Wednesday, 11 March 2009

इन्कलाबी शायर मख़्दूम मोहिउद्दीन का जन्म शताब्दी समारोह




मख़्दूम की जिन्दगी और उनकी शायरी में कोई अन्तर्विरोध नहीं था-नुसरत



मखदूम में अपने समय को जांचने और परखने की अद्भुत क्षमता थी-स्वाधीन



मख़्दूम हमारे साहित्य का शानदार सरमाया है-कृष्ण कल्पित
जयपुरः राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ और राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में 8 मार्च, 09 को अकादमी सभागार में हिन्दुस्तान के इन्कलाबी शायर और स्वतंत्रता सेनानी मख़्दूम मोहिउद्दीन की जन्म शताब्दी श्रद्धापूर्वक मनाई गई।
मुख्य अतिथि प्रतिष्ठित शायर और मख़्दूम मोहिउद्दीन के सुपुत्र नुसरत मोहिउद्दीन ने उनके जीवन के अछूते और अंतरंग संस्मरण सुनाते हुए बताया कि मख़्दूम की बातचीत का अंदाज अनूठा और प्रभावित करने वाला था। उन्होंने कहा कि मख़्दूम की जिन्दगी और उनकी शायरी में कोई अन्तर्विरोध नहीं था। वे जो देखते थे उसका अक्स उनकी शायरी में प्रतिबद्धता के साथ झलकता था। वे बच्चों को बताते थे कि हम अपराधी के रूप में जेल यात्रा नहीं करते थे बल्कि गरीबों को उनका हक और किसानों को उनकी जमीनें दिलाने के लिए जेल जाते हैं।
अपना संस्मरण सुनाते हुए नुसरत ने बताया कि एक बार हिन्दुस्तान की मशहूर महिला कव्वाल शकीला बानो भोपाली उन दिनों हैदराबाद आई हुई थीं और मख़्दूम मोहिउद्दीन की लिखी गजल को अपनी आवाज में सजाने के लिए रियाज कर रही थी। हमें उनसे मिलने की चाहत हुई तो अपने वालिद मख़्दूम साहब को बिना बताये ही उनका शेरवानी शूट पहनकर उस होटल में पहुंच गये जहां शकीला जी ठहरी हुई थीं। कुछ देर बाद जब मख़्दूम साहब वहां आये तो हमें देखकर हैरत में पड़ गये और अपने ही अंदाज में कहने लगे, ’तो जनाब आप यहां पहुंच गये। ये सूट तो मुझे पहनकर आना था। खैर, आप लोग शकीला जी से मिल लिए हैं और आपका मकसद पूरा हो गया है तो अब घर चले जाएं और यह सूट एहतियात से हैंगर में लगाकर रख दें। उनकी बात सुनते हुए हम पसीना-पसीना हो रहे थे।’
नुसरत ने बताया कि उन्होंने प्रेम विवाह किया जिससे घर वाले नाराज थे। अपने पिता को जब यह बात पता चली तब वे जेल में थे। उन्होंने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा कि फिक्र मत कीजिए और मेरे दोस्त राज बहादुर गौड़ से मिलिए जो आपको सरपस्ती देंगे। उनकी सरपरस्ती में ही शादी हुई थी, लेकिन हम शादी के बाद अपने घर नहीं गये। जब पिता मख़्दूम साहब जेल से छूटे तो वे हमें लेकर घर आये। बच्चों के साथ उनका हमेशा अच्छा सलूक रहता था। वे जहां भी जाते या रहते तो वहां के वाकियात, रहन-सहन, खानपान की बातें हमसे किया करते थे। मख़्दूम साहब बेशक आम लोगों की लड़ाई में साथ खड़े हुए रहते थे, लेकिन परिवार के लोगों और बच्चों से भी बराबर जुड़े रहते थे। हमने उन्हें दिली तौर पर कभी अपने से अलग महसूस नहीं किया।
नुसरत ने मख़्दूम की स्मृति में लिखी एक नज्म की ये पंक्तियां सुनाते हुए अपनी बात पूरी की-
तीन छः महीने और फिर बरस बीत गए

दिल तन्हा है

तन्हाई आंख से आंसू बनकर ढल जाती है

फिर भी अरसे से तेरे शे’र तेरी आवाज गूंजा करती है

फजाओं में आसमानों में

मुझे यूं महसूस होता हैजैसे तू हयात बन गया हैऔर मैं मर गया हूं।
हैदराबाद से आये समारोह के मुख्य वक्ता, प्रतिष्ठित कवि और ’हिन्दी साहित्य संवाद’ के सम्पादक शशिनारायण स्वाधीन ने अपने वक्तव्य में कहा कि जब उपनिवेशवाद से लड़ाई चल रही थी तब मख़्दूम मोहिउद्दीन ’अंधेरा’ नज्म कह रहे थे। आजादी की लड़ाई के समापन पर नये सूरज के स्वागत के प्रति गिरिजा माथुर ने भी हमें सावधान किया था। यह एक मोहभंग के समय की ओर संकेत था - ’आज जीत की रात पहरुए सावधान रहना’ और मख़्दूम खुले रूप में कह रहे थे -
रात की तलछटें हैं, अंधेरा भी है, सुबह का कुछ उजाला, उजाला भी हैहमदमों हाथ में हाथ दोसूए मंजिल चलोमंजिलें प्यार की मंजिले दार की कूए दिलदार की मंजिलेंदोश पर अपनी-अपनी सलीबें उठाए चलो।
स्वाधीन ने मख़्दूम और मुक्तिबोध के साहित्य की शाश्वतता पर विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि हर तरफ जब अंधेरा था तब उसके खिलाफ हमारे यहां मख्दूम और मुक्तिबोध जैसे दो बड़े रचनाकार संघर्ष कर रहे थे। इन दो क्रांतिकारी और युग परिवर्तनकारी कवियों का सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक संघर्ष अलग-अलग भूगोल और स्थितियों से जुड़ा रहा, लेकिन इनके मूल संघर्ष की धारा, साम्राज्यवाद के विरुद्ध कहीं अधिक निकट और पास-पास देखी जा सकती है। मख़्दूम को समझने के लिए देश, काल और इतिहास के साथ हमें कवि की संघर्ष भूमि-तेलंगाना के सशस्त्र संग्राम को भी समझना जरूरी है। इस संघर्ष में मख्दूम ने गरीब किसानों को निजामशाही और सामंतों-जागीरदारों के शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए खुद बंदूक उठाई थी और निजाम की सेना के अलावा अंग्रेजों की सेना का भी मुकाबला किया था।
स्वाधीन ने कहा कि मख़्दूम मुक्तिबोध की तरह पहले अध्यापन से जुडे़। उन्होंने जीवन के प्रारम्भिक दिनों में निचले दर्जे की जिन्दगी का सामना किया, एक अनाथ बच्चे के रूप में मस्जिदों में झाड़ू लगाते हुए उन्होंने बचपन बिताया और बड़ी जद्दोजहद करते हुए तालीम हासिल की। जब उन्होंने अध्यापन शुरु किया तब वे अपने छात्रों को अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में रुसी साहित्य का अनुवाद करने की प्रेरणा देते थे। यह साहित्य उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध लोगों को तैयार करने वाला था। मख़्दूम क्लास रूम में पाठ्यपुस्तकों के पाठ की बजाय निजाम और जमींदारों के अत्याचारों के विरुद्ध अधिक बोलते थे। बाहर उनकी ख्याति एक इन्कलाबी शायर के रूप में हो गई थी। एक दीक्षान्त सामारोह में निजाम उस्मान अली खान आमंत्रित थे। तब मख़्दूम के नेतृत्व में सैकड़ों छात्रों ने ’गाॅड सेव दी किंग’ राष्ट्रीय गीत को गाने से इंकार कर दिया था और मख़्दूम ने उसकी जगह अपना गीत ’धंसता है मेरेे सीने में जैसे बांस का भाला, वो पीला दुशाला सुनाया। गौरतलब है कि निजाम हरा साफा बांधते थे और पीला दुशाला ओढ़ते थे। इस घटना के बाद मख़्दूम ने काॅलेज से इस्तीफा दे दिया। सितम्बर 1939 में जब साम्राज्यवादी जंग हुई उस समय मख़्दूम ने इन्कलाबी नज़्म लिखी जिसमें आने वाली नई विश्वव्यवस्था की ओर बढ़ने की आशा थी।
स्वाधीन ने कहाकि मुक्तिबोध और मख़्दूम में अपने समय को जांचने और परखने की क्षमता मौजूद थी। प्रतिबद्धता और दृष्टिकोण की अतल स्पर्शिता दोनों में थी। यह कहा जा सकता है कि मख़्दूम का कवि अवामी लड़ाइयों में शामिल था। निजामशाही साम्राज्य को उखाड़ फैंकने के लिए एक तरफ उन्होंने अभियान चलाया था वहीं अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ भारत की स्वतंत्रता के लिए जान की बाजी लगा रखी थी। वे अपनी कलम के साथ-साथ सशस्त्र घूमते थे और हुकूमत ने उनके सिर पर उस जमाने में पांच हजार का इनाम घोषित कर रखा था। मख़्दूम मोहिउद्दीन आज भी प्रासंगिक हैं और हमेषा रहेंगे।
सुपरिचित कवि कृष्ण कल्पित ने कहा कि हम उन खुशनसीब भारतीयों में से एक हैं जो मख़्दूम की शायरी पढ़ते हुए बड़े हुए और हमारे साहित्यिक संस्कार उन्हीं से प्रेरित रहे। मख़्दूम सच्चे अर्थों में क्रांतिकारी शायर थे। उर्दू में रोमेंटिक रिवोल्यूशनरी धारा मख़्दूम साहब से शुरु हुई। ग़ज़ल और शायरी से मख़्दूम ने क्रांति जगाने का जैसा काम किया, इस तरह पहले किसी ने शायरी को क्रांति, आम आदमी और सड़क से नहीं जोड़ा। इसके बाद तो उर्दू शायरी में एक धारा ही चल पड़ी। मज़ाज़ जैसे शायर इसी कड़ी के शायर थे। मज़ाज़ को उर्दू का कीट्स कहा जाता है लेकिन मज़ाज़ से पहले मख़्दूम जैसे कीट्स उर्दू में पैदा हो चुके थे और वही धारा थी जो मज़ाज़ तक पहुंची। संस्कृत में जिसे वज्र से भी कठोर और फूल से भी कोमल कहा जाता है, ऐसी ही शायरी मख़्दूम साहब की थी जिसका विस्तार जीवन में होता दिखाई देता है। अगर मख़्दूम की शायरी का ठीक-ठीक अक्स हिन्दी में खोजना हो तो वह निराला या नागार्जुन में मिलेगा। वैचारिक धरातल एक होते हुए भी मख़्दूम की शायरी और मुक्तिबोध की कविता की शक्लें अलग थीं। इतनी मौलिक, इतनी पैनी और सेंसिटिव शायरी करने वाले मख़्दूम ’एक चमेली के मंडवे तले दो बदन प्यार के लिए जल गये’ जैसी और क्रांति की कविता लिखने वाले शायर की तुलना मुक्तिबोध से करने के साथ-साथ क्रांतिकारी कवि नजरुल इस्लाम से भी की जानी चाहिए। मख़्दूम सिर्फ उर्दू के शायर नहीं थे। भारतीय कविता के आसमान में जो सितारे और नक्षत्र आज हम देख रहे हैं, उनमें मख़्दूम सबसे तेज चमकते सितारे हैं। आने वाले हजारों वर्षाें तक उनकी शायरी जिन्दा रहेगी। मुक्तिबोध का संघर्ष उनका मानसिक संघर्ष था, जबकि मख़्दूम साहब ने सड़क पर आकर राजशाही और साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
कल्पित ने कहा कि मख़्दूम ने ’ये जंग है जंगे आजादी, आजादी के परचम के तले’ और ‘फिर छिड़ी बात फूलों की रात है या बारात फूलों की’ जैसी शायरी की। कहते हैं कि रेगिस्तान में गर्मी और ठंड के तापमान में जो अन्तर है वह विस्तृत भूमि और विस्तृत वेदना मख़्दूम की शायरी में मिलती है जो मख़्दूम को बड़ा बनाती है। वे हमारे भारतीय साहित्य का शानदार सरमाया हैं।’
उन्होंने कहा कि प्रगतिशील आन्दोलन में मख़्दूम का जो योगदान है उसे हमें पाॅब्लो नेरुदा या विश्व के ऐसे ही महान रचनाकारों की तरह याद करना चाहिए। उनकी कविता में जो क्रांतिकारिता दिखाई देती थी वही उनके जीवन में झलकती थी। आज के दौर में किसी को रिवोलुशनरी कहना जबकि महाश्वेता देवी द्वारा ब्यूरोक्रेट्स को भी रिवोलुशनरी कहा जाता है, कुछ सोचने को विवश करता है। आज जब हमारे प्रगतिशील और जनवादी मित्रों को पूंजीपतियों के पुरस्कार लेने से फुरसत नहीं है, ऐेसे समय में मख़्दूम को याद करना एक सही पथ को याद करना है।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रमुख कवि और मीडियाकर्मी नन्द भारद्वाज ने कहा कि मख़्दूम और उस दौर के बहुत से कवि एवं लेखक इस बात की ओर इशारा करते हैं कि आजादी की लड़ाई मंे किस तरह शायरों और अदीबों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सभी परिचित हैं कि राजस्थान में अंग्रेजी हुकूमत और देशी हुकूमत के खिलाफ एक जबर्दस्त लड़ाई यहां के लेखकों ने अपने स्तर पर लड़ी। वे आजादी की मशाल को बुलन्द किए रहे। उन्होंने कलम के माध्यम से आवाज उठाई और आंदोलनों में भी शामिल रहे।
राजस्थानी कवि आजादी के आंदोलन में भी सक्रिय रहे। वह लड़ाई की प्रकृति ही कुछ ऐसी थी जो जागरूक लोगों को स्वतः अपने से जोड़ लेती थी। उन लोगों का आजादी और लोकतंत्र को लेकर एक खूबसूरत सपना था। वह लड़ाई कोई छोटे मकसद या आजादी प्राप्त कर लेने से सब कुछ प्राप्त हो जायेगा, इस मकसद को लेकर नहीं थी बल्कि बेहतर हिन्दुस्तान, एक अच्छा देश और एक अच्छा भविष्य बनाना है, यह बात उनके दिमाग में थी। आजादी के बाद जब यह सपना बिखरने लगा तो चाहे मुक्तिबोध हों या मख़्दूम मोहिउद्दीन, तमाम फनकार-अदीब चुप नहीं रह सकते थे। ऐसे शायरों को याद करना हमारा फर्ज भी है और जरूरत भी।
भारद्वाज ने कहा कि हम अपनी इस विरासत को सहेजकर रखें, इससे सीखें और हम इसमंे क्या जोड़ सकते हैं, इस बात पर मिल-बैठकर विचार करें। इसी में इस आयोजन की सार्थकता है। प्यार की जो पवित्र भावना थी वह मख़्दूम की नज़्मों और ग़ज़लों में मौजूद थी। ऐसे शायर की विरासत को हम अपनी विरासत का हिस्सा अनिवार्य रूप से बनाएं तभी लेखन की सार्थकता है।
इस अवसर पर अली सरदार जाफरी द्वारा मख़्दूम मोहिउद्दीन के जीवन संघर्ष और उनकी शायरी पर निर्मित डेढ़ घण्टे की एक फिल्म का प्रदर्शन किया गया। जयपुर में जन्मे सिने जगत के मशहूर अभिनेता इरफान ने बखूबी मख़्दूम के किरदार की भूमिका निभाई है। इस फिल्म के साथ मख़्दूम मोहिउद्दीन की आवाज में शायरी भी समारोह में मौजूद श्रोताओं को सुनाई गई। समारोह के अन्त में यशस्वी उपन्यासकार-कथाकार स्व. यादवेन्द्र शर्मा ’चन्द्र’ और जयपुर के सांसद स्व. गिरधारीलाल भार्गव को दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धाजंलि दी गई।
प्रारंभ में राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव प्रेमचन्द गांधी ने मख़्दूम मोहिउद्दीन की शायरी, उनके जीवन संघर्ष और साहित्य जगत के लिए उनके योगदान पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला। गंाधी ने कहा कि मख्दूम मोहिउद्दीन को आजकल लोग एक फिल्मी गीतकार की तरह जानते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि मख्दूम ने कभी फिल्म के लिए नहीं लिखा। मख्दूम की रचनाओं की ताकत और लोकप्रियता के कारण फिल्मकारों ने उनकी रचनाओं को फिल्मों में लिया। उनकी कुल जमा छह रचनाएं फिल्मों में ली गई हैं। मख्दूम ने तेलंगाना में किसानों के साथ जो संघर्ष किया उसे लेकर उर्दू के महान उपन्यासकार कृषन चंदर ने ‘जब खेत जागे’ उपन्यास लिखा, जिस पर गौतम घोष ने तेलुगू में ‘मां भूमि’ फिल्म बनाई। गांधी ने कहा कि मख्दूम की प्रमुख कृतियों में सुर्ख सवेरा, गुल-ए-तर और बिसात-ए-रक्स हैं। इस जन्मषताब्दी के मौके पर नुसरत और स्वाधीन ने ‘सरमाया’ नाम से मख्दूम समग्र संपादित किया जिसे वाणी प्रकाषन ने प्रकाषित किया है। मख्दूम ने जार्ज बर्नाड शा के नाटक ‘विडोवर्स हाउस’ का उर्दू में ‘होष के नाखून’ नाम से और एंटन चेखव के नाटक ‘चेरी आर्चर्ड’ का ‘फूल बन’ नाम से रूपांतर किया। मख्दूम ने रवींद्रनाथ टैगोर और उनकी शायरी पर एक लंबा लेख भी लिखा। ‘फूल बन’ में भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की बेटी लीलामणि ने अभिनय किया, जो आंध्रप्रदेष की रंगमंच पर आने वाली पहली अभिनेत्री थीं। इस अवसर पर प्रमुख चित्रकार एकेष्वर हटवाल ने श्रद्धास्वरूप मख़्दूम का खूबसूरत चित्र तैयार कर प्रगतिशील लेखक संघ को भेंट किया, जिस पर श्रद्धासुमन अर्पित किये गये।
प्रस्तुति-फारूक आफरीदीउपाध्यक्ष, राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ,ई-750, न्याय पथ, गांधी नगर, जयपुर-302015 (राज.)मो.ः 94143 35772

Sunday, 8 March 2009

शब्दों की सरहद पर औरत



साहित्य और समाज में हर दौर में स्त्रियों की बदहाली को लेकर चिंतन-अनुचिंतन किया जाता रहा है। दुर्भाग्य से बहुत सारे लोग यह मानकर चलते हैं कि नारीवादी चिंतन पाश्चात्य दुनिया में पैदा हुआ और भारत में इसका अंधानुकरण किया जा रहा है। दरअसल स्त्री विमर्ष कोई नई परिघटना नहीं है और अगर भारतीय परंपरा में देखें तो ऋग्वेद से ‘सीमंतिनी उपदेश’ तक एक लंबी परंपरा है, जिसमें स्त्री की स्वाधीनता और पुरुष के समान अधिकारों की बात कही गई है। हिंदी की प्रसिद्ध कवयित्री अनामिका की पुस्तक ‘स्त्रीत्व का मानचित्र’ इस विषय की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है, जिसमें भारतीय आर्ष साहित्य से लेकर सामाजिक आंदोलनों, विभिन्न भाषाई साहित्य और पाश्चात्य नारीवादी विमर्ष की बहुत गहरी पड़ताल की गई है। इसी प्रकार कात्यायनी ने ‘दुर्ग द्वार पर दस्तक’ में समकालीन स्त्री विमर्ष को एक रेडिकल नजरिये से देखा है और आज के समय में समूचे नारीवादी चिंतन को एक प्रतिबद्ध वामपंथी दृष्टिकोण से जांचने-परखने की कोषिष की है। देखा जाए तो साठ के दशक के नारीवादी आंदोलन के बाद स्त्रियों के बहुत से सवालों को भारतीय समाज में प्रतिबद्ध लेखिकाओं और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकताओं ने विभिन्न नजरियों से देख परख कर विश्लेषित कर समग्रता में एक वृहद नारी-समानतावादी विमर्ष तैयार करने के प्रयास किये हैं, जिसने बहुत सी नई लेखिकाओं को तैयार किया और अपने समय और समाज को लैंगिक समानतावादी दृष्टि से रूपायित करने की जमीन तैयार की।
यद्यपि यह बात सही है कि बीसवीं शताब्दी में स्त्री को लेकर सबसे ज्यादा विमर्ष और चिंतन हुआ। लेकिन भारत ही नहीं दुनिया के अनेक देशों में नारी समानता को लेकर चिंतन उन्नीसवीं सदी में ही प्रारंभ हो गया था। कार्ल मार्क्स ने ‘पूंजी’ में सैंकड़ों जगह मजदूर स्त्रियों के साथ अन्याय से लेकर विभिन्न प्रकार के समतामूलक सवालों की चर्चा की है, यद्यपि मार्क्स का विश्लेष्ण लैंगिक आधार पर नहीं था और उन्होंने स्त्री की बात वर्गीय ढांचे के अंतर्गत ही की है, जिसे बहुत से लोग उस वक्त की एक सीमा मानते हैं। आज के महाशक्तिशाली देश अमेरिका में 1861 में तीस वर्षीया रेबेका हार्डिंग ने साहित्य के तत्कालीन घेरे से बाहर रहकर ‘लाइफ इन द आइरन मिल्स एण्ड अदर स्टोरीज’ जैसी किताब लिखी जो अमेरिका के इतिहास की पहली नारीवादी विमर्ष की प्रामाणिक पुस्तक मानी जाती है। इस किताब की खास बात यह कि अमेरिका में इससे पहले स्त्री विमर्ष की कोई लिखित रचना या किताब ही नहीं मिलती। लेकिन नारीवादी विमर्ष में हमारे सामने सीमोन द बोउवा, वर्जीनिया वुल्फ, कैथरीना मैन्सफील्ड, केट मिलेट, ज्यां राइस, एडिथ व्हार्टन, क्रिस्टीना स्टीड, जेन बाउल्स और क्रिस्टीन ब्रुक रोज जैसी लेखिकाएं प्रमुख तौर पर सामने आती हैं, जिन्होंने अपने लेखन से बीसवीं शताब्दी के सामाजिक चिंतन की धारा को ही बदल डाला। सीमोन द बोउवा की 1949 में प्रकाशित ‘द सैकण्ड सेक्स’ ने अपने समय में जो हलचल मचाई उसकी अनुगूंज आज भी सुनाई देती है। दुनिया की तमाम प्रमुख भाषाओं में अनूदित इस पुस्तक ने स्त्री विषयक चिंतन को वैज्ञानिक और तार्किक आधार दिया और नारी समानता की पुरजोर वकालत की। यह किताब बताती है कि किस प्रकार इतिहास में एक स्त्री को मनुष्य समझने के बजाय लैंगिक भेदभाव की दृष्टि से एक ‘इतर लिंग’ के रूप में देखा जाता रहा है और इसी आधार पर प्रताड़ित किया गया है।
वर्जीनिया वुल्फ की 1929 में प्रकाशित ‘ए रूम आफ वन्स ओन’ में इस बात की चर्चा की गई है कि क्या एक स्त्री लेखन में शेक्सपीयर के समान ही उत्कृष्ट रचना कर सकती है? वो इस किताब में दिखाती हैं कि तमाम किस्म की चीजों के बावजूद एक स्त्री पुरुष के समकक्ष सिर्फ इसलिए नहीं हो सकती, क्योंकि उसके लिए कुछ दरवाजे हमेषा बंद रहते हैं, जो उसे रोकते हैं। इसी प्रकार केट मिलेट की पुस्तक ‘सेक्सुअल पालिटिक्स’ में इस बात को रेखांकित किया गया है कि राजनीति में स्त्रियों को लैंगिक आधार पर खारिज किया जाता रहा है और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के चलते यौन संबंध भी प्रभावित होते हैं, जिन्हें अनेक स्तरों पर देखा जा सकता है। मिलेट ने डी.एच.लारेंस जैसे महान लेखकों की रचनाओं में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के लक्षणों को उजागर किया। 1970 में प्रकाशित मिलेट की इस कृति के बाद राजनीति में महिलाओं की भागीदारी की बात प्रमुखता से उठने लगी और आज के नारी आंदोलन की यह सबसे अहम मांगों में से एक है।


स्त्री समानता का लक्ष्य स्त्रियों को सत्ता में भागीदार बनाए बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता और हजारों वर्षों से सताई हुई स्त्री की आवाज जिन किताबों में मुखरित हुई हैं, वे सदियों तक मानवजाति का मार्गदर्शन करती रहेंगी।

Tuesday, 3 March 2009

संघर्ष और जीवन की जयकथा





कुछ कलाकार हमेशा लीक से हटकर काम करने में विशवास करते हैं और तमाम किस्म की मुश्किलों के बीच भी अविचलित रहते हुए निरंतर अपने सृजन में रत रहते हैं। एकेश्वर हटवाल ऐसे ही कलाकार हैं, पूरी निष्ठा के साथ कला को समर्पित और मीडिया की चकाचौंध से दूर अपने अनूठे अंदाज में उद्देश्यपरक और जनपक्षधर कला का संसार रचते हुए। वे पहले-पहल अपनी ‘रिक्षावाला’ चित्र-श्रृंखला से चर्चित हुए थे। इसके बाद एकेश्वर ने लोक कलाकार-नर्तकों को अपने चित्रों में पूरी खूबसरती के साथ ही नहीं बल्कि सांगीतिक लय और कलात्मक उर्जा के साथ जीवंत किया। हमेशा कुछ अलग और सार्थक प्रयोग करने वाले एकेश्वर ने इस बार अपनी कला का माध्यम ही बदल डाला और मूर्तिशिल्प के साथ ब्लू पोटरी में आधुनिक चित्र बनाने की पहल की। इस नये काम की हाल ही एन एक प्रदर्शनी जवाहर कला केंद्र, जयपुर में आयोजित हुई तो एक सुखद आश्चर्य हुआ कि पिछले कई महीनों से एक सड़क दुर्घटना में घायल शरीर के कष्ट झेलते एकेश्वर ने एक नया अवतार लिया है। यह प्रदर्शनी उस दिन शुरू हुई जिस दिन बराक हुसैन ओबामा ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली। एकेश्वर के ब्लू पोटरी चित्रों में ओबामा भी है, जो पूरी दुनिया के अश्वेत और वंचितों के नए मसीहाई प्रतीक कहे जा रहे हैं।

मूर्तिकला एकेश्वर बरसों से पढ़ा रहे हैं, लेकिन पहली बार उन्होंने इस माध्यम में खुद काम किया है। और उनके मूर्तिशिल्प देखने से पता चलता है कि इस माध्यम पर उनकी कितनी गहरी पकड़ है और अपने गहन चाक्षुष अध्ययन से उन्होंने जिन लोक कलाकारों की कला को आत्मसात किया है, उसे मूर्तिशिल्प में ढालते हुए वे इस कदर तल्लीन हो जाते हैं कि दो कला-रूप एक दूसरे में बहुत खूबसूरती के साथ समाविष्ट हो जाते हैं। नृत्य और संगीत की लय को मूर्तिशिल्प में पकड़ पाना आसान नहीं है और सबसे बड़ी बात यह कि उसमें नवीनता का समावेश कैसे किया जाए? आखिरकार कला में नवीनता का सृजन ही तो सबसे महत्वपूर्ण बात है। जिंदगी के जिस पहलू को कला में व्यक्त किया जाता है, वह अगर प्रेक्षक को नवीनता का बोध नहीं कराता तो कैसी कला? देखे हुए को नये ढंग से दिखाना ही तो चाक्षुष कला है। कहना न होगा कि एकेश्वर ने इस दृष्टि से बहुत ही सुंदर और उत्कृष्ट काम किया है। इन मूर्तिशिल्पों में ढोल, मंजीरे और परात बजाते तथा नृत्य करते लोक कलाकार राजस्थान, मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ के होते हुए भी वैश्विक लगते हैं, क्योंकि एकेश्वर ने अपनी कलाभिव्यक्ति में उनको इस कदर रूपांतरित कर दिया है कि वे सृजनशील और श्रमजीवी कलाकार अधिक लगते हैं, पेशेवर कलाकार कम। और ऐसा करते हुए एकेश्वर इस बात का ध्यान रखते हैं कि लोक कलाकारों की सर्जनात्मक जिजीविषा और उर्जा ही शिल्प की ताकत बन जाए, स्त्री-पुरुष कलाकार का भेद मिट जाए और एक सार्वभौमिक लोक कलाकार की छवि प्रेक्षक के दिलो-दिमाग पर इस तरह रच-बस जाए कि उसके लिए देखे हुये कलाकार एक सर्वथा नए रूप में प्रकट हों और किंचित विस्मय के बाद वह दो कलाओं के इस महामिलन को एक नए चाक्षुष कला-आस्वाद के रूप में ग्रहण कर सके। इन मूर्तिशिल्पों में एक शिल्प रिक्षा वाले का भी है। इस शिल्प की खास बात यह है कि इसमें रिक्षा और चालक एकमेक हो गये हैं और लोक कलाकारों की भांति रिक्षाचालक भी अपनी विशिष्ट लय में किसी श्रमजीवी कलाकार की तरह सृजन में लीन दिखाई देता है।जयपुर की ब्लू पोटरी कला विश्वविख्यात है और राजस्थान के महान चित्रकार स्व. कृपालसिंह शेखावत ने इस कला को नए आयाम प्रदान किए। एकेश्वर हटवाल ने ब्लू पोटरी में सर्वथा नए प्रयोगशील काम की शुरूआत की है। इस प्रदर्शनी में एकेश्वर के तीस ब्लू पोटरी चित्रों को देखने के बाद बरबस ही इस बात पर हमारा ध्यान जाता है कि अभी भी आधुनिक कला को कितने नए माध्यमों में प्रवेश करना बाकी है। ब्लू पोटरी कला में अब तक पारंपरिक किस्म का चित्रांकन ही होता आया है और स्व. कृपालसिंह जी जैसे कलाकार भी उसमें इस किस्म के प्रयोग नहीं कर पाए थे। वैसे भी कृपालसिंह जी पारंपरिक कला को थोड़ी ज्यादा ही तवज्जोह दिया करते थे। बहरहाल, एकेश्वर ने इस लिहाज से ऐतिहासिक शुरूआत की है। इधर कुछ सालों से इस कला में यानी ब्लू पोटरी में प्रयोग और नवाचार तो हुए हैं, लेकिन कथ्य या अंतर्वस्तु के लिहाज से कोई खास उल्लेखनीय बदलाव नहीं देखने को मिले। जो थोड़े बहुत बदलाव हुए भी तो कृपालसिंह जी और उनके शिष्य रामगोपाल सैनी ने किए। एकेश्वर ने रामगोपाल सैनी के साथ मिलकर इस नए काम को पूरा किया। एकेश्वर के ब्लू पोटरी चित्र टाइल्स में बनाए गये हैं। अभी तक हम लोग टाइल्स में खास तौर पर सिरेमिक में, एक ही बदलाव देख पाए हैं कि वहां भी धार्मिक प्रतीक और देवी-देवता सजावटी चीजों की तरह प्रवेश कर गये हैं या पाश्चात्य नमूने और वस्त्रसज्जा के रूपाकार आए हैं। ऐसे में एकेश्वर का काम बेहद सुकून देता है कि टाइल्स में आप अश्वेत समुदाय के महानायक बराक हुसैन ओबामा से लेकर लोक कलाकार, नर्तक, संगीतकार, नृत्य में लीन गणपति, रिक्षाचालक, पहाड़ी मजदूर अर्थात् पिट्ठू, गधे और सुअर तक को एक कला संसार में दाखिल होते हुए देख सकते हैं। इस कला संसार में सब कुछ जीवन, संगीत और श्रम में रचा-बसा है। जीवन की पूरी लय और गति अपनी पूरी ताकत के साथ दिखाई देती है। एकेश्वर के कला संसार में अभिजात्य की कोई जगह नहीं है, वहां सिर्फ मेहनतकशों की सृजनशीलता है या जीवन के संघर्ष में मुब्तिला जानवर, जो अपनी मूक वाणी से मनुष्यों की तरह ही अपना दुख अभिव्यक्त करते हैं। चूंकि एकेश्वर ने खुद एक अत्यंत संघर्षशील जीवन जिया है और जी रहे हैं, इसलिए ‘संघर्ष’ उनकी कला के केंद्र में रहता है। यही संघर्ष कला में जब व्यक्त होता है तो एक सर्वथा नई दुनिया हमारे सामने आती है। हमें खुशी ही नहीं अत्यंत गर्व महसूस होता है, जब हम देखते हैं कि हमारे बीच एकेश्वर के रूप में एक ऐसा कलाकार मौजूद है, जो मनुष्य जाति के सांस्कृतिक संघर्ष को उसकी पूरी संवेदना के साथ व्यक्त करता है और जीवन की जयकथा गाता है।

टूटती जंजीरें


यूं तो राजस्थान ही क्या पूरे भारत के ही पुरातनपंथी, जातिवादी और सामंती संस्कारों वाले समाजों में आज भी महिलाओं की और खासकर विधवाओं की स्थिति बेहद दयनीय है। अगर सामंती मूल्यों वाली जातियों की बात करें तो क्षत्रिय और ब्राह्मणों में औरतों की हालत आज भी भयावह है, जिसमें कम उम्र में विवाह, शिक्षा पर रोक, विधवा विवाह पर प्रतिबंध, जाति पंचायतों की निर्णायक भूमिका के साथ झूठी आन-बान और शान के नाम पर अपनी ही बेटियों को प्रताड़ित करना इतना आम है कि इसे लेकर आज भी तलवारें तन जाती हैं और स्त्रियों को नारकीय स्थितियों में जीना पड़ता है। राजस्थानी और हिंदी साहित्य में स्त्री के इन हालात को लेकर काफी कुछ लिखा गया है, लेकिन राजस्थान के उर्दू साहित्य में राजस्थानी स्त्री के इस विकट जीवन को, संभवतया पहली बार उर्दू की महत्वपूर्ण कथाकार सरवत खान ने ‘अंधेरा पग’ उपन्यास के रूप में चित्रित किया है। उर्दू साहित्य के इतिहास में साहसी स्त्री कथाकारों की जो परंपरा रशीद जहां से चली आई है, कहना न होगा कि सरवत खान ने उसे समृद्ध करने का अत्यंत सार्थक प्रयास किया है। वैसे उर्दू में गालिब के समकालीन हाली ने पहली बार ‘मुनाजाते बेवा’ अर्थात् ‘विधवा की प्रार्थना’ लिखी थी, क्योंकि क्या हिंदू क्या मुस्लिम, किसी भी भारतीय समाज में विधवा जीवन स्त्री के लिए एक अभिशाप ही रहा है।
सरवत खान ने अपने इस पहले उपन्यास में बीकानेर के ग्रामीण जनजीवन को केंद्र में रखकर राजपुरोहित समुदाय में एक विधवा युवती के अदम्य संघर्ष और उसकी विजय को चित्रित किया है। इस उपन्यास की खास बात यह है कि आज के समूचे स्त्री विमर्ष में से विधवा जीवन जिस प्रकार से गायब है, उसे भी यह केंद्र में रखता है और उन तमाम प्रश्नों पर सोचने के लिए विवश करता है, जिन पर सामंती संस्कारों वाले हमारे प्रदेश में आज भी बहुत गहराई से सोचने की जरूरत है।

एक लड़की है रूपकुंवर, जिसने कस्बे की पहली डाक्टर बनने का ख्वाब देखा था और स्कूली पढाई के बीच ही उसे विवाह के बंधन में बांध दिया गया। विवाह के तुरंत बाद ही वह विधवा हो गई और फिर शुरू हुआ उसकी अंतहीन तकलीफों का एक सिलसिला। अमावस की रात उसे ससुराल से पीहर के लिए ‘अंधेरा पग’ की रस्म के निभाने के लिए चुपचाप रवाना कर दिया जाता है। वह यह सोचकर पीहर आती है कि ससुराल के विधवा जीवन से मुक्ति मिलेगी, लेकिन पारंपरिक समाजों में स्त्री की मुक्ति कहीं नहीं है। इस बात का अहसास रूपकुंवर को पीहर आने पर होता है, जहां उसके लिए एक अंधेरी कोठरी इंतजार कर रही है। जिस कोठरी को वह बचपन से एक रहस्य की तरह देखती आई थी, वह कोठरी उसी की प्रतीक्षा में अपने भीतर सीलन और बदबू भरे बैठी थी। मां, बाप, दादी, चाचा, चाची, घर-परिवार और नौकरानियों के होते हुए भी वह अपने ही घर में पराई और अभिशप्त स्त्री का जीवन जीने के लिए मजबूर होती है।उसकी शहरवासी बुआ राजकुंवर, जिद करके उसे अपने साथ शहर ले जाती है और यह बात फैला दी जाती है कि रूपकुंवर बीमारी का इलाज कराने गई है। नगर में रूपकुंवर पढ़ाई में ऐसी जुट जाती है कि हर बार अव्वल आती है और सचमुच डॉक्टरी की पढ़ाई करने लग जाती है। सब ठीक चल रहा होता है, लेकिन एक दिन गांव का ही एक युवक रूपकुंवर का रहस्य खोल देता है और फिर जाति-समाज-गांव की पंचायत जुट जाती है, एक विधवा को उसका कथित ‘आदर्श जीवन’ जिलाने के लिए। रूपकुंवर अर्श से वापस फर्श पर आ जाती है, डॉक्टर बनने का सपना कहीं गुम हो जाता है। काली अंधियारी कोठरी में किताबों के साथ भी वह क्या करे? इस बीच उसके पिता उसकी हमउम्र नौकरानी के साथ रास रचा लेते हैं और जब वह गर्भवती हो जाती है तो उसे मरवा डालते हैं। रूपकुंवर को पता चलता है तो वह पुलिस में किसी तरह रपट दर्ज करवाती है और पुलिस के आने पर पता चलता है कि बच्चों को जिस सूखी बावड़ी की तरफ जाकर खेलने से हमेशा मना किया जाता था, वहां एक नहीं दो लाशें दफन थीं, एक ताजा और एक दो दशक पुरानी और दोनों ही औरतों की। उसकी मां पुलिस के सामने अपने सारे जेवरों की पोटली लाकर रख देती है और पुलिस वहां से चुपचाप चली जाती है। यहीं रूपकुंवर को अहसास होता है कि अब कोई चारा नहीं और वह अपनी किताबें उठाकर सहेली जैसी नौकरानी के साथ घर से बाहर ‘उजियारा पग’ बढ़ाती दूर निकल जाती है और घर वालों में से कोई उसे नहीं रोकता। एक था ससुराल जहां से उसे ‘अंधेरा पग’ लिए निकलना पड़ा और अब उसके सामने थी पूरी दुनिया, जिसमें उजाले उसकी राह देख रहे थे।

उर्दू साहित्य में सरवत खान के इस उपन्यास के महत्व को स्वीकारते हुए ही उर्दू के प्रसिद्ध आलोचक शकील सिद्दीकी ने खुद इसका हिंदी में अनुवाद भी किया और एक लंबी भूमिका भी लिखी है। उनके अनुसार सरवत खान की इस कृति ने ‘उर्दू उपन्यास के किसी हद तक निराशा से भरे परिदृश्य में एक हलचल पैदा की है, आस बंधाई है और उर्दू उपन्यास के सामाजिक आधार को नया विस्तार दिया है। उर्दू के वरिष्ठ साहित्यकार वारिस अलवी ने इस उपन्यास के बारे में लिखा है कि सरवत खान ने एक पुराने विषय को ऐसा रूप दिया है जिसमें विधवा का दुःख विद्रोह में बदल जाता है। राजस्थान के उर्दू साहित्य में इस उपन्यास को इसलिए याद किया जाएगा कि इसमें राजस्थानी भाषा और संस्कृति की गहरी मिठास भी पूरी तरह मौजूद है, जो उर्दू-हिंदी की गंगा-जमनी तहजीब की शानदार विरासत भी है।

Monday, 23 February 2009

मेरे दादा पिकासो: मेरीना पिकासो

पाब्लो पिकासो की पोती मरीना पिकासो की किताब 'पिकासो माय ग्रैंड फादर' मुझे कुछ दिन पहले एक किताब मेले में यूँ ही मिल गयी। किताब को पढने के बाद ज़बरदस्त रोमांच का अनुभव हुआ। मुझे लगा इसका अनुवाद किया जाना चाहिए। आनंद भाव से जो अनुवाद किया तो खुदी को बहुत अच्छा लगा। यह पोस्ट अपने अनुभव साझा करने की एक छोटी-सी ख़बर है। मेरे पास इसके कोई कोपी राइट नहीं हैं, लेकिन मैं इसे प्रकाशित कर रहा हूँ।
मैं जानती हूँ कि पिकासो से बचकर मैं कहीं नहीं भाग सकती। मुझे इसमें कभी कामयाबी नहीं मिली। जब सब कुछ दुनिया के सामने आ चुका है, पिकासो मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा।
दोपहर का एक बजा है। मैं जिनेवा में हूँ, हमेशा की तरह बहते यातायात में मैं ‘गुस्ताव अडोर’ की ड्राइविंग सीट पर बैठी गाड़ी चला रही हूँ। मैं अपने बच्चों, गेल और फ्लोर को स्कूल लेकर जा रही हूँ। मेरे दांयी तरफ लेक जिनेवा और इसका मशहूर गीजर जेट डियू है। झील, कार और गीजर... अचानक मुझे भयानक दर्द के साथ तीव्र आघात लगता है। मेरी अंगुलियों में भयानक जकड़न हो रही है। मुझे छाती में बहुत तेज जलन के साथ दौरा पड़ता है। मेरा दिल तेजी से धड़क रहा है। मेरा दम घुट रहा है। मैं मरने वाली हूँ। मेरे पास सिर्फ इतना ही समय बचा है कि मैं अपने बच्चों को यह कह सकूँ कि वे स्टीयरिंग व्हील पर मेरा सिर गिरने तक चुपचाप बैठे रहें। मुझे लकवा मार गया है। क्या मैं पागल हो गई हूँ?
मैं सड़क के बीचोंबीच कार रोक देती हूँ। आगे पीछे और साथ चलने वाली कारों के हार्न चीखते हैं और सब मुझे आगे बढ़ने के लिए कहते हैं। मेरे लिए कोई नहीं रुकता, सब चलते जाते हैं। दर्द और भय के आधे घण्टे बाद मैं किसी तरह वापस कार स्टार्ट करती हूँ। सड़क के मुहाने पर कार खड़ी कर पास के गैसोलीन पंप पर खुद को लगभग घसीटते हुए ले जाती हूँ। मुझे किसी को मदद के लिए बुलाना चाहिए। मैं अभी मरना नहीं चाहती। मेरे पीछे मेरे बच्चों का क्या होगा?
‘तुम्हें गहन जांच से गुजरना होगा।’ मेरा चिकित्सक कहता है। इस बिंदु पर मेरे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। और मैं जांच के लिए तैयार हो जाती हूँ-जांच जो चौदह बरस तक चलने वाली है।
मैंने चौदह साल के ये दिन बेकाबू आंसुओं, रूदन और विस्मृति में बिताये हैं। जब मैं अपने पिछले दिनों को याद करती हूँ तो सिहरन होने लगती है। वो सब चीजे याद आती हैं जिनकी वजह से मेरी जिंदगी बर्बाद हुई। पहले चुपचाप और फिर किसी हथौड़े की तरह अतीत मुझ पर टूट पड़ता है। सब कुछ साफ होने लगता है कि किन चीजों ने एक छोटी बच्ची, किशोरी और युवती को बुरी तरह जिंदा ही चबा डाला। एक बदकिस्मत जिंदगी को ठीकठाक करने के लिए मुझे चैदह बरस विपत्तियों से गुजरना पड़ा।
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परम-चरम को पाने की पिकासो की प्यास के पीछे ताकत हासिल करने की जबर्दस्त इच्छा थी। उनका अदभुत काम इंसानों की बलि मांगता था। उन्होंने उस हरेक shakhs को दूर भगा दिया जो उनके नजदीक गया, वे उसे हताष करते और निगल जाते। मेरे परिवार में से कोई भी सदस्य उस अदभुत महान प्रतिभावान कलाकार के पाष से नहीं बच सका। पिकासो को अपनी हर कलाकृति पर हस्ताक्षर करने के लिए लहू चाहिए था, मेरे पिता का, मेरे भाई का, मेरी मां का, मेरी दादी का और मेरा यानी हम सबका लहू। उन्हें उन सबका खून चाहिए था, जो उन्हें प्यार करते थे। लोग यह सोचते थे कि वे एक इंसान को प्यार करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वे पिकासो को प्यार करते थे।
मेरे पिता पिकासो की तानाषाही के बंधन में पैदा हुए और इसी से पलायन करते, बचते, निराष होते, बर्बाद होते, अपनी हस्ती को खोते हुए एक दिन मर गये।
मेरा भाई पाब्लितो, मेरे दादा की परपीड़ा और अन्याय का खिलौना, चैबीस बरस की आयु में ब्लीच की प्राणघातक मात्रा पीकर खुदकुषी कर बैठा। मैंने उसे अपने ही खून में लिथड़ा हुआ पाया। उसकी आंतें जल गई थीं, उसका पेट फट गया था, उसका दिल अजीब तरीके से धड़क रहा था। मैंने एंटीबीस के ला फोन्टोन अस्पताल में उसका हाथ आखिरी बार थामा था, जहां वह धीरे धीरे मौत की नींद सो रहा था। इस भयानक कृत्य से वह उन दुखों और खतरों को खत्म करना चाहता था, जो उसके और मेरे रास्ते में आने वाले थे। क्योंकि हम पिकासो के नवजात वारिस थे, जिन पर नकली उम्मीदों का सांप कुण्डली मारे बैठा था।
मेरी दादी ओल्गा का जीवन भी अपमान, कलंक और पलायन के एक अंतहीन सिलसिले के बाद लकवाग्रस्त होकर गुजरा। मेरे दादा एक बार भी उन्हें देखने नहीं आये, जब वो पूरी तरह बिस्तर से ही चिपक गई थीं और बेहद कष्ट से गुजर रही थी। जबकि दादी ने उनके लिए सब कुछ छोड़ दिया था, अपना देष, अपना कैरियर, अपने सपने और अपना स्वाभिमान छोड़कर वो उनके साथ चली आई थीं।
जहां तक मेरी मां की बात है, उसे भी किसी बिल्ले यानी बैज की तरह पिकासो नाम मिला था, एक ऐसा बिल्ला जिसने उसे मानसिक संभ्रम की उच्चतम अवस्था यानी पैरानोइया की मरीज बना दिया था। मां के लिए मेरे पिता से शादी करने का मतलब था पिकासो नाम से षादी करना। भीषण उन्माद के क्षणों में मां यह स्वीकार करने को ही तैयार नहीं होती थी कि दादाजी उन्हें एक वांछित सम्मानपूर्ण जीवन देने के लिए कहीं से भी उत्सुक और तत्पर हैं। कमजोर, खोई खोई और असंतुलित मानस की मां को उस मामूली साप्ताहिक भत्ते से ही हमारा घर चलाना पडता था, जो दादाजी उन्हें अपने बेटे और पोते पोती को अपने नियंत्रण में रखने और गरीबी के मुहाने पर जीने के लिए देते थे।
मैं उम्मीद करती हूँ कि एक दिन मैं इस अतीत के बिना भी जिंदा रह सकूंगी।
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नवंबर, 1956। यह गुरुवार का दिन है और मेरे पिता मेरा हाथ थामे आगे चल रहे हैं। वे चुपचाप हमारे सामने खड़े दरवाजे उस दरवाजे तक चलकर जाते हैं, जो ला कैलीफोर्नी को सुरक्षा देता है, यानी हमारे दादाजी का कैन्स स्थित घर। मेरा भाई पाब्लितो हमारे पीछे चल रहा है, उसने अपने हाथ पीछे बांध रखे हैं। मैं अभी छह साल की हुई हूँ और पाब्लितो सात बरस का है।
मेरे पिता धातु के बने दरवाजे पर घण्टी बजाते हैं। मैं डरी हुई हूँ, हम जब भी यहां आते हैं, मेरे साथ ऐसा ही होता है। हमें पदचाप सुनाई देती है, फिर दरवाजे में चाबी धुमाने की आवाज आती है। ला कैलीफोर्नी का बुजुर्ग इतालवी केयरटेकर अधखुले दरवाजे से नमूदार होता है। वो हमारी तरफ देखकर पिताजी से पूछता है, ‘पाॅल साहब, क्या आपने मुलाकात के लिए समय ले रखा है?’
‘हां’, पिता हकलाते हुए जवाब देते हैं। वे मेरे हाथ से अपना हाथ छूट जाने देते हैं, जिससे मुझे यह नहीं पता चलता कि उनकी हथेली में कितना पसीना है।
‘ठीक है,’ कहते हुए वो जोड़ता है, ‘मैं देखता हूँ कि क्या मालिक मिलना चाहते हैं या नहीं।’
दरवाजा फिर से बंद हो जाता है। बारिष हो रही है। यूक्लेप्टिस के दरख्तों की उस कतार से आती गंध हवा में तैर रही है, जहां हमें मालिक के आदेषों की प्रतीक्षा में खड़ा कर दिया गया है। पिछले षनिवार या गुजरे हुए गुरुवारों की तरह हम इंतजार में खड़े हैं।
दूर एक कुत्ता भौंक रहा है। यह जरूर से लुम्प ही होगा, दादाजी का डैषहुण्ड कुत्ता। वो मुझे और पाब्लितो को पसंद करता है। वो हमें उसे पुचकारने देता है। हम अंतहीन प्रतीक्षा करते हैं। पाब्लितो कुछ तो आराम के लिए और कुछ अपना अकेलापन कम करने के लिए मुझसे और चिपक जाता है। पिताजी अपनी सिगरेट खत्म कर चुके हैं। वे उसे फेंक कर दूसरी सिगरेट जलाते हैं। उनकी अंगुलियों पर निकोटीन के गहरे निषान पड़ गये हैं।
‘तुम लोगों को कार में बैठकर इंतजार करना चाहिए,’ पिताजी धीरे से इस तरह फुसफुसाते हैं, जैसे उन्हें किसी के द्वारा सुन लिए जाने का डर लग रहा हो।
‘नहीं,’ हम दोनों एक साथ कहते हैं, ‘ हम आपके साथ ही रहेंगे।’
हमारे सिरों पर बर्फबारी के कारण चादर सी जम गई है। हमें अपराधबोघ महसूस होता है।
एक बार फिर दरवाजे में चाबी लगने और दरवाजा खुलने की आवाज आती है। बूढ़ा इतालवी प्रकट होता है। उसकी नजरें झुकी हुई हैं। निराष स्वर में वह वही पाठ दोहराता है, जो उसे दोहराने के लिए याद कराया गया है।
‘मालिक आज आपसे नहीं मिल सकते। मैडम जैकेलीन ने आपसे यह बताने के लिए कहा है कि मालिक इस वक्त काम कर रहे हैं।’
द्वारपाल को भी बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। वो षर्मिंदा है।
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कितने गुरुवारों को हमने ला कैलीफोर्नी के किले की तरह सुरक्षित दरवाजे पर ये वाक्य सुने हैं-कि मालिक काम कर रहे हैं-कि मालिक सा रहे हैं-या मालिक इस वक्त घर पर नहीं हैं। कभी कभार जैकेलीन रोक, यानी भविष्य उर्फ समर्पित मैडम पिकासो यह भी कहती है, ‘सूरज अपनी षांति भंग नहीं करना चाहता।’
जब वो दादाजी को ‘सूरज’ नहीं कहती तो ‘महाषय’ या ‘महान मालिक’ कहती है। हम उसके सामने अपनी निराषा और अपमानबोध और पीड़ा कभी नहीं प्रदर्षित करते।
जिस दिन हमारे लिए दरवाजे खुले रहते हैं, हम पिता के पीछे पीछे बजरी वाले रास्ते से अहाता पार करते हुए घर के मुख्य प्रवेष द्वार तक जाते हैं। मैं माला जपने की तरह हर कदम को गिनती हूँ। गिनती में मेरे कदमों की संख्या पूरी साठ आती है, झिझक और अपराधबोध के साठ कदम।
सूर्यदेव के महल में-अलीबाबा की खजाने वाली गुफा में-हर तरफ अव्यवस्था का सम्राज्य है। वहां ईजल्स पर और फर्ष पर पेंटिंग्स के ढेर लगे हुए हैं। चारों ओर मूर्तिषिल्प बिखरे पड़े हैं। टोकरों में बेतरतीबी से अफ्रीकी मुखौटे, कार्डबोर्ड पैकिंग के बक्से, पराने अखबार, काम में नहीं आये कैनवस के चैखटे, टिन के कैन, सिरेमिक टाइल, आरामकुर्सी के पाये, संगीत वाद्य, साइकिल के हत्थे, धातु की चादरों के टुकड़े और ना जाने कई तरह के सामान भरे पड़े हैं। दीवार पर सांडों की लड़ाई के पोस्टर, चित्रों का जखीरा, जैकेलीन का पोर्टेªट और सांडों के सिर टंगे हुए हैं।
इन सब के बीच पैर घसीटकर हम पहुंचते हैं, हमें यहीं उनका इंतजार करना है। हमें महसूस होता है कि हम यहां अवांछित हैं। मेरे पिता खुद को सामान्य करने के लिए व्हिस्की का एक गिलास बनाते हैं और एक ही सांस में गटक जाते हैं। शायद इसी से उनको ताकत मिलती है और साहस भी। पाब्लितो एक कुर्सी पर बैठ जाता है और उस सैनिक का नेतृत्व करने के खेल का बहाना बनाता है, जिसे उसने अभी अपनी जेब से बाहर निकाला है।
‘बिल्कुल भी षोर नहीं करना और किसी चीज को हाथ मत लगाना!’ कमरे में दाखिल होकर जैकलीन चीखती है। ‘सूर्यदेव किसी भी क्षण सीढियों से उतरकर नीचे आ सकते हैं।’
एसमेराल्डा, हमारे दादा की बकरी भी चुपचाप हमारा अनुसरण करती है। वैसे वो अपनी मर्जी से कुछ भी कर सकती है-पूरे घर में उछलकूद कर सकती है, फर्नीचर से अपने सींगों की ताकत जांच सकती है, फर्ष पर बिखरी पड़ी पिकासो की पेंटिंग्स और कैनवस के ढेर पर मींगणियां कर सकती है। एसमेराल्डा अपने घर पर है और हम यहां घुसपैठिये हैं।
हमें ठहाकों और चीखों की गूंज सुनाई देती है। दादाजी नाटकीय अंदाज में गर्जना के साथ किसी नायक की तरह प्रकट होते हैं।
मैं कहती हूँ, ‘दादाजी’, लेकिन हमें इस तरह उन्हें पुकारने की इजाजत नहीं है, ऐसा करने की मनाही है यहां। हमसे अपेक्षा की जाती है कि हम सब लोगों की तरह उन्हें पाब्लो कहकर पुकारें। सीमाएं तोड़ने की जगह यह ‘पाब्लो’ हमें अपरिचय की हद में बांध देता है, इससे हमारे और एक देवता सरीखे अगम्य महान व्यक्ति के बीच एक दूसरी दीवार खड़ी हो जाती है।
‘हैलो, पाब्लो,’ मेरे पिता दादाजी के पास पहुंचकर कहते हैं। ‘क्या आप ठीक तरह से सोये?’
मेरे पिता को भी उन्हें ‘पाब्लो’ ही कहने की इजाजत है।
पाब्लितो और मैं दौडकर दादाजी के पास पहुंचते हैं और उनको अपनी बांहों में घेर लेते हैं। हम बच्चे हैं। हमें दादाजी की जरूरत है।
दादाजी हमारे सिर पर हाथ से थपकियां देते हैं, जैसे कोई घोड़े की गर्दन थपकाता है।
‘तो मेरीना, नया क्या चल रहा है? क्या तुम एक अच्छी लड़की हो? और तुम पाब्लितो, तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है।’
ऐसे खाली और खोखले सवाल जिनका जवाब देने की कोई जरुरत नहीं है। हमें पालतू बनाने का एक तरीका, जो उनके मन को आम तौर पर अच्छा लगता है।
दादाजी हमें उस कमरे में ले जाते हैं, जहां वे चित्र बना रहे होते हैं। कोई भी कमरा, जिसे उन्होंने अपने स्टूडियो के लिए चुन लिया है। एक सप्ताह या महीना, किसी नये कमरे का उद्घाटन करने तक वे अपने निष्चित कमरे में ही काम करते हैं। दादाजी अपनी मर्जी, प्रेरणा या मौज के वष अपना स्टूडियो चुनते हैं। यहां हमें किसी चीज की मनाही नहीं है। हमें ब्रष छूने की इजाजत है, उनकी नोटबुक में चित्र बनाने की इजाजत है और अपने चेहरों पर रंग लगाने की भी खुली छूट है। इससे उनको मजा आता है।
‘मैं तुम्हें एक मजेदार चीज बनाकर दिखाता हूँ।’, हंसते हुए दादाजी कहते हैं।
वे अपनी नोटबुक में से एक पन्ना फाड़ते हैं, बहुत तेज गति से इसे कई बार मोड़ते हैं और जादुई ढंग से उनके बलषाली हाथों से एक छोटा सा कुत्ता, कोई फूल या चूजा बनकर सामने आ जाता है।
‘क्या यह तुम्हें पसंद है?’ वे अपनी भर्राई आवाज में पूछते हैं।
पाब्लितो कुछ नहीं कहता जबकि मैं हकलाते हुए कहती हूँ, ‘यह तो बहुत सुंदर है।’
हम इसे अपने साथ घर ले जाना चाहते हैं, लेकिन हमें इसकी इजाजत नहीं है। आखिर यह पिकासो का काम है, उनकी एक नायाब कलाकृति है।
कागज की बनी ये आकृतियां, कार्डबोर्ड या माचिस के डिब्बों से बनी चीजें, ऐसे तमाम भ्रम जो दादाजी ने किसी जादूगर की तरह बनाये, वो सब उस महत्वाकांक्षा का ही एक रूप था, जिसके तहत वे हमें, मुझे अब महसूस होता है, दैत्याकार लगते थे, वे हमें यह जताना चाहते थे और हमारे भीतर तक यह बात भर देना चाहते थे कि वे सर्वषक्तिमान हैं और हम कुछ भी नहीं हैं। उन्हें सिर्फ इतना करना होता था कि वे कोई कागज अपने नाखूनों से फाड़ें, कैंची से कार्डबोर्ड का कोई टुकड़ा काटें या किसी मोड़ पर रंग फेला दें। इसके बाद जो कुछ भी सामने आता, उससे एक हिंसक और काफिर किस्म की तस्वीर उभरती जिससे हमारा जीवन बर्बाद हो जाता।
लेकिन मैं इस बात से भी पूरी तरह संतुष्ट हूँ कि पिकासो को अकेलापन बहुत सताता था और वो वापस बचपन के दिनों में लौटना चाहते थे। हमारे नहीं, बल्कि अपने बचपन में जाना चाहते थे। वे दक्षिणी स्पेन में मालगा में लौटना चाहते थे, जहां वे पेंसिल के एक स्ट्रोक से अपनी चचेरी बहनों मारिया और कोंचा को काल्पनिक प्राणियों के चित्र बनाकर चकित कर दिया करते थे। दर्षक के रूप में मारिया और कोंचा की तरह मैं और पाब्लितो भी पिकासो के लिए एक किस्म के ‘आॅडियंस मैटेरियल’ ही थे, जिन्हें वे अपनी मनमर्जी से बुद्धू बना सकते थे या अपना जादू दिखाकर चकित कर सकते थे। उन्होंने अपने बेटे पाउलो के साथ भी यही बर्ताव किया। पाउलो सीरिज की उनकी पेंटिंग्स-पाउलो आॅन हिज डंकी, पाउलो होल्डिंग ए लैम्ब, पाउलो विद ए स्लाइस आॅव ब्रेड, पाउलो ड्रेस्ड एज ए टोरेरो, पाउलो ड्रेस्ड एज ए हार्लेक्वीन आदि में यह सब देखा जा सकता है। यह उस वक्त की बात है जब मेरे पिता उनकी नजरों में मेरे अयोग्य पिता सिद्ध हुए।
हम जब भी ला कैलीफोर्नी जाते पिता हमेषा हमारे साथ ही रहते, उनकी हिम्मत नहीं होती कि वे जरा भी उन विषेष क्षणों में कोई व्यवधान पैदा करें, जो हम दादाजी के साथ गुजार रहे होते। पिताजी अपनी आंखों में बीमारी के लक्षण लिए, चिंतित मुद्रा में स्टूडियो से रसोई के बीच चक्कर पर चक्कर लगाते रहते। वो खुद के लिए व्हिस्की का एक और गिलास बनाते या रसोई से वाइन का गिलास लेकर चले आते। वो बहुत ज्यादा पी रहे हैं। थोड़ी ही देर में उन्हें दादाजी का समना करना होगा और उनसे हमारे और मां के लिए पैसे मांगने होंगे। पैसे, जो पिताजी के पिकासो पर बकाया हैं। वो शब्द मेरे कानों में गूंजते हैं-‘काम करने के बदले में पैसे।’ वो पिकासो के शाॅफर हैं, जिसे हर सप्ताह पैसा दिया जाना है, एक ऐसा मजदूर-श्रमिक जो सब काम करता है, लेकिन जिसकी अपनी कोई जिंदगी नहीं है, एक ऐसी कठपुतली जिसकी डोर हिलाते हुए पिकासो को आनंद आता है, उनके इषारों पर नाचने वाला लड़का।
‘कहो, पाउलो, तुम्हारे बच्चे तो बिल्कुल भी मजाक नहीं करते। इन्हें खेलने-कूदने की थोड़ी ढील देनी चाहिए।’
हमें अपनी बारी का इंतजार करना चाहिए, बेहतर यही है कि हम सब चीजों को ठीक से हो जाने दें। मेरे पिता और मां की बेहतरी के लिए यही ठीक है कि हम पिकासो के साथ खेलें और उनका मनोरंजन करें।
पिकासो एक कुर्सी पर पड़े एक हैट को उठाते हैं और खूंटी पर टंगे कोट की जेब से टोपी निकालकर दोनों को अपने कंधों पर रखकर किसी टूटी हुई पुतली की तरह उछलने कूदने लग जाते हैं। अनवरत और पूरी ताकत लगाकर वे चीखते जाते है और तालियां बजाते रहते हैं।
‘चलो आओ, आ जाओ’, उनकी आंखों में चमक बढ़ जाती है, ‘आओ जैसा मैं करता हूँ, वैसा ही करो और खुषी में झूम जाओ।’
हम ताली बजाकर उनके विदूषक रूप की प्रषंसा करते हैं। मेरे पिता भी शामिल हो जाते हैं। वे अपने पिता के मुंह के एक कोने में दबी सिगरेट को हटाना चाहते हैं, जिसके धुंए से उनकी आंखों से पानी बहने लगा है।
‘अण्दा, पाब्लो! अण्दा, अण्दा!’ स्पेनिष यानी पिकासो की भाषा में पिकासो की जयजयकार। सर्वषक्तिमान पिता और पुत्र के बचपन के दिनों के बीच का बचा हुआ एक मात्र जुड़ाव।
उत्साह से भरे दादाजी लकड़ी की एक चम्मच और मेज पर से एक तौलिया उठाते हैं, उनकी तलवार और ढाल। आंखों में एक चमकदार और बर्बर दृष्टि व्याप गई है। वे हमारे सामने हमारे पिता और मेरे द्वारा निरंतर ‘ओले’ की लय पर लगातार कई चीजें एक साथ पेष करते जाते हैं-मेनोलेटिनाज, चिक्वेलिनाज, वेरोनिकाज और मेरीपोसाज।
पाब्लितो चुपचाप बैठा कहीं दूर देख रहा है। उसके चेहरे पर मौत जैसा पीलापन छाया हुआ है। मेरी तरह वह भी एक सामान्य परिवार से जुड़ना चाहता है, जिसमें एक जिम्मेदार पिता हो, मृदुभाषी मां हो, प्यार करने वाले एक दादाजी हों। पाब्लितो और मेरी किस्मत में यह सब नहीं लिखा है।
आप खुद की कोई पहचान कैसे बना सकते हैं और कैसे शांति के साथ बैठ सकते हैं, जब आपके दादाजी आपके लिए उपलब्ध पूरे का पूरा स्पेस घेर लेते हैं और आपके पिता उनके सामने सिर्फ दण्डवत होकर बिछे पड़े रहते हैं। और आपकी मां ‘सदी की मुलाकात’ के बाद आप पर सवालों की बौछार कर देती है, जिस मुलाकात के लिए किसी ने उसे बुलाने की जरूरत नहीं समझी।
पूरब से आती हवा बादलों के पीछे भाग रही है और कातर सूरज का प्रकाष कमरे में दिव्य रोषनी पैदा कर रहा है। मेरे पिता कीे अभी भी दादाजी के सामने पैसे का सवाल पेष करने की हिम्मत नहीं हो रही है। उन्हें क्यों परेषान किया जाये? वे आज बहुत ही अच्छे मूड में हैं।
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सन् 1961, दादाजी ने नोत्र-देम-दी-वाई की वादियों में एक फार्महाउस खरीदा। दादाजी ला केलिफोर्नी से दूर जाना चाहते थे, क्योंकि रीयल एस्टेट व्यापारियों ने वहां आवासीय फ्लैट्स की एक पूरी कालोनी बनाकर माहौल का सारा मजा किरकिरा कर दिया था। इन फ्लैट्स के कारण समुद्र और प्राकृतिक दृष्यावली का नजारा ही गुम हो गया था।
नोत्र-देम-दी-वाई एक अद्भुत रूप से सुरक्षित किला था, जिसके चारों तरफ बिजली का करंट दौड़ती रेलिंग और कांटेदार तारबंदी की गई थी। आगंतुकों के बारे में प्रवेष द्वार पर ही एक इंटरकाॅम के माध्यम से पूरी जानकारी ले ली जाती थी और आक्रमण के लिए पूर्ण प्रषिक्षित अफगानी षिकारी कुत्ते रात-दिन पूरे परिसर में घूमते रहते थे। वहां हमारा आना-जाना लगभग अधिकारिक किस्म के मुलाकाती साक्षात्कार-भेंटवार्ताओं जैसा हुआ करता था, जिसमें वहां की कठोर गार्जियन जैकेलीन का समय को लेकर पूरा दखल रहता था, वो इस बात का बहुत खयाल रखती थी कि हम दादाजी का ज्यादा समय नहीं खराब करें।
क्या पिकासो यह जानते थे कि जैकेलीन ने उनके और हमारे बीच कोई दीवार खड़ी कर रखी थी? मुझे डर है कि वे यह जानते थे। खुद दादाजी के पास ही जैकेलीन को ऐसी ताकत देने का अधिकार था, जिसमें वह नेपध्य में रहती थी।
फ्रेंकोइस गिलोट की 1964 में प्रकाषित पुस्तक ‘लाइफ विद पिकासो’ से बुरी तरह आहत और नाराज दादाजी ने उसके बाद क्लाउड व पालोमा ही नहीं उनकी बेटी माया और मेरी थेरेस वाल्टर सेे अनेकानेक कारणों से कभी नहीं मिले। केवल मेरे पिता को ही उस दुर्ग में दाखिल होने की इजाजत थी, और पिताजी चाहते थे कि मैं और भाई पाब्लितो भी दादाजी से मिल सकें, ताकि वे यह जता सकें कि वे हमारा बहुत खयाल रखते हैं। पता नहीं, पिताजी ने कभी क्यों नहीं हमें दादाजी से एक बार भी अपने बिना अकेले मिलने दिया? हम दादाजी को यह बता सकते थे कि हम सिर्फ पिता के पुछल्ले नहीं हैं। हम उन्हें दिल खोलकर अपनी सब बातें बता सकते थे, अपने बचपन के रहस्य उनके साथ बांट सकते थे और शायद तब दादाजी भी ठीक से समझ पाते कि हम उनसे क्या अपेक्षाएं रखते हैं।
हाय रे बदकिस्मती, दादाजी और हमारे बीच लोहे का जो परदा गिरा हुआ था, वो इतना भारी था और हमारे सवालों, हमारी इच्छाओं और हमारी यातनाओं से हमेषा के लिए बेखबर और बंद था। ला कैलीफोर्नी की रोषनियां कहां गुम हो गईं मेरे मौला? नोत्र-देम-दी-वाई में सब कुछ धुंधला-धुंधला और निराषाजनक था। किसी जनाजे में आये हुए लोगों जैसे साइप्रस के शोकाकुल दरख्त, भयानक रूप से गमजदा जैतून के पेड़, एक अपराजेय किस्म का वातावरण और इंटरकाॅम की किसी भीमकाय दैत्य की तरह गूंजती आवाज, ये सब मिल कर अजीब सी सिहरन पैदा करते थे।
छठे दषक के आखिरी वर्षों में नोत्र-देम-दी-वाई में एक बार फिर जाना हुआ। हमारे पिता ने हम भाई-बहन को कैन्स और वैलाॅरिस के कहीं बीच से अपने साथ लिया था। ‘जल्दी से अंदर आ जाओ,’ अपनी कार की खिड़की के शीषे उतारते हुए उन्होंने कहा, ‘हमें देर हो रही है।’ दादाजी के दिव्य दर्षनों के लिए देरी, जिसके लिए उन्होंने बड़ी कृपा करके अपने बेटे और पोते-पोती को थोड़ा-सा वक्त दिया है। नोत्र-देम-दी-वाई का दरवाजा किसी एकांतवास की तरह बंद था। मेरे पिता घंटी बजाते हैं, पहले दो छोटी घंटी, फिर एक बड़ी घंटी। हमें इंटरकाॅम पर जैकेलीन की आवाज सुनाई पड़ती है, ‘कौन है?’
वे जानती है कि ये हमारे पिताजी हैं और इनके साथ हम भी हैं। सिर्फ पिताजी ही इस तरह अपने आने का संकेत देने के लिए इस दरवाजे पर घंटी बजा सकते हैं। वो हमें हमारे भीतर दाखिल होने से पहले ही यह साफ जता देना चाहती है कि हम इस दुर्ग में अवांछित हैं। वो हमें चिढ़ाना चाहती है। पिकासो सिर्फ और सिर्फ उस अकेली के ही हैं। किसी को भी उस जाल से छेड़छाड़ करने या उसके पार जाने की इजाजत नहीं है, जो उसने अपने मालिक के इर्दगिर्द बुन रखा है।
‘कौन है?’ वह अपना सवाल दोहराती जाती है, उसे जवाब चाहिए। ‘मैं पाउलो हूं।’ बिजली का ताला आक्रमण की मुद्रा में खुलता है। निर्दयी ढंग से हमें दुत्कारने की मुद्रा में तुरंत ही अफगानी षिकारी कुत्ते दांत दिखाते हुए हम पर गुर्राने लगते हैं। हम जिस अंधकार भरे इलाके में दाखिल होने जा रहे हैं वहां के सुरक्षा प्रहरी हैं ये भयानक खूंखार कुत्ते, जो लगातार चैकन्ने रहकर हमारे पीछे-पीछे चले आ रहे हैं।
बिना जल्दी मचाये हम चुपचाप साइप्रस के दरख्तों के साये में चले जा रहे हैं। जैकेलीन घर के दरवाजे पर हमारा इंतजार कर रही है। उसने काले कपड़े पहन रखे हैं। उसकी कमर पर और चर्बी चढ़ गई है और उसका चेहरा उतरा हुआ है। ‘मालिक छोटे ड्राइंग रूम में बैठे हैं। वो अभी बस एक झपकी लेने ही जा रहे थे।’ उसने पिताजी से यह कहा, इसका मतलब ज्यादा देर मत लगाना।
एक आराम कुर्सी पर बैठे दादाजी हमारा स्वागत करते हैं। उनके सामने एक प्याले से भाप निकल रही है और उसी के पास एक फ्लास्क रखा है, जिसमें कोई तरल पदार्थ है, जो जैकेलीन ने उन्हें पीने के लिए दिया है। पिताजी ने हमें रास्ते में बताया था कि दादाजी कुछ समय से बीमार हैं और वे खुद अपने स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं। सच्चाई यह है और सब जानते हैं कि वे बीमार नहीं हैं और न कभी रहे। उनका डाॅक्टर, जो मातिस (चित्रकार) का भी डाॅक्टर था, कभी-कभार सिर्फ हाजिरी पूरी करने आता है, क्योंकि वो जानता है कि उसके रोगी की पीड़ाएं उसकी बढती उम्र के कारण हैं। हालांकि पिकासो को एक चीज जरूर सांत्वना देती है और वो यह कि उनके आसपास के सारे दोस्त आज की तारीख में मृत्यु का ग्रास बन चुके हैं, लेकिन वो खुद जिंदा बचे हुए हैं।
दादाजी अमर हैं। यह मैं और पाब्लितो ही जानते हैं। वे दुनिया के सबसे ताकतवर इंसान हैं। उनके पास तमाम किस्म की षक्तियां हैं, वो कभी नहीं मर सकते।... हम शर्माते हुए उनके पास जाते हैं। वे हाल ही में पहनना षुरु किये चष्मे के पीछे से झांकती अपनी चमकदार आंखों से हमें देखते हुए बमुष्किल मुस्कुरा पाते हैं। ‘तो स्कूल कैसा चल रहा है?’ दादाजी पाब्लितो से पूछते हैं। और फिर विचार कर पूछते हैं, ‘और तुम्हारी मां कैसी है मेरीना?’ हम सिर्फ सिर हिला पाते हैं, इन सवालों के हमारे पास क्या जवाब होंगे? वे बिना हमारी तरफ देखे हमसे पूछते हैं, ‘ क्या तुम लोग इस बार छुट्टियों में कहीं जा रहे हो?’
‘नहीं।’ दबी आवाज में पाब्लितो कहता है। वे अनिष्चय में कहते हैं, ‘अच्छा, बहुत अच्छे।’ उन्हें हमारी छुट्टियों की या हमारी पढ़ाई की क्या चिंता है? वो तो सिवाय खुद के और किसी चीज में रूचि नहीं लेते।... जैकेलीन एक छाया की तरह कमरे में आती है। वो मेरे पिता के पास आती है और उनके कान में कुछ फुसफुसाती है। पिताजी सिर हिलाते हैं और हमसे मुखातिब होकर कहते हैं, ‘मेरीना, पाब्लितो। अब चलने का वक्त हो गया, अब दादाजी के आराम का वक्त है, तुम लोगों ने उनको बहुत थका दिया है, वो अब आराम चाहते हैं।’ हम भी उनसे थक चुके हैं, क्योंकि उन्होंने हम पर एक सैकण्ड के लिए भी ध्यान नहीं दिया।
दिव्य दर्षनों का समय समाप्त हुआ। हम जैकेलीन के पीछे-पीछे वापस निकलते हैं। वो दरवाजे की सीढियों पर खड़ी होकर हमे यूं हाथ हिलाती है जैसे हमसे नाराजगी का रिष्ता निभा रही हा और फिर तुरंत भीतर चली जाती है। वो भीतर जाते हुए चिल्लाती है, ‘मैं आ रही हूं मालिक मैं आ रही हूं।’ वो अपने मालिक से एक सैकण्ड के लिए भी दूर रहना नहीं सहन कर सकती। दादाजी के बिना वो एक जलबिन मछली की तरह है।
मैं इस बदनसीबी में कुछ नहीं कर सकती। मैं इस किस्म की हिंसा, दूसरों की कमजोरियों और मेंरे साथ पाब्लितो के जीवन पर किसी के नियंत्रण से आजादी चाहती हूं। मुझे इस परिवार से मुक्ति चाहिए। मैं भाई से कहती हूं, ‘पाब्लितो हमें कुछ करना चाहिए।’ भाई कहता है, ‘क्यों? किस लिए? हम कभी अलग नहीं हो सकते। हम पिकासो परिवार के लोग हैं बहना।’ संक्षेप में हमारी नियति है यातना से गुजरना। मैंने तय कर लिया है कि अब मैं और यातना नहीं सहन करूंगी। अब मैं मुक्त होना चाहती हूं और अपनी मंजिल खुद तय करना चाहती हूं।
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मेरे दादाजी ने कभी भी अपने निकटतम लोगों के भविष्य के बारे में सोचना बन्द नहीं किया था। वो सिर्फ एक ही चीज को लेकर ज्यादा सोचते थे, सिर्फ चित्र और चित्रों से मिलने वाली पीड़ा और खुषी। जैसे ही उन्होंने इस पर मास्टरी कर ली, वो किसी भी कला फार्मूले को स्वीकार या अस्वीकार कर देते थे। जैसे ही वेे अपने रंगों भरे ब्रष के माध्यम से रंगों की अंतर्निहित भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए रंग फेलाते तो इस प्रक्रिया में वे उन लोगों के प्रति भी निर्मम हो उठते जो उन पर ताना कसते या आरोप लगाते।
दादाजी बच्चों को मासूमियत के कारण और स्त्रियों को यौन भावनाओं की वजह से बहुत प्रेम करते थे। वे अपने चित्रों में स्त्रियों के प्रति अपनी चरम भावनाओं को पूरी मुखरता से अभिव्यक्त करते थे। उन्हें स्त्रियां मृत्युदूत लगती थीं। अंधेरे के शहंषाह की तरह वे उन पर रात के अंधेरे में अपने स्टूडियो में काम करते थे। स्त्रियां उनके निषाने पर थीं और वे उनके लिए ग्रीक मिथक चरित्र के विषाल वृषभ के सिर वाले दैत्य थे। उनके लिए सब कुछ इस कला संग्राम में ही निहित था। किसी की कोई वकत नहीं थी, फिर वो चाहे जीवित या मृत दोस्त हों या रिष्तेदार या बच्चे-नाती-पोते। उनकी कला के सामने सबको बलिदान होना ही था।
वो पिकासो थे। एक महान प्रतिभावान कलाकार।
महान प्रतिभा किसी पर दया नहीं दिखाती, क्योंकि उसका गौरव और उसकी महिमा इसी पर निर्भर करती है।
रिवरहैड बुक्स द्वारा प्रकाषित पुस्तक ‘पिकासो माइ ग्राण्डफादर’ से साभार।
परिचय: मेरीना पिकासो
वियतनाम में अनेक दानदाता संस्थाओं की संस्थापक मेरीना पिकासो विषेष रूप से निराश्रित और निर्धन बच्चों की सहायता के लिए काम करती हंै। उनके पांच बच्चे हैं, जिनमें से तीन वियतनामी बच्चे गोद लिए हुए हैं। वे दक्षिणी फ्रांस के उस विला में रहती हैं, जो उन्हें अपने दादा की विरासत में मिला था।

Sunday, 22 February 2009

खाद्यान्न संकट के कई रूप




इस बात को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब दुनिया के तमाम अखबारों में हैती के बाजारों में नमक-मिट्टी के बने बिस्किट बिकने की तस्वीरें छपी थीं। हैती में गरीबी और भूख से मारे लोगों के जून में हुए एक प्रदर्शन के दौरान एक प्रदर्शनकारी ने कहा, ‘अगर सरकार खाद्य पदार्थों की कीमतें कम नहीं कर सकती तो इसे चले जाना चाहिए। अगर पुलिस और संयुक्त राष्ट्रसंघ हम पर गोली चलाना चाहे तो चला दे, क्योंकि आखिरकार हम गोली से नहीं तो एक दिन भूख से मर जायेंगे।’ बरसों से हम दक्षिण अफ्रीका के कुछ देशों में भुखमरी से ग्रस्त कंकाल-पिंजर बच्चों की तस्वीरें देखते आ रहे हैं। आज विश्व के सैंतीस विकासशील देश भयानक खाद्य संकट से जूझ रहे हैं और इनमें से बीस देश तो अल्पविकसित देशों की श्रेणी में आते हैं।जरा गौर से सोचें तो यह दिनों-दिन गहराते उस खाद्यान्न संकट का एक पहलू है, जिसके बारे में बहुत गम्भीरता और विस्तार से चर्चा-विमर्श दुनिया के ज्यादातर देशों में नहीं हो रहा है। जिस भयानक आर्थिक मन्दी से अमेरिका और यूरोप के कई मुल्क आज गुजर रहे हैं, वह उस वक्त किस कदर खौफनाक होगी, जब दुनिया में आबादी के हिसाब से खाने को अन्न ही उपलब्ध नहीं होगा। बहुत सम्भव है आज की मन्दी का दौर जल्द ही खत्म हो जाये, लेकिन सोना, चांदी या पैसा कभी भी भोजन का विकल्प नहीं हो सकता। आज दुनिया खाद्यान्न के मामले में दूसरे विश्व युद्ध से भी पीछे चली गई है। एक समय में उपजे खाद्यान्न संकट के दौर में त्वरित उपाय के रूप में अधिक पैदावार देने वाली फसलों का जो विकल्प अपनाया गया था, वह आज कई मायनों में दुनिया के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। दूसरी तरफ कनाडा जैसे देश में केन्द्र सरकार सूअरपालकों को एक सूअर मारने के लिए 250 डालर दे रही है, क्योंकि वहां सूअरों का उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ गया है और कीमतें जबर्दस्त रूप से कम हो गई हैं, यह सूअरपालक के लिए घाटे का सौदा है जिसे सरकार पूरा कर रही है, वजह यह कि सुअरपालन में आने वाली लागत बढ़ गई है। कैसा विचित्र विरोधाभास है कि एक तरफ लोग भूख से मर रहे हैं और दूसरी तरफ उपलब्ध भोजन को नष्ट किया जा रहा है।
यह सब उन यूरो-अमेरिकी नीतियों का नतीजा है जो ‘विश्व ग्राम’ के नाम पर पूरी दुनिया पर थोपी जा रही हैं। विश्व बैंक, मुद्रा कोष और तमाम अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं ही नहीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी इन्हीं नीतियों पर अमल करते हुए दुनिया को जरा से मुनाफे के लिए बर्बाद करने को आमादा हैं। आज खुद अमेरिकी नागरिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और राजनेता दुनिया पर छाये इस खाद्यान्न संकट को लेकर बेहद चिंतित हैं और उन पुरानी किसानी पद्धतियों की ओर लौटने की बात करने लगे हैं, जिन्हें एक समय में अवैज्ञानिक, रूढिबद्ध और निरर्थक कहकर नकार दिया गया था। जिस अमोनियम नाइटेªट से बम और उर्वरक दोनों बनाये जा सकते हैं, उसका पहले हथियार बनाने में और बाद में खाद बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। आज इसके जो परिणाम पूरी दुनिया को भोगने पड़ रहे हैं, उनके बारे में अगर पहले सोचा जाता तो हालात इतने भयावह नहीं होते।
कहां गये वो खेत खलिहान
आज आप किसी भी बड़े शहर से बाहर निकलें तो सौ-पचास किमी तक आपको वो पुराने खेत-खलिहान नजर नहीं आयेंगे, जिन्हें आप बचपन से देखते आये हैं। बड़े नगरों का जिस कदर बेतहाशा विस्तार हो रहा है और टाउनशिप, सेज और औद्योगीकरण के नाम पर शहरों के नजदीकी खेत-खलिहान नष्ट हो रहे हैं, यह एक भयानक परिदृश्य को प्रतिबिम्बित करता है। आने वाले वर्षों में इन शहरों में पर्यावरण की दृष्टि से भयानक हादसे हो सकते हैं, क्योंकि महानगरों के नजदीक के खेत-खलिहान ही इनके चारों तरफ एक हरित पट्टी की संरचना करते थे, जो खत्म कर दी गई है। इतना ही नहीं इन बड़े नगरों के बाशिंदों के लिए अनाज, सब्जियों और दुग्धोत्पाद से लेकर पीने के पानी तक का संकट भी दिनोंदिन गहराता जायेगा। कारखाने जमीन को बंजर कर देंगे और भूजल का स्तर निरंतर घटता जायेगा, खाने-पीने की चीजें दूर-दराज से आयेंगी और आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जायेंगी। खेत-खलिहान की जगह इमारतों का जंगल एक बड़ा-सा बायलर होगा, जिसमें इन्सान सिर्फ एयरकन्दीशनर के कारण ही आराम से रह पायेगा, एयरकन्डीषनर यानी ओजोन परत को भेदने का मानवीय आविष्कार। खाने-पीने के लिए बड़े बाजार होंगे जिनमें वो सब उपलब्ध होगा, जिससे कुछ लोग मुनाफा कमायेंगे और आम आदमी हर तरह से ठगा जायेगा। सुगम और तीव्र परिवहन के नाम पर और वह भी खाद्यान्न आदि की आपूर्ति के लिए जो बड़े हाइवे बनाये जा रहे हैं वे प्रदूषण ही नहीं फैला रहे, बल्कि ग्रीनहाउस गैसों को भी बढा रहे हैं। आज आप किसी भी हाइवे पर चले जायें, वहां निर्दयी ढंग से हरे दरख्तों को काट दिया गया है और वहां चारों तरफ सीमेन्ट-कोलतार की तपती सड़कें सिर्फ और सिर्फ आग उगलती नजर आती हैं।
नकदी फसलों का जंजाल
नकदी फसलों का मतलब है अपनी आवश्यकता के बजाय बाजार की जरुरत के हिसाबसे ऐसी फसलों का उत्पादन जो अधिक मुनाफा ही नहीं दें, बल्कि विदेशों को निर्यात भी की जा सकें। तीसरी दुनिया के देशों में भारत कृषि उत्पाद निर्यात करने वाले देशों में नम्बर एक है, जहां दो करोड़ लोग रोज भूखे सोते हैं। निर्यात की जाने वाली ऐसी फसलों में देशी जरुरत का ध्यान नहीं रखा जाता और अनाज के बजाय तिलहन, दलहन और फलों के उत्पादन पर जोर दिया जाता है। दुनिया के तमाम देशों में किसान प्राकृतिक रूप से सूरज की रोशनी, प्राकृतिक खाद और बारिश या नहर के पानी से सदियों से खेती करते आये हैं। लेकिन आधुनिक कृषि तकनीकों के आविष्कार ने पिछले पचास बरसों में खेती-किसानी का पारम्परिक स्वरूप ही बदल कर रख दिया है। बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की महामन्दी और दूसरे विश्व युद्ध के बाद उपजे खाद्यान्न संकट के दौर में कृषि के आधुनिकीकरण की जबरदस्त वकालत की गई। नतीजतन रासायनिक खाद और उन्नत बीजों के माध्यम से कम समय में अधिकाधिक फसल पैदा करने और मुनाफा कमाने के लिए नकदी फसलों के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर बल दिया गया। जिन खेतों में साल में अलग-अलग किस्म की तीन-चार फसलें होती थीं, उनमें एक ही जिन्स की इस कदर अन्धाधुन्ध खेती की गई कि कुछ ही बरसों में सोना उगलने वाली धरती सीमेन्ट के फर्श की तरह कठोर और बंजर हो गई। हजारों-लाखों एकड़ जमीन हमने अपने ही हाथों बर्बाद कर दी। आज फिर से सोचा जा रहा है कि इन्सानी तरीकों से बंजर हुई जमीन को पशु-पक्षियों की प्राकृतिक खाद से वापस उपजाऊ बनाने की कोशिश की जाये और खेती के पारम्परिक तरीकों की ओर लौटा जाये।
खेती और पशुपालन में अलगाव
पहले किसान और पशुपालक की कोटि अलग-अलग नहीं थी। जो खेती करता था वही मवेशी भी पालता था। जानवर किसान के लिए दूध ही नहीं खाद भी पैदा करते थे। आधुनिक कृषि ने पशुपालन और खेती को अलग कर दिया। परिणाम यह हुआ कि कृषिभूमि से जानवरों के गायब होते ही जमीन की प्राकृतिक उर्वरता खत्म होने लगी और विशाल डेयरियों में पशुओं से अधिक दुग्धोत्पाद और मांस की प्राप्ति के लिए अन्धाधुन्ध प्रयोग किये जाने लगे। कई तरह के इंजेक्षन देकर और प्रोटीन खिलाकर जानवरों को इस कदर बीमार कर दिया गया कि आज वो ‘मैड काउ’ और ‘एन्थ्रेक्स’ से लेकर गम्भीर त्वचा रोगों और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के वाहक बन गये हैं। जो जानवर प्राकृतिक वातावरण में फलफूल रहे थे, वे कारखानों जैसी विशालकाय डेयरियों में न केवल बीमार होने लगे, बल्कि ग्रीनहाउस गैसों का भी बड़ी मात्रा में उत्पादन करने लगे। एक अमेरिकी अध्ययन के अनुसार दुनिया में 18 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसें सिर्फ पशुओं की वजह से पैदा होती हैं। अगर ये जानवर खुले खेत-चरागाहों में होते तो हालात दूसरे होते, एक तरफ तो खुद स्वस्थ रहते और दूसरी तरफ धरती की उर्वराशक्ति को बढाते। एक अन्य अध्ययन के अनुसार एक पाउण्ड मांस को तैयार करने में 5000 गैलन पानी अलग खर्च होता है। इन जानवरों के लिए चारा पैदा करने में भी भारी खर्च होता है, अगर वे खेतों में रहें तो उन पर होने वाला खर्च भी बहुत कम किया जा सकता है।
तत्वहीन अन्न का क्या करोगे
दुनिया में अधिक उत्पादन वाली फसलें अब गुणवत्ता की दृष्टि से बेकार सिद्ध हो रही हैं। एक तरफ तो बिना धूप-बारिश की अतिउत्पादक फसलें, कारखाना किस्म के कृषि उत्पादन, आधुनिक खाद्य-प्रसंस्करण प्रविधियों, रासायनिक खाद, कीटनाषक, कृषि-यांत्रिकी, पैकेजिंग और परिवहन के कारण खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है तो दूसरी तरफ पेट्रोलियम उर्जा के प्रयोग से प्राकृतिक उर्जा संसाधनों की खपत बेतहाशा बढ़ गई है। आज से सत्तर बरस पहले एक कैलोरी उर्जा से 2.3 कैलोरी खाद्य-शक्ति प्राप्त होती थी, और आज दस कैलोरी उर्जा से महज एक कैलोरी खाद्य-शक्ति प्राप्त होती है। इतना ही नहीं कम गुणवत्ता और रासायनिक प्रक्रिया से निकलने वाले खाद्य पदार्थों के कारण हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। अधिक मात्रा में पैदा होने वाला खाद्यान्न कई कारणों से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। जब मात्रात्मक दृष्टिकोण से अधिक उत्पादन पर जोर दिया जाता है तो सबसे पहले गुणवत्ता प्रभावित होती है। वजह यह कि प्राकृतिक रूप से होने वाले उत्पादन में समय, मौसम और उर्वरकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। रासायनिक प्रक्रिया और तकनीकी तरीके से की गई पैदावार बेमौसम और प्रकृतिविरुद्ध होती है, जिसमें मनुष्य का बेवजह दखल ज्यादा होता है। इसीलिए आप हर मौसम में आम तो खा सकते हैं, लेकिन स्वाद और सेहत के हिसाब से हो सकता है कि फलों का राजा आपके लिए कोई गम्भीर बीमारी लेकर आ जाये। अवशीतन गृहों में संरक्षित खाद्य पदार्थ प्रक्रियागत कारणों के चलते अगर अखाद्य नहीं भी होते तो भी उतने ताजा तो नहीं रहते जितने पड़ोस के खेत से आये खाद्यान्न होते हैं। बाजार में मिलने वाले फास्ट फूड में से ज्यादातर में कहने भर को भरपूर कैलोरी होती हैं, असलियत में तो कैलोरी के नाम पर वसा और कार्बोहाइड्रेट्स ही ज्यादा होते हैं, जो एक समय बाद गम्भीर बीमारियों के कारण बन जाते हैं।
इथोपिया से क्या सीखें
अपनी महान प्राचीन संस्कृति से पहचाने जाने वाला इथोपिया आज अकाल और भुखमरी के कारण हमेशा सुर्खियों में रहता है। यह सब 1970 के बाद हुआ। लेकिन कैसे, यह जानने के लिए थोड़ा पीछे चलें। इथोपिया की सबसे बड़ी नदी अवाश पर बड़े बांध बनाने के लिए विश्व बैंक-मुद्रा कोष ने सरकार को समझाया और कहा कि इसके बाद देश के दिन फिर जायेंगे। सिंचाई के लिए पानी होगा, बिजली होगी और हर तरफ समृद्धि होगी। सरकार ने सुझाव मान लिया। लेकिन बांधों के लिए जमीन साफ करने के लिए जंगल, खेत, खलिहान, चरागाह और गांव के गांव पानी में डुबोने पड़े। 50 लाख लोग काश्तकार से भिखारी हो गये। बांधों से नदी की उपजाऊ मिट्टी खेतों में नहीं पहुंची और खेत बंजर होने लगे। विष्व बैंक-मुद्रा कोष ने रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग की सलाह दी तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से महंगे उर्वरक खरीदे गये। उर्वरकों के कारण पर्यावरण सन्तुलन बिगड़ गया तो कीटनाशक भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से आयात करने पड़े। अत्यधिक आयात के कारण अर्थव्यवस्था और गड़बड़ा गई। बड़े बांधों के कारण उपजाऊ भूमि नष्ट हो गई और रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों ने जमीन के भीतर जाकर जमीन को विषाक्त और जहरीला बना दिया। खाद्यान्न उत्पादन घट गया और सरकार को अनाज आयात करने के लिए वापस विश्व बैंक और मुद्रा कोष की शरण में जाना पड़ा। दोनों ने सलाह दी कि नकदी फसलें उगाओ यानी कपास और गन्ना। इथोपिया ने अमीर देशों के लिए सस्ती कपास और सस्ता गन्ना उगाना प्रारम्भ किया तो खुद के देश में खाद्यान्न का संकट गहरा गया। अकाल देश का स्थायी भाव हो गया और विश्व व्यवस्था के नियंत्रकों ने कड़ी से कड़ी शर्तों पर कर्जे दिये। आज इथोपिया भयानक ऋण-दुष्चक्र में फंसा हुआ है, जिसकी पहचान है हड्डियों के ढांचे वाले बालक और नागरिक।
और यह हाल सिर्फ इथोपिया का ही नहीं हुआ। साइप्रस, कोलम्बिया, मोरक्को, जमैका, बोलिविया, जाम्बिया, बांग्लादेश, अर्जेन्टीना, जायरे, पेरू, ब्राजील, केन्या, तन्जानिया, फिलीपीन्स और मेक्सिको जैसे अनेक देशों के साथ भी लगभग यही हुआ। भारत के साथ भी ऐसा हो सकता है अगर हम नहीं चेते तो वह दिन दूर नहीं होगा।
एक पहलू यह भी...
एक तरफ जहां विश्व खाद्यान्न संकट का बोलबाला है, वहीं इन्स्टीट्यूट फार फूड एण्ड डवलपमेंट का मानना है कि दुनिया में खाद्यान्न का कोई संकट नहीं है, अगर संकट है तो वह है असमान वितरण और उचित नीतियों के इस्तेमाल नहीं करने का। इस संस्थान का कहना है कि पृथ्वी पर आज इतना अन्न पैदा होता है कि प्रत्येक इंसान को 3500 कैलोरी भोजन दिया जा सकता है, यानी मोटापा बढाने लायक। एक अमेरिकी अध्ययन के मुताबिक दुनिया के 78 प्रतिशत कुपोषित बच्चे उन देशों में रहते हैं, जहां खाद्यान्न का अतिरेक है। जिन देशों में हमेशा खाद्यान्न संकट रहता है वहां कुल उपलब्ध सिंचाई योग्य भूमि के महज दस से पैंतीस फीसद हिस्से में खेती की जाती है। उदाहरण के लिए चाड में सिर्फ दस प्रतिशत भूमि पर ही खेती होती है। भारत में भी लगभग यही स्थिति है, जहां अरबों एकड़ जमीन बेकार पड़ी है, इसे अगर गरीब भूमिहीन किसानों में निशुल्क बांट दिया जाये तो कोई खाद्यान्न संकट कभी सिर नहीं उठायेगा। दरअसल सारा झगड़ा इस बात का है कि औद्योगिक उत्पादन के रास्ते त्वरित विकास का सपना लेकर हमने कई दशकों तक खेती किसानी को हेय बना दिया और रसातल में जाने दिया। आज अगर हम फिर चेत जायें तो सारे संकट हल हो सकते हैं।

Thursday, 19 February 2009

मेरा छोटा सा परिचय

प्रेमचन्द गाँधी
जन्मः 26 मार्च, 1967 जयपुर


शिक्षा - बी कोम एम.ए. (हिन्दी)। सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित और आकाशवाणी -दूरदर्शन से प्रसारित।
स्तम्भ- लेखन : राजस्थान पत्रिका , जयपुर- कला- समीक्षा । दैनिक नवज्योति , जयपुर- विश्वप्रसिद्ध उपन्यासों का सार-संक्षेप ‘पुनर्पाठ’ शीर्षक से।डेली न्यूज, जयपुर- विश्वसाहित्य से प्रेम कहानियों का अनुवाद ‘हमन हैं इश्क मस्ताना’ स्तम्भ में और इन दिनों प्रसिद्ध व महत्वपूर्ण पुस्तकों पर स्तम्भ ‘पोथीखाना’।महका भारत, जयपुर- सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर स्तम्भ लेखन ‘संस्कृति क्षेत्रे’ शीर्षक से।समय माजरा, जयपुर- मीडिया की प्रवृतियों पर समालोचनात्मक स्तम्भ।, 'हमशहरी' लाहौर, पाकिस्तान- दक्षिण एशिया के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर लेखन।
नाटक‘सीता नहीं’ - रामकथा का स्त्री-पाठ।‘महाकवि’ - बिहारी के जीवन पर रांगेय राघव के उपन्यास का नाट्य रूपान्तर।‘एक अनूठी प्रेम कहानी’ - हरिशंकर परसाई के उपन्यास ‘रानी नागफनी की कहानी’ का रूपान्तर।‘रोशनी की आवाज’ - लघु नाटक।
विविध- दृश्य -मीडिया लेखनजयपुर दूरदर्शन के लिए दो वर्ष तक ‘आसपास’ कार्यक्रम का लेखन।‘मेकिंग आॅफ ए म्यूरल’ - सुरेन्द्र जोशी के काष्ठ -म्यूरल पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म का लेखन।‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ - भास्कर टीवी, जयपुर द्वारा निर्मित फिल्म के लिए शोध एवं लेखन।
पुस्तकें - ‘इस सिम्फनी में’ कविता संग्रह। ‘संस्कृति का समकाल’ - निबन्ध-संग्रह।
पुरस्कार-सम्मान पं. गोकुलचन्द्र राव सम्मान - सांस्कृतिक लेखन के लिए - 2005। जवाहर कला केन्द्र, जयपुर द्वारा लघु नाटक ‘रोशनी की आवाज’ पुरस्कृत - 2004। राजेन्द्र बोहरा स्मृति काव्य पुरस्कार ‘इस सिम्फनी में’ के लिए - 2007। लक्ष्मण प्रसाद मण्डलोई सम्मान ‘इस सिम्फनी में’ के लिए - 2007।
विदेश यात्रा 2005 और 2007 में पाकिस्तान की सांस्कृतिक-यात्रा।
सम्प्रति - महासचिव, राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ।
सम्पर्क - 220ए रामा हेरिटेज, सेन्ट्रल स्पाइन, निकट सिने स्टार, विद्याधर नगर, जयपुर 302 023 फोन-98291.90626