Monday, 20 July, 2009

पहला नोबल विजेता कवि स्युली प्रूदोम


जब अल्‍फ्रेड नोबल ने प्रकृति के अध्‍ययन और इससे वाबस्‍ता ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में नई खोजों को सम्‍मानित करने के लिए नोबल पुरस्‍कार की परिकल्‍पना की थी तो उसमें साहित्‍य को भी शामिल किया था। इसके पीछे उनकी सोच यह थी कि विभिन्‍न देशों के बीच शांति और भ्रातृत्‍व बढाने के मूल उद्देश्‍य को साहित्‍य भी वैसे ही पूरा करता है जैसे अन्‍य अनुशासन। साहित्‍य में पहला नोबेल पुरस्‍कार फ्रांस के महान कवि स्‍युली प्रूदोम को 10 दिसंबर, 1901 को प्रदान किया गया था। स्‍युली प्रूदोम, जिन्‍हें भारत में प्राय: प्रूदों लिखा जाता है, अपने काल में विश्‍व साहित्‍य के सबसे प्रखर चिंतक कवियों में थे। 16 मार्च, 1839 को जन्‍मे प्रूदोम ने पहले विज्ञान, फिर कानून की शिक्षा प्राप्‍त की और अंतत: कविता की ओर उन्‍मुख हुए। विज्ञान की पढाई के दौरान उन्‍हें आंखों की एक भयानक बीमारी हो गई थी, जिसने उनकी पूरी जिंदगी ही बदल डाली और वे अंतर्मुखी हो गए। एक वैज्ञानिक की मानसिकता और कानून की पेचीदगियां उनके अंतर्मन को व्‍यथित करती रहती थीं, एक अकेलापन और निरपेक्ष उदासी प्रूदोम को विज्ञान के रहस्‍यों और प्राणि जगत के साथ-साथ समूचे ब्रहमांड के अंर्तसंबंधों को लेकर सोचने के लिए विवश करती थी, जिससे वे कविता लिखने के लिए प्रेरित होते थे।
विश्‍व साहित्‍य में प्रूदोम जैसी मानसिक बनावट वाले कवि बहुत हुए हैं, लेकिन प्रूदोम उन दुर्लभ कवियों में हैं, जो ना तो चिंतन कर कविता लिखते हैं और ना ही कविता में चिंतन करते हैं, अपितु उनके काव्‍य में मनुष्‍य की आत्‍मा की गहराइयां, प्रकृति के रहस्‍य, मनुष्‍य की नियति और उसके होने की अर्थवत्‍ता एक वैज्ञानिक दृष्टि के साथ प्रस्‍तुत होती हैं। उनकी कविता से पाठक को एक रहस्‍यमयी जगत के बीच चलने वाले मनुष्‍य के क्रिया व्‍यापार को गहराई से देखने-समझने की एक नई दृष्टि मिलती है। वे मूलत: विज्ञान, दर्शन और आत्मिक संवदनाओं के कवि हैं। प्रूदोम फ्रेंच कविता के इतिहास की विश्‍वप्रसिद्ध धारा ‘पारनासियनवाद’ के बड़े कवियों में थे। यह उन्‍नीसवीं सदी की सकारात्‍मकतावादी काव्‍यधारा थी, जिसने रोमांटिक और बिंबवादी कविता के संधिकाल में जबर्दस्‍त हस्‍तक्षेप किया और भविष्‍य की कविता के लिए मार्ग प्रशस्‍त किया।
पारनासियन कवि कलावाद के प्रणेता गातियर से प्रभावित थे, लेकिन इन कवियों ने शापेनहावर के दर्शन से प्रभावित होकर अपनी कविता को अतिशय भावुकता से मुक्‍त करते हुए क्‍लासिकी विषयों पर कविता लिखी। प्रूदोम के साथ के दूसरे पारनासी कवियों में चार्ल्‍स लिस्‍ले, बेनविले, मलार्मे, वरलेन, कोप्‍पे और हेरेडिया प्रमुख थे। पारनासियन कविता की धारा ने अपने काल में ऐसा जबर्दस्‍त प्रभाव पैदा किया कि फ्रांस की सीमा से पार वह समूचे यूरोप और लेटिन अमेरिका में छा गई। लेटिन अमेरिकी साहित्‍य में इसी विचार ने आधुनिकतावाद को जन्‍म दिया।
स्‍युली प्रूदोम कवि के साथ एक अच्‍छे आलोचक भी थे। उनकी आलोचना की दो पुस्‍तकें प्रकाशित हुईं। 1904 में उनकी संपूर्ण कविताओं का चार खण्‍डों में प्रकाशन हुआ। पारिवारिक विवादों और अस्‍वस्‍थता के कारण उनका लेखन प्रभावित होता रहा लेकिन प्रूदोम ने अविचलित होते हुए कविता का दामन नहीं छोड़ा। सहज, सरल और गहरी संवेदनाओं के इस महान कवि का निधन 6 सितंबर, 1907 को हुआ। पाठकों के लिए यहां प्रस्‍तुत हैं प्रूदोम की दो छोटी कविताएं, जिनसे उनकी महानता का सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है।
हिंडोले
बंदरगाह के किनारे से चुपचाप आगे बढते जाते
जहाजों को उन हिंडोलों की कोई सुध नहीं
जिन्‍हें स्त्रियां झुलाती रहती हैं अपने हाथों से
लेकिन एक दिन आएगा विदाई का
जब स्त्रियां दहाड़ें मार रोएंगी
और उत्‍सुक पुरूष उन क्षितिजिों की ओर तकते रहेंगे
जो उन्‍हें लुभाते आए हैं
और उस दिन बंदरगाह से ओझल हो दूर जाते जहाजों को
सुदूर हिंडोलों की भावनाओं से यह अहसास होगा कि
पीछे कितना कुछ छूट गया है
इस दुनिया में
इस दुनिया में सारे फूल मुरझा जाते हैं
पंछियों के मीठे गीतों की उम्र कम होती है
मैं उस बसंत का स्‍वप्‍न देखता हूं
जो सदाबहार रहे
इस दुनिया में होंठ मिलते हैं लेकिन हौले-से
और माधुर्य का कोई स्‍वाद नहीं बचा रहता
मैं उस चुंबन का ख्‍वाब देखता हूं
जो हमेशा कायम रहेगा
इस दुनिया में हर शख्‍स
दोस्‍ती या प्रेम के वियोग में रो रहा है
मैं उस दुनिया का सपना देखता हूं
जिसमें सब एक साथ रहें
(राजस्थान पत्रिका के १९ जुलाई, २००९ के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित. )

3 comments:

  1. जानकारी का आभार.

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  2. मैं उस दुनिया का सपना देखता हूँ ...जहाँ सब एक साथ रहे !!
    सपना ही है ..!!

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  3. 1901 का पहला नोबेल पुरस्कार लियो टॉल्सटॉय पर वरीयता देकर सली प्रूधों को दिया गया था . आश्चर्य कि टॉल्सटॉय को पूरी दुनिया जानती है और प्रूधों को महज मुट्ठी भर लोग .

    पुरस्कारों की राजनीति पर इससे बड़ी टिप्पणी और क्या हो सकती है .

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