Sunday, 27 June 2010

गल्प का विराट शिल्पी : सॉल बैलो

‘लोग अपनी जिंदगी पुस्तकालयों में खत्म कर सकते हैं। उन्हें सावधान करने की जरूरत है।’ ऐसी रोचक टिप्पणी विश्‍वसाहित्य में सॉल बैलो के सिवा और कौन कर सकता है। बेहद मामूली और सामान्य से दिखने वाले इंसानों के भीतर कितनी किस्मों के चरित्र हो सकते हैं, यह जानना हो तो सॉल बैलो को पढ़िये, जहां हंसते, खिलखिलाते, धीर-गंभीर, आवारा, हताश, उन्मुक्त, मस्त, पस्त और ना जाने कितने चरित्र अपने पूरे वजूद के साथ सिनेमा की तरह चलते-फिरते नजर आते हैं। इन चरित्रों के सर्जक सॉल बैलो के यहूदी माता-पिता 1913 में रूस से कनाडा पहुंचे। यहीं 10 जून, 1915 को सॉल बैलो का जन्म हुआ। एक पराए देश में संघर्षपूर्ण तरीके से जीवनयापन करते माता-पिता के साथ सॉल बैलो का बचपन गुजरा, जिसमें मां के वो पुराने किस्से शामिल थे, जब मां सुनाया करती थी कि रूस में वो कैसे नौकर-चाकरों से भरे घर में रहती थी। अलग-अलग राष्ट्रीयताओं वाले अपने हमशहरी लोगों के बीच नौ बरस की उम्र तक सॉल बैलो कनाडा के मांट्रियल शहर में रहे। यहां पिता अब्राहम शराब का गैरकानूनी कारोबार करते थे। एक बार पिता को पीटा गया। इसके बाद परिवार अमेरिका के शिकागो शहर चला आया। यहां पिता ने नया आयात व्यापार शुरु किया। यहीं सॉल बैलो की शिक्षा हुई। धार्मिक विचारों वाली मां चाहती थी कि सॉल बैलो संगीत के क्षेत्र में जाए, लेकिन सॉल बैलो को यह पसंद नहीं था। किशोरावस्था में एच. बी. स्टो का विश्‍वप्रसिद्ध उपन्यास ‘अंकल टॉम’स कैबिन’ पढ़कर सॉल बैलो ने तय कर लिया कि लेखक बनना है।
सत्रह साल की उम्र में मां की मृत्यु से सॉल बैलो बेहद विचलित हो गए। स्कूली शिक्षा के बाद सॉल बैलो साहित्य में ही उच्च शिक्षा लेना चाहते थे, लेकिन उन दिनों यहूदियों के खिलाफ हर तरफ बेहद नफरत का माहौल था और विश्‍वविद्यालयों के मानविकी विभागों में तो बहुत ही खराब वातावरण था। लिहाजा सॉल बैलो ने साहित्य के बजाय नृतत्वशास्त्र और समाजविज्ञान में पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान साहित्य के एक प्रोफेसर ने उनसे कह दिया कि कोई यहूदी ऐसी अंग्रेजी नहीं सीख सकता, जिससे लेखक बना जाए। बात चुभने वाली थी, लेकिन सॉल बैलो ने तो बचपन में ही लेखक बनने की ठान ली थी। वे लिखते रहे, लेकिन प्रकाशन नहीं हुआ। उन्होंने अध्यापक की नौकरी की और एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के संपादन विभाग में भी कुछ समय काम किया। दो साल वे अमेरिकन मर्चेंट मैरीन में रहे। इस बीच उन्होंने अपना पहला उपन्यास लिखा, ‘डैंजलिंग मैन’। 1944 में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ, जिसमें एक निराश बेरोजगार युवक की संघर्षगाथा, डायरी शैली में कही गई है। तीन साल बाद दूसरा उपन्यास आया ‘द विक्टिम’, जो एक अधेड़ यहूदी व्यक्ति की कथा है, जिसे भय है कि किसी बदकिस्मती के चलते उसके साथ सब कुछ बुरा हो रहा है। ये दोनों उपन्यास साहित्य की दुनिया में सॉल बैलो के सामान्य उपन्यास माने जाते हैं, खुद सॉल बैलो पहले उपन्यास को ‘एम.ए.’ और दूसरे को ‘पी.एच.डी.’ मानते थे।
1953 में जब उनका तीसरा उपन्यास ‘द एडवेंचर्स ऑफ ऑगी मार्च’ आया तो सॉल बैलो की धूम मच गई। आधुनिक आम अमेरिकी व्यक्ति के बचपन से लेकर बड़े होने तक की रोमांचक, हास्य और व्यंग्य से भरपूर गाथा सॉल बैलो ने ऐसी खूबसूरत किस्सागो शैली में प्रस्तुत की कि आलोचकों ने कहा कि अमेरिकी साहित्य का डॉन क्विक्जोट अब पैदा हुआ है। बेहद गरीबी का मारा ऑगी शहरी जीवन की विद्रूपताओं, झूठ, छल, प्रपंच और अजीब मानसिकताओं से भरे चरित्रों के बीच आम अमेरिकी की उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें जनता किसी भी तरह जल्दी अमीर बनने और आरामतलब जिंदगी जीने का स्वप्न देख कर जीती है। इस उपन्यास में सॉल बैलो भावातिरेक से बचते हुए विशुद्ध यथार्थ के साथ एक ऐसी कथा रचते हैं, जिसमें आगे आने वाली घटनाओं का कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। बेचारा नायक अचानक धनवान बनने के बाद तुरंत ही कंगाल हो जाता है और हर हाल में मस्त रहता है। इस उपन्यास की लोकप्रियता से विचलित हुए बिना सॉल बैलो ने अपने अगले उपन्यास में पूरी शैली बदल डाली और ‘सीज द डे’ में एक असफल अभिनेता की मार्मिक कथा लिखी, जो अपनी विफलता के चलते पत्नी, बच्चे और पिता सबसे अलग-थलग पड़ जाता है। द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद अमेरिकी समाज में उपजे हालात और पारस्परिक संबंधों में आए व्यापक बदलाव को इस उपन्यास ने जितना बेहतरीन ढंग से रूपायित किया उतना किसी ने नहीं। इसीलिए इसे बीसवीं सदी का श्रेष्ठतम अमेरिकी उपन्यास कहा जाता है। अपने पांचवें उपन्यास ‘हैंडरसन द रेन किंग’ में सॉल बैलो एक ऐसे धनी अधेड़ व्यक्ति की कथा कहते हैं जो कोई अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति और ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। इस अतृप्त प्यास को लेकर वह अफ्रीका के गांवों में पहुंच जाता है और कई रोमांचक घटनाओं के बीच नए अनुभव हासिल करता है। उसे महसूस होता है कि आत्मा, शरीर और बाहरी दुनिया के बीच कोई शत्रुता नहीं है और सौहार्द्रपूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
सॉल बैलो की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे पुराकथाओं जैसा गल्प रचते हुए अपने समय और समाज को अनेक आयामों में देखते हैं, जहां तमाम भागमभाग और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मनुष्य को एक सहज, संतोषी और सौहार्द्रपूर्ण जीवन की ओर ले जाने का मार्ग दिखाई देता है। सॉल बैलो का अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यास ‘हरजोग’ एक ऐसे अधेड़ यहूदी की कथा है जो पत्नी द्वरा त्याग दिया गया है और जिस स्त्री के साथ रहता है, वह उससे विवाह नहीं करना चाहती। गहरी अनास्था और हताशा के बीच वह अपने दोस्तों, परिजनों, महान विद्वानों, दार्शनिकों और भगवान के नाम पत्र लिखता रहता है, लेकिन इन पत्रों को किसी को नहीं भेजता। इन पत्रों के माध्यम से ही उसकी मानसिकता और उलझन भरी कहानी पता चलती है। इसी तरह मि. सैमलर’स प्लेनेट में एक ऐसे विद्वान प्रोफेसर की कहानी है जो खुद एक प्रलय से बच कर आया है, लेकिन अजीब पागलपन का शिकार होने की वजह से लोगों को भविष्य के विचित्र वायदे करता रहता है। उसका मानना है कि अधिकाधिक सुविधाभोगी जीवन से ही मनुष्य की तकलीफें बढ़ रही हैं।
अमेरिका के नेशनल बुक अवार्ड के लिए छह बार नामांकित होने और तीन बार पुरस्कृत होने वाले सॉल बैलो एकमात्र रचनाकार हैं। लेखन के लिए उन्हें पुलित्जर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। जब 1976 में उन्हें नोबल पुरस्कार दिया गया तो उन्हें इसका वाजिब हकदार माना गया। जन्म से कनाडाई होने के कारण, कनाडा के इतिहास में सिर्फ उन्हीं को साहित्य के लिए यह सम्मान मिला। सॉल बैलो के लेखन को लेकर बहुत से लोगों का मानना है कि उनके अधिकांश उपन्यासों में उनकी अपनी निजी जिंदगी से जुड़ी हुई चीजें हैं, जैसे उनका यहूदी होना, साहित्य के साथ समाजशास्त्र और नृतत्वशास्त्र पढ़ाना, एक के बाद एक पांच-पांच शादियां करना और घूम-घूम कर नई जगहें देखना। खुद सॉल बैलो भी मानते थे कि एक लेखक की रचनाओं में ऐसा होना सहज है। साहित्य की दुनिया में कहा जाता है कि सॉल बैलो बीसवीं शताब्दी के ऐसे महान रचनाकार थे, जिन्होंने रूसी, यूरोपीय, अंग्रेजी और अमेरिकी क्लासिक उपन्यास परंपरा को नया जीवन दिया और सरवांतीस, दोस्तोयेव्स्की, डिकेंस और टॉलस्टोय जैसे सर्वकालिक महान रचनाकारों की शैली को आत्मसात करते हुए आधुनिक उपन्यास को नई बुलंदियों पर पहुंचाया। 5 अप्रेल, 2005 को 90 वर्ष की उम्र में सॉल बैलो का ब्रुकलिन में निधन हुआ।

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्‍ट में 'विश्‍व के साहित्‍यकार' स्‍तंभ में 27 जून, 2010 को प्रकाशित हुआ।

Sunday, 20 June 2010

मेरे पिता... तेरा मान रहे... सम्मान रहे

प्राणी जगत में मनुष्य ही है जिसने रक्त संबंधों को सभ्यता के विभिन्न चरणों में नई गरिमा और नई पहचान दी है। एक आदर्श और मानवीय समाज की सतत परिकल्पना में पारिवारिक संबंधों के महानतम रूप में माता और पिता को सर्वोच्च स्थान दिया गया। मातृसत्तात्मक समाज से जब पितृसत्तात्मक व्यवस्था की नींव पड़ी तो सभ्यता, संस्कृति और समाज में परिवार के मुखिया पुरुष को राज्य के समान सत्ता मिली। जहां पहले राजा को संपूर्ण प्रजा के पालन का दायित्व था, वह परिवार में पालक पिता का हो गया। यहीं से परिवार में पिता और संतानों के बीच संबंधों का रोचक इतिहास आरंभ होता है। समाज में उत्पादन के साधनों के विकास के साथ जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ने लगा, परिवार की आय में वृद्धि होती गई, उसी परिमाण में पारिवारिक संबंधों का स्वरूप भी बदलता गया। इन संबंधों के बदलने में स्थानीय परिवेश और संस्कृति का भी उत्पादन के साधनों जितना ही महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों में हुए शोध, लेखन और समग्र विकास का विहगावलोकन करें तो यह बात पूरी तरह साफ हो जाएगी कि लगभग हर दशक में कम से कम एक पीढ़ी का पिता अपनी परवर्ती पीढ़ी के पिता से अलग दिखाई देता है। समाज में सांस्कृतिक स्तर पर परिवर्तन बहुत धीमी गति से होते हैं, इसलिए पारिवारिक संबंधों पर पड़ने वाला इनका प्रभाव बहुत देर से दिखाई देता है, लेकिन उत्पादन के साधनों यानी आर्थिक जगत में परिवर्तन तेजी से होते हैं, इसलिए ऐसे परिवर्तनों से पड़ने वाले प्रभाव तुरंत दिखाई देते हैं।

पालक पिता को परिवार के सभी सदस्यों की सर्वांगीण सुरक्षा को लेकर चिंता रहती है, इसलिए पिता की आशंकाएं और आकांक्षाएं पत्नी से लेकर संतानों पर ही केंद्रित रहती हैं। कुछ समय पहल कहीं यह पढ़ने को मिला कि परिवार में पुरुष को आंधी, तूफान, बारिश, भूकंप, आग, किसी के आने या जाने की आहट, शोर-शराबा और ऐसे ही खतरों को लेकर तुरंत सजग होना पड़ता है, क्योंकि इनसे पूरे परिवार को खतरा हो सकता है, जबकि महिलाएं उन खतरों को जल्दी पकड़ती हैं, जिनसे सिर्फ बच्चों को खतरा हो। एक पिता जहां अपने पुत्रों की आर्थिक सुरक्षा और नैतिक व्यवहार को लेकर जीवन भर सशंकित रहता है, वहीं पुत्रियों को लेकर उनके भावी वैवाहिक जीवन और विवाहपूर्व सदाचारी जीवन के बारे में चिंतित रहता है। यह कमोबेश आज भी चली आ रही सनातन चिंताएं हैं। पिछली दो सदियों का साहित्य उठाकर देख लीजिए हर जगह पिता की यही चिंताएं देखने को मिलेंगी। रूसी, यूरोपियन और अमेरिकी ही नहीं भारतीय साहित्य में भी इसके असंख्य उदाहरण बिखरे पड़े हैं। प्रेमचंद के ‘गोदान’ का होरी अपने पुत्र गोबर के भविष्य और झुनिया के साथ उसके प्रेमसंबंध को लेकर आज के किसी भी पिता की तरह चिंतित दिखाई देता है। पश्चिमी साहित्य में तो लंपट पिता अपने पुत्रों के चरित्र को लेकर हद दर्जे तक सशंकित दिखाई देते हैं। खास तौर पर रूसी उपन्यासों के पिता अपने पुत्रों के प्रति खलनायक नजर आ जाते हैं। इसका मुख्य कारण है उस काल खण्ड में पनपा सामंती व्यवहार, जो भू दास प्रथा, जमींदारी, उन्नत कृषि तकनीक और कृषि के अतिरिक्त अन्य आयस्रोतों के पनपने से परिवार के मुखिया पिता में विकसित होता है।

खैर, अगर हम एक सदी के हिंदी सिनेमा को गौर से देखें तो पिता और संतानों के बीच बदलते हुए अंतर्संबंध हर दौर में नजर आएंगे। हिंदी सिनेमा में तो सैंकड़ों फिल्में पिता और संतान के बीच के अंतर्विरोधों को लेकर ही बनी हैं। फिर वह राजकपूर का सिनेमा हो या राजकुमार हीरानी का। और दोनों के बीच अंतर्द्वंद्व मुख्य रूप से अमीरी गरीबी के बीच चुनाव, नैतिक और अनैतिक में से एक का पक्ष लेना या समय और समझ के हिसाब से स्वतंत्र निर्णय और पारंपरिकता को निभाने के बहुआयामी दबावों को लेकर होते हैं। हर व्यक्ति की तरह सभी पिता और उनकी संतानें अपने समय और भविष्य को लेकर अपने मन से जीवन जीने का स्वप्न देखते हैं और व्यवहार में भी यही कोशिश करते हैं। लेकिन समय इतनी तेजी से आगे बढ़ता है कि कोई भी पीढ़ी उसे पूरी तरह पकड़ नहीं पाती। इसी वजह से हर व्यक्ति नॉस्टेल्जिक होता है, उसे अपना बचपन और पिता के साथ बिताए दिन याद आते हैं, जो एक समय बाद यथार्थ के पथरीले फर्श पर मिट्टी के खिलौनों की तरह चकनाचूर हो जाते हैं।

संतान को लगता है, मेरे पिता ऐसे तो नहीं थे, उन्हें क्या हो गया है? दूसरी तरफ पिता को महसूस होता है कि मेरी परवरिश में ऐसी कौनसी कमी रह गई जो औलाद ऐसी निकल गई। भारतीय समाज में जब तक संयुक्त परिवार की व्यवस्था मजबूत रही, पारिवारिक संबंधों में भी सुदृढ़ता बनी रही, कारण यह कि एक साथ रहने से परिवार के पुरुषों को बहुत से सुरक्षा संबंधी मामलों में पारस्परिक अंतर्निभरता की वजह से निश्चिंतता रहती थी। लेकिन समय के साथ आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर जब संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार विकसित होने से असुरक्षा की भावना अधिक बलवती हुई तो घर टूटने लगे। जिन पिताओं ने अपने सुखद भविष्य की कामना में अपने पुत्र-पुत्रियों को उच्च शिक्षा दिलाई, कमाई के लिए विदेश भेजा, आज वे स्वयं एकाकी जीवन जी रहे हैं। बदले हुए समय में दूरियों ने संबंधों की मृदुलता कम कर दी है, पिता सांस्कृतिक रूप से आदरणीय और पूज्य हैं, लेकिन लाखों का नुकसान सह करना और लाखों रुपयों के साथ काम के कई दिन खर्च कर उनकी तीमारदारी करना आज की संतान के लिए अव्यावहारिक है, इसलिए हद से हद पैसे भेज देना और फोन पर चिंता करना जिम्मेदार संतान की निशानी रह गया है। पिता भी इस बात को जानते हैं कि एक समय उन्होंने खुद अपने पिता को सुनहरे स्वप्न दिखाकर लौटने के वादे के साथ कभी ना लौटने का संकल्प लिया था। इसीलिए आप देखेंगे कि पिछले कुछ बरसों में वृद्धाश्रमों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। कार्पोरेट स्तर पर इधर आलीशान ओल्ड एज या रिटायरमेंट होम भी बनने लगे हैं। यह सब पिता और संतानों के बीच हो रहे बदलावों के मुखर संकेत हैं और फिर यह बात स्‍पष्‍ट होती है कि उत्‍पादन के साधनों के साथ पारिवारिक संबंधों में भी परिवर्तन होते हैं।

लेकिन उन पिताओं की बात अलग है, जिन्होंने अपनी संतानों को अपनी अदम्य जिजीविषा से जीवनभर प्रेरित किए रखा। मुंशी प्रेमचंद के यशस्वी पुत्र अमृतराय ने प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ जीवन लिखी ‘कलम का सिपाही’, सज्जाद जहीर की रचनाकर पुत्री नूर जहीर ने पिता के साथ बिताए वर्षों के यादगार संस्मरण ‘मेरे हिस्से की रौशनाई’ में लिखे, जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा गांधी के नाम अविस्मरणीय पत्र लिखे, ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य में विशेष रूप से आजादी के बाद के साहित्य में पिता की बेहद मार्मिक छवियां मिलती हैं। आजादी के मोहभंग से उपजी पिताओं की निराशा, हताशा और कुंठाओं को अनेक लेखकों ने बहुत गहराई से रचा है। उदय प्रकाश की कहानी ‘तिरिछ’ में पिता की गैर मौजूदगी और उनकी ज्ञात-अज्ञात कारणों से हुई मौत हमारी पूरी व्यवस्था पर ही प्रश्‍नचिह्न लगा जाती है। पिछली सदी में पिता परिवार में संतानों के लिए भय का पर्याय हुआ करता था, जो अब थोड़ा बहुत मित्रवत हो गया है। विगत कुछ वर्षों में हुए वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि जिन परिवारों में पिता की पालन-पोषण में सक्रिय भूमिका रहती है, उनके बच्चे बहुत सी मानसिक और शारीरिक बीमारियों का शिकार होने से बच जाते हैं।

पिता और संतान के बीच का सारा द्वंद्व समय और समाज में चल रहे विचारों का होता है। ऐसा कभी कोई आदर्श समाज नहीं रहा, जिसमें सिर्फ श्रवण कुमार जैसी आदर्श और परम आज्ञाकारी संतानें हों, और ऐसी कोई कामना करना भी सिवा खामखयाली के कुछ नहीं है। हमारे कवि मित्र हरीश करमचंदाणी अपनी एक कविता में लिखते हैं, ‘क्या पिता की हर बात मानना संभव भी है?’ सच्चाई यह है कि बिना वैज्ञानिक ज्ञान या समझ के अपने पूर्ववर्तियों की बात को ठुकरा देना जितना नुकसानदेह होता है, उससे कहीं अधिक हानिकारक होता है अंधश्रद्धा से मान लेना। इस दुनिया को जितना आज्ञाकारी संतानों ने बनाया है उससे कहीं ज्यादा उन्होंने बनाया, जिन्होंने अपने पिता की इच्छाओं के विपरीत जाकर अपना मार्ग चुना और सफलता हासिल की। ईसाई धर्म में जिस धर्मगुरु को फादर कहते हैं, गैलीलियो ने उसी की सत्ता को चुनौती दी। चार्ल्स डार्विन ने अपने पिता की नाराजगी के बावजूद अपनी खोजें जारी रखीं। एक मशहूर शेर है कि ‘कुफ्र कुछ चाहिए, इस्लाम की रौनक के लिए’, तो कुछ हुक्म उदूलियां अनिवार्य हैं, मावनीय सभ्यता को आगे ले जाने के लिए। संतान का धर्म है पिता की व्यवस्था को आगे ले जाना और पिता का धर्म है कि बूढ़े दरख्तों की तरह घर-आंगन में अपने आशीर्वाद का साया फैलाते रहें। 

यह आलेख डेली न्‍यूज़ के रविवारीय परिशिष्‍ट 'हम लोग' में प्रकाशित हुआ। चित्र http://www.hoviscreations.com/ से साभार।

Sunday, 13 June 2010

विष्‍णु नागर होने का मतलब

नागर जी से मेरा पहला परिचय उनके असंख्य पाठकों की तरह नवभारत टाइम्स के जरिए ही हुआ। ये मेरे लेखकीय शैशवकाल के दिन थे, जब पढ़ने की भूख कुछ भी पढ़वा लेती थी और जिन लेखकों को पत्र-पत्रिकाओं में किसी ना किसी रूप में पढ़ता रहा, उनमें नागर जी अहम थे। उन दिनों मुझे लगता था कि विष्णु नागर नाम के तीन लोग हैं, जिनमें से एक कविताएं लिखता है, दूसरा व्यंग्य और तीसरा पत्रकारिता करता है। कई साल बाद जब असलियत मालूम हुई तो आश्‍चर्य हुआ कि एक व्यक्ति कैसे इन तीन विधाओं को साध सकता है। आश्‍चर्य इस बात का भी था कि एक पत्रकार इस कदर रचनात्मक हो सकता है कि वह कविता को व्यंग्य जैसी विधा के साथ साध लेता है। आज भी मुझे लगता है कि विष्णु नागर जैसी रचनात्मकता के लिए बहुत गहरे आंतरिक रचनात्मक अनुशासन और संवेदनशीलता की जरूरत है, जो हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं है और पत्रकारिता में रहते हुए तो यह लगभग असंभव ही है। और यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हिंदी दैनिक पत्रकारिता में विष्णु नागर जैसा दूसरा कोई पत्रकार नहीं दिखाई देता, जो कविता, कहानी, व्यंग्य और समसामयिक विषयों पर एक साथ कलम चला सकता हो।

मुझे यह याद नहीं आ रहा कि पहली बार मेरा उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलना कब हुआ। लेकिन स्मृति पर जोर डालता हूं तो लगता है जैसे हम सदियों से एक-दूसरे को जानते हों। कुछ व्यक्ति ऐसे ही होते हैं, जिनसे आप कितनी ही बार मिले हों, लगता है, जैसे उनसे आपका बहुत पुराना रिश्‍ता है। विष्णु जी की सहज, सरल मृदुल मुस्कान आपको पहली नजर में अपनत्व से भर देती है और उनकी मिलनसारिता अपने मोहपाश में इस कदर जकड़ लेती है कि आप बरसों बाद मिलेंगे तो भी आपको वे कुछ नहीं कहेंगे और अपनी निर्मल मुस्कान से फिर अपना बना लेंगे। मेरे जैसे बेहद आलसी व्यक्ति से भी वे कभी निराश नहीं होते और कभी उलाहना भी नहीं देते। अगर प्रभाष जोशी होते तो इसे मालवा की मिट्टी की खासियत के तौर पर रेखांकित करते। लेकिन उसी मालवा की धरती से निकले कई रचनाकार मिल जाएंगे जिनके व्यक्तित्व में नागर जी जैसी सहजता नहीं है।

पिछले करीब बीस वर्षों में नागर जी से बीसियों मुलाकातें और गप्प गोष्ठियां हुई हैं, और मैंने कभी भी किसी मसले पर उत्तेजित होते नहीं देखा, एक सहज सौम्य मृदुल उपस्थिति से वे पूरे माहौल को गरिमामय बनाए रखते हैं। सायंकालीन रसरंजन गोष्ठियों में जब भाई लोग किसी विषय पर विचारोत्तेजक होते हुए वीरोचित मुद्रा अख्तियार कर लेते हैं, नागर जी शांत और सौम्य बने रहते हैं और अक्सर वातावरण को सामान्य बनाने में उन्हीं की मुख्य भूमिका होती है। नागर जी स्वाद के बहुत शौकीन हैं और उत्तेजनापूर्ण माहौल को सहज करने में उनकी यह रूचि प्रायः काम कर जाती है, जब वे बहस में संलग्न मित्रों से कहते हैं, छोड़िए इन बातों को, ये जो नमकीन है वो लाजवाब है, आपके यहां के नमकीन व्यंजनों की तो बात ही निराली है। और फिर बहस व्यंजनों की ओर मुड़ जाती है, जिसमें हर भोजनभट्ट अपनी तरफ से नई जानकारियां जोड़ते हुए नागर जी की जीभ का जायका बढ़ाने लगता है और उन्हें दावत देने लगता है। एक बार बातचीत में नागर जी ने बताया था कि उनकी मां बहुत अच्छा खाना बनाती थीं, जहां से उन्हें अच्छे खाने का चस्का लगा। और प्रमिला भाभी भी बहुत स्वादिष्ट भोजन बनाती हैं और इसमें भी कमाल की बात यह कि दोनों पति-पत्नी ही जायकेदार भोजन के गुणग्राहक हैं। लेकिन बहुत से लोग शायद यह नहीं जानते कि प्रमिला भाभी का कण्ठ बहुत सुरीला है। उनके स्वर में कबीर को सुनना एक अद्भुत अनुभव होता है। उन्हें सुनते हुए आपको कुमार गंधर्व और प्रहलाद टिपनिया का कबीर गायन याद आता है। मालवी लोकगीत भी प्रमिला भाभी को खूब याद हैं और मन करता है तो खुलकर गाती हैं। मुझे नहीं मालूम कितने सौभाग्यशाली मित्रों को प्रमिला भाभी को सुनने का अवसर मिला है, लेकिन मैं उन खुशकिस्मत लोगों में हूं।

नागर जी कविता में जितने सहज हैं, व्यंग्य में उतने ही तीखे और पत्रकारिता में वैसे ही प्रखर और गंभीर। मेरे खयाल से पत्रकारिता जो सबसे बड़ी चीज सिखाती है, वो है पठनीयता। और नागर जी ने इसे इस कदर साध लिया है कि वे सामान्य पाठक के दिल में सीधे उतर जाते हैं, फिर वो रचना किसी भी विधा की हो। इसीलिए हिंदी आउटलुक ने एक बार जब हिंदी के दस लोकप्रिय लेखकों का सर्वेक्षण किया तो उसमें विष्णु नागर भी एक रहे। ऐसी लोकप्रियता सहज बोधगम्य लेखन से ही हासिल होती है। उनकी कविताओं में मुझे लगता है कई बार उनका व्यंग्यकार बहुत सहजता से दाखिल होकर कविता को बहुआयामी और बेहद तीक्ष्ण बना देता है। ‘हंसने की तरह रोना’ संग्रह में ऐसी ही एक अद्भुत कविता है, जिसमें नरेंद्र मोदी और जॉर्ज बुश एकमेक होकर नई अर्थछवियां रचते हैं।
 
ग्‍लोबलाइजेशन के इस जमाने में
हत्‍यारे का नाम कुछ भी हो सकता है
जॉर्ज मोदी भी और नरेंद्र बुश भी

नागर जी अपनी कविता में कहीं भी, एक क्षण के लिए भी वैयक्तिक नहीं होते। आत्म से अगर उनकी कविता शुरु भी होती है तो एकाध पंक्ति के बाद ही उसमें पूरा मानव समाज किसी ना किसी रूप में आ जाता है और वैयक्तिक को निर्वैयक्तिक में बदलते हुए समूची मानवता को अपने संवेदना संसार में शामिल कर लेती है। उनका आधुनिकता बोध इतना गहरा है कि वे अत्यंत साधारण विषय को भी रोचकता के साथ बहुआयामी अर्थ दे देते हैं। ‘घर के बाहर घर’ संग्रह में एक कविता है ‘स्वर्ग में कुछ भी नहीं है’। इस कविता में नागर जी स्वर्ग में आधुनिक सुख सुविधाओं के अभाव की बात करते हुए कहते हैं,

स्वर्ग में बाज़ार नहीं है, भूमण्डलीकरण नहीं है
नहीं है, नहीं है, मैंने कहा न स्वर्ग में कुछ भी नहीं है

इसलिए मैं नरक तो फिर भी जा सकता हूं
लेकिन स्वर्ग-बिल्कुल नहीं!

विष्णु नागर का गद्य बहुआयामी है। वे इतिहास में जाकर पुराण कथाओं का ग़जब पुनराविष्कार करते हैं। कछुए और खरगोश की कहानी का जो नवीनीकरण नागर जी ने किया है, वह हमारे समय में पुराने आख्यानों को देखने की एक नई दृष्टि देता है। नागर जी ने इस क्रम में बहुत सारी पुराकथाओं का नवीकरण किया है। लेकिन मेरे विचार से उनका सबसे महत्वपूर्ण काम है, ‘ईश्‍वर की कहानियां’। ईश्‍वर का ऐसा दयनीय और मार्मिक रूप नागर जी ने रचा है कि आज के घोर आस्थावान और अंधभक्ति के माहौल में इन कथाओं को पढ़कर किसी भी पाठक को ईश्‍वर पर दया आ सकती है। नागर जी के लेखन की एक और जो बड़ी विशेषता है वो यह है कि वे हमारे समय में घट रहे यथार्थ को अतीत के आख्यानों से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भों में व्याख्यायित करते हुए पाठक को एक नये किस्म का आस्वाद देते हैं और अपने समय व समाज के प्रति और अधिक संवेदनशील बनाते हैं। उनकी एक कविता है ‘लगते तो नहीं’:

कई बार लोग मुझी से पूछते हैं
कि क्या आप
विष्णु नागर हो

जब मैं कहता हूं कि हां हूं
तो वे कहते हैं कि लेकिन लगते तो नहीं

और वे भीड़ में
विष्णु नागर को ढूंढने आगे बढ़ जाते हैं।

यह जो नहीं लगना है वह बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि विष्णु नागर को देखकर सचमुच आपको नहीं लगता कि यह शाश्‍वत मुस्कुराने वाला मृदुलता से ओतप्रोत व्यक्तित्व इतना बहुआयामी लेखक-रचनाकार हो सकता है। और लोग अगर भीड़ में विष्णु नागर को ढूंढने निकल पड़ते हैं तो इसका यही अर्थ है कि विष्णु नागर जनता का रचनाकार है, वह व्यक्ति में नहीं समष्टि में मिलेगा। जहां भी जनता के सवाल होंगे, जनता होगी, आप विष्णु नागर को वहीं पाएंगे। हम खुशकिस्मत लोग हैं कि हमारे समय में एक ऐसा लेखक-रचनाकार मौजूद है, जो हमारे समय और समाज को विविध रूपों में रचते हुए न केवल साहित्य को समृद्ध कर रहा है, बल्कि अपनी जनता को, उसकी संवेदना को, उसकी सोच-समझ और संस्कारों को भी नए आयाम दे रहा है। विष्णु नागर शतायु हों, सहस्रायु हों, और निरंतर हमें अपनी रचनाशीलता से लाभान्वित करते रहें, यही कामना है।

यह आलेख 'संबोधन' पत्रिका के 'विष्‍णु नागर' पर केंद्रित अंक, अप्रेल-जून 2010 में प्रकाशित हुआ।

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Monday, 7 June 2010

विवादास्पद और वर्जित विषयों की रचनाकार : एलफ्रीडे जेलीनेक

यूरोप के छोटे-से देश ऑस्ट्रिया के साहित्य की तरफ दुनिया का ध्यान पहली बार तब आकर्षित हुआ जब नोबल पुरस्कार के 110 साल के इतिहास में पहली बार 2004 में, यहां की चर्चित नाटककार और उपन्यासकार ऐलफ्रीडे जेलेनीक को दुनिया के सबसे बड़े साहित्य सम्मान से नवाजा गया। इस पर खासा विवाद भी हुआ, क्योंकि यूरोप के स्वतंत्र समाज में भी जेलीनेक के लेखन को कई लोग अश्‍लीलता की श्रेणी में मानते हैं, लेकिन ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि जेलीनेक अपनी विवादास्पद लेखन शैली में कितनी चिंता और गहराई के साथ सामाजिक विद्रूपताओं को बेनकाब कर रही हैं। उनकी लेखनशैली और विवादित विषयों पर लिखने के मूल में जाएं तो कारण आसानी से समझ में आता है।

जेलीनेक का जन्म 20 अक्टूबर, 1946 को स्तीरिया प्रांत में हुआ। पिता चेक-यहूदी मूल के थे और मां विएना के प्रतिष्ठित परिवार से थीं। दूसरे विश्‍वयुद्ध के दौरान पैतृक परिवार के बहुत से लोग नाजियों की बर्बरता के चलते मारे गए और जेलीनेक के पिता जिंदा बचने वालों में से एक थे। जेलीनेक की मां की इच्छा थी कि जेलीनेक कम उम्र में ही संगीत की दुनिया में नाम कमाए और यही सोचकर वे बेटी को लेकर विएना चली आईं जहां एक छोटे-से घर में मां-बेटी रहने लगे। मां के कठोर अनुशासन और जिद के आगे चार साल की उम्र में ही जेलीनेक को संगीत का कड़ा अभ्यास शुरु करना पड़ा। सामान्य शिक्षा के साथ संगीत का गहन अभ्यास करते हुए जेलीनेक ने 14 साल की उम्र में पियानो के लिए विशेष शिक्षा के लिए एक मशहूर संस्था में प्रवेश लिया। 4 साल बाद हाई स्कूल पास कर उन्होंने विएना विश्‍वविद्यालय में रंगमंच, कला और इतिहास विषयों के अध्ययन के लिए दाखिला लिया। इस बीच जेलीनेक कविताएं लिखने लगीं थीं और सत्रह साल की उम्र में पहली कविता प्रकाशित हुई। विश्‍वविद्यालय की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वो साहित्य की दुनिया में आ गई। पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और गद्य रचनाओं का नियमित प्रकाशन होने लगा और 1967 में पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ। कविता के साथ जेलीनेक ने महिलाओं की समस्याओं को लेकर नाटक लिखना शुरु किया तो खासी शोहरत मिलने लगी। नारी की यौन प्रश्‍नाकुलता को जेलीनेक ने बड़ी शिद्दत से उठाया और पुरुष वर्चस्व को चुनौती दी। इस बीच छात्र संगठनों से जुड़ाव के कारण उनके लेखन में नारी समस्याओं के साथ दूसरी सामाजिक समस्याएं भी समाहित होने लगीं। 1970 में उनका एक उपन्यास बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसे हिंदी में ‘हम बच्चे नहीं चारा हैं’ कहा जा सकता है। इस उपन्यास में एक तरफ तो खुद जेलेनीक के बचपन का प्रभाव है और दूसरी तरफ छात्रों के साथ रहने के अनुभवों से उपजी संवेदनशीलता। किस प्रकार मां-बाप बच्चों पर अपने सपने लाद देते हैं और उनके स्वप्न छीन लेते हैं, इसे व्यंग्यात्मक शैली में जेलीनेक ने बहुत खूबसूरती से दर्शाया है। जेलीनेक की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें 1973 में ऑस्ट्रिया की राष्ट्रीय छात्रवृति प्रदान की गई।

1972 में दूसरा उपन्यास आया, जिसमें जेलीनेक ने ऑस्ट्रियाई समाज की आमबोलचाल की भाषा और संस्कृति को लेकर विद्रोही तेवर में कड़ी आलोचना करते हुए बताया कि बेहतर जीवन का दावा बिल्कुल झूठा है और वो समाज में कहीं दिखाई नहीं देता। महिलाओं के लिए वर्जित विषयों पर लिखते हुए जेलीनेक ने सारी परंपराएं तोड़ दीं और देश की चर्चित महिलाओं में शुमार हो गईं। 1974 में वे कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बन गईं और लेखन के साथ राजनीति में भी सक्रिय हो गईं। अगले ही साल उनका उपन्यास ‘वूमन एज लवर्स’ बहुत लोकप्रिय हुआ, इसे जर्मन भाषा पढ़ने वाले तमाम देश में प्रशंसा मिली। जेलीनेक के लेखन की खासियत यह है कि वो जो कथानक बुनती हैं, उसमें परिस्थितियां बहुत उलझी हुईं और जटिल होती हैं। पाठक हतप्रभ रह जाता है कि इस समाज में हिंसा और दमन इतने रूपों में व्याप्त है कि सहसा हमारा ध्यान ही नहीं जाता। दमन के शिकार लोगों को किस प्रकार बेबसी के साथ घुटने टेकने पड़ते हैं? मनोरंजन उद्योग किस तरह लोगों की चेतना को कुंद कर देता है और लोग वर्ग एवं लिंग के आधार पर होने वाले अन्याय के किसी भी प्रकार के प्रतिरोध के काबिल नहीं रह जाते? ऑस्ट्रियाई साहित्य में जेलीनेक जैसा स्वर पहली बार देखा गया है, इससे पहले के साहित्य में समाज की आलोचना तो होती थी, लेकिन बहुत संभ्रांत ढंग से।

जेलीनेक का उपन्यास ‘लस्ट’ दुनिया की कई कई भाषाओं में अनूदित होने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। इस उपन्यास में उन्होंने बुनियादी तौर पर सभ्यता और संस्कृति को लेकर ही कई सवाल उठाए हैं। जेलीनेक का मानना है कि जब तक समाज में महिलाओं पर होने वाली हर स्तर की हिंसा खत्म नहीं होगी, इस कथित सभ्यता पर सवाल उठते रहेंगे। उनकी लेखनी को किसी खास तरह से व्याख्यायित करना संभव नहीं है, क्योंकि उनके लेखन का दायरा बहुत विस्तृत है। गहरी काव्यात्मकता और व्यंग्य के साथ जेलीनेक अपने कथानक के साथ चलने वाली आवाजों को भी पूरा महत्व देते हुए एक अजीब किस्म का रसायन बनाती हैं कि पहले पाठ में सामान्य पाठक के पल्ले कुछ नहीं पड़ता, लेकिन धीरे-धीरे रहस्य खुलने लगते हैं, साथ होने वाली घटनाएं आवाजों के माध्यम से एक पूरे संसार की रचना करती हैं, जिसमें लेखिका का दर्द पूरी संवेदनशीलता के साथ प्रकट होता है। हिंदी में एक प्रकाशक ने ‘लस्ट’ को मूल जर्मन से अनुवाद करवा कर छापा तो है, लेकिन अनुवादक ने देशज अनुवाद करने के प्रयास में जो कुछ किया वह भारतीय माहौल में अश्‍लीलता ही माना जाएगा। इसलिए प्रकाशक ने इसे जारी नहीं किया है।

एलफ्रीडे जेलीनेक बहुत मुखर लेखिका हैं। उन्होंने अपने देश की दक्षिणपंथी पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का खुलकर विरोध किया तो सरकार ने उन पर देशद्रोही होने का आरोप लगा दिया। लेकिन जेलीनेक की मुखरता का कोई अंत नहीं है। उन्हें लेखन के लिए उपन्यास और नाटकों पर कई पुरस्कार और सम्मान मिले। 2004 में जब नोबल पुरस्कार की घोषणा हुई तो वे लेने नहीं गई। उन्होंने कहा कि इतना बड़ा सम्मान मिलना प्रसन्नता की बात है, लेकिन मुझसे कई बड़े रचनाकार हैं, जो इसके हकदार हैं। करीब दो दशकों से वे अपने घर में ही रहती हैं और कहीं आती जाती नहीं। उन्हें सामाजिक जीवन से और प्रशंसकों की भीड़ से बड़ा डर लगता है। कठोर अनुशासन में बीते बचपन का असर ही है यह शायद कि जेलीनेक हवाई जहाज में बैठने से और बाजार जाकर खरीदारी करने से भी डरती हैं। उनके लेखन में व्याप्त भय और हिंसा का वातावरण वैश्विक है, लेकिन कितनी बड़ी विडंबना है कि दुनिया को भय से मुक्ति का मार्ग दिखाने वाली कलमकार अपने ही डर की वजह से विएना के अपने ही घर में खुद कैद होकर बैठी है।

यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 6 जून, 2010 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।













Sunday, 30 May 2010

सर्बिया का चमकीला नक्षत्र - ईवो आंद्रिक

दो साल की उम्र में जिस बालक को पिता अनाथ छोड़ जाएं, उस के भविष्य की कल्पना ही भयावह होती है। लेकिन जीवट हो तो इंसान क्या नहीं कर सकता? ऐसा ही हुआ, 1961 के नोबल पुरस्कार विजेता कथाकार-उपन्यासकार ईवो आंद्रिक के साथ। 9 अक्टूबर, 1892 को जन्मे ईवो को पिता की मृत्यु के बाद मां के साथ ननिहाल आना पड़ा और आरंभिक वर्ष वहीं गुजारने पड़े। ईवो का जन्म आस्ट्रिया-हंगरी के अधीन प्राचीन ऑटोमान साम्राज्य में हुआ, जो पहले यूगोस्लाविया का भाग था और आज बोस्निया और हर्जेगोविना देश का हिस्सा है। शुरुआत में ईवो ने जिम्नास्टिक की शिक्षा ली और कालांतर में उच्च अध्ययन के लिए कई विश्‍वविद्यालयों में पढ़ाई की। 19 साल की उम्र में ईवो की पहली कविता एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुई। युवावस्था में ही आंद्रिक क्रांतिकारी छात्र संगठनों से जुड़ गए थे, इसलिए उनके लेखन और व्यवहार में भी क्रांति के स्वर उभरने लगे थे। ईवो वैचारिक रूप से साम्राज्यवाद के खिलाफ थे और यूगोस्लाविया के समर्थक थे, इसलिए उपनिवेशवादी सरकार ने प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान ईवो आंद्रिक को जेल में डाल दिया। जेल में रहने के दौरान आंद्रिक ने क्रांतिकारी साहित्य का भरपूर अध्ययन किया। लेकिन रूस की सफल क्रांति के बाद बने यूगोस्लाविया गणराज्य में ईवो आंद्रिक को जेल से रिहाई मिली।

प्रथम विश्‍वयुद्ध की समाप्ति के बाद ईवो आंद्रिक ने चार विश्‍वविद्यालयों में स्लाविक भाषा और साहित्य का अध्ययन किया और ‘तुर्की शासनकाल में बोस्नियाई संस्कृति का इतिहास’ विषय पर शोध किया। 1920 में उन्हें यूगोस्लावियाई प्रशासनिक सेवा में ले लिया गया, जहां बीस वर्ष तक उन्होंने कई महत्वपूर्ण राजनयिक पदों पर काम करते हुए अपनी लेखन यात्रा जारी रखी। ईवो की कविताएं अब तमाम महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं और उन्होंने लेखन के साथ विश्‍व साहित्य से अनुवाद का काम भी शुरु कर दिया था। 1920 में पहली कहानी के प्रकाशन के साथ ही ईवो आंद्रिक ने कविता से किनारा कर लिया और पूरी तरह गद्य के लिए समर्पित हो गए। कहानी लेखन में ईवो ने सदियों पुरानी यूगोस्लावियाई लोक संस्कृति को रूपायित करते हुए वहां की कैथोलिक, यहूदी और मुस्लिम समुदाय की समृद्ध विरासत और संघर्षशील जनता के दुख दर्द को शानदार अभिव्यक्ति दी।

दस साल में उनकी कहानियों के कई संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें सबका शीर्षक ‘कहानियां’ था। द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान यूगोस्लाविया पर नाजी आक्रमण के बाद ईवो अपनी राजनयिक सेवा छोड़कर स्वदेश वापस लौट आए। लौटते ही नाजियों ने ईवो को उनके घर में ही नजरबंद कर दिया। इस अवधि में ईवो ने अपना सर्वश्रेष्ठ लेखन किया जो 1945 में उपन्यास त्रयी के रूप में प्रकाशित हुआ। इस त्रयी में ‘द ब्रिज ऑन द्रीना’, ‘बोस्नियन क्रॉनिकल’ और ‘द वूमन फ्राम सरायेवो’ को जबर्दस्त लोकप्रियता हासिल हुई। पूर्वी बोस्निया में द्रीना नदी पर एक प्राचीन पुल के माध्यम से ईवो ने बोस्नियाई ग्रामीण समुदाय के चार सदियों के संघर्षमय जीवन को पहली बार विश्‍व के समक्ष रखा। यहां पुल और नदी जीवंत चरित्र के रूप में सामने आते हैं। यह पुल पूरब और पश्चिम को जोड़ने वाले घटक के तौर पर उभरता है, जिसे प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया जाता है। ‘बोस्नियन क्रॉनिकल’ में संस्कृतियों के संघर्ष को ईवो ने अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। नेपोलियन के विश्‍वविजयी अभियान के बाद फ्रांसिसी शासन के दौरान किस तरह तुर्की और यूरोपीय संस्कृतियों में जबरदस्त टकराव होता है, इसे महज सात साल के दौरान एक कथासूत्र में पिरोकर ईवो आंद्रिक ने दर्शाया। ‘द वूमन फ्राम सरायेवो’ में एक नौकरानी की धनलोलुपता को ईवो ने एक नीतिकथा की शैली में औपन्यासिकता प्रदान की। यह नौकरानी अच्छी खासी खाती पीती महिला है, लेकिन पैसों को लेकर उसके लालच का कोई अंत नहीं है।

दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद ईवो आंद्रिक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए और कई वर्षों तक वे यूगोस्लावियाई लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। इस अवधि में ईवो ने सैंकडों कहानियां, यात्रा संस्मरण, सामयिक विषयों पर लेख और कुछ लघु उपन्यास लिखे। पांचवे दशक में यूगोस्लाविया में सामाजिक यथार्थवाद और आधुनिकता को लेकर लंबी बहस चली, जिसमें ईवो आधुनिकता के पक्ष में खड़े थे और अंततः उनके पक्ष की ही जीत हुई। 1960 तक आते-आते ईवो आंद्रिक की रचनाओं का दुनिया की अनेक भाषाओं में अनुवाद होने लगा था और वे सर्वाधिक अनूदित सर्बियाई लेखक हो चुके थे। यूगोस्लाविया के वे सबसे सम्मानित, चर्चित और महत्वपूर्ण व्यक्तियों में थे। 1959 में जाकर ईवो ने चित्रकार मिलिका बेबिक से विवाह किया। 1961 में उन्हें नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। सर्बियाई भाषा के वे पहले साहित्यकार थे, जिन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित होने का गौरव मिला। उनकी नोबल प्रशस्ति में कहा गया कि ईवो आंद्रिक के लेखन में आधुनिक मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि के साथ पुराकथाओं जैसी मानव नियति के दर्शन होते हैं। मानवता के प्रति ईवो गहरा अनुराग और प्रेम महसूस करते हैं लेकिन सबसे बड़ी बुराई के तौर पर दुनिया में मौजूद भय और हिंसा से मुंह नहीं मोड़ते। ईवो आंद्रिक ने अपने देश के इतिहास से मानव की नियति कथाओं को लेकर महाकाव्यात्मक शक्ति से अभिव्यक्त किया है। हिंदी में उनकी कुछ कहानियों का अनुवाद हुआ है। करीब तीन दशक पहले ईवो की उपन्यास त्रयी के पहले उपन्यास को साहित्य अकादमी ने ‘द्रीना नदी का पुल’ शीर्षक से प्रकाशित किया था, जो अब अनुपलब्ध है। ईवो आंद्रिक के लेखन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक निजी और देशज कथा को वैश्विक आयाम देते हैं और इसीलिए सुदूर बोस्निया के बाशिंदों की कहानी भी अपनी-सी लगने लगती है। 13 मार्च, 1975 को 83 बरस की उम्र में ईवो आंद्रिक का निधन हुआ। उनकी मृत्यु के बाद बोस्निया में उनका स्मारक और संग्रहालय बनाया गया। ईवो आंद्रिक आज भी दुनिया में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले सर्बियाई लेखक हैं।

Sunday, 23 May 2010

फतवा है फरमान नहीं

हाल ही में दारुल उलूम देवबंद से एक फतवा जारी हुआ है, जिसके मुताबिक किसी मुस्लिम महिला का कार्यालयों में पुरुष सहकर्मियों के साथ काम करना और उसकी कमाई से घर का खर्च चलाना गैर इस्लामिक माना गया है। यह पहली बार नहीं हुआ है, भारत के मुस्लिम संस्थान बरसों से ऐसे फतवे निकालते रहे हैं, जिनका वर्तमान से, आधुनिक विचारशील  दुनिया से कोई सरोकार नहीं होता और ये संस्थान अपने इतिहास के खोल में ही आनंद पाते हैं। गैर इस्लामी लोगों को तो शायद यह भी पता नहीं होगा कि फतवे का मतलब फरमान या आदेश नहीं होता। ऐसे फतवों पर बाहर की दुनिया हंसती है, इस्लाम के मुताबिक फतवे का मतलब है किसी व्यक्ति विशेष अर्थात धार्मिक विद्वान से किसी धर्मावलंबी द्वारा पूछे गए किसी सवाल के संबंध में कोई राय जाहिर करना। यह राय सिर्फ देने वाले के लिए अनुल्लंघनीय है, बाकी सब लोग इसे मानने या ना मानने के लिए स्वतंत्र हैं, उन पर कोई बंदिश नहीं है, खुद सवाल पूछने वाला भी इसे मानने के लिए बाध्य नहीं है। इस्लाम की तरह तमाम धर्मों में इस किस्म के धार्मिक आदेश निकलते रहते हैं, जिनकी कोई परवाह नहीं करता। सिर्फ इस्लाम में ही इसके उदय के बाद करीब दस लाख फतवे जारी हो चुके जिनमें से शायद दस फीसद भी नहीं माने गए। धार्मिक आदेश दुनिया में सदियों से निकलते रहे हैं, और अगर इंसान इनके कहे पर चलता तो आज भी बैलगाड़ी युग में होता। यह मनुष्य सभ्यता की विरासत का ही कमाल है कि तमाम धार्मिक प्रपंचों के बावजूद मनुष्य अपने अनुसार जीवन जीता है और धर्म का कोई बंधन उसे ऐसा करने से नहीं रोकता।

दरअसल मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि उसे बंधनों को तोड़ने में आनंद मिलता है, इसे किसी बच्चे की गतिविधियों से सहज समझा जा सकता है, जिसे जो काम नहीं करने के लिए मना किया जाए वह पहले करता है, क्योंकि अवज्ञा का अपना मजा है, इससे आज्ञा देने वाला खीजता है और अवज्ञा करने वाले को इस खीज में आनंद मिलता है। जैसे धर्म ने कहा कि जनेउ धारण करना और उसके नियमों का पालन करना चाहिए, बच्चे के लिए इसका कोई अर्थ नहीं, वह उतार कर रख देता है क्योंकि बार-बार उसे कान पर लपेटना और धोना-साफ रखना उसके लिए फालतू काम हैं। इसलिए आजकल ब्राह्मणों में भी यज्ञोपवीत विवाह से पूर्व ही पहना जाता है और फिर अधिकांश लोग जीवन भर नहीं पहनते।

धार्मिक आदेशों का इतिहास सदियों पुराना है, लगभग हर धर्म में धर्मगुरु लोगों की जिज्ञासा शांत करने के लिए अथवा अपने धर्मावलंबियों को सही राह दिखाने के मकसद से समय-समय पर धर्मादेश निकालते रहे हैं, जिनके मानने या ना मानने से सभ्य समाज को बनाने में ऐतिहासिक प्रभाव पड़े हैं। उदाहरण के लिए हिंदू धर्म में एक समय विदेशयात्रा को अधार्मिक घोषित कर दिया गया, जिससे लोगों ने व्यापार एवं ज्ञानार्जन के लिए बाहर जाना बंद कर दिया। इसका सामाजिक प्रभाव यह पड़ा कि लोग एक ही देश में बंद हो गए, नए आविष्कारी संसाधन आना बंद हो गए, हमारा उत्पादन हमीं उपभोग करने लगे, दुनिया में क्या कुछ चल रहा है, हम जान ही नहीं सके, हमारे विद्यार्थी और विद्वान कूपमंडूक बने रहे। हमारे देश पर लगातार आक्रमण होते रहे और हम सहते रहे। हमें पता ही नहीं चला कि बारूद जैसी किसी चीज का आविष्कार हो चुका है जो हमारी तलवारों के मुकाबले ज्यादा घातक है। बाल्टी से लेकर रोटी तक हमने तब जानी जब हम पर विदेशियों ने आधिपत्य जमा लिया, क्योंकि रोटी और बाल्टी विदेशी ही लेकर आए। सिर्फ एक धार्मिक आदेश किसी कौम का कितना हित-अहित कर सकता है इस एक उदाहरण से आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।

दुनिया में सबसे ज्यादा धर्मादेश इस्लाम और ईसाई धर्मों ने निकाले हैं, लेकिन पश्चिमी समाज में धर्म और विज्ञान के संघर्ष में राज्य ने चूंकि विज्ञान का साथ दिया इसलिए वहां बहुत से मामलों में नई सोच को फलने-फूलने का मौका मिला और विकास हुआ। दुनिया के कई देशों में राज्य धार्मिक मामलों में राय-मशविरा देने के लिए धार्मिक मंत्री नियुक्त करते हैं, लेकिन उसकी राय मानना राज्य या जनता के लिए अनिवार्य नहीं होता। ऐसी नियुक्तियां सिर्फ इसलिए की जाती हैं ताकि धर्मसत्ता को यह विश्वास बना रहे कि उनकी राज्य में कोई पूछ है, इसे एक किस्म का तुष्टिकरण भी कह सकते हैं। मध्य पूर्व के बहुत से इस्लामी देशों में फतवा जारी करने से पहले बहस होती है और इस्लामी विद्वान और न्यायविद मिलकर मशविरा करते हैं। फतवे के बाद उपजने वाली तमाम परिस्थितियों और प्रभावों का अध्ययन करने के बाद ही कोई फतवा जारी किया जाता है। इस प्रक्रिया में एक सीमा तक यह संभावना रहती है कि ऐसा फतवा नहीं जारी किया सकता जिससे धर्मावलंबियों की सामान्य जीवनचर्या और देश की विकास प्रक्रिया में अवरोध पैदा हो। जाहिर है कि हाल ही में जारी किए गए फतवे में इस बात का ध्यान नहीं रखा गया, इसीलिए इसे लेकर कई किस्म की बातें हो रही हैं।

आम आस्थावान हिंदू भी अपनी दिनचर्या में रोज कई किस्म के फतवों का सामना करते हैं। मसलन, कहीं जाना हो, कोई मुहूर्त निकलवाना हो, चौघड़िया देखना हो, पूजा का समय पूछना हो या किसी विशेष उद्देश्य के लिए कोई बात पूछनी हो तो प्रायः लोग किसी पंडित के पास जाते हैं। यहां पंडित की राय का स्थान वही है जो इस्लाम में फतवे का है, अर्थात पूछने वाला पंडित की राय मानने या ना मानने के लिए स्वतंत्र है। सूर्य और चंद्र ग्रहण के समय बहुत से आस्थावान हिंदू अन्न-जल ग्रहण नहीं करते, ग्रहण पूरा होने के बाद ही स्नान व पूजा के बाद सामान्य दिनचर्या शुरु करते हैं। इस संबंध में किसी समय कोई फतवा जारी हुआ होगा, जिसे लोग आज तक मानते आ रहे हैं, अखबार तक रोज राहु काल छाप रहे हैं, सूतक का समय प्रकाशित कर रहे हैं। मानने वाले मान रहे हैं और नहीं मानने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। वजह यह कि आधुनिक समय में विज्ञान ने बहुत सी पुरानी धारणाओं को अवैज्ञानिक सिद्ध कर दिया है और लोग किंचित आधुनिकता और कामकाज की व्यस्तता के चलते पुरातनपंथी विचारों से मुक्त हो रहे हैं। लेकिन वैज्ञानिक शिक्षा के अभाव में अतिआस्थावान और कष्टों में जी रहे लोग अपने संशय दूर करने के लिए धर्मगुरुओं की शरण में जाते हैं और उन्हें धर्मग्रंथों में बताई गई पुरातनपंथी सोच के हिसाब से ऐसे हल या उपाय जानने को मिलते हैं, जिनसे मानवता के विकास का ही मार्ग अवरुद्ध होता है।

धर्म अपने आप में एक पूर्ण सत्ता है। वह राज्य के बाद सबसे बड़ी सत्ता है और इतिहास में तो धर्म राज्य को चलाने वाली सत्ता रही है। धर्म की या कहें कि धार्मिक सत्ता की सदैव यही आकांक्षा रहती है कि दुनिया अगर उसके कहे पर चले तो सही मायने में एक धार्मिक राज्य की स्थापना हो सकेगी। लेकिन मनुष्य की प्रकृति ही ऐसी है कि वह बंधनों से मुक्त होकर नया करने की निरंतर कोषिश करता है। इसके लिए वह धर्मगुरुओं से बहस भी करता है, जैसे डार्विन ने की थी। दुनिया के इतिहास में गैलीलियो और डार्विन अगर धर्मसत्ता से नहीं टकराते तो सोचिए इस दुनिया का क्या स्वरूप होता? इतिहास के हर काल खण्ड में ऐसे दूरदृष्टिवान लोग होते हैं, जो धार्मिक जकड़बंदियों के खिलाफ खड़े होते हैं। लोग गुपचुप ही सही उनका अनुसरण करते हैं और एक समय ऐसा आता है कि जकड़बंदियां स्वतः समाप्त हो जाती हैं और नए विचार सहज स्वाभाविक माने जाने लगते हैं। हालांकि ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं है जो कहते हैं कि धर्म अपने मूल में एक हद तक विज्ञान का सहयोगी ही होता है, क्योंकि दोनों की प्रकृति है कि नया कुछ खोजा जाए, जिससे दोनों के मतावलंबियों की संख्या बढ़े। बहरहाल, इस बहस में ना भी पड़ें कि धर्म और विज्ञान कहां तक साथ निभाते हैं, तो भी एक बात तो तय है कि मानवता के इतिहास में इन दोनों के बीच हुए संघर्ष में अधिकांश लोगों ने विज्ञान और वैज्ञानिक विचारों का साथ दिया है, इसीलिए हम यहां तक पहुंचे हैं। धर्मगुरु कुछ भी कहते रहें, मनुष्य अपने हिसाब से सोच विचार कर निर्णय लेता है और आगे बढ़ता रहता है। धर्म और धर्मगुरु अपनी पवित्र किताबों में सुरक्षित रहते हैं, जनता उनका उतना ही सम्मान करती है, जितने के वे हकदार होते हैं।

यह आलेख जयपुर से प्रकाशित ‘डेली न्यूज’ के रविवारीय परिशिष्ट ‘हम लोग’ में 23 मई, 2010 को प्रकाशित हुआ।
Photo Courtsey : twocircles.net

Sunday, 16 May 2010

बेचैन आत्‍मा का कवि : इयुजीनियो मोन्‍ताले

समकालीन भारतीय कविता, विशेष रूप से हिंदी कविता को विश्‍व के जिन कवियों ने बेहद प्रभावित किया है, उनमें इतालवी कवि इयुजीनियो मोंताले का नाम प्रमुख है। आधुनिक इतिहास, दर्शन, प्रेम और मानवीय अस्तित्व की विविध दुविधाओं और बेचैनियों को गीतात्मक सौंदर्य और अबूझ रहस्यों के साथ प्रस्तुत करने वाले मोंताले को 1975 में नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया था। 12 अक्टूबर, 1896 को व्यापारी परिवार में जन्मे मोंताले छह भाई-बहिनों में सबसे छोटे थे। खराब सेहत के चलते बचपन में पढ़ाई आधी-अधूरी रही। संगीत का शौक था और गायक बनने का सपना लिए मोंताले संगीत सीखने लगे। लेकिन अपने गुरु की असामयिक मृत्यु से विचलित हो मोंताले ने संगीत शिक्षा छोड दी और साहित्य की तरफ चले आए। उनकी रूचि इतालवी और यूरोपीय साहित्य के साथ दर्शनशास्त्र में थी। परिवार में सबसे छोटे होने के कारण उन्हें अपने मन से कुछ भी करने की स्वतंत्रता थी। इसलिए कुछ दिन उन्होंने एकाउंटेंट की नौकरी भी की और प्रथम विश्‍वयुद्ध में सैन्य अधिकारी के रूप में देश की सेवा भी की। लेकिन किताबों के प्रति अपने अगाध प्रेम की वजह से वे पूरी तरह साहित्य की दुनिया में लौट आए। पुस्तकालयों में घंटों बैठकर पढते और लिखते। कई पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हुए उन्होंने कुछ समय एक प्रकाशन संस्थान में भी काम किया। 1928 में वे एक अनुसंधान पुस्तकालय के निदेशक नियुक्त किए गए, जहां से उनकी आलोचना यात्रा आरंभ होकर नए आयामों तक पहुंची।

मोंताले राजनैतिक तौर पर फासीवाद के विरोधियों के साथ थे, इसलिए उनका पहला कविता संग्रह 'बोन्स ऑफ द कटलफिश' 1925 में फासीवाद विरोधी प्रकाशक पिएरो गोबेती ने प्रकाशित किया। मोंताले परिवार गर्मियों के दिन  एक छोटे से गांव लिगूरिया में बिताया करता था। मोंताले ने अपने पहले संग्रह की कविताओं में उसी गांव के श्रमशील लोगों की जिंदगी, उस वातावरण में अपने एकांतिक अस्तित्व और उसमें छाई हुई हताशा और नैराश्‍य के बीच वहां के प्राकृतिक सौंदर्य को अपनी विशिष्ट शैली में प्रस्तुत किया। प्रथम विश्‍वयुद्ध की निरर्थकता ने समूचे यूरोपीय साहित्य को प्रभावित किया और मोंताले भी इससे अछूते नहीं रहे। मोंताले के पहले संग्रह में एक प्रसिद्ध कविता की अंतिम पंक्तियां हैं-

आज हमारे पास आपसे कहने के लिए इतना भर है कि
हम वो नहीं हैं कि जो हम होना नहीं चाहते

1933 में मोंताले की मुलाकात यहूदी-अमेरिकी शोधकर्ता इरमा ब्रेंडिस से हुई और जल्द ही उनकी मित्रता मशहूर हो गई। दांते पर शोधरत इरमा को लोग दांते की प्रेमिका बिएत्रिस की तरह मोंताले की बिएत्रिस कहने लगे। 1938 में फासीवादी सरकार ने आते ही मोंताले को निदेशक के पद से हटा दिया। अगले साल उनका सबसे महत्वपूर्ण संग्रह 'द ऑकेजंस' प्रकाशित हुआ। इसे इतालवी साहित्य में प्रथम विश्‍वयुद्ध के बाद की सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक माना जाता है। इस संग्रह में एक तरफ तो फासीवाद के विरोध में स्वर उठाती कविताएं हैं तो दूसरी तरफ इरमा को क्लीजिया के रूप में संबोधित कर लिखी गई प्रेम कविताएं हैं। मानव मन की अनंत गहराइयों का उत्खनन करते हुए मोंताले अपने निजी संसार को भी कविता में अपनी दुरूह शैली में सार्वजनिक बना देते हैं। बेहद निजी और अबूझ संसार को अपनी कविता में रचते हुए मोंताले व्यक्तिगत रूप से भी गैर सांसारिक हो जाते हैं। संगीत की दुनिया में उन्हें सुकून मिलता है और वे इटली के सबसे बड़े अखबार कूरियर डेला सेरा के लिए अपने नियमित स्तंभ में संगीत की चर्चा करते रहते हैं। अपनी कविता की एकांतिक दुनिया और दुरुहता के बारे एक बार उन्होंने कहा था, 'एक कवि कभी नहीं जानता और अक्सर जान ही नहीं पाता कि वह किस पाठक को संबोधित कर लिख रहा है।'
 
लंबे समय तक मोंताले कविता की दुनिया से दूर रहे और विश्‍व के महान साहित्यकारों की रचनाओं का इतालवी में अनुवाद करते रहे। दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद वे मिलान चले गए। यहां वे अपनी आत्मकथा लिखने लगे जो कई सालों में कई बार प्रकाशित होते अंततः दो खण्डों में पूरी हुई। 1956 में उनका महत्वपूर्ण संग्रह 'द स्टोर्म एण्ड अदर पोएम्स' प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद उपजी स्थितियों का काव्यात्मक और आलोचनात्मक आख्‍यान है। इसमें हिटलर, मुसोलिनी और क्लीजिया के साथ स्वयं कवि अपने समय की निर्मम आलोचना करता हुआ जंग की खिलाफत करता है और मानवता की बात करता है। चौथा संग्रह 'सेतूरा' 1962 में प्रकाशित हुआ। इसमें मोंताले बेहद व्यंग्यात्मक लहजे में दुनिया की विद्रूपताओं का वर्णन करते हैं। 'धुंधली-सी रोशनी हुई/जब इंसान ने सोचा/कि वह छछूंदरों और झींगुरों से बहुत बड़ा है।'

1967 में उन्हें इटली की सीनेट का आजीवन सदस्य बनाया गया। उन्हें मिलान, केंब्रिज और रोम विद्गवविद्यालयों ने मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की। 1975 में उन्हें नोबल पुरस्कार मिला। 12 सितंबर 1981 को उनका निधन हुआ। मोंताले की मृत्यु के बाद 1996 में प्रकाशित उनकी डायरी कवियों, काव्यप्रेमियों और आलोचकों के बीच बहुत लोकप्रिय है।