Sunday, 29 November, 2009

अर्थवान की तलाश में निरर्थकता के दर्शन का लेखक - अल्बैर कामू



भारत में जिन विदेशी रचनाकारों को सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है, उनमें अल्बैर कामू एक ऐसा नाम है, जिनकी रचनाओं का भारत की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। 1957 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित कामू, रूडयार्ड किपलिंग के बाद दूसरे ऐसे साहित्य़कार हैं जिन्हें महज 44 वर्ष की आयु में वैश्विक प्रतिष्ठा मिली। 7 नवंबर, 1913 को अल्जी़रिया के कृषि मजदूर पिता के घर में जन्मे कामू ने शुरुआत में अत्यंत संघर्षपूर्ण जीवन जीया। जन्म को एक साल भी नहीं हुआ था कि पिता की युद्ध में मृत्यु हो गई। मां की एक हादसे में सुनने-बोलने की क्षमता आधी रह गई थी। लेकिन विधवा मां ने अपने इस इकलौते सपूत के पालन-पोषण में कोई कमी नही रखी। कामू ने छात्रवृत्ति से अपनी शिक्षा जारी रखी। कई किस्म की छोटी-मोटी नौकरियां करते हुए वे एक अखबार के संपादक बने। 22 बरस की उम्र में दर्शनशास्त्र की शिक्षा प्राप्त करते ही दर्शनशास्त्र पर लिखे लेखों की पुस्तक प्रकाशित हुई तो अल्जीरिया में एक लेखक के रूप में कामू की ख्या‍ति फैल गई।


रंगमंच, पत्रकारिता, वामपंथी राजनीति और दार्शनिक-सामाजिक गतिविधियों के बीच कामू ने अपना पहला उपन्या‍स ‘अजनबी’ लिखा और एक उपन्यासकार के तौर पर उनकी कलम का लोहा माना जाने लगा। इस पहले उपन्यास ने बीसवीं सदी के अस्तित्ववादी दर्शन को एक विशाल कैनवास प्रदान किया। जर्मनी के नाजीवाद के कुकृत्यों को कामू ने धर्म, राजनीति, दर्शन और मानव अस्तित्व के सवालों के कटघरे में खड़ा कर यह सिद्ध करने की कोशिश की कि नाजीवाद एक निरर्थक और अमानवीय विचार है, जिसकी वजह से मनुष्य जाति का ही भविष्य संकट में पड़ गया है। इस उपन्यास के साथ ही कामू के सुप्रसिद्ध दार्शनिक लेख ‘मिथ ऑफ सिसिफस’ का प्रकाशन हुआ। इस पुस्तक में कामू ने निरर्थकतावाद के दर्शन को प्रस्तुत किया। कामू की मान्यता थी कि एक अदृश्य ईश्वर की कपोल कल्पना में बनाई गई इस दुनिया में अर्थ, एकता या समरूपता की खोज करना निरर्थक है। ग्रीक मिथक सिसिफस के माध्यम से कामू ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया कि संघर्ष का अपना आनंद है, भले ही वह लोगों की नजरों में निरर्थक हो और सबसे बड़ी बात यह कि सारी निरर्थकता के बावजूद आत्महत्या कोई विकल्प नहीं है, बल्कि विद्रोह और क्रांति ही विकल्प है।

1947 में कामू का एक और विश्वप्रसिद्ध उपन्यास ‘प्लेग’ प्रकाशित हुआ। एक शहर में प्लेग की महामारी फैलने का यह रोमांचक दस्तावेज है, जिसमें कामू की कलम पाठक की समूची चेतना को इस कदर झिंझोड़ कर रख देती है कि पाठक खुद को रोगी समझने लग जाए। विश्वसाहित्य में किसी महामारी की त्रासदी को लेकर लिखा गया संभवत: यह अकेला उपन्यास है। चिकित्सक, मरीज, पत्रकार, प्रशासन और पूरे नगर का महामारी के आतंक में जीता हुआ वातावरण इतनी गहरी संवेदना और लेखकीय संलग्नता के साथ लिखा गया है कि नियति और मानवीय स्थितियों को लेकर ढेरों सवाल उठ खड़े होते हैं। इस उपन्यास की हर पंक्ति अपने भीतर एक से अधिक अर्थ व्यक्त करती हुई पाठक की चेतना को कई स्तरों पर सोचने के लिए विवश करती है। इस उपन्‍यास को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजियों के खिलाफ फ्रांसिसी विद्रोह का प्रतीकात्मक आख्यान भी माना जाता है।

कामू की मान्यता थी कि उपन्यास दर्शनशास्त्र को दृश्य और बिंबों में व्यक्त करने के अलावा कुछ नहीं है। दर्शन और साहित्य के साथ राजनीति में समान विचारों के कारण प्रारंभ में अल्बैर कामू और ज्यां पाल सार्त्र की जबर्दस्त दोस्ती रही, लेकिन आगे चलकर राजनैतिक विचारों में मतभेद के कारण यह दोस्ती टूट गई। कामू और सार्त्र दोनों को अस्तित्ववाद का प्रवर्तक माना जाता है, लेकिन दोनों ने ही इससे इन्कार किया, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद के लेखकों में इन दोनों की प्रसिद्धि विश्वव्यापी रही। कामू ने अपने दार्शनिक और राजनैतिक विचारों के कारण बहुत से मित्रों को भी दुश्मन बना डाला था। वामपंथी झुकाव के बावजूद उन्होंने सोवियत रूस, पोलैंड और जर्मनी की सरकारों के कई निर्णयों की खुलकर आलोचना की। कामू के विचारों में मानवाधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और इसीलिए उन्होंने मृत्युदण्ड की जबर्दस्‍त आलोचना की। सार्त्र से संबंध विच्छेद से पहले कामू ने 1951 में ‘द रिबेल’ पुस्‍तक लिखी, जिसमें सत्ता के विरुद्ध मानव के विद्रोह के विभिन्न स्‍वरूपों और सिद्धांतों की गहरी पड़ताल की गई है।

1956 में कामू का एक और महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुआ ‘पतन’। इसमें एक धार्मिक व्‍यक्ति किसी बार में बैठकर एक अजनबी के सामने अपने द्वारा किये गए अपराध स्वीकार करता है। इस प्रकार कामू जहां धार्मिकता के आवरण में छिपे पाखण्डों को उजागर करते हैं वहीं ज्यां बैप्टिस्ट के चरित्र के कथनों के माध्यम से आधुनिक व्यक्ति पर भी प्रहार करते हैं जो बार में बैठकर अपने गुनाह स्वीकार करता है। कामू ने अपने जीवन में ढेरों कहानियां और नाटक भी लिखे, जिनमें ‘कलिगुला’ नाटक बेहद प्रसिद्ध है। अल्जीरिया उस वक्त फ्रांस का उपनिवेश था, इसलिए कामू मुक्ति संग्राम के सिपाही भी थे। उनके दर्शन में इसीलिए विद्रोही विचारों की व्याप्ति मिलती है। कामू अपने देश को लेकर एक विशाल उपन्यास की रचना करना चाहते थे, जिसमें अल्जीरिया की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास को एक बड़े व्यापक परिदृश्य पर प्रस्तुत करना चाहते थे। एक उपन्यास और कई कहानियां उनकी अधूरी रह गईं। 4 जनवरी, 1960 को एक कार दुर्घटना में उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। निधन के बाद उनकी बेटी कैथरीन ने उनकी अप्रकाशित रचनाओं को प्रकाशित कराया। 1970 में ‘ए हैप्पी डैथ’ का प्रकाशन हुआ, जिसमें ‘अजनबी’ से मिलती जुलती कहानी है। 1995 में ‘द फर्स्ट मैन’ प्रकाशित हुआ, यह कामू का अधूरा उपन्यास है, जिसमें कामू ने अल्जीरिया में अपने बचपन के दिनों की यादें आत्मकथा के रूप में लिखी हैं। कामू ने अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था कि अगर किसी भी चीज का कोई अर्थ नहीं है तो तुम सही हो, लेकिन फिर भी कुछ है जो अर्थवान है। कामू के साहित्य से उन्हीं अर्थवान चीजों को जानने और समझने की शक्ति मिलती है जो तमाम निरर्थकताओं के बावजूद अपने आप में ही नहीं मनुष्य जाति के लिए भी अर्थवान हैं। हिंदी में कामू की अधिकांश साहित्यिक रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं, दार्शनिक विषयों पर लिखी पुस्तकें अभी आना बाकी हैं।

( यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में 29, नवंबर, 2009 को 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में प्रकाशित हुआ।)

Saturday, 28 November, 2009

दिसंबर के एक सर्द सफर की याद




लेखकों के साथ यूं तो बहुत-सी यात्राएं की हैं, लेकिन दिसंबर की कड़ाके की ठण्ड में किये गए दो लंबे सफर यादगार हैं। पहली याद दिसंबर 2005 की है, जब हम 25 लेखक दिल्ली से वाघा के रास्ते पाकिस्तान जा रहे थे। मैं पहली विदेश यात्रा के जोम में था, इसलिए दो-चार पैग ज्‍यादा लेकर बैठा था। सुबह करीब छह बजे आंख खुली तो ब्‍लैकआउट की वजह से याद ही नहीं आया कि बस में मैंने सामान रखा भी था कि नहीं। मैंने साथी लेखकों की तरफ देखा तो ज्‍यादातर सोए हुए थे, चंद्रकांत देवताले ही जागृत थे। मैंने उनसे पूछा तो उन्‍होंने आश्‍वस्‍त किया कि तुम्‍हारा सामान रख दिया गया था। लेकिन मैं असमंजस में था। बस एक ही खयाल आ रहा था कि कहीं बस रुके तो डिक्‍की खुलवाकर देख लूं। घने कोहरे की वजह से बस बहुत धीरे चल रही थी। लुधियाना से आगे सुबह के नौ बजे सबकी इच्छा हुई कि अब चाय पीनी चाहिए, सो एक ढाबे पर रुक गए। इलाहाबाद के एक बुजुर्ग शायर कोहरे में किसी खुले स्थान पर हल्के होकर आए तो उनके पीछे-पीछे एक नौजवान लाठी लेकर गुस्से में पंजाबी में गालियां बकता आ गया। लंबी बहस के बाद मामला समझ में आया कि बुजुर्गवार जिस जगह हल्के होकर आए हैं वहां एक बड़ा होटल है, जो कोहरे की वजह से दिखाई नहीं दिया। पच्चीस लोगों में महिलाएं भी थीं, जिनकी वजह से नौजवान शांत हो सका और उसके होटल में चाय-ना'श्‍ते के वादे पर मामला हंसी-खुशी में निपट सका। अगर कोहरा ना होता तो हम वाघा सुबह के सात बजे पहुंच सकते थे, लेकिन पहुंचे बारह बजे।

लाहौर रेल्वे स्टेशन पर जब हम सांझ ढले सात बजे अपनी गाड़ी का इंतजार कर रहे थे, तो दो डिब्बों में लेखकों का बंटवारा होना था कि छह सीटों वाले डिब्बे में कौन बैठेगा और बीस वाले में कौन? आखिर तय हुआ कि सूफी मत के छह लेखक अलग हो जाएंगे और बाकी सब एक साथ। इन छह में कवि राजेंद्र शर्मा अनचाहे ही फंस गए। खैर, हम बीस लेखक एक डिब्बे में बैठ तो गए, लेकिन यह समझ में नहीं आया कि रेल में और वो भी पाकिस्तान में रसरंजन कैसे होगा? बाद में पता चला कि हमारे पाकिस्तानी दोस्त छह फीट लंबे इरशाद अमीन ने रेल के सुरक्षा प्रहरियों को पहले ही समझा दिया था कि इस डिब्बे में हिंदुस्तानी लेखक-पत्रकार हैं। मैं जयपुर से ही ठण्ड में जकड़ा हुआ चला था। मुझे ऊपर वाली बर्थ पर जमना था, नीचे की बर्थ बुजुर्ग और लेखिकाओं के लिए थीं। मेरे नीचे वाली बर्थ पर चंद्रकांत देवताले बैठे थे। रेल का डिब्बा वातानुकूलित था, लेकिन सर्दी इतनी गजब की थी कि एसी के बावजूद कंपकंपी छूट रही थी। मेरे जैसे कई लेखक थे, जो इस भयानक सर्दी में गला तर करके सुकून पाना चाहते थे। हमारे मेजबान दोस्त ने जब अपना पिटारा खोला तो सबकी बांछें खिल गईं। वोदका के घूंट हलक में उतरे तो कंपकंपी कम हुई। गीत और गजलों की महफिल सज गई और चलती रेल में सुर और सुरा की सरिता बहने लगी। हमसफर पाकिस्तानी नागरिक भी इसमें मजा लेने लगे और सुबह होते-होते तो हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी यात्रियों में ऐसा भाईचारा स्थापित हो गया कि लेखिकाएं ही नहीं कई बुजुर्ग लेखक पाकिस्तानी यात्रियों के सफरी कटोरदानों में नाश्‍ता करते नजर आने लगे।
मेरी हालत सर्दी की वजह से खराब थी और दवाइयां कोई असर नहीं कर रही थीं। देवताले जी ने अपने बैग में से मेरे लिए सोंठ निकाली और कहा इसे चबाते रहो, तुम्हारे पान मसाले से बेहतर है यह। मैंने पान मसाला छोड़कर सोंठ चबाना शुरु किया तो कराची पहुंचते-पहुंचते इतना आराम मिला कि अगले दिन पता ही नहीं चला कि कब-कैसे सीने में जमा बलगम गायब हो गया और बंद नाक खुल गई।

कराची से लौटते वक्त हम लोग एक नॉन एसी बस में रवाना हुए। बॉर्डर एरिया और डाकू-लुटेरों के भय के कारण सारे शीशे बंद कर दिए गए। बहुत घुटन होने लगी तो हवा के लिए कण्डक्टर ने छत वाली खिड़की खोल दी। रेतीले इलाके की धूल बस में समाने लगी और विभूति नारायण राय की हालत खराब होने लगी। वो खिड़की बंद करनी पड़ी। सेवण के शाहबाज कलंदर की दरगाह की जियारत कर हम ब्रिटिश जमाने के गेस्ट हाउस में रात बिताने पहुंचे। सुबह पांच बजे ही हमें जगा दिया गया, मोहन्जोदड़ो जाने के लिए। छह बजे नाश्‍ता लग गया। एकाध वीर लेखक नहा धोकर तैयार हो गए थे। आलोचक खगेंद्र ठाकुर इतनी सुबह चार परांठे खा चुके थे और सबको चकित कर दिया था। बाहर निकले तो जिंदगी की अब तक की सबसे खूबसूरत सुबह देखी। सिंध नदी कोहरे में लिपटी हुई मंथर गति से बह रही थी और आसमान में सूरज के आने से पहले का सुरमई और सुनहले रंगों का कैनवस मंडा हुआ था। एक तरफ दरगाह की रोशनी थी और दूसरी जानिब सूर्यदेव की कलाकारी। हम तमाम लेखक इस रंगीन सुबह के मोहपाश में इस कदर जकड़ गए थे कि चंद्रकांत देवताले और कमला प्रसाद ने कहा कि अपने कैमरे निकालो और इस सुबह को कैद कर लो, जिसमें हमारी तस्वीरें भी हों।


मोहन्जोदड़ो से लरकाना पहुंचे तो हमने अपने मेजबान दोस्तों से मिन्नत की कि कहीं कोई दुकान हो तो बता दें, हमारा कोटा खत्म हो चुका है। हमें जानकर ताज्जुब हुआ कि इतने बड़े नगर में शराब की कोई दुकान नहीं है, जबकि यहां हिंदुओं की अच्छी खासी आबादी है। हमें लगा कि हमारे मेजबान पक्के मुसलमान हैं। जब सब तरफ उम्मीदें खत्म हो चुकीं तो खयाल आया कि राय साहब और पवन कुमार के सामान में दो बोतलें हैं। दो दिन के सफर में एक नई पार्टी का गठन हो चुका था, जिसके महासचिव थे राय साहब। पार्टी की सदस्यता मुझ जैसे कुछ लोगों को प्राप्त हो चुकी थी, बाकी की विचाराधीन थी। राय साहब के पास जो बोतल थी, उसके बारे में वो इतना कुछ बता चुके थे कि उसे देखने भर से शायद हमारी प्यास शांत हो जाती। वे यह बोतल मॉरीशस से लाए थे, जिस पर मार्क ट्वेन की प्रसिद्ध उक्ति लिखी थी कि ईश्‍वर ने पहले मॉरीशस बनाया और फिर स्वर्ग। स्वर्ग मॉरीशस की नकल है।

सवाल यह था कि बस की छत पर तिरपाल में बंधे हमारे सामान में से वो बोतलें कैसे लाई जाए। लेखक के पास विचारों की कमी नहीं होती, इसलिए निरंतर चिंतन के बाद राय साहब की तबियत को आधार बनाया गया। उनकी दवा उनके सामान में बंद है, उसे निकालना है। बीच सड़क पर बस रुकवाई गई, खलासी के साथ कवि पवन कुमार बस की छत पर चढ़े और राय साहब के सूटकेस के साथ अपना बैग भी ले आए। अब रात आराम से गुजारी जा सकती थी। लेकिन सामान कम था और प्रत्याशी ज्यादा। देवताले जी ने मुझसे मनुहार की कि डेढ़ पैग से काम चल जाएगा। एक लेखिका ने भी सर्दी के कारण एक पैग की गुजारिश की। राय साहब की पार्टी की सदस्यता लेने वालों की तादाद बढ़ गई। उन्होंने घोषणा की कि समाजवाद की राह पर आगे चलना है, इसलिए यथासंभव कोशिश की जाएगी कि कोई तिश्‍नालब ना रह जाए। थोड़ी ही सही मिलेगी सबको। और सच में कोई तिश्‍नालब ना रहा। सबको मिली और एक सर्द सफर में सबको राहत मिली। लाहौर पहुंचे तो राय साहब की तबियत और बिगड़ गई। उन्हें वहां के सर गंगाराम अस्पताल ले जाया गया और सक्‍शन मशीन से उनका जमा कफ निकाला गया।
दिसंबर का दूसरा सर्द सफर डॉ. नामवर सिंह, शरद दत्‍त, प्रभुनाथ सिंह आजमी, कमला प्रसाद और राजेंद्र शर्मा के साथ भोपाल से छिंदवाड़ा पैसेंजर ट्रेन में फर्स्‍ट क्‍लास के कूपे में किया था, 2007 में। उस पर फिर कभी।

Sunday, 8 November, 2009

प्रयोगधर्मिता से निकली राह : सुनीत घिल्डियाल का कला संसार



सुनीत घिल्डियाल राजस्‍थान के बेहद प्रशंसित और प्रतिष्ठित चित्रकार हैं। राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उनके काम को एक दर्जन से अधिक बार सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। देश-विदेश तक उनकी कलाकृतियां पहुंची हैं और सराही गई हैं। राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न कला शिविरों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। उनके चित्र चालीस से अधिक एकल व समूह प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किये गए हैं। हेमवतीनंदन बहुगुणा विश्‍वविद्यालय, गढ़वाल से कला में स्नातकोत्तर सुनीत वर्तमान में जयपुर में राजस्थान स्कूल आफ आर्ट में पढ़ा रहे हैं।
स्वभाव से बेहद हंसमुख, मिलनसार और निरंतर कला की धुन में मगन रहने वाले सुनीत घिल्डियाल का काम मुझे व्यक्तिगत रूप से उस वक्त से पसंद रहा है, जब वे पेंसिल ड्राइंग से अत्यंत अर्थवान चित्रों की रचना किया करते थे। यह बात करीब दो दशक पुरानी है। इस बीच सुनीत ने एक लंबी कला यात्रा की है, जिसमें वृहदाकार कैनवस से लेकर ताजा काष्ठ कलाकृतियों का अभिनव कला संसार समाहित है। मुझे इस पूरी कला यात्रा को देखकर महसूस होता है कि अब शायद सुनीत को अपना मनचाहा कला रूप या कहें कि माध्यम मिल गया है। पता नहीं क्यों ये पंक्तियां लिखते वक्त मुझे सुनीत की वो ड्राइंग बुक्स याद आ रही हैं, जिन्हें दिखाते हुए सुनीत एक-एक चित्र की गहन व्याख्या कर मुझे अपनी सृजनशीलता की गहराई से ही नहीं बल्कि अपनी विचार प्रक्रिया और उससे संबद्ध सृजन प्रक्रिया से प्रभावित किया करते थे। उस दौर में वे एक युवा कलाकार के तौर पर जिस आत्म संघर्ष की प्रक्रिया से गुजर रहे थे, वह आज जिस मुकाम पर आई है, उसमें सुनीत की बरसों की कलात्मक अंतर्यात्रा बहुत गहराई से रची-बसी है और मुझे गहरी आश्‍वस्ति देती है। उनके कला संसार की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे मूर्त और अमूर्त दोनों तरह के चित्र बनाते हैं और बहुधा उनके यहां दोनों का अत्यंत सुंदर समावेश देखने को मिलता है।



इन बरसों में सुनीत ने रंग और रेखाओं के साथ जो रिश्‍ता बनाया वह कागज, कैनवस से आगे चलकर काष्ठ कला के नए आयामों वाली कला में विकसित हुआ है। कला के सुधी प्रेक्षकों को याद होगा कि सुनीत अपनी ‘फेसेज’ चित्र श्रृंखला से बेहद चर्चित हुए थे, जिसमें उन्हें कई सम्मान-पुरस्कार हासिल हुए थे। पिछले एक दशक से सुनीत ने इस नई कला प्रविधि में देवदार की लकड़ी के पटरे पर कुरेद कर आकृतियां बनाई हैं और इनमें रंग भर कर बेहद खूबसूरत कलाकृतियों का सृजन किया है। लकड़ी पर सुनीत रंगों को कुछ इस प्रकार भरते हैं कि लकड़ी का अपना सौंदर्य भी बना रहे और रंगों की पारदर्षिता प्रेक्षक को नया कलात्मक आस्वाद प्रदान करे। कागज से काष्ठ तक की इस यात्रा को मैं सुनीत की चित्रकला में एक माध्यम भर की खोज हीं नहीं मानता, बल्कि मेरे लिए यह यात्रा सुनीत के चित्रों की अंतर्वस्तु की यात्रा भी है। क्योंकि मेरे लिए कला में माध्यम की खोज अंततः अंतर्वस्तु के बिना नहीं हो सकती। इसलिए मुझे सुनीत की इस नई कला प्रविधि में उनकी वर्षों की सतत कला साधना और गहरी विचार प्रक्रिया दृष्टिगत होती है।



सुनीत ने इस नई कला यात्रा को ‘टाइम एण्ड लाइफ-ए कण्टीन्युअस जर्नी’ शीर्षक दिया है। एक सृजनशील कलाकार के लिए यह शीर्षक उचित भी है, क्योंकि वह इस तरह अपनी पूरी सृजन यात्रा को बयां कर रहा होता है। इस यात्रा पथ में जितने उतार-चढाव हो सकते हैं, वे सब आपको उनकी कला में दिखाई देंगे। हंसी-खुशी के पल हों या किंचित अवसाद के, जीवन के चमकीले प्रकाशमान अवसर हों या गहरी स्मृतियां, सुनीत की कला में वो सब अपनी सदेह उपस्थिति दर्ज कराते हैं। दरअसल सुनीत के काम में आपको एक अजीब किस्म की गहरी संलग्नता दिखाई देती है, जो आपको पहली नजर में ठिठका देती है और जब आप एकबारगी ठहर कर उनके काम को देखने लगते हैं तो रंग और आकृतियों के व्यामोह में आप पूरी तरह खो जाते हैं। फिर आप अपनी स्मृतियों पर जोर डालने लगते हैं और आपके सामने आपका अपना स्मृतिलोक एक नए कलात्मक रूप में सामने दिखने लगता है। इस तरह सुनीत अपने प्रेक्षक को कई स्तरों पर देखने सोचने के लिए विवश करते हुए आधुनिक कला की अद्भुत कल्पनाशील सर्जनात्मक दुनिया से साक्षात कराते हैं। आधुनिक कला को अर्थहीन कहने वाले बहुतेरे लोग मिल जाएंगे, लेकिन ऐसे लोगों को भी सुनीत की कला, मेरा दावा है, एकबारगी तो गहराई से देखने और सोचने के लिए विवश करेगी ही।



सुनीत गढ़वाल, उत्तराखंड में जन्मे हैं और उनके कला संसार में वहां की खूबसूरत वादियों के साथ, सर्पिल राहें, पगडंडियां, फूलों से महकता परिवेश, जाड़ों में कांपता-सा सूरज, ग्रामीण जनजीवन में व्याप्त लोक रूपाकार, कठोर पहाड़ी जीवन का संघर्ष और इस सबके साथ राजस्थान के रेतीले धोरों की पीली उजास भरी दुनिया इस तरह एकाकार हो गई है कि दो विपरीत छोरों के अंचलों के तमाम रंग उनके काम में सहज दृष्टिगोचर होते हैं। सुनीत प्रारंभ से ही प्रयोगधर्मी रहे हैं और इस माध्यम में उनकी प्रयोगशीलता बहुत आगे निकल आई है, जहां वे काष्ठ पटरे को कैनवस की तरह इस्तेमाल करते हुए उसे कैनवस से अलग भी आकार देते हैं, यानी तयशुदा ज्यामितीय आकार से अलग एक किस्म का ‘लोक रूप’, जिसमें आपको कांकड़ पर विराजमान लोकदेवता के थान की याद आ जाए या फिर गांव-देहात में बिखरे लोक कलारूपों की।



सुनीत के काम की खूबी यही है कि इसमें हमारी जानी पहचानी दुनिया नए रूपाकारों में दिखाई देती है। इस बात को मैं विशेष रूप से कहना चाहता हूं कि आज के आधुनिक कला जगत में जब बहुतेरे कलाकारों की कला प्रेक्षक को एक अजीब किस्म से भयभीत करती है या सजावटी सामान की तरह दिखाई देती है, सुनीत की कला एक विचार प्रक्रिया से गुजरने और सहज ढंग से आधुनिक कला का आस्वाद लेने के लिए आमंत्रित करती है। सुनीत ने वर्षों की प्रयोगधर्मिता के बाद नए माध्यम की खोज करते हुए जो अंतर्यात्रा की है, वह एक और नए सुनीत की संभावना जगाती है, जो अगली बार कुछ और अर्थवान रचता हुआ, हमारे लिए नई कलात्मक दुनिया लेकर आएगा। इस अंतर्यात्रा का हासिल यह है तो इसका आगामी पड़ाव और बेहतर होगा, यही उम्मीद करनी चाहिए।


(सुनीत घिल्डियाल से ए-60, गोल मार्केट, जवाहर नगर, जयपुर, मोबाइल नंबर 09413622979 पर संपर्क किया जा सकता है। यह आलेख जयपुर से समांतर संस्‍थान द्वारा प्रकाशित की जाने वाली द्विमासिक पत्रिका 'संस्‍कृति मीमांसा' के जुलाई-अगस्‍त अंक में शाया हुआ।)





Monday, 2 November, 2009

आलोचना की उपेक्षा परंपरा के शिकार जनकवि


हिंदी आलोचना की परंपराओं में उपेक्षा भी एक परंपरा ही है, जिसमें अनेक महत्वपूर्ण कवियों को बिल्कुल भुला दिया जाता है और कम महत्वपूर्ण कवियों को खासी तवज्जोह देकर महान सिद्ध कर दिया जाता है। ऐसी उपेक्षा के शिकार कवियों में हिंदी और राजस्थानी के सुप्रसिद्ध जनकवि हरीश भादाणी भी हैं। साहित्य की तथाकथित मुख्यधारा ने भले ही हरीश भादाणी को ज्यादा महत्व ना दिया हो, लेकिन वे एक ऐसे कवि थे, जिनकी कविता हजारों लाखों कण्ठों से एक साथ फूटती हुई इंकलाब का परचम बन जाती है। गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर, 2009 को ऋषि परंपरा के इस महान कवि ने कैंसर से लड़ते हुए अंतिम सांस ली। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उनकी महायात्रा में बीकानेर और प्रदेश भर से आए हजारों लोगों ने उनके गीत गाते हुए उन्हें अंतिम विदाई दी।



11 जून, 1933 को बीकानेर के एक समृद्ध सामंती परिवार में उनका जन्म हुआ। जन्म के तुरंत बाद ही पिता संन्यासी हो गए और इस शोक को सह नहीं पाने के कारण जल्द ही माता का भी देहावसान हो गया। जब तक पिता रहे, उनके घर में भक्ति संगीत की महफिलें जमती थीं। इसलिए कदाचित उन्हें विरासत में संन्यासी पिता बेवा जी महाराज जैसा सुरीला कण्ठ मिला, जिससे गीत सुनकर लोग उन्मत्त हो जाते थे। संन्यासी पिता की बड़ी प्रतिष्ठा थी। जयपुर में एक घर में उनकी विशाल तस्वीर लगी हुई कुछ लोगों ने देखी है। बहरहाल, बचपन में भादाणी जी की घर में ही हिंदी, महाजनी और संस्कृत की प्रारंभिक शिक्षा हुई। जन्म के साथ ही पिता के संन्यासी बनने और मां की असमय मृत्यु के कारण परिवार द्वारा उन्हें अपशगुनी बालक करार दिया गया, दूसरी तरफ घर का सामंती माहौल। इसलिए उन्हें संभवतः बचपन से ही उस घर से वितृष्णा हो गई थी, ऐसे में उनका प्रतिरोध कविता के सिवा और कहां स्वर पाता? और जब समाजवादियों के गढ़ बीकानेर में रायवादियों और समाजवादियों के संपर्क में आए तो फिर पूरी दुनिया उनका घर हो गई। किसी को तंगहाल देखते तो अपनी चिंता छोड़कर उसकी मदद करने में लग जाते। जो कुछ संपति विरासत में मिली था, उसे परमार्थ में लगाने लगे। सामाजिक आंदोलनों में सक्रियता ऐसी बढ़ी कि एम.ए. अधूरा रह गया और मजदूर-किसानों के साथ संघर्ष करते हुए जेल जाना भी सामान्य बात हो गई। आंदोलनों में सिर्फ भाषणों से काम नहीं चलता इसलिए संघर्ष के जुझारू गीत लिखने लगे। लोकप्रिय रूमानी गीतों का गायक, मंचों पर वाहवाही लूटने वाला गीतकार, जनता का, जनता के संघर्षों का कवि बन गया।

उनका घर जरूरतमंदों का आश्रयस्थल बन गया। दूर-दूर से साहित्यकार, परिचित, सामाजिक कार्यकर्ता और बहुत से लोग आकर उनके विशाल हवेलीनुमा घर में डेरा जमा लेते और फिर आवश्यककता के अनुकूल समय तक, जो कई बार दो साल भी होता, वहीं रहते। 1960 में उन्होंने राजस्थान में अपने ढंग की नई साहित्यिक पत्रिका ‘वातायन’ का प्रकाशन शुरु किया। (हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि राजेश जोशी की पहली कविता इसी ‘वातायन’ में प्रकाशित हुई थी।) अब भादाणी जी को लोगों के साथ पत्रिका प्रकाशन के लिए भी आर्थिक व्यवस्था करनी थी। एक-एक कर उनकी सारी विरासत परमार्थ और ‘वातायन’ के लिए बिकती चली गई और इस व्यवस्था को कायम रखने के लिए बंबई और कलकत्ता में कई किस्म की कलमी मजूरी करनी पड़ी। चौदह वर्षों तक उन्होंने ‘वातायन’ को नियमित चलाया। लेकिन अनवरत संघर्ष करने की प्रक्रिया में उनकी आखिरी हवेली भी बिक गई और उसी हवेली के सामने एक छोटा-सा वातायनी घर बनाकर रहने लगे। उनकी दरियादिली में इस सबके बावजूद कोई कमी नहीं आई।



सिर्फ कविता के बल पर जीने वाला कवि आपको हरीश भादाणी जैसा दूसरा शायद ही मिले। मंच के कवि सम्मेलनों से कविता की यात्रा आरंभ करने वाले हरीश जी जनता के संघर्ष की कविता से होकर ऋग्वेद और उपनिषदों की रहस्यमय कविताओं तक गए। ‘सयुजा सखाया’ संग्रह में उनके वो गीत हैं, जिनके बारे में प्रख्यात आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय ने लिखा है कि इन कविताओं में ‘भारत के आध्यात्मिक, दार्शनिक चिंतन को यथार्थ जीवन, कर्म और लौकिक संबंधों से पृथक न कर उनसे गूंथा गया है, कबीर की चदरिया की तरह। इससे जीवन-जगत की सही मानवीय समझ पैदा होती है। यद्यपि चिंतन भीतर से शुरु होता है लेकिन वह सारे सृष्टि-अर्थ खोल देता है ताकि मनुष्य, चराचर की समानता और सह अस्तित्वमय जीवन जीने की ओर बढ़ सके।... कवि ने द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दृष्टि का समायोजन, पारंपरिक भाव, चेतना और अभिव्यक्ति का सही मान रखते हुए किया है, ताकि अलौकिक अर्थ का महत्व भी कम ना हो और वह लौकिक अर्थ में भी ढल सके। यह शैली संतों जैसी है।’  हरीश जी ने अपने निजी जीवनानुभवों से काव्ययात्रा में यह रास्ता चुना था, भारतीय मनीषा का एक प्रगतिशील जनवादी प्रत्याख्यान करने का, जिसे पढ़-सुन कर नए अर्थ ध्वनित होते हैं। बाबा नागार्जुन को भी उनकी ऐसी कविताएं बहुत पसंद थीं।


हरीश जी की कविताओं के हिंदी और राजस्थानी में बीस से अधिक संकलन हैं, इसके अलावा जनगीतों और साक्षरता के लिए लिखी दो दर्जन से अधिक पुस्तिकाएं प्रकाशित हुईं। कविता के लिए उन्हें मीरा प्रियदर्शिनी सम्मान, राहुल सम्मान और बिहारी सम्मान सहित अनेक सम्मान-पुरस्कारों से नवाजा गया। बंबई में कलम मजूरी करते हुए उन्होंने फिल्मी दुनिया के लिए भी काम किया। इनमें से बहुत-सी चीजें दूसरों के नाम चली गईं, उनके नाम बचा सिर्फ ‘आरंभ’ फिल्म का गीत, ‘सभी सुख दूर से गजरें, गुजरते ही चले जाएं’। मुकेश के गाए इस गीत को सुनकर अंदाज होता है कि सिनेमा के लिए ऐसी कविता भी लिखी जा सकती है।

वे कई मायनों में सामाजिक क्रांति के अग्रदूत थे। अपनी बेटियों को उन्होंने खुद आगे बढ़कर सामाजिक आंदोलनों में अग्रणी बनाया। उनकी सबसे बड़ी बेटी सरला माहेश्वरी पं. बंगाल से दो बार सांसद रह चुकी हैं। बीकानेर में पुष्पा और कविता निरंतर आंदोलनों में सक्रिय रहती है। उन्होंने बीकानेर की प्रसिद्ध होली को अश्लीलता से मुक्त कर उसमें जनजागरण के गीतों की शुरुआत की। सोरठा छंद में उन्होंने जो ‘हूणिए’ लिखे, वो जनसंघर्षों के दौरान क्रांति का उद्घोष गीत बन गए। उनके जनगीतों में ‘रोटी नाम सत है और ‘बोल मजूरा हल्ला बोल’ वो गीत हैं, जिन्हें हजारों लोगों द्वारा दिल्ली के इंडिया गेट से लेकर गांव-कस्बों के जनांदलनों में गाया जाता है। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि बीकानेर में उनका पता किसी से पूछने की जरूरत नहीं थी, कोई तांगे वाला आपको बिना पैसे लिए उनके घर छोड़ देता था। हर गांव, कस्बे और शहर में उनके अपने जैसे कई घर थे, जहां वे अपनी सुविधा से रहते थे। जीवन भर लोगों के काम आने वाले इस महान जनकवि ने मृत्यु के बाद अपनी देह बीकानेर मेडिकल कालेज को दान कर अपनी अंतिम इच्छा पूरी की। शत शत नमन।

पार्टी झण्‍डे में लिपटी जनकवि की देह

(बीकानेर मेडिकल कॉलेज को देहदान करते मित्र, परिजन और प्रशंसक, 'हरीश भादानी अमर रहे' का नारा लगाती श्रीमती जमुना भादानी, हरीश जी की जीवनसंगिनी)

हरीश भादानी जी को पुष्‍पांजलि अर्पित करते मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत
( यह आलेख हिंदी मासिक 'आउटलुक' के नवंबर, 2009 अंक में प्रकाशित)

Sunday, 1 November, 2009

विडम्बनाओं के भंवर में फंसा रचनाकार - सेमुएल योसफ एग्नान



एफ्रो एशियाई भाषा परिवार की हिब्रू भाषा को बाइबिल की पुरानी भाषा होने के कारण हमारी संस्कृत की तरह पवित्र भाषा के रूप में जाना जाता है। प्राचीनता के कारण इस दुर्लभ, दुर्भेद्य और इतनी पुरानी भाषा के आधुनिक साहित्य को अब तक सिर्फ एक बार नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। यह सौभाग्य मिला 1966 में इजराइल के सेमुएल योसफ एग्नान को। 17 जुलाई, 1888 को यूक्रेन के गैलीशिया नगर में जन्मे एग्नान उन चुनिंदा यहूदियों में हैं, जिन्हें विश्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह भी संयोग ही है कि 1966 में उनके साथ एक और यहूदी लेखिका नेली शेक्स को भी संयुक्त रूप से साहित्य का नोबल प्रदान किया गया। यहूदी समुदाय के विस्थापन के त्रासद इतिहास को इस प्रकार वैश्विक संवेदना का स्पर्श मिला। एग्नान का जबर्दस्त गद्य हमें यहूदियों के ऐतिहासिक संघर्ष और आधुनिक विश्व के साथ उसके त्रासद यथार्थ के चित्र दिखाता हुआ एक ऐसी दुनिया प्रस्तु‍त करता है, जिसमें मजहब, जाति, और नस्ल के आधार पर किसी का दमन नहीं होना चाहिए। लेकिन पूंजी के क्रूर खेल ने सदियों से मानवता का इसी प्रकार अहित किया है, जिसे हिब्रू में एग्नान की तरह लिखने वाले रचनाकार तमाम भाषाओं में मिल जाएंगे।


एग्नान ने पांच साल की उम्र से लिखना शुरु किया और जल्द ही उनकी प्रसिद्धि इस कदर फैल गई कि गायक उनके गीत गाने लगे। बीस बरस की उम्र में कविताएं और कहानियां प्रकाशित होने लगीं। खुद जीवन की राह बनाने के लिए एग्नान घर छोड़कर पहले फिलीस्तीन गए, फिर एक प्रकाशक के कहने पर जर्मनी में रहने लगे। लेकिन भाग्य की विडम्बना देखिए कि प्रथम विश्वयुद्ध ने एग्नान का सब कुछ समाप्त कर दिया। उनका घर आग की भेंट चढ़ गया और सब कुछ स्वाहा हो गया। पांच साल बाद फिर यहूदी विरोधी नाजी माहौल में उनका घर जला दिया गया। दो बार की आगजनी में उनकी पांच हजार किताबें और दो अधूरे उपन्यास, जिनमें एक के सात सौ पेज वे लिख चुके थे, और बहुत सी महत्वपूर्ण सामग्री खाक हो गई।

इतने झंझावातों के बीच 1931 में जब उनका उपन्यास ‘द ब्राइडल कैनोपी’ प्रकाशित हुआ तो हर तरफ से उनकी सराहना की गई। कहा गया कि आधुनिक हिब्रू को एक नया विश्वस्तरीय रचनाकार मिल गया है। इस उपन्यास में एग्नान ने एक ऐसे सरल, भोले और वृद्ध आस्थावान व्यक्ति का चरित्र लिखा जो उन्नीनवीं सदी के प्रारंभ में एक उजाड़ नगर में अपनी बेटी के लिए दूल्हा खोजने के लिए निकला। यह वही उजाड़ नगर था जिसमें एग्नान ने बचपन और किशोरावस्था के दिन बिताए थे। इस उपन्यास की सरवांतीस के महान उपन्यास ‘डॉन क्विक्‍जोट’ से तुलना की गई। अपनी स्मृतियों के शहर गैलीशिया और यरूशलम को एग्नान यहूदी मिथकों और इतिहास के माध्यम से अपनी तमाम रचनाओं में विविध प्रकार से खोजते रहे। ‘ए गेस्ट फॉर द नाइट’ में एग्नान ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद नष्ट हुए अपने शहर का मार्मिक चित्रण किया और इस उपन्यास के माध्यम से यूरोप में यहूदी समुदाय का भविष्य देखने का प्रयत्न किया। लेकिन उनका सबसे महत्वहपूर्ण उपन्यायस ‘द डे बिफोर यस्टरडे’ है, जिसमें बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में यहूदियों के सर्वनाश के बाद वैश्विक शरणार्थी बन जाने की महागाथा है। इस उपन्यास में एग्नान ने प्राचीन और तत्कालीन यहूदी जीवन को इस खूबसूरती के साथ पिरोया कि एक महानायक और एक कुत्ते की कथा ने समूचे यहूदी समुदाय की विडंबनाओं को पूरी शिद्दत से उजागर कर दिया।

17 फरवरी, 1970 को एग्नान का निधन हुआ। इस अवधि में उनकी दर्जनों किताबें प्रकाशित हुईं, जिनमें से कई का अंगेजी और जर्मन में अनुवाद हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी ने उनके अप्रकाशित साहित्य के सुव्युवस्थित प्रकाशन का काम किया। आज इजराइली साहित्य के युवा अध्येता निरंतर एग्नान के साहित्य पर शोध कर रहे हैं। मृत्यु से पूर्व उनकी प्रतिष्ठा का आलम यह था कि स्थानीय प्रशासन ने लेखक की शांति में खलल ना पड़े, यह ध्यान में रखते हुए उनके घर के पास से गुजरने वाली सड़क पर वाहनों का आवागमन बंद कर दिया गया और बाकायदा बोर्ड लगा दिया, ‘वाहनों का प्रवेश निषेध, लेखक काम पर है’।

एग्नान की रचनाएं यहूदियों के लिहाज से बेहद आधुनिक हैं, क्योंकि वे यहूदी समुदाय की बहुत सी धारणाओं को तोड़ते हुए इतिहास से निकलकर वर्तमान में जीने की बात करते हैं। लेकिन यहूदी धर्म के इतिहास और बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य में उनकी रचनाएं एक भिन्न किस्म का यहूदी पाठ प्रस्तुत करती हैं, जिसमें यहूदी समुदाय की वैयक्तिक और सामुदायिक पहचान का प्रश्न इतिहास और वर्तमान के बीच एक विडंबना की तरह अनुत्तरित रह जाता है। बदलते समय के बीच संस्कृतियों को बचाने का जो संकट पैदा होता है, उसे एग्नान ने खूबसूरती से बयान किया है, लेकिन यहूदी धर्म का आधुनिक जगत से मिलान करते हुए उसकी प्रासंगिकता की तलाश में उन्हें कुछ मूल्यवान नहीं मिलता और यही उनके लेखन और विषयवस्तु की सबसे बड़ी सीमा है। आलोचक लिपमैन बोडोफ के अनुसार एग्नान अतीत और भविष्य, धर्म और प्रकृति, अध्यात्म और विज्ञान, एकेश्वरवाद और बहुदेववाद, यहूदी परंपरा और यूनानी व रोमन संस्कृति, ईश्वर और प्रकृति... इन सबके बीच घूमते हुए बहुत सूक्ष्म विश्लेषण तो करते हैं लेकिन शायद नहीं जानते कि ऐसी रस्साकशी में विजेता साफ तौर पर किसी एक को नहीं कहा जा सकता। इसके साथ-साथ एग्नान की भाषा और कथावस्तु इतनी गंभीर और इस कदर संश्लिष्ट है कि मूल हिब्रू से उनका अनुवाद भी अत्यंत कठिन है। वजह यह भी है कि एग्नान ने अपनी रचनाओं में धर्मग्रंथों के विशद उद्धरण दिए हैं, जिन्हें सामान्य हिब्रू का ज्ञान रखने वाला भी नहीं समझ सकता। इसीलिए आलोचक उन्हें बहुत दुर्भेद्य और अनुवाद के लिहाज से अनुपयुक्त लेखक मानते हैं।

एग्नान ने अपने नोबल भाषण में जो महत्ववपूर्ण बातें कहीं उनमें दो का जिक्र बहुत जरूरी लगता है, क्योंकि वह भारतीय परंपरा से मिलता है। एग्नान ने अपने लेखन पर विभिन्न लेखकों और पुस्तकों से पड़े प्रभावों का जिक्र करते हुए कहा कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि कौनसी गाय के किस दूध से मेरा शरीर बना है, वैसे ही मेरे लिए लेखकों-प्रेरकों का जिक्र करना भी मुश्किल है। इसी प्रकार उन्होंने कहा था कि हमारी महान परंपरा के अनुसार किसी भी खुशी के अवसर को बिना ईश्वरीय आशीर्वाद या अनुकंपा के ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए, वो ईश्वर हमें आशीष दे जिसने इस रक्त–मांस-मज्जायुक्त देह में चेतना दी है। भारतीय काव्य परंपरा जैसा यह अद्भुत  आह्वान हमें विश्व्साहित्य में सेमुअल योसफ एग्नान की रचनाओं में मिलता है।
( यह आलेख राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय में 'विश्‍व के साहित्‍यकार' शृंखला में 25 अक्‍टूबर, 2009 को प्रकाशित हुआ।)