Sunday, 17 May, 2009

राजस्थानी प्रेम कहानी-जेठवा उजली


राजस्थान के लोकसाहित्य को संरक्षित, सवंर्द्धित और विकसित करने का जो काम विजयदान देथा ‘बिज्जी’ ने किया, उसी परंपरा की एक और महत्वपूर्ण रचनाकार हैं रानी लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत। बातपोशी यानी कथा कहने की जो समृद्ध परंपरा राजस्थान में रही है, उसे कलमबद्ध कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजने का महान कार्य करने वाली इस 93 वर्षीय महान लेखिका का जन्म 24 जून, 1916 को हुआ। रानी जी ने राजस्थानी और हिंदी साहित्य को न केवल लोकसाहित्य संरक्षित करके ही समृद्ध किया, अपितु अनुवाद, मौलिक लेखन और यात्रा संस्मरणों से भी हमारे साहित्य के गौरव में श्रीवृद्धि की। राजस्थान की सांस्कृतिक परंपराओं और रीतिरिवाजों पर उनकी दो अत्यंत महत्वपूर्ण किताबें हैं। रवींद्रनाथ टैगोर की बांग्ला कहानियों के अलावा आपने रूसी और विश्‍व की कई भाषाओं से कहानियों का राजस्थान में अनुवाद किया। ‘देवनारायण बगड़ावत महागाथा’ आपका ऐतिहासिक महत्व का ग्रंथ है। रानीजी के विशद रचना संसार में संरक्षित लोककथाओं में ‘जेठवा उजली’ एक अत्यंत लोकप्रिय प्रेम आख्यान है। इस पर राजस्‍थानी भाषा में एक लोकप्रिय संगीतमय फिल्‍म भी बन चुकी है। राजस्‍थान के प्रख्‍यात रंगकर्मी आर साहित्‍यकार डॉ. अर्जुनदेव चारण इस कहानी पर एक विख्‍यात नाटक भी देश भर में मंचित कर चुके हैं।
एक दिन बरड़े की पहाड़ियों में जबर्दस्त आंधी, तूफान के साथ मूसलाधार बारिश हुई। बरसात ऐसी कि इस तलहटी में अपने पशु चराने आए चारणों के परिवारों के बच्चे सहम गये और अपनी मांओं की छातियों से चिपक गए। बूढों को लगा जैसे आज ही काल आ गया। क्या औरत, क्या आदमी और क्या बच्चे सब ईश्‍वर से प्रार्थना करने लगे कि प्रभु अपनी इस प्रकोपी बरसात को वापस ले लो। एक कामचलाउ झोंपड़ी में अस्सी बरस का बूढा अमरा चारण अपनी गुदड़ी में दुबका, ठिठुरता हुआ माला के मनके फर रहा था। आधी रात का वक्त इस भयानक बारिश में कब आ गया पता ही न चला। ऐसे ही वक्त अमरा को झोंपड़ी के बाहर घोड़े की टापों की आवाज सुनाई दी। वो आवाज थोड़ी देर में आवाज झोंपड़ी के बाहर आकर रूक गई। घोड़े की हिनहिनाहट सुनाई दी। बूढे अमरा ने अपनी जवान बेटी को आवाज दी, ‘बेटी उजली! उठकर जरा बाहर तो देख, इस तूफानी रात में कौन आया है।‘
ठण्ड में कांपती उजली ने गुदड़ी फेंकी और बाहर देखा तो एक घोड़ा खड़ा था। घुड़सवार घोड़े के पांवों के पास गठरी हुआ पड़ा था, बिल्कुल अचेत, पानी में तर बदन और आंखें बंद। उजली ने बापू को सारा दृश्‍य बताया तो बूढा बाप बाहर आया और देखा कि नौजवान घुड़सवार की नाड़ी चल रही है। दोनों बाप-बेटी जैसे-तैसे कर नौजवान को झोंपड़ी के भीतर लाए। बाप ने बेटी से कहा कि इस नौजवान को बचाना है तो इसका शरीर गर्म करना पड़ेगा, नही तो ठण्ड के मारे बदन अकड़ जाएगा। उजली ने बापू से कहा कि गुदडी़ तो एक ही है, बाकी सब बरसात में गीली हो गई हैं। पिता ने कहा कि चूल्हे में आग जला कर भी गर्मी पैदा की जा सकती है। उजली ने बताया कि थोड़ी-सी लकड़ियां हैं लेकिन वो भी गीली हैं। भयानक बारिश के बीच यह एक और भयानक संकट। घर आया अतिथि मर जाए तो भयानक पाप के भागी होंगे बाप-बेटी। पिता ने आखिरी उपाय सोचकर कहा, ‘बेटी अगर यह मर गया तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी, घर आए मेहमान की जान बचाना हमारी जिम्मेदारी है। अब तो एक ही उपाय है कि अपने बदन की गर्मी से इसकी जान बचाई जाए। मेरे बूढे शरीर में तो गर्मी है नहीं, तू अपने बदन की गर्मी इसे देकर बचा सकती है।’ बेटी बाप का मुंह देखती रह गई। बाप ने कहा, ‘इस बेहोश नौजवान के साथ भांवरें ले और ईश्‍वर को साक्षी मान कर कह कि आज से यही मेरा पति है।’ उजली ने पिता की बात मानी और परदेसी के साथ भांवर ले भगवान को प्रणाम कर अनजान परदेसी को पति स्वीकार किया और गुदड़ी में उसे लेकर सो गई।
उजली के बदन की गर्मी से नौजवान परदेसी की बेहोशी टूटी और फिर टूट गये सब बंधन। दो अनजान बदन एक ही रात में एक दूजे के हो गए। पोरबंदर का राजकुमार जेठवा गरीब अमरा चारण की उजली का संसार हो गया। सुबह बारिश थमने के बाद दोनों के बीच मिलन और धूमधाम से शादी के वायदे हुए। कुछ दिन उजली के साथ बिताकर जेठवा वापस चला गया।
बीच में जेठवा अपने पिता यानी पोरबंदर के महाराजा से शिकार पर जाने की कहकर उजली से मिलने आता। छुपकर उजली से मिलता और विवाह के मंसूबे बांधता। फूलों के गहने बना उजली को पहनाता, रात बिताकर सुबह वापस चला जाता। गुपचुप प्रेम की बात आखिर कब तक छुपी रहती, पहले लोगों में बात फैली और फिर राजा तक पहुंची। राजा ने सुना तो जेठवा को बुलाकर धमकाया, ‘चारणों की बेटी राजपूत के लिए बहन समान होती है, खबरदार जो कभी उस लड़की से शादी करने का सपना भी देखा।’ जेठवा ढीला पड़ गया और धीरे-धीरे उजली को भूलने लग गया।
उधर उजली जेठवा की राह तकती रही। वह सुबह से लेकर शाम तक पोरबंदर की तरफ जाने वाली राह पर जेठवा के घोड़े की टापों की आवाज सुनने और जेठवा को देखने के लिए बैठी रहती। कभी उस राह कोई घुड़सवार आता तो उसकी आंखों में चमक आ जाती लेकिन जब वो पास आता तो जेठवा को ना पाकर फिर निराश हो जाती। रातों में वो चांद सितारों से जेठवा को लेकर बातें करतीं। लेकिन अब ना तो जेठवा को आना था और न ही वो आया। आषाढ़ के बादल फिर आए और बरसने लगे। उजली के मन पर बरसात की बूंदें अंगारों की तरह पड़ने लगीं। विरही उजली के दिल में विरह के गीत गूंजने लगे। उजली ने अपने रचे सोरठे जेठवा के पास भेजे, जवाब में जेठवा ने कहला भेजा, ‘तू चारण की बेटी, मैं राजपूत, मेरे लिए तू बहन समान, भूल जा मुझे और कर ले किसी चारण से ब्याह।’ उजली ने जवाब में कहलवाया, ‘जिससे मन लग जाए वही प्रेम और पति होता है, जात-पांत का कोई भेद नहीं होता प्रेम में।’ लेकिन जेठवा का पत्थर दिल जरा भी नहीं पिघला। उसने उजली को कहला भेजा कि अगर तुझे जात-पांत की परवाह नहीं तो मुझसे भी बड़े राजा हैं, कर ले उनसे ब्याह।‘
उजली के तन-मन में आग लग गई। गुस्से से भरी उजली एक दिन निकल पड़ी पैदल ही पोरबंदर की राह। महल के बाहर भूखी-प्यासी पड़ी रही तीन दिन तक। तीसरे दिन जेठवा ने झरोखे से झांकते हुए कहा, ‘उजली तू किसी चारण के बेटे से शादी कर ले और मुझसे आधा राज ले ले।’ सुनकर उजली उठी, पास ही रत्नाकर सागर लहरा रहा था, उजली गई और सीधे सागर में कूद गई।
कहानी अंश
अठारह साल की कुंवारी कन्या बाप का मुंह देखती रह गई।
‘बेटी, यह धर्म है पाप नहीं।’ ठंडी आवाज में बाप ने कहा।
‘अचेत सोए आदमी की दो भांवरें ले, ईश्‍वर को साक्षी मान कह, आज से यह परदेसी मेरा पति’।
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उजली के दिल का दर्द काव्य की लड़ी में गुंथता जाता, उसकी जबान से दोहों और सोरठों की झड़ी लगने लगती। उसे सारा संसार ही जेठवामय दिखाई देता। पशु, पक्षी, ताल, तलैया, सारी प्रकृति में उसे जेठवा घुलामिला लगता। खेत में सारस का एक जोड़ा चुग रहा था। उजली रो पड़ी, संसार में प्रेम को निभाने वाला सारस का जोड़ा या फिर चकोर पक्षी। जेठवा, मुझे तो तीसरा कोई प्रेम निभाने वाला दिखाई नहीं देता।
लेखिका-परिचय
जन्म 24 जून, 1914
सम्मान-पुरस्कार
पद्मश्री, साहित्य महामहोपाध्याय, राजस्थान रत्न, तेस्सीतोरी स्वर्ण पुरस्कार, महाराणा कुंभा पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार सहित अनेकों सम्मान व पुरस्कार
विशेष
राष्ट्रसंघ के निशस्त्रीकरण सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व और कई विश्‍व सम्मेलनों में भाग लिया और यात्रा संस्मरण लिखे। राजस्थान प्रदेश कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं, तीन बार विधायक रहीं और राज्यसभा की सदस्य रहीं।
प्रकाशन
हिंदुकुश के उस पार, शांति के लिए संघर्ष, अंतध्र्वनि, लेनिन री जीवनी, सांस्कृतिक राजस्थान, राजस्थान के रीतिरिवाज, देवनारायण बगड़ावत महागाथा
अनुवाद- रवि ठाकर री बातां, संसार री नामी कहाणियां, सूळी रा सूया माथै- जूलियस फ्यूचिक की ‘फांसी के तख्ते से’ का अनुवाद, गजबण-रूसी कहानियों का राजस्थानी अनुवाद। करीब चालीस किताबें प्रकाशित।

4 comments:

  1. एक ने इंसान का धर्म निभाया, दूजे ने राजधर्म। राजधर्म हमेशा निष्ठुर होता है।

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  2. बहुत बढिया प्रस्तुति. बधाई/

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  3. दुर्लभ कहानी लोगो तक पहुचाने के लिए धन्यवाद

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  4. दुर्लभ कहानी लोगो तक पहुचाने के लिए धन्यवाद

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