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Sunday, 20 September 2009

एक महाद्वीप को साहित्‍य में सिर्फ एक नोबल पुरस्‍कार


नोबल पुरस्‍कार के इतिहास में संभवत: यह एक मात्र उदाहरण है जिसमें एक महाद्वीप को एक ही बार पुरस्‍कार मिला। यह अद्भुत संयोग हुआ ऑस्‍ट्रेलिया के साथ। यूं ऑस्‍ट्रेलियाई साहित्‍य अंग्रेजी में होने के कारण पूरी दुनिया में पढा और सराहा जाता है किंतु 1973 में जब पैट्रिक व्‍हाइट को नोबल पुरस्‍कार मिला तब दुनिया का ध्‍यान इस विशाल महाद्वीप के साहित्‍य की ओर गया। पैट्रिक व्‍हाइट को महाकाव्‍यात्‍मक और मनोवैज्ञानिक विवरणों के अद्भुत उपन्‍यासकार के रूप में जाना जाता है। 28 मई, 1912 को लंदन में व्‍हाइट का जन्‍म हुआ और जब वो छह महीने के थे, पिता परिवार सहित ऑस्‍ट्रेलिया चले आए। व्‍हाइट का बचपन पिता की इस सनक और समझ के चलते बहुत मुश्किलों में बीता कि इस लड़के को लेखक या कलाकार के बजाय किसान बनना चाहिए। बचपन से ही अस्‍थमा के रोगी बालक को दस बरस की उम्र में पढने के लिए एक बोर्डिंग स्‍कूल में भेज दिया गया। उस स्‍कूल के बंद होने की नौबत आई तो प्रधानाध्‍यापक की सलाह पर व्‍हाइट को इंग्‍लैंड भेज दिया गया। अपने रोग के कारण व्‍हाइट ने बचपन से ही एकाकी स्‍वभाव अपना लिया और स्‍कूल में भी अपनी काल्‍पनिक दुनिया में मगन रहने लगे।
इंग्‍लैंड में व्‍हाइट ने एक छोटी सी मित्र मण्‍डली बना ली थी, जिसमें वो अक्‍सर थियेटर जाते और घूमने निकल पड़ते। छुट्टियों में माता-पिता के साथ वो यूरोप और अमेरिका घूमने जाते। लेकिन परिवार से पैट्रिक की भावनात्‍मक दूरी वैसी ही बनी रही। अपने चार साल के इंग्‍लैंड प्रवास को पैट्रिक व्‍हाइट ‘कैद’ कहते थे। व्‍हाइट अभिनेता बनना चाहते थे और जब उन्‍होंने माता-पिता को अपनी इच्‍छा बताई तो उन्‍होंने पहले ऑस्‍ट्रलिया आने के लिए कहा।
लौटने पर पिता ने बजाय कलाकार बनाने के व्‍हाइट को एक जानवरों के एक फार्महाउस पर पशुपालक का काम करने भेज दिया, जहां उसका मन काम से अधिक लिखने और अपनी कल्‍पना की दुनिया में ज्‍यादा लगता था। यहां आकर स्‍वास्‍थ्‍य खुली आबोहवा में सुधरने लगा तो अपने बंद कमरे में व्‍हाइट ने कई कहानियां, उपन्‍यास, नाटक और कविताएं लिख डालीं। व्‍हाइट ने छद्म नाम से एक कविता बड़े अखबार में भेजी जो प्रकाशित भी हुई।
1932 में व्‍हाइट फिर से इंग्‍लैंड चले गए, जहां केंब्रिज चार साल तक फ्रेंच और जर्मन साहित्‍य का अध्‍ययन किया। इस बार व्‍हाइट ने लंदन में अपने लिखे नाटकों के मंचन करवाने और रचनाएं प्रकाशित करवाने की कोशिशें कीं। कुछ कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं, लेकिन नाटक को लेकर व्‍हाइट को इंतजार करना पड़ा। इन्‍हीं दिनों पहला काव्‍य संग्रह ‘द प्‍लौमैन एण्‍ड अदर पोएम्‍स‘ प्रकाशित हुआ और एक नाटक शौकिया कलाकारों के समूह ने मंचित किया। प्रकाशन से जो उत्‍साह मिला उसके चलते व्‍हाइट ने लगातार लिखना जारी रखा और पुराने उपन्‍यास ‘हैप्‍पी वैली’ को फिर से लिखा। इस उपन्‍यास में पशुपालक के तौर पर देखे गए जीवनानुभवों को उन्‍होंने बहुत खूबसूरती से चित्रित किया। यह उपन्‍यास प्रकाशित हुआ तो इंग्‍लैंड के समीक्षकों ने सराहा, लेकिन ऑस्‍ट्रेलिया में किसी ने इस पर ध्‍यान नहीं दिया। 1937 में पिता की मृत्‍यु हो गई और वे पुत्र के लिए अच्‍छी खासी रकम छोड़कर गए, जिससे वो पूरी तरह लेखन के लिए समर्पित हो सकते थे।
द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद कुछ वक्‍त वो अमेरिका रहे और वापस लौटकर ऑस्‍ट्रेलिया आ गए, जहां सिडनी के पास एक कस्‍बे में रहने लगे। यहां आने के बाद उन्‍होंने अपना पहला महत्‍वपूर्ण उपन्‍यास लिखा ‘द आन्‍ट्स स्‍टोरी’। इस उपन्‍यास में व्‍हाइट ने एक अविवाहित ऑस्‍ट्रेलियाई महिला का संघर्षमय जीवन दिखाया जो ऑस्‍ट्रेलिया और ब्रिटेन की दो संस्‍कृतियों के द्वंद्व में फंसी है। वह अपनी मां की मृत्‍यु के बाद यूरोप और अमेरिका की यात्रा पर जाती है और अकेलेपन के चलते मानसिक रूप से विक्षिप्‍तता की हद तक पहुंच जाती है। उसके एकाकीपन को व्‍हाइट ने बहुत संवेदनशील तरीके से पाठकों तक पहुंचाया। यह व्‍हाइट का प्रिय उपन्‍यास भी रहा। आलोचकों ने प्रारंभ में इसे नहीं सराहा, लेकिन पुनर्प्रकाशन के बाद इसे जबर्दस्‍त लोकप्रियता हासिल हुई। 1955 में व्‍हाइट ने अपने जीवन का सबसे महत्‍वपूर्ण उपन्‍यास लिखा ‘द ट्री ऑफ मैन’। इसके बारे में खुद व्‍हाइट ने लिखा कि सिडनी के पास रहने के दौरान शहरी-कस्‍बाई उबाउ जिंदगी के भीतर से मुझे किसी कविता का संगीत सुनाई दिया और उपन्‍यास का जन्‍म हुआ। इस उपन्‍यास में व्‍हाइट ने पार्कर परिवार की नाटकीय जिंदगी का वर्णन किया है जिसमें ऑस्‍ट्रेलिया के लोकसंगीत, लोक परंपराओं और मिथकों को कहानी में बहुत खूबसूरती के साथ पिरोया गया है। इस उपन्‍यास को भी पहले खारिज कर दिया गया और बाद में इसका महत्‍व स्‍वीकारा गया।
ऑस्‍ट्रेलिया में उनके जिस उपन्‍यास को सबसे ज्‍यादा पसंद किया गया वो था ‘वॉस’, जो 1957 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्‍यास के प्रारंभ में 1845 में एक सनकी जर्मन खोजकर्ता वॉस यहां की एक अनाथ लड़की लॉरा से मिलता है और दोनों में प्रेम हो जाता है। वॉस पूरे महाद्वीप को पैदल पार कर अंतहीन विस्‍मयों से साक्षात करना चाहता है। उपन्‍यास में वॉस की ऑस्‍ट्रेलिया महाद्वीप की यात्रा का रोमांचक वर्णन है। दो दलों में बंटकर यह खोजी अभियान दल करीब बीस साल तक ऑस्‍ट्रेलिया के सुदूर इलाकों की यात्रा करता है और एक-एक कर सब लोग मारे जाते हैं। वॉस और लॉरा दैवीय शक्तियों से एक दूसरे से संवाद करते रहते हैं और कहानी में दोनों पात्रों का जीवन क्रम चलता रहता है। आदम और हव्‍वा की कहानी को व्‍हाइट ने कई स्‍तरों पर रचते हुए एक अद्भुत उपन्‍यास की रचना की है। इस उपन्‍यास को पहला माइल्‍स फ्रेंकलिन लिटरेरी अवार्ड दिया गया। 1961 में व्‍हाइट का एक और महत्‍वपूर्ण उपन्‍यास आया ‘राइडर्स इन द चेरियट’। इसमें व्‍हाइट ने 1950 के दशक में एक काल्‍पनिक ऑस्‍ट्रेलियाई कस्‍बे सरसापारिल्‍ला के रहन-सहन का चार लोगों के माध्‍यम से वर्णन किया है। रहस्‍यवाद, आध्‍यात्मिकता और कस्‍बाई सांस्‍कृतिक जीवन का यह शानदार मिश्रण है।
1970 में व्‍हाइट का आठवां उपन्‍यास प्रकाशित हुआ ‘द विविसेक्‍टर’। इसमें एक काल्‍पनिक चित्रकार की जिंदगी की यादों का खजाना है। कैसे एक गरीब परिवार में पैदा हुआ बालक महलों में जा पहुंचता है और जिंदगी भर कला में सत्‍य की खोज करता हुआ ईश्‍वर के लिए अपनी नायाब कृति रचता है। 1973 में पैट्रिक व्‍हाइट की एक और कृति आई ‘द आई ऑफ द स्‍टॉर्म’। इस उपन्‍यास के बाद व्‍हाइट को नोबल पुरस्‍कार प्रदान किया गया। अपनी एकांतप्रियता की वजह से व्‍हाइट नहीं गए और अपने मित्र को पुरस्‍कार ग्रहण करने के लिए भेजा। समारोह में इस उपन्‍यास की चर्चा करते हुए कहा गया कि व्‍हाइट थोड़े मुश्किल लेखक हैं । यह बात सही भी है तो सिर्फ इसलिए ही नहीं कि वे एक अलग तरह की जटिल और सांकेतिक महाकाव्‍यात्‍मक भाषा का प्रयोग करते हैं, बल्कि इसलिए भी कि उनके विचार और उनके उपन्‍यासों में प्रस्‍तुत समस्‍याएं भी बिल्‍कुल अलग किस्‍म की हैं, जिन पर एकबारगी लोगों का ध्‍यान नहीं जाता। पैट्रिक व्‍हाइट ने ज्‍यादा नहीं कुल एक दर्जन उपन्‍यास लिखे, लेकिन उनकी कल्‍पनाशीलता इन दर्जन भर उपन्‍यासों में आश्‍चर्यचकित कर देती है। नोबल पुरस्‍कार मिलने के बाद उन्‍होंने तीन उपन्‍यास और लिखे। ‘ए फ्रिंज ऑफ लीव्‍ज़’ में एक महिला के दुख भरे दुर्दिनों की कथा है, जो जहाज डूबने से आदिवासियों के बीच पहुंच जाती है। ‘द ट्वायबॉर्न अफेयर’ में ऑस्‍ट्रेलिया, फ्रांस और ब्रिटेन में प्रथम विश्‍व युद्ध से दूसरे विश्‍व युद्ध तक अपनी अस्मिता और पहचान तलाशते व्‍यक्ति की दास्‍तान बयां होती है। ‘मेमोयर्स ऑफ मैनी इन वन’ की पाण्‍डुपलपि व्‍हाइट ने दक्षिणी ऑस्‍ट्रेलिया में साक्षरता के प्रसार के लिए दान कर दी थी, जिसे बाद में प्रकाशित किया गया।
अपने विशाल घर के एकांतवास में व्‍हाइट ने कविता-कहानियों के दो-दो संग्रह और सात नाटक भी लिखे। उनकी आत्‍मकथा ‘फ्लाज़ इन द ग्‍लास’ 1986 में प्रकाशित हुई। पैट्रिक व्‍हाइट के लेखन का मूल केंद्र है अस्मिता की तलाश। ब्रिटेन में पैदा होकर ऑस्‍ट्रेलियाई होने का द्वंद्व उनकी रचनाओं में निरंतर झलकता है। द्वितीय विश्‍व युद्ध में उन्‍हें जबर्दस्‍ती कई देशों में भेजा गया और इस दौरान उन्‍होंने युद्ध की निरर्थकता को निकट से देखा-भोगा। जीवन में जहां कहीं वो गए उसे किसी ना किसी प्रकार से अपनी रचना में इस्‍तेमाल किया।
लेखक की निजता के वे जबर्दस्‍त पक्षधर थे और आम लोगों या पाठकों-आलोचकों से मिलना उन्‍हें बिल्‍कुल पसंद नहीं था। आलोचकों से वे चिढते थे और उन्‍हें अपनी पाण्‍डुलिपि दिखाना भी पसंद नहीं करते थे। बाद के वर्षों में वे बहुत मुखर हो गए थे और ऑस्‍ट्रेलियाई मूल निवासियों के अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण, परमाणु निशस्‍त्रीकरण, समलैंगिकों के अधिकारों आदि विविध विषयों पर खुलकर बोलने लगे थे। एक बार उन्‍हें सुनने के लिए तीस हजार लोग इकट्ठा हुए थे। लेकिन एकांत उन्‍हें इतना पसंद था कि लंबी बीमारी के बाद जब 30 सितंबर, 1990 को उनका निधन हुआ तो इसकी खबर भी लोगों को उनके अंतिम संस्‍कार के बाद मिली।
मूलभूत तथ्‍य

जन्‍म 28 मई, 1912
सम्‍मान पुरस्‍कार
दो बार माइल्‍स फ्रेंकलिन अवार्ड
ऑस्‍ट्रेलियन ऑफ द ईयर अवार्ड
नोबल पुरस्‍कार
प्रमुख उपन्‍यास
हैप्‍पी वैली, द आन्‍ट्स स्‍टोरी, द ट्री ऑफ मैन, वॉस, राइडर्स इन द चेरियट, द विविसेक्‍टर, द आई ऑफ द स्‍टॉर्म, द ट्वायबॉर्न अफेयर और फ्लाज़ इन द ग्‍लास।
निधन - 30 सितंबर, 1990

Sunday, 6 September 2009

अपनी जनता का लेखक : फ्रांस ईमिल सिल्लान्पा


विश्‍वसाहित्‍य में भारतीय भाषाओं जैसी कई भाषाएं हैं जिन्‍हें या तो कभी नोबल पुरस्‍कार नहीं मिला अथवा एक ही बार मिला है। ऐसी ही एक भाषा है उत्‍तरी यूरोपीय देश फिनलैंड की सुओमी भाषा, जिसे सामान्‍य तौर पर फिनिश कहा जाता है। यूरेलिक भाषा परिवार की इस भाषा का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, लेकिन इसका साहित्‍य इतना समृद्ध है कि इसमें लिखे उपन्‍यासों का दुनिया की तमाम भाषाओं में अनुवाद ही नहीं होता, बल्कि हॉलीवुड में उस पर फिल्‍में भी बनती हैं। दुर्भाग्‍य से हिंदी में सुओमी भाषा की अब तक मेरी जानकारी में सिर्फ दो पुस्‍तकें आई हैं, जिनमें एक फिनलैंड का राष्‍ट्रीय महाकाव्‍य ‘कालेवाला’ है, जिसमें प्राचीन फिनिश लोक कविताओं को एलियास लोनरो ने पंद्रह साल की मेहनत के बाद संग्रहित किया था। हिंदी में इसका अनुवाद प्रसिद्ध कवि विष्‍णु खरे ने किया और दूसरी किताब माइका वाल्‍तारी का प्रसिद्ध उपन्‍यास ‘द इजिप्शियन’ है, जिसका ‘वे देवता मर गए’ नाम से अनुवाद प्रकाशित हुआ। सुओमी भाषा को वैश्विक स्‍तर पर पर पहली बार तब जाना गया, जब 1939 में फ्रांस ईमिल सिल्‍लान्‍पा को नोबल पुरस्‍कार प्रदान किया गया। सिल्‍लान्‍पा के लिहाज से यह पुरस्‍कार भी उनके चमत्‍कारिक जीवन की तरह एक चमत्‍कार ही था। इस वर्ष नोबल पुरस्‍कार की दौड़ में उनके साथ ‘सिद्धार्थ’ के रचयिता प्रसिद्ध जर्मन लेखक हरमन हेस भी थे, जिन्‍हें 1946 में नोबल पुरस्‍कार मिला। सिल्‍लान्‍पा के महत्‍व का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि मंगल और गुरू के बीच की परिधि में भ्रमण करने वाले क्षुद्र ग्रह ‘1446 सिल्‍लान्‍पा’ को 1938 में उन्‍हीं के देशवासी खगोलविद यरजो वाइसाला द्वारा खोजा गया और सिल्‍लान्‍पा के नाम पर उसका नामकरण किया गया।

सिल्‍लान्‍पा का जन्‍म 16 सितंबर, 1888 को एक बेहद गरीब परिवार में हुआ। पिता दिहाड़ी मजदूर थे और मां नौकरानी। गरीबी की हालत यह थी कि फिनलैंड के भयानक सर्दी वाले वातावरण में पाला पड़ने से उनकी मामूली फसलें, बीज और पालतू पशु ही नहीं कई बच्‍चे भी मारे गए और कुदरत के चमत्‍कार से सिर्फ सिल्‍लान्‍पा ही बच पाए। बालक सिल्‍लान्‍पा को एक घुमंतू स्‍कूल मिला, जिसमें प्रारंभिक शिक्षा हुई। पढाई में होशियार सिल्‍लान्‍पा को जल्‍दी ही एक नियमित विद्यालय मिल गया और गाड़ी चल पड़ी। अच्‍छी शिक्षा के लिए लोगों ने बालक को बाहर भेजने की सलाह दी और माता-पिता ने पेट काटकर बेटे को पढने के लिए शहर भेजा। सिल्‍लान्‍पा ने अच्‍छे अंकों से 1908 में मैट्रिक पास की और किसी दयालु आदमी की दरियादिली के चलते हेलसिंकी विश्‍वविद्यालय में जीव- विज्ञान की पढाई शुरू कर दी। विश्‍वविद्यालय में दत्‍तचित्‍त होकर पढाई में जुटे सिल्‍लान्‍पा को लेखक, कलाकर और बुद्धिजीवी दोस्‍तों की सोहबत मिली और वे पाठ्यक्रम के अलावा भी दूसरी किताबें पढ़ने लगे। पांच साल बाद सिल्‍लान्‍पा को पता चलता है कि अभी परीक्षाएं दूर हैं और दानदाता अब सहायता करने में बिल्‍कुल असमर्थ है। बची-खुची रकम लेकर सिल्‍लान्‍पा गांव लौटे तो देखा मां-बाप पहले से भी बुरे हालात में दिन काट रहे हैं। बेटा अब मां-बाप के साथ रहने लगा और कुछ मदद करने की सोचने लगा।
मां-बाप के कामकाज में हाथ बंटाते हुए सिल्‍लान्‍पा ने एक दिन पड़ौस के गांव से लिखने के लिए कागज-लिफाफे खरीदे और छद्मनाम से एक कहानी लिखकर नजदीकी शहर के एक बड़े अखबार को भेज दी। चमत्‍कार की तरह कहानी अखबार के मुखपृष्‍ठ पर छपी और मेहनताना अलग मिला। उस अखबार में छद्मनाम से लिखने का सिलसिला चल पड़ा और एक नए प्रतिभाशाली लेखक की चर्चा आम हो गई, बस उसे ढूंढ़ने भर की देर थी। जल्‍द ही लोगों ने युवा लेखक सिल्‍लान्‍पा को ढूंढ़ निकाला। एक प्रकाशक ने आगे आकर अग्रिम राशि देकर सिल्‍लान्‍पा को एक किताब लिखने के लिए अनुबंधित कर लिया। ऐसे ही चमत्‍कारों से भरे सिल्‍लान्‍पा के जीवन में 1914 में एक गांव में एक नृत्‍य के दौरान एक लड़की सीग्रिड मारिया मिलती है, जो नौकरानी का काम करती है। मारिया और सिल्‍लान्‍पा के बीच प्रेम होता है और 1916 में दोनों विवाह कर लेते हैं। पच्‍चीस वर्षों के सफल वैवाहिक जीवन में मारिया आठ बच्‍चों की मां बनती है।
1914 में एक अखबार के लिए लेख लिखने के लिए वे स्‍वीडन और डेनमार्क की यात्रा पर निकल पड़ते हैं और पत्रकार बनने की सोच लेते हैं। लेकिन लेखन और पत्रकारिता की कशमकश में वे 1916 में अपना पहला उपन्‍यास ‘लाइफ एण्‍ड सन’ लिख डालते हैं। युद्ध की आशंका के मंडराते बादलों भरे दिनों में एक युवक और दो युवतियों के प्रेम त्रिकोण को बयान करने वाले इस उपन्‍यास को जनता में लोकप्रियता और आलोचकों की प्रशंसा दोनों हासिल हुईं। इसी बीच देश में गृहयुद्ध छिड़ गया, जिसमें सिल्‍लान्‍पा ने जनरल मैनरहाइम का समर्थन किया, जो जर्मन श्‍वेत सेना के साथ था। गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद सिल्‍लान्‍पा को लगा कि इस युद्ध से आखिरकार क्‍या हासिल हुआ, सिवाय हजारों लोगों के रक्‍तपात के? युद्ध के बाद सिल्‍लान्‍पा ने युद्ध के कारण अनाथ हुए बच्‍चों के कल्‍याण के लिए काम करना शुरू कर दिया। इसके साथ वे निरंतर कहानियां लिखते रहे। 1923 में गांव में मकान बनाने की वजह से लेखक कर्जों के बोझ में दब गया और आत्‍महत्‍या की सोचने लगा। उसके प्रकाशक ने लिपिक की नौकरी देने का प्रस्‍ताव रखा, लेकिन स्‍वाभिमानी लेखक नहीं माना। चार बच्‍चों के परिवार को लेकर यह महान लेखक हेलसिंकी आकर रहने लगा। और दस साल बाद फिर से उपन्‍यास लिखना शुरू किया। 1931 में ‘मैड सिल्‍जा’ उपन्‍यास का अंग्रेजी में अनुवाद हुआ तो उनकी ख्‍याति रातों-रात अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर फैल गई। एक किसान युवती के संघर्ष की इस महागाथा को पढ़कर अनेक आलोचकों ने सिल्‍लान्‍पा को नोबल पुरस्‍कार का हकदार बताया। 1932 में ‘द वे ऑफ ए मैन’ में सिल्‍लान्‍पा ने एक आदर्श किसान युवक का खूबसूरत चित्रण किया, जिसे जर्मनी में युवक की शराबनोशी की वजह से प्रतिबंधित कर दिया गया, क्‍योंकि कोई आर्य किसान शराब पिये यह नाजी सरकार को गवारा नहीं था। 1934 में ‘पीपुल इन द समर नाइट’ के रूप में उनका सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण उपन्‍यास आया, जिसमें एक अंचल विशेष में रहने वाले समुदाय का जीवन दर्शाया गया था। 1936 में हेलसिंकी विश्‍वविद्यालय ने सिल्‍लान्‍पा को मानद डॉक्‍टरेट की उपाधि प्रदान की।
1939 में विश्‍वयुद्ध का खतरा दिखने लगा तो यह संवेदनशील लेखक बेहद विचलित हुआ और अपने आपको रोक नहीं पाया। परिणामस्‍वरूप किताब आई ‘क्रिसमस लैटर टू डिक्‍टेटर्स’। इसमें हिटलर, मुसोलिनी जैसे तत्‍कालीन तानाशाहों की जबर्दस्‍त आलोचना की गई थी। इसी साल सिल्‍लान्‍पा की कहानियों का स्‍वीडिश भाषा में अनुवाद हुआ तो नोबल पुरस्‍कार समिति ने उनके नाम पर गंभीरता से विचार किया। नोबल पुरस्‍कार की घोषणा से कुछ माह पहले पत्‍नी मारिया की मृत्‍यु हो जाती है। विषाद में डूबे सिल्‍लान्‍पा अपनी सचिव अन्‍ना मारिया से विवाह करते हैं, यह शादी ज्‍यादा नहीं चल पाती है।
युद्ध के दिनों वे ज्‍यादातर स्‍वीडन में ही रहे। 1940 में गंभीर बीमारी के चलते वे अस्‍पताल में भर्ती हुए और तीन साल तक उनका इलाज चला। इस बीच उनकी दो पुस्‍तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें बीते दिनों और खोए हुए आदर्शों को लेकर एक लेखक का अतीत प्रेम प्रकट होता है। विश्‍वयुद्ध समाप्‍त होने पर वे स्‍वदेश लौटते हैं और रेडियो से जुड़ जाते हैं, जहां वे श्रोताओं से अपनी जिंदगी के अनुभव बांटते हैं। 1944 में ‘अगस्‍त‘ और 1945 में ‘द लवलीनैस एण्‍ड रेचेडनैस ऑफ द ह्युमन लाइफ’ उपन्‍यास प्रकाशित होते हैं। रेडियो पर सुनाए गए अनुभवों को लेकर वे अपनी आत्‍मकथा लिखते हैं, जो 1953 में ‘द ब्‍वॉय लिव्‍ड हिज़ लाइफ’ के रूप में सामने आती है। 1956 में राजनीति और समाज पर लिखे गए उनके लेखों का संग्रह ‘डे एट इट्स हाइएस्‍ट’ प्रकाशित हुआ। इस महान लेखक ने अपने समृद्ध रचनात्‍मक जीवन में 3 जून, 1964 को हेलसिंकी में अंतिम सांस ली। विश्‍व साहित्‍य में सिल्‍लान्‍पा को अपने देश की जनता और प्रकृति से प्रेम करने वाले और लेखन में प्रकट करने वाले अद्भुत और महान लेखक के रूप में जाना जाता है। उनके उपन्‍यास ‘मैड सिल्‍जा‘ पर तीन बार लोकप्रिय फिल्‍में बनीं और अनेक कहानियों और उपन्‍यासों पर ढेरों फिल्‍में बनी हैं।