Monday 8 March 2010

मख्मूर साहब के बिना

उर्दू के मशहूर शाइर मख्‍मूर सईदी साहब का पिछले दिनों यानी 2 मार्च, 2010 को जयपुर में निधन हो गया। 31 दिसंबर, 1934 को टोंक में जन्‍मे मख्मूर साहब ने उर्दू शायरी में राजस्थान का परचम इस बुलंदी के साथ फहराया कि इस रेगिस्तानी सरजमीं की तमाम रंगतें उनकी शायरी में नुमायां हो गईं। टोंक के अदबी घराने से आपका शेरी सफर शुरु हुआ और हिंदुस्तान-पाकिस्तान ही नहीं दुनिया के तमाम उर्दू जुबां के मुरीद मुल्कों में अपनी सादाबयानी और दिलकश जज्बात की वजह से नई बुलंदियों पे पहुंचा। उनकी शायरी में उर्दू अदब की क्लासिकल, तरक्कीपसंद और जदीदियत तीनों दौर की शायरी के रंग मिलते हैं। मखमूर साहब हर दौर की शायरी से वाबस्ता रहे लेकिन अपने उपर किसी किस्म का ठप्पा नहीं लगने दिया और हर दौर की बेहतरीन चीजों का वे अपनी शायरी में इस्तेमाल करते हुए अपनी बात जुदा ढंग से कहते रहे। वे उस जदीदियत से दूर रहे जिसमें आम-अवाम के रंजो-गम की बात नहीं होती, लेकिन उनकी जदीद शायरी में कुदरत की खूबसूरती और इंसानियत के तमामतर रंगो-बू भी शामिल है। जब उर्दू शायरी में लोगों ने रूबाई कहना लगभग छोड़ दिया, मख्मूर साहब ने एक मरती हुई विधा को बचाने के लिए रूबाई को नई पहचान दी। वे सिर्फ ग़ज़ल के ही शायर नहीं थे, उन्होंने बड़ी तादाद में बेहतरीन नज्में भी कहीं। उर्दू आलोचना में भी उनका बड़ा योगदान है और उर्दू की साहित्यिक पत्रकारिता में भी उन्होंने नए आयाम स्थापित किए। यूं उनके हजारों शेरों में से सैंकड़ों शेर ऐसे हैं जो लंबे समय तक लोगों की जुबान पर गूंजते रहेंगे, लेकिन मुझे लगता है कि भविष्य में उनका यह शेर आज के दौर को देखते हुए हमेशा मौजूं बना रहेगा,

इतनी दीवारें उठी हैं एक घर के दरमियां
घर कहीं गुम हो गया, दीवारो दर के दरमियां।

यह बहुत दुखद है कि जब मख्मूर साहब अपनी शायरी के उरूज पे थे, जब हिंदुस्तानी उर्दू अदब ने साहित्य एकेडमी और ग़ालिब अवार्ड से उनकी शायरी का एहतराम किया, कुदरत ने उन्हें हमसे छीन लिया। पेश हैं उनकी नायाब शायरी से चुनिंदा शेर-

खेल समझा न तेरे प्यार को हम ने वरना ,
हम कोई खेल जो खेले हैं तो हारे कम हैं.

सबसे झुक कर मिलना अपनी आदत है,
कद अपना हम सबके बराबर रखते हैं.

सिर्फ एक ख्वाब था मैं अपने ज़माने के लिए,
जिस ने पाया है मुझे उस ने गंवाया है मुझे.

अपने ख्वाब पलकों से झटक दो
मुकद्दर खुश्‍क  पत्तों का है शाखों से जुदा होना

अजाब क्या है मखमूर तुम पर यूं रिसे गम है
हवाओं की तो आदत है चरागों से खफा रहना.
हमारे     बाद    की   नस्‍लें    उतारे
सुखन का कर्ज़ जो हम पर रहा है

4 comments:

  1. खेल समझा ना तेरे प्यार को हमने वर्ना
    हम जो खेल कोई खेले हैं हारे कम है ...
    क्या बात है ....मख्मूर साहब की शायरी भी ...
    सुखन का क़र्ज़ जो हम पर रहा है ....

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  2. हमारे बाद की नस्लें उतारें...
    सुख़न का कर्ज़ जो हम पर रहा है...

    स्मृति को नमन...

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  3. कहाँ कहाँ से मोती तलाश लाते हैं ???

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