Sunday, 21 March, 2010

विंदा हुए विदा...

भारतीय भाषाओं में ऐसे कवि कम ही हुए हैं, जिन्हे अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य और आम जनता के बीच खासी लोकप्रियता हासिल हो। विंदा करंदीकर ऐसे ही विरल रचनाकार थे, जिन्हें मराठी के अलावा हिंदी, अंग्रेजी और समस्त भारतीय भाषाओं में बेहद सम्मान मिला। विंदा के इस आदर की वजह है उनकी अद्भुत पठनीयता। आधुनिक भारतीय कविता में जितने प्रयोग विंदा करंदीकर ने किए, शायद ही किसी अन्य कवि ने किए हों। शब्द, शिल्प, शैली, बिंब, रूपविधान आदि तमाम चीजों को लेकर विंदा करंदीकर अत्यंत प्रयोगधर्मी होते हुए भी पाठक के लिए कभी दुर्बोध नहीं हुए, यह उनकी अद्भुत काव्यमेधा का ही कमाल है। और संभवतः इसके पीछे उनकी रचनाशीलता का वह दुर्लभ पक्ष छिपा है, जिसमें विंदा बाल कविताओं के महान रचनाकार के तौर पर सामने आते हैं। बच्चों के लिए लिखना बेहद मुश्किल होता है और विंदा इस विधा के उस्ताद थे। मानवीय संवेदनाओं से सराबोर विंदा की कविता आधुनिक भारतीय कविता की इसलिए भी अमूल्य धरोहर है कि उनकी कविता में भारतीय समाज, प्रकृति, मिथक, लोक जीवन और प्राणी जगत भी अपनी पूरी अर्थवत्ता और सौंदर्य के साथ नमूदार होता है। मात्रात्मक रूप से कम लेकिन उत्कृष्ट लेखन करने वाले विंदा करंदीकर ने कविता के अलावा आलोचना भी लिखी। उन्होंने अरस्तू के काव्यशास्त्र का मराठी में अनुवाद भी किया। विंदा करंदीकर ने मराठी के अलावा अंग्रेजी में भी कविताएं लिखीं। विंदा के विराट रचनाकार स्वरूप को ज्ञानपीठ, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, कबीर सम्मान, साहित्य अकादमी फेलोशिप, केशवसुत पुरस्कार आदि कई विशिष्ट सम्मानों से नवाजा गया। उनका निधन आधुनिक भारतीय कविता के लिए एक युग का समाप्त होना है। हिंदी में चंद्रकांत बांदिवडेकर ने उनकी अधिकांश कविताओं का अनुवाद किया है। मुझे उनकी कविता ‘झपताल’ बेहद पसंद है।

झपताल

पल्लू बाँध कर भोर जागती है...
तभी से झप. झप विचरती रहती हो
...कुर कुर करने वाले पालने में दो अंखियाँ खिलने लगती हैं 
और फिर नन्ही. नन्ही मोदक मुट्ठी से
तुम्हारे स्तनों पर आता है गलफुल्लापन,
सादा पहन कर विचरती हो 
तुम्हारे पोतने से
बूढ़ा चूल्हा फिर से एक बार लाल हो जाता है 
और उसके बाद उगता सूर्य रस्सी पर लटकाए
तीन गंडतरों को सुखाने लगता है
इसीलिए तुम उसे चाहती हो!

बीच. बीच में तुम्हारे पैरों में
मेरे सपने बिल्ली की भाँति चुलबुलाते रहते हैं 
उनकी गर्दनें चुटकी में पकड़ तुम उन्हें दूर करती हो 
फिर भी चिड़िया . कौए के नाम से खिलाये खाने में
बचा .खुचा एकाध निवाला उन्हे भी मिलता है।

तुम घर भर में चक्कर काटती रहती हो
छोटी बड़ी चीजों में तुम्हारी परछाई रेंगती रहती है
...स्वागत के लिए सुहासिनी होती हो
परोसते समय यक्षिणी 
खिलाते समय पक्षिणी
संचय करते समय संहिता
और भविष्य के लिए स्वप्नसती

गृहस्थी की दस फुटी खोली में
दिन की चौबीस मात्राएँ ठीकठाक बिठानेवाली तुम्हारी कीमिया
मुझे अभी तक समझ में नही आई।

3 comments:

  1. गृहस्वामिनी के प्रति सम्मान प्रदर्शित कविता " झपताल " बहुत अच्छी लगी ....
    विंदा करिन्दाकर जी को श्रद्धांजलि व् नमन ....

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  2. क्या क्या क़ोट करूँ?
    वाणी जी के दिए लिंक से यहाँ आया। टकसाली कविता क्या होती है, देखनी हो तो 'झपताल'।
    यह कविता उस श्लोक की एंटी थिसिस है जिसमें 'शयनेषु रम्भा..'कहा गया है। या यूँ कहें उसे और आगे बढ़ा देती है?

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