Sunday, 17 May 2009

राजस्थानी प्रेम कहानी-जेठवा उजली


राजस्थान के लोकसाहित्य को संरक्षित, सवंर्द्धित और विकसित करने का जो काम विजयदान देथा ‘बिज्जी’ ने किया, उसी परंपरा की एक और महत्वपूर्ण रचनाकार हैं रानी लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत। बातपोशी यानी कथा कहने की जो समृद्ध परंपरा राजस्थान में रही है, उसे कलमबद्ध कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजने का महान कार्य करने वाली इस 93 वर्षीय महान लेखिका का जन्म 24 जून, 1916 को हुआ। रानी जी ने राजस्थानी और हिंदी साहित्य को न केवल लोकसाहित्य संरक्षित करके ही समृद्ध किया, अपितु अनुवाद, मौलिक लेखन और यात्रा संस्मरणों से भी हमारे साहित्य के गौरव में श्रीवृद्धि की। राजस्थान की सांस्कृतिक परंपराओं और रीतिरिवाजों पर उनकी दो अत्यंत महत्वपूर्ण किताबें हैं। रवींद्रनाथ टैगोर की बांग्ला कहानियों के अलावा आपने रूसी और विश्‍व की कई भाषाओं से कहानियों का राजस्थान में अनुवाद किया। ‘देवनारायण बगड़ावत महागाथा’ आपका ऐतिहासिक महत्व का ग्रंथ है। रानीजी के विशद रचना संसार में संरक्षित लोककथाओं में ‘जेठवा उजली’ एक अत्यंत लोकप्रिय प्रेम आख्यान है। इस पर राजस्‍थानी भाषा में एक लोकप्रिय संगीतमय फिल्‍म भी बन चुकी है। राजस्‍थान के प्रख्‍यात रंगकर्मी आर साहित्‍यकार डॉ. अर्जुनदेव चारण इस कहानी पर एक विख्‍यात नाटक भी देश भर में मंचित कर चुके हैं।
एक दिन बरड़े की पहाड़ियों में जबर्दस्त आंधी, तूफान के साथ मूसलाधार बारिश हुई। बरसात ऐसी कि इस तलहटी में अपने पशु चराने आए चारणों के परिवारों के बच्चे सहम गये और अपनी मांओं की छातियों से चिपक गए। बूढों को लगा जैसे आज ही काल आ गया। क्या औरत, क्या आदमी और क्या बच्चे सब ईश्‍वर से प्रार्थना करने लगे कि प्रभु अपनी इस प्रकोपी बरसात को वापस ले लो। एक कामचलाउ झोंपड़ी में अस्सी बरस का बूढा अमरा चारण अपनी गुदड़ी में दुबका, ठिठुरता हुआ माला के मनके फर रहा था। आधी रात का वक्त इस भयानक बारिश में कब आ गया पता ही न चला। ऐसे ही वक्त अमरा को झोंपड़ी के बाहर घोड़े की टापों की आवाज सुनाई दी। वो आवाज थोड़ी देर में आवाज झोंपड़ी के बाहर आकर रूक गई। घोड़े की हिनहिनाहट सुनाई दी। बूढे अमरा ने अपनी जवान बेटी को आवाज दी, ‘बेटी उजली! उठकर जरा बाहर तो देख, इस तूफानी रात में कौन आया है।‘
ठण्ड में कांपती उजली ने गुदड़ी फेंकी और बाहर देखा तो एक घोड़ा खड़ा था। घुड़सवार घोड़े के पांवों के पास गठरी हुआ पड़ा था, बिल्कुल अचेत, पानी में तर बदन और आंखें बंद। उजली ने बापू को सारा दृश्‍य बताया तो बूढा बाप बाहर आया और देखा कि नौजवान घुड़सवार की नाड़ी चल रही है। दोनों बाप-बेटी जैसे-तैसे कर नौजवान को झोंपड़ी के भीतर लाए। बाप ने बेटी से कहा कि इस नौजवान को बचाना है तो इसका शरीर गर्म करना पड़ेगा, नही तो ठण्ड के मारे बदन अकड़ जाएगा। उजली ने बापू से कहा कि गुदडी़ तो एक ही है, बाकी सब बरसात में गीली हो गई हैं। पिता ने कहा कि चूल्हे में आग जला कर भी गर्मी पैदा की जा सकती है। उजली ने बताया कि थोड़ी-सी लकड़ियां हैं लेकिन वो भी गीली हैं। भयानक बारिश के बीच यह एक और भयानक संकट। घर आया अतिथि मर जाए तो भयानक पाप के भागी होंगे बाप-बेटी। पिता ने आखिरी उपाय सोचकर कहा, ‘बेटी अगर यह मर गया तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी, घर आए मेहमान की जान बचाना हमारी जिम्मेदारी है। अब तो एक ही उपाय है कि अपने बदन की गर्मी से इसकी जान बचाई जाए। मेरे बूढे शरीर में तो गर्मी है नहीं, तू अपने बदन की गर्मी इसे देकर बचा सकती है।’ बेटी बाप का मुंह देखती रह गई। बाप ने कहा, ‘इस बेहोश नौजवान के साथ भांवरें ले और ईश्‍वर को साक्षी मान कर कह कि आज से यही मेरा पति है।’ उजली ने पिता की बात मानी और परदेसी के साथ भांवर ले भगवान को प्रणाम कर अनजान परदेसी को पति स्वीकार किया और गुदड़ी में उसे लेकर सो गई।
उजली के बदन की गर्मी से नौजवान परदेसी की बेहोशी टूटी और फिर टूट गये सब बंधन। दो अनजान बदन एक ही रात में एक दूजे के हो गए। पोरबंदर का राजकुमार जेठवा गरीब अमरा चारण की उजली का संसार हो गया। सुबह बारिश थमने के बाद दोनों के बीच मिलन और धूमधाम से शादी के वायदे हुए। कुछ दिन उजली के साथ बिताकर जेठवा वापस चला गया।
बीच में जेठवा अपने पिता यानी पोरबंदर के महाराजा से शिकार पर जाने की कहकर उजली से मिलने आता। छुपकर उजली से मिलता और विवाह के मंसूबे बांधता। फूलों के गहने बना उजली को पहनाता, रात बिताकर सुबह वापस चला जाता। गुपचुप प्रेम की बात आखिर कब तक छुपी रहती, पहले लोगों में बात फैली और फिर राजा तक पहुंची। राजा ने सुना तो जेठवा को बुलाकर धमकाया, ‘चारणों की बेटी राजपूत के लिए बहन समान होती है, खबरदार जो कभी उस लड़की से शादी करने का सपना भी देखा।’ जेठवा ढीला पड़ गया और धीरे-धीरे उजली को भूलने लग गया।
उधर उजली जेठवा की राह तकती रही। वह सुबह से लेकर शाम तक पोरबंदर की तरफ जाने वाली राह पर जेठवा के घोड़े की टापों की आवाज सुनने और जेठवा को देखने के लिए बैठी रहती। कभी उस राह कोई घुड़सवार आता तो उसकी आंखों में चमक आ जाती लेकिन जब वो पास आता तो जेठवा को ना पाकर फिर निराश हो जाती। रातों में वो चांद सितारों से जेठवा को लेकर बातें करतीं। लेकिन अब ना तो जेठवा को आना था और न ही वो आया। आषाढ़ के बादल फिर आए और बरसने लगे। उजली के मन पर बरसात की बूंदें अंगारों की तरह पड़ने लगीं। विरही उजली के दिल में विरह के गीत गूंजने लगे। उजली ने अपने रचे सोरठे जेठवा के पास भेजे, जवाब में जेठवा ने कहला भेजा, ‘तू चारण की बेटी, मैं राजपूत, मेरे लिए तू बहन समान, भूल जा मुझे और कर ले किसी चारण से ब्याह।’ उजली ने जवाब में कहलवाया, ‘जिससे मन लग जाए वही प्रेम और पति होता है, जात-पांत का कोई भेद नहीं होता प्रेम में।’ लेकिन जेठवा का पत्थर दिल जरा भी नहीं पिघला। उसने उजली को कहला भेजा कि अगर तुझे जात-पांत की परवाह नहीं तो मुझसे भी बड़े राजा हैं, कर ले उनसे ब्याह।‘
उजली के तन-मन में आग लग गई। गुस्से से भरी उजली एक दिन निकल पड़ी पैदल ही पोरबंदर की राह। महल के बाहर भूखी-प्यासी पड़ी रही तीन दिन तक। तीसरे दिन जेठवा ने झरोखे से झांकते हुए कहा, ‘उजली तू किसी चारण के बेटे से शादी कर ले और मुझसे आधा राज ले ले।’ सुनकर उजली उठी, पास ही रत्नाकर सागर लहरा रहा था, उजली गई और सीधे सागर में कूद गई।
कहानी अंश
अठारह साल की कुंवारी कन्या बाप का मुंह देखती रह गई।
‘बेटी, यह धर्म है पाप नहीं।’ ठंडी आवाज में बाप ने कहा।
‘अचेत सोए आदमी की दो भांवरें ले, ईश्‍वर को साक्षी मान कह, आज से यह परदेसी मेरा पति’।
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उजली के दिल का दर्द काव्य की लड़ी में गुंथता जाता, उसकी जबान से दोहों और सोरठों की झड़ी लगने लगती। उसे सारा संसार ही जेठवामय दिखाई देता। पशु, पक्षी, ताल, तलैया, सारी प्रकृति में उसे जेठवा घुलामिला लगता। खेत में सारस का एक जोड़ा चुग रहा था। उजली रो पड़ी, संसार में प्रेम को निभाने वाला सारस का जोड़ा या फिर चकोर पक्षी। जेठवा, मुझे तो तीसरा कोई प्रेम निभाने वाला दिखाई नहीं देता।
लेखिका-परिचय
जन्म 24 जून, 1914
सम्मान-पुरस्कार
पद्मश्री, साहित्य महामहोपाध्याय, राजस्थान रत्न, तेस्सीतोरी स्वर्ण पुरस्कार, महाराणा कुंभा पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार सहित अनेकों सम्मान व पुरस्कार
विशेष
राष्ट्रसंघ के निशस्त्रीकरण सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व और कई विश्‍व सम्मेलनों में भाग लिया और यात्रा संस्मरण लिखे। राजस्थान प्रदेश कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं, तीन बार विधायक रहीं और राज्यसभा की सदस्य रहीं।
प्रकाशन
हिंदुकुश के उस पार, शांति के लिए संघर्ष, अंतध्र्वनि, लेनिन री जीवनी, सांस्कृतिक राजस्थान, राजस्थान के रीतिरिवाज, देवनारायण बगड़ावत महागाथा
अनुवाद- रवि ठाकर री बातां, संसार री नामी कहाणियां, सूळी रा सूया माथै- जूलियस फ्यूचिक की ‘फांसी के तख्ते से’ का अनुवाद, गजबण-रूसी कहानियों का राजस्थानी अनुवाद। करीब चालीस किताबें प्रकाशित।

Wednesday, 13 May 2009

जयपुर बम धमाकों की बरसी पर सोचो


एक आंधी में इतने पेड़ उखड़ते देखे हैं मैंने
अब पत्‍ता भी हिलता है तो मेरा दिल कांप उठता है
- ओमप्रकाश ‘नदीम’
13 मई सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि एक ऐसी तारीख है, जिसे याद करना लगातार एक भयानक यातना से गुजरना है। वक्‍त का पहिया आंसुओं को सुखा देता है, लेकिन दिलोदिमाग पर पड़ी खौफ़ और दर्द की ख़राशों को नहीं मिटा सकता, बल्कि वो दिन याद आते ही दर्द की लकीरें कुछ ज्‍यादा लंबी हो जाती हैं। एक बरस पहले कुछ हमलावरों ने तीन सदी पुराने इस अमनपसंद गुलाबी शहर की शांति छीन ली थी, और इस एक बरस में ना जाने कितनी बार उस दिन को फिर से दोहराने की कोशिश भरी अफ़वाहों में यहां के बाशिंदे दहशत के साये में अपने हौसलों के दम पर जिंदादिली के साथ रोजमर्रा के जीवनसंघर्ष में शहर की पहचान को कायम रख सके हैं। लेकिन 13 मई की तारीख आज भी इस शहर के बाशिदों से ही नहीं यहां के कर्णधारों और कानून-व्‍यवस्‍था के अलमबरदारों से सवाल-दर-सवाल कर रही है कि ‘कहां गये वो वायदे वो सुख के ख्‍वाब क्‍या हुए’।
‘हर नई दुर्घटना पिछली दुर्घटनाओं को कार्यसूची से बाहर कर देती है’, क्‍या हम 13 मई की तरह फिर किसी हमले के इंतजार में लापरवाही के साथ आराम से बैठे यह नहीं सोच रहे कि यह मेरा काम नहीं, जो होगा देखा जाएगा, अभी तो कोई दिक्‍कत नहीं। हम ना खुद से सवाल करते हैं और न ही कर्णधारों से और यकीन मानिए हमारी आंखें तब भी नहीं खुलेंगी जब दूसरा हमला होगा। हम फिर एक खास समुदाय और पड़ोसी मुल्‍क पर गुस्‍सा होंगे और किसी ना किसी को उत्‍तरदायी ठहराते हुए अपनी जिम्‍मेदारी से पल्‍ला झाड़ लेंगे और इसके बाद शुरू होगा आतंकवादी के नाम पर बेगुनाह लोगों और निर्दोष अल्‍पसंख्‍यकों को हिरासत में लेने और फिर निर्दोषों की सचाई सामने आने पर बगलें झांकने और नए सिरे से कार्यवाही की शुरूआत का एक अंतहीन सिलसिला। आखिर कब तक यह सब चलता रहेगा। इस एक बरस में हमने आखिर इसके सिवा देखा ही क्‍या है? पुलिस के तमाम दावों और मीडिया इन्‍वेस्टिगेशन के नाम पर बेगुनाह लोगों की जिंदगी बरबाद करने के सिवा हमने क्‍या किया आखिर। उस युवक के बारे में हम क्‍यों नहीं सोचते जिसने डॉक्‍टर बनने का ख्‍वाब ही नहीं देखा, बनने जा रहा था, उसकी जिंदगी बम धमाकों से नहीं हमारी जल्‍दबाजी से और लापरवाही से तबाह हुई, क्‍या वो बमकांड के पीडि़तों में शामिल नहीं है। ऐसे कितने लोग हैं, इसकी हमें ठीक-ठीक जानकारी भी नहीं है। वो तो अच्‍छा हुआ कि पोटा जैसा काला कानून नहीं था, वरना ऐसे निर्दोष जिंदगी भर जेलों में सड़ते रहते।
जिन घरों पर 13 मई के हमलों का कहर टूटा, उनकी हालत इन आंखों से देखी नहीं जाती। बचे हुए लोगों को इलाज के नाम पर क्‍या मिला, मृतकों के परिवारों को हर्जाने के नाम पर क्‍या हासिल हुआ, जिनका काम-धंधा चौपट हुआ वो कहां हैं, क्‍या हमने इन सवालों पर कभी ग़ौर किया है। पीयूसीएल की एक जन-सुनवाई में ऐसे सैंकड़ों सवाल उठाये गये थे, लेकिन यकीन मानिए अखबारों में उसका बेहद संक्षिप्‍त विवरण छपा, क्‍योंकि वो जन-सुनवाई 13 मई को नहीं हुई। मीडिया में अब आतंक की खबर भी जयंती-पुण्‍यतिथि की तरह ही बिकती है। आतंकवाद को इस कदर सांप्रदायिक रंग दे दिया गया है कि बेगुनाह अल्‍पसंख्‍यक की पैरवी करना आतंकवादियों के पक्ष में खड़ा होना माना जाता है। और बहुसंख्‍यक को आतंकवादी साबित होने के बाद भी गौरवान्वित किया जाता है और निर्दोष माना जाता है।
इस एक बरस में हम जरा भी नहीं चेते, आज भी उसी तरह लोग अपने वाहन बेतरतीबी से पार्क करते चले जा रहे हैं, कोई किसी को नहीं टोकता कि अपने वाहन पर सामान छोड़कर क्‍यों जा रहे हो। पुलिस शायद ही कभी किसी के सामान या वाहन की जांच करती है, लोग अपने साइकिल-दुपहियों पर इतना बड़ा माल-असबाब ले जाते हैं कि हैरत होती है। दिल्‍ली के अलावा दूसरे रास्‍तों से आने वाली बसों और दूसरी गाडियों में कौन क्‍या ला रहा है कोई नहीं देख रहा। दाढ़ी और टोपी के सिवा हम किसी पर शक नहीं करते। आज भी लोग उसी तरह अनजान लोगों को मकान किराये पर दे रहे हैं, चंद पैसों के लिए होटल, गेस्‍ट हाउस वाले किसी के पहचान दस्‍तावेज की मौलिकता या वैधता पर सवाल नहीं करते। क्‍या हम तभी जागेंगे जब 13 मई को किसी और तारीख में दोहराया जाएगा। बकौल शायर ओमप्रकाश नदीम -
उस पेड़ से उम्‍मीद फल की कोई क्‍या करे
आपस में जिसके गुंचा-ओ-ग़ुल में तनाव है

Sunday, 10 May 2009

विजय दान देथा 'बिज्जी' की कहानी नाहरगढ़



भारतीय साहित्य के गौरवशाली रचनाकार विजयदान देथा उर्फ ‘बिज्जी’ की कहानियों में एक तरफ लोक का जादुई आलोक है तो दूसरी तरफ सहज चिंतन और गहरे सामाजिक सरोकारों से ओतप्रोत एक सजग रचनाकार का कलात्मक एवं वैचारिक स्पर्श। भारतीय मेधा का उत्कृष्ट रूप अगर आपको देखना हो तो आपको बिज्जी की कहानियों से एक बार रूबरू होना ही पडे़गा। उनकी कहानियों पर पहेली, परिणति और दुविधा जैसी फिल्में बन चुकी हैं और हबीब तनवीर विश्विख्यात नाटक ‘चरणदास चोर’ दुनिया भर में प्रदर्शित कर चुके हैं। बिज्जी के कथालोक में ‘नाहरगढ’ एक अनूठी कहानी है, जो जानवरों के माध्यम से मानवीय जगत की बुराइयों और उसके तमाम अच्छे-बुरे पहलुओं की तरफ संकेत करती है।
एक बडे धनी सेठ ने लक्खी बंजारे से 108 मोहरों में एक खूंखार सिंधी कुत्ता खरीदा, जिसका नाम था नाहर। यथा नाम तथा गुण नाहर ने सेठ की दौलत की ऐसी रखवाली की कि चोर-डाकू सेठ की ड्योढी की तरफ आते हुए भी डरते। नाहर ने कइयों को यमलोक पहुंचा दिया। सेठ के तीन लडकों में सबसे बडा शादीशुदा था और उसकी बीवी गहनों की शौकीन। बीवी ने पति के ऐसे कान भरे कि एक दिन वह चोरों के साथ मिलकर पिता की सारी दौलत ले उड़ा। लड़के ने एक पखवाड़े तक नाहर को रोज आधी रात को चूरमा खिलाना शुरू किया और सोलहवीं रात खिलाते-खिलाते नाहर को प्यार से सहलाते हुए उसके मुंह पर तारों की छींकी बांध दी और उसके चारों पैर रस्सी से बांध दिये। बंधनों में जकडा़ नाहर कुछ ना कर सका और उसकी आंखों के सामने ही चोर और सेठ का बेटा सारी दौलत साफ कर गये।
सुबह उठकर सेठ-सेठानी ने जो देखा तो दोनों के होश उड गये। उन्होंने इसके लिए नाहर को ही दोषी ठहराया। सेठ ने नाहर को बहुत मारा, लेकिन वह यह सोचकर सह गया कि मालिक बिचारा तमाम दौलत लुट जाने से दुखी है। नाहर ने सेठ-सेठानी से अपनी सफाई में जो भी हो सकता था वो कहा लेकिन दोनों ने उसकी एक ना सुनी और उसे घर से बाहर कर दिया। नाहर को उन्होंने रोटी देना भी बंद कर दिया। नाहर को रोटी से ज्यादा इस बात की चिंता थी कि उस पर ही तोहमत लगाई गई और बेटे की करतूत पर सेठ को बिल्कुल भी गुस्सा नहीं आया। सेठ ने मानाकि नाहर की मिली भगत के बिना कोई परिंदा भी उसकी दौलत की तरफ पर नहीं मार सकता था। सात दिन तक नाहर को ना रोटी मिली ना पानी। वह दुबला गया और भूख के मारे चिंतन करते नाहर को जैसे एक नई दिशा मिल गई। सातवें दिन वह एकदम उछलकर खडा हो गया और पांच-सात बार जोर-जोर से भोंका। गुस्साए सेठ-सेठानी बाहर आए तो नाहर ने कहा, ‘कसम खाता हूं कि आइंदा किसी इंसान की चौखट नहीं चढूंगा और कोशिश करूंगा कि कोई कुत्ता इंसान के तलवे ना चाटे। अब तो इस दुखी कौम के उद्धार के लिए ही मेरी जिंदगी है।’
सेठ की ड्योढी छोडकर नाहर निकला तो कौम के कुत्तों से संवाद हुआ। नाहर ने सबको समझाया कि इंसान से अलग एक नई बस्ती बसाने का वक्त आ गया है, जहां वे अपनी अलग दुनिया में रहेंगे और एक आजाद जिंदगी जीएंगे। कुत्तों को पहले तो नाहर की बातें समझ ही नहीं आईं कि आखिर इंसान के बिना कुत्ते रह कैसे सकते हैं। लकडबग्घे उन्हें कभी भी मार डालेंगे। नाहर ने एक-एक कुत्ते को सौ-सौ बार समझाया तब जाकर कुछ के समझ में आया। नाहर की मेहनत से आखिरकार सूने जंगल में ग्यारह हजार कुत्तों की एक अलग बस्ती बसाई गई और नाहर के नाम पर उसका नामकरण किया गया ‘नाहरगढ’। कुत्तों की आदतों में हुए बदलाव और उनके बीच एकता की परख करने के लिए नाहर उन्हें गंगा स्नान कराने के लिए ले गया और वापसी में पाया कि कुत्ते सचमुच बदल गए हैं। कुत्तों की इस बस्ती का जल्द ही दूर-दूर तक डंका बजने लगा। इंसान डर के मारे सीधा हो गया। लकडबग्घे दूर भाग गये। नाहर ने एक आदेश निकाला कि हर गांव से दो-दो मोतबर आदमी नाहरगढ आकर बातचीत करें।
नाहर के बुलावे पर तीन सौ लोग आए, जिनमें सेठ और उसका लडका भी शामिल था। नाहर ने फरमान सुनाया कि अगले पांच साल तक इस बस्ती के तमाम कुत्तों के रहने, खाने-पीने और पहनने-ओढने का बंदोबस्त करना है। यह युगों की गुलामी का हर्जाना है। गेहूं का दलिया, गुड, घी और नारियल की गिरी, खाने के लिए बडे थाल और पचास टहलुए, जो हरदम सेवा में रहें। गांव वालों ने हिसाब-किताब लगाकर सब इंतजाम करने का वचन दिया। इंसानी हाथ और बुद्धि के कौशल से सबके लिए अलग-अलग झोपडियां बनीं और बीचोंबीच एक शानदार गढ बनाया गया। सरदी से बचाव के लिए सबकों ऊनी झूल दी गई। बस्ती का सारा काम सहज गति से चलने लगा। नाहर ने कौम के लिए एकनिष्ठ सहवास का जो नियम बनाया उससे पहले तो परेशानी हुई लेकिन आखिर सबको मानना पडा। हर पूनम की रात सभा जुटती जिसमें नाहर एक ही बात कहता कि इंसान के अलावा हमें किसी से खतरा नहीं है। इंसान इस बस्ती की तरक्की से जल रहा है और वो कोई ना कोई षडयंत्र रचने में लगा होगा, इसलिए हमेशा सावधान रहना।
नाहर को बस्ती के एकछत्र राजा होने के कारण कुछ अभिमान भी हो गया था। होशियार कुत्तों ने नाहर को खुश रखने के लिए अपनी बीवियों को उसके पास भेजा। नाहर पहले तो कडा रहा लेकिन जब नरम पडने लगा तो ऐसा पडा कि उसने कुत्ते-कुत्ते में फर्क करना शुरू कर दिया। सत्ता के अहंकार ने नाहर में दूसरी बुराइयां भी पैदा कर दीं, वह सुबह सोचता कि सूरज उग जाना चाहिए और थोडी देर में सूरज उग जाता। उसे लगने लगा कि दुनिया में जो कुछ हो रहा है, सब उसी की इच्छा और मर्जी के कारण होता है। बारिश, बादल, हवा, चांदनी, दिन, रात सब उसकी वजह से होते हैं।
अगले साल बस्ती की आबादी बीस गुना बढ गई तो पचास आदमियों की तादाद इतनी बडी आबादी के लिए झोंपडी बनाने के लिए कम पडने लगी। आदमी बढाने की बात नाहर को ठीक नहीं लगी, अगर ज्यादा आदमी हो गये तो वो बस्ती को बर्बाद कर देंगे। उसने नया आदेश निकाला कि एक परिवार में एक ही पिल्ला रहेगा, बाकी खाने के काम आएंगे और आदेश के साथ ही हजारों पिल्ले मारे गये। गलियों में पिल्लों के खून की नदियां बह गईं।
नाहर बस्ती को विश्‍वास दिलाता कि इंसान उनका दुश्‍मन नंबर एक है। भरोसेमंद भेदिये पक्की खबर लाए हैं कि एक लाख लक्कडबग्घों की फौज नाहरगढ पर हमला करने की तैयारी में है। बस्ती को एक रहना है। बस्ती के कुछ कुत्तों को इंसान ने तोड लिया है। ऐसे कुत्तों से होशियार रहना है। नाहरगढ की गलियों में मुनादी गूंजने लगी। हेलिया नामक कुत्ते के यह बात गले नहीं उतरी और उसने धीरे-धीरे कुत्तों को अपने साथ लेना शुरू कर दिया, हेलिया के समर्थक बढने लगे। नाहर को उसकी भनक लग चुकी थी। उसने तय किया कि मौका आने पर वह हेलिया को ठिकाने लगा देगा। और जल्द ही वह मौका आ गया।
एक सुबह एक बैलगाडी पर एक आदमी भींटोरा लेकर जा रहा था। नाहर की गर्जना से बस्ती इकट्ठी हो गई। नाहर ने कहाकि जिस चीज का डर था वह आ गई है। उसने कहाकि बैलगाडी पर काली मौत आ रही है, इसलिए सब जोर से भौंको। बैलगाडी के नजदीक आने पर हेलिया ने कहाकि यह मौत नहीं है, यह तो दरअसल झरबेरियों के झाड हैं, जिनसे इंसान बाड बनाते हैं, इससे कोई खतरा नहीं। नाहर को हेलिया का यह अंदाज नागवार गुजरा। उसने हेलिया को खूब भला-बुरा कहा। हेलिया कुछ कहता इससे पहले ही नाहर ने सबको जोर से भौंकने का आदेश दे दिया। कुत्ते भोंकते रहे और बैलगाडी चुपचाप चली गई। हेलिया ने कहाकि नाहरगढ के भाग्य से यह खतरा टल गया है फिर भी सावधान रहने की जरूरत है। नाहर ने कहाकि खतरा टला नहीं छुप गया है, रात को अचानक हमला हो सकता है। यह कहकर वह खतरे को देखने के लिए बैलगाडी की तरफ चल दिया।
बहुत दूर तक चलने के बाद नाहर को लगा कि कोई खास खतरा नहीं है, इसलिए वह बैलगाडी के नीचे चलने लगा। बैलगाडी के साथ चलते-चलते उसे लगा कि बैलगाडी उसी की वजह से चल रही है, जब वह रूकता तो बैलगाडी भी रूक जाती। उसे लगा बैलगाडी क्या यह सारी दुनिया उसी के भरोसे चल रही है। इस अहसास के साथ वह वापस लौट आया। चबूतरे पर खडे होकर उसने घोषणा की कि डरने की कोई जरूरत नहीं, मेरे होते हुए नाहरगढ पर कोई खतरा नहीं है। मेरे कारण वह बैलगाडी चलती रही, मैं रूकता तो वह भी रूक जाती। इस पर हेलिया ने कहा कि आप बस एक शंका का समाधान कर दें कि बैलगाडी यहां तक कैसे आई और अब जब आप यहां हैं, वह कैसे चल रही है। नाहर को लगा यही ठीक समय है और उसने हेलिया के खिलाफ ऐसा धुंआधार बोलना शुरू किया कि नाहर के विश्‍वासपात्र कुत्तों ने हेलिया और उसके समर्थकों के चिथडे-चिथडे कर डाले। जब चार-पांच कुत्ते हेलिया की खोपडी पर झपटकर उसका भेजा खाने लगे तो नाहर ने उन्हें रोक दिया, ‘खबरदार जो इस गद्दार का भेजा खाया, इसे खाकर तुम्हारा भी दिमाग खराब हो जाएगा।’ सब वहां से हट गये। वह खोपडी आज भी वहीं पडी है, खाने के लिए सबका मन ललचाता है, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं होती। एक कडकती आवाज फिजाओं में गूंजती रहती है-खबरदार! खबरदार!!
बिज्जी की इस कहानी में अनेक स्तरों पर नए-नए अर्थ ध्वनित होते हैं। एक तरफ यह मनुष्य द्वारा अपने पालतू कुत्ते के प्रति बिना वजह अविश्‍वास करने के कारण उपजी परिस्थितियों में कुत्ते के मानसिक विचलन और मनुष्य जाति से ही मुक्ति की कथा है तो दूसरी तरफ नाहरगढ बस्ती के बहाने मनुष्य जगत की कमजोरियों का कुत्तों के माध्यम से प्रत्याख्यान है। संक्षेप में कहें तो किसी भी जाति की मुक्ति अकेले नहीं हो सकती, इसी बात को यह कहानी रेखांकित करती है। मुक्ति चाहे मजलूमों की हो या जानवरों की वह साहचर्य और सामूहिक रूप से ही संभव है। दरअसल कुत्ता यहां एक प्रतीक भर है जिसे आप किसी भी वंचित समुदाय से जोडकर देख सकते हैं, जो अज्ञान के अंधेरे में मुक्ति की कामना करता है।

कहानी अंश
खून के आंसू रोते नाहर बोला, ‘ऐसा क्या किया मैंने! बेटे के अकरम का गुस्सा मुझ पर निकालते हो! अपने बाप से घात करने वाला मुझे कब छोडता! पैसा तो आदमी के हाथ का मैल है। फिर कमाया जा सकता है। पर मेरा यह कलंक तो मरकर भी नहीं मिटेगा। मुझे आपसे यह उम्मीद नहीं थी।’
सेठानी के होशोहवास ने जवाब दे दिया था। ताली बजाकर जोर से हंसी। बोली, ‘तू क्या समझता है, अपने जाए बेटे से मुझे यह उम्मीद थी! हम इंसान तो पैसों के लिए एक-दूसरे का गला काट सकते हैं, पर तुझे तो पैसों का लोभ नहीं। तेरी नीयत क्यूं खराब हुई?’
वो सुबकते बोला, ‘इस तोहमत से तो अच्छा है आप मुझे मार डालें।’
ःःःःःःःःःःःःःः
सबका मांस नोचने के बाद जब चार-पांचेक कुत्ते हेलिया की खोपडी पर झपटे तो नाहर उन्हें होशियार करते दहाड़ा, ‘खबरदार! इस गद्दार का भेजा मत खाना, वरना तुम्हारा दिमाग भी बिगड़ जाएगा।यह बहुत खतरनाक छूत की बीमारी है, जो मौत से पहले ही मार डालती है। खबरदार, जो किसी ने इसकी ओर देखा तो।’

Tuesday, 5 May 2009

इतिहास में यायावरी और लेखन

यायावरी और लेखनकला का लिखित इतिहास लगभग दो हजार साल पुराना है। विश्‍व इतिहास में हमें पहली किताब प्राचीन यूनान के यात्री पावसानियास की 'डेस्क्रिप्‍शन आफ ग्रीस’ मिलती है, जिसमें दूसरी शताब्‍दी के यूनान के बारे में प्राथमिक किस्‍म की जानकारियां मिलती हैं। पावसानियास के काम को साहित्‍य और पुरातत्‍व का मिलाजुला दस्‍तावेज माना जाता है। एक अनुमान के मुताबिक वह लीडिया का रहने वाला था और उसने प्राचीन यूनान ही नहीं रोम और मिश्र की भी यात्रा की थी। उसने मिश्र के पिरामिड, एम्‍मान का मंदिर, मैसिडोनिया में आरफियस का गुंबद, इटली से गुजरते हुए कंपानिया शहर और ट्राय शहर के अवशेष देखे। लिखित इतिहास में पावसानियास के बाद ईरान के नासिर खुसरो की ‘सफरनामा’ का भी खासा महत्‍व है। नासिर खुसरो का जन्‍म आज के अफगानिस्‍तान में सन 1004 में हुआ था। वह एक कवि, दार्शनिक और इस्‍लामी विद्वान था, जिसे गणित, चिकित्‍साशास्‍त्र और ज्‍योतिष-खगोलशास्‍त्र का भी अच्‍छा ज्ञान था। उसने मध्‍य-पूर्व और भारत तक की यात्रा की थी। सन 1046 से 1052 के बीच नासिर खुसरो ने करीब सात साल में उन्‍नीस हजार किमी की यात्रा की। उसने मक्‍का, कैरो, बगदाद, सीरिया, यरूशलम, लाहौर, मुल्‍तान और सिंध की यात्रा की। खुसरो के बाद स्‍पेन के कवि इब्‍न जुबैर का यात्रा वृतांत ‘द ट्रेवल्‍स आफ इब्‍न जुबैर’ मिलता है, जिसने सन 1183 से 1185 के बीच स्‍पेन से समुद्री यात्रा शुरू की और मिश्र, अलेक्‍जेंड्रिया, कैरो, मक्‍का, मदीना, यरूशलम, बगदाद और सिसिली की यात्रा की।
तेरहवीं शताब्‍दी के विश्‍वप्रसिद्ध यात्री मार्को पोलो से सब परिचित हैं। उसने लौटकर अपनी यात्रा का जो वृतांत पश्चिमी दुनिया के सामने रखा, उस पर लोग विश्‍वास भी नहीं करते थे। मार्को पोलो पहला पश्चिमी यात्री था, जिसने चीन की यात्रा की। वह चंगेज खां के पडपोते कुबला खान से मिला था और उसी ने पूर्व और पश्चिम के बीच व्‍यापार की शुरूआत की थी। मार्को पोलो के बाद इब्‍न बतूता की भारत यात्रा इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है। मोरक्‍को के इस अदभुत यात्री ने अपनी जिंदगी के 65 बरसों में करीब तीस साल तक यात्राएं की। उसने ईराक, ईरान, अफ्रीका, मध्‍य एशिया, दक्षिण एशिया, चीन, भारत, बांग्‍लादेश, बर्मा, अल्‍जीरिया, माले, टयूनिशिया, सुमात्रा, फिलीपींस, मलेशिया, सीरिया, मिश्र, अरब के सभी देशों सहित तुर्की और पूर्वी यूरोप के कई देशों की यात्राएं की। इब्‍न बतूता के बाद इतिहास में अंग्रज लेखक रिचर्ड हकलेविट की अमरिका यात्रा का वर्णन भी अपना खास मुकाम रखता है। उसने उत्‍तरी अमेरिका और कई ब्रिटिश उपनिवेशों की खोजपूर्ण यात्राएं कीं और दो महत्‍वपूर्ण किताबें लिखीं। सत्रहवीं शताब्‍दी में फ्रांस के फ्रेंकोइस डी ला बूले ले गूज ने भारत, इर्रान, मिश्र, यूनान, मध्‍य पूर्व, इंग्‍लैंड, जर्मनी और अनेक यूरापीय देशों की यात्रा की और फ्रेंच में मशहूर यात्रा विवरण लिखा। भारत को लेकर लिखे गये यात्रा संस्‍मरणों में अफनासी निकीतीन की भारत यात्रा विश्‍वप्रसिद्ध है। इस रूसी यात्री ने भारत की सामाजिक, आर्थिक व्‍यवस्‍था और उस वक्‍त होने वाले युद्धों का रोचक और विश्‍वसनीय विवरण लिखा। उसी ने पहली बार पश्चिमी जगत को बताया कि भारत में हाथी जैसा जानवर होता है, जिस पर बैठकर युद्ध लडे जाते हैं।
इतिहास में यात्रा और लेखन को लेकर बात करें तो सैंकडों क्‍या हजारों लेखकों की बात की जा सकती है। और दरअसल देखा जाए तो लेखन अंतत: एक किस्‍म की यात्रा ही है। कालिदास का मेघदूत एक काव्‍यात्‍मक यात्रा संस्‍मरण ही तो है। कर्नल जेम्‍स टाड और एल.पी. टैस्सिटोरी का काम भी यात्रा विवरण ही है। भारत को लेकर अल बरूनी की किताब एक रोमांचक यात्रा संस्‍मरण है। लेकिन भारत के महानतम यायावरों की बात की जाए तो महापंडित राहुल सांकृत्‍यायन का नाम सबसे उपर आएगा। राहुल जी ने भारत के विभिन्‍न स्‍थ्‍ालों की ही नहीं श्रीलंका, तिब्‍बत, चीन और मध्‍य एशिया की बेहद लंबी और खेजपूर्ण पैदल यात्राएं की। वे अपनी यात्राओं में दुर्लभ और ऐतिहासिक महत्‍व के प्राचीन ग्रंथों को बर्बाद होने से बचने के लिए खच्‍चरों पर लादकर भारत लाए। राहुलजी ने देश के युवाओं को घुमक्‍कडी की शिक्षा देने के लिए कई किताबें लिखीं और कहा कि भारत के प्रत्‍येक सामर्थ्‍यवान और साहसी युवक को यायावर हो जाना चाहिए, तभी देश की उन्‍नति हो सकती है।
इतिहासप्रसिद्ध यायावरों की किताबों को आज इतिहास माना जाता है, लेकिन ये अपने समय के सर्वश्रेष्‍ठ यात्रा संस्‍मरण हैं। हम एक काल में यात्रा करते हैं और उसके बारे में लिखते हैं। आगे चलकर वही इतिहास हो जाता है। हम कहीं की भी यात्रा करें, अगर उस जगह के बारे में हमें पहले से कुछ जानकारी हो तो सच मानिए यात्रा का मजा दोगुना हो जाता है। वजह यह कि हम अपनी जानकारी से उस जगह का एक दिमागी नक्‍शा बना लेते हैं और फिर वहां जाकर जो देखते हैं तो एक दूसरी तस्‍वीर बनती है, वह आपको रोमांचित कर देती है।
लेखक और यायावरी का चोली दामन जैसा साथ होता है। बिना यायावरी के श्रेष्‍ठ लेखन संभव नहीं। एक दायरे में कैद होकर लिखना आसान है, लेकिन दुनिया के तमाम अदेखे अनजाने पक्षों को यायावरी करके ही लिखा जा सकता है। यायावरी लेखक की कल्‍पनाशीलता को नए आयाम प्रदान करती है। नई जगह देखने और समझने की जो सुविधा देती है, वह लेखक की खुराक होती है। इसीलिए आप पाएंगे कि लगभग हर लेखक यायावर होता है। लेकिन हर यायावर लेखक हो यह जरूरी नहीं। फिर भी इतिहास में हमें ऐसे यायावर लेखक मिलते हैं, जिन्‍होंने जिंदगी में एक ही किताब लिखी और वो भी यायावरी की। मराठी में विष्‍णुभटट गोडसे की ‘माझा प्रवास’ ऐसी ही किताब है। धार्मिक वृत्ति के गोडसे 1857 में महाराष्‍ट्र से पैदल उत्‍तर भारत की यात्रा के लिए चल पडे और गदर में फंस गए। लौटकर उन्‍होंने इसका रोचक विवरण लिखा। यह किताब अम़ृत लाल नागर को मिली और उन्‍होंने इसका हिंदी में अनुवाद किया ‘आंखों देखा गदर’। इस किताब से जाना जा सकता है कि धार्मिक पर्यढन भी किस कदर ऐतिहासिक महत्‍व का हो सकता है। इस लिहाज से अज्ञेय द्वारा कुंभ मेले को लेकर लिखे गये विवरण अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण हैं। इसी प्रकार हिंदी और भारतीय भाषाओं में ऐसे हजारों उदाहरण मिलेंगे। अमृतलाल वेगड ने हिंदी में नर्मदा की यात्रा करके जो संस्‍मरण लिखे हैं, उनमें नर्मदा मैया के प्रति श्रद्धा और प्रकृति का मोहक विवरण पढकर मन तृप्‍त हो जाता है। कथाकार गोविंद मिश्र ने गोवर्धन परिक्रमा को लेकर एक शानदार पुस्‍तक लिखी है।
जीवन एक प्रकार से यात्रा ही है और हर पल हम सफर में रहते हैं। लेकिन इसका विवरण लिखना जितना सहज लगता है वैसा होता नहीं और उस यात्रा को लिखना जिस पर आप होकर आए हैं उसे तुरंत लिखना भी संभव नहीं होता। बहुत से ऐसे लेखक हैं जिन्‍होंने यात्रा के कई बरस बाद जाकर यात्रा वृतांत लिखा। हालांकि कुछ ऐसे लेखक भी होते हैं जो किसी जगह बिना गए ही विश्‍वसनीय यात्रा विवरण लिख देते हैं या दोस्‍तों को सुनाते हैं। यायावरी और लेखन का एक रोमांचक इतिहास है, जिसकी यात्रा किताबों को पढकर ही की जा सकती है।

Sunday, 3 May 2009

राम की हत्या



हिन्दी और राजस्थानी के महान कथाकार यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ निर्विवादित रूप से रांगेय राघव के बाद प्रदेश के राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले विरल साहित्यमकारों में से थे. उनकी सैंकडों कहानियां पाठकों के दिलोदिमाग में पैठी हुई हैं. 15 अगस्त, 1932 को बीकानेर में जन्मे ‘चन्द्र’ जी का एक माह पहले ही निधन हुआ है. उनकी सवा सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, संस्मरण और बाल साहित्य भी शामिल है. ‘चन्द्र’ जी को दर्जनों सम्माान और पुरस्कारों से नवाजा गया। वे राजस्थासन के संभवतः अकेले मसिजीवी रचनाकार थे, जिन्होंने सिर्फ लेखनी के बल पर ही पूरा जीवन जिया. उनके साहित्य में राजस्थान का लोकजीवन, यहां की सांस्कृकति परंपराएं और कठोर जीवन संघर्ष में मुब्तिला आम आदमी के साथ, खास तौर पर संघर्षशील महिलाएं भी दिखाई देती हैं.


उनके विशद कथा साहित्य में ‘राम की हत्या‘ एक ऐसी कहानी है, जो आज भी बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है और आज के माहौल में बहुत ही प्रासंगिक भी नजर आती है। रामलीला में राम का चरित्र निभाने वाले कलाकार मंगल की हत्या कर दी गई है और लोगों की भीड उसकी लाश को घेरे खडी है। लोग लाश पर भिनभिनाने वाली मक्खियों से बात का सिरा शुरू करते हैं। पास में एक सफेद बालों वाला बुजुर्ग खडा है. एक युवक उससे कहता है कि उस्ताद तुम्हारे राम की हत्या हो गई है. बुजुर्ग के चेहरे पर कोई भाव नहीं आते. रावण की भूमिका निभाने वाला कलाकार भीड को हटाने के लिए सबसे कहता है कि घर जाओ यहां क्यों भीड लगा रखी है. पुलिस आती है और फिर अस्पताल से लेकर श्मशान तक का एक लंबा सिलसिला चलता है. बुजुर्ग उस्ताद को याद आता है कि कल रात कैसे राम ‘सीते सीते’ चिल्लाता हुआ दर्शकों में राम-सीता के प्रेम और विरह की भावनाएं जगा रहा था. उसे बीस बरस पहले की एक घटना याद आ जाती है, जिस वक्त वह खुद राम की भूमिका निभाया करता था.


किसी गांव में उनकी मण्डली जमी हुई थी और एक सेठ ने उन्हें भोजन के लिए अपनी हवेली में बुलवाया था। खाने से पहले ही एक व्यक्ति आकर उसे यानी ‘राम’ को भीतर बुलाकर ले गया। वहां एक कोठरी में एक अनिंद्य सुंदरी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। यह सेठ की विधवा बेटी थी, जो रोज रामलीला में गुप्त नाम से राम को एक रूपये के नोटों की माला पहनाती थी. वह बाल विधवा उस वक्त के राम यानी उस्तोद नर्मदाप्रसाद को सीधे-सीधे प्रणय निवेदन करती है. उस्ताद स्पष्ट रूप से इन्कार कर देता है, क्योंकि उसके लिए गुरू हनुमान महाराज की दी हुई शिक्षा के अनुसार राम का चरित्र निभाने के लिए राम जैसा आचरण भी करना चाहिए. उसे रामलीला की यह नौकरी भी बडी मुश्किलों से गुरू की अथक सेवा के बाद मिली थी, वह नौकरी और चरित्र दोनों को नहीं छोडना चाहता था. युवती उस्ताद को बहुत प्रलोभन देती है, सोने की जंजीर, नौकरी और बहुत कुछ देने का वादा करती है. वह उसे राम होने के कारण उस पर दया करने के लिए भावनात्मक रूप से भी उकसाती है. पहले वह उस्ताद का हाथ पकडती है, फिर वासना के मारे उससे लिपट जाती है, उस्ताद नहीं मानता. वह उस कामासक्त युवती से कहता है कि वह पहले से ही शादीशुदा है और पराई नार को छूना उसके लिए पाप समान है. लडकी गुस्सा हो जाती है और उस्ताद किसी तरह वहां से बाहर निकल आता है. उस दिन उसे सेठ का स्वादिष्ट भोजन भी जहर लगता है.


श्मशान में रामलीला मण्डली के सब लोग चीख पुकार मचा रहे हैं, कामेडियन तक भयानक रूदन कर रहा है, लेकिन उस्ताद गुमसुम-चुपचाप बैठे हैं। उन्हें याद आता है कि उस बाल विधवा युवती के सामने भी अपना धर्म और ईमान नहीं छोडा और राम की मर्यादा को बरकरार रखा। उस्तांद को एक और स्त्री याद आती है जो उसे रोज एक सेर दूध भेजती थी और एक दिन उससे मिलने आई। उसने भी उस्ताद से प्रणय निवेदन किया था, जिसे उस्ताद ने बडी सहजता से अस्वीिकार कर दिया था। वह स्त्री भी युवती की तरह ही गुस्से से भर गई थी। उस्ताद को पता था कि इस राम की हत्या् शूर्पणखा के भाई मेघनाद ने की है। मण्डली के लोग पूछते हैं कि राम का चरित्र निभाने वाले मंगल की मौत का क्या उस्ताभ्द को कोई गम नहीं है? उस्ताद कहते हैं कि मंगल की मौत से ज्यादा गम इस बात का है कि उसे अपनी करनी का दण्डं मिला है। तुम सब लोग अपने कर्तव्य और धर्म की राह से भटक गए हो। उस्ताद बताते हैं कि मंगल ने किस तरह ‘राम’ की मर्यादा पहले ही दिन भंग कर दी थी। वह सीता की बजाय उस युवती के लिए विलाप करता था, जो उसकी तरफ प्यार भरी निगाहों से देखती थी। मंगल ने दिन में उस लडकी के साथ रास रचाना शुरू कर दिया और लडकी ने शूर्पणखा की भूमिका ले ली. उस लडकी की नाक कट गई और उसके भाई को पता चल गया. ‘राम’ बने मंगल ने उस लडकी से उपहार में सोने का नेकलैस भी ले लिया और उस्ताद के पूछने पर साफ इन्का’र भी कर गया. पेशे और चरित्र के प्रति इस किस्म् की बेइमानी का नतीजा यही होना था. ‘


चन्द्र’ जी की यह कहानी आज के घोर अर्थवादी, अनैतिक और निर्लज्ज समय में इसलिए अधिक प्रासंगिक है, क्यों कि आज चारों तरफ देखिए, अनैतिकता का महारास दिखाई देता है। रामलीला जैसे धार्मिक महत्व के आयोजन-प्रयोजन भी कहीं न कहीं पेशे के प्रति बेइमानी और लोगों का इस तरफ से ध्यान हटने के कारण अपना महत्व खोते जा रहे हैं. उस्ताद के रूप में हमें इस कहानी में एक ऐसा आदर्श चरित्र मिलता है जो तमाम मुश्किलों के बीच भी अपनी कला और नैतिकता को बचाने के लिए प्रतिबद्ध है. वासना में डूबी स्त्रियों के माध्यम से ‘चन्द्र ’ जी उन प्रलोभनों की तरफ इशारा करते हैं जो प्रतिबद्ध और ईमानदार लोगों को पथ से विचलित करने के लिए समाज में हर तरफ बिखरे पडे हैं. ‘चन्द्र’ जी इस कहानी में रामायण के पात्रों का प्रयोग करते हुए बहुत गहरा व्यंग्य करते हैं और धार्मिक प्रतीकों के प्रयोग से कहानी को त्रेता से कलियुग तक ले आते हैं. अपने समय को इस प्रकार देखना और व्याख्यायित करना ‘चन्द्र‘ जी की बहुत बडी खूबी थी, जिसके लिए उन्हें सदैव याद किया जाएगा.


कहानी अंश


‘मुझे छोड दीजिए। मैं आपके हाथ जोडता हूं। मैं राम हूं। हनुमान महाराज ने कहा था कि बेटा राम का पार्ट मांग रहे हो, उसे करने के लिए उस जैसी महान आत्मा भी चाहिए। उस जैसी मर्यादा भी चाहिए। जब तक तुममें अपने पेशे प्रति पवित्रता नहीं होगी, तब तक तुम मंच पर वह राम लग ही नहीं सकते, जो जन-जन के घट में बसा हुआ है।’ लेकिन बूली वासना में डूबी थी। वह उससे लिपट गई। वह आवेश में बडबडा रही थी, ‘मेरी पीर को जानो राम। मैं आपको बहुत चाहती हूं।’


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मंगल ‘राम’ की मर्यादा भूल गया... वह दिन के उजाले में विलास के फूल खिलाने लगा। यह राम, जो मयार्दा पुरूषोत्तम कहलाता है, ने मर्यादा के जिस्म पर लगे सलमों-सितारों को तोडना शुरू कर दिया। शूर्पणखा की नाक कट गई। मंगल ने राम की मर्यादा भंग की। वह अपने पेशे प्रति ईमानदार नहीं रहा। जिस पेशे ने उसके पेट की आग बुझाई, यश दिया, मान-सम्माान दिया, उस पेशे के धर्म को भूलकर वह मर्यादाविहीन हो गया।


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जयपुर से प्रकाशित दैनिक नवज्योति अख़बार में शुरू किया गए नए स्तम्भ 'एक कहानी' का आरम्भ आज इस कहानी से हुआ है, जिसमें राजस्थान के हिन्दी-राजस्थानी कथाकारों की एक प्रतिनिधि कहानी का सार संक्षेप और महत्त्व रेखांकित करने का विनम्र प्रयास किया जाएगा।























Thursday, 30 April 2009

प्रसिद्ध उर्दू लेखक कमर रईस नहीं रहे



उर्दू के जाने माने साहित्‍यकार और विद्वान डा. कमर रईस का कल रात दिल्‍ली के बत्रा हास्पिटल में निधन हो गया। 77 वर्षीय रईस पिछले कई दिनों से पीलिया का इलाज करा रहे थे। उनके परिवार में पत्‍नी और एक पुत्री है। कमर रईस भारत सरकार के संस्‍कृति विभाग में काम करते हुए कई वर्षों तक ताशकंद में रहे। वहीं उन्‍होंने मुगल बादशाह जहीरूदीन बाबर के जीवन पर अपनी मशहूर किताब लिखी जिसमें बाबर के जीवन के अछूते पक्षों पर खोजपरक दृष्टि से अनेक महत्‍वपूर्ण जानकारियां दी गई हैं। कमर रईस ने अपने ताशकंद प्रवास के दौर में ही एक और अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण किताब का संपादन किया ‘अक्‍टूबर रिवोल्‍यूशन – इंपेक्‍ट आन इंडियन लिटरेचर’। इस किताब की भूमिका पूर्व प्रधानमंतगी इाई.के. गुजराल ने लिखी थी। कमर रईस ने सज्‍जाद जहीर और रतननाथ सरशार की जीवनियां लिखीं। उर्दू साहित्‍य में मुंशी प्रेमचंद का महत्‍व स्‍थापित करने में उनकी बडी भूमिका रही। प्रेमचंद पर उर्दू में उनकी प्रसिद्ध किताब है ‘प्रेमचंद का फन’। वे करीब पच्‍चीस बरस तक प्रगतिशील लेखक संघ के उर्दू संगठन अंजुमन तरक्‍कीपसंद मुसन्‍नफीन के सेक्रेट्री रहे। फिलवक्‍त वे दिल्‍ली उर्दू एकेडमी के वाइस चेयरमैन थे।
मेरी उनसे एक ही मुख्‍तसर सी मुलाकात रही, जब उन्‍होंने अंजुमन तरक्‍कीपसंद मुसन्‍नफीन की जानिब से इलाहाबाद में सज्‍जाद जहीर की जन्‍मशती का भव्‍य समारोह करवाया था। उस समारोह में पाकिस्‍तान से जाहिदा हिना सहित करीब पच्‍चीस लेखक आए थे।
प्रस्‍तुत तस्‍वीर में बाईं तरफ कमर रईस हैं अपने एक दोस्‍त के साथ।


Saturday, 25 April 2009

हमेशा रहेगी किताबों की जरूरत


उस दुनिया की कल्‍पना करना कितना भयावह है, जिसे किताबों के बिना जीना पडता है। लेकिन सच्‍चाई यही है, आज भी विश्‍व की करीब पचास फीसद जनता पुस्‍तकविहीन अंधकारमय जीवन जीने के लिए विवश है। लेकिन यह भी इतना ही बडा सच है कि ऐसे अज्ञान और अंधकार भरे समाज के लिए किताब पहुंचाने की कोशिशें भी वैश्विक स्‍तर पर जारी हैं। देश में चल रहे ‘सर्वशिक्षा अभियान’ जैसे प्रयास दुनिया के तमाम निर्धन देशों में चल रहे हैं। हालांकि ऐसा मानने वाले लोगों की भी कमी नहीं है कि बिना किताबों के भी ज्ञान प्राप्‍त किया जा सकता है और यह एक हद तक सच भी है। हमारे पुरखों ने ज्ञान के नाम पर अपने समय में जो कुछ प्राप्‍त किया वह जीवनानुभवों का ही सार है, जिसके बिना किताब भी संभव नहीं होती, क्‍योंकि किताब भी आखिरकार एक व्‍यक्ति के अनुभूत ज्ञान और संचित जीवनानुभवों का ही तो समुच्‍चय है।
इस दुनिया को आज हम जिस रूप में देख रहे हैं, उसके पीछे किताबों की बहुत बडी भूमिका है। दुनिया के तमाम धर्मों में एक या अधिक किताबों की जरूरत हमेशा से रही है, जिनसे उनके अनुयायियों को धर्म की राह पर चलने के लिए एक रास्‍ता मिलता है। आज भी लोगों के लिए किताब अगर एक पवित्र किस्‍म की चीज है तो वह इसीलिए कि प्रारंभ में किताब का अर्थ धार्मिक किताब ही होता था, जिसके पैर से छू जाने या गिर जाने से अनर्थ की आशंका होती थी और धर्म का अपमान लगता था। मजहबी किताबें दुनिया में सबसे ज्‍यादा बिकने वाली किताबें हैं और शायद हमेशा रहेंगी। वजह यह कि पढना आये या ना आये अपने धर्म की किताब हर व्‍यक्ति घर में जरूर रखना चाहता है। सुख-दुख के अवसरों पर इनकी महत्‍ता रहती है, घर को ये एक किस्‍म की पवित्रता प्रदान करती हैं। व्‍यक्ति को ऐसी किताबों के अध्‍ययन और श्रवण से आत्मिक संतोष मिलता है। इसीलिए सभी धर्मों में आप देखेंगे कि धार्मिक किताबों के समय-समय पर पाठ आयोजित करने की परंपरा है, फिर वह चाहे गुरूग्रंथ साहिब का पाठ हो या रामायण का, कुरानख्‍वानी हो या बाइबिल का पाठ।
धार्मिक किताबों का महत्‍व इस मायने में स्‍वीकार किया जाना चाहिए कि इन्‍हीं की वजह से शिक्षा का प्रसार भी हुआ। आज भी बहुत से लोग अगर लडकियों को पढने स्‍कूल भेजते हैं तो यही समझकर कि चलो कम से कम वह कुरान, रामायण या गुरूग्रंथ साहिब का पाठ तो कर लेगी और अपने बच्‍चों को ठीक-ठाक संस्‍कार दे सकेगी। लेकिन किताबों की दुनिया का यह एक बहुत बडा सच है कि यह एक प्रकार से मनुष्‍य में संक्रामक रोग भी पैदा करती है, अर्थात जिसे पढना आ गया वह एक के बाद दूसरी किताब पढने की ओर आगे बढता है। और पढने की इस चाहत ने ही किताबों की दुनिया को परवान चढाया है। जिन लडकियों को धार्मिक किताबें पढने के लिए पाठशाला भेजा गया, वे आगे चलकर दूसरी किताबें पढकर खुद लेखिकाएं बन गईं, ऐसे हमारे समाज में सैंकडों उदाहरण हैं।
आज के तेजी से बदलते संचार क्रांति के युग में बहुत से लोग कहते हैं कि अब किताबें अप्रासंगिक हो जाएंगी, वजह यह कि किताबों की जगह लेने के लिए बाजार में बहुत सी चीजें आ गई हैं और किताबों का स्‍वरूप भी बदल गया है। सीडी, डीवीडी, ई-बुक, और इसी किस्‍म की बहुत सी ईजादों ने किताब का स्‍थान लेने की कोशि की है, लेकिन पश्चिम के अघाये हुए समाज की मानें तो आज भी पन्‍ने पलटकर, कहीं भी बैठकर, लेटकर, यात्रा करते हुए यानी किसी भी तरह किताब पढने से बेहतर कुछ नहीं है। आधुनिक संसाधनों ने जो सबसे बडा काम किया वो यह कि किताबों की उम्र और पढने का दायरा बढा दिया। आज दुनिया के लाखों पुस्‍तकालय डिजिटलाइज्‍ड हो रहे हैं, आनलाइन हो रहे हैं, हजारों की तादाद में ऐसी वेबसाइटें मौजूद हैं जिन पर दुनिया भर की असंख्‍य किताबों के बारे में जानकारी ही हासिल नहीं की जा सकती, बल्कि डाउनलोड कर किताबें पढी भी जा सकती हैं। अभी तक अप्राप्‍य और दुर्लभ समझी जाने वाली असंख्‍य किताबें आज इंटरनेट की दुनिया में या तो उपलब्‍ध हैं या ऐसा करने के प्रयास वैश्विक स्‍तर पर चल रहे हैं। इस तरह संचार क्रांति किताबों की दुनिया के लिए वरदान सिद्ध हो रही है।
दुनिया बदल रही है और इस बदलती हुई दुनिया की यह एक बहुत बडी सच्‍चाई है कि दुनिया में आज मौजूद अनेक समस्‍याएं अज्ञान और अशिक्षा के कारण हैं। फिर वो चाहे आतंकवाद हो या मजहबी कटटरता के कारण पनपने वाला सांप्रदायिक विद्वेष, इन सबकी जड में अशिक्षा और अज्ञान ही है। किताबों की दुनिया ही हमारे समाज को बताती है कि सब धर्म एक परमात्‍मा तक पहुंचने के अलग-अलग रास्‍तों के सिवा कुछ नहीं हैं, मनुष्‍य का एकमात्र धर्म है मानवता की सेवा और सब धर्मों का मूल मकसद है इस धरती को सुंदर बनाना, मानव मात्र को सुखी बनाना। प्रत्‍येक धर्म की किताब यही सिखाती है, लेकिन कुछ लोग हैं जो उनका अलग अर्थ निकालकर लोगों को एक दूसरे खिलाफ भडकाते हैं और व्‍यर्थ में खून बहाते हैं। इस प्रक्रिया में ना जाने कितनी सभ्‍यताएं नष्‍ट हो चुकी हैं और नष्‍ट होंगी, फिर किताबें ही बताएंगी कि क्‍यों वे सभ्‍यताएं नष्‍ट हुईं।


एक फ्रांसिसी दार्शनिक ने म्रत्‍यु शैया पर कहा था, ‘जो कुछ हम जानते हैं वह बहुत थोडा है, जो नहीं जानते वह बहुत अधिक है।‘ किताबों की दुनिया हमारे लिए उस अजाने संसार के दरवाजे खोलती है, जिसे हम एक जीवन में प्राप्‍त नहीं कर सकते। प्रत्‍येक विद्धान, मनीषी यही कहता है कि मैं तो एक विद्यार्थी मात्र हूं। किताबें ही यह विनम्रता का बोध पैदा करती हैं और मनुष्‍य को महामानव बनाती हैं। मनुष्‍य जीवन में किताबों का महत्‍व सदा से किसी ना किसी रूप में मौजूद रहा है और धरती के नष्‍ट होने तक रहेगा। इस दुनिया में किताब की ताकत का अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि बहुत से आततायी और हिंसक लोगों ने सिर्फ डर की वजह से न केवल किताबें, बल्कि पूरी की पूरी लाइब्रेरियां जला डालीं।
(विश्व पुस्तक दिवस २१ अप्रेलको जयपुर 'डेली न्यूज़' में आलेख.)