्‍ती का फर्ज अदा किया है। दोस्‍ती को साहित्‍य में परवान चढाने में डाक विभाग का सबसे ज्‍यादा योगदान है। पत्र लेखन से ही लेखक, बुद्धिजीवियों के बीच आपसी संवाद बढ़ा और संबंधों में मजबूती आई। यूं मित्रों के बीच पत्राचार की परंपरा हमारे यहां मिर्जा ग़ालिब के जमाने से चली आई है। उर्दू साहित्‍य में तो पत्रवाहक यानी कासिद के साथ महबूबा के चले जाने की भी परंपरा मिलती है। ग़ालिब का वो मशहूर शेर हर बार याद आता है,
कासिद के आते-आते खत इक और लिख रखूं
मैं जानता हूं वो जो लिखेंगे जवाब में
बहरहाल, उर्दू में मंटो पहले लेखक थे, जिनके साथ अपनी मित्रता को लेकर उनके परम मित्र उपेंद्रनाथ अश्‍क ने एक पूरी किताब लिखी ‘मंटो मेरा दुश्‍मन’। ये अपने वक्‍त की बेहद मशहूर किताब रही और हिंदी-उर्दू में इसको खूब सराहा गया। इस किस्‍म की किताबों से पाठकों को एक लेखक के व्‍यक्तित्‍व के अनेक पहलुओं का पता चलता है। इसी तरह उर्दू अदब में जोश मलीहाबादी की किताब ‘यादों की बारात’ अपने वक्‍त की सबसे मशहूर किताबों में शुमार की जाती है जिसमें जोश ने अपनी आत्‍मकथा लिखते हुए अपनी जबर्दस्‍त दोस्तियों का भी खासा जिक्र किया है। कुछ बरस पहले अली सरदार जाफरी की किताब ‘लखनउ की पांच रातें’ आई तो रातों रात मशहूर हो गई। इस किताब में सरदार ने अपने छात्र जीवन के प्रसंगों और उस दौर की अपनी दोस्तियों को लेकर बहुत ही खुबसूरत ढंग से संस्‍मरण लिखे हैं। जांनिसार अख्‍तर, कैफी आज़मी, सिब्‍ते हसन और मजाज लखनवी जैसे नामचीन शायर और अदीबों के उन दिनों का जबर्दस्‍त वर्णन है जब ये लोग अदब की दुनिया में दाखिल हो रहे थे। उर्दू में ऐसी ही एक और प्रसिद्ध किताब है मुज्‍तबा हुसैन की ‘चेहरा दर चेहरा’ जिसमें उर्दू साहित्‍य की महान हस्तियों के खाके यानी व्‍यक्तिचित्र देखने को मिलते हैं। इन खाकों में उन अदीबों के साथ गुजारे गए वक्‍त और उनकी लेखन प्रक्रिया आदि बातों को बेहद रोचक ढंग से लिखा गया है।
हिंदी साहित्‍य में माहन आलोचक रामविलास शर्मा और कवि केदारनाथ अग्रवाल की मित्रता चर्चित रही है। इन दोनों की दोस्‍ती को उनके पत्राचार की पुस्‍तक ‘मित्र संवाद’ से गहराई से जाना जा सकता है। इन पत्रों से इस बात का पता चलता है कि किस प्रकार एक आलोचक कवि को शक्ति प्रदान करता है और कैसे एक कवि अपने आलोचक मित्र की मदद करता है। इन पत्रों को पढते हुए एक पूरे युग की साहित्यिक बहसों और हलचलों का भी पता चलता है। इसी तरह प्रसिद्ध कहानीकार और नाटककार मोहन राकेश के पत्रों को पढा जा सकता है। हिंदी में पत्र साहित्‍य बहुत समृद्ध नहीं है और लेखकों के पत्राचार की किताबें भी कम ही छपती हैं, इसलिए दोस्‍ती के अनेक पहलू अज्ञात रह जाते हैं। लेकिन इधर हिंदी में संस्‍मरण विधा का जबर्दस्‍त विकास हो रहा है और कई बड़े लेखकों ने संस्‍मरण लिखकर अपनी मित्रता के संबंधों को उजागर किया है। इस लिहाज से रवींद्र कालिया की ‘ग़ालिब छुटी शराब’ ने एक इतिहास बनाया है। शराबनोशी के प्रसंगों के बहाने कालिया ने अपने मित्रों का बेहद रोचक वर्णन किया है। इस पर काफी हंगामा भी हुआ और कई लेखकों ने जवाबी हमले के अंदाज में संस्‍मरण लिखे। कवि नीलाभ ने कथाकार और ‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन को लेकर एक लंबा संस्‍मरण लिखा जिसमें ज्ञानरंजन की याद को एक प्रेमिका की याद की तरह बताया है। कथाकार स्‍वयं प्रकाश ने कुछ दोस्‍तों और कुछ बड़े लेखकों को लेकर ‘हमसफरनामा’ लिखी, जिसमें उनके लेखन और अपनी दोस्‍ती को बहुत जिंदादिली के साथ याद किया है। मित्रता के प्रसंगों को लेकर काशीनाथ सिंह के संस्‍मरण भी खासी लोकप्रियता हासिल कर चुके हैं तो कांति कुमार जैन के संस्मरणों की बात ही निराली है। दोस्‍ती का यह सिसिला जारी है और मोबाइल-इंटरनेट के जमाने में अब पुराने दिनों को याद कर लेखक संस्‍मरण लिख रहे हैं।
पिछले साल जब लेखक-पत्रकार अशोक शास्‍त्री का निधन हुआ और उनकी याद में एक कार्यक्रम हुआ तो हिंदी की मशहूर लेखिका लवलीन ने अपने प्रिय साहित्‍यकार-पत्रकार मित्रों को याद करते हुए एक लंबी कविता मुझे दी कि इसे मंच से पढकर सुनाओ। लवलीन की संभवत: यह अंतिम कविताओं में से एक है और अभी तक कहीं प्रकाशित नहीं हुई। इस कविता से साहित्‍य में मित्रता के कई पहलुओं को देखा जा सकता है। इस कविता में राजस्‍थान के अनेक लेखक मित्रों का जिक्र है और मित्रों के बहाने खुद लवलीन अपने लिए जीने की ताकत ढूंढ रही थी।
दिवंगतों के लिए
मेरे दोस्‍तों, परिजनों, सखियों
देखो मैं वापस लौट आई हूं मैात के मुंह से
वापस आकर धरती पर पाया
मृत्‍यु ही मृत्‍यु का तांडव
तुम सब एक के बाद एक
दिंवगत हो रहे हो
जैसे इस बदसूरत
लहूलुहान धरती पर जीना मुहाल है
सच्‍चे, सुंदर, सह्रदय, ईमानदार बने रहकर जीना अभिशाप हो
चक्‍की के पाट में तुम्‍हें ही आना था मेरी पत्रकारिता के गुरू।
ओ रघुनंदन, ओ संजीव, ओ चारूमित्रा
ओ अशोक शास्‍त्री
ओए रब्‍बा तूने तो मुझे कंगाल कर दिया
ओ यूं खेल से अधबीच उठकर जाने वालों
तुम धरती पर छोड़ गए हो इतना विराट शून्‍य
जिसे भर नहीं सकता थार का मरूस्‍थल भी
और हमें इतना क्षुद्र भी बना दिया कि तुम्‍हारी स्‍मृतियां
स्‍मरण, आख्‍यान ही बटोर सकते हैं हम
जीवन अनंत संभावना है
तुम सब तो अभी उत्‍कर्ष पर थे
श्रेष्‍ठ अभी निसृत होना था
फिर कैसी चली हवा
दीया गया
हम मित्रों के सुरों की सरगम
तीस बरस पुरानी थी
‘भूमिका’ मेरा मायका है- रहेगा
घर तो पहले से नहीं था
मित्रों, द्विजजनों, सखियों से ही
एक कुनबा बसाया था
ज्‍यों कोई कम्‍यून
अब वह भी टूट गया
भस्‍मीभूत हो गया ।
भादानी जी, नंदकिशोर आचार्य, शास्‍त्री, सीमंतिनी
अंजू, संजीव, कल्पित, अजंता, सत्‍यनारायणजी
और ना जाने कितने जाने-अनजाने
वो गोष्ठियां-गप्‍पबाजियां
साहित्‍याकाश का सितारा बनने
के जुनून की शाब्दिक कसरतें और
मन को मथ मथ कर छोटा छोटा रचना और सुनना सुनाना
तुम्‍हारा विद्वता भरा बड़प्‍पन और बड़बोलापन
मैं शायद इसी शाप के साथ
लौट आई हूं कि
तुम सबकी स्मृतियों के एलबम से
एक एक चित्र निकाल कर
तुम सबको याद कर कर ताउम्र कलपती रहूं
तुम्हारी बरसी-श्रा’द्ध मनाती रहूं

अब मैं क्या करूं
विधवाओं की डबडब आंखें
दुख से कातर चेहरे
और चेहरों पर काली झाइ यां देखकर
मेरा दिल दिमाग जलता है
और ईष्वर को शाप देता है
देता है शाप कि तूने मुझे मिला या ही क्यों
मेरी सखियां-सुख-साथ-प्रेम के
सब रंगों का कोलाज बन जाने के
सुखद पलों का इतना बड़ा खजाना देकर
जिंदगी के अधबीच ही डोर तोड़ डाली।

मित्र, परिजनों मैं जानती हूं
तुम सब मेरे सपनों में आओगे
मेरी अंतरंग आत्मा से बतियाओगे
मैं तुम्हारी रचनाएं बार बार पढ़ूंगी
तुम्हें जीवित कर तुम्हारा
साक्षात साथ पाने के लिए
जैसे कोई रोज पूजा-अर्चना करता है
स्मृति दीप जलाना है
सुबह उठकर नित्य नियम की तरह

जिन संबंधों-साथ-मित्रताओं की
जड़ें होती हैं बरगद-सी
उनका उत्तान उनके जाने के बाद भी
आसमान के सितारों से जुड़ जाता है

ओ दिवंगतों एक बार लौट आओ
अब अगर कोई जवान मौत हुई
खिला फूल मसला गया
मैं अपनी तेज गरम गरम नेजों सी आंखें
ईश्‍वर की घात भरी नजर से लड़ाउंगी
ईश्‍वर मैं तुम्हारी हत्या कर दूंगी

अशोक शास्त्री की स्मृति में मैं
‘भूमिका’ से एक पौधा ले आई हूं
जो अब पनप गया है मेरी बगिया में
इस तरह ही सही
तुम मेरे निकट सदा रहोगे।
(जयपुर से प्रकाशित 'डेली न्यूज़' के रविवारीय 'हम लोग' में प्रकाशित.)

Sunday, 15 February 2009

झरोखों से झांकता इतिहास




जैसलमेर एक ऐसा ऐतिहासिक शहर है, जिसका इतिहास और स्थापत्य सदा से ही रचनाकारों को आकर्षित करता आया है। यहां की रूठी रानी को लेकर मुंशी प्रेमचंद ने अपनी प्रसिद्ध कहानी लिखी। आचार्य चतुरसेन ने ‘राजकुमारी रत्नावली की कहानी’ लिखी तो हरिकृष्ण प्रेमी ने ‘मित्र’ नाटक लिखा। महान फिल्मकार-साहित्यकार सत्यजित राय ने जैसलमेर को केंद्र में रखकर ‘सोनार किला’ उपन्यास लिखा। इसी नगर के बाशिंदे और राजस्थान के अत्यंत महत्वपूर्ण कथाकार ओमप्रकाश भाटिया ने पांच वर्ष के गहन शोध एवं अनुसंधान के बाद सन् 2002 में ‘दीवान सालम सिंह’ उपन्यास लिखा, जो दुर्भाग्य से हिंदी साह्रित्य जगत में लगभग उपेक्षित और अलक्षित ही रहा। इतिहास को गल्प में ढालना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है और इसमें सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि लेखक अपने समय के परिप्रेक्ष्य में इतिहास को किस प्रकार देखता है। क्या इतिहास के एक विशेष कालखण्ड से पाठक को आज भी कुछ नया मिलता है? अथवा सिर्फ इतिहास की एक झलक ही देखने को मिलती है? कहना न होगा कि ओमप्रकाश भाटिया का उपन्यास इन सवालों के मुकम्मिल जवाब भी देता है और उनसे टकराते हुए आज के जालियों और झरोखों से इतिहास को एक युगीन दृष्टि से देखता है।
इतिहास में कई अवसरों पर देखा गया है कि राजा से महत्वपूर्ण उसके दरबारी या मंत्री अथवा कोई और सामान्य व्यक्ति भी हो जाते हैं। जैसलमेर के इतिहास में भी दीवान सालमसिंह अपने राजा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण चरित्र रहा है। वह राज्य का ऐसा दीवान था, जिसने राजा न होते हुए भी सत्ता का निरंकुश इस्तेमाल किया और अपने हाथ में सत्ता रखने के लिए आजीवन तमाम किस्म के षड़यंत्र रचे। लेकिन सालमसिंह ने ग्यारह बरस की उम्र में देखा था कि उसके पिता दीवान स्वरूप सिंह का दिन दहाड़े जैसलमेर के दरबार में युवराज रायसिंह ने सर कलम कर दिया था। बालक मन पर यह दृश्य इस तरह अंकित हो गया कि इसकी परिणति आगे चलकर हिंसक, विलासी और षड़यंत्रकारी दीवान सालमसिंह में हुई। दीवान सालमसिंह का काल सन् 1773 से 1824 के मध्य रहा और यह काल भारतीय इतिहास में राजाओं की आपसी लड़ाई और सामंतशाही के पतन का आरंभिक काल भी है। इसी काल में भारत के विभिन्न राजा ईस्ट इंडिया कंपनी से समझौते कर अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार कर रहे थे। उस समय के राजपूताना में मराठों के आक्रमण हो रहे थे और इन हमलों से बचने का एकमात्र उपाय अंग्रेजों से संधि करना ही रह गया था। ऐसे समय में ही दीवान सालमसिंह जैसे चरित्र राजा से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं और सत्ता पर अपनी पकड़ स्थापित कर लेते हैं।
दीवान सालमसिंह को जैसलमेर की परंपरा के अनुसार विरासत में दीवानी मिली और उसने अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेते हुए उसने पहले एक-एक कर पूरे राजपरिवार को खत्म किया और नाम मात्र के राजपरिवार के बहाने जैसलमेर की संपूर्ण राजसत्ता पर अपना दबदबा कायम किया। दीवान सालमसिंह एक ऐसा ऐतिहासिक चरित्र है, जिसमें तत्कालीन राजशाही और सामंती शासन के तमाम दुर्गुणों को एक साथ देखा जा सकता है। उसे सिर्फ अपने पिता की हत्या के प्रतिशोध से ही शांति नहीं मिलती, बल्कि वह तो पूरी सत्ता अपने हाथ में लेकर अपनी मनमर्जी से राज चलाता है। उसे जहां कहीं कोई सुंदर स्त्री, युवती या बालिका भी दिख जाये तो वह हर कीमत पर उसे हासिल करना चाहता है। इसके लिए वह उस परंपरा को भी बदलवा देता है, जिसमें एक माहेश्वरी जाति का दीवान एक से अधिक विवाह नहीं कर सकता। ताकत और पैसे के जोर पर सब कुछ बदला जा सकता है और दीवान सालमसिंह यही करता है। ओम प्रकाश भाटिया के इस उपन्यास से ही हमें पहली बार एक कथा के रूप में यह जानकारी मिलती है कि कैसे जैलमेर का ऐतिहासिक कुलधरा नामक गांव एक ही रात में खाली हो गया था।
दरअसल हुआ यह था कि दीवान सालमसिंह को पालीवाल ब्राह्मणों की एक किशोरी बेहद भा गई थी और वह उससे शादी करने पर आमादा था। पालीवालों ने पचास बरस के दीवान से चौदह बरस की लड़की का विवाह करने से इन्कार कर दिया। इससे क्रुद्ध दीवान ने पूरी पालीवाल बिरादरी पर पांच सौ रूपये प्रति घर 'कर' लगा दिया। पालीवालों को जैसलमेर राज्य की तरफ से पांच सौ बरस से यह छूट मिली हुई थी कि उनसे कभी कर या लगान नहीं लिया जायेगा। दीवान के फैसले से नाराज पालीवालों ने दीवान के आगे घुटने टेकने से मना कर दिया और एक सामूहिक फैसला लिया कि एक वे एक रात में गांव खाली कर देंगे और फिर कभी लौटकर जैसलमेर राज्य की सीमा में नहीं आयेंगे। ऐसे ही एक पालीवाल परिवार का एक वंशज सन् 2005 में मुझे कराची में मिला था, जिसने बताया था कि उनका परिवार कई पीढ़ियों पहले जैसलमेर के किसी गांव से यहां आ गया था और वापस जैसलमेर की तरफ लौटकर न जाने के प्रण के कारण विभाजन के बाद भी वहीं रह गया। ओम प्रकाश भाटिया का उपन्यास निश्चित रूप से इतिहास नहीं, इतिहास का साहित्यिक प्रतिफलन है। लेकिन इसमें ऐतिहासिक तथ्यों, किंवदंतियों और लोक गीतों के साथ लोक कथाओं का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है, जिससे उपन्यास की घटनाओं को एक किस्म की विश्वसनीयता मिलती है और तथ्यों की पुष्टि होती है। आज भी जैसलमेर में खड़ी सालमसिंह की हवेली उसकी चरम विलासिता का जीता जागता प्रमाण प्रस्तुत करती है। आजीवन दूसरों के लिए षड़यंत्र रचने वाले दीवान सालमसिंह का अंत उसी की कामुकता की शिकार सातवीं पत्नी के हाथों जहर दिये जाने से होता है।