Sunday, 29 January 2012

कार्टूनिस्‍ट-कलाकार अभिनेता-अभय... खा गया समय...


अभी-अभी उस अभय वाजपेयी को आखिरी सलाम कहकर आया हूं, जो हरदिल अजीज था। राजस्‍थान पत्रिका के पॉकेट कार्टून झरोखा  के विख्‍यात त्रिशंकु, जिसे लाखों पाठकों की बेपनाह मोहब्‍बत हासिल थी... जिसने अपने मुंह से कभी नहीं कहा कि मैं ही त्रिशंकु हूं और मैं ही कलाकार, रंगकर्मी, निर्देशक अभय वाजपेयी। अजीब मस्‍तमौला और बिंदास आदमी था। किसी के बारे में था कहना-लिखना कितना मुश्किल होता है... जिंदादिल लोग आपको बहुतेरे मिल जायेंगे, लेकिन अभय वाजपेयी जैसे शख्‍स बहुत दुर्लभ होते हैं...हर फिक्र को धुंए में उड़ाते चला गया... ऐसी बेफिक्री कि बावजूद डॉक्‍टरों और मित्रों की चेतावनियों के, बीपी की दवा ही नहीं ली... उनका शाम के वक्‍त तकियाकलाम होता था, शाम के वक्‍त चाय पीने से मुंह से बदबू आती है.. लोग क्‍या कहेंगे...अभय वाजपेयी के इतने बुरे दिन आ गये हैं कि शाम 6 बजे बाद चाय पीता है... सरकार ने नौकरी से निकाल दिया है या कि राजस्‍थान पत्रिका ने कार्टून के पैसे देना बंद कर दिया है...यार दोस्‍तों की मंडली को अपनी लाजवाब चुटकियों और किस्‍सों की कभी ना खत्‍म होने वाली पोटली से गुलजार करने वाला वो अप्रतिम कलाकार...
मैं उनसे इस बात के लिये बहुत झगड़ता था कि अपने कार्टूनों की एक पुस्‍तक प्रकाशित की जानी चाहिए... वे इस पर तैयार भी हो गये थे... लेकिन अपनी मस्‍ती में भूल ही जाते थे... उन्‍होंने कभी अपने कार्टून प्रकाशित होने के बाद प्रेस से शायद ही वापस मांगे हों... अखबार के दफ्तर की रद्दी में ना जाने कहां गुम हो गये हजारों कार्टून... बाद के दिनों में उन्‍होंने शायद उन्‍हें सहेजना शुरु कर दिया था... मैंने उन्‍हें चुनिंदा कार्टून्‍स की प्रदर्शनी लगाने की भी सलाह दी थी... लेकिन उनके पास ऐसे फालतू कामों के लिए शायद वक्‍त ही नहीं था... जिस जमाने में लोग अपनी मार्केटिंग खुद ही करते रहते हैं, उन्‍होंने खुद के लिए कोई वक्‍त नहीं रखा... इसीलिए 2002 की शुरुआत में उन पर जबर्दस्‍त अटैक हुआ और वे लंबे समय तक कोमा में रहने के बाद जब ठीक हुए तो जुबान चली गई. और साथ ही चला गया हाथों का कौशल...  फिर भी अपनी जिंदादिली से उन्‍होंने दो-तीन साल में बहुत कुछ अर्जित कर लिया था. कुछ बोलने लगे थे और उन पर कार्टून का जुनून सवार था... मैं बनाउंगा, फिर से कार्टून... इतना अदम्‍य विश्‍वास था उन्‍हें... और साबित कर दिया कि वे बेजोड़ हैं। कुछ दिन दैनिक नवज्‍योति में उनके कार्टून छपे थे, जिनमें से एक की याद आज पत्रिका के अभिषेक तिवारी जी ने याद दिलाई। वर्तमान अशोक गहलोत सरकार की नई-नई ताजपोशी हुई थी और मीडिया में सब कह रहे थे कि कर्मचारियों ने इस बार अशोक गहलोत की वापसी में बड़ा काम किया है..लेकिन कुछ ही दिनों में कर्मचारियों के किसी आंदोलन के संबंध में सरकार ने सख्‍ती की थी, उस पर उनके कार्टून का कैप्‍शन था दिल दिया, दर्द लिया। वे एक लाइन में इतनी बड़ी बात कह देते थे, जो कई पेज के लेख में नहीं कही जा सकती। उनके पास फिल्‍मी गीतों की एकाध पंक्ति पर कार्टून बना देने की अद्भुत कला थी। अपनी मौज में खूब पैरोडियां बनाते थे और अपनी अभिनय कला से उसका ऐसा वाचन करते थे कि सुनने वालों के पेट में बल पड़ जायें। धीरे-धीरे प्‍यार को बढना है गीत में वे मुखड़े के तुरंत बाद दो सिंधी शब्‍द डालकर और हद को बंगाली में हौद करके वे अपने अंदाज में गाते थे, धीरे-धीरे प्‍यार को बढाना है, अरे वरी हद से गुजर जाना है.. धीरे-धीरे प्‍यार को बढाना है, अरे सांई हौद से गुजर जाना है. इसी तरह उन्‍होंने कुछ कुछ होता है की पैरोडी बनाई थी। तुम पास आये, हम हिनहिनाए, यूं मुस्‍कुराये, तुमने ना जाने क्‍या सपने दिखाये, अब तो मेरा दिल जागे ना सोता है, क्‍या करूं हाय, कुछ नहीं होता है...
वे रंगमंच के मंजे हुए कलाकार थे और कई धारावाहिकों और फिल्‍मों में भी उन्‍होंने अभिनय किया। उनके पास गजब का विट और ह्यूमर था, जिसे उन्‍होंन खुद के बनाये अजब गजब जैसे दूरदर्शन धारावाहिकों में बखूबी इस्‍तेमाल किया. अपने साथी कलाकारों में वे बेहद लोकप्रिय थे और सभी उन्‍हें बेहद सम्‍मान से देखते थे। बहुत से फिल्‍म कलाकार उनके जिगरी दोस्‍त हैं, जिनमें रघुवीर यादव की बात मुझे इसलिए याद है कि एक शाम मैंने भी दोनों के साथ गुजारी थी।
उनके कार्टून आज भी लोगों की स्‍मृति में जिंदा हैं। मुझे कर्मचारी हड़ताल के दौरान बनाया एक कार्टून याद आता है, जिसमें घर पर खाना खाने के बाद कर्मचारी पत्‍नी से कहता है कि अब लंच हो गया, तुम मेज कुर्सी लगा दो, मैं सोने जा रहा हूं। एक बार आर.एस.एस. का कोई कार्यक्रम था, जिसमें स्‍वयंसेवकों के पास गणवेश ना होने की खबर छपी थी। कार्यक्रम से ऐन पहले उनका कार्टून था, जिसमें पति टांड पर सामान के बीच गणवेश खोज रहा है और पत्‍नी से कह रहा है, कहीं तुमने बर्तनों के बदले में तो नहीं बेच दिया... उनका आम आदमी राजस्‍थानी पगड़ी वाला साधारण किसान-मजदूर था, जिससे दूर-दराज का पाठक भी अपना संबंध बना लेता था। मुझे एक बार किसी मित्र ने बताया था कि उनके निरक्षर दादाजी अखबार से खबरें सुनने के साथ कार्टून भी सुना करते थे।

अभी इतना ही... अगर आपको उनके कार्टून याद आयें तो जरूर बतायें...


Thursday, 12 January 2012

दो नई कविताएं

शुक्रवार की साहित्‍य वार्षिकी-2012 में ये दो नई कविताएं प्रकाशित हुई हैं। मेरे मित्र और पाठक जानते हैं कि इधर मेरी कविताओं का स्‍वर बहुत बदला है और ये कविताएं इसे बताती हैं। कुछ मित्रों ने इन कविताओं को पहले सुना भी है और शायद एकाध ने पढ़ा भी है। आज मैं अपने तमाम दोस्‍तों के नाम ये कविताएं इस उम्‍मीद के साथ प्रस्‍तुत कर रहा हूं कि शायद आप सबको इनसे कुछ कहने को मिले, जो मेरी काव्‍य यात्रा में सहायक हो।


मृत्‍यु और प्रमाण पत्र



एक

वो नहीं रहे
इसका सबूत क्‍या है

मैंने कहा
जैसे वे गए
वसंत भी चला गया
उन्‍होंने कहा
सबूत पेश करो
शरद, शिशिर, हेमंत और वर्षा भी नहीं रहे

हमें सबका मृत्‍यु प्रमाणपत्र चाहिए।

दो

उन्‍हें चाहिए
हर जगह मूल मृत्‍यु प्रमाणपत्र
कोई प्रतिलिपि नहीं चलेगी

बैंक, बीमा, पेंशन, पानी, बिजली, टेलीफोन
नगर पालिका, आवासन मण्‍डल
सभी को चाहिए
मूल मृत्‍यु प्रमाणपत्र

मैं कहना चाहता हूं कि
पहली बार वे तब मरे थे
जब उन्‍हें स्‍कूल में दाखिला नहीं दिया गया था
उनकी जाति के कारण

इस पहली मृत्‍यु के निशान
जीवन भर रहे उनकी आत्‍मा पर

दूसरी बार उनकी मौत तब हुई
जब सबसे अच्‍छे अंकों से
प्रथम श्रेणी में उत्‍तीर्ण होने के बावजूद
उन्‍हें गांव भर में अपमानित किया गया
दूसरी मौत उन्‍हें शहर ले आई
शहर में उन्‍हें धीरे-धीरे मारा गया

सबसे पहले अच्‍छी कॉलोनी में
किराए के मकान से वंचित रखकर मारा गया
दफ्तर में पानी का अलग
मटका रखकर मारा गया
ज्‍यादा काम करने के बावजूद
औरों के हिस्‍से का काम लाद कर मारा गया

उन्‍होंने धार्मिक जुलूस के लिए चंदा नहीं दिया तो
उनकी दराजों-अलमारियों में
अदृश्‍य रंग में डूबे
रुपये रखकर मारा गया

उन्‍हें पदोन्‍नति में
नाकाबिल कहकर मारा गया
बच्‍चों की पढ़ाई
और मकान के लिए
उन्‍हें कर्जे के लिए अपात्र मानकर मारा गया

सेवानिवृति से ऐन पहले
उनके खिलाफ जांच बिठाकर मारा गया
कचहरी में झूठी गवाहियों से मारा गया
घाघ वकीलों की जिरह में
उन्‍हें लांछनों से मारा गया

आए दिन पल-पल की इस मौत से
सुकून दिलाने वाली
उनकी थोड़ी-सी शराब को
गांधीवाद और मद्यनिषेध के नाम पर
महंगी कर-करके उन्‍हें मारा गया 

वे अपनी बमुश्किल सत्‍तर-साला जिंदगी में
दस हजार बार मरे
क्‍या करें हुजूर
इन मौतों का कोई प्रमाण नहीं

यह उनकी आखिरी मौत थी प्राकृतिक
बस इसी का पंजीकरण हुआ है
जिसका दस्‍तावेज है
यह मूल मृत्‍यु प्रमाणपत्र।


अंतिम कुछ भी नहीं होता

कोई दिन नहीं अंतिम
न कोई पल अंतिम
झूठी और भ्रामक हैं
अंतिम की सारी अवधारणाएं
जैसे सृष्टि के अंत की घोषणाएं

किसी के अंत या अंतिम होने की बात
लोभ और लालच की संस्‍कृति में
व्‍यापार की नई कला है
बिक्री और छूट का आखिरी दिन
बचे हुए माल को बेचने का तरीका
आवेदन की अंतिम तिथि
गलाकाट प्रतियोगिता का पैंतरा
कमजोर को बाहर करने का हथियार अंतिम

अंतिम आदमी तमाम सूचियों से बाहर
अन्‍न के आखिरी दाने गोदामों में सड़ते
अंतिम पायदान पर लोग तरसते
पानी की आखिरी बूंद पर कंपनियां काबिज
हर अंतिम सत्‍य को झुठलाती संसद

कौन देता है अंतिम रूप उन नीतियों को
जो पहले से त्रस्‍त लोगों को
धकेलती अंत की ओर
समस्‍याओं का आखिरी समाधान
क्‍यों होता है सिर्फ व्‍हाइट हाउस के पास

दरिद्रता के अंतिम मुहाने पर खड़े
आदिवासियों के पास
कहां से आता है आखिरी हथियार
क्‍यों अपनी ही जनता को
गोलियों से भून देने का
बचा रह जाता है आखिरी उपाय

कहीं नहीं कोई अंतिम सत्‍ता
इस अनंत सृष्टि में
हमने मंगल तक जाकर देख लिया

अंतिम कुछ भी नहीं होता
आखिरी सांस के बारे में
सिर्फ मृतक जानते थे
हमारे पास तो सिर्फ इरादे हैं
इनमें से कोई अंतिम नहीं।

Sunday, 13 November 2011

प्रेम का अंकशास्‍त्र


नौ ग्रहों में सबसे चमकीले शुक्र जैसी है उसकी आभा
आवाज़ जैसे पंचम में बजती बांसुरी
तीन लोकों में सबसे अलग वह
दूसरा कोई नहीं उसके जैसा

नवचंद्रमा-सी दर्शनीय वह
लुटाती मुझ पर सृष्टि का छठा तत्‍व प्रेम

नौ दिन का करिश्‍मा नहीं वह
शाश्‍वत है हिमशिखरों पर बर्फ की मानिंद

सात महासागरों के जल से निखारा है
कुदरत ने उसका नव्‍यरूप

खत्‍म हो जाएं दुनिया के सातों आश्‍चर्य
वह लाजिमी है मेरे लिए
जिंदगी में सांस की तरह
पृथ्‍वी पर हवा-पानी-धूप की तरह।

Monday, 7 November 2011

कराची में बकरा मण्‍डी

2005 में अपनी पहली पाकिस्‍तान यात्रा के दौरान कराची देखने का अवसर मिला। शहर कराची को लेकर कुछ कविताएं लिखी थीं। उनमें से एक कविता यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं। सब दोस्‍तों को ईद की दिली मुबारकबाद के साथ सबकी सलामती की कामनाओं के साथ।

न जाने कितनी दूर तक चली गई है
यह बल्लियों की बैरीकैडिंग
जैसे किसी वीवीआईपी के आने पर
सड़कें बांध दी जाती हैं हद में

आधी रात के बाद
जब पहली बार इधर से गुज़रे तो लगा
बकरे मिमिया रहे हैं
यहां इस विशाल अंधेरे मैदान में
और बकरीद आने ही वाली है

इस मण्‍डी से कुछ फर्लांग के फासले पर
हाईवे से गुज़रते हुए
कभी नहीं दिखा कोई बकरा
न सुनाई दी उसकी हलाल होती चीख़
एक ख़ामोशी ही बजती थी हवा में
कसाई के छुरे की तरह

एक सुबह मण्‍डी के पास से गुजरते हुए मालूम हुआ
बकरा मण्‍डी सिर्फ बकरों की नहीं
यहां भेड़, गाय, भैंस, ऊंट सब बिकते हैं

बुज़ुर्ग मेज़बान ने
बड़े दुख के साथ कहा,
'चारा नहीं है
मवेशी जिबह किये जा रहे हैं और
चाय के लिए पाउडर दूध इस्‍तेमाल होता है.
मसला यह नहीं कि मवेशी कम हो रहे हैं
मसला यह कि शहर कराची
इंसान और जानवर दोनों की मण्‍डी है।'

Monday, 24 October 2011

रोशनी और अंधेरे की कविताएं

ठीक से याद नहीं आता, लेकिन इन कविताओं को लिखे हुए 15 साल से अधिक हो चुके हैं। उस समय वैचारिक परिपक्‍वता नहीं थी, लेकिन जीवन-जगत को एक कवि की दृष्टि से देखने की कोशिश तो चलती ही रहती थी। उन दिनों ठोस गद्य की कविताएं लिखने का भी एक चलन चला था। अमूर्त विषयों पर भी खूब लिखा जाता था। उसी दौर में अंधरे और रोशनी के बारे में ये दो कविताएं लिखी गई थीं। दीपावली के अवसर पर आप सब मित्रों के लिए ये दो कविताएं प्रस्‍तुत हैं।

रोशनी के बारे में

वह जितनी पलकों के बाहर दिखती है उससे कहीं ज्‍यादा भीतर होती है। भीतर देखने की कोशिश प्रारंभ में एक अंधकार में उतरने की कोशिश होती है और शनै:-शनै: एक इंद्रधनुषी आभा में लिपटी दिखायी देती है रोशनी। प्राय: हम अंधकार से डरकर रोशनी से दूर चले जाते हैं। वस्‍तुत: यह डर अंधकार से अधिक भीतर की रोशनी का होता है।

रोशनी के विषय में बात करने पर अंधकार की चर्चा आ ही जाती है। दरअसल रोशनी नाम ही अंधकार की अनुपस्थिति का है। हालांकि अंधकार प्राय: सब जगह और मौकों पर उपस्थित रहता है यहां तक कि रोशनी की उपस्थिति में भी। यह हमारी ही सीमा है कि हम दोनों की उपस्थिति साथ-साथ देख पाते हैं या नहीं।

रोशनी के रंग भी होते हैं और इन रंगों में अक्‍सर काला रंग भी होता है। काली रोशनी में देखना ध्‍यान की शुरुआत है और उसमें विलीन होना मोक्ष की। मोक्ष भी एक प्रकार की रोशनी ही है।

रोशनी के बारे में इतना ही पता है कि वह अंधकार की बेटी है और पृथ्‍वी ही क्‍या ब्रह्मांड से भी पहले जन्‍म चुकी थी। वह गर्भ में पल रहे शिशु की आंख से लेकर दिग-दिगंत तक व्‍याप्‍त रहती है।

शाम जब हम दिया जलाते हैं और रोशनी को नमन करते हैं तो दरअसल हमारा नमन रोशनी से ज्‍यादा अंधकार के प्रति होता है जो हमें रोशनी की ओर ले जाता है।

अंधेरे के बारे में

रोशनी की अनुपस्थिति में काले रंग का पर्याय वह अपने भीतर समो लेता है कायनात के तमाम रंग। एक मां की तरह वह अपने गर्भ में रखता है अपना शिशु 'प्रकाश'। पूरे ब्रह्मांड में पैदल चलता है वह। जब वह दुलराता है हमें अपने कोमल हाथों से हमारी रगों में दौड़ने लगता है उसका शिशु।

काल के तीनों खंडों में व्‍याप्‍त रहता वह हमें मां के गर्भ से लेकर कब्र तक साथ देता है। उसके प्रति हमारी कृतज्ञता सूरज को शीश नवाने से प्रकट होती है।

व्‍यर्थ ही उससे भयभीत रहते हैं हम। दरअसल वह पैदा नहीं करता भय हमारे भीतर पहले से मौजूद रहता है भय।

अमावस और पूर्णिमा दोनों उसी के पर्व हैं। एक दिन वह चांद को धरती से पीठ लगाकर बच्‍चे को दूध पिलाती मां की तरह गोदी में खिलाता है तो दूसरे दिन मेले में कंधों पर बच्‍चे को बिठाए पिता की तरह चांद को लिए धरती के बीचों-बीच खड़ा हो जाता है।

तारों को सुलाने और सूरज को जगाने की ड्यूटी निभाता हुआ वह पृथ्‍वी के दोनों गोलार्द्धों में अपनी हाजिरी देता है।

Thursday, 13 October 2011

कुछ लोकतंत्र की भी सोचिए


श्रेष्‍ठ विचार और आदर्शों को लेकर चलने वाला एक आंदोलन कैसे दिशाहीनता और दिग्‍भ्रम का शिकार होकर हास्‍यास्‍पद हो जाता है, जनलोकपाल आंदोलन इसका ज्‍वलंत उदाहरण है। एक गैर राजनीतिक आंदोलन अंततोगत्‍वा राजनीति की शरण में जा रहा है या कहें कि अन्‍ना हजारे की साफ सुथरी छवि समय के साथ राजनीति और स्‍वार्थ के यज्ञ में हवन हो रही है और खुद अन्‍ना इसे ठीक करने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। भ्रष्‍टाचार के मसले पर शुरु हुआ अन्‍ना आंदोलन अब जिस दिशा में जा रहा है वह किसी भी रूप में गैर-राजनैतिक या कि जनपक्षधर नहीं है, बल्कि एक खास दिशा में भटकता हुआ यह कथित आंदोलन कुछ वर्चस्‍ववादी समूहों के हाथ में जाकर एक किस्‍म की फासिस्‍ट और अराजक परिणति को प्राप्‍त करने वाला है। जिस तरह अन्‍ना ने बिल पास ना करने की हालत में कांग्रेस को समर्थन देने से लोगों को मना किया है, वह ना तो गांधीवादी है और ना ही लोकतांत्रिक। गांधी जी ने कभी ऐसी शर्तें नहीं रखीं, जैसी अन्‍ना रख रहे हैं।
अन्‍ना हजारे के आंदोलन की हजार कमियां हैं और उनमें सबसे बड़ी कमी यह कि वे जिस देश में आंदोलन चला रहे हैं उसी की सरकार से यह मांग करते हैं कि वह अपने से ऊपर किसी ऐसी व्‍यवस्‍था का निर्माण करे, जिसकी चाबी कुछ लोगों के पास हो। इस देश के लोगों ने आजाद होने के बाद तय किया कि वे एक लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था अमल में लाएंगे। अब अगर कुछ लोग उसके बरक्‍स कोई नई सत्‍ता खड़ी करना चाहते हैं तो बावजूद उनकी तमाम घोषित ईमानदारियों के यह देखना होगा कि वे असल में इस लोकतंत्र को मजबूत करने के नाम पर कैसी व्‍यवस्‍था ईजाद करना चाहते हैं। इसके जो भी संकेत मिल रहे हैं वे बहुत खतरनाक हैं और बहुत दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि अधिकांश लोग उन संकेतों को नहीं समझ रहे हैं।
कहने के लिए यह लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए चलाया जा रहा आंदोलन है, लेकिन किसी एक सवाल या मुद्दे पर किसी राजनैतिक दल को वोट नहीं देने की अपील ही अलोकतांत्रिक है और इससे साफ संकेत मिलते हैं कि मामला देश में भ्रष्‍टाचार समाप्‍त करने का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर एक नए सांकेतिक ढंग से हमारी राजनीति को संचालित करने का है। अब धीरे-धीरे स्‍पष्‍ट होता जा रहा है कि अन्‍ना हजारे के नाम पर भ्रष्‍टाचार समाप्‍त करने की आड़ में कितने किस्‍म के भ्रष्‍ट, अलोकतांत्रिक, अराजक, फासिस्‍ट और इस देश की एकता और अखण्‍डता को तोड़ देने वाले कुकृत्‍य सरअंजाम दिए जा रहे हैं। खुद अन्‍ना ही स्‍वीकार कर रहे हैं कि केजरीवाल और शांतिभूषण का रवैया ठीक नहीं रहा, जिसकी वजह से आंदोलन लंबा चला। और अब तो वैकल्पिक मीडिया में जो तथ्‍य सामने आए हैं उनसे पता चलता है कि पूरे आंदोलन का चरित्र ही अलोकतांत्रिक है और कुछ कार्पोरेट घरानों, राजनैतिक स्‍वार्थों और व्‍यक्तिगत हितों को साधने के लिए पूरे देश की जनता को गुमराह करने वाला रहा है।
इस देश को चलाने वाली शक्ति इस देश की जनता के पास है और वह अपनी शक्ति हर बार चुनाव में अपने प्रतिनिधियों को सौंप देती है। ये चुने हुए जनप्रतिनिधि ही इस तय कर सकते हैं कि जनता की किस समस्‍या का समाधान कैसे करना है। अब अगर जनप्रतिनिधि ही भ्रष्‍ट हों तो ऐसे भ्रष्‍टाचार के खिलाफ कानून बनाना भी जनप्रतिनिधियों का ही काम है और इसमें कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। इसलिए जब अन्‍ना कांग्रेस को वोट नहीं देने की अपील करते हैं तो इसे सीधे-सीधे राजनैतिक प्रतिशोध की भावना कहना चाहिए, क्‍योंकि कांग्रेस सत्‍ता में है और उसने अन्‍ना टीम का लोकपाल बिल पास नहीं किया, इसलिए उसे वोट नहीं दें। लेकिन गुजरात में मोदी सरकार ने लोकायुक्‍त नियुक्‍त नहीं किया तो अन्‍ना टीम ने भाजपा के बारे में कुछ नहीं कहा, मतलब साफ है कि टीम अन्‍ना एक खास किस्‍म की राजनीति कर रही है।
अन्‍ना और उनके साथी जिस तरह के लोकपाल की व्‍यवस्‍था चाहते हैं वह लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में संभव नहीं, इसीलिए संसद ने सर्वसम्‍मति से लोकपाल गठन के मामले को स्‍थायी समिति के पास भेज दिया है। अब कानून बनाने की प्रक्रिया रेल का टिकट बनाने जितनी सरल और त्‍वरित तो है नहीं कि झट से तैयार। इसलिए इसमें जो समय लग रहा है, उसे लेकर इतनी व्‍यग्रता जो दिखाई जा रही है वह खास राजनीति से प्रेरित है और उसकी दिशा फासीवादी है, लोकतांत्रिक नहीं। इस देश की जनता लोकतंत्र में आस्‍था रखती है, फासीवाद में नहीं।

(यह आलेख डेली न्‍यूज, जयपुर में शनिवार 8 अक्‍टूबर, 2011 को प्रकाशित हुआ।)

Sunday, 25 September 2011

एक कविता बेटी के लिए

आज बेटियों का दिन है। मेरी बड़ी बेटी दृष्टि के जन्‍म पर यह कविता अपने आप फूटी थी, आत्‍मा की गहराइयों से। आज आप सब दोस्‍तों के लिए यह कविता दुनिया की तमाम बेटियों के नाम करता हूं।

दृष्टि तुम्‍हारे स्‍वागत में

दृष्टि
तुम्‍हारे स्‍वागत में
मरुधरा की तपती रेत पर बरस गयी
सावन की पहली बरखा
पेड़-पौधे लताएं लगीं झूमने
हर्ष और उल्‍लास में


बाघनखी* की चौखट छूती
लता भी नहा गयी
प्रेम की इस बरखा में
गुलाब के पौधे पर भी आज खिला
बड़ा लाल सुर्ख़ फूल
उसने भी कर लिया
सावन की पहली बूंदों का आचमन
अनार ने भी पी लिया
मीठा-मीठा पानी
अनार के दानों में
अब रच जाएगी मिठास
और सुर्ख़ होंगे
पीले-गुलाबी दाने

तुम्‍हारे स्‍वागत में बरखा ने
नहला दिया शहर को सावन के पहले छंद से
महका दिया धरती को सौंधी-सौंधी गंध से
मोगरे पी कर मेहामृत
बिखेर दी चारों दिशाओं में
ताज़ा फूलों की मादक गंध

यह महकता मोगरा
यह सौंधती मरुधरा
यह नहाया हुआ शहर
ये दहकने को आतुर अनार
मुस्‍कुराता गुलाब
बढ़ती-फैलती बाघनखी की लता
सब कर रहे हैं तुम्‍हारा स्‍वागत।

*बाघनखी एक खूबसूरत कांटेदार बेल।