
समलैंगिकता को लेकर चल रही तमाम बहसों में इस बात की चर्चा नहीं हो रही कि साहित्य, कला, संस्कृति और दर्शन से लेकर विभिन्न ज्ञान अनुशासनों में समलैंगिक संबंधों को बहुत सामान्य ढंग से लिया जाता रहा है। और इसका इतिहास कोई दो-चार सौ नहीं हजारों साल पुराना है। प्राचीन यूनान में पुरूषों के बीच समलैंगिक संबंध बहुत ज्यादा होते थे। महान उपन्यासकार ई.एम. फोर्स्टर का लिखा प्रसिद्ध उपन्यास ‘मॉरिस’ उनकी मृत्यु के बाद जब 1978 में प्रकाशित हुआ तब पश्चिमी जगत को पता चला कि जिस संबंध को वे लोग दुष्कर्म मानते हैं वो उनके पथप्रदर्शक प्राचीन यूनान में अत्यंत सामान्य संबंध था। इस उपन्यास पर इसी नाम से 1987 में एक फिल्म भी बनी थी जिसे जेम्सं आइवरी ने निर्देशित किया था। सिकंदर और नेपोलियन की सेना में समलैंगिक संबंध सहज थे। आज भी दुनिया की प्राय: सभी सेनाओं में समलैंगिक संबंध सामान्यं माने जाते हैं। इसकी वजह साफ तौर पर लंबे समय तक स्त्री से दूर रहना है। कई देशों की सेनाओं और दूसरी नौकरियों में समलैंगिकों को सामान्य व्यक्ति की तरह सभी अधिकार मिले हुए हैं।
इस दुनिया में अनेक महानतम लेखक, कलाकार और दार्शनिक ऐसे हुए हैं जो समलैंगिक थे। मोनालिसा के महान चित्रकार और शल्य चिकित्सक लियोनार्दो विंसी, महान दार्शनिक सुकरात, महान चित्रकार माइकल एंजिलो, जॉन ऑव आर्क, अरस्तू, जूलियस सीजर, वर्जीनिया वुल्फ, महान संगीतकार चायकोवस्की, शेक्सपीयर, हेंस क्रिश्चियन एंडरसन, लार्ड बायरन, सिकंदर महान, अब्राहम लिंकन, नर्सिंग आंदोलन की प्रणेता फलोरेंस नाइटेंगल और अनेक महान लोगों के बारे में जानकारी मिलती है कि ये सब कम या अधिक मात्रा में समलैंगिक थे। इन महान लोगों के काम से दुनिया आज भी अभिभूत है तो इसका सीधा सा मतलब है कि यौन वृत्ति का प्रतिभा से कोई लेना देना नहीं है। हम यहां उदाहरण के लिए सिर्फ दो महान लोगों की चर्चा करेंगे जो समलैंगिक होते हुए भी महान काम करके गए।
पहले चर्चा माइकल एंजिलो की। 6 मार्च 1475 को इटली में जन्में इस महान कलाकार को अनेक विधाओं में महारत हासिल थी। वो कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुकार और इंजीनियर था। लियोनार्दो विंसी का समकालीन यह महान कलाकार यूरोप में पुनर्जागरण का नायक था। मात्र 24 साल की उम्र में उसने अपनी महान कलाकृति ‘पिएता’ रच दी थी, जिसमें सूली से उतारने के बाद ईसा मसीह अपनी मां मेरी की गोद में लेटे हुए हैं। माइकल एंजिलो को रोम के लगातार सात पोप, कई गिरजाघर और गुंबद बनाने का काम देते रहे और उसने दुनिया की अनुपम कलाकृतियां रचीं जो आज भी मानवीय सभ्यता और कला-संस्कृति की बेशकीमती धरोहर है। उसके रचे महान मूर्तिशिल्प ‘स्टेच्यू ऑव डेविड’ में आप उसकी कला का अद्भुत सौंदर्य ही नहीं वरन उसकी समलैंगिक छवि भी देख सकते हैं। सिस्टीन चैपल की छत पर बने महान चित्रों में ‘क्रिएशन ऑव एडम’ में माइकल एंजिलो की समलैंगिक मानसिकता को बहुत खूबसूरती के साथ देखा जा सकता है।
बीसवीं शताब्दी में जिन लेखिकाओं ने अपने लेखन से जबर्दस्त तहलका मचाया और साहित्य की दुनिया में नई राह बनाई उनमें वर्जीनिया वुल्फ का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। 1882 में लंदन में जन्मी इस महान लेखिका के साथ उसके सौतेले भाइयों ने बचपन में इस कदर दुराचार किया कि वो जिंदगी भर उन भयावह क्षणों को नहीं भूल पाई। तभी तो वो इतना कुछ लिख पाई जिसे हम आज नारीवादी लेखन कहते हैं। यह जानना भी कई बार कितना भयानक होता है कि इस विचार का जन्म कितनी अंतहीन यातनाओं से गुजरने के बाद हुआ है। वुल्फ की त्रासदी यह थी कि वो अकेली नहीं बल्कि उसकी बहनें भी भाइयों की कमसिन वासना का शिकार हुईं। वर्जीनिया ने शादी की किंतु कभी भी पति के साथ सामान्य स्त्री की तरह दैहिक आनंद के लिहाज से खुश नहीं रही। जिंदगी में उसकी बड़ी उम्र की महिलाएं गहरी मित्र रहीं। कुछ के साथ वर्जीनिया के शारीरिक संबंध भी रहे। यौन संबंधों के लिहाज से वुल्फ बहुत आजाद खयाल महिला थी। उसकी कहानियों में आप तत्कालीन उच्चमध्य्वर्गीय अंग्रेज समाज के भीतर व्याप्त दोमुही मानसिकता को साफ देख सकते हैं जिसमें स्त्री की हैसियत सजावटी गुडि्या से अधिक नहीं है। वर्जीनिया वुल्फ ने अपने उपन्यास द वॉयेज आउट, ऑरलैंडो और बिटविन द एक्ट्स में सेक्सु और पात्रों की मानसिक उथलपुथल का गजब का चित्रण है।
पश्चिमी जगत में ही नहीं पूर्वी जगत में भी यह आम बात रही है। हम सब जानते हैं लेकिन नैतिकता की दुहाई देकर इसे स्वीकारने से बचते हैं। धर्म के झण्डाबरदार लोग मानवीय संबंधों को हमेशा से ही धार्मिक कानून के दायरे में लाने की कोशिेशें करते हैं। याद कीजिए मीरा नायर की फिल्म ‘फायर’ के बाद मचा बवाल, जिसमें देवरानी-जेठानी के समलैंगिक संबंधों को बताया गया था। भारत की बात बाद में करेंगे, पहले चीन की चर्चा करते हैं, जहां प्राचीन काल से ही यानी तकरीबन 2600 साल पहले से साहित्य में समलैंगिक संबंधों को लेकर लिखा जाता रहा है। बाओयू के उपन्यास ‘ड्रीम ऑव रेड चेंबर’ से लेकर कैनेथ पाई के ‘क्रिस्टल बॉयज़’ तक चीनी साहित्य में समलैंगिक संबंधों की एक लंबी परंपरा मिलती है।

भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी ही क्या लगभग सभी भाषाओं के साहित्य_ में ही समलैंगिक संबंधों की चर्चा किसी ना किसी रूप में देखने को मिलती है। हालांकि लेखक इसे स्वींकार नहीं करेंगे, लेकिन यह भी सच्चाई है कि अनेक लेखकों में समलैंगिक संबंधों की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। अंग्रेजी के कवि अशोक राव अकेले लेखक हैं जो बरसों से खुद को गर्व से समलैंगिक कहते आए हैं और समलैंगिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष भी करते रहे हैं। इधर चल रही बहस में एक ब्लांगर ने उर्दू शायरी से चुनकर कई शेर उद्ध्रत किये हैं जिनसे पता चलता है कि रचनाकार को समलैंगिक कहा जा सकता है। हाफिज फारसी के बड़े शायर थे, उनका यह शेर देखिए,
गर आन तुर्क शीराजी बे-दस्तत आरद दिल-ए-मारा
बा खाल हिंदोश बख्श म समरकंद ओ बुखारा
अर्थात अगर यह तुर्क लड़का मेरे दिल की पुकार सुन ले तो इसके माथे पर लगे मस्से के लिए मैं समरकंद और बुखारा कुर्बान कर दूं।
अब महान शायर मीर का यह बयान देखिए,
तुर्क बच्चे से इश्क किया था रेख्ते मैंने क्या क्या कहे
रफता रफता हिंदुस्तान से शेर मेरा ईरान गया
या
मीर क्या सादे नैन उसके बीमार हुए जिसके सबब
उसी अत्तार के लौंडे से दवा लेते हैं
समकालीन उर्दू कविता में इफतिखार नसीम ‘इफती’ एकमात्र शायर हैं जो खुद के समलैंगिक होने की बात स्वीकार करते हैं। अब आप ख्वाजा हैदर अली आतिश का यह शेर देखिए,
जुलेखा को दिखाए आसमान तस्वीर युसूफ की
ये दिल दीवाना है जिसका परी-पैकर है वो लड़का
उर्दू शायरी में लोग दबी जुबान से समलैंगिक संबंधों की बात स्वीकार करते हैं। हिंदी में अभी तक ऐसा साहसी लेखक कोई नहीं सामने आया, अलबत्ता मनोहर श्याम जोशी ने अपने उपन्यासों में समलैंगिक संबंधों की खुली चर्चा की है, जिसे खूब दुत्कारा गया है। लेकिन साहित्य के अलावा संगीत और कला संस्कृति की दुनिया में समलैंगिक संबंध बहुत आम हैं। दबे छिपे ढंग से लोग इनकी चर्चा करते हैं, लकिन खुलकर स्वींकार नहीं करते। क्यों कि हमारे यहां ऐसे संबंधों को अभी भी अच्छी नजर से नहीं देखा जाता।
वयस्क व्यक्ति एक आत्मचेतस मनुष्य होता है और न्यायालय ने इसी आधार पर आपसी सहमति से समलैंगिक संबंधों को जायज और कानूनी माना है। साहित्य्, कला और संस्कृति की दुनिया के लोग सामान्य से अलग होते हैं, समाज में उनकी अलग प्रतिष्ठा होती है। वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ज्यादा अहमियत देते हैं, इसलिए यौन संबंधों में भी वे अगर सामान्य से अलग होते हैं तो उन्हें ऐसा करने की स्वंतंत्रता होती है। इस प्रकार के संबंधों को सहज लिया जाना चाहिए, क्योंकि महज यौन साथी चयन की प्रवृत्ति या प्राथमिकता के आधार पर आप किसी की प्रतिभा का आकलन नहीं कर सकते और न ही किसी को हेय या प्रेय कह सकते हैं। आधी सदी पहले ही विज्ञान यह मान चुका है कि समलैंगिक होने से कोई व्यक्ति दुराचारी या अनैतिक या मानसिक रूप से बीमार नहीं होता, फिर हमें विज्ञान की बात माननी चाहिए कि धर्म के कठमुल्लों की जो खुद कई किस्म के कुकर्मों में आए दिन लिप्त पाए जाते हैं। किसी भी व्यक्ति को जैसे दोस्त चुनने की आजादी है वो रहनी चाहिए, अब यह उन पर निर्भर है कि वो इस दोस्ती को कहां तक ले जाते हैं। कात्यायनी ने एक कविता में लिखा है, ‘सभी वासनाएं दुष्ट नहीं होतीं।‘




